तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

SAVE ELEPHANT राज एक्‍सप्रेस, भोपाल, 01 फरवरी 2014


गजराज को गुस्सा क्यों आता है ?

                            पंकज चतुर्वेदी
इन दिनों झारखंड-उडीसा-छत्तीसगढ की सीमा के आसपास एक हाथी-समूह का आतंक है। जंगल महकमे के लोग उस झंूड को भगाते घूम रहे हैं जबकि जिन दर्जनों लोगों को वह हाथी-दल घायल या नुकसान कर चुका है; उसे मारने की वकालत कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि हाथी बस्ती में आ गया है, लेकिन यदि तीस साल पहले के जमीन के रिकार्ड को उठा कर देखें तो साफ हो जाएगा कि इंसान ने हाथी के जंगल में घुसपैठ की है। दुनियाभर में हाथियों को संरक्षित करने के लिए गठित आठ देशों के समूह में भारत शामिल हो गया है। भारत में इसे ‘राष्ट्रीय धरोहर पशु’ घोषित किया गया है। इसके बावजूद भारत में बीते दो दशकों के दौरान हाथियों की संख्या स्थिर हो गई हे। जिस देश में हाथी के सिर वाले गणेश को प्रत्येक शुभ कार्य से पहले पूजने की परंपरा है , वहां की बड़ी आबादी हाथियों से छुटकारा चाहती है । 
कभी हाथ्यिों का सुरक्षित क्षेत्र कहलाने वाले असम में पिछले सात सालों में हाथी व इंसान के टकराव में 467 लोग मारे जा चुके हैं। अकेले इस साल नवंबर तक 43 लोगों की मौत हाथों के हाथों हुई। पिछले साल 92 लोग मारे गए थे। झारखंड की ही तरह आए रोज  हाथी को गुस्सा आ जाता है और वह खड़े खेत, घर, इंसान; जो भी रास्ते में आए कुचल कर रख देता है । देशभर से हाथियों के गुस्साने की खबरें आती ही रहती हैं । पिछले दिनों भुवनेश्वर में दो लेाग हाथी के पैरों तले कुचल कर मारे गए ।.ऋ़शिकेश के कई इलाकों में हाथियों के डर से लोग खेतों में नहीं जा रहे हैं । छत्तीसगढ़ में हाथी गांव में घुस कर खाने-पीने का सामान लूट रहे हैं । इंसान को भी जब जैसया मौका मिल रहा है, वह हाथियों की जान ले रहा है । दक्षिणी राज्यों  के जंगलों में गर्मी के मौसम में हर साल 20 से 30 हाथियों के निर्जीव शरीर संदिग्ध हालात में मिल रहे हैं । प्रकृति के साथ लगातार हो रही छेड़छाड़ को अपना हक समझने वाला इसांन हाथी के दर्द को समझ नहीं रहा है और धरती पर पाए जाने वाले सबसे भारीभरकम प्राणी का अस्तित्व संकट में है ।
19 वीं सदी की शुरूआत में एशिया में हाथियों की संख्या दो लाख से अधिक आंकी गई है । आज यह बामुश्किल 35 हजार है । सन 1980 में भारत में 26 से 28 हजार हाथी थे । अगले दशक में यह घट कर 18 से 21 हजार रह गई । भले ही सरकारी दावे कुछ हों, लेकिन आज यह आंकड़ा 15 हजार के आसपास सिमट कर रह गया है । भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में सबसे अधिक हाथी हैं । उसके बाद दक्षिण का स्थान आता है । हिमालय की तराई भी गजराज का पसंदीदा क्षेत्रा रहा है ।
1959 में एशियाई हाथी को संकटग्रस्त वन्यजाति में शामिल किया गया था । इसी के मद्देनजर आठवीं पंचवर्षीय योजना में हाथी परियोजना के लिए अलग से वित्तीय प्रावधान रखे गए थे । सरकारी फाईलों के मुताबिक 1991-92 से देश में यह विशेष परियोजना लागू है । लेकिन दुर्भाग्य है कि इसी के बाद गजराज के सिर पर मौत का साया अधिक गहराता जा रहा है ।
उत्तर-पूर्वी राज्यों में, विशेषकर नगा लोग हाथियों को ‘बवाल’ समझते हैं । उनका डर है कि हाथी उनके लहलहाते धान के खेतों को तबाह कर डालता है और मौका मिलने पर उनके गांवों को भी नहीं छोड़ता है । इस लिए वे इसके शिकार की फिराक में रहते है । इस शिकार में एक तरफ तो वे ‘शत्रुा विजय’ का गर्व अनुभव करते हैं और दूसरी ओर उन्हें दावत के लिए प्रचुर मांस मिलता है । इन क्षेत्रों में हाथी की हड्डी, मद, दांत व अन्य अंगों  को ले कर कई चिकित्सीय व अंधविश्वासीय मान्यताएं हैं , जिनके कारण जनजाति के लोग हाथी को मार देते हैं । वैसे इन दिनों कतिपय बाहरी लोग इन आदिवासियों को छोेट-मोटे लालच में फंसा कर ऐसे शिकार करवा रहे हैं ।
कर्नाटक के कोडगू और मैसूर जिले में 643 वर्ग किमी में फैला नागरहोल पार्क हाथियों का पसंदीदा आवास है । इसके  दक्षिण-पश्चिम में केरल की व्यानाद सेंचूरी है । पास में ही बांदीपुर(कर्नाटक) और मधुमलाई (तमिलनाडु) के घने जंगल  हैं । भारत में पाए जाने वाले हाथियों का 40 फीसदी यहां रहता है । पिछले कुछ सालों में यहां जंगल की कटाई बढ़ी है । हर साल बारिश से पहले इन जंगलों में हाथियों की मौत हो रही है । वन विभाग के अफसर लू या दूषित पानी को इसका कारण बता कर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं । हकीकतन यहां हाथियों केा 100 लीटर पानी और 200 किलो पत्ते, पेड़ की छाल आदि की खुराक जुटाने के लिए हर रोज 18 घंटेां तक भटकना पड़ता है । गौरतलब है कि हाथी दिखने में भले ही भारीभरकम हैं, लेकिन उसका मिजाज नाजुक और संवेदनशील होता है । थेाड़ी थकान या भूख उसे तोड़ कर रख देती है । ऐसे में थके जानवर के प्राकृतिक घर यानि जंगल को जब नुकसान पहुचाया जाता है तो मनुष्य से उसकी भिडं़त होती है ।
असल संकट हाथी की भूख है । कई-कई सदियों से यह हाथी अपनी जरूरत के अनुरूप अपना स्थान बदला करता था । गजराज के आवागमन के इन रास्तों को ‘‘एलीफेंट काॅरीडार’’ कहा गया । सन 1999 में भारत सरकार के वन तथा पर्यावरण मंत्रालय ने इन काॅरीडारों पर सर्वे भी करवाया था । उसमें पता चला था कि गजराज के प्राकृतिक काॅरीडार  से छेड़छाड़ के कारण वह व्याकुल है । हरिद्वार और ऋषिकेश के आसपास हाथियों के आवास हुआ करते थे । आधुनिकता की आंधी में जगल उजाड़ कर ऐसे होटल बने कि अब हाथी गंगा के पूर्व से पश्चिम नहीं जा पाते हैं्र। रामगंगा को पार करना उनके लिए असंभव हो गया है । अब वह बेबस हो कर सड़क या रेलवे ट्रैक पर चला जाता है और मारा जाता है । ओडिसा के हालात तो बहुत ही खराब हैं । हाथियों का पसंदीदा ‘‘ सिंपलीपल काॅरीडार’’ बोउला की क्रोमियम खदान की चपेट में आ गया । सतसोकिया काॅरीडोर को राष्ट्रीय राजमार्ग हड़प गया ।
ठीक ऐसे ही हालात उत्तर-पूर्वी राज्यों के भी हैं । यहां विकास के नाम पर हाथी के पारंपरिक भोजन-स्थलों का जम कर उजाड़ा गया और बेहाल हाथी जब आबादी में घुस आया तो लोगों के गुस्से का शिकार बना । हाथियों के एक अन्य प्रमुख आश्रय-स्थल असम में हाथी बेरोजगार हो गए है और उनके सामने पेट भरने का संकट खड़ा हो गया है। सन 2005 में सुप्रीम कोट के एक आदेश के बाद हाथियों से वजन ढुलाई का काम गैरकानूनी घोषित कर दिया गया था। इसके बाद असम के कोई 1200 पालतू हाथी एक झटके में बेरोजगार हो गए। हाथी उत्तर-पूर्वी रज्यों के समाज का अभिन्न हिस्सा रहा है सदियों से ये हाथी जंगलों से लकड़ी के लठ्ठे ढोने का काम करते रहे हैं।  अदालती आदेश के बाद ये हाथी और उनके महावत लगभग भुखमरी की कगार पर हैं। असम में कहीं भी जाईए, सड़कों पर ये हाथी अब भीख मांगते दिखते हैं। सनद रहे कि एक हाथी की खुराक के लिए महीने भर में कम से कम दस हजार रूपए खर्च करना ही होते हैं। ऐसे में ‘‘हाथी पालना’’ अब रईसों के बस से भी बाहर है। असम के कुछ महावत अब अपने जानवरों को दिल पर पत्थर रख कर राजस्थान, दिल्ली जैसे राज्यों में बेच रहे हैं।

दक्षिणी राज्यों में जंगल से सटे गांवों मे रहने वाले लोग वैसे तो हाथी की मौत को अपशकुन मानते हैं , लेकिन बिगड़ैल गजराज से अपने खेत या घर को बचाने के लिए वे बिजली के करंट या गहरी खाई खोदने को वे मजबूरी का नाम देते हैं । यहां किसानों का दर्द है कि ‘हाथी प्रोजेक्ट’ का इलाका होना उनके लिए त्रासदी बन गया है । यदि हाथी फसल को खराब कर दे तो उसका मुआवजा इतना कम होता है कि उसे पाने की भागदौड़ में इससे कहीं अधिक खर्चा हो जाता है । हाथी के पैरों के नीचे यदि इंसान कुचल कर मर जाए तो मुआवजा राशि 25 हजार मात्रा होती है । वैसे यहां दुखी ग्रामीणों की आड़ में कई ‘वीरप्पन’ हाथी दंात के लिए हाथियों के दुश्मन बने हुए है ।
उत्तरांचल के जिम कार्बेट पार्क में कुछ साल पहले तक 1300 से अधिक हाथी रहते थे । रामगंगा परियोजना के लिए रिजर्व जलाशय और फिर कुनाई चीला शक्ति नहर के लिए उस जंगल के बड़े हिस्से को उजाड़ा गया । फिर बांध से विस्थापितों ने अपने नए घर-खेतों के लिए 1,65,000 एकड़ वन क्षेत्रा को काट डाला । यहां हरियाली के नाम पर यूक्लेपिटस जैसे गैर-चारा पेड़ लगाए गए । ंजंगल कटने से हाथियों के लिए चारे-पानी का संकट खड़ा हुआ । भूख से बेहाल गजराज कई बार फसल और संपत्ति को नुकसान कर बैठते हैं ।
ऐसे ही भूखे हाथी बिहार के पलामू जिले से भाग कर छत्तीसगढ़ के सरगुजा व सटे हुए आंध्रप्रदेश के गंावों तक में उपद्रव करते रहते हैं । कई बार ऐसे बेकाबू हाथियों को जंगल में खदेड़ने के दौरान उन्हें मारना वन विभाग के कर्मचारियों की मजबूरी हो जाता है । उत्तरांचल में पिछले 25 सालों के दौरान कई हाथी ट्रेन से टकरा कर मारे गए हैं । कोई एक दर्जन हाथियों की मौत जंगल से गुजरती बिजली की लाईनों में टूटफूट के कारण होना सरकारी रिकार्ड में दर्ज है । ये वाकिये अनियोजित विकास के कारण प्राकृतिक संपदा को हो रहे नुकसान की बानगी हैं ।
नदी-तालाबों में शुद्ध पानी के लिए यदि मछलियों की मौजूदगी जरूरी है तो वनों के पर्यांवरण को बचाने के लिए वहां हाथी अत्यावश्यक हैं । मानव आबादी के विस्तार, हाथियों के प्राकृतिक वास में कमी, जंगलों की कटाई और बेशकीमती दांतों का लालच; कुछ ऐसे कारण हैं जिनके कारण हाथी को निर्ममता से मारा जा रहा है । यदि इस दिशा में गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो जंगलों का सर्वोच्च गौरव कहलाने वाले गजराज को सर्कस, चिडि़याघर या जुलूसों में भी देखना दुर्लभ हो जाएगा ।

गुरुवार, 30 जनवरी 2014

‘दादा’ हटे तो जंगल कटे
पंकज चतुर्वेदी
यह बात तो स्वीकारनी होगी कि पिछले साल नवंबर में हुए विधानसभा चुनावों के कुछ पहले से बस्तर के आंचलिक क्षेत्रों तक जिस तरह केंद्रीय सुरक्षा बलों ने पैठ बनाई थी, उसके बाद वहां नक्सलवाद का असर बेहद कम हुआ है। दूसरी तरफ से आंध््रा प्रदेष व उडि़सा की सीमाओं से भी दवाब आया तो कई बड़े नक्सली नेताओं ने आत्मसमर्पण भी किया। इसके साथ ही संरक्षित वनों में रह रहे आदिवासियों को वन-ग्राम के पट्टे मिल गए। लेकिन यह बेहद दुखद है कि जंगलों से ‘लाल सलाम‘ का असर कम होते ही वहां के ‘ग्रीन गोल्ड’ का अंधाधुंध दोहन षुरू हो गया है। जनजातियों का जीवन यापन ही जंगलों पर निर्भर है और जब जंगल कटेंगे तो वहां के वाषिंदों का जनजीवन भी प्रभावित होगा।
बस्तर का इलाका, जो अब सात प्रषासनिक जिलों में विभाजित है, 39,060 वर्ग किलोमीटर में फैला है जो केरल राज्य से बड़ा है। बस्तर यानी बांस की तरी अर्थात बांस की घाटी में कभी बीस फीसदी बांस के ंजगल होते थे, जो स्थानीय जनजातियों के जीवकोपार्जन का बड़ा सहारा थे। इसके अलावा साल, सागौन, जापत्र सहित 15 प्रजातियों के बड़े पेड़ यहां के जंगलों की षान थ्ळो। सन 1956 से 1981 के बीच विभिन्न विकास योजनओं के नाम पर यहां के 125,483 हैक्टर जंगलों को नेस्तनाबूद किया गया। आज इलाके के कोई दो लाख चालीस हजार हैक्टर में सघन वन हैं, हालांकि यह जानना जरूरी है कि अबुझमाड़ के ओरछा और नारायणपुर तहसीलों के कोई छह सौ गांव-मजरों-टोलों में से बामुष्किल 134 का रिकार्ड षासन के पास है। अंग्रेजों के षासन के समय भी बस्तर के राजाओं ने इस इलाके का भूमि बंदोब्स्त यह कह कर नहीं किया था कि वहां का स्थानीय षासन आदिवासी कबीलों के पास ही रहेगा। यानी इतने बडे़ इलाके के साल-षीषम जंगलों का अता-पता सरकारी रिकार्ड में भी नहीं हैं। यह बात सरकार स्वीकारती है कि पिछले कुछ सालों में बस्तर इलाके में 12 हजार हेक्टर वन क्षेत्र में कमी आई है। सलवा जुड़ुम के प्रारंभ के बाद पेड़ो की कटाई ज्यादा हुई। वैसे तो यहां के घुप्प अंधेरे जंगलों की सघनता व क्षेत्रफल की तुलना में वन विभाग का अमला बेहद कम है, ऊपर से यहां जंगल-माफिया के हौंसले इतने बुलंद हैं कि आए रोज वन रक्षकों पर प्राणघातक हमले हारेते रहते हैं।
सनद रहे कि बस्तर जिले में गत एक वर्श के दौरान ग्रामीणों द्वारा बड़े पैमाने पर जंगलात की जमीन पर कब्जे किए गए। सरकार ने ग्रामीणों को वनाधिकार देने का कानून बनाया तो कतिपय असरदार लोग जल्द ही जमीन के पट्टे दिलवाने का लालच दे कर भोले -भाले ग्रामीणों को जगल पर कब्जा कर वहां सपाट मैदान बनाने के लिए उकसा रहे हैं। महज पांच सौ से हजार रूप्ए में ये आदिवासी  साल या षीषम की बड़ा सा पेड़ काट डालते हैं और जंगल माफिया इसे एक लाख रूपए तक में बेच देता है।  बस्तर वन मंडल में बोदल, नेतानार, नागलश्वर, कोलावाडा, मिलकुलवाड़ा वन- इलाकों में सदियों से रह रहे लोगों को लगभग 40 हजार एकड़ वन भूमि पर वनाधिकार के पट्टे बांटे जा चुके हैं। इसके बाद वन उजाड़ने की यहां होड़ लग गई है। कुछ लोगों को और जमीन के पट्टे का लोभ है तो कुछ खेती करने के लिए जंगल काट रहे हैं। इनसे मिली लकड़ी को जंगल से पार करवाने वाला गिरोह सीमावर्ती राज्यों- महाराश्ट्र, आंध््रा प्रदेष, उडि़सा, झारखंड और मध्यप्रदेष तक अपना सषक्त नेटवर्क रखता है।  चित्रकोट क्षेत्र के घने जंगलों में जहां लोग नक्सलियों के डर से जाने से भय खाते थे, आज बास्तानार, कोडेनार में निजी जमीन के पेड़ की कटाई का स्थानीय प्रमाण पत्र दे कर ट्रकों जंगल उजाड़ा जा रहा है। कुछ महीनों पहले नेतानार व बोदल के लकड़ी डिपो में कथित तौर पर आगजनी हुई थी व वन विभाग के कर्मचारियों ने इसे नक्सलियों की कारस्तानी बता कर खुद जंगलों में जाने से मुक्ति पा ली थी। हालांकि आम लेागों का कहना है कि यह सब वन माफिया व कर्मचारियों की मिली भगत ही था।
सुकमा में भी जलाऊ लकड़ी के लिए सूखे पेड़ो की टहनियां काटने के बहाने सागौन के पचास-पचास साल पुराने पेड़ ढहाए जा रहे हैं। यहां  वन-ग्राम के नाम पर लोगों को दी गई छूट, नक्सलियों के कम हुए डर व वन महकमे की गैरमौजूदगी के चलते आंध््रा प्रदेया से सटे किस्टावरम, बुर्कलंका, राजामुंडा, तोंगपाल, जबेली, पोलमपल्ली, कन्हईगुड़ा सहित पचास गांवों में अंधेरा होते ही छोटे वाहनों से सागौन को ढोया जाता है। छिंदगढ़ ब्लाक के पाकेला में सड़क निर्माण के लिए कुछ पेड़ों को काटने की अनुमति क्या मिली, एक साल में कई हजार पेड़ जड़ से उड़ा दिए गए। बलोदा बाजार के बादनवापारा अभ्यारण के कक्ष क्रमांक 145 में अचानक ही सागौन के पांच सौ पेड़ कट गए। संभागीय मुख्यालय जगदलपुर से सटे कावापाल, धूनपूंची, माचकोट, पुसपाल में हर सुबह कुछ ढूंढ जमीन से चिपके दिख जाते हैं। चुनाव के पहले केंद्रीय बलों की धमक के बीच कांकेर वन मंडल के उत्तरी कोंडागांव इलाके में बड्डेनार के पचास एकड़ इलाके का एक-एक पेड़ जड़ से उड़ा दिया गया।
पेड़ की कटाई अकेले जंगलों को ही नहीं उजाड़ रही है, वहां की जमीन और जल-सरिताओं पर भी उसका विपरीत असर पड़ रहा है । धरती पर जब पेड़-पौधों की पकड़ कमजोर होती है तब बरसात का पानी सीधा नंगी धरती पर पड़ता है और वहां की मिट्टी बहने लगती है । जमीन के समतल न होने के कारण पानी को जहां भी जगह मिलती है, मिट्टी काटते हुए वह बहता है । इस प्रक्रिया में नालियां बनती हैं और जो आगे चल कर गहरे होते हुए बीहड़ का रूप ले लेती है । बहती हुई मिट्टी नदी-नालों और झरनों को भी उथला करती हैं। बस्तर के जंगलों में महज इमारती लकड़ी ही नहीं है, यहां के नैसर्गिक वातावरण में कई सौ-हजार दुलर्भ जड़ीबूटियां भी हैं। यहां की जैव विविधता से खिलवाड़ आने वाली पीढि़यों के लिए अपूरणीय क्षति है।
बस्तर में इस समय बीएसएफ की कई टुकडि़यां हैं, सीआपीएफ पहले से है, लेकिन केंद्रीय बल स्थानीय बलों की मदद के बगैर असरकारी नहीं होते। जंगलों से नक्सलियों का खौफ कम करने में तो ये बल कारगर रहे हैं, लेकिन इसके बाद बैखौफ हो रहे जंगल-माफिया, स्थानीय आदिवासी समाज में वन व पर्यावरण के प्रति घटती जागरूकता और षहरी समाज में जैव विविधता के प्रति लापरवाही, नक्सलवाद से भी बड़े खतरे के रूप् में उभर रहा है। जरूरी है कि केंद्रीय बल जनहित के कार्यों की श्रंखला में जंगल-संरक्षण का कार्य भी करें।

बुधवार, 29 जनवरी 2014

गाँधी जी के शहादत दिवस पर विशेष , दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण , ३० जनवरी २०१४ http://epaper.jagran.com/epaper/30-jan-2014-262-edition-National-Page-1.html

गांधी की आत्मा को तो बख्शो
पंकज चतुर्वेदी
यह बात अलग-अलग मंचों पर-अवसरों पर, राजनेता व स्वयंसेवी लगातार रटते रहते हैं कि गांधी एक व्यक्ति या नाम नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका या सिद्धांत है । फिर भी गांधीजी की एक भी समझाईश  पर क्रियान्वयन से परहेज किया जाता रहा है। यह बात भी अब खुल कर सामने आ गई है कि अपने आखिरी दिनों में गांधी खुद को उपेक्षित व विरक्त महसूस कर रहे थे। तन्हा गांधी की आत्मा अपने महाप्रयाण के समय तब के सत्ता-षिखरों से बेहद निराश  थी। उन्हें लग रहा था कि जिन मूल्यों के लिए वे संघर्श कर रहे थे वे असल में आम लोगों तक पहुंचे ही नहीं। जिस अहिंसा के नारे को उन्होंने आजादी का मूल मंत्र बनाया था , वह आजादी ही मिलते ही काफूर हो गया था- विभा जन की घोषणा  होते ही पूरे देष में हुआ कत्लेआम इसकी बानगी था। जाहिर है कि गांधीजी को उस समय समझ आ गया था कि उनके अहिंसा, व दीगर संदेश  नारे से ज्यादा नहीं हैं। तभी से एक हताश  गांधी को हर साल उनके शहीदी दिवस पर बार-बार शहीद किया जाता है।
‘‘ भारत को आजादी मिल गई, कांग्रेस का काम पूरा हो गया । अब इसकी जरूरत नहीं है , इसे समाप्त कर देना ही ठीक है । हमारी कांग्रेस सत्ता की भांति हथियारों के बल पर कायम नहीं रह सकेगी । कांगे्रस ने जनता का विष्वास अपने त्याग , और तप के आधार पर संपादित किया है । पर यदि कांगे्रस जनता की सेवक न बन कर उसकी अधीषशवर बने, अथवा मालिक का दर्जा अपना ले तो मैं अपने अनेक वर्षों  के अनुभव के आधार पर भविष्यवाणी कर सकता हूं कि चाहे मैं जीवित रहूं या न रहूं, एक क्रांति देश  में फैल जाएगी और लोग सफेद टोपी वालों का चुन-चुन कर सफाया कर देंगे । उसका फायदा एक तीसरी शक्ति उठाएगी । ’’ आजादी के कुछ दिन पहले ही 21 मई 1947 को महात्मा गांधी ने पटना में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कोई छह दशक बाद के भारत के हालात का अंदाजा लगा लिया था । कांग्रेस, देश्  और जनता आज कुछ वैसे ही हालात से रूबरू हैं, जिसकी आशंका गांधी बाबा को थी । वैसे तो गांधी के शरीर को 30 जनवरी 1948 को गोडसे ने एक ही बार मारा था, लेकिन उसके बाद तो उनकी आत्मा व विचारों की हत्या का दौर शु रू हो गया है । एक और जयंती है - दिल्ली में राजघाट, 30 जनवरी मार्ग स्थित स्मृति स्थल और देष में जहां कहीं भी गांधी की प्रतिमाएं हैं, उन पर हार-फूल चढ़ाने वालों का तांता  है । हर एक के भाशण में ‘‘साबरमती के संत’’ के सपनों का भारत साकार करने का संकल्प जोर मार रहा है । लेकिन क्या जरा गांधी और कांग्रेस के सच्चे हिमायती होने का दावा करने वाले कांग्रेसियों ने ऊपर उल्लेखित गांधी के उद्बोधन पर गौर किया है ?
दूरदशी गांधी ने कई दशक पहले ही अंदाजा लगा लिया था कि आजाद हिंदुस्तान को धर्म और जाति के नाम पर विवाद झेलने पड़ेंगे । 11 मई 1935 के ‘‘हरिजन’’ के अंक में  उन्होंने धार्मिक संकीर्णता पर कुठाराघात करते हुए एक आलेख लिखा था -‘‘ यदि मेरे हाथ में सत्ता हेाती  और मैं कानून बना सकता तो मैं सब धर्म परिवर्तन पर रोक लगा देता ’’ ।  गांधी की विरासत के असली हकदार होने का दावा करने वालों के हाथों सत्ता व कानून की डोर लगभग 50 सालों से है । केंद्र में एक भी सरकार ऐसी नहीं बनी, िजसने राजघाट पर जा कर बापू के संकल्प नहीं दोहराए हों । परंतु पूरे देश्  में धर्म परिवर्तन धड़ल्ले से हो रहा है और इसके विषम  परिणाम जनजातिय इलाकों में सामने भी आ रहे हैं । राजनेता का धर्म जनसेवा होता है, जब वही धर्म परिवर्तन कर व्यवसाय करने को उतारू है तो उससे गांधी की आत्मा को सहेजने की क्या उम्मीद की जाए ।
गांधीजी को गिनी-चुनी चीजों से नफरत थी, उनमें सबसे ऊपर षराब का नाम था ।  ‘‘ यंग इंडिया’’  के 03 मार्च 1927 के अंक में उन्होंने एक लेख में उल्लेख किया था कि षराब और अन्य मादक द्रव्यों से होने वाली हानि कई अंषों में मलेरिया आदि बीमारियों सें होने वाली हानियों से असंख्य गुना ज्यादा है । कारण, बीमारियों से तो केवल षरीर को ही हानि पहंुचती है, जबकि षराब आदि से षरीर और आत्मा दोनों का ही नाष होता है ।  गांधी के आदर्शों  के प्रति कृतसंकल्पित होने का दावा करने वाली सरकारों के सर्वोच्च स्थान राश्ट्रपति भवन से ले कर हर छेाटे-बड़े नेता द्वारा शराब की खरीदी व उसका भोज-पार्टी में सार्वजनिक वितरण क्या गांधी की आत्मा को हर पल कचोटता नहीं होगा ?
‘‘यंग इंडिया’’ के ही 15 सितंबर 1927 अंक में गांधीजी ने  मदिरापान पर एक कड़ी टिप्पणी कर इस दिषा में अपनी मंशा  जताई थी- ‘‘ मैं भारत का गरीब होना पसंद करूंगा, लेकिन मैं यह नहीं बर्दाष्त करूंगा कि हजारों लेाग शराबी हों ।  अगर भारत में षराब पांबदी जारी रखने के लिए लेागों को षिक्षा देना बंद करना पड़े तो कोई परवाह नहीं । मैं यह कीमत चुका कर भी शराबखोरी बंद करूंगा । ’’ राजघाट पर फूल चढ़ाते समय हमारे ‘‘भारत भाग्य विधाता’’  क्या कभी  गांधी के इस संकल्प को याद करने का प्रयास करते हैं ? आज हर सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं के संचालन के लिए धन जुटाने में शराब से आ रहे राजस्व का बहुतायत है । पंजाब में अधिक शराब बेच कर किसानों को मुफ्त बिजली-पानी देने की घोशणाओं में किसी को षर्म नहीं आई । हरियाणा में षराबबंदी को समाप्त करना चुनावी मुद्दा बना थौ । दिल्ली में घर-घर तक षराब पहुंचाने की योजनाओं में सरकार यूरोप की नकल कर रही है । उत्तर प्रदेष और मध्यप्रदेष के कई कांग्रेसी षराब के ठेकों से परोक्ष-अपरोक्ष जुड़े हैं । यही नहीं भारत सरकार के विदेष महकमे बाकायदा सरकारी तौर पर षराब-पार्टी देते हैं

‘‘भारत छोड़ो आंदोलन’’ की 46वीं वर्शगांठ  पर दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में संपन्न समारोह में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने बड़े साफ मन से स्वीकार किया था कि गांधीजी के सिद्धांतों पर अमल न करके सरकार ने गलती की है । हम उस गलती को सुधारेंगे ।’’ लेकिन उसके बाद उनकी सरकार चली नहीं । काल के गाल में वह चमकता सूर्य अस्त हो गया । वैसे तो इस बात पर भी षक है कि उस समारोह के बाद वहां बैठे किसी नीति निर्धारकों को राजीवजी के ऐसे संकल्प की याद भी रही हो । हां, हर साल बदलती सरकारें गांधी के एक-एक सपने को चूर जरूर करती रहीं ।
खादी या कुटीर उद्योग की बात हो या षिक्षा या स्वाबलंबन की या फिर अनुसूचित जाति के लेागों के कल्याण या अल्पसंख्यकों को भयमुक्त माहौल देने की नीति, गांधी कहीं बिसूरता सा रहा । महात्मा गांधी ने भारतीय परिवेष में रोजगारोन्मुखी षिक्षा का खाका तैयार किया था, ताकि गांव का पढ़ा-लिखा तबका रोजगार के लिए षहर की ओर पलायन न करे । लेकिन आज की समूची षिक्षा प्रणाली षहरी तड़क-भड़क की ओर आकर्शित करती सी प्रतीत होती है । पठन-पाठन का मूल आधार होता है उसका भाशा माध्यम । गांधीजी हिंदी व अन्य भारतीय भाशाओं में षिक्षा व अन्य कामकाज के कट्टर समर्थक थे ।  देष की आजादी के बाद उन्होंने ‘‘हरिजन सेवक’’(21.09.1947)  में एक आलेख में इस विशय पर अपनी स्पशट टिप्पणी की थी -‘‘ मेरा मतलब यह है कि जिस तरह हमारी आजादी को जबरदस्ती छीनने वाले अंग्रेजों की सियासी हुकुमत को हमनें सफलतापूर्वक इस देष से निकाल दिया, उसी तरह हमारी संस्कृति को दबाने वाली अंग्रेजी भाशा को भी हमें यहां से निकाल देना चाहिए । ’’  कैसी विडंबना है कि गांधी के देष में अंग्रेजी ना केवल दिन दुगना-रात चैगुना प्रगति कर रही है, बल्कि संसद, सुप्रीम कोर्ट और सभी बड़े दफ्तरों में आधिकारिक भाशा अंग्रेजी ही है । यही नहीं अब तो हमारे देष में ऐसे बुद्धिजीवियों की जमात खड़ी हो रही है, जो कि अंग्रेजी को विदेषी भाशा ही नहीं मानते हैं ।  गांधी के सच्चे भक्तों की सरकारें  अब स्कूली स्तर पर सरकारी स्कूलों में भी अंग्रेजी को अनिवार्य बना रही हैं ।
दिल्ली दुनिया के सबसे अधिक प्रदूशित नगरों में से है । यहां की सबसे बड़ी सड़क ‘रिंग रेाड’ कों महात्मा गांधी का नाम दिया गया है, यह जानते हुए भी कि यह सबसे दूशित इलाकों में से एक है । इतनी बड़ी सड़क को गांधी का नाम दे कर नेताओं ने सोचा कि वे गांधी को सम्मानित कर रहे हैं । ठीक उसी तरह गांधी के सिद्धांतों और मान्यताओं की समाधियों पर फूल चढ़ा कर उनकी आंख का पानी नहीं मर रहा है । न्यायमूर्ति कुदाल आयोग की रिपोर्ट में तो देष की गांधीवादी संस्थाओं को विभिन्न अनियमितताओं व कानून-विरेाधी कृत्यों का अड्डा बताया गया था । कागं्रेस के प्रति गांधी की भविश्यवाणी आज सत्य होती दिखती है । दूसरे मामलों में भी लेागों को अब संभल जाना चाहिए, वरना गांधी का नाम तो उनके महान कार्यों के कारण सदैव याद रख जाएगा, पर साथ में यह भी भुलाया नहीं जा सकेगा कि उस संत की षिक्षाओं को न मानने हमनें क्या खो दिया है ।

पंकज चतुर्वेदी
नेषनल बुक ट्रस्ट, इंडिया
नई दिल्ली -110070

मंगलवार, 28 जनवरी 2014

गाजियाबाद के तालाबों को पी गया शहरीकरण जनसंदेश टाईम्‍स, उ प्र 29 1 2014

पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश: तालाबों पर कब्जे से रूठा पानी
पंकज चतुर्वेदी
दिल्ली के पूर्वी हिस्से की सड़कों से सटा हुआ है उत्तरप्रदेश का गाजियाबाद जिला। कहने को देश-दुनिया का सबसे तेजी से विस्तार पाता जिला है। आखिर हों भी क्यों ना ,गाजियाबाद भले ही उ.प्र में हो लेकिन शहरीकरण व उससे संबद्ध त्रासदियों में वह दिल्ली के कदम-दर-कदम साथ है। यहां भी भयंकर जनसंख्या विस्फोट है, यहां भी अनियोजित शहरीकरण है, यहां भी जमीन की कीमतें बेशकीमती हैं और उसी तरह यहां भी जब जिसे मौका मिला तालाब को हड़प कर कंक्रीट के जंगल रोपे गए। कई-कई पूरी कोलोनियां, सरकारी भी, तालाबों को सुखा कर बसा दी गईं। गगनचुंबी इमारतों में रहने वाले सर पर छत के सपने के पूरा होने पर इतने मुग्ध थे कि उन्हें खबर ही नहीं रही कि जीने के लिए जल भी जरूरी है, जिसे सुखा कर उन्होंने अपना सपना पूरा किया है।
गाजियाबद जिले में कुल 1288 हेक्टेयर भूभाग में 65 तालाब व झीलें हैं, जिनमें से 642 हेक्टेयर ग्राम समाज, 68.5 मछली पालन विभाग और 588 हेक्टेयर निजी लोगों के कब्जे में है। तकरीबन सौ तालबों पर लोगों ने कब्जा कर मकान-दुकान बना लिए हैं। यहां पर दो पांच एकड़ क्षेत्रफल के 53 तालाब हैं, पांच से 10 हैक्टर वाले 03, 10 से 50 हैक्टर का एक तालाब कागजों पर दर्ज है। इनमें से कुल 88 तालाब पट्टे वाले और 13 निजी हैं। जिले की 19.2 हैक्टर में फैली मसूरी झील, इलाके सबसे बड़ी हसनपुर झील(37.2 हैक्टर), 4.8 हैक्टर वाली सौंदा झील और धौलाना का 7.9 हैक्टर में फैला तालाब अभी भी कुछ आस जगाते हैं।  गाजियाबद षहर यानी नगर निगम के तहत कुछ दषक पहले तक 135 तालाब हुआ करते थे, इनमें से 29 पर तो कुछ सरकारी महकमों ने ही कब्जा कर लिया। गाजियाबाद विकास प्राधिकरण ने रहीसपुर, रजा पुर, दमकनपुर, सिहानी आदि 10 तालाबों पर तो अपनी कालोनियां ही बना डालीं।  आवास विकास परिषद ने 05, यूपीएसआईडीसी ने 12 और सीपीडब्लूडी व नगर निगम ने एक-एक तालाब पर अपना कब्जा ठोक दिया। शहर के 28 तालाब अभी भी अपने अस्तित्व की लड़ाई समाज से लड़ रहे हैं जबकि 78 तालाबों को रसॅूखदार लोग पी गए। जाहिर है कि जब बाड़ ही खेत चर रही है तो उसका बचना संभव ही नहीं है। अब एक और हास्यास्पद बात सुनने में आई है कि कुछ सरकारी महकमे हड़प किए गए तालाबों के बदले में और कहीं जमीन देने व तालाब खुदवाने की बात कर रहे हैं।
गाजियाबाद महानगर पुरानी बस्ती है, यहां थोड़ी भी बारिश हो जाए तो पूरा शहर जलमग्न हो जाता है। मुख्य सड़के एक घंटे की बारिष में घुटने-घुटने पानी से लबा-लब होती हैं, लेकिन षहर के रमतेराम रोड़ स्थित पुराने तालाब में एक बूंद पानी नहीं रहता है। सनद रहे कि इस तालाब के रखरखाव पर विकास प्राधिकरण ने पूरे पांच करोड़ खर्च किए है। असल में हुआ यह कि तालाब के चारों आरे जम कर कंक्रीट पोता गया, सीढि़यां पक्की कर दी गई, लेकिन बारिष का पानी जिन सात रास्तों से तालाब तक पहुंचता था, उन्हें भी कंक्रीट से बंद कर दिया गया। अब रमतेराम रोड़ पर पानी भरता है, लेकिन तालाब में नहीं, जबकि कभी यह तालाब पूरे शहर को पानी आपूर्ति करता था। कोई चार सौ साल पुराने इस तालाब का क्षेत्रफल अभी तीन दशक पहले तक 17 हजार वर्गमीटर दर्ज था। अब इसके नौ हजार वर्गमीटर पर कब्जा हो चुका है और रही बची कसर इसके चारों ओर पक्की दीवार खड़ी कर पूरी हो गई है। अब यह एक सपाट मैदान है जहां बच्चे खेलते हैं या भैंसे चरती हैैं या फिर लोग कूड़ा डालते हैं। जाहिर है कि कुछ साल इसमें पानी आएगा नहीं और इसकी आड़ लेकर वहां कब्जा हो जाएगा। ठीक यही कहानी मकनपुर के तालाब की है, इसे पक्का बना दिया गया, यह विचारे बगैर कि तालाब की तली को तो कच्चा ही रखना पड़ता है।
षहर के मोहन नगर के करीब अर्थला तालाब कभी करीबी हिंडन के सहयोग से सदा-नीरा रहता था। राज्य के सरकारी महकमे ग्रामीण अभियंत्रण सेवा यानी आरईएस की ताजा रपट में बताया गया है कि वर्श 2008 से 2010 के बीच इस झील की जमीन पर 536 मकान बनाए गए। इंजीनियरों ने मकान में लगगे मटेरियल की जांच कर उनकी उम्र निर्धारित की और उसकी रपट कमिश्‍नर को सौंप दी। अब कुछ अफसर अपनी नौकरी व मकान मालिक अपने घर बचाने के लिए सियाासती जुगत लगा रहे हैं।
कहने की जरूरत नहीं है कि प्रकृति के साथ हुए इस अमानवीय व्यवहार पर यहां की अदालतें भी कागजी षेर की तरह बस आदेष ही देती रहीं। गाजियाबाद में तालाबों के सम्ृद्ध दिन लौटाने के लिए संघर्श कर रहे एक वकील संजय कष्यप ने जब सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी तो बताया गया कि सन 2005 में बनाए गए मास्टर प्लान में जिन 123 तालाबों का वजूद स्वीकारा गया था, उनमें से 82 पर अवैध कब्जे हो गए है। पता नहीं इतनी बड़ी स्वीकरोक्ति में प्रषासन की मासूमियत थी या लाचारी । हालांकि राजस्व रिकार्ड गाजियाबद नगर निगम सीमा के भीतर 147 तालाबों की बात कहता है, जबकि नगर निगम का सर्वे 123 की। सरकारी अफसर कहते हैं कि इनमें से केवल 45 तालाब ही ऐसे हैं जिन्हे बचाया जा सकता है। षहर के मकनपुर, सिहानी, मोरटा, षाहपुर, बम्हेटा, सादिक नगर, काजीपुरा, नायफल, कोटगांव, भोपुरा, पसांडा, सिकंदरपुर, रहीसपुर, महरौली, रजापुर, झंडापुर, साहिबाबाद गांव,महाराजपुर आदि इलाकों में रिकार्ड में तालबा है लेकिन हकीकत में वहां कालेानियां खड़ी है। यह पूरा घोटाला कई-कई अरब का है और इसमें हर दल-गुट- माफिया के लोग षामिल है। भूजल का स्तर बढ़ाने के नाम पर राज्य में कई साल से आदर्श तालाब निर्माण योजना चल रही है और इसे आंकड़ों की कसौटी पर देखें तो पाएंगे कि तालाबों में नोटों की खेप तो उतारी गई, लेकिन बदले में नतीजा शून्य ही रहा। अकेले गाजियाबाद जिले में बीते छह सालों के दौरान जिन 814 तालाबों पर कई करोड़ रूपए खर्च किए गए उनमें से 324 तो बारिष में भी रीते पड़े हैं। आंकडे कहते है। कि गाजियाबाद जिले की कुल 405 ग्राम पंचायतों में 2431 छोटे-बड़े ताल-तलैया हैं, जिनमें से 93 को आदर्ष तालाब घोषित किया गया है। इन पर अभी तक कोई 15 करोड़ रूपए का सरकारी व्यय किया जा चुका है। सरकारी रिकार्ड यह भी स्वीकार करता है कि ग्रामीण इलाकों के 302 तालाबों पर कतिपय असरदार लोगों ने अवैध कब्जे कर रखे हैं। हालांकि इस बात को बड़ी चतुराई से छिपाया जाता है कि इन कब्जे वाले इलकों में अब शायद ही तालाब का कोई अस्तित्व बचा है।
जिस तेजी से गाजियाबाद जिले का शहरीकरण हुआ, वहां की समृद्ध तालाब परंपरा पर कागजों पर करोड़ो खर्च किए गए, जबकि असल में तालाबों की संख्या हजारों में है। इन तालाबों को पाट कर कालेानी, बारातघर, स्कूल आदि बने, जिनके अब बाकायदा पक्के रिकार्ड हैं। यहां हर घर-कालेनी में पानी का संकट खड़ा है। श

हर का तीन-चैथई हिस्सा भूजल पर निर्भर है और जिस तेजी से तालाब समाप्त हुए, उसके चलते यहां का भूजल स्तर भी कई सौ फुट नीचे जा चुका है और इसे खतरनाक जल स्तर वाले क्षेत्र के तौर पर अधिसूचित किया गया है। बगैर पानी के बस रही कालोनियां मनवीय सभ्यता के विकास की सहयात्री तो हो नहीं पाएंगी, आखिर समस्या को हमने ही न्योता दिया है तो भुगतना भी हमें ही पड़ेगा।

सोमवार, 27 जनवरी 2014

दफ़न होते दरिया , मेरी आने वाली नई किताब

मेरी आने वाली नई किताब
यह पुस्तक शायद १५ दिन में सबके सामने आ जाये . इसके प्रकाशक हें "यश पब्लिकेशंस" नई दिल्लीhttp://www.yashpublications.com
अस्सी के दशक अंतिम वर्षों में श्री अनुपम मिश्र आपी पुस्तक ‘आज भी खरे हैं तालाब’ पर काम कर रहे थे, और उनकी प्रेरणा से मैने कुछ सामग्री बुंदेलखंड के तालाबों पर जुटाई। उसका इस्तेमाल  पुस्तक में हुआ भी, मेरे उल्लेख के साथ। फिर तालाबों को देखने, उनके प्रति लोगों को जागरूक बनाने की जो लगन लगी कि देश-दुनिया में जहां भी गया , वहां की जल-निधियों को देखना नहीं भूला। वैसे भी प्रकृति की अनमोल भेंट, बारिश की हर एक बूंद को सहेजना व सालभर आड़े वक्त पर काम लेने की कला हमारे पूर्वजों ने कई-कई सदियों में सीखी, विकसित की और सहेजी थी। और इस अनुकरणीय श्रम को अगली पीढ़ी तक सहेज कर रखना हमारी भी नैतिक जिम्मेदारी है। अब हाकिमों को, बड़ी-बड़ी डिगरी वाले इंजीनियरों को भी समझ आ गया है कि चाहे कंठ को तर करना हो या फिर खेत को संतुष्ट; ना तो जमीन का पेट चीर कर इस मांग को पूरा किया जा सकता है और ना ही नदियों से। जरूरी है कि अपने गांव-कस्बों के पुराने जल-कुंडों को उनका समृद्ध अतीत लौटाया जाए।
इस पुस्तक में कुल आठ ऐसे महानगरों व उनके करीबी शहरों को लिया गया है, जहां की आबादी सालभर पानी के लिए त्राहि-त्राहि कर रही है, जबकि उनके चप्पे-चप्पे पर पारंपरिक तालाब थे, जो विकास की आंधी में कहीं समतल मैदान तो कहीं कालोनी बन गए। प्रयास किया गया है कि इसमें अधिकांश उन तालाब-प्रणालियों को शामिल किया जाए , जो गैरहिंदीभाषी राजयों में हैं और जहां की खबरें हिंदी इलाकों तक कम ही आती हैं। ॅिफर अनुपम बाबू ने हिंदीभाषी इलाकों के तालाबों पर अपनी किताब में जो लिख दिया, उसके आगे उन प्रणालियों पर कुछ कहने को रह नहीं जाता है। यह पुस्तक तालाबों की  विकसित तकनीकी और फिर आजादी के बाद उनकी उपेक्षा से उपजे हालातों की बानगी है।यह पुस्तक लेखक के चार साल के भ्रमण और शोध का प्रतिफल है।

पंकज चतुर्वेदी, (एम.एससी, गणित)मूल रूप से पत्राकार हैं, सारे देश में  घूमते हैं और पानी, तालाब जैसे विषयों पर देशभर के अखबारों , पत्रिकाओं में तीन हजार से ज्यादा आलेख लिख चुके हैं। लगभग सात साल तक एक महाविद्यालय में सहायक प्राध्यापक, एक साल तक जिला साक्षरता समिति, छतरपुर में जिला समन्वयक , दिल्ली विश्वविद्यालय के कुछ कालेज व डाईट में आमंत्रित प्रवक्ता के साथ-साथ यूनीसेफ, राज्य संसाधन केंद्र, डी.पी.ई.पी., सर्व शिक्षा अभियान आदि के लिए बतौर सलाहकार व सौ से ज्यादा कार्यशालाओं का संचालन करने वाले श्री चतुर्वेदी ने बच्चों के लिए कई पुस्तकें लिखी और अनूदित की हैं, जिनका प्रकाशन नेशनल बुक ट्रस्ट, सीबीटी, प्रथम बुक्स, रूम टू रीड, नवनीत प्रकाशन, रेमाधव प्रकाशन, वर्चुअस पब्लिकेशंस आदि ने किया है। आई.आई.टी., दिल्ली और राजीव गांधी जल मिशन द्वारा प्रकाशित शोध ग्रंथः ‘बुंदेलखंड का जल संकट’ में लेखक की सामग्री का संदर्भ और संलग्नक में दो आलेख।
पत्राकार के तौर पर उनका शोध ‘‘क्या मुसलमान ऐसे होते हैं?’’ (शिल्पायन प्रकाशन,नई दिल्ली) एक पुस्तक के रूप में बेहद चर्चित रही है। डनहें कई पुरस्कार व सम्मान मिले हैं, जिनमें उल्लेखनीय हैं - म.प्र. आंचलिक पत्राकार संघ द्वारा वर्ष 1991 के लिए माखन लाल चतुर्वेदी पत्राकारिता पुरस्कार, षष्ठम विश्व पर्यावरण महासम्मेलन, 1997 में ‘राष्ट्रीय पर्यावरण सेवा सम्मान’, टीकमगढ़ जिला पत्राकार संघ द्वारा निवाड़ी में नवंबर’92 में बुंदेलखंड की बेहतरीन पत्राकारिता के  लिए सम्मान, चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट द्वारा आयोजित छठी वार्षिक प्रतियोगिता में वर्ष 1999 के लिए ‘ऐतिहासिक / पारंपरिक’ संवर्ग (9-12 आयुवर्ग) का द्वितीय पुरस्कार, साक्षरता निकेतन, राज्य संसाधन केंद्र द्वारा आयोजित अखिल भारतीय नवसाक्षर लेखन प्रतियोगिता वर्ष 2001-02 में दो पांडुलिपियाँ पुरस्कृत, 7वें अखिल भारतय हिंदी साहित्य सम्मलेन, गाजियाबाद, वर्ष 1999 में ‘युवा लेखक सम्मान’,राजीव गांधी एक्सीलेंसी अवार्ड - कान्सटीट्यूशनल क्लब, नई दिल्ली, 29 जून 2011,  एनसीईआरटी के लिए तैयार आॅडियो कार्यक्रम को श्रेष्ठ पुरस्कार, वर्ष - 2008, कार्यक्रम-बचेन्द्रीपाल आदि। आकाशवाण, दूरदर्शन व कई टी वी चैनलों पर कई कार्यक्रमों में विशेषज्ञ के रूप में शामिल रहे श्री चुतर्वेदी ने एस.आर.सी, जामिय लियिा इस्लामिया और एन.सी.ई.आर.टी. के लिए कई आॅडियो और वीडियो कार्यक्रम लिखे हैं।

रविवार, 26 जनवरी 2014

जनसत्‍ता, रविवार, 26 जनवरी 2014 कवर स्‍टोरी http://epaper.jansatta.com/219755/Jansatta.com/26-January-2014#page/17/1


जहर होता पाताल पानी

पंकज चतुर्वेदी

0 अग्निकांड के कारण चर्चा में आए मंडीडबवाली कस्बे के करीबी गांव जज्जल के लेाग पीने का पानी लेने सात किमी दूर गांव जाते हैं । कारण जज्जल व उससे सटे तीन गांवों में गत् कुछ वर्शों में सैंकड़ों लेाग केंसर से मारे गए हैं । कपास उत्पादन करने वाले इस इलाके में यह बात घर-घर तक फैल गई है कि उनके गांव के नलकूप व हैंडपंप पानी नहीं, जहर उगलते हैं । यह बात सरकार भी स्वीकार रही है कि अंधाधूंध कीटनाषकों के इस्तेमाल ने यहां के भूजल को विशेला बना दिया है ।

0 ‘‘ग्राउंडवाटर इन अर्बन इनवायरमेंट आफ इंडिया’’ प्रकाषक - केंद्रीय भूजल बोर्ड पुस्तक में उल्लेख है कि देष की राजधानी दिल्ली में आई.आई.टी. , एनसीईआरटी परिसर, नारायणा और षाहदरा के कुछ इलाकों के भूजल में नाईट्रेट की मात्रा 12.5 मिलीग्राम प्रति लीटर तक है, जबकि इसकी निर्धारित सीमा 1.5 मिग्रा से अधिक नहीं होना चाहिए ।

0 सी.पी.आर. इनवायरमंेटल एजुकेषन सेंटर द्वारा आयोजित किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि चैन्ने के भूजल में क्लोराईड और टी.डी.एस. की मात्रा पूरे षहर में निर्धारित सीमा से दुगना है ।

0 बिहार के नवादा जिले का कच्चारीडीह गांव ‘‘बांस के सहारे चलने वाले’’ गांव के नाम से कुख्यात है । यहां के 300 लोग, जिनमें 50 बच्चे भी हैं, बगैर सहारे के चलने में लाचार हैं । सरकारी जांच से पता चलता कि गांव के लोग ऐसा पानी पीने को मजबूर हैं, जिसमें फ्लोराईड की मात्रा 8 प्रतिषत तक है, जो निर्धारित सीमा के पांच गुना के बराबर है ।

0 गैरसरकारी संस्था ‘‘पर्यावरण सुरक्षा समिति’  की सर्वेक्षण रिपोर्ट बताती है कि गुजरात राज्य के कुल 184 तालुका में से 74 गंभीर भूजल प्रदूशण के षिकार हैं । अंकलेष्वर, अहमदाबाद आदि में तो केडमियम, तांबा और सीसे का आधिक्य है ।

जमीन की गहराईयों में पानी का अकूत भंडार है । यह पानी का सर्वसुलभ और  स्वच्छ जरिया है, लेकिन यदि एक बार दूशित हो जाए तो इसका परिश्करण लगभग असंभव होता है । भारत में जनसंख्या बढ़ने के साथ घरेलू इस्तेमाल, खेती और औद्योगिक उपयोग के लिए भूगर्भ जल पर निर्भरता साल-दर-साल बढ़ती जा रही है  । पाताल से  पानी निचोड़ने की प्रक्रिया में सामाजिक व सरकारी कोताही के चलते भूजल खतरनाक स्तर तक जहरीला होता जा रहा है ।ं भारत में दुनिया की सर्वाधिक खेती होती है । यहां 50 मिलियन हेक्टर से अधिक जमीन पर जुताई होती है, इस पर 460 बी.सी.एन. पानी खर्च होता है । खेतों की जरूरत का 41 फीसदी पानी सतही स्त्रोतों से व 51 प्रतिषत भूगर्भ से मिलता है ।  गत् 50 सालों के दौरान भूजल के इस्तेमाल में 115 गुणा का इजाफा हुआ है । भूजल के बेतहाषा इस्तेमाल से एक तो जल स्तर बेहद नीचे पहंुच गया है, वहीं लापरवाहियों के लते प्रकृति की इस अनूठी सौगात जहरीली होती जा रही है ।
सनद रहे कि देष के 360 जिलों को भूजल स्तर में गिरावट के लिए खतरनाक स्तर पर चिन्हित किया गया है । भूजल रिचार्ज के लिए तो कई प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन खेती, औद्योगिकीकरण और षहरीकरण के कारण जहर होते भूजल को ले कर लगभग निश्क्रियता का माहौल है ।  बारिष, झील व तालाब, नदियों और भूजल के बीच यांत्रिकी अंतर्संबंध है । जंगल और पेड़ रिचार्ज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । इसी प्रक्रिया में कई जहरीले रसायन जमीन के भीतर रिस जाते हैं । ऐसा ही दूशित पानी पीने के कारण देष के कई इलाकों में अपंगता, बहरापन, दांतों का खराब होना, त्वचा के रोग, पेट खराब होना आदि महामारी का रूप ले चुका है । ऐसे अधिकांष इलाके आदिवासी बाहुल्य हैं और वहां पीने के पानी के लिए भूजल के अलावा कोई विकल्प उपलब्ध नहीं हैं ।
दुनिया में चमड़े के काम का 13 फीसदी भारत में और भारत के कुल चमड़ा उद्योग का 60 फीसदी तमिलनाडु में है । मद्रास के आसपास पलार और कुंडावानुर नदियों के किनारे चमड़े के परिश्करण की अनगिनत इकाईयां हैं । चमड़े की टैनिंग की प्रक्रिया से निकले रसायनों के कारण राज्य के आठ जिलों के भूजल में नाईट्रेट की मात्रा का आधिक्य पाया गया है । दांतों व हड्डियों का दुष्मन फलोराईड सात जिलों में निर्धारित सीमा से कहीं अधिक है । दो जिलों में आर्सेनिक की मात्रा भूजल में बेतहाषा पाई गई है ।
संसद के दोनों सदनों में प्रस्तुत की गई जानकारी के मुताबिक आंध्रप्रदेष के 10 जिलों के भूजल में नाईट्रेट की मात्रा  45 मिलीग्राम से भी अधिक पाई गई है । जबकि फ्लोराईड की मात्रा 1.5 मिलीग्राम के खतरनाक स्तर से अधिक का मात्रा वाला भूजल 11 जिलों में पाया गया है । भारी धातुओं व आर्सेनिक के आधिक्य वाले आठ जिले हैं । राज्य के प्रकाषम, अनंतपुर, नालगोंडा जिलों में गर्भ जल के पानी का प्रदूशण स्तर इस सीमा तक है कि वहां का पानी मवेषियों के लिए भी अनुपयोगी करार दिया गया है ।  दक्षिण भारत के कर्नाटक की राजधानी बंगलौर, झीलों की नगरी कहलाने वाले धारवाड़ सहित 12 जिलों के भूजल में नाईट्रेट का स्तर 45 मिग्रा से अधिक है । फ्लोरोईड के आधिक्य वाले तीन जिले व भारी धातुओं के प्रभाव वाला एक जिला भद्रावती है । सर्वाधिक साक्षर व जागरूक कहलाने वाले केरल का भूजल भी जहर होने से बच नहीं पाया है । यहां के पालघाट, मल्लापुरम, कोट्टायम सहित पांच जिले नाईट्रेट की अधिक मात्रा के षिकर हैं । पालघाट व अल्लेजी जिलों के भूजल में फ्लोराईड की अधिकता होना सरकार द्वारा स्वीकारा जा रहा है ।
पूर्वी भारत के पष्चिम बंगाल में पाताल का पानी बेहद खतरनाक स्तर तक जहरीला हो चुका है । यहां के नौ जिलों में नाईट्रेट और तीन जिलों में फ्लोराईड की अधिकता है ।  बर्धमान, 24 परगना, हावड़ा, हुगली सहित आठ जिलों में जहरीला आर्सेनिक पानी में बुरी तरह घुल चुका है ।  राज्य के 10 जिलों का भूजल भरी धातुओं के कारण बदरंग, बेस्वाद हो चुका है । ओडिषा के 14 जिलों में नाईट्रेट के आधिक्य के कारण पेट के रोगियों की संख्या लाखों में पहुंच चुकी है । जबकि बोलांगिर, खुर्दा और कालाहांडी जिलों फ्लोराईड के आधिक्य के कारण गांव-गांव में पैर टेढ़े होने का रोग फैल चुका है ।
अहमदनगर से वर्धा तक लगभग आधे महाराश्ट्र के 23 जिलों के जमीन के भीतर के पानी में नाईट्रेट की मात्रा 45 मिलीग्राम के स्तर से कहीं आगे जा चुकी है । इनमें मराठवाड़ा क्षेत्र के लगभग सभी तालुके षामिल हैं । भंडारा, चंद्रपुर, औरंगाबाद और नांदेड़ जिले के गांवों में हैंडपंप का पानी पीने वालों में दांत के रोगी बढ़ रहे हैं, क्योंकि इस पानी में फ्लोराईड की बेइंतिहरा मात्रा है । तेजी से हुए औद्योगिकीकरण व षहरीकरण का खामियाजा गुजरात के भूजल को चुकाना पड़ रहा है । यहां के आठ जिलों में नाईट्रेट और फ्लोराईड का स्तर जल को जहर बना रहा है ।
मध्यप्रदेष की राजधानी भोपाल के बड़े हिस्से के भूजल में यूनियन कार्बाइड कारखाने के जहरीले रसायन घुल जाने का मुद्दा अंतरराश्ट्रीय स्तर पर चर्चित रहा है । बावजूद इसके लोग हैंडपंपों का पानी पी रहे हैं औरर बीमार हो रहे हैं । राज्य के ग्वालियर सहित 13 जिलों के भूजल में नाईट्रेट का असर निर्धारित मात्रा से कई गुणा अधिक पाया गया है । फ्लोराईड के आधिक्य की मार झेल रहे जिलों की संख्या हर साल बढ़ रही है । इस समय ऐसे जिलों की संख्या नौ दर्ज है । नागदा, रतलात, रायसेन, षहडोल आदि जिलों में विभिन्न कारखानों से निकले अपषिश्ठ के रसायन जमीन में कई कई किलोमीटर गहराई तक घर कर चुके हैं और इससे पानी अछूता नहीं है । उत्तरप्रदेष का भूजल पदिृष्य तो बहद डरावना बन गया है । यहां लखनऊ, इलाहबाद, बनारस सहित 21 जिलों में फ्लोराईड का आधिक्य दर्ज किया गया है । जबकि बलिया का पानी आर्सेनिक की अधिकता से जहर हो चुका है ।  गाजियाबाद, कानपुर आदि औद्योगिक जिलों में नाईट्रेट व भारी धातुओं की मात्रा निर्धारित मापदंड से कहीं अधिक है  । पष्चिमी उत्तर प्रदेष में भूजल में जहर का कहर बेहद डरावना हो गया है। यहां 120 से 150 फुट गहराई वाला पानी भी सुरक्षित नहीं है। यहां का पानी यदि मीठा लग रहा है तो यह ज्यादा खतरनाक है- क्योंकि उसमें आर्सेनिक की मात्रा अधिक होती है।
बस्तर के जंगलों में हर साल सैंकड़ो आदिवासी जहरीले पानी के कारण मरते हैं। यह बात सामने आ रही है कि नदी के किनारे बसे गांवों में उल्टी-दस्त का ज्यादा प्रकोप होता है। असल में यहां धान के खेतों में अंधाधुंध रसायन का प्रचलन बढने के बाद यहां के सभी प्राकृतिक जल-धाराएं जहरीली हो गई हैं। इलाके भर के हैंड पंपों पर फ्लोराईड या आयरन के आधिक्य के बोर्ड लगे हैं, लेकिन वे आदिवासी तो पढना ही नहीं जानते हैं और जो पानी मिलता है, पी लेते हैं। माढ़ के आदिवासी षौच के बाद भी जल का इस्तेमाल नहीं करते हैं। ऐसे में उनके षरीर पर बाहरी रसायन तत्काल तेजी से असर करते हैं।
देष की राजधानी दिल्ली , उससे सटे हरियाणा व पंजाब की जल कुंुंडली में जहरीले गृहों का बोलबाला है । यहां का भूजल खेतों में अंधाधुंध रासायनिक खादों के इस्तेमाल और कारखानों की गंदी निकासी के जमीन में रिसने से दूशित हुआ है । दिल्ली में नजफगढ् के आसपास के इलाके के भूजल को तो इंसानों के इस्तेमाल के लायक नहीं करार दिया गया है । गौरतलब है कि खेती में रासायनिक खादों व दवाईयों के बढ़ते प्रचलन ने जमीन की नैसर्गिक क्षमता और उसकी परतों के नीचे मौजूद पानी को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है । उर्वरकों में मौजूद नाईट्रोजन, मिट्टी के अवयवों से मिल कर नाईट्रेट के रूप में परिवर्तित हो कर भूजल में घुल जाते हैं ।
राजस्थान के कोई 20 हजार गांवेंा में जल की आपूर्ति का एकमात्र जरिया भूजल ही है और उसमें नाईट्रेट व फ्लोराईड की मात्रा खतरनाक स्तर पर पाई गई है । एक तरफ प्यास है तो दूसरी ओर जहरीला पानी । लोग ट्यूबवेल का पानी पी रहे हैं और बीमार हो रहे हैं । हैं। ‘‘चमकते गुजरात’’ के तो 26 में से 21 जिले खारेपन की चपेट में हैं और 18 में फ्लोराईड की मार।

दिल्ली सहित कुछ राज्यों में भूजल के अंधाधुंध इस्तेमाल को रोकने के लिए कानून बनए गए हैं, लेकिन भूजल को दूशित करने वालों पर अंकुष के कानून किताबों से बाहर नहीं आ पाए हैं । यह अंदेषा सभी को है कि आने वाले दषकों में पानी को ले कर सरकार और समाज को बेहद मषक्कत करनी होगी । ऐसे में प्रकृतिजन्य भूजल का जहर होना मानव जाति के अस्तित्व पर प्रष्न चिन्ह लगा सकता है ।

पंकज चतुर्वेदी
नेषनल बुक ट्रस्ट
5 वसंत कुंज इंस्टीट्षनल एरिया फेज-2
वसंत कुंज
नई दिल्ली-110070



निर्मल नहीं रहा भूजल

क्रमांक    राज्य    नाईटेªट के आधिक्य से प्रभावित जिले
(45मिग्रा/लीटर से अधिक मात्रा)    फ्लोराईड के आधिक्य से प्रभावित जिले
(1.5मिग्रा/लीटर से अधिक)    आर्सेनिक की अधिकता वाले जिले(0.05मिग्रा/लीटर से अधिक)    भारी धातु और आर्सेनिक के कारण दूशित जिले
1.    आंध्रप्रदेष    प्रकाषम, खम्माम, नलौर, नालगांेडा, निजामाबाद,गुंटुर,,कुरनूल,करीमनगर, महबूब नगर, विजयवाड़ा    प्रकाषम, अनंतपुर, नल्लौर, नालगांेडा,रंगारेड्डी, आदिलाबाद, कृश्णा, करनूल, कडप्पा, गुटूर, करीमनगर,    -    अनंतपुर, कडप्पा, मेहबूबनगर, नालगोंडा,प्रकाषम, विषाखपत्तनम, मेदक जिले का बोलराम पटनचेरू क्षेत्र
2.    असम    लखीमपुर    ररांग, नार्थ लखीमपुर, नगांव, करबी-अनलंाग        दिग्बोई
3.    बिहार    गया, पटना, नालंदा, नवादा,भागलपुर, बांका    जमुई    भोजपुर, पटना    बेगुसराय, भोजपुर, मुजफ्फरपुर
4.    छत्तीसगढ़    रायपुर    बस्तर, बिलासपुर, धमतरी,    कांकेर, कारेबा, कोरिया,रायपुर, राजनांदगांव    राजनांदगांव, बस्तर, कोरबा
5.    दिल्ली    पष्चिमी, पष्चिमी-दक्षिणी    उत्तर-पष्चिमी, पष्चिमी, पष्चिमी-दक्षिणी ,केंद्रीय        उत्तर-पष्चिमी, पष्चिमी, पष्चिमी-दक्षिणी ,केंद्रीय साथ में नजफगढ़ नाला
6.    गुजरात    अमरेली,,बनासकांठा,भावनगर, गांधीनगर, जामनगर, जूनागढ़, कच्छ, मेहसाणा    बनासकांठा, कच्छ, सौराश्ट्र, पंचमहल, खेड़ा, मेहसाणा, साबरकांठा       
7.    हरियाणा    अंबाला,भिवानी, फरीदाबाद,गुडगांव, हिसार, जींद, कुरूक्षेत्र, करनाल, महेन्द्रगढ, रोहतक, सोनीपत, सिरसा    झज्जर ,भिवानी, फरीदाबाद,गुडगांव, हिसार,कैथल, रेवाड़ी,फतेहाबाद, जींद,कुरूक्षेत्र,करनाल, महेन्द्रगढ, रोहतक, सोनीपत, सिरसा        फरीदाबाद
8.    हिमाचल प्रदेष    उना            कलाअंबा, परवाणु
9.    जम्मू-कष्मीर    कठुआ,           
10.    झारखंड    पलामू, साहेबगंज    गिरीडीह, धनबाद        धनबाद
11.    कर्नाटक    बीापुर, बैंगलोर, बेलगांव, बैल्लारी, चित्रदुर्ग, धारवाड़, गलुबर्गा, हासन,कोलार,मांडया,रायचूर,षिमोगा    बीजापुर, गुलबर्ग, बैल्लारी,        भद्रावती
12.    केरल    इदुक्की, केाट्टायम, पालघाट, पटानामिट्टा, मल्लापुरम    पालघाट, अलेप्पी       
13.    मध्यप्रदेष    भिंडद्व भापेाल, छिंदवाड़ा,धार,देवास, ग्वालियर, इंदौर, खंडवा, मंदसौर, मुरैना,षिवपुरी, सीहोर, उज्जैन    भिंड, मुरैना, हौषंगाबाद, गुना, झाबुआ, टीकमगढ़, छिंवाड़ा सिवनी, मंडला        नागदा, रतलाम
14.    महाराश्ट्र    अहमदनगर,अमरावती,अकोला,औरंगाबद, भंडारा, बीड, बुलडाना, चंद्रपुर, गढ़चिरोली, धुले, जलगांव, कोल्हापुर, जालना, लातुर, नागपुर, नांदेड़ उस्मानाबाद, पुणे, सांगली, सतारा, षोलापुर, ठाणे,वर्धा    भंडारा, चंद्रपुर, नांदेड़, औरगांबाद       
15.    उड़ीसा    अगंल, बरगड, बोलांगीर, बौध, कटक, गंजाम, जगतसिंहपुर, कालाहांडी, क्योंजर, मलकानगिरी,नवापारा, रायगढ़ा, संबलपुर, सुंदरगढ़    बोलांगिर, खुर्दा, कालाहांडी       
16.     पंजाब    भटिंडा, फरीदकोट, फिरोजपुर,पटियाला संगरूर    भटिंडा,मानसा,मोगा,मुक्तसर फरीदकोट, फिरोजपुर,पटियाला         लुधियाना, फतेहगढ़ साहेब  जिले का मंडी गोविंदगढ़,
17.    तमिलनाडु    कोयंबतूर,पेरियार,सालेम, अंबेडकरनगर,डिंडिगलु, पदयाची    धरमपुरी, सालेम, नार्थ अराकोट,पदयाची, मुथुरमल्लीगांव,तिरूचिनापल्ली, पुदुकोट्टई        मनाली, नार्थ अरकोट
18.     राजस्थान    अजमेर, अलवर, भरतपुर, बीकानेर, डूंगरपुर, गंगानगर हनुमानगढ़, जयपुर, जैसलमेर,जालौर, झंुझनू, जोधपुर, नागौर, सवाईमाधौपुर, उदयपुर    अजमेर, बाडमेर,भीलवाड़ा, बीकानेर,डूंगरपुर, गंगानगर, हनुमानगढ़,जयपुर,जैसलमेर,जालौर, झंुझनू, जोधपुर, पाली, राजसमंद, नागौर, सवाईमाधौपुर, उदयपुर, सीकर, सिरोही        झुंझनू, जोधपुर, पाली, उदयपुर
19.    उत्तरप्रदेष    अलीगढ़, आगरा, बांदा, इटावा, गाजियाबाद, हमीरपुर, जौनपुर, झंासी, कानपुर, मैनपुरी, मथुरा, पीलीभीत    फतेहपुर,रायबरेली,लखीमपुर, खीरी, लखनऊ, उन्नाव, कानपुर, हरदोई, बुलंदषहर,अलीगढ़,आगरा,मथुरा,गाजियाबाद, मेरठ, फीरोजाबाद, एटा,  मैनपुरी, महोबा, इलाहबाद, बनारस    बलिया    इलाहबाद, अलीगढ़, बस्ती, जौनपुर, कानपुर, सहारनपुर, सिंगरौली, बनारस
20.    उत्तरांचल    नैनीताल           
21.    प. बंगाल    उ. दीनाजपुर, मालदा, बीरभूमि, मुर्षिदाबाद, नदिया, बांकुरा, पुरलिया, हावड़ा, मेदनीपुर    बीरभूमि, हावड़ा, 24 परगना     बर्धमान, हावड़ा, हुगली, माल्दा, मुर्षिदाबादख्, नदिया, 24 परगना    बर्धमान, दुर्गापुर, हुगली, हावड़ा, मुर्षिदाबाद, मालदा, पदिया, 24 परगना
22.    चंडीगढ़    षहर           


विकलांग बनाता पानी
पंकज चतुर्वेदी

  ‘‘दस साल पहले तिलइपानी के बाशिंदों का जीवन देश के अन्य हजारों आदिवासी गांवों की ही तरह था । वहां थोड़ी बहुत दिक्कत पानी की जरूर थी । अचानक अफसरों को इन आदिवासियों की जल समस्या खटकने लगी । तुरत-फुरत हेंडपंप रोप दिए गए । लेकिन उन्हें क्या पता था कि यह जल जीवन दायी नहीं, जहर है । महज 542 आबादी वाले इस गांव में 85 बच्चे विकलांग हैं । तीन से बारह साल के अधिकांश बच्चों के हाथ-पैर टेढ़े हैं । वे
घिसट-घिसट कर चलते हैं और उनकी हड्डियों और जोड़ों में असहनीय दर्द रहता है ।’’
 यह विदारक कहानी अकेले तिलइपानी की ही नहीं है । मध्यप्रदेश और उससे अलग हो कर बने छत्तीसगढ़ राज्य के आधा दर्जन जिलों के सैंकड़ों गांवों में ‘तिलइपानी’ देखा जा सकता है । पारंपरिक जल स्त्रोतों, नदी-नालों व तालाब-बावडियों से पटे मप्र में पिछला दशक जल समस्या का चरम काल रहा है । हालांकि इस समस्या को उपजाने में समाज के उन्हीं लोगों का योगदान अधिक रहा है, जो इन दिनों इसके निदान का एकमात्र जरिया भूगर्भ जल दोहन बता रहे हैं ।
टेकनालाजी मिशन नामक करामाती केंद्र सरकार पोषित प्रोजेक्ट के शुरुआती दिनों की बात है । नेता-इंजीनियर की साझा लाबी गांव-गांव में ट्रक पर लदी बोरिंग मशीनें लिए घूमते थे । जहां जिसने कहा कि पानी की दिक्कत है, तत्काल जमीन की छाती छेद कर नलकूप रोप दिए गए । हां, जनता की वाह-वाही तो मिलती ही, जो वोट की फसल बन कर कटती भी । यानि एक तीर से दो शिकार - नोट भी और वोट भी । पर जनता तो जानती नहीं थी और हैंडपंप मंडली जानबूझ कर अनभिज्ञ बनी रही कि इस तीर से दो नहीं तीन शिकार हो रहे हैं । बगैर जांच परख के लगाए गए नलकूपों ने पानी के साथ-साथ वो बीमारियां भी उगलीं, जिनसे लोगों की अगली पीढि़यां भी अछूती नहीं रहीं । ऐसा ही एक विकार पानी में फ्लोराइड के आधिक्य के कारण उपजा । फ्लोराइड पानी का एक स्वाभाविक- प्राकृतिक अंश है और इसकी 0.5 से 1.5 पीपीएम मात्रा मान्य है । लेकिन मप्र के हजारों हैंडपंपों से निकले पानी में यह मात्रा 4.66 से 10 पीपीएम और उससे भी अधिक है ।
फ्लोराइड की थोड़ी मात्रा दांतों के उचित विकास के लिए आवश्यक हैं । परंतु इसकी मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक होने पर दांतों में गंदे धब्बे हो जाते हैं । लगातार अधिक फ्लोराइड पानी के साथ शरीर में जाते रहने से रीढ़, टांगों, पसलियों और खोपड़ी की हड्डियां प्रभावित होती हैं । ये हड्डियां बढ़ जाती हैं, जकड़ और झुक जाती हैं । जरा सा दवाब पड़ने पर ये टूट भी सकती हैं । ‘फ्लोरोसिस’ के नाम से पहचाने वाले इस रोग का कोई इलाज नहीं है ।
मप्र के झाबुआ, सिवनी, शिवपुरी, छतरपुर, बैतूल, मंडला और उज्जैन व छत्तीसगढ़ के बस्तर जिलों के भूमिगत पानी में फ्लोराइड की मात्रा निर्धारित सीमा से बहुत अधिक है । आदिवासी बाहुल्य झाबुआ जिले के 78 गांवों में 178 हेंडपंप फ्लोराइड आधिक्य के कारण बंद किया जाना सरकारी रिकार्ड में दर्ज है । लेकिन उन सभी से पानी खींचा जाना यथावत जारी है । नानपुर कस्बे के सभी हेंडपंपांे को पीने अयोग्य घोषित किया गया है । जब सरकारी अमले उन्हें बंद करवाने पहुंचे तो जनता ने उन्हें खदेड़ दिया । ठीक यही बड़ी, राजावट, लक्षमणी, ढोलखेड़ा, सेजगांव और तीती में भी हुआ । चूंकि यहां पेय जल के अन्य कोई स्त्रोत शेष नहीं बचे हैं । सो हेंडपंप बंद होने पर जनता को नदी-पोखरों का पानी पीना होगा,जिससे हैजा,आंत्रशोथ,पीलिया जैसी बीमारियां होगीं । इससे अच्छा वे फ्लोरोसिस से तिल-तिल मरना मानते हैं । बगैर वैकल्पिक व्यवस्था किए फ्लोराइड वाले हेंडपंपों को बंद करना जनता को रास नहीं आ रहा है । परिणाम है कि  जिले के हर गांव में 20 से 25 फीसदी लोग पीले दांत, टेढ़ी-मेढ़ी हड्डियों वाले हैं ।
शिवपुरी जिले के नरवर और करैरा विकास खंडों के दो दर्जन गांवों में फ्लोराइड की विनाश लीला का पता सन 1990 में ही लग गया था । तब यहां के पानी के नमूने राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) नागपुर भेजे गए थे । सर्वाधिक प्रभावित गांवों फूलपुर और हतैडा में सितंबर-92 में फ्लोराइड उपचार यंत्र लगाए गए थे । एक तो इन संयंत्रों का रखरखाव ठीक रहा, फिर आबादी बढ़ने के साथ बढ़ी पानी की मांग को पूरा करने के लिए नए हेंडपंप भी लगे । सो बनियानी, जरावनी, हतैडा गांवों में आधी से अधिक आबादी फ्लोरोसिस के अभिशाप से ग्रस्त है ।
मंडला जिले के तिलइपानी, मोहगांव, सिलपुरी, सिमरियामाल और घुघरी विकास खंडों मेें आठ हजार से अधिक हेंडपंप फ्लोराइड का जहर उगल रहे हैं । यहां बच्चों की समूची पीढ़ी ताजिंदगी अपाहिज है । तिलइपानी के करीबी रसोइदाना, शिवपुर, छपरी, सिमरिया में ही 2000 से अधिक रोगी हैं । जिले के कुल 2092 में से 2053 गांवों में फ्लोरोसिस का आधिक्य है । दर्दनाक बात यह है कि यहां लगाए गए हरेक हेंडपंप की सर्वे रिपोर्ट में फ्लोराइड की मात्रा 1.3 पीपीएम से अधिक नहीं लिखी है और उसे राज्य प्रदूषण निवारण बोर्ड ने भी सत्यापित किया है। वो तो जब गांवों में विकलांग बच्चों की संख्या बढ़ने लगी, तब जबलपुर मेडिकल कालेज के कुछ डाक्टरों का ध्यान इस ओर गया ।
सिवनी जिले के 82 गांवों में फ्लोराइड के खतरनाक सीमा पार कर जाने के बाद वहां 111 हेंडपंपों को बंद कर दिया गया है । सबसे अधिक बुरी हालत घनसौर ब्लाक की है, जहां 31 गांवों में फ्लोराइड का आतंक है । छपरा ब्लाक में 16, घनौरा में आठ और सिवनी में 27 गांवों के भूजल ने विकलांगता का कोहराम मचा रखा है । इन सभी गांवों में पानी की कोई अन्य व्यवस्था करे बगैर ही हैंडपंपों को बंद कर दिया गया है ।
गलत रिपोर्ट देने वाला कौन है ? इसकी जांच को हर स्तर पर दबा दिया गया । उसके बाद सरकार इन फ्लोराइड आधिक्य वाले गांवों को निहार रही है । चंूिक कहीं भी पेय जल के लिए और कोई व्यवस्था है नहीं, सो जनता जान कर भी जहर पी रही है । कई गांवों के हालात तो इतने बदतर हैं कि वहां मवेशी भी फ्लोराइड की चपेट में आ गए हैं । डाक्टरी रिपोर्ट बताती है कि गाय-भैंसों के दूध में फ्लोराइड की मात्रा बेतहाशा बढ़ी हुइ्र्र है , जिसका सेवन साक्षात विकलांगता को आमंत्रण देना है । लेकिन ऐसी कई और रिपोर्टें भी महज सरकारी लाल बस्तों में धूल खा रही हैं ।
जहां एक तरफ लाखों लोग फ्लोरोसिस के अभिशाप से घिसट रहे हैं, वहीं प्रदेश के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग की रुचि अधिक से अधिक ‘फ्लोरोडीशन संयंत्र’ खरीदने में है । यह किसी से छिपा नहीं है कि सरकारी खरीद-फरोख्त में किन के और कैसे वारे-न्यारे होते हैं । इस बात को सभी स्वीकारते हैं कि जहां फ्लोरोसिस का आतंक इतना व्यापक हो, वहां ये इक्का-दुक्का संयंत्र फिजूल ही होते हैं । फ्लोराइड से निबटने में ‘नालगोंडा विधि ’ खासी कारगर रही है । इससे दस लीटर प्रति व्यक्ति हर रोज के हिसाब छह सदस्यों के एक परिवार को साल भर तक पानी शुद्ध करने का खर्चा मात्र 15 से 20 रुपए आता है । इसका उपयोग आधे घंटे की ट्रेनिंग के बाद लोग अपने ही घर में कर सकते हैं । काश सरकार या स्वयंसेवी संसथाओं ने इस दिशा में कुछ सार्थक व्रयास किए होते ।
फ्लोराइड आधिक्य वाले इन इलाकों में फ्लोराइड युक्त टूथ पेस्टों की बिक्री धड़ल्ले से जारी है । साथ ही कुछ ऐसी रासायनिक खादों की बिक्री भी हो रही है जिसमें मिलावट के तौर पर फ्लोराइड की कुछ मात्रा होती है । इन पर रोक के लिए किसी भी स्तर पर सोचा ही नहीं गया है ।


शनिवार, 25 जनवरी 2014

परमाणु ताकत की कीमत चुकाता भारत द सी एक्‍सप्रेस आगरा 26 जनवरी 2014 http://theseaexpress.com/Details.aspx?id=60663&boxid=12347812 और डेली न्‍यजू, जयपुर 29 1 14 http://dailynewsnetwork.epapr.in/220867/Daily-news/29-01-2014#page/6/1

कई फुकुषिमा पनप रहे हैं भारत मेंा!
                                    पंकज चतुर्वेदी

ं बीते कुछ सालों से मुल्क की सियासत के केंद्र में बिजली है - कहीं सस्ती या मुफ्त बिजली के वायदे हैं तो कहीं ज्यादा बिजी बिलों को ले कर तकरार। यूपीए-1 तो बिजली के लिए अमेरिका के साथ परमाणु समझौते को ले कर पूरी सरकार को दांव पर लगा चुका था। लेकिन बिजी की लालसा में लोग चार साल पहले जापान में आई सुनामी के बा
परमाणु उर्जा से बनने वाली बिजली का उपभोग करने वाले नेता व अफसर तो दिल्ली या किसी शहर में सुविधा संपन्न जीवन जी रहे हैं , परंतु हजारों लोग ऐसे भी हैं जो इस जुनून की कीमत अपना जीवन दे कर चुका रहे हैं । जिस जमीन पर परमाणु ताकत का परीक्षण किया जाता रहा है, वहां के लोग पेट के खातिर अपने ही बच्चों को अरब देशों में बेच रहे हैं । जिन इलाकों में एटमी ताकत के लिए रेडियो एक्टिव तत्व तैयार किए जा रहे हैं, वहां की अगली पीढ़ी तक का जीवन अंधकार में दिख रहा है । जिस जमीन से परमाणु बम का मुख्य मसाला खोदा जा रहा है, वहां के बाशिंदे तो जैसे मौत का हर पल इंतजार ही करते हैं ।
झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के जादुगोड़ा में भारत की पहली और एकमात्र यूरेनियम की खान है । यहां से अयस्क का खनन किया जाता है और उसे परिशोधन के लिए हजार किमी दूर हैदराबाद भेजा जाता है । इस प्रक्रिया में शेष बचे जहरीले कचरे को एक बार फिर जादुगोड़ा ला कर आदिवासी गांवों के बीच दफनाया जाता है । यूरेनियम कारपोरेशन आफ इंडिया (यूसिल) लाख दावा करे कि खनन या कचरे का जन-जीवन पर कोई असर नहीं पड़ रहा है । पर हकीकत यह है कि पिछले तीन-चार सालों में यहां एक सैंकड़ा से अधिक असामयिक मौतें हुई हैं । खुद युसिल का रिकार्ड बताता है कि यूरेनियम खनन और उसके कचरे के निबटारे में लगे 21 लोग सन 1996 में मारे गए । ऐसे ही मरने वालों की संख्या 1995 में 14 और 1994 में 21 थी । ये सभी मौतें टीबी, ल्यूकेमिया, केंसर जैसी बीमारियों से हुई हैं और इसके मूल में रेडियो विकिरण ही था । उसके बाद कंपनी ने रिकार्ड को उजागर करना ही बंद कर दिया है, लेकिन गैरसरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि साल का अंक बढ़ने के साथ-साथ मौत के आंकड़े भी बढ़ रहे हैं।
सिंहभूम जिले के सिविल सर्जन ने विकिरण से प्रभावित कई लोगों की पहचान भी की है । इलाके के आदिवासी विकिरण-मुक्त जीवन के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं । पिछले कई सालों से आंदोलन, लाठीचार्ज, धरने, गिरफ््तारियां, उत्पीड़न यहां के बाशिंदों की नियति बन गया है । जब कोई मौत होती है तो गुस्सा भड़कता है । प्रशासन के आश्वासन मिलते हैं । ‘राष्ट्र गौरव’ की बेदी पर बलि होने के लिए एक बार फिर भूखे-मजबूर आदिवासियों की नई जमात खड़ी हो जाती है ।
रावतभाटा(राजस्थान) में परमाणु शक्ति से बिजली बनाने का संयत्र लगा है , लेकिन एटमी ताकत को बम में बदलने के लिए जरूरी तत्व जुटाने का भी यह मुख्य जरिया है । कुछ साल पहले गुजरात इंस्टीट्यूट आफ डेवलपमेंट रिसर्च ने रावतभाटा के आसपास 17 दिन तक विस्तृत अध्यन किया था । संस्था के लोगों ने कोई छह हजार घरों पर पड़ताल की थी । इन्होंने पाया कि रावतभाटा के करीबी गांवों में अन्य गांवों की तुलना में जन्मजात विकलांगता की दर तीन गुना अधिक है । गर्भपात, मरे हुए बच्चे पैदा होना, स्त्रियों में बांझपन आदि का प्रतिशत भी बहुत उंचा है । इस बिजली घर से पांच किमी दूर स्थित तमलाव गांव में बोन ट्यूमर, थायराइड ग्लैंड, सिस्टिक ट्यूमर जैसी बीमारियां हर घर की कहानी है । केंद्र के कर्मचारियों और वहां रहने वालों के बच्चे टेढ़े-मेढ़े हाथ-पांव और अविकसित अंग पैदाइशी होना आम बात हो गई है । यहां तक कि पशुओं की संख्या भी कम होती जा रही है । बकरियों में विकलांगता और गर्भपात की घटनाएं बढ़ी हैं ।
इस सर्वेक्षण में कई डाक्टर भी थे । उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी है कि विकिरण की थोड़ी सी मात्रा भी शरीर में परिवर्तन के लिए काफी होती है । विकिरण जीव कोशिकाओं को क्षति ग्रस्त करता है । इससे आनुवांशिकी कोशिकाओं में भी टूट-फूट होती है । आने वाली कई पीढि़यों तक अप्रत्याशित बीमारियों की संभावना बनी रहती है ।
शौर्य भूमि पोकरण में भव्य स्मृति स्थल बनाने के लिए करोड़ों का खर्चा करने के लिए आतुर कथित राष्ट्रवादी संगठनों ने कभी यह जानने की जुर्रत नहीं की कि तपती मरूभूमि में जनजीवन होता कैसा है । भाजपा षासन के दौरान किए गए परीक्षण-विस्फोट से डेढ़ सौ मकान पूरी तरह बिखर गए थे । साल भर के लिए पानी इकट्ठा रखने वाले ‘टांकों’ के टांके टूट गए । ऐवज में सरकार ने जो मुआवजा बांटा था उससे एक कमरा भी खड़ा नहीं होना था । धमाके के बाद जब इलाके में नाक से खून बहने और अन्य बीमारियों की खबरें छपीं तो खुद प्रधानमंत्री ने किसी भी तरह के विकिरण कुप्रभाव ना होने के बयान दिए थे । जबकि भूगर्भीय परीक्षण के बाद रेडियोधर्मी जहर के रिसाव की मात्रा और उसके असर पर कभी कोई जांच हुई ही नहीं है । राजस्थान विश्वविद्यालय के एक शोधकर्ता डा अग्रवाल ने पाया था कि 1974 में विस्फोट के बाद पोकरण व करीबी गांवों में केंसर के रोगियों की संख्या में बढ़ौतरी हुई है ।
पोकरण क्षेत्र सरकारी उपेक्षा का किस हद तक शिकार है, इसकी बानगी है कि यहां पेट पालने के लिए लोग अपने बच्चों को बेच रहे हैं । पोकरण और इसकी पड़ौसी पंचायत शिव के कोई एक दर्जन गांव-ढ़ाणियों से हर साल सैंकड़ों बच्चे ऊंट दौड़ के लिए खाड़ी देशों को जाते हैं । ये बच्चे 12 से 14 साल उम्र और 30-35 किलो वजन के होते हैं । इनका वजन नहीं बढ़े इसके लिए उन्हें खाना-पीना कम दिया जाता है । जेसलमेर जिले के भीखोडोई , फलसूंड , बंधेव , फूलोसर व राजमथाई और बाडमेर के उंडू , कानासर , आरंग , रतेउ ,केसुआ आदि गांवों के लड़के अरब देशों को गए हैं । ये गरीब मुसलमान , सुतार , राजपूत और जाट बिरादरी के हैं ।
अपने घरों के लिए पेट की जुगाड़ बने ये बच्चे जब विदेश से लौटे तो पैसा तो खूब लाए पर असामान्य हो गए । वे तुतलाने और हकलाने लगे । कई बच्चे शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग हो गए । हर समस्या की तरह इस पर भी सरकार का तो यही कहना है कि इलाके से कोई बच्चा नहीं गया है । पर वास्तविकता को यी बात उजागर करती है कि अकेले पोकरण से हर साल 30 से 50 पासपोर्ट बन रहे हैं । जेसलमेर जिले में हर साल डेढ़ हजार पासपोर्ट बन रहे हैं ।
‘जय जवान-जय किसान’  के साथ ‘‘जय विज्ञान ’’ के नारे की प्रासंगिकता पोकरण  के इस पहलू से संदिग्ध हो जाती है । इस घोर रेगिस्तान में ना तो उद्योग-धंधे खुल सकते हैं और ना ही व्यापार की संभावनाएं हैं । ऊपर से एक तरफ प्रकृति की मार है तो दूसरी ओर ‘जय विज्ञान’ का आतंक । आखिर किस बात का गौरव है ?
यह विडंबना ही है कि भारत में इन तीनों स्तर पर जन-जीवन भगवान भरोसे है । षायद इस बात का आकलन किसी ने किया ही नहीं कि परमाणु ताकत से बिजली बना कर हम जो कुछ पैसा बचाएंगे या कमाएंगे; उसका बड़ा हिस्सा जन-स्वास्थ्य पर खर्च करना होगा या फिर इससे अधिक धन का हमारा मानव संसाधन बीमारियों की चपेट में होगा।
आने वाली पीढ़ी के लिए उर्जा के साधन जोड़ने के नाम पर एटमी ताकत की तारफ करने वाले लोगों को यह जान लेना चाहिए कि क्षणिक भावनात्मक उत्तेजना से जनता को लंबे समय तक बरगलाया नहीं जा सकता है । यदि हमारे देश के बाशिंदे बीमार, कुपोषित और कमजोर होंगे तो लाख एटमी बिजली घर या बम भी हमें सर्वशक्तिमान नहीं बना सकते हैं ।



द फुकुषिमा के परमाणु बिजली संयंत्र का रिसाव अकेले जापान ही नहीं आधा दर्जन देषों के अस्तित्व पर संकट बन गया था। उस समय सारी दुनिया में बहस चली थी कि परमाणु उर्जा कितनी उपयोगी और खतरनाक है। सभी ने माना था कि परमाणुु षक्ति को बिजली में बदलना षेर पर सवारी की तरह है- थोड़ा चूके तो काल का ग्रास बनना तय है। लेकिन विडंबना है कि भारत में देष के भाग्यविधात उन लाखों लोगों के प्रति बेखबर हैं जो कि देष का परमाणु-संपन्न बनाने की कीमत पीढि़यों से विकिरण की त्रासदी सह कर चुका रहे हैं। एटमी ताकत पाने के तीन प्रमुख पद हैं - यूरेनियम का खनन, उसका प्रसंस्करण और फिर विस्फोट या परीक्षण। लेकिन जिन लोगों की जान-माल की कीमत पर इस ताकत को  हासिल किया जा रहा है; वे नारकीय जीवन काट रहे हैं ?

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

TIRATHGARH ; THE MOST BEAUTIFUL WATER FALL OF BASTAR

  1. तीरथगढ़ के झरने छत्तीसगढ़ के बस्तर ज़िले में कांगेर घाटी पर स्थित कई झरने है।
    तीरथगढ़ झरने जगदलपुर की दक्षिण-पश्चिम दिशा में 35 किमी की दूरी पर स्थित है।
    तीरथगढ़ झरने भारत के सबसे ऊँचे झरनों में से एक है।





































    तीरथगढ़ झरनों की ऊँचाई लगभग 300 फीट है।
    तीरथगढ़ झरनों पर पिकनिक का आनंद उठाया जा सकता है।
    असल में यहाँ कई झरने हें सबकी स्वर अलग अलग हें, बस्तर के बेहतरीन दर्शनीय स्थल में से एक कांगेर नदी पर, लगभग 300 फीट नीचे गई खण्डों में एक साथ गिरती,विशाल जलराशि का सौन्दर्य अतुलनीय।सबसे ऊंचा जलप्रपात । तीरथगढ़ जलप्रपात के आगे इसी नदी पर कांगेर धारा प्रपात भी दर्शनीय /

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

दाल की घटती मांग व् खेती पर आलेख राष्ट्रीय सहारा २२ जनवरी २०१४ http://www.rashtriyasahara.com/epapermain.aspx?queryed=9और राज एक्सप्रेस, भोपाल २३-१-१४

आम आदमी की थाली से दूर होती दाल
मुद्दा पंकज चतुव्रेदी
इन दिनों आम आदमी के भोजन से दाल गायब हो रही है। इसका कारण है, मांग की तुलना में कम उत्पादन। डॉलर के मुकाबले रपए के कमजोर होने से घटता आयात और उसके आसमान छूते दाम। वह दिन अब हवा हो गए हैं जब आम मेहनतकश लोगों के लिए प्रोटीन का मुख्य स्रेत दालें हुआ करती थीं। देश की आबादी बढ़ी, लोगों की पौष्टिक आहार की मांग भी बढ़ी, लेकिन नहीं बढ़ा तो दाल बुवाई का रकबा। परिणाम सामने हैं- मांग की तुलना में दाल की आपूत्तर्ि कम है और इसी कारण बाजार भाव मनमाने हो रहे हैं। भारत में 20 मीट्रीक टन दाल की सालाना जरूरत है, जबकि देश में सन् 2012-13 में इसका उत्पादन हुआ महज 18.45 मीट्रिक टन। दाल की कमी होने के कारण ही इसके दाम बढ़ रहे हैं, नजीतन आम आदमी प्रोटीन की जरूरतों की पूर्ति के लिए दीगर अनाजों पर निर्भर हो रहा है। इस तरह दूसरे अनाजों की भी कमी और दामों में बढ़ोतरी हो रही है। हालात इतने खराब हैं कि पिछले 22-23 सालों से हम हर साल दालों का आयात तो कर रहे हैं, लेकिन दाल में आत्मनिर्भर बनने के लिए इसका उत्पादन और रकबा बढ़ाने की कोई ठोस योजना नहीं बन पा रही है । यहां यह जानना जरूरी है कि भारत दुनिया भर में दाल का सबसे बड़ा खपत कर्ता, पैदा करने वाला और आयात करने वाला देश है। दुनिया में दाल के कुल खेतों का 33 प्रतिशत हमारे यहां है जबकि खपत 22 फीसद है। इसके बावजूद अब वे दिन सपना हो गए हैं जब आम-आदमी को ‘दाल-रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ’ कह कर कम में ही गुजारा करने की सीख दे दी जाती थी। आज दाल अलबत्ता तो बाजार में मांग की तुलना में काफी कम उपलब्ध है, और जो उपलब्ध है, उसकी कीमत चुकाना गरीब गुरबा और आम-आदमी के बूते से बाहर हो गया है। वर्ष 1965-66 में देश का दलहन उत्पादन 99.4 लाख टन था, जो 2006-07 तक आते-आते भी 145.2 लाख टन ही पहुंच पाया। सन 2008-09 में मुल्क के 220.9 लाख हेक्टेयर खेतों में 145.7 लाख टन दाल ही पैदा हो सकी। सनद रहे कि इस अवधि में देश की जनसंख्या में कई-कई गुणा बढ़ोतरी दर्ज हुई है। जाहिर है, अबादी के साथ दाल की मांग भी बढ़ी। इसी अवधि के दौरान गेंहू की फसल 104 लाख टन से बढ़ कर 725 लाख टन तथा चावल की पैदावार 305.9 लाख टन से बढ़ कर 901.3 लाख टन हो गई। हरित क्रांति के दौर में दालों की उत्पादकता दर, अन्य फसलों की तुलना में बेहद कम रही है। दलहन फसलों की बुवाई के रकबे में बढ़ोतरी न होना भी चिंता की बात है । सन 1965-66 में देश के 227.2 लाख हेक्टेयर खेतों पर दाल बोई जाती थी जबकि सन 2005-06 तक आते-आते यह रकबा घट कर 223.1 लाख हेक्टेयर रह गया। वर्ष 1985-86 में विश्व में दलहन के कुल उत्पादन में भारत का योगदान 26.01 प्रतिशत था, लेकिन 1986-87 में यह आंकड़ा 19.97 पर पहुंच गया। हालांकि सन 2000 आते-आते इसमें कुछ बढ़ोतरी हुई और यह 22.64 फीसद हो गया लेकिन ये आंकड़े हकीकत में मांग से बहुत दूर रहे। हम गत 25 वर्षो से लगातार विदेशों (म्यांमार, कनाडा, आस्ट्रेलिया और टर्की) से दालें मंगवा रहे हैं। पिछले साल देश के बाजारों में दालों के रेट बहुत बढ़ गए थे। तब आम आदमी बहुत परेशानी में था और उसने अपने स्तर पर विरोध भी दर्ज कराया, लेकिन आलू-प्याज के लिए कोहराम मचाने वाले राजनीतिक दल इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रहे थे । पिछले साल सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एमएमटीसी ने नवम्बर तक 18,000 टन अरहर और मसूर की दाल आयात करने के लिए नियंतण्र टेंडर को मंजूरी दी थी। माल आया भी, उधर हमारे खेतों ने भी बेहतरीन फसल उगली। एक तरफ आयातित दाल बाजार में थी, सो किसानों को अपने उत्पादन का अपेक्षित रेट नहीं मिला। ऐसे में किसान के हाथ फिर निराशा लगी और अगली फसल में उसने एक बार फिर दालों से मुंह मोड़ लिया । दाल के उत्पादन को प्रोत्साहित करने के इरादे से केंद्र सरकार ने सन 2004 में इंटीग्रेटेड स्कीम फार आईल सीड, पल्सेज, आईल पाम एंड मेज (आईएसओपीओएम) नामक योजना शुरू की थी। इसके तहत दाल बोने वाले किसानों को सब्सिडी के साथ-साथ कई सुविधाएं देने की बात कही गई थी। लेकिन वास्तव में यह योजना नारों से ऊपर नहीं आ पाई। इससे पहले चौथी पंचवर्षीय योजना में ‘इंटेंसिव पल्सेस डिस्ट्रीक्ट प्रोग्राम’ के माध्यम से दालों के उत्पादन को बढ़ावा देने का संकल्प लाल बस्तों से उबर नहीं पाया। सन 1991 में शुरू हुई राष्ट्रीय दलहन विकास परियोजना भी आधे-अधूरे मन से शुरू की गई योजना थी। उसके भी कोई परिणाम नहीं निकले। जहां सन 1950-51 में हमारे देश में दाल की खपत प्रति व्यक्ति प्रति दिन 61 ग्राम थी जो 2009-10 तक आते-आते 36 ग्राम से भी कम हो गई। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की मानें तो हमारे देश में दलहनों के प्रामाणिक बीजों हर साल मांग 13 लाख कुंतल है, जबकि उपलब्धता महज 6.6 लाख कुंतल। यह तथ्य इस बात की बानगी है कि सरकार दाल की पैदावार बढ़ाने के लिए कितनी गंभीर है। यह दुख की बात है कि भारत, जिसकी अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है, वहां दाल जैसी मूलभूत फसलों की कमी को पूरा करने के लिए कोई ठोस कृषि-नीति नहीं है। एक ही उपाय है कि कमी हो तो बाहर से आयात कर लो। यह तदर्थवाद देश की परिपक्व कृषि-नीति का परिचायक कतई नहीं माना जा सकता है। नेशनल सैंपल सव्रे के एक सव्रेक्षण के मुताबिक आम भारतीयों के खाने में दाल की मात्रा में लगातार हो रही कमी का असर उनके स्वास्थ्य पर दिखने लगा है। इसके बावजूद दाल की कमी कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं बन पा रहा है। शायद सभी सियासी पार्टियों की रुचि देश के स्वास्थ्य से कहीं अधिक दालें बाहर से मंगवाने में हैं। तभी तो इतने शोर-शराबे के बावजूद दाल के वायदा कारोबार पर रोक नहीं लगाई जा रही है। इससे भले ही बाजार भाव बढ़े, सटौरियों को बगैर दाल के ही मुनाफा हो रहा है।
    

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