तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

सोमवार, 30 जून 2014

child beggers

RASHTRIY SAHARA 01-07-2014http://www.rashtriyasahara.com/epapermain.aspx?queryed=9
भीख के लिए गिड़गिड़ाते मासूमों का सच

मुद्दा पंकज चतुव्रेदी
दिल्ली की ठसाठस भरी बसों में बेसुरे स्वर में गाना गाकर भीख मांगते बच्चों को सुन अब शायद ही किसी के दिल में कसक उठती हो। चीथड़ों में लिपटे और नंगे पैर चार से आठ-दस साल की उम्र के ये बच्चे भोर होते ही बसों में गाने लगते हैं। गाना पूरा करने के बाद दुत्कार के साथ कुछ एक से पैसा मिल जाने की खुशी भले ही इन्हें होती हो, लेकिन यह खुशी इस देश के लिए कितनी महंगी पड़ेगी, इस पर गौर करने का कष्ट कोई भी शासकीय या स्वयंसेवी संगठन नहीं कर रहा है। देश की कुल आबादी का 21.87 फीसद यह वर्ग आने वाले दिनों में किस भारत का निर्माण करेगा, इस पर हर तरफ चुप्पी है । ट्रेन-बस में भौडी आवाज में गाना गाने के अलावा, इन मासूमों का इस्तेमाल और भी तरीकों से होता है। कुछ बच्चे (विशेषकर लड़कियां) भीड़ में पर्चा बांटती दिखेंगी कि वह गूंगी है, उसकी मदद करनी चाहिए। छोटे बच्चों को बीच सड़क पर लिटाकर बीमार होने या मर जाने का नाटक कर पैसे ऐंठने का खेल अब छोटे-छोटे कस्बों तक फैल गया है। मथुरा, काशी सरीखे धार्मिक स्थानों पर बाल ब्रrाचारियों के फेर में भिक्षावृत्ति जोरों पर है। इसके अलावा जादू या सांपने वले का खेल दिखाने वाले मदारी के जमूरे, सेकेंड क्लास डिब्बों में झाडू लगा व क्रासिंग पर कार-स्कूटर की धूल झाड़ने जैसे कायार्ें के जरिए या सीधे भीख मांगते बच्चे सरेआम मिल जाएंगे। अनुमान है कि देश में कोई पचास लाख बच्चे हाथ फैलाए एक अकर्मण्य व श्रमहीन भारत की नींव रख रहे हैं। सत्तर के दशक में देश के विभिन्न हिस्सों में कुछ ऐसे गिरोहों का पर्दाफाश हुआ था, जो अच्छे-भले बच्चों का अपहरण कर उन्हें लोमहर्षक तरीके से विकलांग बना भीख मंगवाते थे। यह दानव बच्चों की खरीद-फरोख्त भी करते थे लेकिन नब्बे का दशक आते-आते इस समस्या का रंग-ढंग बदल गया है। ऐसे गिरोहों के अलावा महानगरों में ‘झुग्गी संस्कृति’ से अनाचार-कदाचार के जो रक्तबीज प्रसवित हुए, उनमें अब अपने सगे ही बच्चों को भिक्षावृत्ति में धकेल रहे हैं। हारमोनियम लेकर बसों में भीख मांगने वाले एक बच्चे से बात करने पर पता चला कि उसके मां-बाप उसे सुबह छह बजे जगा देते हैं। बगैर मंजन-कुल्ला या स्नान के इनको ऐसे बस रूटों की ओर धकेल दिया जाता है, जहां दफ्तर जाने वालों की बहुतायत होती है। भूखे पेट बच्चे दिन में 12 बजे तक एक बस से दूसरी बस में चढ़कर वही अलापते रहते हैं। फिर ये शाम 4.30 बजे से 8.00 बजे तक बसों के चक्कर काटते हैं। रोजाना औसतन 50 से 75 रुपये एक संगीत पार्टी कमा लेती है। ये भिखारी ज्यादातर फुटपाथों पर ही रहते हैं। मां जहां भीख मांगती फिरती है, वहीं बाप नशा करके दिन काट देता है। जाहिर है नशा खरीदने के लिए पैसे बच्चों की मशक्कत से ही आते हैं । यह भी देखा गया है कि भीख मांगने वाली लड़कियां 14 वर्ष की होते-होते मां बन जाती हैं और दुबली पतली देह पर एक मरगिल्ला सा बच्चा आय का अच्छा ‘एक्सपोजर’
RAJ EXPRESS BHOPAL 8-7-14 http://epaper.rajexpress.in/epapermain.aspx
बन जाता है। आंख खुलने ही हिकारत, तिरस्कार और श्रम के अवमूल्यन की भावना के शिकार ये बच्चे किस हद तक कुंठित होते हैं, इसका मार्मिक उदाहरण दिल्ली के एक मध्यम वर्ग कालोनी के बगीचे में बच्चों के बीच हो रही तकरार का यह वाकिया है। कुछ भिखारी बच्चे (उम्र सात से नौ वर्ष,) कालोनी के झूले पर झूलने लगे। कालोनी के उतनी उम्र के बच्चे झूला खाली कराना चाहते थे। भिखारी लड़की गुस्से में कहती है,‘भगवान करे तुम्हारा भी बाप मर जाए। जब किसी का बाप मरता है तो मुझे बड़ी खुशी होती हैं।’ कालोनी के बच्चे ने कहा ‘तुझसे क्या मुंह लगें, तू तो फुटपाथ पर सोती है।’ ‘एक दिन फुटपाथ पर सोकर देख ले, पता चल जाएगा।’ मुश्किल से नौ साल की इस भिखारी लड़की के दिल में समाज और असमानता को लेकर भरा जहर किस हद तक पहुंच गया है, यह इस वार्तालाप से उजागर होता है। यह विष भारत के भविष्य पर क्या असर डालेगा, यह सवाल अभी कहीं खड़ा ही नहीं हो पा रहा है, हल की बात कौन करे! भिक्षावृति निरोधक अधिनियम के अंर्तगत, भीख मांगने वाले को एक से तीन साल के कारावास का प्रावधान है लेकिन कई राज्यों में सपेरे, मदारी, नट, साधु आदि को पुरातन भारतीय लोक-कलाओं व संस्कृति का रक्षक माना जाता है और वे इस अधिनियम की परिधि से बाहर होते हैं। अलबत्ता भिखारी बच्चों को पकड़ने की जहमत कोई सरकारी महकमा उठाता नहीं हैं। फिर यदि इस सामाजिक समस्या को कानूनी डंडे से ठीक करने की सोचें तो असफलता ही हाथ लगेगी। देश के बाल सुधार गृहों की हालत अपराधी निर्माणशाला से अधिक नहीं है। यहां बच्चों को पीट-पीट कर मार डाला जाता है। भूख से बेहाल बच्चे यौन शोषण का शिकार होते हैं। बाल भिक्षावृत्ति समस्या की र्चचा बालश्रम के बगैर अधूरी लगेगी। देश में बचपन-बचाने के नाम पर संचालित दुकानों द्वारा बालश्रम की रोकथाम के नारे केवल उन उद्योगों के इर्द-गिर्द भटकते दिखते हैं, जिनके उत्पाद देश को विदेशी मुद्रा अर्जित कराते हैं। भूख से बेहाल बच्चे की पेट व बौद्धिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए न तो कानून या शासन सक्षम है, न ही समाज जागरूक। ऐसे में बच्चा यदि छुटपन से कोई ऐसा तकनीकी कार्य सीखने लगता है, जो आगे चल कर न सिर्फ उसके जीवकोपार्जन का साधन बनता है, बल्कि देश की आर्थिक व्यवस्था की सुदृढ़ता में भी सहायक होता है, तो यह सुखद है। एक्सपोर्ट कारखानों से बच्चों की मुक्ति की मुहिम चलाने वालों द्वारा सड़कों पर हाथ फैलाए नौनिहालों की अनदेखी करना, उनका बच्चों के प्रति प्रेम व निष्ठा के विद्रूप चेहरे को उघाड़ता है। बच्चों के शारीरिक, मानसिक व सामाजिक विकास के लिए 22 अगस्त 1974 को बनी ‘राष्ट्ीय बाल नीति’ हो या 1986 की राष्ट्रीय शिक्षानीति या फिर 2010 तक सभी के लिए शिक्षा का विश्व बैंक कार्यक्रम या केद्र सरकार का सभी को शिक्षा का नारा। फिलहाल सभी कागजी शेर की तरह दहाड़ते दिख रहे हैं। सभी बच्चों को शिक्षा के अधिकार के ढिंढोरे से ज्यादा उस मानवीय दृष्टिकोण जरूरत है जो मासूमों के दिल के अरमानों को पूरा कर सके।

रविवार, 29 जून 2014

probleme creating flyovers and under pass

नईदुनिया राष्ट्रीय संस्करण ३० जून २०१४ http://naiduniaepaper.jagran.com/Details.aspx?id=692030&boxid=13533





फजीहत करवाते फ्लाईओवर
पंकज चतुर्वेदी

अभी कुछ फुहारें क्या पड़ी ,दिल्ली और उसके आसपास के सभी महानगर- गाजियाबाद, नोएडा, गुडगांव पानी-पानी हो गए। कई सड़कों पर पांच किलोमीटर तक लंबा जाम लग गया। गरमी से निजात के आनंद की कल्पना करने वाले सड़कों पर जगह-जगह पानी भरने से ऐसे दो-चार हुए कि अब बारिष के नाम से ही डर रहे हैं। बारिष भले ही रिकार्ड में बेहद कम थी, लेकिन आधी दिल्ली ठिठक गई। जहां उड़ कर जाने को यह भी नहीं कि ऐसा केवल दिल्ली में ही हो रहा है। यह तो हर साल की कहानी है और देष के कोई दो दर्जन महानगरों की त्रासदी है। हर बार सारा दोष नालों की सफाई ना होने ,बढ़ती आबादी, घटते संसाधनों और पर्यावरण से छेड़छाड़ पर थोप दिया जाता हैं । विडंबना है कि शहर नियोजन के लिए गठित लंबे-चौड़े सरकारी अमले पानी के बहाव में शहरों के ठहरने पर खुद को असहाय पाते हैं ।
देष की राजधानी दिल्ली में सुरसामुख की तरह बढ़ते यातायात को सहज बहाव देने के लिए बीते एक दश्क के दौरान ढेर सारे फ््लाई ओवर और अंडरपास बने। कई बार दावे किए गए कि अमुक सड़क अब ट्राफिक सिग्नल से मुक्त हो गई है, इसके बावजूद दिल्ली में हर साल कोई 185 जगहों पर 125 बड़े जाम और औसतन प्रति दिन चार से पांच छोटे जाम लगना आम बात है।  इनके प्रमुख कारण किसी वाहन का खराब होना, किसी धरने-प्रदर्शन  की वजह से यातायात  का रास्ता बदलना, सड़कांे की जर्जर हालत ही होते हैं । लेकिन जान कर आश्चर्य होगा कि यदि मानवजन्य जाम के कारणों को अलग कर दिया जाए तो महानगर दिल्ली में जाम लगने के अधिकांश्  स्थान या तो फ्लाई ओवर हैं या फिर अंडर पास। और यह केवल बरसात के दिनों की ही त्रासदी नहीं है, यह मुसीबत बारहों महीने, किसी भी मौसम में आती है। कहीं इसे डिजाईन का देाश कहा जा रहा है तो कहीं लोगों में यातायात-संस्कार का अभाव। लेकिन यह तय है कि अरबों रूपए खर्च कर बने ये हवाई दावे हकीकत के धरातल पर त्रासदी ही हैं।
बारिष के दिनों में अंडर पास में पानी भरना ही था, इसका सबक हमारे नीति-निर्माताओं ने आईटीओ के पास के षिवाजी ब्रिज और कनाट प्लेस के करीब के मिंटो ब्रिज से नहीं लिया था। ये दोनों ही निर्माण बेहद पुराने हैं और कई दशकोंू से बारिश  के दिनों में दिल्ली में जल भराव के कारक रहे हैं। इसके बावजूद दिल्ली को ट्राफिक सिग्नल मुक्त बनाने के नाम पर कोई चार अरब रूपए खर्च कर दर्जनभर अंडरपास बना दिए गए। लक्ष्मीनगर चुंगी, द्वारका मार्ग, मूलचंद,पंजाबी बाग आदि कुछ ऐसे अंडर पास हैं जहां थोड़ी सी बारिष में ही कई-कई फुट पानी भर जाता है। सबसे श र्मनाम तो है हमारे अंतर्राष्ट्रीय  हवाई अड्डे को जोड़ने वाले अंडर पास का नाले में तब्दील हो जाना। कहीं पर पानी निकालने वाले पंपों के खराब होने का बहाना है तो सड़क डिजाईन करने वाले नीचे के नालों की ठीक से सफाई ना होने का रोना रोते हैं तो दिल्ली नगर पालिका अपने यहां काम नहीं कर रहे कई हजार कर्मचारियों की पहचान ना कर पाने की मजबूरी बता देती है। इन अंडरपास की समस्या केवल बारिश  के दिनों में ही नहीं है। आम दिनों में भी यदि यहां कोई वाहन खराब हो जाए या दुर्घटना हो जाए तो उसे खींच कर ले जाने का काम इतना जटिल है कि जाम लगना तय ही होता है। असल में इनकी डिजाई में ही खामी है जिससे बारिश  का पूरा जल-जमाव उसमें ही होता है। जमीन के गहराई में जा कर ड्रैनेज किस तरह बनाया जाए, ताकि पानी की हर बूंद बह जाए, यह तकनीक अभी हमारे इंजीनियरों को सीखनी होगी।
ठीक ऐसे ही हालात फ्लाईओवरों के भी हैं। जरा पानी बरसा कि उसके दोनो ओर यानी चढ़ाई व उतार पर पानी जमा हो जाता है। कारण एक बार फिर वहां बने सीवरों की ठीक से सफाई ना होना बता दिया जाता है। असल में तो इनकी डिजाईन में ही कमी है- यह आम समझ की बात है कि पहाड़ी जैसी किसी भी संरचना में पानी की आमद ज्यादा होने पर जल नीचे की ओर बहेगा। मौजूदा डिजाईन में नीचे आया पानी ठीक फ्लाईओवरों से जुड़ी सड़क पर आता है और फिर यह मान लिया जाता है कि वह वहां मौजूद स्लूस से सीवरों में चला जाएगा। असल में सड़कों से फ्लाईओवरों के जुड़ाव में मोड़ या अन्य कारण से एक तरफ गहराई है और यहीं पानी भर जाता है। कई स्थान पर इन पुलों का उठाव इतना अधिक है और महानगर की सड़कें हर तरह के वाहनों के लिए खुली भी हुई हैं, सो आए रोज इन पर भारी मालवाहक वाहनों का लोड ना ले पाने के कारण खराब होना आम बात है। एक वाहन खराब हुआ कि कुछ ही मिनटों में लंबा हो जाता है। ऐसे हालात सरिता विहार, लाजपत नगर, धौलाकुआं, नारायणा, रोहिणी आदि में आम बात हैं।
अब शायद दिल्ली को वल्र्ड क्लास सिटी बनाने के स्वप्नदृश्टाओं को सोचना होगा कि कई अरब-खरब खर्च कर यदि ऐसी ही मुसीबत को झेलना है तो फिर ट्राफिक सिग्नल सिस्टम ही क्या बुरा है ? जैसे हाल ही में सरकार को समझ में आया कि कई-कई करोड़ खर्च कर बनाए गए भूमिगत पैदल पारपथ आमतौर पर लोग इस्तेमाल करते ही नहीं हैं और नीतिगत रूप से इनका निर्माण बंद कर दिया गया है। 
यह विडंबना है कि हमारे नीति निर्धारक यूरोप या अमेरिका के किसी ऐसे देष की सड़क व्यवस्था का अध्ययन करते हैं जहां ना तो दिल्ली की तरह मौसम होता है और ना ही एक ही सड़क पर विभिन्न तरह के वाहनों का संचालन। उसके बाद सड़क, अंडरपास और फ्लाईओवरों की डिजाईन तैयार करने वालों की षिक्षा भी ऐसे ही देशों  में लिखी गई किताबों से होती हैं। नतीजा सामने है कि ‘‘आधी छोड़ पूरी को जावे, आधी मिले ना पूरी पावे’’ का होता है। हम अंधाधंध खर्चा करते हैं, उसके रखरखाव पर लगातार पैसा फूंकते रहते हैं- उसके बावजूद ना तो सड़कों पर वाहनों की औसत गति बढ़ती है और ना ही जाम जैसे संकटों से मुक्ति। काष! कोई स्थानीय मौसम, परिवेश  और जरूरतों को ध्यान में रख कर जनता की कमाई से उपजे टैक्स को सही दिशा  में व्यय करने की भी सोचे। सरकार में बैठे लोग भी इस संकट को एक खबर से  कहीं आगे की सोच के साथ देखे।

पंकज चतुर्वेदी
यूजी-1, 3/186 ए राजेन्द्र नगर
सेक्टर-2
साहिबाबाद
गाजियाबाद 201005
9891928376, 0120-4241060
चब7001010/हउंपसण्बवउ

शनिवार, 28 जून 2014

Urbanisation : threat to ecology




 100 नए शहर और अनियोजित शहरीकरण: पर्यावरण का सबसे बड़ा संकट
पंकज चतुर्वेदी
जनसत्‍ता रविवार 29 6 14


देष की राजधानी दिल्ली ! बीते कुछ दिनों से तापमान क्या उछला, जैसे सारा महानगर ही अस्त-व्यस्त हो गया। कही ंपानी नहीं है तो कहीं बिजली का संकट, कहीं गरम हो कर वाहन सड़क पर जाम कर रहे हैं तो कहीं  भीषण गर्मी से स्वास्थ्य समस्याएं उभर रही हैं। नारे-वादे-आरोप-प्रत्यारोप तो बहुत से हैं, लेकिन सर्वशक्तिमान महानगर के पास इनका कोई हल नहीं हैं। असल में शहरीकरण आधुनिकता और विकास की सार्वभौम प्रक्रिया है और अव्यवस्थाएं, अनाचार, असमानता, इसके स्वाभाविक उत्पाद। साल दर साल बढती गरमी, गांव-गांव तक फैल रहा जल-संकट का साया, बीमारियों के कारण पट रहे अस्पताल,.. ऐसे कई मसले हैं जो आम लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक बना रहे हैं। कहीं कोई नदी, तालाब के संरक्षण की बात कर रहा है तो कही पेड़ लगा कर धरती को बचाने का संकल्प, जंगल व वहां के बाशिंदे जानवरों को बचाने के लिए भी सरकार व समाज प्रयास कर रहे हैं। लेकिन भारत जैसे विकासशील व्यवस्था वाले देष में पर्यावरण का सबसे बड़ा संकट तेजी से विस्तारित होता ‘शहरीकरण’ एक समग्र विशय के तौर लगभग उपेक्षित है। असल में देखें तो संकट जंगल का हो या फिर स्वच्छ वायु का या फिर पानी का ; सभी के मूल में विकास की वह अवधरणा है जिससे शहररूपी सुरसा सतत विस्तार कर रही है और उसकी चपेट में आ रही है प्रकृति और नैसर्गिकता।
और अब 100 नए शहर बसाने की तैयारी हो रही है, बस उम्मीद ही कर सकते हैं कि नए बने षहर उर्जा, यातायात, पानी के मामलों में अपने संसाधनों पर ही निर्भर होंगे, वरना यह प्रयोग देष के लिए नया संकट होगा। नए षहर का मतलब कुछ हजार-लाख एकड़ उपजाऊ खेतों को कंक्रीट द्वारा उदरस्थ होना, पानी के परंपरागत स्त्रोतों की बलि, हरियाली व नैसर्गिकता की हत्या और बिजली-पानी-सड़क-कचरे के संकटों के नए प्रतिमान। इसमें कांेई शक नहीं कि नए शहर बनने से रियल एस्टेट , सीमेंट, लोहे का कारोबार बढ़ेगा, कुछ लोगों को कुछ साल तक मजूदरी व अन्य रोजगार मिलेगा, इससे देष की आर्थिक व्यवस्था के आंकड़े दुरूस्त होते दिखेंगे और उसे विकास भी कहा जाएगा। बस, यही फक होता है विकास और प्रगति में - प्रगति में व्यक्ति से कहीं अधिक समुदाय, प्रकृति और दूरगामी परिवर्तन के तत्व होते हैं, जबकि विकास में कुछ कंपनियों का या कुछ लेागों का महज आर्थिक विकास होता है।  विचारणीय है कि क्या गावंों में मूजभूत सुविधाएं, परिवहन व संचार, कुटीर उद्योग को सषक्त कर देष के जीडीपी में इजाफा नहीं किया जा सकता?
हमारे देश में संस्कृति, मानवता और बसावट का विकास नदियों के किनारे ही हुआ है । सदियों से नदियों की अविरल धारा और उसके तट पर मानव-जीनव फलता-फूलता रहा है । बीते कुछ दशकों में विकास की ऐसी धारा बही कि नदी की धारा आबादी के बीच आ गई और आबादी की धारा को जहां जगह मिली वह बस गई । और यही कारण है कि हर साल कस्बे नगर बन रहे हैं और नगर महानगर । बेहतर रोजगार, आधुनिक जनसुविधाएं और, उज्जवल भविष्य की लालसा में अपने पुश्तैनी घर-बार छोड़ कर शहर की चकाचांैंध की ओर पलायन करने की बढ़ती प्रवृति का परिणाम है कि देश में एक लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की संख्या 302 हो गयी है । जबकि 1971 में ऐसे शहर मात्र 151 थे । यही हाल दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की है । इसकी संख्या गत दो दशकों में दुगुनी होकर 16 हो गयी है । पांच से 10 लाख आबादी वाले शहर 1971 में मात्र नौ थे जो आज बढ़कर आधा सैंकड़ा हो गये हंैं । विशेषज्ञों का अनुमान है कि आज देश की कुल आबादी का 8.50 प्रतिशत हिस्सा देश के 26 महानगरों में रह रहा है । विश्‍व बैंक की ताजा रिपोर्ट बताती है कि आने वाले 20-25 सालों में 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों की संख्या 60 से अधिक हो जाएगी जिनका देश के सकल घरेलू उत्पाद मे ंयोगदान 70 प्रतिशत होगा। एक बात और बेहद चैांकाने वाली है कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या शहरों में रहने वाले गरीबों के बराबर ही है । यह संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है, यानी यह डर गलत नहीं होगा कि कहीं भारत आने वाली सदी में ‘अरबन स्लम’ या षहरी मलिन बस्तियों में तब्दील ना हो जाए।
देष की लगभग एक तिहाई आबादी  31.16 प्रतिषत अब शहरों में रह रही हैं। 2011 की जनगणना के आंकड़े गवाह हैं कि गांव छोड़ कर शहर की ओर जाने वालों की संख्या बढ़ रही है और अब 37 करोड 70 लाख लोग षहरों के बाषिंदे हैं । सन 2001 और 2011 के आंकड़ों की तुलना करें तो पाएंगे कि इस अवधि में षहरों की आबादी में नौ करोड़ दस लाख का इजाफा हुआ जबकि गावंो की आबादी नौ करोड़ पांच लाख ही बढ़ी।
देष के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में सेवा क्षेत्र का योगदान 60 फीसदी पहंुच गया है जबकि खेती की भूमिका दिनो-दिन घटते हुए 15 प्रतिषत रह गई है। जबकि गावोे की आबादी अभी भी कोई 68.84 करोड़ है यानी देश की कुल आबादी का दो-तिहाई। यदि आंकड़ों को गौर से देखें तो पाएंगे कि देष की अधिकांष आबादी अभी भी उस क्षेत्र में रह रही है जहां का जीडीपी शहरों की तुलना में छठा हिस्सा भी नहीं है। यही कारण है कि गांवों में जीवन-स्तर में गिरावट,  शिक्षा, स्वास्थ्य, मूलभूत सुविधाओं का अभाव, रोजगार की कमी  है और लोगों बेहतर जीवन की तलाष में षहरों की ओर आ रहे हैं।
लेकिन शहर भी  दिवास्वप्न से ज्यादा नहीं ंहै, देष के चारों महानगर अब आबादी का बोझ सहने लायक नहीं ंहैं जबकि दीगर 9735 शहर भले ही आबादी से लबालब हों, लेकिन उनमें से मात्र 4041 को ही सरकारी दस्तावेज में शहर की मान्यता मिली है। शेष 3894 शहरों में शहर नियोजन या नगर पालिका तक नहीं है। यहां बस खेतों को उजाड़ कर बेढब अधपक्के मकान खउ़े कर दिए गए हैं जहां पानी, सड़क, बिजली आदि गांवों से भी बदतर हे। सरकार कारपोरेट को बीते पांच साल में कोई 21 लाख करोड़ की छूट बांट चुकी है। वहीं हर साल पचास हजार करोड़ कीमत की खाद्य सामग्री हर साल माकूल रखरखाव के अभाव में नष्‍ट हो जाती है और सरकार को इसकी फिकर तक नहीं होती। बीते साल तो सुप्रीम कोर्ट भी कह चुका कि यदि गोदामों में रखो अनाज को सहजे नहीं सकते हो तो उसे गरीबों को बांट दो, लेकिन इसके लिए हुक्मरान तैयार नहीं है। विकास और सबसिडी का बड़ा हिस्सा षहरी आबादी के बीच बंटने से विशमता की खाई बड़ी होती जा रही है।

दिल्ली, कोलकाता, पटना जैसे महानगरों में जल निकासी की माकूल व्यवस्था न होना शहर में जल भराव का स्थाई कारण कहा जाता है । मुंबई में मीठी नदी के उथले होने और सीवर की 50 साल पुरानी सीवर व्यवस्था के जर्जर होने के कारण बाढ़ के हालात बनना सरकारें स्वीकार करती रही है। बंगलौर में पारंपरिक तालाबों के मूल स्वरूप में अवांछित छेड़छाड़ को बाढ़ का कारक माना जाता है । शहरों में बाढ़ रोकने के लिए सबसे पहला काम तो वहां के पारंपरिक जल स्त्रोतों में पानी की आवक और निकासी के पुराने रास्तों में बन गए स्थाई निर्माणों को हटाने का करना होगा । यदि किसी पहाड़ी से पानी नीचे बह कर आ रहा है तो उसका संकलन किसी तालाब में ही होगा । विडंबना है कि ऐसे जोहड़-तालाब कंक्रीट की नदियों में खो गए हैं । परिणामतः थोड़ी ही बारिश में पानी कहीं बहने को बहकने लगता है ।
महानगरों में भूमिगत सीवर जल भराव का सबसे बड़ा कारण हैं । जब हम भूमिगत सीवर के लायक संस्कार नहीं सीख पा रहे हैं तो फिर खुले नालों से अपना काम क्यों नहीं चला पा रहे हैं ? पोलीथीन, घर से निकलने वाले रसायन और नष्ट न होने वाले कचरे की बढ़ती मात्रा, कुछ ऐसे कारण हैं, जोकि गहरे सीवरों के दुश्मन हैं । महानगरों में सीवरों और नालों की सफाई भ्रष्टाचार का बड़ा माध्यम है । यह कार्य किसी जिम्मेदार एजेंसी को सौंपना आवश्यक है, वरना आने वाले दिनों में महानगरों में कई-कई दिनों तक पानी भरने की समस्या उपजेगी, जो यातायात के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा होगा ।

शशर के लिए सड़क चाहिए, बिजली चाहिए, मकान चाहिए, दफ्तर चाहिए, इन सबके लिए या तो खेत होम हो रहे हैं या फिर जंगल।  जंगल को हजम करने की चाल में पेड़, जंगली जानवर, पारंपरिक जल स्त्रोत, सभी कुछ नश्ट हो रहा है। यह वह नुकसान है जिसका हर्जाना संभव नहीं है। षहरीकरण यानी रफ्तार, रफ्तार का मतलब है वाहन और वाहन हैं कि विदेषी मुद्रा भंडार से खरीदे गए ईंधन को पी रहे हैं और बदले में दे रहे हैं दूषित वायु। शशर को ज्यादा बिजली चाहिए, यानी ज्यादा कोयला जलेगा, ज्यादा परमाणु संयंत्र लगेंगे।
षहर का मतलब है औद्योगिकीकरण और अनियोजित कारखानों की स्थापना का परिणाम है कि हमारी लगभग सभी नदियां अब जहरीली हो चुकी हैं। नदी थी खेती के लिए, मछली के लिए , दैनिक कार्यों के लिए , नाकि उसमें गंदगी बहाने के लिए। गांवों के कस्बे, कस्बों के षहर और षहरों के महानगर में बदलने की होड़, एक ऐसी मृग मरिचिका की लिप्सा में लगी है, जिसकी असलियत  कुछ देर से खुलती है। दूर से जो जगह रोजगार, सफाई, सुरक्षा, बिजली, सड़क के सुख का केंद्र होते हैं, असल में वहां सांस लेना भी गुनाह लगता है।
शहरों की घनी आबादी संक्रामक रोगों के प्रसार का  आसान जरिया होते हैं, यहां दूषित पानी या हवा भीतर ही भीतर इंसान को खाती रहती है और यहां बीमारों की संख्या ज्यादा होती है।  देश के सभी बड़े शहर इन दिनों कूड़े को निबटाने की समस्या से जूझ रहे हैं। कूड़े को एकत्र करना और फिर उसका शमन करना, एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। एक बार फिर शहरीकरण से उपज रहे कचरे की मार पर्यावरण पर ही पड़ रही है।
असल में शहरीकरण के कारण पर्यावरण को हो रहा नुकसान का मूल कारण अनियोजित शहरीकरण है। बीते दो दशकों के दौरान यह प्रवृति पूरे देष में बढ़ी कि लोगों ने जिला मुख्यालय या कस्बों की सीमा से सटे खेतों पर अवैध कालोनियां काट लीं। इसके बाद जहां कहीं सड़क बनी, उसके आसपास के खेत, जंगल, तालाब को वैध या अवैध तरीके से कंक्रीट के जंगल में बदल दिया गया। देश के अधिकांष उभरते शहर अब सड़कों के दोनेां ओर बेतरतीब बढ़ते जा रहे हैं। ना तो वहां सार्वजनिक परिवहन है, ना ही सुरक्षा, ना ही बिजली-पानी की न्यूनतम मांग। असल में देश में बढ़े काले धन को जब बैंक या घर मे ंरखना जटिल होने लगा तो जमीन में निवेश के अंधे कुंए का सहरा लिया जाने लगा। इससे खेत की कीमतें बढ़ीं, खेती की लागत भी बढ़ी और किसानी लाभ का काम नहीं रहा गया। पारंपरिक शिल्प और रोजगार की त्यागने वालों का सहारा शहर बने और उससे वहां का अनियोजित व बगैर दूरगामी सोच के विस्तार का आत्मघाती कदम उभरा।
केवल पर्यावरण प्रदूषण ही नहीं, षहर सामाजिक और सांस्कृतिक प्रदूषण की भी ंगंभीर समस्या उपजा रहे हैं। लोग अपनों से मानवीय संवेदनाओं से , अपनी लोक परंपराओं व मान्यताओं से कट रहे हैं। इसकी जगह उनका झुकाव आधुनिक किस्म के बाबा-फकीरों, देवताओं और पंथों में बढ़ रहा है, जो अलग किस्म के अंधविश्‍वास और रूढि़यों का कारक है।
तो क्या लोग गांव में ही रहें ? क्या विकास की उम्मीद ना करें ? ऐसे कई सवाल शहरीकरण में अपनी पूंजी को हर दिन कई गुणा होते देखने वाले कर सकते हैं। असल में हमें अपने विकास की अवधारणा को ही बदलना होगा- पक्की सड़क, अंग्रेजी दवाई स्थानीय भाषा को छो़ड कर अं्रग्रेजी का प्रयोग, भोजन व कपड़े का पाश्‍चात्यीकरण असल में विकास नहीं है। यदि कोई चमड़े का काम करने वाला है, वह अपने काम को वैज्ञानिक तरीके से करना सीखता है, आपे श्रम की वास्तविक कीमत वसूलने के प्रति जागरूक होता है, अपने समान सामाजिक अधिकार के प्रति सचेत हो जाता है तो जरूरी नहीें है कि वह गावं में अपने हाथ के काम को छेाड़ कर षहर मे ंचपरासी या दैनिक मजदूर की नौकरी कर संकरी गलियों की गंदी झुगियों में रहे।  इंसान की क्षमता, जरूरत और योग्यता के अनुरूप उसे अपने मूल स्थान पर अपने सामाजिक सरोकारों के साथ जीवनयापन का  हक मिले, यदि विकास के प्रतिमान ऐसे होंगे तो षहर की ओर लोगों का पलायन रूकेगा। इससे हमारी धरती को कुछ राहत मिलेगी।
किसान या तो शहरों में मजदूरी करने लगता है या फिर मिट्टी की तात्कालिक अच्छी कीमत हाथ आने पर कुछ दिन तक ऐश करता है। फिर आने वाली पीढियों के लिए दुर्भाग्य के दिन शुरु हो जाते हैं।
कोई दो दशक पहले दिल्ली नगर निगम द्वारा कराए गए एक सर्वेक्षण की रिपोर्ट महान चिंतक कार्ल मार्क्‍स की उस चर्चित उक्ति की पुष्टि करती है, जिसमें उन्होने कहा था कि अपराथ, वेश्यावृति तथा अनैतिकता का मूल कारण भूख व गरीबी होता है। निगम के स्लम तथा जे जे विभाग की रिपोर्ट में कहा गया है कि राजधानी में अपराधों में ताबडतोड बढ़ौतरी के सात मुख्य कारण हैं - अवांछित पर्यावरण, उपेक्षा तथा गरीबी, खुले आवास, बडा परिवार, अनुशासनहीनता व नई पीढी का बुजुर्गों के साथ अंतर्विरोध और नैतिक मूल्यों में गिरावट। वास्तव में यह रिपोर्ट केवल दिल्ली ही नहीं अन्य महानगरों और शहरों में भी बढ़ते अपराधों के कारणों का खुलासा करती है। ये सभी कारक शहरीकरण की त्रासदी की सौगात हैं।
गांवों में ही उच्च या तकनीकी शिक्षा के संस्थान खोलना, स्थानीय उत्पादों के मद्देनजर ग्रामीण अंचलों में छोटे उद्योगों को बढ़ावा देना, खेती के पारंपरिक बीज खाद और  दवाओं को प्रोत्साहित करना, ये कुछ ऐसे उपाय हैं जिनके चलते गांवों से युवाओं के पलायन को रोका जा सकता है । इस राष्ट्रीय समस्या के निदान में पंचायत समितियां अहमं भूमिका निभा सकती हैं । पंचायत संस्थाओं में आरक्षित वर्गो की सक्रिय भागीदारी कुछ हद तक सामंती शोषण पर अंकुश लगा सकती , जबकि पानी ,स्वास्थ्य, सड़क, बिजली सरीखी मूलभूत जरूरतेंा की पूर्ति का जिम्मा स्थानीय प्रशासन को संभालना होगा ।
विकास के नाम पर मानवीय संवेदनाओं में अवांछित दखल से उपजती आर्थिक विषमता, विकास और औद्योगिकीकरण की अनियोजित अवधारणाएं और पारंपरिक जीवकोपार्जन के तौर-तरीकेां में बाहरी दखल- शहरों की ओर पलायन को प्रोत्साहित करने वाले तीन प्रमुख कारण हैं । इसके लिए सरकार और समाज दोनो को साझा तौर पर आज और अभी चेतना होगा ।, अन्यथा कुछ ही वर्षों में ये हालात देश की सबसे बड़ी समस्या का कारक बनेंगें - जब प्रगति की कहानी कहने वाले महानगर बेगार,लाचार और कुंठित लोगों से ठसा-ठस भरे होंगे, जबकि देश का गौरव कहे जाने वाले गांव मानव संसाधन विहीन पंगु होंगे ।




पंकज चतुर्वेदी
यूजी-1, 3/186 ए राजेन्द्र नगर
सेक्टर-2
साहिबाबाद
गाजियाबाद 201005
9891928376, 0120-4241060



How petrol expenditure can be reduced ?

JANSANDESH TIMES U.P.http://www.jansandeshtimes.in/index.php?spgmGal=Uttar_Pradesh/Varanasi/Varanasi/29-06-2014&spgmPic=9

THE SEA EXPRESS AGRA http://theseaexpress.com/epapermain.aspx
कम किया जा सकता है पेट्रो-घाटा
पंकज चतुर्वेदी
अभी इराक पर युद्ध के बादल मंडरा रहे हेै और अंतरराष्‍ट्ीय बाजार में तेल के दाम बढ़ने व उसका असर भारत पर होने पर खूब तफ्सरा हो रहे हैं। भले ही आज सरकार ने डीजल-पेट्रोल के दाम बढ़ाने से इंकार कर दिया हो, लेकिन बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाएगी ? बीते आठ साल में 40 बार एक सरीखे विलाप टीवी और अखबारों में दिखे - सरकार कहती रही कि अंतरराष्‍ट्रीय बाजार में तेल के दाम बढे या फिर डालर के मुकाबले रूपया कमजोर हो गया, सा दाम बढ़ाने पड़े, विपक्ष सरकार की नीतियों को कोसता है, परंपरावादी पब्लिक ट्रांसपोर्ट को प्रोत्साहित करने जैसे सुझाव देते हैं। ऐसा नहीं कि यह सब रूक जाएगा, हालात बताते हैं कि आने वाले दो-तीन महीने में पेट्रोल व डीजल दोनो के दाम बढने पर कोई रोक नहीं लगा सकेगा। नतीजा हर बार शून्य रहता है- प्रमुख विपक्षी दल इसे अपने सत्ता के करीब पहुंचने का एक कदम मानते हैं और सत्ताधारी चुनाव से ऐन पहले कुछ लोकलुभावनी घोषणाओं पर विचार करते हैं पेट्रो पदार्थों के मामले में सरकार खुद को लाचार दिखाती है जबकि हकीकत तो यह है कि हम लोग ईंधन के मामले में लापरवाह और बगैर किसी दूरगाामी योजना के चल रहे हैं। भारत ही नहीं सारी दुनिया पर एक बार फिर मंदी का असर दिख रहा है। गरीब और मध्यम वर्ग के लिए घर खर्च चलाना  मुश्‍किल पड़ रहा है। ऐसे में भारत यदि समझदारी से अपने विदेशी मुद्रा के भंडार का उपयोग करता है तो इस वित्तीय सुनामी सें निबटा जा सकता है, वरना हम संकट में आ सकते है। कैसी विडंबना है कि मंदी के बाजार में भी आटोमोबाईल का बाजार चमका हुआ है। जाहिर है कि इसका सीधा असर ईंधन की मांग पर पड़ रहा है। हमारी विदेशी मुद्रा का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल को खरीदने में खर्च हो रहा है। यहां यह भी जानना जरूरी है कि बीते साल भारत सरकार ने पेट्रोल-डीजल व अन्य ईंधन पर 1,03,000करोड़ की सबसिडी दी है।
यह बात सभी स्वीकार कर रहे हैं कि हमें ईंधन की खपत घटाने के तरीके अपनाना चाहिए। केंद्र सरकार समय-समय पर खर्चों में कटौती की अपील भी करती है, लेकिन यह तरीका किसी भी तरह तेल की बढ़ती मांग को थामने में कारगर नहीं है। उ.प्र और बिहार जैसे राज्यों में कुछ मंत्रियों की कार हर महीने ढाई-तीन लाख का तेल पी जाती है। हालांकि कुछ छोटे-छोटे उपाय है जिनका पालन ईमानदारी से करने पर भारत जैसे देश में हर रोज पेट्रोल-डीजल की दो से पांच प्रतिशत बचत की जा सकती है। लेकिन समस्या है कि शुरूआत कौन करे ? निजी कारों के बनिस्पत सार्वजनिक वाहनों को प्रोत्साहन देने की बात एक नारे के रूप में तो कर रही है, लेकिन उसकी शुरूआत अपने घर से ही करने से हिचकिचाती है। दिल्ली में ही आला अफसरों के सरकारी मकान गिनी-चुनी कालेानियों में ही हैं। इसके बावजूद दो हजार से अधिक अफसर अपनी अलग-अलग गाडि़यों में दफ्तर जाते हैं। कभी उनके लिए एक एयरकंडीशंड बस चलाने की बात क्यों नहीं की जाती है। इसी तरह संसद सदस्यों को भी सार्वजनिक वाहन में आ कर लोगों के सामने अनुकरणीय मिसाल पेश करना चाहिए। नए बन रहे सरकारी कार्यालयीन भवनों के करीब ही स्टाफ के रहने की व्यवस्था को अनिवार्य करने से वाहनों का संचालन रोका जा सकता है।
वैसे सरकार पेट्रो-पदार्थों पर जिस तरह का घाटा दिखाती है, वह असल में होता नहीं है। आईल इंडिया या ओ एन जी सी की बीते एक दषक की बैलेंस-शीट उठा कर देख लें, हर बार कई हजार करोड़ का मुनाफा दर्ज है। यदि इन कंपनियों का गैर-योजना मद देखें तो आंखें चकाचैंध हो जाएंगी, । यहां आवभगत, सजावट जैेसे मद में किए गए खर्चें राष्‍ट्रपति भवन से भी ज्यादा होते हैं। गौरतलब है कि ये कंपनियां अपने खर्चें घटाने के लिए कुछ नहीं करती हैं। यदि केवल विज्ञापन मद में ही व्यय आधा कर दिया जाए तो जनता को बगैर दाम बढ़ाए आसानी से ईंधन मुहैया करवाया जा सकता है। फिर आज जो हम कच्चा तेल खरीद रहे हैं वह आज के दाम पर नहीं है, असल में इस का भुगतान कई साल पहले किया जा चुका होता है और इसे मौजूदा घाटा दिखाना आंखों का धोखा है।  यही नहीं चार पेट्रो कंपनियों क ेलेखा रिकार्ड अपने मुनाफे व व्यय को अलग-अलग दिखाते हैं। जब दाम एक हैं, खरीदी की दर समान है, बिक्री का तरीका एक सरीखा है , ऐसे में प्रति बैरल एक कंपनी सात डालर कमाती है तो दूसरी दो डालर का घाटा सहती दिखती है - जाहिर है कि इन कंपनियों की विपणन नीति में कहीं आंकडों की बाजगरी चल रही है और इसका खामियाजा आम लोग भोगते हैं। एक बात और जान लें, जिस कच्चे तेल को मंगवा कर हम उसका परिशोधन करते हैं , उससे केरोसीन, डीजल, पेट्रोल, और गैसे के अलावा नेप्था, ग्लीसरीन, प्लास्टिक दाना, कोलतार जैसे उत्पाद निकलते हैं जो अलग-अलग दाम पर बाजार में बिकते हैं, जबकि सरकार बढ़े कच्च्ेा तेल के दाम के साथ कुछ उत्पादों का ही ढिंढोरा पीटती है।  हमारे देश में ईंधन को रिफायनरी से ढो कर डिपो और वहां से पंप तक ले जाने के लिए कई लाख लीटर डीजल हर महीने खर्च होता है। यदि बन रहे हाई वे के साथ-साथ ईंधन की सप्लाई के लिए पाईप लाईन डाल दी जाएं तो इस किस्म की फिजूलखर्ची से बचा जा सकता है।
बिजली उत्पादन के लिए डीजल के जनरेटरों का इस्तेमाल देष के तेल घाटे को कोई एक प्रतिशत की चोट देता है। बिजली उत्पादन के वैकल्पिक स्त्रोतों- सौर, पवन या फिर खपत को घटाना जैसे तरीकों पर विचार किया जाना चाहिए। एक अनुमान है कि अकेले गाजियाबाद और नोएडा जिले में हर साल छोटे-बड़े जनरेटरों पर जितना खर्च होता है उससे एक अच्छा-खासा बिजली घर लगाया जा सकता है।
पेट्रोल बचाने के एक ओर महत्वपूर्ण तरीके की चाबी भी सरकार के हाथों में ही है - सुचारू परिवहन व्यवस्था। इसके लिए सड़कों का अच्छा होना और कम से कम रेड लाईटें होना जरूरी है।  यदि कुछ राश्ट्रीय राजमार्गों को छोड़ दें तो पूरे देष में घटिया ंसड़कें वाहनों की सबसे बड़ी दुष्मन हैं। दिल्ली जैसे महानगर में एक बारिश में सड़कों का गड्ढे में बदल जाना, फ्लाईओवर, बीआरटी या मेट्रो के निर्माण, सीवर, पानी की लाईनें डालने जैसे कार्यों के लिए सड़क को खोद देने से हर रोज हजारों लीटर ईंधन बेकार होता है। क्यों ना कम ट्राफिक के समय यानी रात में ऐसे स्थानों पर निर्माण कार्य करवाया जाए ? एक तो काम अबाध होगा, साथ ही यातायात भी प्रभावित नहीं होगा। परिणामतः ईंधन की बचत हेागी ही। इसके अलावा एक ही सड़क पर यांत्रिक व मानव या पषुचालित वाहनों के चलने से भी इंधन का खर्चा बढ़ता है। कुछ सड़कों को केवल साईकल या रिक्षा के लिए आरक्षित करने तथा मुख्य सड़कों पर ऐसे वाहनों की पाबंदी को कड़ाई से लागू करने से वाहन से बरबाद हो रहे ईंधन को बहुत-कुछ बचाया जा सकता है। बगैर वैकल्पिक रास्ता बनाए निर्माण कार्य ना करने, सड़क समय से पहले खराब होने पर संबंधित ठेकेदार व अफसर की जिम्मेदारी तय करने, बिटुमिन के स्थान पर सड़क बनाने में सीमेंट का इस्तेमाल बढ़ाने जैसे प्रयोग से वाहनों को सहज गति तो मिलेगी ही; ईंधन का संरक्षण भी होगा।
वाहनों की बढ़ती संख्या के लिए सरकार की वाहन और बैंक नीति भी काफी कुछ जिम्मेदार है। आटोमोबाईल उद्योग को भारत में अत्यधिक संभावनाएं दिखती है, सो उसने बैंकों को अपने साथ मिला लिया है। बगैर वैध ड्राईविंग लाईसेंस के किसी को भी वाहन का लोन मिल रहा है। नतीजा यह है कि जो लोग सरकार पर दवाब बढ़ा कर बसें या ऐसे ही सार्वजनिक परिवहन की मांग रखते थे, अब वे अपने वाहनों में जा रहे हैं। हो सकता है कि नए वाहनों की बिक्री पर बुरा असर पड़े, हो सकता है कि इससे सरकार की वित्तीय व्यवस्था भी गड़बड़ाए; लेकिन यदि वाहनों के लिए कर्ज बांटने में सख्ती की जाए तो प्रदूषण और ईंधन, दोनों की बचत हो सकती है।  घटिया स्पेयर पार्ट , नकली इंजन आईल और मिलावर्टी इंधन के कारण भी ईंधन की खपत बढ़ती है। इन पर रोक भी सरकार को ही लगानी होगी। व्यावसायिक और निजी इस्तेमाल के ईंधनों को अलग करना भी समय की मांग है। इससे सबसिडी के फार्मूले को न्यायोचित बनाने में मदद मिलेगी। उपाय तो और भी सुझाए जा सकते हैं। निजी तौर पर प्रयास भी किए जा सकते हैं, लेकिन जब तक सरकार में बैठै लोगों की इच्छा-षक्ति नहीं होगी, ये सभी बातें किसी मठाधीष के प्रवचन से अधिक नहीं होंगी। हां षुरूआत तो तेल कंपनियो को खुद भी करनी होगी, अपने षाही खर्चों में कटौती कर के।
आज भी अंतरराष्‍ट्रीय उठापटक से निबटना बहुत सरल है- महज कुछ उपाय करने होंगे- पेट्रोलियम खनिज के अन्य उत्पादों जैसे प्लास्टिक, वैक्स आदि के रेट बढ़ाए जा सकते हैं। पेट्रोलियम ईंधन में ग्रीन-डीजल यानी जटरोफा तेल और एथेनाल की मात्रा बढ़ाना, तेल से चलने वाले जेनरेटर की जगह सोलर जेनरेटरों का प्रचलन बढ़ाना, आॅटो कंपनियों के निर्माण, विपणन और उससे जुड़े वित्तीय प्रबंधन पर लगाम कसना; आदि सामान्य उपाय हैं। इसके अलावा सरकार को अपनी कर-नीति पर तो विचार करना ही होगा, जिसके कारण पेट्रोलियम पदार्थ लगभग दो गुणा महंगे होते हैं।

पंकज चतुर्वेदी  यूजी-1 ए 3/186 राजेन्द्र नगर सेक्टर-2, साहिबाबाद गाजियाबाद 201005 ,9891928376


9891928376, 0120-4241060


शनिवार, 21 जून 2014

देर से मिला न्याय बेमानी है
पंकज चतुर्वेदी
THE SEA EXPRESS AGRA 22-6-14 http://theseaexpress.com/Details.aspx?id=64494&boxid=1744751

 देश की सर्वोच्च अदालत में मुकदमों की संख्या कोई 55 हजार है, विभिन्न हाई कोर्ट में पैंतालिस लाख मुकदमें न्याय की बाट जोह रहे हैं। निचली अदालतों में लंबित मुकदमों की संख्या दो करोड़ पैंतालिस लाख को पार कर गई है।  यदि इसी गति से मुकदमों का निबटान होता रहा तो 320 साल चाहिए।इस बीच अदालतों में भ्रष्‍टाचार का मामला भी खूब उछल रहा है। ऐसे में अदालतों के सामाजिक सरोकार पर विचार होना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश माननीय आर.एस लोढा ने विचार जताया है कि मुकदमों के बढ़ते बोझ से निबटने के लिए अदालतों को 365 दिन काम करना चाहिए। इससे पहले अदालतों को दो सत्रों में लगाने की बात भी हो चुकी है। महान्यायवादी मुकुल रोहतगी का यह कहना गलत नहीं है कि 365 दिन काम करने से भी मुकदमों पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला । असल में मुकदमों की सुनवाई की प्रक्रिया, एक फैसला आने पर अपील का विकल्प और कानूनी प्रक्रिया का दिनों-दिन जटिल, महंगा व आम आदमी की पहुंच से बाहर आना, ना केवल आम लोगों के दिल में न्याय-मंदिर के प्रति आस्था कम कर रहा है, साथ ही निराशा में और अपराध करने या खुद ही न्याय कर देने की प्रवृति को भी बढ़ावा दे रहा है।
देश की सड़कों पर आए रोज दिखने वाला आम आदमी का गुस्सा भले ही उस समय महज पुलिस या व्यवस्था का विरोध नजर आता हो, हकीकत में यह हमारी न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है - लोग अब महसूस कर रहे हैं कि देर से मिला न्याय अन्याय के बराबर ही है। यह बात भी लोग अब महसूस कर रहे हैं कि हमारी न्याय व्यवस्था में जहां अपराधी को बचने के बहुत से रास्ते खुले रहते हैं , वहीं पीडि़त की पीड़ा का अनंत सफर रहता है। हाल ही में देष की सुप्रीम कोर्ट ने हमारी आपराधिक न्याय प्रणाली पर ही सवाल खड़े करते हुए कहा है कि  निचली अदालतों के दोषी को दी जाने वाली सजा के निर्धारण के लिए कोई विधायी या न्यायिक दिशा-निर्देश ना होना हमारी न्याय प्रणाली की सबसे कमजोर कड़ी है। कई मामले पहले दस साल या उससे अधिक निचली अदालत में चलते हैं फिर उनकी अपील होती रहती है। कुछ मिला कर एक उम्र बीत जाती है, न्याय की आस में वहीं लंपट और पेशेवर अपराधी न्याय व्यवस्था की इस कमजोरी का फायदा उठा कर कानून से बैखोफ बने रहते हैं।
मुंबई धमाकों का मामला सामने हैं - पूरे 20 साल लग गए सुप्रीम कोर्ट तक फैसला आने में  । इसी तरह एक मामला था सन 2000 में केरल मे ंनकली शराब पीने से 31 लोगों से हुई मौत का। पुलिस ने गैरइरादतन हत्या का मामला दर्ज किया और निचली अदालत ने इसके तहत दो साल की सजा सुना दी। मामला उच्च न्यायालय में गया और अदालत ने सजा बढ़ा कर पांच साल कर दी। आरोपी सुप्रीम कोर्ट आ गया, वहां न्यायमूर्ति आफताब आलम और रंजना प्रकाष देसाई की खंडपीठ ने उच्च न्यायालय की सजा को बरकरार रखते हुए कहा कि दंड तो मानव जीवन की पवित्रता को स्वीकार करने वाला होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट को दुख था कि 31 लोगों की मौत का कारण बने व्यक्ति को इतनी कम सजा हो रही है। यह बानगी है कि किस तरह निचली अदालतें मनमाने तरीके से अपराधियों की सजओं का निर्धारण करती हैं यह बात अब किसी से दबी-छुपी नहीं है कि जिला स्तर पर अदालतों में जम कर लेन-देन हो रहा हे। कई बार तो चर्चित अपराधों में सजा के फैसले इस तरह लिखने के मोल-भाव हो जाते हैं कि जब उसकी अपील ऊंची अदालत में जाए तो आरोपी को बरी होने में मदद मिल जाए। एक अन्य मामले का जिक्र करना जरूरी है जिसमें जयपुर यूनिवस्रिटी के जेसी बोस हाॅस्टल में कोई पंद्रह साल पहले एक राह चलती लड़की को अगवा कर ले जाया गया था और डेढ़ दर्जन लोगों ने उसके साथ बलात्कार किया था। 05 सितंबर 1997 कांे अपराध हुआ और मामले की जिला अदालत में सुनवाई पूरी हुई 25 अक्तूबर 2012 को । पंद्रह साल बाद नौ लोग इस मामले में बरी कर दिए गए , जबकि आठ को 10 साल की सजा सुनाई गई। जरा सोचिए कि न्याय पाने के लिए उस 21 साल की लड़की को अपने प्रौढ होने का इंतजार करना पड़ा। हो सकता है इस बीच उसकी नौकरी लग गई हो, उसका परिवार हो बच्चे हो। वहीं आधे आरोपी छूट गए और सजा पाए आरोपियो के पास भी अभी उच्च न्यायालय जाने का विकल्प खुला है। क्या कोई आम आदमी इतनी लंबी काूनी लड़ाई के लिए आर्थिक, मानसिक, सामाजिक और व्यावहारिक तौर पर सक्षम होता है ?
देशभर में हो रहे मौजूदा प्रदर्षनों में फास्ट-ट्रैक अदालतों या जल्दी फैसले का जिक्र हो रहा है। अभी पिछले साल ही मध्यप्रदेश के धार जिले में हत्या के एक मामले में एक महीने के भीतर आरोपियों को सजा सुना दी गई। राजस्थान में भी 21 दिन में फैसले हुए हैं। जाहिर है कि अदालतों में जल्दी फैसले आ सकते हैं। साफ नजर आता है कि आखिर मामलों को लंबा खींचने में किसके स्वार्थ निहित होते हैं। आजादी के बाद चुने हुए प्रतिनिधियों, नौकरशाही ने किस तरह आम लोगों को निराश किया,इसकी चर्चा अब मन दुखाने के अलावा कुछ नहीं करती है । यह समाज ने मान लिया है कि ढर्रा उस हद तक बिगड़ गया है कि उसे सुधरना नामुमकिन है । भले  ही हमारी न्याय व्यवस्था में लाख खामियां हैं, अदालतों में इंसाफ की आस कभी-कभी जीवन की संास से भी दूर हो जाती है । इसके बावजूद देश को विधि सममत तरीके से चलाने के लिए लोग अदालतों को उम्मीद की आखिरी किरण तो मानते ही हैं । बीते कुछ सालों से देष में जिस तरह अदालत के निर्देशों पर सियासती दलों का रूख देखने को मिला हैै, वह न केवल शर्मनाक है, बल्कि इससे संभावना जन्म लेती है कि कहीं पूरे देश का गणतंत्रात्मक ढ़ांचा ही पंगु न हो जाए ।
यह विडंबना है कि देष का बहुत बड़ा तबका थोडे़ से भी न्याय की उम्मीद न्यायपालिका से कर ही नहीं पाता है। गरीब लोग तो न्यायालय तक पहुंच ही नहीं पाते। इसकी औपचारिकताओं और जटिल प्रक्रियाओं के कारण केवल वकीलों द्वारा ही न्यायालय में बात कही जा सकती है, लेकिन गरीब लोग वकीलों की बड़ी-बड़ी फीसें नहीं दे सकते, वे न्याय से वंचित रह जाते हैं। जो कुछ लोग न्यायालय तक पहुंच पाते हैं उन्हें यह उम्मीद नहीं होती कि एक निष्चित समयावधि में उनके विवाद का निपटारा हो पाएगा। मुकदमे के निर्णय में जितने समय की सजा दी जाती है उससे ज्यादा समय तो मुकदमों की सुनवाई में ही लग जाता है। अगर इस दौरान मुवक्किल जेल से बाहर हुआ तो इस सारे मुकद्मे के दौरान अपने को बचाने की कवायद की परेषानी और सजा से ज्यादा खर्चे और जुर्माना ही कष्टदायी हो जाता है। पुलिस और प्रभावशाली लोग न्यायिक प्रक्रिया को और भी ज्यादा दूरूह बना रहे हैं क्योंकि प्रभावशाली लोग पुलिस को अपने इशारों पर     नचाते हैं और उन लोगों को डराने धमकाने और चुप कराने के लिए पुलिस का इस्तेमाल करते हैं जो अत्याचारी और शोषणपूर्ण व्यवस्था को बदलने का प्रयास कर रहे हैं। एक तरफ न्याय प्रक्रिया जटिल है तो दूसरी ओर वकील या अदालतों पर कोई जिम्मेदारी या समयबद्धता का दवाब नहीं है। देषभर की अदालतों में वकील साल में कई दिन तो हडताल पर ही रहते हैं, यह जाने बगैर कि एक पेशी चूकने से उनके मुवक्किल की न्याय से दूरी कई साल की बढ़ जाती है। यह भी कहना गलत ना होगा कि बहुत से मामलों में वकील खुद ज्यादा पेशी की ज्यादा फीस के लालच में केस को खींचते रहते हैं।
देश की बड़ी और घनी आबादी, भाषाई, सामाजिक और अन्य विविधताओं को देखते हुए मौजूदा कानून और दंड देने की प्रक्रिया पूरी तरह असफल रही है। ऐसे में कुछ सिनेमा याद आते हैं- 70 के दशक में एक फिल्म में हत्या के लिए दोशी पाए गए राजेश खन्ना को फरियादी के घर पर देखभाल करने के लिए रखने पर उसका ह्दय परिवर्तन हो जाता है। अभिशेक बच्चन की एक फिल्म में बड़े बाप के बिगड़ैल युवा को एक वृद्धाश्रम में रह कर बूढ़ों की सेवा करना पड़ती है।  वैसे पिछले साल दिल्ली में एक लापरवाह ड्रायवर को सड़क पर खड़े हो कर 15 दिनों तक ट्राफिक का संचालन करने की सजा वाला मामला भी इसी श्रंखला में देखा जा सकता है, लेकिन दुर्भाग्य कि ऐसी व्यावहारिक सजा को बाद में बड़ी अदालत ने कानूनसम्मत ना मानते हुए रोक लगा दी थी। मोटर साईकलों पर उपद्रव काटने वाले सिख युवकों को कुछ दिनों के लिए गुरूद्वारे में झाड़ू-पोंछा करने का सजा की भी समाज में बेहद तारीफ हुई थी।
क्या यह वक्त नही आ गया है कि लिखे कानून के बनिस्पत सुधार के लिए जरूरी कदमों या अपराध-निवारण को अपनाया जाए ?आज की न्यायीक व्यवस्था बेहद महंगी, डरावनी, लंबी खिंचने वाली है। गरीब लोग तो अदालतों की प्रक्रिया में सहभागी ही नहीं हो पाते हैं। उनके लिए न्याय की आस बेमानी है। साक्ष्य अधिनियम को सरल बनाना, सात साल से कम सजा वाले मामालों में सयब़ नीति बनाना, अदालतों में बगैर वकील की प्रक्रिया को प्रेरित करना, हडताल जैसी हालत में तारीख आगे बढाने की जगह वकील को दंडित करना जैसे कदम अदालतों के प्रति आम आदमी के विष्वास को बहाल करने में मददगार हो सकते हैं। ऊंची फीस लेने वाले वकीलों का एक वर्ग ऐसी सिफारिषों को अव्यावहारिक और गैरपारदर्षी या असंवदेनषील करार दे सकता है, लेकिन देषभर में सउ़कों पर उतरे लोगों की भावना ऐसी ही है और लोकतंत्र में जनभावना ही सर्वोपरि होती है।
पंकज चतुर्वेदी
यू जी-1, 3/186 राजेन्द्र नगर, सेक्टर-2
साहिबाबाद, गाजियाबाद
201005
गाजियाबाद 201005



गुरुवार, 19 जून 2014

NAYAA GYANODAAYA JUNE -14

भारतीय ज्ञान पीठ द्वारा प्रकाशित पत्रिका "नया ज्ञानोदय" का जून अंक पर्यावरण पर केंद्रित हें.इसमें मेरा एक लेख तालाबों पर हें, कहीं पत्रिका मिले तो पढ़ें, वैसे तीनो पन्नों की जे पी  जी फाईल संलग्न हें



RATNESHWAR MAHADEV TEMPLE OF KARACHI





























यह है कराची का रत्‍नेश्‍वर महादेव का मंदिर, यहां के सबसे महंगे इलाके क्लिफटन में है, कहते हैं दाउद भी यहीं रहता है, बहरहाल, रत्‍नेश्‍वर महादेव बहेद पुराना व विशाल मंदिर है, यह समुद्र में कुछ गहराई में उतरने पर बना है, यहां सभी देवी देवता हैं, सन 2007 में जब वहरां गया था तो कुछ नई मूर्तियां भी लग रही थींा यहां पुजारी भील हैं व हर रविवार को यहां लंगर भी होता है, कुछ महीनों पहले यहां अंडर पास बनाते समय नुकसान की संभावना बन गई थी, लेकिन सरकार ने इस पर कोई आंच नहीं आने दीा यह सभी फोटो मेरे द्वारा ही बनाए गए हें

रविवार, 15 जून 2014


अब तो लौट आएं हमारे लापता फौजी!

                    ... पंकज चतुर्वेदी
DAILY NEWS, JAIPUR 16-6-2014 http://dailynewsnetwork.epapr.in/c/2998608?show=print


अब तो केंद्र की नई सरकार के पाकिस्तान से पारिवारिक रिश्‍ते बन गए हैं- इस तरफ से शॉल व उस तरफ से साड़ी का दौर पूरा हो गया है। सीमा पर मोर्टार हमलों के बावजूद हमारे प्रधानमंत्री ने नवाज षरीफ को षुक्रिया का खत भी भेजा है। यह भी तय हो गया है कि अब ना तो शहीद हेमराज का कटा सिर वापिस आएगा और ना ही उसके बदले में दस षीष। लेकिन उम्मीद की जा सकती है कि अब दोनों मुल्क की सरकारें अपने आपसी ताल्लुक सुधारेंगी व उन फौजियों की भी चिंता करेंगी जो बीते 43 सालों से पाकिस्तानी जेलों में हिंदुस्तान की रक्षा करने की कीमत चुका रहे हैं। लगभग हर साल संसद में विदेष मंत्री बयान भी देते हैं कि पाकिस्तानी जेलों में आज भी सन 1971 के 54 युद्धबंदी सैनिक हैं, लेकिन कभी लोकसभा में प्रस्ताव या संकल्प पारित नहीं हुआ कि हमारे जाबांजों की सुरक्षित वापिसी के लिए सरकार कुछ करेगी।
देश की नई पीढ़ी को तो शायद यह भी याद नहीं होगा कि 1971 में पाकिस्तान युद्ध में देश का इतिहास व विश्‍व का भूगोल बदलने वाले कई रणबांकुरे अभी भी पाकिस्तान की जेलों में नारकीय जीवन बिता रहे हैं । उन जवानों के परिवारजन अपने लेागों के जिंदा होने के सबूत देते हैं, लेकिन भारत सरकार महज औपचारिकता निभाने से अधिक कुछ नहीं करती है । इस बीच ऐसे फौजियों की जिंदगी पर बालीवुड में कई फिल्में बन गई हैं और उन्हें दर्शकों ने सराहा भी । लेकिन वे नाम अभी भी गुमनामी के अंधेरे में हैं जिन्हें ना तो षहीद माना जा सकता है और ना ही गुमशुदा ।
उम्मीद के हर कतरे की आस में तिल-दर-तिल घुलते इन जवानों के परिवारजन अब लिखा-पढ़ी करके थक गए हैं । दिल मानता नहीं हैं कि उनके अपने भारत की रक्षा वेदी पर शहीद हो गए हैं । 1971 के युद्ध के दौरान जिन 54 फौजियों के पाकिस्तानी गुनाहखानों में होने के दावे हमारे देशवासी करते रहे हैं ,उनमें से 40 का पुख्ता विवरण उपलब्ध हैं । इनमें 6-मेजर, 1-कमाडंर, 2-फ्लाईंग आफिसर, 5-कैप्टन, 15-फ्लाईट लेफ्टिनेंट, 1-सेकंड फ्ला.लेफ्टि, 3-स्कावर्डन लीडर, 1-नेवी पालयट कमांडर, 3-लांसनायक, और 3-सिपाही हैं ।
एक लापता फौजी मेजर अशोक कुमार सूरी के पिता डा. आरएलएस सूरी के पास तो कई पक्के प्रमाण हैं, जो उनके बेटे के पाकिस्तानी जेल में होने की कहानी कहते हैं । डा. सूरी को 1974 व 1975 में  उनके बेटे के दो पत्र मिले, जिसमें उसने 20 अन्य भारतीय फौजी अफसरों के साथ, पाकिस्तान जेल में होने की बात लिखी थी । पत्रों का बाकायदा ‘‘हस्तलिपि परीक्षण’’ करवाया गया और यह सिद्ध भी हुआ कि यह लेखनी मेजर सूरी की ही है।1979 में डा. सूरी को किसी अंजान ने फोन करके बताया कि उनके पुत्र को पाकिस्तान में उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रदेश की किसी भूमिगत जेल में भेज दिया गया है । मेजर सूरी सिर्फ 25 साल की उम्र में ही गुम होने का किस्सा बन गए ।
पाकिस्तान जेल में कई महीनों तक रहने के बाद लौटे एक भारतीय जासूस मोहन लाल भास्कर ने, लापता विंग कमाडंर एचएस गिल को एक पाक जेल में देखने का दावा किया था । लापता फ्लाईट लैफ्टिनेंट वीवी तांबे को पाकिस्तानी फौज द्वारा जिंदा पकड़ने की खबर, ‘संडे पाकिस्तान आब़जर्वर’ के पांच दिसंबर 1971 के अंक में छपी थी । वीर तंाबे का विवाह बेडमिंटन की राष्ट्ीय चेंपियन रहीं दमयंती से हुआ था । शादी के मात्र डेढ़ साल बाद ही लड़ाई छिड़ गई थी । सेकंड लेफ्टिनेंट सुधीर मोहन सब्बरवाल जब लड़ाई के लिए घर से निकले थे, तब मात्र 23 साल उम्र के थे । केप्टर रवीन्द्र कौरा को अदभ्य शौर्य प्रदर्शन के लिए सरकार ने ‘वीर चक्र’ से सम्मानित किया था, लेकिन वे अब किस हाल में और कहां हैं, इसका जवाब देने में सरकार असफल रही है । ।
पाकिस्तान के मरहूम प्रधानमंत्री जुल्फकार अली भुट्टो को फांसी दिए जाने के तथ्यों पर छपी एक किताब भारतीय युद्धवीरों के पाक जेल में होने का पुख्ता सबूत मानी जा सकती है । बीबीसी संवाददाता विक्टोरिया शोफील्ड की किताब ‘भुट्टो: ट्रायल एंड एक्सीक्यूशन’ के पेज 59 पर भुट्टो को फांसी पर लटकाने से पहले कोट लखपतराय जेल लाहौर में रखे जाने का जिक्र है । किताब में लिखा है कि भुट्टो को पास की बैरक से हृदयविदारक चीख पुकार सुनने को मिलती थीं । भुट्टो के एक वकील ने पता किया था कि वहां 1971 के भारतीय युद्ध बंदी है । जो लगातार उत्पीड़न के कारण मानसिक  विक्षिप्त हो गए थे ।
कई बार लगता है कि इन युद्धवीरों की वापिसी के मसले को सरकार भूल ही गई हैं । यहां पता चलता है कि युद्ध बाबत संयुक्त राष्ट् संघ के निर्धारित कायदे कानून महज कागजी दस्तावेज हैं । इनका क्रियान्वयन से कोई वास्ता नहीं है । संयुक्त राष्ट् के विएना समझौते में साफ जिक्र है कि युद्ध के पश्चात, रेड़क्रास की देखरेख में तत्काल सैनिक अपने-अपने देश भेज दिए जाएंगे । दोनों देश आपसी सहमति से किसी तीसरे देश को इस निगरानी के लिए नियुक्त कर सकते हैं । इस समझौते में सैनिक बंदियों पर क्रूरता बरतने पर कड़ी पाबंदी है । लेकिन भारत-पाक के मसले में यह कायदा-कानून कहीं दूर-दूर तक नहीं दिखा । 1972 में अतंर्राष्ट्ीय रेडक्रास ने भारतीय युद्ध बंदियों की तीन लिस्ट जारी करने की बात कही थी । लेकिन सिर्फ दो सूची ही जारी की र्गइं । एक गुमशुदा फ्लाईग आफ्सिर सुधीर त्यागी के पिता आरएस त्यागी का दावा है कि उन्हें खबर मिली थी कि तीसरी सूची में उनके बेटे का नाम था । लेकिन वो सूची अचानक नदारत हो गई ।
भारत सरकार के वरिष्ठ अधिकारी मानते हैं कि हमारी फौज के कई जवान पाक जेलों में नारकीय जीवन भोग रहे हैं । उन्हें शारीरिक यातनाएं दी जा रही हैं । करनाल के करीम बख्श और पंजाब के जागीर सिंह का पाक जेलों में लंबी बीमारी व पागलपन के कारण निधन हो गया । 1971 की लड़ाई में पाकिस्तान द्वारा युद्ध बंदी बनाया गया सिपाही धर्मवीर 1981 में जब वापिस आया तो पता लगा कि यातनाओं के कारण उसका मानसिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया है । सरकार का दावा है कि कुछ युद्ध बंदी कोट लखपतराय लाहौर, फैसलाबाद, मुलतान, मियांवाली और बहावलपुर जेल में है । पर दावों पर राजनीति के दांव पंेच हावी हैं ।
भारत की सरकार लापता फौजियों के परिवारजनों को सिर्फ आस दिए हैं कि उनके बेटे-भाई जीवित हैं । लेकिन कहां है किस हाल में हैं ? कब व कैसे वापिस आएंगे ? इसकी चिंता ना तो हमारे राजनेताओं को है और ना ही आला फौजी अफसरों को । काश 1971 की लड़ाई जीतने के बाद भारत ने पाकिस्तान के 93,000 बंदियों को रिहा करने से पहले अपने एक-एक आदमी को वापिस लिया होता । पूरे पांच साल तक प्रधानमंत्री रहे पीवी नरसिंहराव भी भूल चुके थे कि उन्होंने जून 90 में बतौर विदेश मंत्री एक वादा किया था कि सरकार अपने बहादुर सैनिक अधिकारियों को वापिस लाने के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं । लेकिन देश के सर्वोच्च पद पर रहने के दौरान अपनी कुर्सी बचाने के लिए हर कीमत चुकाने की व्यस्तता में उन्हें सैनिक परिवारों के आंसूओं की नमी का एहसास तक नहीं हुआ। अपने परिवारजनों को वापिस लाने के लिए प्रतिबद्ध संगठन के लोग सन 2007 में रक्षा मंत्री ए के एंटोनी से मिले थे और उन्हें आश्‍वासन दिया गया था  विशेष कमेटी बना कर लापता फौजियों की तलाश की जाएगी। सात साल बीत गए अभी तक कोई कमेटी बन नहीं पाई।
हमारे लापता फौजी और उनकी तलाश में लगे परिवारजनों को ना तो मीडिया पहचानता है, ना ही सलमान खान या फिर अक्षय खन्ना(जिन्होंने इसी विशय पर एक फिल्म भी की थी); ना ही मोमबत्ती ले कर न्याय का झंडा बुलंद करने वाले ना ही खुद को पूर्व फौजी बताने वाले अन्ना हजारे। काश! देश पर मर मिटने वालों का चैहरा, मीडिया में बिकता होता।

  पंकज चतुर्वेदी
यू जी -1 ए 3/186, राजेन्द्र नगर सेक्टर-2 साहिबाबाद, गाजियाबाद 201005
संपर्क: 9891928376, 011- 26707758(आफिस),



शनिवार, 14 जून 2014

Police needs training for changing time

THE SEA EXPRESS, AGRA 15-6-14http://theseaexpress.com/epapermain.aspx
केवल खलनायक ही नहीं है खाकी वाले
पंकज चतुर्वेदी

यदि कभी आंकड़ों में डूब कर देखें तो हर साल अपराधियों से लड़ते हुए देशभर में कई सौ पुलिस वाले मारे जाते हैं। यह विडंबना है कि पुलिसवाले को उन सभी कर्मों की गाली खानी पड़ती है, उन सभी मसलों से जूझना पड़ता है, जिससे उसका कोई वास्ता नहीं नहीं होता। जैसे कि गली में नाली भर गई, बिजली गोल है, अस्पताल में डाक्टर-तिमारदार भिड गए, दो राजनीतिक दल के लोगों में टकराव..... ऐसे ही कई मसले हैं जिनका पुलिस से सीधा वास्ता नहीं होता, लेकिन उसे ही सामने हो कर आक्रोशित लोगों को समझना पड़ता है। कभी-कभी या अधिकांष मूल मसला पीछे रह जाता है और सारा झगड़ा पुलिस-जनता के टकराव में बदल जाता है। उ.प्र. के एक दरोगा जिनका बीते 20 सालेां में प्रमोशन नहीं हुआ का दर्द गौरतलब है - ‘‘ जिन लोगों को हम लाठी मार कर हवालात में बंद कर देते थे, वे अब माननीय बन जाते हैं। फिर डर रहता है कि ये कहीं ना कहीं खुन्नस निकालेंगे। इसी लिए आज उभरते नेता, जो लफंगई व दबंगई के बल पर आगे आ रहे हैं उन पर कार्यवाही करने से पहले सोचना पड़ता है कि कल इन्हीं को सेल्यूट ठोकना होगा।’’
JANSANDESH TIMES U.P. 19-6-2014http://www.jansandeshtimes.in/index.php?spgmGal=Uttar_Pradesh/Varanasi/Varanasi/19-06-2014&spgmPic=9

टीवी पर ढ़ेर सारे खबरिया चैनल हैं, हर दिन कोई ना कोई चैनल एक  ना एक रिपोर्ट ऐसी जरूर दिखाता है, जिसमें खाकी वर्दी वाले वहशियाना तरीके से आम लोगों को लाठियों से पीटते , दौड़ाते दिखते हैं । पिटने वाले लोग आमतौर पर बिजली-पानी मांगने वाले, पेट भरने या किसी अन्याय का विरोध करने वाले होते हैं । पुलिस का काम तो अपराध रोकना है, अपराधी को पकड़ कर पीडि़त को न्याय दिलवाना है- यह कब से उनका काम हो गया कि जनता की आवाज को लाठियों से दबा दो ? एक बुजुर्ग स्वतंत्रता सेनानी को व्यथित मन से कहते सुना कि जब हमारी पुलिए डंडे ले कर जनता पर टूटती दिखती है तो यह भ्रम टूट जाता है कि हम आजाद हैं । बिल्कुल वही दृश्य होता है, आजादी का अधिकार मांगने वालों को बूटों के तले कुचल दो !
ऐसा लगता है कि देश में गणतंत्र की स्थापना के 64 साल बीत जाने के बाद भी हमारे नीति-निर्धारक यह तय नहीं कर पाए हैं कि हमें पुलिस क्यों चाहिए ? जब कभी सुरक्षा में चुक या भयंकर अपराध होते हैं तो आंकड़ों का खेल शुरू हो जाता है - हमारे यहां आबादी के लिहाज से पुलिस वालों की संख्या बेहद कम हैं । दूसरी तरफ देखें तो एक-एक व्यक्ति की सुरक्षा में सौ-सौ कर्मचारी तो कहीं एक लाख की बस्ती पर एक सिपाही, वह भी शारीरिक रूप  से अक्षमता की हद तक बेडौल ! अपराध घटित हो जाने के बाद पुलिस का पहंुचना, फिर मुजरिम से अधिक मुद्दई की प्रताड़ना । देश की अदालतें मुकदमों के बोझ से हलाकांत हैं और पुलिस आए रोज हजारों-हजार मुकदमें दर्ज कर अदालत भेज रही हैं । सजा होने का आंकड़ा तो बेहद शर्मनाक हैं - शायद 20 फीसदी से भी कम। विचाराधीन कैदियों को जेल में रखने की व्यवस्था(या अव्यवस्था) की चर्चा के लिए पूरा अलग अध्याय लिखना होगा । फिर एक एक वर्दीधारी का हर रोज 18 घंटे तक ड्यूटी करना। गष्त, मुकदमें की लिखा पढी, मुजरिम को अदालत ले जाना, पुराने मुकदमों की पेषी के लिए कोर्ट में खड़े होना, इसके बाद आकस्मिक तनाव होने पर ड्यूटी के लिए भागना। इतना करने पर भी ना तो जनता संतुश्ट, ना ही अफसर। ना कोई ओवर टाईम, ना ही सोने, खाने, मनोरंजन की कोई माकूल व्यवस्था। ना प्रमोषन की संभावनाएं, ना ही परिवार को समय दे पाना, ेऐस ही कई दर्द ले कर एक सिपाही से ले कर उप निरीक्षक तक नौकरी करता है।
RAJ EXPRESS, BHOPAL 21-6-14 http://epaper.rajexpress.in/Details.aspx?id=221761&boxid=1656593

कई दशक पहले एक सम्मानीय न्यायाधीश आनंद नारायण मुल्ला  अपने एक आदेश में लिख चुके हैं कि पुलिस वर्दी पहने हुए संगठित अपराधिक गिरोह की तरह काम करती हैं । इसका अनुभव किसी भी शहर, गांव में किया जा सकता हैं । पटरी पर दुकान लगाने वाले, ढ़ाबे चलाने वाले, बस, डग्गामार जीपों के संचालक, शराब के ठेकेदार , दीगर कामों के ठेकेदार, जुंए की फड़ व सट्टा के नंबर लिखने वाले- ये वर्ग कश्मीर से कन्याकुमारी तक पुलिस के लिए दुधारू-गाय रहा हैं । धारा 107,116,151 में गिरफ्तारी का भय देशभर के थानों की नियमित कमाई का जरिया और ‘‘ पुलिस की सक्रियता ’’ का प्रमाण-पत्र है । ये धाराएं शांति-भंग की आश्ंाका की हैं और आमतौर पर जब देा पक्षों के बीच मामूली झगड़ा भी होता है तो पुलिस दोनों पक्षों को इसमें बंद कर खुश हो जाती है। । सवाल फिर वही कि क्या पुलिस का काम यही हैं ?
भारत में घटित होने वाले अपराध, खासतौर पर पिछले दो दशकों की आतंकवादी घटनाएं, अन्य किसी विकासशील देश की तुलना में कई गुना अधिक हैं । कहा जा सकता है कि देया का एक तिहाई भाग तो सषस्त्र विद्रोहियों की निजी मल्कीयत बना हुआ है। विपन्नता, भौगोलिक और सामाजिक स्तर पर गहरी होती खाईयां इन अपराधों या अलगाववाद का कारण कहे जाते हैं । सरकार ऐसे उग्रवादियों और अपराधों के मूल कारकों को जाने बगैर उनसे जूझने के लिए डंडे का जोर बढ़ाती जा रही है । जाहिर है कि खाकी वर्दी पर बढ़ता यह खर्चा उसी जनता की खून-पीने की कमाई से उगाहे गए करों से आता है, जिसे इनकी ताकत का शिकार होना पड़ता है । यह भी मखौल ही है कि देश में एक दर्जन से अधिक विशेष सुरक्षा बल हैं और अधिकांश वह काम नहीं कर रहे हैं, जिसके लिए उनका गठन किया गया है । ऐसे में जब यह बात आती है कि पड़ताल, सुरक्षा व्यवस्था और अदालती कार्यों के लिए पुलिस की अलग-अलग शाखाएं बनाई जाएं तो यह कारगर कदम तो कतई नहीं दिखता हैं । हाल ही में मध्यप्रदेष में प्रत्येक थाने में दो इंस्पेक्टर की बहाली षुरू हुई है- एक कानून-व्यवस्था देखेगा और दूसरा मामलों का अन्वेषशण। देखने में तो यह व्यवस्था अच्छी प्रतीत होती है, लेकिन जब तक दसवीं पास को सिपाही तथा सिपाही को केवल डंडा समझने की प्रवृति से मुक्ति नहीं मिलती, ऐसे सभी सुधार बेमानी होंगे।
यह विडंबना है कि अभी भी पुलिस, विशेषरूप से सिपाही स्तर पर केवल दमन और डंडे का प्रषिक्षण दिया जा रहा है। सुधारों के कई-कई आयोग बने, सिफारिशें आईं; लेकिन नेतागण व सरकारें  पुलिस की ताकत का खुद के स्वार्थों के लिए इस्तेमाल करने के लोभ से उबर नहीं पा रहे हैं।  पुलिस इंतजार करती रहती है कि पहले कोई अपराध हो, उसके बाद उसके कागजी पंचनामें भरे जाएं। सुरक्षा, अपराध या व्यवस्था में चूक होने पर किसी भी स्तर पर काई जिम्मेदारी तय ना किया जाना भी पुलिस की निरंकुषता का कारक है।
पुलिस सुधार की कई सिफारिशें और यहां तक कि उन्हे लागू  करने के लिएए सुप्रीम कोर्ट की हिदायतें कहीं लाल बस्ते में बंधी पड़ी हैं। असल में अब पुलिस का अपराध उन्मूलन के बनिस्पत सियासती इस्तेमाल बढ़ गया है, सो कोई भी नहीं चाहता कि खाकी वर्दी का खौफ कम हो। जब तक खौफ रहेगा, तब तक उसका दुरूपयोग होगा। असल में यह समझना जरूरी है कि हमें पुलिस चाहिए किस काम के लिए-सुरक्षा के लिए, अपराध रोकने के लिए, अपराधियां को सजा दिलवाने के लिए, यातायात व्यवस्था बनाए रखने के लिए या आम लोगों के आक्रोष और गुस्से को डंडे के बल दबाने के लिए या फिर झूठी-सच्ची कहानियां गढ़ कर आम लोगों पर रौब गालिब करने के लिए।
आज प्रत्येक प्रदेष का पुलिस का बजट सालाना कई अरब रूपए का है, इसके बावजूद आम आदमी पीडि़त होने के बाद भी थाने जाने से घबराता है। प्रत्येक राज्य अत्याधुनिक हथियार, वाहन और संचार के नाम पर ज्यादा से ज्यादा पैसा मांग रहा है। लेकिन पुलिस के आम लोगों से सरोकार गौण ही हैं। समय साक्षी है कि भले ही लाल किले पर फहराने वाले झंडे का रंग बदला हो, लेकिन हमारी पुलिस की मानसिकता और प्रशिक्षण वही अधिनायकवादी है।


पंकज चतुर्वेदी
नेषनल बुक टस्ट
5 नेहरू भवन, वसंत कुंज इंस्टीट्यूषनल एरिया फेज-2
वसंत कुंज नई दिल्ली-110070


रविवार, 8 जून 2014

it is not scaricity of water, lack of managment

RAJ EXPRESS BHOPAL, 9-6-14http://epaper.rajexpress.in/Details.aspx?id=219039&boxid=17262953
कमी पानी की नहीं प्रबंधन की है

पंकज चतुर्वेदी
मध्यप्रदेष में बीते एक महीने से गरमी अपने षबाब पर है और राज्य के 160 नगरीय इलाकों मे हर ारेज पानी की सप्लाई बंद कर दी गई है। इंदौर छिंदवाड़ा, नीमच जैसे दो दर्जन षहरों में तो अभी से पांच दिन में एक बार नल से पानी टपकता है। बुंदेलखंड के सभी जिले जल-संकट ग्रस्त घोशित कर दिए गए हैं। दुख की बात है इनमें से अधिकांष इलाके ‘‘पग-पग नीर’’ के लिए मषहूर मालवा अंचल यानि इंदौर और उज्जैन संभाग के हैं। षिप्रा नदी मंगलनाथ के करीब नदारत हो चुकी है।  सरकार का कहना है कि सार्वजनिक जल वितरण के स्त्रोत भूजल है और राज्य में भूजल स्तर इतना नीचे गिर गया है कि अब बारिष होने पर ही कुछ हो सकता है। यहां गौर करें कि आज पानी बूंद-बूंद को तरस रहे इलाके बीते बारिष के मौसम में अतिवृश्टि से हलाकांत थे। हालांकि मध्यप्रदेष की जल-कुंडली यदि कागजों पर बांचे तो साफ लगेगा कि पानी का संकट मानवजन्य ज्यादा है।
सरकारी आंकडे गवाह हैं कि  यहां रोपे गए पांच लाख 18 हजार 380 हैंड पंपों में से 25 हजार 862 बंद हो चुके है।। इनमें से ग्यारह हजार से अधिक के ठप होने का करण भूजल स्तर  पाताल में जाना है। राज्य में पानी  सप्लाई करने की 11 हजार 927 योजनाओं में से 1443 बंद पड़ी हैं। 498 के तो स्त्रोत ही सूख गए हैं। कुल मिला कर देखें तो सरकार अपनी मजबूरी का ठीकरा भूजल पर फोड़ रही है, जबकि असलियत में तो यह राज्य के ताल-तलैया, नदी-सरिताएं, कुंए-बावड़ी को बिसराने का प्रतिफल है। इंसान को औसतन 55 लीटर पानी हर रोज चाहिए, लेकिन म.प्र. में बामुष्किल 40 लीटर औसत मिल पा रहा है। सूखे कंठ अपने मजरे-टोले में रहना लोगों के लिए संभव नहीं है, सो टीकमगढ़ जैसे जिलोें की 35 फीसदी आबादी पलायन कर चुकी हैं।
षायद अब यह याद भी नहीं होगा कि अस्सी के दषक को विष्व स्वास्थ्य संगठन ने ‘‘ हर गांव में पेयजल’’ के लक्ष्य के साथ प्रचारित किया था। लेकिन आज पग-पग नीर वाले मालवा से ले कर तालाबों से पटे बंुदेलखंड तक और नर्मदा के उद्गम से ले कर कालीसिंध के चंबल तक पूरे प्रदेष में एक-एक बूंद पानी इंसान की जिंदगी से बढ़ कर हो गया है। हजारों गांव ऐसे हैं जहां के बाषिंदे हर रोज से बारह से चैदह घंटे केवल पानी जुटाने में खर्च करते हैं। राज्य सरकार संकट के लाइलाज होने का इंतजार करती रही और अब टैंकर से पानी पहुंचाने के नाम पर तीन सौ करोड के वारे-न्यारे हो गए हैं। इतनी बड़ी धन राषि के बाद भी यह प्यास का कोई स्थाई निदान नहीं हैं। यहां विपदा से निबटने की सरकारी कोषिषें और दायित्व विभिन्न महकमों के कुप्रबंधेां, इंजीनियरों-नेता-ठेकेदारें के निजी स्वार्थों के अंधकूप में डूब कर रह गए हैं। यदि प्रदेष की जल कुडली देखें तो पाएंगे कि यहां मौजूद समृद्ध प्राकृतिक जल संसाधन हर मजरे-टोले का गला तर करने के लिए पर्याप्त हैं।
सन 1986 में तैयार की गई राश्ट्रीय जल नीति में क्रमषः पेय, कृशि, बिजली, जल परिवहन, उद्योग; इस क्रम में पानी की प्राथमिकता तय की गई थी। इसमें दावा किया गया था कि सन 1991 तक देष की सारी आबादी को षुद्ध पेयजल मिल जाएगा। लेकिन देष के दिल पर बसे मध्यप्रदेष में यह जलनीति रद्दी के टुकड़े से अधिक नहीं रही। जैसे-जैसे जल-संकट का मरज बढ़ता गया, पुराने जल-स्त्रोतों को मिट्टी में मिलाना तेज होता गया। कभी ‘सरोवर हमारी धरोहर’ तो कभी ‘जलाभिशेक’ के लुभावने नारों के साथ सरकारी धन पर पानी और जनता की आंखों में ध्ूाल झोंकने में कोई भी सरकार पीछे नहीं रही। कहीं से पानी की चिल्ला-चोट अधिक होती तो वहां गाडि़यां भेज कर नलकूप खुदवा दिए जाते। जनता को यह समझने में बहुत समय लग गया कि धरती के गर्भ में भी पानी का टोटा है और ये नलकूप गागर में पानी के लिए नहीं , जेब में सिक्कों के लिए रोपे जा रहे हैं। प्रदेष में हर पांच साल में दो बार अल्प वर्शा होना कोई नई बात नहीं है। पहले लोग पानी की एक-एक बूंद सहेज कर रखते थे, आज बारिष की बूदों को नारों के अलावा कहीं समेटा नहीं जाता है। राज्य का लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग इस बात से सहमत है कि प्रदेष का साठ फीसदी हिस्सा भूगर्भ जल के दोहन के लिए अप्रयुक्त ह। इन इलाकों की भूगर्भ संरचना इतनी जटिल है कि वहां जमीन से निकाला जा रहा पानी वास्तव में ‘सीपेज’ है, न कि भूजल। राज्य के मालवा जैसे सदानीरा क्षेत्र में पानी का स्तर 400-600 फुट नीचे खिसक गया है। उज्जैन के पास षिप्रा नदी नदारत हो चुकी है। ैनर्मदा का प्रवाह निमाड़-मालवा में बेहद क्षीण हो गया है। बुदेलखंड व विंध्य तो पानी की कमी के लिए जगजाहिर है।
मध्यप्रदेष के विज्ञान और प्रौद्योगिकी परिशद द्वारा कुछ साल पहले सैटेलाईट के माध्यम से तैयार किए गए नक्षें बताते हैं कि प्रदेष में 56.25 एकड़ से अधिक माप के 407 जलाषय मौजूद है। 1476 ऐसे जलाषय हैं जिनका माप 56 एकड़ से कुछ कम है।  खाली पड़े जलषयों का क्षेत्र फल जहां एक लाख दस हजार हैक्टर से अधिक है तो पानी भरने के बाद इनका जल विस्तार दो लाख सैंतीस हजार सात सौ हैक्टर को पार कर जाता है। ये आंकड़े प्रदेष की सषक्त जल-क्षमता की बानगी है। पानी की कमी के कारण सबसे विशम हालात झेल रहे टीकमगढ़ जिले में साठ के दषक तक 1200 से अधिक चंदेलकालीन तालाब हुआ करते थे। कभी प्रदेष में सबसे अधिक गेंहूं पैदा करने वाले जिले में साल दर साल तालाब से सिंचाई का रकवा घटना षुरू हुआ तो नलकूप के नषे में मस्त समाज ने इस पर गौर नहीं किया। तालाब फोड़ कर पहले खेत और फिर कालोनियां बन गई। जब होष आया तो पानी के कारण्र पलायन के हालात बन गए थे। दतिया, पन्ना, छतरपुर में भी ऐसी ही कहानियां दुहराई गईं। भोपाल  और सागर जैसे षहरों की झीलें भी आधुनिकता की चपेट में पानी का संकट साथ लाईं।
सन 1944 में अकाल के समय तत्कालीन अंग्रेज सरकार द्वारा गठित फेमिन इन्क्वारी कमीषन ने अपनी रिपोर्ट में साफ लिखा था कि आने वाले दिनों में संभावित पेयजल संकट का सामना करने के लिए अधिक से अधिक तालाबों की ख्ुदाई करना होगा।  इंटरनेषल क्राप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फार दी सेमीएरिडट्रापिक्स के विषेशज्ञों का ‘‘भारतीय तालाब प्राधिकरण’’ गठित करने का सुझाव हो या फिर पूर्व कृशि आयुक्त डी आर भूंबला के निश्कर्श; मध्यप्रदेष की नौकरषाही ने सभी को बिसरा दिया। अमदाबाद फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी के डा. पी.आर. पिषरोटी ने कई सालों पहले सलाह दी थी कि भारत के उन 300  जिलों, जहां बारिष सालाना 50 सेमी से कम है,10 हेक्टर मीटर क्षेत्रफल के 30 हजार तालाब खोदने चाहिए, तो हर तरीके के जल संकट से निजात मिल जाएगी। सौभाग्य से मध्यप्रदेष में कोई तीन लाख हेक्टर क्षेत्रफल के जलग्रहण क्षेत्र या तालाब मौजूद है।
प्रदेष में लगभग आठ हजार तालाब ऐसे हैं जिनके रखरखाव पर आजादी के बाद ईमानदारी से एक पैसा भी नहीं खर्चा गया। बारिष के कारण समाई मिट्टी, तेज हवा की धूल, करीबी पेड़-पौघों से गिरी पत्तियां और बाषिंदों द्वारा फैंके गए कचरे ने तालाबों में कई-कई फुट गाद पाट दी है। इस बेषकीमती खाद को निकाल कर जहां तालाब की जलग्रहण क्षमता बढत्राई जा सकती है, वहीं खेतों को बेहतरीन खाद भी मिलेगी। यह प्रयोग कर्नाटक में बेहद सफल भी रहा है। एक बात और तालाब में पानी होगा तो राज्य के तीन लाख से अधिक छोटे कुंओं में भी तरावट रहेगी।
मध्यप्रदेष में नर्मदा क्षिप्रा, बेतवा, सोन, केन, जैसी नदियों का उद्गम है। अनुमान है कि प्रदेष के नदियों के संजाल में 1430 लाख एकड़ पानी प्रवाहित होता है। यदि इसका नियोजित इस्तेमाल हो तो 2.30 लाख एकड़ खेत आसानी से सींचे जा सकते हैं। पर संकट यह है कि राज्य की सभी नदियां औद्योगिक व निस्तार प्रदूशण के कारण सीवर में बदल चुकी है। जंगलों की अंधाधंुध कटाई के कारण जहां बारिष कम हुई तो मिट्टी के नदियों में सीधे गिरने से उनका उथला होना भी षुरू हो गया। राज्य के चप्पे-चप्पे पर कुओं और बावडि़यों का जाल है, लेकिन ये सभी आधुनिकता की आंधी में उजड़ गए। पारंपरिक जल संसाधनों के प्रति बेरूखी का ही परिणाम है कि आज राज्य में पानी के लिए खून बह रहा है।  वैसे तो प्रदेष में ‘‘सरेावर हमारी धरोहर’’ और ‘‘जलाभिशेक’’ जैसे लुभावनी योजनाओं के खूब विज्ञापन छपे हैं, कागजों पर करोड़ेां का खर्च भी दर्ज है, लेकिन बढ़ती गरमी ने इनकी पोल खोल दी है। बस पुराने तालाबों, बावडि़यों को सहेजें, नदियों को गंदा होने से बचाएं, हरियाली की दीर्घकालीन योजना बनाएं; किसी बड़े खर्च की जरूरत नहीं है- प्रदेष को फिर से सदानीरा बनाया जा सकता है। जरूरत है तो बस मौजूद संसाधनों के मजबूत इच्छा षक्ति के साथ व्यावहारिक प्रबंधन और पुरानी सिफारिषों के ईमानदार क्रियान्वयन की।

पंकज चतुर्वेदी
यूजी-1, 3/186 ए राजेन्द्र नगर
सेक्टर-2
साहिबाबाद
गाजियाबाद 201005
9891928376, 0120-4241060


शनिवार, 7 जून 2014

WHY CRIMINALS ARE FEARLESS?

THE SEA EXPRESS, AGRA 8-6-14http://theseaexpress.com/Details.aspx?id=64016&boxid=133521453
क्यों नहीं रहा पुलिस का डर

पंकज चतुर्वेदी


लग रहा है कि समूचा उत्तर प्रदेष अपराध की चपेट में है- बलात्कार, छेड़छाड़, लूट की घटनाओं से आम जनता हलांकांत है। यह तो सामने आ गया है कि यदि पुलिस मुस्तैद होती, फोर्स का सही इस्तेमाल होता तो यह आग इतना विकराल रूप नहीं लेती। वैसे भी पिछले कुछ सालों से पूरे देष में सरेआम अपराधों की जैसे झड़ी ही लग गई है। भीड़भरे बाजार में जिस तरह से हथियारबंद अपराधी दिनदहाड़े लूटमार करते हैं, महिलाओं की जंजीर व मोबाईल फोन झटक लेते हैं, बैंक में लूट तो ठीक ही है, अब तो एटीएम मषीन उखाड़ कर ले जाते हैं; इससे साफ है कि अपराधी पुलिस से दो कदम आगे हैं और उन्हें कानून या खाकी वर्दी की कतई परवाह नहीं है। पुलिस को मिलने वाला वेतन और कानून व्यवस्था को चलाने के संसाधन जुटाने पर उसी जनता का पैसा खर्च हो रहा है जिसके जानोमाल की रक्षा का जिम्मा उन पर है। दिल्ली और एनसीआर बेहद संवेदनषील इलाका है और यहां की पुलिस से सतर्कता और अपराध नियंत्रण के लिए अतिरिक्त चैकस रहने की उम्मीद की जाती है। विडंबना है कि एनसीआर की पुलिस में कर्मठता और व्यावसायिकता की बेहद कमी है। वैसे यहां पुलिस की दुर्गति का मूल कारण सरकार की पुलिस संबंधी नीतियों का पुराना व अप्रासंगिक होना है।
jansandesh times, u.p. 10-6-14 http://www.jansandeshtimes.in/index.php?spgmGal=Uttar_Pradesh/Varanasi/Varanasi/10-06-2014&spgmPic=9
ऐसा नहीं है कि पुलिस खाली हाथ हैं, आए रोज कथित बाईकर्स गेंग पकड़े जाते हैं, बड़े-बड़े दावे भी होते हैं लेकिन अगले दिन ही उससे भी गंभीर अपराध सुनाई दे जाते हैं। लगता है कि दिल्ली व पड़ोसी इलाकों में दर्जनों बाईकर्स-गैंग काम कर रहे हैं और उन्हें पुलिस का कोई खौफ नहीं हैं। अकेले गाजियाबाद जिले की हिंडन पार की कालोनियों में हर रोज झपटमारी की दर्जनों घटनाएं हो रही हैं और अब पुलिस ने मामले दर्ज करना ही बंद कर दिया है। जिस गति से आबादी बढ़ी उसकी तुलना में पुलिस बल बेहद कम है। मौजूद बल का लगभग 40 प्रतिषत  नेताओं व अन्य महत्वपूर्ण लोगों की सुरक्षा में व्यस्त है। खाकी को सफेद वर्दी पहना कर उन्हीं पर यातायात व्यवस्था का भी भार है। अदालत की पेषियां, अपराधों की तफ्तीष, आए रोज हो रहे दंगे, प्रदर्षनों को झेलना। कई बार तो पुलिस की बेबसी पर दया आने लगती है।
मौजूदा पुलिस व्यवस्था वही है जिसे अंग्रेजों ने 1857 जैसी बगावत की पुनरावृत्ति रोकने के लिए तैयार किया था।  अंग्रेजों को बगैर तार्किक क्षमता वाले आततायियों की जरूरत थी ,इसलिए उन्होंने इसे ऐसे रूप में विकसित किया कि पुलिस का नाम ही लोगों में भय का संचार करने को पर्याप्त हो। आजादी के बाद लोकतांत्रिक सरकारों ने पुलिस को कानून के मातहत जन-हितैषी संगठन बनाने की बातें तो कीं लेकिन इसमें संकल्पबद्धता कम और दिखावा ज्यादा रहा। वास्तव में राजनीतिक दलों को यह समझते देर नहीं लगी कि पुलिस उनके निजी हितों के पोषण में कारगर सहायक हो सकती है और उन्होंने सत्तासीन पार्टी के लिए इसका भरपूर दुरुपयोग किया। परिणामतः आम जनता व पुलिस में अविश्वास की खाई बढ़ती चली गयी और समाज में असुरक्षा और अराजकता का माहौल बन गया। शुरू-शुरू में राजनैतिक हस्तक्षेप का प्रतिरोध भी हुआ। थाना प्रभारियों ने विधायकों व मंत्रियों से सीधे भिड़ने का साहस दिखाया पर जब ऊपर के लोगों ने स्वार्थवश हथियार डाल दिये तब उन्होंने भी दो कदम आगे जाकर राजनेताओं को ही अपना असली आका बना लिया। अन्ततः इसकी परिणति पुलिस-नेता-अपराधी गठजोड़ में हुई जिससे आज पूरा समाज इतना त्रस्त है कि सर्वोच्च न्यायालय तक ने पुलिस में कुछ ढांचागत सुधार तत्काल करने की सिफारिषें कर दीं। लेकिन लोकषाही का षायद यह दुर्भाग्य ही है कि अधिकांष राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट के इस आदेष को नजरअंदाज कर रही हैं। परिणति सामने है- पुलिस अपराध रोकने में असफल है।
कानून व्यवस्था या वे कार्य जिनका सीधा सरोकार आम जन से होता है, उनमें थाना स्तर की ही मुख्य भूमिका होती है। लेकिन अब हमारे थाने बेहद कमजोर हो गए हैं। वहां बैठे पुलिसकर्मी आमतौर पर अन्य किसी सरकारी दफ्तर की तरह क्लर्क का ही काम करते हैं। थाने आमतौर पर षरीफ लोगों को भयभीत और अपराधियों को निरंकुष बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आज जरूरत है कि थाने संचार और परिवहन व अन्य अत्याधुनिक तकनीकों से लैस हांे। बदलती परिस्थितियों के अनुसार थानों के सशक्तीकरण महति है। आज अपराधी थानें में घुस कर हत्या तक करने में नहीं डरते। कभी थाने उच्चाधिकारियों और शासन की प्रतिष्ठा की रक्षा के सीमावर्ती किलों की भांति हुआ करते थे। जब ये किले कमजोर हो गये तो अराजक तत्वों का दुस्साहस इतना बढ़ गया कि वे जिला पुलिस अधीक्षक से मारपीट और पुलिस महानिदेशक की गाड़ी तक को रोकने से नहीं डरते हैं।
रही बची कसर जगह-जगह अस्वीकृत चैकियों, पुलिस सहायता बूथों, पिकेटों आदि की स्थापना ने पूरी कर दी है। इससे पुलिस-शक्ति के भारी बिखराव ने भी थानों को कमजोर किया है। थानों में ”स्ट्राइकिंग फोर्स“ नाममात्र की बचती है। इससे किसी समस्या के उत्पन्न होने पर वे त्वरित प्रभावी कार्यवाही नहीं कर पाते हैं । तभी पुलिस थानों के करीब अपराध करने में अब अपराधी कतई नहीं घबराते हैं।
पुलिस सुधारों में अपराध नियंत्रण, घटित अपराधों की विवेचना और दर्ज मुकदमें को अदालत तक ले जाने के लिए अलग-अलग  विभाग घटित करने की भी बात है।  सनद रहे अभी ये तीनों काम  एक ही पुलिस बल के पास है, तभी आज थाने का एक चैथाई स्टाफ हर रोज अदालत के चक्कर लगाता रहता है। नियमित पेट्रोलिंग लगभग ना के बराबर है। यह भी एक दुखद हकीकत है कि पुलिस को गष्त के लिए पेट्रोल बहुत कम या नहीं मिलता है। पुलिसकर्मी अपने स्तर पर इंधन जुटाते हैं, जाहिर है कि इसके लिए गैरकानूनी तरीकों का सहारा लेना ही पड़ता होगा।  उ.प्र. में कई थाने ऐसे है, जहां टेलीफोन कनेक्षन कट चुके है। राजधानी के समीपवर्ती गाजियाबाद जिले की पुलिस तो अभी भी सन 65 के माडल की जीप पर गष्त कर रही है, जबकि अपराधी पलक झपकते ही हवा से बातें करने वाली मोटरसाईकल पर सवार होते हैं।  यहां उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान के कराचीं में पुलिस विषेश रूप से तैयार किए गए तिपहिया स्कूटरों पर गष्त करती है। एक तो उस पर एक साथ तीन पुलिसवाले सवार हो जाते हैं, फिर इसमें इंधन का खर्च कम है और साथ ही यह तेज गति से गलियों में भी दौड़ लेता है।
इन दिनों पुलिस सुधार का हल्ला चल रहा है । सुप्रीम कोर्ट भी इस बारे में निर्देश दे चुका हैं, लेकिन देश का नेता पुलिस का उपनिवेशिक चेहरे को बदलने में अपना नुकसान महसूस करता है । तभी विवेचना और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए अलग-अलग एजेंसियों की व्यवस्था पर सरकार सहमत नहीं हो पा रही है ।  वे नहीं चाहते हैं कि थाना प्रभारी जैसे पदों पर बहाली व तबादलों को समयबद्ध किया जाए।  कितना दुखद है कि मुलायम सिं का षासन आने पर एक जाति विषेश के और मायावती की सत्ता में दूसरी जाति के सिपाही से ले कर एसपी तक की बहाली होती है। पष्चिमी उ.प्र के दंगों में एक समाज विषेश के पुलिस वालों ने अल्पसंख्यकों की खूब गरदने कटवाईं। जब पुलिस का जाति व सांप्रदायिकरण इस स्तर पर होग या है तो जन सरोकार का गर्त में जाना लाजिमी ही है। इसी का परिणाम है कि उ्रप्र में अपराधी पुलिस की कमजोरियों का भरपूर लाभ उठा रहे हैं। ़
वैसे भी अपराधों में इजाफा नगरीय अपसंस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा है। कोई एक दषक पहले दिल्ली नगर निगम के स्लम विभाग द्वारा करवाए गए एक सर्वेक्षण की रिपोर्ट भले ही कहीं लाल बस्ते में बंध कर गुम हो गई हे, लेकिन वह है आज भी प्रासंगिक। निगम के स्लम तथा जे जे विभाग की रिपोर्ट में कहा गया था कि राजधानी में अपराधों में ताबडतोड बढ़ौतरी के सात मुख्य कारण हैं - अवांछित पर्यावरण, उपेक्षा तथा गरीबी, खुले आवास, बडा परिवार, अनुशासनहीनता व नई पीढी का बुजुर्गों के साथ अंतर्विरोध और नैतिक मूल्यों में गिरावट। पुलिस की मौजूदा व्यवस्था इन कारकों के प्रति कतई संवेदनषील नहीं है। वह तो डंडे और अपराध हो जाने के बाद अपराधी को पकड़ कर जेल भेजने की सदियों पुरानी नीति पर ही चल रही है।
आज जिस तरह समाज बदल रहा है, उसमें संवेदना और आर्थिक सरोकार प्रधान होते जा रहे हैं, ऐसे में सुरक्षा एजेंसियों की जिम्मेदारी, कार्य प्रणाली व चेहरा सभी कुछ बदलना जरूरी है ।  आज जरूरत डंडे का दवाब बढ़ाने की नहीं है, सुरक्षा एजेंसियों को समय के साथ आधुनिक बनाने की है ।


पंकज चतुर्वेदी
सहायक संपादक
नेषनल बुक ट्रस्ट इंडिया
 नेहरू भवन, वसंत कुंज इंस्टीट्यूषनल एरिया फेज-2
 वसंत कुंज, नई दिल्ली-110070
 संपर्क- 9891928376




शुक्रवार, 6 जून 2014

Ecology need serious attantion

विकास का सहयात्री बने पर्यावरण संरक्षण
पंकज चतुव्रेदी स्वतंत्र पत्रकार/ लेखक
अभिलाषाओं, अपेक्षाओं और उम्मीदों के सूर्य-रथ पर सवार हो कर आई मोदी सरकार विकास के प्रति कटिबद्ध होने का दावा कर रही है। सनद रहे विकास एक सापेक्षिक अवधारणा है और समानअर्थी प्रतीत होने के बावजूद इसके मायने ‘प्रगति’ से भिन्न हैं। विकास, प्रगति का उत्प्रेरक तत्व है, लेकिन इसका मूल महज आर्थिक तत्व नहीं है-गुणात्मक उन्नति यानी समाज, स्वाथ्य, शिक्षा, परिवहन, संचार, बौद्धिकता, रोजगार, बूढ़े, गरीब, औरतें, बच्चे..सभी के जीवन में सकारात्मक बदलाव। केवल सड़क, कारखाने, तेज गति की ट्रेन ही विकास शब्द को परिभाषित नहीं करते हैं। मुल्क के हर बाशिंदे-चाहे व इंसान हो या फिर जीव- जंतु, को साफ हवा मिले सांस लेने के लिए, नदी-तालाब, समुद्र स्वच्छ हों, लाखों-लाख किस्म के पेड़-पौधे, कीट-पतंगे, जानवर-पक्षी उन्मुक्त हो कर अपने नैसर्गिक स्वरूप में जीवन यापन कर रहे हों-ऐसा विकास ही जन भावनाओं की संकल्पना होता है। तमिलनाडु का एक शहर है रानीपेट, वहां चमड़े के हजारों कारखाने हैं। वहां की प्रति व्यक्ति आय राज्य में सबसे ऊंची है लेकिन दूसरी तरफ उसे दुनिया के दस सर्वाधिक प्रदूषित नगरों में गिना जाता है, वहां कई सौ मीटर गहराई तक भूजल में बदबू और जहर है, इलाके की नदी की बदबू कई किलोमीटर तक दिमाग को फाड़ देती है। लब्बोलुआब यही है कि नई सरकार के पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का यह बयान है तो बड़ा लुभावना कि वह विकास और पर्यावरण में संतुलन से ज्यादा इनके सहअस्तित्व पर भरोसा करते हैं। परियोजना व पर्यावरण केंद्र सरकार को अपनी पूर्व सरकार से विरासत में सैकड़ों ऐसी फाइलें मिली हैं, जिनमें कोई आठ लाख हैक्टेयर इलाके में विकास की मंजूरियों की दरकार है। इनमें से कुछ पांच साल से भी ज्यादा पुरानी हैं। याद होगा कि चुनाव के समय ‘जयंती टैक्स’ खूब उछला था और उससे पहले जयराम रमेश की पर्यावरण मंत्रायलय से विदाई के पीछे भी कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं को पर्यावरण अनापत्ति के नाम पर हटाने का मसला गरम रहा था। यह भी जरूरी है कि आधुनिक विकास की अवधारणा का मूल अवयव ऊर्जा है और कोयला खदानों से अधिक माल निकालने, कोयला व अन्य खदानों के वन क्षेत्र में होने के कारण उन संरक्षित क्षेत्रों में खुदाई की अनुमति, परमाणु ऊर्जा का विस्तार जैसे मसले एक चुनौतीपूर्ण निर्णय वाले होंगे। अब हरियाणा के फतेहाबाद जिले के गोरखपुर में लगने वाले परमाणु ऊर्जा संयत्र का ही मसला लें, चुनाव से पहले मौजूदा सरकार में मंत्री व सेना के पूर्व प्रमुख विजय कुमार सिंह इलाके का दौरा कर परियोजना से पर्यावरण के नुकसान के प्रति लोगों को जागरूक करते रहे हैं। मेनका गांधी ने भी यहां बडोपल गांव में सभा कर इस संयत्र को इलाके के जीव-जंतुओं के लिए खतरा बताया था। अब यह सिंह व गांधी तथा उनके साथ घूम-घूम कर नारे लगा रहे सभी भाजपा नेताओं के लिए कथनी व करनी के अंतर का सवाल है कि क्या ये दोनों कैबिनेट में परमाणु ऊर्जा संयत्रों की खिलाफत करेंगे। गंगा नदी को स्वच्छ बनाने के लिए गंगा एक्शन प्लान के तहत अभी तक हुए कामों की समीक्षा का काम शुरू होना एक अच्छा कदम है, लेकिन यह भी समझना जरूरी होगा कि यमुना, हिंडन, सिंध जैसी नदियों की हालत सुधारे बगैर गंगा में सुधार होना असंभव है, फिर उस तरह रौद्र नदी ब्रहपुत्र है तो दक्षिण में मैली होती कावेरी, छत्तीसगढ़ में इंद्रावति , हर जगह की कहानी एक सी ही है। देश की संस्कृति, सभ्यता, लोकाचार के अनुसार सभी छोटी-बड़ी नदियां गंगा की ही तरह पवित्र, जन आस्थाओं की प्रतीक और पर्यावरण के लिए जरूरी हैं। जिस तरह प्रकृति का तापमान बढ़ रहा है, उसको देखते हुए हिमाचल के ग्लेशियर से ले कर गांव-कस्बे की ताल-तलैया को संरक्षित करना इस सरकार की योजना में होना चाहिए वरना गांगा सफाई अभी तक उछाले गए नारों से अलग नहीं होगा। बढ़ती आबादी, जल संकट से निबटने के लिए पाताल फोड़ कर पानी निकालने के बजाए, बारिष की हर बूंद को सहेजने की छोटी-छोटी योजनाएं समय की मांग हैं। पर्यावरण मंत्रालय के सामने सबसे बड़ी चुनौती नदी जोड़ने की परियोजनाओं को लेकर है। अभी तक तो यही सामने आया है कि हजारों करोड़ खर्च कर नदियों को जोड़ने के बाद जिस स्तर पर जंगल, खेतों का नुकसान होना है, उसी तुलना में फायदे बहुत कम हैं। कहर बरपाता विकास!
साल दर साल बढ़ती गरमी, गांव-गांव तक फैल रहा जल-संकट का साया, बीमारियों के कारण पट रहे अस्पताल..ऐसे कई मसले हैं जो आम लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक बना रहे हैं। कहीं कोई नदी, तालाब के संरक्षण की बात कर रहा है तो कही पेड़ लगा कर धरती को बचाने का संकल्प, जंगल व वहां के बाशिंदे जानवरों को बचाने के लिए भी सरकार व समाज प्रयास कर रहे हैं। लेकिन भारत जैसे विकासशील व्यवस्था वाले देश में पर्यावरण का सबसे बड़ा संकट तेजी से विस्तारित होता ‘शहरीकरण’ एक समग्र विषय के तौर लगभग उपेक्षित है। असल में देखें तो संकट जंगल का हो या फिर स्वच्छ वायु का या फिर पानी का; सभी के मूल में विकास की वह अवधारणा है जिससे शहररूपी सुरसा सतत विस्तार कर रही है और उसकी चपेट में आ रही है प्रकृति और नैसर्गिकता। और अब 100 नए शहर बसाने की तैयारी हो रही है, बस उम्मीद ही कर सकते हैं कि नए बने शहर ऊर्जा, यातायात, गंदगी निस्तारण, पानी के मामलों में अपने संसाधनों पर ही निर्भर होंगे, वरना यह प्रयोग देश के लिए नया पर्यावरणीय संकट होगा। एक बात और बेहद चौकाने वाली है कि भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की संख्या शहरों में रहने वाले गरीबों के बराबर ही है। यह संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है, यानी यह डर गलत नहीं होगा कि कहीं भारत आने वाली सदी में ‘अरबन स्लम’ या शहरी मलिन बस्तियों में तब्दील ना हो जाए। भारत में तस्करों की पसंद वे नैसर्गिक संपदा है, जिसके प्रति भारतीय समाज लापरवाह हो चुका था, लेकिन पाश्चात्य देश उनका महत्व समझ रहे हैं। गौरतलब है कि यह महज नैतिक और कानूनसम्मत अपराध ही नहीं है, बल्कि देश की जैव विविधता के लिए ऐसा संकट है, जिसका भविष्य में कोई समाधान नहीं होगा। भारत में लगभग 45 हजार प्रजातियों के पौधों की जानकारी है, जिनमें से कई भोजन या दवाइयों के रूप में बेहद महत्वपूर्ण हैं। दुर्लभ कछुओं, कैकड़ों और तितलियों को अवैध तरीके से देश से बाहर भेजने के कई मामले अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों पर पकड़े जा चुके हैं। हमारा जल, मिट्टी, फसल और जीवन इन्हीं विविध जीवों व फसलों के आपसी सामंजस्य से सतत चलता है। खेतों में चूहे भी जरूरी हैं और चूहों का बढ़ना रोकने के लिए सांप भी। सांप पर काबू पाने के लिए मोर व नेवले भी हैं। लेकिन कहीं खूबसूरत चमड़ी या पंख के लिए तो कहीं जैव विविधता की अनबुझ पहेली के गर्भ तक जानने को व्याकुल वैज्ञानिकों के प्रयोगों के लिए भारत के जैव संसार पर तस्करों की निगाहें गहरे तक लगी हुई हैं। भारत ही साक्षी है कि पिछले कुछ वर्षो के दौरान चावल और गेहूं की कई किस्मों, जंगल के कई जानवरों व पंक्षियों को हम दुर्लभ बना चुके हैं और इसका खमियाजा भी समाज भुगत रहा है। कानून, योजनाएं सरकार भले ही बहुत-सी बना ले लेकिन जब तक आम लोगों को पर्यावरणीय संरक्षण के सरोकारों से जोड़ा नहीं जाएगा, सरकार का हर प्रयास अधूरा रहेगा।
RASHTRIY SAHARA] HASTAKSHEP 07-06-2014                                                                                                         

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