तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

रविवार, 23 जुलाई 2017

Flyover-unnder pass cause of jam in rainy season

शहरी विकास की पोल खोलती बारिश

महानगरों में बढ़ते यातायात को सहज बनाने के लिए बीते एक दशक के दौरान ढेर सारे फ्लाईओवर और अंडरपास बने। दावे किए गए कि अमुक सड़क अब ट्रैफिक सिग्नल से मुक्त हो गई है। इसके बावजूद वहां प्रति दिन जाम लगना आम बात है। यदि मानवजन्य कारणों को अलग कर दिया जाए तो दिल्ली जैसे शहरों में जाम लगने के अधिकांश स्थान या तो फ्लाईओवर हैं या फिर अंडरपास। यह मुसीबत बरसात के दिनों में और गंभीर हो जाती है

फजीहत करवाते फ्लाईओवर
पंकज चतुर्वेदी

 


अभी कुछ फुहारें क्या पड़ी ,दिल्ली और उसके आसपास के सभी महानगर- गाजियाबाद, नोएडा, गुडगांव पानी-पानी हो गए। कई सड़कों पर पांच किलोमीटर तक लंबा जाम लग गया। गरमी से निजात के आनंद की कल्पना करने वाले सड़कों पर जगह-जगह पानी भरने से ऐसे दो-चार हुए कि अब बारिश के नाम से ही डर रहे हैं। बारिश भले ही रिकार्ड में बेहद कम थी, लेकिन आधी दिल्ली ठिठक गई। जहां उड़ कर जाने को यह भी नहीं कि ऐसा केवल दिल्ली में ही हो रहा है। यह तो हर साल की कहानी है और देश के कोई दो दर्जन महानगरों की त्रासदी है। हर बार सारा दोष नालों की सफाई ना होने ,बढ़ती आबादी, घटते संसाधनों और पर्यावरण से छेड़छाड़ पर थोप दिया जाता हैं । विडंबना है कि शहर नियोजन के लिए गठित लंबे-चौडे़ सरकारी अमले पानी के बहाव में शहरों के ठहरने पर खुद को असहाय पाते हैं । दुखद है कि जाम का कारण बनने वाला पानी का भराव उन जगहों पर होता है जिन्हे सड़क निर्माण तकनीक की आधुनिक संरचना कहते हैं - अंडर पास व फ्लाई ओवर।
देश की राजधानी दिल्ली में सुरसामुख की तरह बढ़ते यातायात को सहज बहाव देने के लिए बीते एक दशक के दौरान ढेर सारे फ््लाई ओवर और अंडरपास बने। कई बार दावे किए गए कि अमुक सड़क अब ट्राफिक सिग्नल से मुक्त हो गई है, इसके बावजूद दिल्ली में हर साल कोई 185 जगहों पर 125 बड़े जाम और औसतन प्रति दिन चार से पांच छोटे जाम लगना आम बात है।  इनके प्रमुख कारण किसी वाहन का खराब होना, किसी धरने-प्रदर्शन की वजह से यातायात  का रास्ता बदलना, सड़कांे की जर्जर हालत ही होते हैं । लेकिन जान कर आश्चर्य होगा कि यदि मानवजन्य जाम के कारणों को अलग कर दिया जाए तो महानगर दिल्ली में जाम लगने के अधिकांश स्थान या तो फ्लाई ओवर हैं या फिर अंडर पास। और यह केवल बरसात के दिनों की ही त्रासदी नहीं है, यह मुसीबत बारहों महीने, किसी भी मौसम में आती है। कहीं इसे डिजाईन का देाश कहा जा रहा है तो कहीं लोगों में यातायात-संस्कार का अभाव। लेकिन यह तय है कि अरबों रूपए खर्च कर बने ये हवाई दावे हकीकत के धरातल पर त्रासदी ही हैं।
बारिश के दिनों में अंडर पास में पानी भरना ही था, इसका सबक हमारे नीति-निर्माताओं ने आईटीओ के पास के शिवाजी ब्रिज और कनाट प्लेस के करीब के मिंटो ब्रिज से नहीं लिया था। ये दोनों ही निर्माण बेहद पुराने हैं और कई दशकों से बारिश के दिनों में दिल्ली में जल भराव के कारक रहे हैं। इसके बावजूद दिल्ली को ट्राफिक सिग्नल मुक्त बनाने के नाम पर कोई चार अरब रूपए खर्च कर दर्जनभर अंडरपास बना दिए गए। लक्ष्मीनगर चुंगी, द्वारका मार्ग, मूलचंद,पंजाबी बाग आदि कुछ ऐसे अंडर पास हैं जहां थोड़ी सी बारिश में ही कई-कई फुट पानी भर जाता है। सबसे षर्मनाम तो है हमारे अंतरराश्ट्रीय हवाई अड्डे को जोड़ने वाले अंडर पास का नाले में तब्दील हो जाना। कहीं पर पानी निकालने वाले पंपों के खराब होने का बहाना है तो सड़क डिजाईन करने वाले नीचे के नालों की ठीक से सफाई ना होने का रोना रोते हैं तो दिल्ली नगर पालिका अपने यहां काम नहीं कर रहे कई हजार कर्मचारियों की पहचान ना कर पाने की मजबूरी बता देती है। इन अंडरपास की समस्या केवल बारिश के दिनों में ही नहीं है। आम दिनों में भी यदि यहां कोई वाहन खराब हो जाए या दुर्घटना हो जाए तो उसे खींच कर ले जाने का काम इतना जटिल है कि जाम लगना तय ही होता है। असल में इनकी डिजाईन में ही खामी है जिससे बारिश का पूरा जल-जमाव उसमें ही होता है। जमीन के गहराई में जा कर ड्रैनेज किस तरह बनाया जाए, ताकि पानी की हर बूंद बह जाए, यह तकनीक अभी हमारे इंजीनियरों को सीखनी होगी।
ठीक ऐसे ही हालात फ्लाईओवरों के भी हैं। जरा पानी बरसा कि उसके दोनो ओर यानी चढ़ाई व उतार पर पानी जमा हो जाता है। कारण एक बार फिर वहां बने सीवरों की ठीक से सफाई ना होना बता दिया जाता है। असल में तो इनकी डिजाईन में ही कमी है- यह आम समझ की बात है कि पहाड़ी जैसी किसी भी संरचना में पानी की आमद ज्यादा होने पर जल नीचे की ओर बहेगा। मौजूदा डिजाईन में नीचे आया पानी ठीक फ्लाईओवरों से जुड़ी सड़क पर आता है और फिर यह मान लिया जाता है कि वह वहां मौजूद स्लूस से सीवरों में चला जाएगा। असल में सड़कों से फ्लाईओवरों के जुड़ाव में मोड़ या अन्य कारण से एक तरफ गहराई है और यहीं पानी भर जाता है। कई स्थान पर इन पुलों का उठाव इतना अधिक है और महानगर की सड़कें हर तरह के वाहनों के लिए खुली भी हुई हैं, सो आए रोज इन पर भारी मालवाहक वाहनों का लोड ना ले पाने के कारण खराब होना आम बात है। एक वाहन खराब हुआ कि कुछ ही मिनटों में लंबा हो जाता है। ऐसे हालात सरिता विहार, लाजपत नगर, धौलाकुआं, नारायणा, रोहिणी आदि में आम बात हैं।
अंडर पास का हर बार तालाब बन जाना गाजियाबाद के गौशाला अंडरपास की स्थाई समस्या है तो जयपुर जाने वाले राश्ट्रीय राजमार्ग 8 पर गुडगांव के लिए जाने वाले प्रत्येक रपटे पर बारिश का पानी जमा होता ही है। दिल्ली के हवाई अड्डे स ेले कर दिलशाद गार्डन तक के अंडर पास जरा से बादल बरसने पर दरिया बन जाते हैं। फरीदाबाद में प्रत्येक पुल बरसात के बाद जाम हो जाता है। यह दिक्कत अकेले दिल्ली एनसीआर तक ही नहीं है, लखनउ, इंदौर, पटियाला, सूरत जैसे षहर भी पुल व भूमिगत पथों के बारिश में बेकार होने की शिकायतें करते रहते हैं। भले ही अब बरसात कुछ ही दिनों होती हो, लेकिन कुछ ही दिनों में कुछ ही घंटों में होने वाला जाम ईंधन की बर्बादी, उससे उपजे कार्बन के कारण धरती को स्थाई नुकसान तथा ईंधन की खरीद पर भारत के विदेशी पूंजी के व्यय में इजाफा करता है। जाहिर है कि फ्लाई ओवर और अंडरपास के डिजाईन बरसात को ध्यान में रख कर बनाए जाने आवश्यक हैं ताकि उससे पानी को बचाया भी जा सके।
अब षायद दिल्ली को वर्ल्ड क्लास सिटी बनाने के स्वप्नदृश्टाओं को सोचना होगा कि कई अरब-खरब खर्च कर यदि ऐसी ही मुसीबत को झेलना है तो फिर ट्राफिक सिग्नल सिस्टम ही क्या बुरा है ? जैसे हाल ही में सरकार को समझ में आया कि कई-कई करोड़ खर्च कर बनाए गए भूमिगत पैदल पारपथ आमतौर पर लोग इस्तेमाल करते ही नहीं हैं और नीतिगत रूप से इनका निर्माण बंद कर दिया गया है। 
यह विडंबना है कि हमारे नीति निर्धारक यूरोप या अमेरिका के किसी ऐसे देश की सड़क व्यवस्था का अध्ययन करते हैं जहां ना तो दिल्ली की तरह मौसम होता है और ना ही एक ही सड़क पर विभिन्न तरह के वाहनों का संचालन। उसके बाद सड़क, अंडरपास और फ्लाईओवरों की डिजाईन तैयार करने वालों की शिक्षा भी ऐसे ही देशों में लिखी गई किताबों से होती हैं। नतीजा सामने है कि ‘‘आधी छोड़ पूरी को जावे, आधी मिले ना पूरी पावे’’ का होता है। हम अंधाधंुध खर्चा करते हैं, उसके रखरखाव पर लगातार पैसा फूंकते रहते हैं- उसके बावजूद ना तो सड़कों पर वाहनों की औसत गति बढ़ती है और ना ही जाम जैसे संकटों से मुक्ति। काश! कोई स्थानीय मौसम, परिवेश और जरूरतों को ध्यान में रख कर जनता की कमाई से उपजे टैक्स को सही दिशा में व्यय करने की भी सोचे। सरकार में बैठे लोग भी इस संकट को एक खबर ेस कहीं आगे की सोच के साथ देखे।

पंकज चतुर्वेदी
यूजी-1, 3/186 ए राजेन्द्र नगर
सेक्टर-2
साहिबाबाद
गाजियाबाद 201005
9891928376, 0120-4241060
चब7001010/हउंपसण्बवउ

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शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

sewar death spot for cleaner

गंदगी के समंदर में गर्क होती जिंदगी

सीवर सफाई में लगे श्रमिकों के बीच किए गए सर्वे से मालूम चलता है कि उनमें से 49 फीसदी लोग सांस की बीमारियों, खांसी व सीने में दर्द के रोगी हैं। 11 प्रतिशत को डरमैटाइसिस, एक्जिमा और ऐसे ही चर्म रोग हैं।

अभी बीते शनिवार को दिल्ली के घिटोरनी में एक फार्म हाउस के सीवर की सफाई के दौरान चार लोग काल के गाल में समा गए। इसी साल अप्रैल महीने में दिल्ली एनसीआर के फरीदाबाद और गाजियाबाद में सीवर की जानलेवा गैस से दम घुटने के चलते छह लोग मरे हैं। एक अप्रैल को उदयपुर में एक ही स्थान पर पांच लोग मारे गए। ऐसी मौतें हर साल हजार से ज्यादा होती हैं। हर मौत का कारण सीवर की जहरीली गैस बताया जाता है।

हर बार कहा जाता है कि यह लापरवाही का मामला है। पुलिस ठेकेदार के खिलाफ मामला दर्ज कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है। यही नहीं अब नागरिक भी अपने घर के सैप्टिक टैंक की सफाई के लिए अनियोजित क्षेत्र से मजदूरों को बुला लेते हैं और यदि उनके साथ कोई दुर्घटना होती है तो न तो उनके आश्रितों को कोई मुआवजा मिलता है और न ही कोताही करने वालों को कोई समझाईश। शायद यह पुलिस को भी नहीं मालूम है कि सीवर सफाई का ठेका देना हाईकोर्ट के आदेश के विपरीत है। समाज के जिम्मेदार लोगों ने कभी महसूस ही नहीं किया कि नरक-कुंड की सफाई के लिए बगैर तकनीकी ज्ञान व उपकरणों के निरीह मजदूरों को सीवर में उतारना अमानवीय है।
विडंबना है कि सरकार व सफाई कर्मचारी आयोग सिर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा पर रोक लगाने के नारों से आगे इस तरह से हो रही मौतों पर ध्यान ही नहीं देते। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और मुंबई हाईकोर्ट ने सात साल पहले सीवर की सफाई के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे, जिनकी परवाह और जानकारी किसी को नहीं है। सरकार ने भी सन 2008 में एक अध्यादेश लाकर गहरे में सफाई का काम करने वाले मजदूरों को सुरक्षा उपकरण प्रदान करने की अनिवार्यता की बात कही थी। नरक कुंड की सफाई का जोखिम उठाने वाले लेागों की सुरक्षा-व्यवस्था के कई कानून हैं और मानव अधिकार आयोग के निर्देश भी।

लंकिन इनके पालन की जिम्मेदारी किसी की नहीं। कोर्ट के निर्देशों के अनुसार सीवर की सफाई करने वाली एजंसी के पास सीवर लाईन के नक्शे, उसकी गहराई से संबंधित आंकड़े होना चाहिए। सीवर सफाई का दैनिक रिकॉर्ड, काम में लगे लोगों की नियमित स्वास्थ्य जांच, आवश्यक सुरक्षा उपकरण मुहैया करवाना, काम में लगे कर्मचारियों का नियमित प्रशिक्षण, सीवर में गिरने वाले कचरे की नियमित जांच कि कहीं इसमें कोई रसायन तो नहीं गिर रहे हैं, जैसे निर्देशों का पालन होता कहीं नहीं दिखता।

यह एक शर्मनाक पहलू है कि यह जानते हुए भी कि भीतर जानलेवा गैसें और रसायन हैं, एक इंसान दूसरे इंसान को बगैर किसी बचाव या सुरक्षा-साधनों के भीतर ढकेल देता है । सनद रहे कि महानगरों के सीवरों में महज घरेलू निस्तार ही नहीं होता, उसमें ढेर सारे कारखानों की गंदगी भी होती है। यही नहीं सीवर के काम में लगे लोगों को सामाजिक उपेक्षा का भी सामना करना होता है। दिल्ली में सीवर सफाई में लगे कुछ श्रमिकों के बीच किए गए सर्वे से मालूम चलता है कि उनमें से 49 फीसदी लोग सांस की बीमारियों, खांसी व सीने में दर्द के रोगी हैं। 11 प्रतिशत को डरमैटाइसिस, एक्जिमा और ऐसे ही चर्म रोग हैं। लगातार गंदे पानी में डुबकी लगाने के कारण कान बहने व कान में संक्रमण, आंखों में जलन व कम दिखने की शिकायत करने वालों का संख्या 32 फीसदी थी। भूख न लगना उनका एक आम रोग है।

इतना होने पर भी सीवरकर्मियों को उनके जीवन की जटिलताओं की जानकारी देने के लिए न तो सरकारी स्तर पर कोई प्रयास हुए हैं और न ही किसी स्वयंसेवी संस्था ने इसका बीड़ा उठाया है। आज के अर्थ-प्रधान और मशीनी युग में सफाईकर्मियों के राजनीतिक व सामाजिक मूल्यों के आकलन का नजरिया बदलना जरूरी है। सीवरकर्मियों को देखें तो महसूस होता है कि उनकी असली समस्याओं के बनिस्पत भावनात्मक मुद्दों को अधिक उछाला जाता रहा है। केवल छुआछूत या अत्याचार जैसे विषयों पर टिका चिंतन-मंथन उनकी व्यावहारिक दिक्कतों से बेहद दूर है। सीवर में काम करने वालों को काम के लिए आवश्यक सुरक्षा उपकरण, आर्थिक संबल और स्वास्थ्य की सुरक्षा मिल जाए जो उनके बीच नया विश्वास पैदा किया जा सकता है।

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

children-should-have-a-lot-of-books


बच्चों को चाहिए ढेर सारी किताबें

                                                         
पंकज चतुर्वेदी

बाल मन और जिज्ञासा एक-दूसरे के पूरक शब्द ही हैं। वहीं जिज्ञासा का सीधा संबंध कौतुहल से है। उम्र बढ़ने के साथ ही अपने परिवेश की हर गुत्थी को सुलझाने की जुगत लगाना बाल्यावस्था की मूल-प्रवृत्ति है। भौतिक सुखों व बाजारवाद की बेतहाशा दौड़ के बीच दूषित हो रहे सामाजिक परिवेश और बच्चों की नैसर्गिक जिज्ञासु प्रवृत्ति पर बस्ते के बोझ के कारण एक बोझिल-सा माहौल पैदा हो गया है। ऐसे में बच्चों को दुनिया की रोचक जानकारी सही तरीके से देना राहत भरा कदम होता है। पुस्तकें इसका सहज, सर्वसुलभ और सटीक माध्यम हैं। भले ही शहरी बच्चों का एक वर्ग इंटरनेट व अन्य माध्यमों से ज्ञानवान बन रहा है, पर आज भी देश के आम बच्चे को ज्ञान, मनोरंजन, और भावी चुनौतियों का मुकाबला करने के काबिल बनाने के लिए जरूरी पुस्तकों की बेहद कमी है।
आज बच्चे बड़े अवश्य हो रहे हैं, पर अनुभव जगत के नाम पर एक बड़े शून्य के बीच। पूरे देश के बच्चों से जरा चित्र बनाने को कहें। तीन-चौथाई बच्चे पहाड़, नदी, झोपड़ी और उगता सूरज उकेर देंगे। बाकी बच्चे टीवी पर दिखने वाले डिज्नी चैनल के कुछ चरित्रों के चित्र बना देंगे। यह बात साक्षी है कि स्पर्श, ध्वनि, दृष्टि के बुनियादी अनुभवों की कमी, बच्चों की नैसर्गिक क्षमताओं को किस हद तक खोखला बना रही है।

1857 की क्रांति के वक्त अफगानिस्तान से लेकर कन्याकुमारी तक की साक्षरता दर महज एक फीसदी थी। आजादी के समय भी हमारी साक्षरता दर दयनीय ही थी। आज हमारे यहां शिक्षा भी एक क्रांति के रूप में आई है। यह हम सभी मानेंगे कि अब गांव में स्कूल खुलना उतना ही बड़ा विकास का काम माना जाता है, जितना सड़क बनना या अन्य कोई काम। पर बच्चों पर स्कूल में पढ़ाई का बोझ बढ़ता जा रहा है- ऐसी पढ़ाई का बोझ, जिसका बच्चों की जिंदगी, भाषा और संवेदना से कोई सरोकार नहीं है। ऐसी पढ़ाई समाज के क्षय को रोक नहीं सकती, उसे बढ़ावा ही दे सकती है।

भारत में बाल साहित्य की पुस्तकों का इतिहास दो सौ वर्षों का नहीं हुआ है। वैसे 14वीं सदी में अमीर खुसरो ने पहेलियां लिखी थीं, जिनका लक्षित वर्ग बच्चों को माना गया था। 1817 में कोलकाता में कुछ ईसाई मिशनरियों ने बच्चों के लिए पुस्तकों का प्रकाशन शुरू किया था। राजा शिव प्रसाद सिंह सितारे हिंद ने 1867 में बच्चों के लिए कहानियां लिखीं और 1876 में लड़कों के लिए कहानियां नाम से अपने संग्रह प्रकाशित करवाए थे। कहा जा सकता है कि आधुनिक मुद्रण में बच्चों की हिंदी में पहली किताबें वही थीं।

शुरुआती दिनों में हमारा बाल साहित्य पंचतंत्र, हितोपदेष, जातक, पौराणिक व दंतकथाओं तक ही सीमित रहा। कहा गया कि बाजार उभार में है, सो प्रकाशक ऐसा सुरक्षित रास्ता पकड़ना चाहते हैं जहां उन्हें घाटा न लगे। इक्कीसवीं सदी में वैश्वीकरण ने पूरी दुनिया के दरवाजे एक-दूसरे के लिए खोल दिए। टीवी, इंटरनेट क्रांति ने सूचना का प्रवाह इतना तीव्र कर दिया कि भारत जैसे देश की बाल पीढ़ी लड़खड़ा-सी गई, पर उसका एक फायदा बाल पुस्तकों को जरूर हुआ- उसकी विषयवस्तु और गुणवत्ता आदि में सुधार आया।

मगर यह विडंबना है कि हिंदी के बड़े लेखक बच्चों के लिए लिखने से बचते हैं, जबकि मराठी, बांग्ला में ऐसा नहीं है। आज जरूरी है कि बच्चों की पठन अभिरुचि में बदलाव, उनकी अपेक्षाओं, अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य आदि को ध्यान में रखकर आंचलिक क्षेत्रों तक शोध हों, लोगों को अंग्रेजी ही नहीं, भारत की अन्य भाषाओं में बाल साहित्य पर हो रहे काम की जानकारी मिले तथा हिंदी के बड़े लेखक बच्चों के लिए लिखें।

सोमवार, 17 जुलाई 2017

why rivers are flooding

छेड़छाड़ से बिफर रही हैं नदियां

                            पंकज चतुर्वेदी

जो देश अभी एक महीने पहले एक-एक बूंद पानी के लिए तरस रहा था, बादल क्या बरसे, आधे से ज्यादा इलाका बाढ़ की चपेट में आ गया। असम जैसे राज्य में साठ से ज्यादा मौत हो चुकी हैं व 25 जिले पूरीत रह जलमग्न है।। असम, बिहार, पूर्वी उ.्रप तो हर साल बारिश में हलकान रहता है,लेकिन इस बार तो गुजरात का सौराश्ट्र और राजस्थान के शेखावटी के रेतीले इलाके भी जलमग्न हैं। पिछले कुछ सालों के आंकड़ें देखें तो पायेंगे कि बारिश की मात्रा भले ही कम हुई है, लेकिन बाढ़ से तबाह हुए इलाके में कई गुना बढ़ौतरी हुई है । कुछ दशकों पहले जिन इलाकों को बाढ़ से मुक्त क्षेत्र माना जाता था, अब वहां की नदियां भी उफन रही हैं और मौसम बीतते ही, उन इलाकों में एक बार फिर पानी का संकट छा जाता है । गंभीरता से देखें तो यह छोटी नदियों के लुप्त होने, बड़ी नदियों पर बांध और मध्यम नदियों के उथले होने का दुष्परिणाम है। बाढ़ अकेले कुछ दिनों की तबाही ही नहीं लाती है, बल्कि वह उस इलाके के विकस को सालेां पीछे ले जाती है ।

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 1951 में बाढ़ ग्रस्त भूमि की माप एक करोड़ हेक्टेयर थी । 1960 में यह बढ़ कर ढ़ाई करोड़ हेक्टेयर हो गई । 1978 में बाढ़ से तबाह जमीन 3.4 करोड़ हेक्टेयर थी और 1980 में यह आंकड़ा चार करोड़ पर पहुंच गया । अभी यह तबाही कोई सात करोड़ हेक्टेयर होने की आशंका है । पिछले साल आई बाढ़ से साढ़े नौ सौ से अधिक लोगों के मरने, तीन लाख मकान ढ़हने और चार लाख हेक्टेयर में खड़ी फसल बह जाने की जानकारी सरकारी सूत्र देते हैं । यह जान कर आश्चर्य होगा कि सूखे और मरुस्थल के लिए कुख्यात राजस्थान भी नदियों के गुस्से से अछूता नहीं रह पाता है ।ं देश में बाढ़ की पहली दस्तक असम में होती है । असम का जीवन कहे जाने वाली ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां मई-जून के मध्य में ही विनाश फैलाने लगती हैं । हर साल लाखों बाढ़ पीड़ित शरणार्थी इधर-उधर भागते है । बाढ़ से उजड़े लोगों को पुनर्वास के नाम पर एक बार फिर वहीं बसा दिया जाता है, जहां छह महीने बाद जल प्लावन होना तय ही होता है । यहां के प्राकृतिक पहाडों की बेतरतीब खुदाई कर हुआ अनियोजित शहरीकरण और सड़कों का निर्माण भी इस राज्य में बाढ़ की बढ़ती तबाही के लिए काफी हद तक दोषी है । सनद रहे वृक्षहीन धरती पर बारिश का पानी सीधा गिरता है और भूमि पर मिट्टी की उपरी परत, गहराई तक छेदता है । यह मिट्टी बह कर नदी-नालों को उथला बना देती है, और थोड़ी ही बारिश में ये उफन जाते हैं । हाल ही में दिल्ली में एनजीटी ने मेट्रो कारपोरेशन को चताया है कि वह यमुना के किनारे  जमा किए गए हजारों ट्रक मलवे को हटवाए। यह पूरे देश में हो रहा है कि विकास कार्याें के दौरान निकली मिट्टी व मलवे को स्थानीय नदी-नालों में चुपके से डाल दिया जा रहा है। और तभी थोड़ी सी बारिश में ही  इन जल निधियों का प्रवाह कम हो जाता है व पानी बस्ती,खेत, ंजगलों में घुसने लगता है।

   देश के कुल बाढ़ प्रभवित क्षेत्र का 16 फीसदी बिहार में है । यहां कोशी, गंड़क, बूढ़ी गंड़क, बाधमती, कमला, महानंदा, गंगा आदि नदियां तबाही लाती हैं । इन नदियों पर तटबंध बनाने का काम केन्दª सरकार से पर्याप्त सहायता नहीं मिलने के कारण अधूरा हैं । यहां बाढ़ का मुख्य कारण नेपाल में हिमालय से निकलने वाली नदियां हैं । ‘‘बिहार का शोक’’ कहे जाने वाली कोशी के उपरी भाग पर कोई 70 किलोमीटर लंबाई का तटबंध नेपाल में है । लेकिन इसके रखरखाव और सुरक्षा पर सालाना खर्च होने वाला कोई 20 करोड़ रूपया बिहार सरकार को झेलना पड़ता है । हालांकि तटबंध भी बाढ़ से निबटने में सफल रहे नहीं हैं । कोशी के तटबंधों के कारण उसके तट पर बसे 400 गांव डूब में आ गए हैं । कोशी की सहयोगी कमला-बलान नदी के तटबंध का तल सील्ट (गाद) के भराव से उंचा हो जाने के कारण बाढ़ की तबाही अब पहले से भी अधिक होती हैं । फरक्का बराज की दोषपूर्ण संरचना के कारण भागलपुर, नौगछिया, कटिहार, मंुगेर, पूर्णिया, सहरसा आदि में बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र बढ़ता जा रहा है । विदित हो आजादी से पहले अंग्रेज सरकार व्दारा बाढ़ नियंत्रण में बड़े बांध या तटबंधों को तकनीकी दृष्टि से उचित नहीं माना था । तत्कालीन गवर्नर हेल्ट की अध्यक्षता में पटना में हुए एक सम्मेलन में डा. राजेन्दªप्रसाद सहित कई विद्वानों ने बाढ़ के विकल्प के रूप में तटबंधों की उपयोगिता को नकारा था । इसके बावजूद आजादी के बाद हर छोटी-बड़ी नदी को बांधने का काम अनवरत जारी है ।
    बगैर सोचे समझे नदी-नालों पर बंधान बनाने के कुप्रभावों के कई उदाहरण पूरे देश में देखने को मिल रहे हैं। वैसे शहरीकरण, वन विनाश और खनन तीन ऐसे प्रमुख कारण हैं, जो बाढ़ विभीषिका में उत्प्रेरक का कार्य कर रहे है । जब प्राकृतिक हरियाली उजाड़ कर कंक्रीट जंगल सजाया जाता है तो जमीन की जल सोखने की क्षमता तो कम होती ही है, साथ ही सतही जल की बहाव क्षमता भी कई गुना बढ़ जाती है । फिर शहरीकरण के कूड़े ने समस्या को बढ़ाया है । यह कूड़ा नालों से होते हुए नदियों में पहुंचता है । फलस्वरूप नदी की जल ग्रहण क्षमता कम होती है ।
   पंजाब और हरियाणा में बाढ़ का कारण जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में हो रहा जमीन का अनियंत्रित शहरीकरण ही है । इससे वहां भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं और इसका मलवा भी नदियों में ही जाता है । पहाड़ों पर खनन से दोहरा नुकसान है । इससे वहां की हरियाली उजड़ती है और फिर खदानों से निकली धूल और मलवा नदी नालों में अवरोध पैदा करता है । हिमालय से निकलने वाली नदियों के मामले में तो मामला और भी गंभीर हो जाता है । सनद रहे हिमालय, पृथ्वी का सबसे कम उम्र का पहाड़ है । इसकी विकास प्रक्रिया सतत जारी है, तभी इसे ‘‘जीवित-पहाड़’’ भी कहा जाता है । इसकी नवोदित हालत के कारण यहां का बड़ा भाग कठोर-चट्टानें ना हो कर, कोमल मिट्टी है । बारिश या बरफ के पिघलने पर, जब पानी नीचे की ओर बहता है तो साथ में पर्वतीय मिट्टी भी बहा कर लाता है । पर्वतीय नदियों में आई बाढ़ के कारण यह मिट्टी नदी के तटों पर फैल जाती है । इन नदियों का पानी जिस तेजी से चढ़ता है, उसी तेजी से उतर जाता है । इस मिट्टी के कारण नदियों के तट बेहद उपजाऊ हुआ करते हैं । लेकिन अब इन नदियों को जगह-जगह बांधा जा रहा है, सो बेेशकीमती मिट्टी अब बांध्बांधंांेे में ही रुक जाती है और नदियों को उथला बनाती रहती है । साथ ही पहाड़ी नदियों में पानी चढ़ तो जल्दी जाता है, पर उतरता बड़े धीरे-धीरे है ।
  मौजूदा हालात में बाढ़ महज एक प्राकृतिक प्रकोप नहीं, बल्कि मानवजन्य साधनों का त्रासदी है । हकीकत में नदियों के प्राकृतिक बहाव, तरीकों, विभिन्न नदियों के उंचाई-स्तर में अंतर जैसे विशयों का हमारे यहां कभी निश्पक्ष अध्ययन ही नहीं किया गया और इसी का फायदा उठा कर कतिपय ठेकेदार, सीमेंट के कारोबारी और जमीन-लोलुप लोग इस तरह की सलाह देते हैं। पानी को स्थानीय स्तर पर रोकना, नदियों को उथला होने से बचाना, बड़े बांध पर पाबंदी , नदियों के करीबी पहाड़ों पर खुदाई पर रोक और नदियों के प्राकृतिक मार्ग से छेउ़छाड़ को रोकना कुछ ऐसे सामान्य प्रयोग हैं, जोकि बाढ़ सरीखी भीशण विभीशिका का मुंह-तोड़ जवाब हो सकते हैं।
पंकज चतुर्वेदी
फ्लेट यूजी-1, 3/186 राजेन्द्र नगर सेक्टर-2
साहिबाबाद, गाजियाबाद
201005
संपर्क: 9891928376, 011- 26707758(आफिस),



गुरुवार, 13 जुलाई 2017

Kawadiya shoud respect public too

आस्था के साथ सामाजिक सरोकार भी

कांवड़ यात्रा
पंकज चतुर्वेदी

 

 

देहरादून से लेकर दिल्ली और फरीदाबाद से करनाल तक के तीन राज्यों के कोई 70 जिले आगामी 21 जुलाई तक कांवड़ यात्रा को लेकर चिंतित हैं। इस बार अनुमान है कि कोई चार करोड़ कांवड़िये गंगा जल लेने हरिद्वार पहुंच रहे हैं। हाल ही में अमरनाथ यात्रियों पर हमले तथा कश्मीर में सक्रिय आतंकवादियों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के संदीप शर्मा के शामिल होने से सुरक्षा एजेंसियां भी चिंतित हैं।
श्रावण के महीने में हरिद्वार, देवघर (झारखंड), काशी जैसे प्रसिद्ध शिवालयों से पैदल कांवड़ में जल लेकर शिवालयों तक आने की परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है। अभी कुछ साल पहले तक ये कांवड़िये अनुशासन व श्रद्धा में इस तरह डूबे रहते थे कि राह चलते लोग स्वयं ही उनको रास्ता दे दिया करते थे। लेकिन राजनीति में धर्म के घालमेल का असर बीते एक दशक के दौरान कांवड़ यात्रा पर दिखने लगा। पहले संख्या में बढ़ोतरी हुई, फिर उनकी सेवा के नाम पर लगने वाले टेंटों-शिविरों की संख्या बढ़ी। गौरतलब है कि ‘भोलोंÓÓ की सेवा’ÓÓ के सर्वाधिक शिविर दिल्ली में लगते हैं, जबकि कांवड़ियों में दिल्ली वालों की संख्या बामुश्किल 10 फीसदी होती है।
पिछले साल अकेले गाजियाबाद जिले में कांवडि़यों द्वारा रास्ता बंद करने, मारपीट करने, वाहनों को तोड़ने की पचास से ज्यादा घटनाएं हुई थीं। हरिद्वार में तो कुछ विदेशी महिलाओं ने पुलिस में रपट की थी कि उनसे छेड़छाड़ हुई है। बीते एक दशक के दौरान देखा गया है कि कांवड़ यात्रा के दस दिनों में दिल्ली से लेकर हरियाणा-राजस्थान व उधर हरिद्वार को जाने वाली सड़कों पर अराजक कब्जा हो जाता है। इस बार मामला बेहद संवेदनशील है क्योंकि खुफिया एजेंसियां आतंकवादी हमले की आशंका जता रही हैं।
इस बार भी डाक कांवड़ पर पाबंदी, डीजे बजाने पर रोक जैसे जुमले उछाले जा रहे हैं, लेकिन यह तय है कि इनका पालन होना मुश्किल ही होता है। बड़े-बड़े वाहनों पर पूरी सड़क घेर कर, उद्दंडों की तरह डंडा-लाठी-बेसबाल के बल्ले लहराते हुए, श्रद्धा से ज्यादा बेलगाम युवा सड़कों पर आ जाते हैं। कांवड़ यात्रा शुरू होते ही हिंसक घटनाओं की खबरें आती हैं। अधिकांश मामलों में कारण किसी कांवड़िये का जल सड़क पर चल रहे अन्य वाहन से टकरा कर छलकने या सड़क दुर्घटना आदि होता है।

यह जानना जरूरी है कि इनके कारण राष्ट्रीय राजमार्ग पर एक सप्ताह तक पूरी तरह चक्का जाम रहना देश के लिए अरबों रुपए का नुकसान करता है। इस रास्ते में पड़ने वाले 74 कस्बों, शहरों का जनजीवन भी थम जाता है। स्कूलों की छुट्टी करनी पड़ती है और सरकारी दफ्तरों में कामकाज लगभग ना के बराबर होता है। गाजियाबाद में तो लोगों का घर से निकलना दुश्वार हो जाता है। शहर में फल, सब्जी, दूध की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित होती है। आम जनता आस्था के नाम पर यह सब भी सहर्ष सह लेती है लेकिन असल दिक्कत होती है अराजकता से।
राजधानी की विभिन्न संस्थाओं में काम करने वाले कोई सात लाख लोग जीटी रोड के दोनों तरफ बसी गाजियाबाद जिले की विभिन्न कॉलोनियों में रहते हैं। इन सभी लोगों के लिए इन दिनों में कार्यालय जाना त्रासदी से कम नहीं होता। गाजियाबाद-दिल्ली सीमा पर अप्सरा बार्डर पूरी तरह कांवड़ियों की मनमानी की गिरफ्त में रहता है, जबकि इस रास्ते से गुरु तेग बहादुर अस्पताल जाने वाले गंभीर रोगियों की संख्या प्रतिदिन हजारों में होती है।

धर्म, आस्था, पर्व, संकल्प, व्रत, ये सभी भारतीय संस्कृति व लोकजीवन के अभिन्न अंग हैं लेकिन जब यह लोकजीवन के लिए ही अहितकर और धर्म के लिए अरुचिकर हो जाए तो इसकी प्रक्रिया पर विचार करना अत्यावश्यक है। धर्म दूसरों के प्रति संवेदनशील हो, धर्म का पालन करने वाला स्वयं को तकलीफ देकर जन कल्याण की सोचे; यह हिंदू धर्म की मूल भावना है।
जिस तरह कांवड़ियों की संख्या बढ़ रही है, उसको देखते हुए कांवड़ियों का पंजीयन, उनके मार्ग पर पैदल चलने लायक पतली पगडंडी बनाना, महानगरों में कार्यालय व स्कूल के समय में कांवड़ियों के आवागमन पर रोक, कांवड़ लाने की मूल धार्मिक प्रक्रिया का प्रचार-प्रसार, सड़क घेर कर शिविर लगाने पर पाबंदी जैसे कदम लागू करना जरूरी है।
असल में कांवड़ यात्रा अब एक बड़ा व्यवसाय बन गई है। करोड़ों लोगों के लिए टीशर्ट, नेकर, कांवड़, लोटे, सजावटी सामान से लेकर कई वस्तुओं का अपना बाजार है। जरूरत इस बात की है कि प्रशासन खुद के निर्देशों का कड़ाई से पालन करे। साधु-संत भी कांवड़ यात्रा के सात्विक तरीकों के प्रति लोगों को प्रेरित करें।

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बर्बाद होती असम की आर्थिकी

                                 पंकज चतुर्वेदी



अभी तो मॉनसून की शुरु आत ही है और असम के कई जिलों में आई बाढ़ से 95 हजार से अधिक लोग प्रभावित हैं। बुरी तरह पीड़ित दारंग जिले में लगभग 37 हजार लोग बाढ़ की चपेट में हैं। कई इलाकों में कटान से समस्याएं बढ़ी हैं। पूर्वोत्तर के असम राज्य के 14 जिले आने वाले तीन महीने पूरी तरह बाढ़ की चपेट में रहेंगे और कमोबेश यही स्थिति वहां हर साल होती रहती है। हर साल नदियों में आने वाली बाढ़ की विभीषिका की वजह से राज्य का लगभग 40 फीसद हिस्सा पस्त-सा रहता है। एक अनुमान के अनुसार इससे हर साल जान-माल की लगभग 200 करोड़ रु पये की क्षति होती है। राज्य में एक साल के नुकसान के बाद सिर्फ मूलभूत सुविधाएं खड़ी करने में ही दस साल से ज्यादा का समय लग जाता है जबकि नुकसान का सिलसिला हर साल जारी रहता है। केंद्र और राज्य की सरकारें बाढ़ के बाद मुआवजा बांटने में तत्परता दिखाती है। यह दुखद ही है कि आजादी के लगभग 70 साल बाद भी हम राज्य के लिए बाढ़ नियंतण्रकी कोई मुकम्मल योजना नहीं दे पाए हैं। यदि इस अवधि में राज्य में बाढ़ से हुए नुकसान व बांटी गई राहत राशि को जोड़ें तो पाएंगे कि इतनी धनराशि में एक नया और सुरक्षित असम खड़ा किया जा सकता था। 

नीतियां ऐसी बनें कि बाढ़ और असम में हर साल तबाही मचाने वाली ब्रह्मपुत्र और बराक नदियां और उनकी लगभग 48 सहायक नदियां और उनसे जुड़ी असंख्य सरिताओं पर सिंचाई व बिजली उत्पादन परियोजनाओं के अलावा इनके जल प्रवाह को आबादी में घुसने से रोकने की योजनाएं बने। जिसकी मांग लंबे समय से उठती रही है। असम की अर्थव्यवस्था का मूलाधार खेती-किसानी ही है, और बाढ़ का पानी हर साल लाखों हेक्टेयर में खड़ी फसल को नष्ट कर देता है। ऐसे में यहां का किसान कभी भी कर्ज से उबर ही नहीं पाता है। एक बात और यह कि ब्रह्मपुत्र नदी के प्रवाह का अनुमान लगाना भी बेहद कठिन है। इसकी धारा लगातार और तेजी से बदलती रहती है। परिणामस्वरूप भूमि का कटाव, उपजाऊ जमीन के क्षरण से नुकसान बड़े पैमाने पर होता रहता है। यह क्षेत्र भूकंपग्रस्त है और यहां हल्के-फुल्के झटके अक्सर महसूस किए जाते हैं। भूकंप की वजह से जमीन खिसकने की घटनाएं भी यहां की खेती-किसानी को प्रभावित करती है। इस क्षेत्र की मुख्य फसलें धान, जूट, सरसो, दालें व गन्ना हैं। धान व जूट की खेती का समय ठीक बाढ़ के दिनों का ही होता है। यहां धान की खेती का 92 प्रतिशत आहू, साली बाओ और बोडो किस्म की धान का है और इनका बड़ा हिस्सा हर साल बाढ़ में धुल जाता है। असम में मई से लेकर सितम्बर तक बाढ़ रहती है और इसकी चपेट में तीन से पांच लाख हेक्टेयर खेत आते हैं। हालांकि, खेती के तरीकों में बदलाव और जंगलों का बेतरतीब दोहन जैसी मानव-निर्मिंत दुर्घटनाओं ने जमीन के नुकसान के खतरे का दोगुना कर दिया है। दुनिया में नदियों पर बने सबसे बड़े द्वीप माजुली पर नदी के बहाव के कारण जमीन कटान का सबसे अधिक असर पड़ा है। बाढ़ का असर यहां के वनों व वन्य जीवों पर भी पड़ता है। हर साल कांजीरंगा व अन्य संरक्षित वनों में गैंडा जैसे संरक्षित जानवर भी मारे जाते हैं। वहीं दूसरी ओर, इससे पेड़-पौधों को बड़े पैमाने पर नुकसान होता है। राज्य में नदी पर बनाए गए अधिकांश तटबंध व बांध 60 के दशक में बनाए गए थे। अब वे बढ़ते पानी को रोक पाने में असमर्थ हैं। उनमें गाद भी जमा हो गई है, जिसकी नियमित सफाई की कोई व्यवस्था नहीं है। पिछले साल पहली बारिश के दबाव में 50 से अधिक स्थानों पर ये बांध टूटे थे। इस साल पहले ही महीने में 27 जगहों पर मेड़ टूटने से जलनिधि के गांव में फैलने की खबर है। ब्रह्मपुत्र घाटी में तट-कटाव और बाढ़ प्रबंध के उपायों की योजना बनाने और उसे लागू करने के लिए दिसम्बर 1981 में ब्रह्मपुत्र बोर्ड की स्थापना की गई थी। बोर्ड ने ब्रह्मपुत्र व बराक की सहायक नदियों से संबंधित योजना कई साल पहले तैयार भी कर ली थी। केंद्र सरकार के अधीन एक बाढ़ नियंतण्रमहकमा कई सालों से काम कर रहा है और उसके रिकार्ड में ब्रह्मपुत्र घाटी देश के सर्वाधिक बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में से हैं। इन महकमों ने इस दिशा में अभी तक क्या कुछ किया? असम को सालाना बाढ़ के प्रकोप से बचाने के लिए ब्रह्मपुत्र व उसकी सहायक नदियों की गाद सफाई, पुराने बांध व तटबंधों की सफाई, नये बांधों का निर्माण जरूरी है। लेकिन सियासी खींचतान के चलते जहां जनता ब्रह्मपुत्र के कहर को अपनी नियति मान बैठी है, वहीं नेता एक-दूसरे पर आरोप मंढ़ रहे हैं।

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दूषित पानी पीने को अभिशप्त

मध्य प्रदेश के सवा दर्जन से ज्यादा जिलों में ग्रामीण वैसा पानी पीने को मजबूर हैं जिसमें फ्लोरोसिस का आधिक्य है और जिससे विकलांगता बढ़ रही है

दो दशक पहले मध्य प्रदेश में मंडला जिले के तिलक्ष्पानी के बाशिंदों का जीवन देश के अन्य हजारों आदिवासी गांवों की ही तरह था। वहां थोड़ी बहुत दिक्कत पानी की जरूर थी, लेकिन अचानक अफसरों को इन आदिवासियों की जल समस्या खटकने लगी। तुरत-फुरत हैंडपंप रोप दिए गए, लेकिन उन्हें क्या पता था कि यह जल जीवनदायी नहीं, जहर है। महज 542 की आबादी वाले इस गांव में 85 बच्चे विकलांग हो गए। सन दो हजार तक की रिपोर्ट बताती है कि यहां तीन से बारह साल के अधिकांश बच्चों के हाथ-पैर टेढ़े हैं। वे घिसट-घिसट कर चलते हैं और उनकी हड्डियों और जोड़ों में असहनीय दर्द रहता है। जब मीडिया में शोर मचा तो हैंडपंप बंद किए गए, लेकिन तब तक हालात बिगड़ चुके थे। अब भले ही आज वहां अंग टेढ़े होने की शिकायत न हो, लेकिन दांतों की खराबी गांव के हर वाशिंदे की त्रसदी है। यह हृदय विदारक कहानी अकेले तिलक्ष्पानी की ही नहीं है। मध्य प्रदेश के 15 जिलों के 80 विकास खंडों के कोई 14 हजार गांवों की सूरत लगभग ऐसे ही है। इनमें 2,286 गांव अत्यधिक प्रभावित और 5,402 संवेदनशील कहे गए हैं। यह बात हाल ही में राज्य के स्वास्थ्य विभाग की ओर से केंद्र सरकार को भेजी रिपोर्ट में स्वीकर की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रदेश में फ्लोरोसिस बेकाबू होता जा रहा है। हालांकि इस समस्या को उपजाने में समाज के उन्हीं लोगों का योगदान अधिक रहा है, जो इन दिनों इसके निदान का एकमात्र जरिया भूगर्भ जल दोहन बता रहे हैं। 1टेक्नोलॉजी मिशन नामक करामाती केंद्र सरकार पोषित प्रोजेक्ट के शुरुआती दिनों की बात है। नेता-इंजीनियर की साझा लॉबी गांव-गांव में ट्रक पर लदी बोरिंग मशीनें लिए घूमती थी। जहां जिसने कहा कि पानी की दिक्कत है, तत्काल जमीन की छाती छेद कर नलकूप रोप दिए गए। हां, जनता की वाह-वाही तो मिलती ही, जो वोट की फसल बन कर कटती भी थी यानी एक तीर से दो शिकार-नोट भी और वोट भी। मगर जनता तो जानती नहीं थी और हैंडपंप मंडली जानबूझ कर अनभिज्ञ बनी रही कि इस तीर से दो नहीं तीन शिकार हो रहे हैं। बगैर जांच परख के लगाए गए नलकूपों ने पानी के साथ-साथ वह बीमारियां भी उगलीं, जिनसे लोगों की अगली पीढ़ियां भी अछूती नहीं रहीं। ऐसा ही एक विकार पानी में फ्लोराइड के आधिक्य के कारण उपजा। फ्लोराइड पानी का एक स्वाभाविक-प्राकृतिक अंश है और इसकी 0.5 से 1.5 पीपीएम मात्र मान्य है लेकिन मध्य प्रदेश के हजारों हैंडपंपों से निकले पानी में यह मात्र 4.66 से 10 पीपीएम और उससे भी अधिक है। पाताल का पानी पी-पी कर राज्य के ये 14 जिले अब विकलांगों का जमावड़ा बन चुके हैं। इनमें रतलाम, बैतूल, रायसेन, राजगढ़, मंडला, सीहोर, धार, अलीराजपुर, झाबुआ, खरगौन, छिंदवाड़ा, डिंडोरी, सिवनी, शाजापुर और उज्जैन जैसे जिले शामिल हैं। इसके अलावा भी कई ऐसे जिले हैं जहां कुछ या बहुत से गांव फ्लोराइड के आधिक्य से तंग हैं। समस्या इतनी गंभीर है और राज्य सरकार अपने इस मद के बजट का बड़ा हिस्सा महज सर्वे में खर्च करती है। फिर कुछ गांवों में विटामिन या कैल्शियम बांट दिया जाता है। दुखद है कि समस्याग्रस्त गांवों में पेयजल की वैकल्पिक या सुरक्षित व्यवस्था करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाए जाते।1फ्लोराइड की थोड़ी मात्र दांतों के उचित विकास के लिए आवश्यक हैं। परंतु इसकी मात्र निर्धारित सीमा से अधिक होने पर दांतों में गंदे धब्बे हो जाते हैं। लगातार अधिक फ्लोराइड पानी के साथ शरीर में जाते रहने से रीढ़, टांगों, पसलियों और खोपड़ी की हड्डियां प्रभावित होती हैं। ये हड्डियां बढ़ जाती हैं, जकड़ और झुक जाती हैं। जरा सा दवाब पड़ने पर ये टूट भी सकती हैं। ‘फ्लोरोसिस’ के नाम से पहचाने वाले इस रोग का कोई इलाज नहीं है।1मध्य प्रदेश के झाबुआ, सिवनी, शिवपुरी, छतरपुर, बैतूल, मंडला और उज्जैन व छत्तीसगढ़ के बस्तर जिलों के भूमिगत पानी में फ्लोराइड की मात्र निर्धारित सीमा से बहुत अधिक है। आदिवासी बाहुल्य झाबुआ जिले के 78 गांवों में 178 हैंडपंप फ्लोराइड आधिक्य के कारण बंद किया जाना सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है, लेकिन उन सभी से पानी खींचा जाना यथावत जारी है। नानपुर कस्बे के सभी हैंडपंपों से निकलने वाले पानी को पीने के अयोग्य घोषित किया गया है। जब सरकारी अमले उन्हें बंद करवाने पहुंचे तो जनता ने उन्हें खदेड़ दिया। ठीक यही बड़ी, राजावट, लक्षमणी, ढोलखेड़ा, सेजगांव और तीती में भी हुआ। चूंकि यहां पेय जल के अन्य कोई स्नोत शेष नहीं बचे हैं। सो हैंडपंप बंद होने पर जनता को नदी-पोखरों का पानी पीना होगा, जिससे हैजा,आंत्रशोथ,पीलिया जैसी बीमारियां होंगी। इससे अच्छा वे फ्लोरोसिस से तिल-तिल मरना मानते हैं। बगैर वैकल्पिक व्यवस्था किए फ्लोराइड वाले हैंडपंपों को बंद करना जनता को रास नहीं आ रहा है। नतीजतन जिले के हर गांव में 20 से 25 फीसदी लोग पीले दांत, टेढ़ी-मेढ़ी हड्डियों वाले हैं। चूंिक कहीं भी पेय जल के लिए और कोई व्यवस्था है नहीं है, सो जनता जान कर भी जहर पी रही है। कई गांवों के हालात तो इतने बदतर हैं कि वहां मवेशी भी फ्लोराइड की चपेट में आ गए हैं। मेडिकल रिपोर्ट बताती है कि गाय-भैंसों के दूध में फ्लोराइड की मात्र बेतहाशा बढ़ी हुई्र है, जिसका सेवन साक्षात विकलांगता को आमंत्रण देना है। ऐसी कई और रिपोटेर्ं भी महज सरकारी लाल बस्तों में धूल खा रही हैं। जहां एक तरफ लाखों लोग फ्लोरोसिस के अभिशाप से घिसट रहे हैं, वहीं प्रदेश के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग की रुचि अधिक से अधिक ‘फ्लोरोडीशन संयंत्र’ खरीदने में है। यह किसी से छिपा नहीं है कि सरकारी खरीद-फरोख्त में किनके और कैसे वारे-न्यारे होते हैं। इस बात को सभी स्वीकारते हैं कि जहां फ्लोरोसिस का आतंक इतना व्यापक हो, वहां ये इक्का-दुक्का संयंत्र फिजूल ही होते हैं। फ्लोराइड से निबटने में ‘नालगोंडा विधि’ खासी कारगर रही है। इससे दस लीटर प्रति व्यक्ति हर रोज के हिसाब छह सदस्यों के एक परिवार को साल भर तक पानी शुद्ध करने का खर्चा मात्र 15 से 20 रुपये आता है। इसका उपयोग आधे घंटे की ट्रेनिंग के बाद लोग अपने ही घर में कर सकते हैं। काश सरकार ने इस दिशा में कुछ सार्थक प्रयास किए होते।

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