तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

मंगलवार, 29 जुलाई 2014

society has to change his mindset towards women

THE RAJ EXPRESS BHOPAL 29-7-14http://epaper.rajexpress.in/Details.aspx?id=230497&boxid=53458378
मोमबत्ती की ऊष्‍मा वहां तक क्यों नहीं पहुंचती ?
पंकज चतुर्वेदी
लखनउ के मोहनलाल गंज के एक सरकारी स्कूल में एक विधवा युवती के साथ लगभग उतनी ही नृषंसता हुई, जितनी लगभग दो साल पहले दिल्ली में ‘दामिनी’ के साथ। ठीक उसी समय बंगलौर के एक फाईव स्टार स्कूल में एक छह साल की बच्ची के साथा पाषविक कृत्य की सूचना आई। जब पूरा देष इन  दो घटनाओं से सुलग रहा था तब मध्यप्रदेष के छतरपुर जिले में एक 70 साल के  रिष्ते के बाबा ने रमजान के पवित्र महीने में अपनी गूंगी पोती को ही अपनी हवस का शिकार बना लिया। जिस समय लखनउ और बंगलौर कांड के विरोध में देष में कई जगह प्रदर्षन हो रहे थे, ठीक उसी दिन तमिलनाडु के कृश्णानगर जिले के बोडाम पट्टी में एक बीस वर्शीय छात्रा के साथ चार ड्रायवरों ने एक मंदिर परिसर में ना केवल बालात्कार किया, बल्कि उसका वीडियो बना कर इंटरनेट पर अपलोड कर दिया व अपने नाम व फोन नंबर उस लड़की को यह कह कर दिए कि उनकी जब इच्छा होगी, उसे बुलाएंगे। जाहिर है कि इस तरह के अपराधियों को कानून, जनाक्रोष या स्वयं की अनैतिकता पर ना तो डर रह गया है ना ही संवेदना।
दिसंबर-2012 के दामिनी कांड में एक आरोपी की जेल में कथित आत्महत्या हो गई व बाकी की फंासी की सजा पर अदालती रोक चल रही है। उस कांड के बाद बने पास्को कानून में जम कर मुकदमें कायम हो रहे हैं। दामिनी कांड के दौरान हुए आंदोलन की ऊश्मा में सरकारें बदल  गईं। उस कांड के बाद हुए हंगामें के बाद भी इस तरह की घटनाएं सतत होना यह इंगित करता है कि बगैर सोच बदल,े केवल कानून से कुछ होने से रहा, तभी देष के कई हिस्सों  में ऐसा कुछ घटित होता रहा जो इंगित करता है कि महिलाओं के साथ अत्याचार के विरोध में यदा-कदा प्रज्जवलित होने वाली मोमबत्तियां केवल उन्हीं लोेगों का झकझोर पा रही हैं जो पहले से काफी कुछ संवदेनषील है- समाज का वह वर्ग जिसे इस समस्या को समझना चाहिए -अपने पुराने रंग में ही है - इसमें आम लोग हैं, पुलिस भी है और समूचा तंत्र भी।
दिल्ली में दामिनी की घटना के बाद हुए देषभर के धरना-प्रदर्षनों में षायद करोड़ों मोमबत्त्तिया जल कर धुंआ हो गई हों लेकिन समाज के बड़े वर्ग पर दिलो-दिमाग पर औरत के साथ हुए दुव्र्यवहार को ले कर जमी भ्रांतियों की कालिख दूर नहीं हो पा रही हे। ग्रामीण समाज में आज भी औरत पर काबू रखना, उसे अपने इषारे पर नचाना, बदला लेने - अपना आतंक बरकरार रखने के तरीके आदि में औरत के षरीर को रोंदना एक अपराध नहीं बल्कि मर्दानगी से जोड़ कर ही देखा जाता हे। केवल कंुठा दूर करने या दिमागी परेषानियों से ग्रस्त पुरूश का औरत के षरीर पर बलात हमला महज महिला की अस्मत या इज्जत से जोड़ कर देखा जाता हे। यह भाव अभी भी हम लोगों में पैदा नहीं कर पा रहे हैं कि बलात्कार करने वाला मर्द भी अपनी इज्जत ही गंवा रहा है। हालांकि जान कर आष्चर्य होगा कि चाहे दिल्ली की 45 हजार कैदियों वाली तिहाड़ जेल हो या फिर दूरस्थ अंचल की 200 बंदियों वाली जेल ; बलात्कार के आरोप में आए कैदी की , पहले से बंद कैदियों द्वारा दोयम दर्जें का माना जाता है और उसकी पिटाई या टाॅयलेट सफाई या जमीन पर सोने को विवष करने जैसे स्वघोशित नियम लागू हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जेल जिसे असामाजिक लोगों की बस्ती कहा जाता है, जब वहां बलात्कारी को दोयम माना जाता है तो बिरादरी-पंचायतें- पुलिस इस तरह की धारणा क्यों विकसित नहीं कर पा रही हैं। खाप, जाति बिरादरियां, पंचायतें जिनका गठन कभी समाज के सुचारू संचालन के इरादे से किया गया था अब समानांतर सत्ता या न्याय का अड्डा बन रही है तो इसके पीछे वोट बैंक की सियासत होना सर्वमान्य तथ्य है।
ऐसा नही है कि समय-समय पर  बलात्कार या षोशण के मामले चर्चा में नहीं आते हैं और समाजसेवी संस्थाएं इस पर काम नहीं करती हैं, । बाईस साल पहले भटेरी गांव की साथिन भंवरी देवी  को बाल विवाह के खिलाफ माहौल बनाने की सजा सवर्णों द्वारा बलातकार के रूप में दी गई थीं उस ममाले को कई जन संगठन सुप्रीम कोर्ट तक ले गए थे और उसे न्याय दिलवाया था। लेकिन जान कर आष्चर्य होगा कि वह न्याय अभी भी अधूरा है । हाई कोर्ट से उस पर अंतिम फैसला नहीं आ पाया है । इस बीच भंवरी देवी भी साठ साल की हो रही हैं व दो मुजरिमों की मौत हो चुकी है। ऐसा कुछ तो है ही जिसके चलते लोग इन आंदालनो, विमर्षों, तात्कालिक सरकारी सक्रिताओं को भुला कर गुनाह करने में हिचकिचाते नहीं हैं। आंकडे गवाह हैं कि आजादी के बाद से बलात्कार के दर्ज मामलों में से छह फीसदी में भी सजा नहीं हुई। जो मामले दर्ज नहीं नहीं हुए वे ना जाने कितने होंगे।
फांसी की मांग, नपुंसक बनाने का षोर, सरकार को झुकाने का जोर ; सबकुछ अपने- अपने जगह लाजिमी हैं लेकिन जब तक बलात्कार को केवल औरतों की समस्या समझ कर उसपर विचार किया जाएगा, जब तक औररत को समाज की समूची ईकाई ना मान कर उसके विमर्ष पर नीतियां बनाई जाएंगी; परिणा अधूरे ही रहें्रे। फिर जब तक सार्वजनिक रूप से मां-बहन की गाली बकना , धूम्रपान की ही तरह प्रतिबंधित करने जैसे आघारभूत कदम नहीं उठाए जाते  , अपने अहमं की तुश्टि के लिए औरत के षरीर का विमर्ष सहज मानने की मानवीय वत्त्ृिा पर अंकुष नहीं लगाया जा सकेगा। भले ही जस्टिस वर्मा कमेटी सुझाव दे दे, महिला हेल्प लाईन षुरू हो जाए- एक तरफ से कानून और दूसरी ओर से समाज के नजरिये में बदलाव की कोषिष एकसाथ किए बगैर असामनता, कुंठा, असंतुश्टि वाले समाज से ‘‘रंगा-बिल्ला’’ या ‘‘राम सिंह-मुकेष’’ या रामसेवक यादव की पैदाईष को रोका नहीं जा सकेगा।

शनिवार, 26 जुलाई 2014

Iron medicne like iron piles

THE SEA EXPRESS AGRA 27-7-14http://theseaexpress.com/Details.aspx?id=65728&boxid=30877844

लोहे के लिए लोहे के चने चबाते हैं मरीज
                          पंकज चतुर्वेदी


भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा गरीबी की रेखा से नीचे जीवन बसर करता है । फलस्वरूप पौष्टिक आहार के अभाव में रक्त की कमी या एनीमिया एक आम रोग है । यह बड़े सुनियोजित तरीके से प्रचारित किया जाता रहा है कि इस बीमारी का इलाज केवल लोह तत्वों का भक्षण है, और इसके लिए अंग्रेजी दवाएं एकमात्र जरिया हैं । लेकिन यह बात ना तो डाक्टर बताते हैं, और ना ही सरकारी एजेंसियां कि हमारी बाजार में उपलब्ध तथाकथित आयरन-दवाएं ना तो सही है और न कारगर । बीते एक सयाल में दिल्ली सहित देष के अलग अलग हिस्सों से यह खबरें लगातर आती रहीं कि सरकार द्वारा स्कूल में बांटी गई आयरन की गोलियां खा कर बच्चे बीमार हो गए। लोग दवाईयों की गुणवत्ता के छिद्रान्वेशण में तो तल्लीन रहे, लेकिन इस पर विमर्ष नहीं हुआ कि क्या लोहे के लिए अंग्रेजी दवाई की गोली ही एक मात्र विकल्प है ?
जनसंदेश टाईम्‍स, उ.प्र.http://www.jansandeshtimes.in/index.php?spgmGal=Uttar_Pradesh/Varanasi/Varanasi/30-07-2014&spgmPic=9

लौह तत्व युक्त दवाएं तैयार करने का क्षेत्र उपभोक्ताओं के लिए खासा धंुधला है । कई ऐसी बाते हैं जिन्हें हम जानते नहीं हैं, जानते है तो सिर्फ वही जो लुभावने विज्ञापनों में दर्शाया जाता है । अधिकांश लोह-टानिक बहुत महंगे और अनियमित मात्रा वाले होते हैं । हाइमेटेनिक्स के नाम से प्रचलित लौह टानिक पांच विभिन्न रूपों में बिकते हैं - वे जिनमें केवल आयरन-फोलिक एसिड का मिश्रण होता है, वे जो स्पान्सूल के रूप में बेचे जाते है, कुछ में विटामिन्स और अन्य अयस्क भी होते है,सीरप की तरह बेचे जा रहे और जिनमें हीमोग्लोबिन होता है ।
भारत के बाजारों में ऐसे हाइमेटेनिक्स की बाढ़ सी है जो स्वास्थ्य पर बुरा असर डालते हैं, लेकिन उनका प्रचार-प्रसार बड़े ही लुभावने ढ़ंग से किया जाता है । यहां तक कि हीमोग्लोबिन वाले आयरन टानिकों पर पाकिस्तान सरीखे देश तक ने पाबंदी लगा रखी है । कुछ सालों पहले भारत में भी इस पर पाबंदी के लिए प्रकिया शुरू हुई थी, लेकिन दवा उत्पादकों की सशक्त लाबिंग के चलते यह खतरनाक टानिक दवा के रूप में अभी भी धड़ल्ले से बिक रहा है । विकसित देशों में हीमोग्लोबिन का इस्तेमाल कुत्तों के भोजन के रूप में किया जाता है, ना कि हाइमेटेनिक्स के रूप में । इसके बारे में एक और घिनौना तथ्य यह है कि कुछ हीमोग्लोबिन उत्पादों का निर्माण कसाई खानों से एकत्र किए गए खून से किया जाता है और ऐसी दवाईयां अधिक लाभकारी भी नहीं हैं । इसके विपरीत इनकी कीमत अंधाधंुध ऊंची होती हैं ।
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि हाइमेटेनिक्स के विभिन्न ब्रांडों की कीमतों में बेवजह खासा अंतर रखा जाता है । इनमें से कई आदमी की सेहत पर उलटा ही असर करते हैं । ‘मेक्राफोलीन-आयरन’ को हाइमेटेनिक्स में सबसे सस्ता ब्रांड है । मेक्राफोलीन की तुलना में अन्य दवाईयां 145 गुना तक महंगी हैं।‘फेरवीट’ नामक गोली की कीमत इससे 1.4 गुना अधिक है । बाजार में हाइमेटेनिक स्पान्सूल लगभग सात गुना अधिक कीमत पर बेचे जाते हैं और हाइमेटेनिक सीरप की कीमत दो से 145 गुना ऊंची है । जबकि हीमोग्लोबिन वाले हाइमेटेनिक्स की कीमतें मेक्राफोलीन-आयरन गोलियों की तुलना में 16 से 115 गुना अधिक होती हैं । खेदजनक बात तो यह है कि अधिकांश डाक्टर इस सवाल पर अनुत्तरित रहते हैं कि लौह-दवाओं की विभिन्न किस्मों की कीमतों में आखिर इतना फर्क क्यों हैं ?
हीमोग्लोबिन युक्त दवाएं बनाने वाली कंपनियां बड़े जोर-शोर से प्रचार करती है कि हाइमेटेनिक-आयरन की अवशोषण क्षमता काफी अधिक 30 प्रतिशत की दर तक होती है । लेकिन वे इस तथ्य को चालाकी से छुपाते है कि हीमोग्लोबिन के प्रत्येक ग्राम में मात्र 3.4 मिली ग्राम लोहे की मात्रा ही होती है । साथ ही साथ जानवर के खून से तैयार इस दवा के कारण एलर्जी होने की संभावना रहती है । हमारे देश की तेज गर्मी में ऐसी दवाओं में सड़न पैदा होने लगती है, जो ‘माईक्रोआरगन’ की पैदावार को बढ़ावा देता है । फलस्वरूप इसका सेवन करने वाले विभिन्न संक्रामक बीमारियों के शिकार हो जाते हैं । मजेदार बात यह है कि कोई भी मेडिकल संस्था अधिकृत रूप से यह दावा नहीं करती है कि मानव शरीर में लौह-अयस्क की कमी पूरी करने के लिए हाइमेटेनिक दवाएं कारगर हैं । विकसित देशों में तो लौह-अस्यकों से परिपूर्ण इन छलावापूर्ण उत्पादों पर कई साल पहले से पूरी तरह पाबंदी है । जब कि भारत में ऐसी कई दवाएं सर्वाधिक बिकने वाले टानिकों में से हैं ।
यही नहीं ऐसे सीरप तैयार करने में प्रयुक्त जानवरों के लीवर के अर्क में बहुत सारे बेकार व अवांछित अंश भी होते हैं, जो लौह अयस्क के अवशोषण में बाधक हैं । एनिमिया यानि रक्त अल्पता के उचित इलाज हेतु रिपोर्ट में कहा गया है कि विशुð लौह कमी के लिए लौह-लवण देना और गर्भावस्था में फोलिक एसिड की अतिरिक्त खुराक देना पर्याप्त होता हैं । लौह अयस्कों को खाने के रूप में देना ही उचित है, क्योंकि इंजेक्शन के जरिए आयरन देना कष्टप्रद, असुविधाजनक और खतरनाक होने के साथ-साथ महंगा भी होता हैं । ऐसा तभी करना चाहिए जब रोगी को मूंह से दी गई आयरन-दवाएं पच नहीं रही हो, लेकिन ऐसा बहुत कम होता है । बताया गया है कि मूंह से लिए गए प्रत्येक मिलिग्राम लौहे के लिए अन्य मंहगे उत्पादों के बनिस्पत फैरस सल्फेट सर्वाधिक प्रभावकारी और सुरक्षित होता है । 
आमतौर पर डाक्टर सामान्यतया आंखों की पुतलियां देखते हैं और मरीज को एनीमिया की शिकायत बता देते हैं । फिर शुरू हो जाता है आयरन युक्त दवाओं का अंधाधुंध इस्तेमाल । जबकि एनीमिया की पुष्टि के लिए और कई परीक्षण किए जाने आवश्यक होते हैं । यह एक भयानक तथ्य है कि विभिन्न कंपनियों के  उत्पादों की पैकिंग पर दर्ज दवा की मात्रा भी आमतौर पर गलत ही होती है ।
फेरस सल्फेट इस बीमारी का बहुत ही सस्ता और कारगर उपाय है । इसके बावजूद दवाई कंपनियां फेरस सल्फेट की गोलियां बनाने में कतई रुचि नहीं दिखाती हैं, क्योंकि वे इससे अधिक मुनाफा नहीं काट सकेगें । विडंबना है कि हमारे देश में ऐसे कोई नियम कायदे नहीं हैं, जिसके तहत कंपनियों पर ऐसी सस्ती लौह-दवाओं के उत्पादन के लिए दबाव डाला जा सकें । अधिकांश लोगांे का यह भ्रम होता है कि महंगे हाइमेटेनिक्स अधिक कारगर व कम साईड इफेक्ट वाले होते हैं । जबकि इंग्लैंड की जानमानी कंपनी गुडमेन एंड गिलमेन का भी मानना है कि बाजार में उपलब्ध तथाकथित लौह दवाएं खून बढ़ाने में बहुत कम प्रभावी हैं । राम बाण के रूप में प्रचारित विटामिन बी कांपलेक्स के मिश्रण वाले हाईमेटेनिक फार्मूलों में तांबा, कोबाल्ट, लीवर के अर्क या जानवरों के हीमोग्लोबिन की अनियंत्रित मात्रा होती हैं । जो निश्चित ही बेहद नुकसान दायक हैं । ईमानदार चिकित्सा सिðांतों के तहत ऐसी दवाओं को औषधि के रूप में बेचना ही गैरकानूनी व अनैतिक है ।
वैसे आयरन की कमी को दूर करने के लिए आधारभूत दवा (फेरस सल्फेट) का उपयोग ही कारगर होता है। दवाई के क्षेत्र में कार्यरत् बहुराष्ट्ीय कंपनियां आंखों में धूल झोकते हुए आयरन के साथ कई ऐसे घटकों के मिश्रण का लुभावना फार्मूला पेश करती है, जो किसी भी चिकित्सा प्राधिकरण व्दारा मान्य ही नहीं होता हैं । ऐसी दवाओं को बेचने के लिए कंपनियां काकटेल पार्टी, भेंट आदि के जरिए कतिपय डाक्टरों को इस फरेब में शामिल करती हैं । लौह-तत्व की कमी पूरी करने के लिए दवाओं के बनिस्पत ऐसे फल-सब्जियों का सेवन करना चाहिए, जिन्हें काटने पर वे काले पड़ जाते हैं जैसे-बैंगन । दआज जरूरत इस बात की है कि सामान्य बीमारियों में की जा रही असामान्य दवाओं की आड़ में लोगों के साथ धोखा देने की बढ़ती प्रवर्ति के खिलाफ सशक्त उपभोक्ता आंदोलन खड़ा हो । इस अभियान में निश्चित ही डाक्टरों की भूमिका तो अहम होगी ही ।
पंकज चतुर्वेदी                              
नेशनल बुक ट्रस्ट                              
नई दिल्ली 110070                                            

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

Unsafe transportation to schools

DAINIK HINDUSTAN 26-7-14 http://paper.hindustantimes.com/epaper/viewer.aspx
बहुत कठिन है स्कूल तक की राह !
पंकज चतुर्वेदी

लोकमत, मराठी 26 जुलाई 2014


 तंेलंगाना के मेडक जिले में एक स्कूल बस के ट्रैन से भिड़ जाने के कारण 25 से ज्यादा बच्चों की मौत ने देशभर को हिला दिया है। पता तो यही चला है कि बस का चालक शार्ट कट मारना चाहता था । अभी जुलाई के पहले सप्ताह में ही नए सत्र के स्कूल खुले ही थे कि राजधानी दिल्ली में बच्चों को स्कूल ले जा रही एक आरटीवी दुर्घटनाग्रस्त हो गई और वाहन का चालक घायल बच्चों को तड़पता छोड़ भाग गया। वह तो भला हो राहगीरों का जिन्होंने दर्जनों बच्चों को अस्पताल तक पहुंचाया। ऐसा ना तो पहली बार हो रहा है और ना ही अकेले दिल्ली में हुआ है। शायद ही कोई ऐसा दिन जाता हो जब देश के किसी हिस्से में स्कूल की ओर जाते बच्चों के सड़क पर  मारे जाने की खबर ना आती हो। इसी तारतम्य में  सितंबर 2010 की राजधानी की एक घटना गौरतलब है। दिल्ली की पूसा रोड के एक बड़े स्कूल के तीन बच्चों का यौन शोषण उन्हें स्कूल तक लाने ले जाने का काम करने वाले वेन के चालक द्वारा करने का निर्मम कांड सामने आया। बच्चे अल्प आय परिवार से थे, सो उन लोगों से सड़क पर थोड़ा-बहुत गुस्सा निकाला। पुलिस ने भी आम धाराओं में मुकदमा कायम करने की रस्म अदायगी कर ली। इंसाफ के नाम पर मोमबत्तियां ले कर घूमने वाले सोशलाईटों को यह खबर भी नहीं कि 1-14  साल के इन मासूमों की मानसिक हालत खराब हो गई और जब पूरा देश बुराई-स्वरूप रावण का पुतला जला रहा था, तब उन बाल गोपालों को मानसिक चिकित्सालय में भर्ती करवाना पड़ा। पूरे मामले में स्कूल ने अपना यह कह कर हाथ झाड़ लिया कि उन बच्चों के परिवहन की व्यवस्था उनकी अपनी थी और उसका स्कूल से कोई लेना-देना नहीं है। 
देशभर में आए रोज ऐसे हादसे होते रहते हैं, जिसमें स्कूली बच्चे सड़क पर किसी अन्य की कोताही के चलते काल के गाल में समा जाते हैं । कोई एक दशक पहले दिल्ली के एक संकरे वजीराबाद पुल से एक सकूली बस के लुढ़कने से कई बच्चों की मौत के बाद सरकार ने अदालत की फटकार के बाद कई दिशा-निर्देश जारी किए थे । इनमें से अधिकांश कागजों पर जीवंत है। और जो व्यावसायिक हितों में आड़े आते हैं, वे हर रोज चैराहों पर बिकते दिख जाएंगे ।
पीपुल्ससमाचार२०जुलाई१६
बीते कुछ सालों के दौरान आम आदमी षिक्षा के प्रति जागरूक हुआ है, स्कलूों में बच्चों का पंजीकरण बढ़ा है। इसके साथ ही स्कूल में ब्लेक बोर्ड, षौचालय, बिजली, पुस्तकालय जैसे मसलों से लोगों के सरोकार बढ़े हैं।, लेकिन जो सबसे गंभीर मसला है कि बच्चे स्कूल तक सुरक्षित कैसे पहुंचें, इस पर ना तो सरकारी और ना ही सामाजिक स्तर पर कोई विचार हो पा रहा है। इसी की परिणति है कि आए रोज देषभर से स्कूल आ-जा रहे बच्चों की जान जोखिम में पड़ने के दर्दनाक वाकिए सुनाई देते रहते हैं। परिवहन को प्रायः पुलिस की ही तरह खाकी वर्दी पहनने वाले परिवहन विभाग का मसला मान कर उससे मुंह मोड़ लिया जाता है। असली सवाल तो यह है कि क्या दिल्ली ही नहीं देशभर के बच्चों को स्कूल आने-जाने के सुरक्षित साधन मिले हुए हैं । भोपाल, जयपुर जैसे राजधानी वाले शहर ही नहीं, मेरठ, भागलपुर या इंदौर जैसे हजारों शहरों से ले कर कस्बों तक स्कूलों में बच्चों की आमद जिस तरह से बढ़ी है, उसको देखते हुए बच्चों के सुरक्षित, सहज और सस्ते आवागमन पर जिस तरह की नीति की जरूरत है, वह नदारद है । विभिन्न विदेशी सहायता से संचालित हो रही ‘सर्व शिक्षा अभियान’ जैसी योजनाओं के कारण देशभर के स्कूलों में बच्चों की संख्या बढ़ी है, लेकिन बच्चे स्कूल तक पहुंचें कैसे ? इस पर सरकार ने सोचा तक नहीं हैं ।
दिल्ली के धुर पूर्व में उत्तर प्रदेश को छूती एक कालोनी है - दिलशाद गार्डन । दिलशाद गार्डन निम्न और मध्यम लोगों की बड़ी बस्ती हैं और उसके साथ ही सीमापुरी, ताहिरपुर जैसे लम भी हैं । इस कालोनी के दो किलोमीटर के क्षेत्रफल में 65 स्कूल हैं । अधिकांश प्राईवेट हैं तथा इनमें से कई 12वीं तक हैं । यहां लगभग 22 हजार बच्चे पढ़ते हैं । इन स्कूलों की अपनी बसों की संख्या बामुश्किल 20 हैं , यानी 1000-1500 बच्चे इनसे स्कूल आते हैं । शेष का क्या होता है ? यह देखना रोंगेटे खड़े कर देने वाला होता हैं । सभी स्कूलों का समय लगभग एक ही हैं , सुबह साढ़े सात से आठ बजे के बीच । यहां की सड़कें हर सुबह मारूती वेन, निजी दुपहिया वाहनों और रिक्शों से भरी होती हैं और महीने में तीन-चार बार  यहां घंटों जाम लगा होता हैं । पांच लोगों के बैठने के लिए परिवहन विभाग से लाईसेंस पाए वेन में 12 से 15 बच्चे ठुंसे होते हैं । अधिकतम तीन लोगों के बैठने लायक साईकिल रिक्शे पर लकड़ी की लंबी सी बैंच लगा कर दो दर्जन बच्चों को बैठाया हुआ होता हैं । अब तो पुराने स्कूटर के पीछे तीन पहिये लगा कर नये किस्म के ‘‘जुगाड़’’ सड़क पर देखने को मिल जाते हैं जिनमें पंद्रह तक बच्चे लादे होते हैं। हालंाकि इस किस्म का वाहन पूरी तरह गैरकाूनी होता है लेकिन ना तो अभिाभवक इसकी चिंता करते हैं और ना ही स्कूल, जाहिर है इस तरह की सभी गैरकाूनी गतिविधियां पुलिस के लिए हफ्ता वसूली का सहज माध्यम होते हैं सो उन्हें ऐसे वाहन दिखते ही नहीं हैं। दुपहिया पर बगैर हैलमेट लगाए अभिभावक तीन-तीन बच्चों को बैठाए रफ्तार से सरपट होते दिख जाते हैं । आए रोज एक्सीडेंट होते हैं, क्योंकि ठीक यही समय कालोनी के लोगों का अपने काम पर जाने का होता हैं । ऐसा नहीं है कि स्कूल की बसें निरापद हैं , वे भी 52 सीटर बसों में 80 तक बच्चे बैठा लेते हैं । यहां यह भी गौर करना जरूरी है कि अधिकांष स्कूलों के लिए निजी बसों को किराए पर ले कर बच्चों की ढुलाई करवाना एक अच्छा मुनाफे का सौदा है। ऐसी बसें स्कूल करने के बाद किसी रूट पर चार्टेड की तरह चलती हैं। तभी बच्चों को उतारना और फिर जल्दी-जल्दी अपनी अगली ट्रिप करने की फिराक में ये बस वाले यह ध्यान रखते ही नहीं है कि बच्चों का परिवहन कितना संवेदनषील मसला होता है। और तो और ऐसे स्कूल कड़ाके की ठंड में भी अपना समय नहीं बदलते हैं, क्योंकि इसके लिए उनकी बसों को देर होगी और इन हालातों में वे अपने अगले अनुबंध पर नहीं पहुंच सकेंगे।
ऐसे ‘‘दिलषाद गार्डन’’ अकेले दिल्ली ही नहीं, समूचे देष के चप्पे-चप्पे में संवेदनहीनता ही हद तक बच्चों की दुर्दषा पर मूक हैं।देश के हर उस शहर में जिसकी आबादी एक लाख के आसपास है, ठीक यही दृश्य देखा जा सकता हैं । यह सवाल उन लोगों का है जो देश का भविष्य कहलाते है। और उम्र के इस दौर में वे जो कुछ देख-सुन रहे हैं, उसका प्रभाव उन पर जिंदगीभर रहेगा । जब वे देखते हैं कि सड़क सुरक्षा या ट्राफिक कानूनों की धज्जियां उनका स्कूल या अभिभावक कैसे उड़ाते हैं तो उन बच्चों से कतई उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे देश के कानूनों का सम्मान करेंगे । हां, जरूरत पड़ने पर कुछ नारे जरूर लगा लेंगे  ।
ग्रामीण अंचलों में स्कूलों की दूरी,  आर्थिक-सामाजिक असमानताएं बच्चों के स्कूल पहुंचने में बाधक कारक रहे हैं । शहरी संस्कृति में लाख बुराईयों के बावजूद यह तो अच्छाई रही है कि यहां बच्चों को स्कूल भेजना, अच्छे से अच्छे स्कूल में भेजना सम्मान की बात माना जता हैं ।  छोटे शहरों में भी आबादी के लिहाज से सड़कों का सिकुडना तथा वाहनों की बेतहाशा बढ़ौतरी हुई हैं । इसका सीधा असर स्कूल जाने वाले बच्चों की सुरक्षा पर पड़ रहा हैं । पहले बच्चों को अकेले या ‘‘माईं’’ के साथ एक-दो किलोमीटर दूर स्कूल पैदल भेजने में कहीं कोई दिक्कत नहीं होती थी । समय भी दिन में 10 बजे से चार बजे तक का होता था, सो तैयार होने, स्कूल तक पहुंचने के लिए बच्चों के पास पर्याप्त समय होता था । अब तो बच्चों को सुबह  छह या साढ़े छह बजे घर से निकलना होता है और घर लौटने में चार बजना मामूली बात हैं । सड़क, ट्राफिक, असुरक्षा के बीच बच्चों के इस तरह ज्ञानार्जन से उनमें एक तरह की कुंठा,  हताशा और जल्दबाजी के विकार उपज रहे हैं । शहरों के स्कूलों का परिवहन खर्चा तो स्कूली फीस के लगभग बराबर है और इसे चुकाना कई अभिभावकों को बेहद अखरता हैं ।

जब सरकार स्कूलों में पंजीयन, शिक्षा की गुणवत्ता, स्कूल परिसर को मनेारंजक और आधुनिक बनाने जैसे कार्य कर रही है तो बच्चों के स्कूल तक पहुंचने की प्रक्रिया को निरापद बनाना भी प्राथमिकता की सूची में होना चाहिए । विडंबना है कि देषभर के केंद्रीय विद्यालयों के बच्चे भी निजी परिवहन के मनमाने रवैये का शिकार हैं । पब्लिक स्कूलों की परिवहन व्यवस्था भी बहुत कुछ निजी आपरेटरों के हाथ में हैं, जिन्हें बच्चों को स्कूल छोड़ कर तुरत-फुरत अपने अगले ट्रिप पर जाना होता है ।
इस दिशा में बच्चों के स्कूल का समय सुबह 10 बजे से करना, बच्चों के अचागमन के लिए सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था करना, स्कूली बच्चों के लिए  प्रयुक्त वाहनों में ओवरलोडिंग या अधिक रफ्तार से चलाने पर कड़ी सजा का प्रावधान करना, साईकिल रिक्शा जैसे असुरक्षित साधनों पर या तो रोक लगाना या फिर उसके लिए कड़े मानदंड तय करना समय की मंाग हैं । आज दिल्ली में वैन के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया का सीधा असर बच्चों के अभिभावकों पर पड़ना हैं । नए टैक्सों व कानूनों के कारण बढ़े खर्चे को उन्हें ही भोगता होगा । जाहिर है कि खर्चा कम करने के लिए वे हथकंडे अपनाए जाएंगे जिनसे कानून टूटता हैं ।
सरकार में बैठे लोगों को इस बात को आभास होना आवश्यक है कि बच्चे राष्ट्र की धरोहर हैं तथा उन्हें पलने-बढ़ने-पढ़ने और खेलने का अनुकूल वातावरण देना समाज और सरकार दोनों की  नैतिक व विधायी जिम्मेदारी हैं । नेता अपने आवागमन और सुरक्षा के लिए जितना धन व्यय करते हैं, उसके कुछ ही प्रतिशत धन से बच्चों को किलकारी के साथ स्कूल भेजने की व्यवस्था की जा सकती हैं ।

पंकज चतुर्वेदी
नेशनल बुक ट्रस्ट
नई दिल्ली-70

गुरुवार, 24 जुलाई 2014

How to use Road? no manners in India

DAINIK JAGRAN NATIONAL EDITION 25-7-14http://epaper.jagran.com/epaper/25-jul-2014-262-delhi-edition-national.html


कौन सिखाएगा सड़क-संस्कार ?
पंकज चतुर्वेदी

मध्यप्रदेष में सड़कों पर बहुत बड़े-बडे होर्डिग पर एक कार्टून लगा है  जिसमें बुरी तरह टूटी सड़क पर चल रहा एक स्कूटर चालक मुख्यमंत्री से पूछ रहा है -‘‘यह सड़क कहां जाती है ?’’ जवाब में मुख्यमंत्री कह रहे हैं - ‘‘कुछ मंत्री की जेब में । कुछ विधायक व ठेकेदार की जेब में । बांकी कार्यकर्ताओं में बंट जाती है।’’ हकीकत में यह धारणा पूरे देष के हर राज्य में आम लोगों की है। अभी बारिष षुरू ही हुई है राजधानी दिल्ली से लेकर गांव-कस्बे तक सभी मार्ग को बुरी तरह छेद वाले हो गए हैं। देषभर में बाईस लाख करोड़ खर्च कर सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है । ष्वेत क्रांति व हरित क्रांति के बाद अब देष सड़क-क्रांति की ओर अग्रसर है । यह तो जान लेना चाहिए कि सड़क निर्माण पर खर्च होने वाली राषि कहीं आसमान से नहीं टपकेगी । यह हमारी-तुम्हारी जेब से ही निकाली जाएगी , टैक्स के नाम पर या और किसी माध्यम से । इतनी बड़ी राषि खर्च कर तैयार सड़कों का रखरखाव भी महंगा होगा । अभी तक देष में बिछी सड़कों के जाल के रखरखाव पर सालाना खर्च इससे भी अधिक होता है। इतना होने के बावजूद देष की राजधानी दिल्ली से ले कर हर राज्य के कोने -कोने तक जनता यही झींकती मिलती है कि सड़कों की हालत बेहजद ख्,ाराब है । मुंबई, बंगलौर, कोलकता जैसे महानगरों स ेले कर छोटे कस्बों तक में एक बारिष में सड़क व गड्ढ़ों का भेद समाप्त हो जाता है । एक तो निर्माण का स्तर घटिया होता है ऊपर से समाज उन सड़कों का इस्तेमाल बेहद निर्ममता से करता है।
लेकिन यह नसीहत कौन दे कि कि लोगों को अब सड़क-इस्तेमाल करने के संस्कार सीखने होंगे । अभिप्राय तो सही तरीके से ड्रायविंग या पैदल चलने वालों को रास्ता देने के षिश्टाचार से होगा । यह एक चिंता का विशय है कि जिस देष में हर साल लगभग एक लाख लोग सड़क हादसों में मारे जा रहे हों, वहां तेज गति के वाहन चलने वाले सुपरफास्ट एक्सप्रेस वे बनाना कहां तक न्यायोचित व प्रासंगिक है ? एक्सप्रेस वे पर चलने के सामान्य षिश्टाचार की धज्जियां उड़ती देखना हो तो राजधानी दिल्ली से 30-40 किमी दूरी पर मथुरा या करनाल हाईवे पर देख सकते हैं । यहां विपरीत दिषा में चलते वाहन, बैलगाड़ी या ट्रैक्टर का मनमाने तरीके से संचालन, ‘‘जुगाड’’़ जैसे गैरकानूनी वाहनों में भरी भीड़ व ओवरलोड टैंपों या बसों की भागमभाग , ओवरटक करते वाहन देखे जा सकते हैं । सड़क के व्यस्ततम समय में टोल नाकों पर वाहनों की लंबी लाईन, और वहां पहले निकलने की जुगाड़ में एक दूसरे को धकियाते वाहन और उनको नियंत्रित करने वाली किसी व्यवस्था का न होना दर्षाता है कि हिंदुसतान के लेाग अभी ऐसी सड़कों पर चलने के लायक नहीं हैं । साथ ही हमारी व्यवस्थाएं भी इतनी चाक चैबंद नहीं हैं कि 100 या 120 किमी प्रतिघंटे की गति से वाहन दौड़ाने वाली सड़कों पर ख्ूानी खेल होने से रोक सके । सुपरफास्ट ट्राफिक के लिए बनी सड़कों के फ्लाई ओवरों पर साईकल रिक्शा, या रेहड़ी का बीच में ही अटक जाना व उसके पीछे ओटोमोबाईल वाहनों का रेंगना सड़क के साथ-साथ इंघन की भी बर्बादी करता है, लेकिन इस की देखभाल के लिए कोई नहीं है ।
कुल मिला कर हमारी सोच बेहद थोथी है । दिल्ली से ग्रेटर नोएडा के बीच सरपट रोड के दोनो ओर अब मकान और दुकान ही देखने लगे हैं । गे्रटर नोएडा से आगरा के बीच ताज एक्सप्रेस वे पर पांच नए शहर बसाने के लिए बड़े-बड़े प्राईवेट बिल्डरों को ठेका दिया जा रहा है । जाहिर है कि यहां की संभावित लाखों-लाख आबादी अपने दैनिक उपयोग के लिए इसी एक्सप्रेस -वे का इस्तेमाल करेगी । इस पर इक्का-तांगा भी चलेंगे और साईकिल और रिक्शा भी ।  जाहिर है कि इस सड़क की हालत बहुत-कुछ राजधानी दिल्ली की आउटर रिंग रोड की तरह हो जाएगी । भले ही पाकिस्तान की वित्तीय व प्रशासनीक स्थिति हमसे देायम हो, लेकिन वहां यूरोप-अमेरिका की तर्ज पर हाईवे पर चप्पे-चप्पे पर कैमरे लगे हैं । हाईवे पर कम स्पीड के वाहन चलने पर पाबंदी है और बेतरतीब गाड़ी पार्क करने का मतलब तत्काल भारी जुर्माना हैं । यही नहीं निर्धारित स्पीड से अधिक पर गाड़ी चलाने पर कैमरे में कैद हो कर भारी जुर्माना लगाया जाता हैं ।  लेकिन हमारे देश में एक भी सड़क ऐसी नहीं है, जिस पर कानून का राज हो । गोपीनाथ मुंडे, राजेश पायलेट, साहिब सिंह वर्मा जैसे कद्दावर नेताओं को हम सड़क की साधारण लापरवाहियों के कारण गंवा चुके हैं । लेकिन सरकार में बैठे लोग माकूल कानूनों के प्रति बेपरवाह हैं ।
सड़कों पर इतना खर्च हो रहा है, उसके रखरखाव करने वाले महकमों के वेतन व सुविधाओं पर हर रोज लगभग दो करोड़ रूपए खर्च हो रहे हैं इसके बावजूद सड़कों पर चलना यानी अपने को, सरकार को व उस पर चल रहे वाहनों को कोसने का नाम हो गया है । पहले तो देखें कि सड़क की दुर्गति कैसे होती है । सड़कों के निर्माण में नौसिखियों व ताकतवर नेताओें की मौजूदगी कमजोर सड़क की नींव खोेद देती है । यह विडंबना है कि देषभर में सड़क बनाते समय उसके सुपरवीजन का काम कभी कोई तकनीकी विषेशज्ञ नहीं करता है । सड़क ढ़ालने की मषीन के चालक व एक मुंषी, जो बामुष्किल आठ दर्जा पास होता है, सड़क बना डालता है । यदि कुछ विरले मामलों को छोड़ दिया जाए तो सड़क बनाते समय डाले जाने वाले बोल्डर, रोड़ी, मुरम की सही मात्रा कभी नहीं डाली जाती है । षहरों में तो सड़क किनारे वाली मिट्टी उठा कर ही पत्थरों को दबा दिया जाता है । कच्ची सड़क पर वेक्यूम सकर से पूरी मिट्टी साफ कर ही तारकोल डाला जाना चाहिए, क्योंकि मिट्टी पर गरम तारकोल वैसे तो चिपक जाता है, लेकिन वजनी वाहन चलने पर वहीं से उधड़ जाता है । इस तरह के वेक्यूम-सकर से कच्ची सड़क की सफाई कहीं भी नहीं होती है । हालांकि इसे बिल जरूर फाईलों में होते है।  इसी तरह सड़क बनाने से पहले पक्की सड़क के दोनों ओर कच्चे में खरंजा लगाना जरूरी होता है । यह तारकोल को फल्ने से रोकता है व इस में राड़ी मिल कर खरंजे के दवाब में एक सांचे सी ढ़ल जाती है । आमतौर पर ऐसे खरंजे कागजों में ही सिमटे होते हैं । कहीं ईंटें बिछाई भी जाती हे। तो उन्हें मुरम या सीमेंट से जोड़ने की जगह महज वहां से खोदी मिट्टी पर टिका दिया जाता है । इससे थोड़ा पानी पड़ने पर ही ईंटें ढ़ीली हो कर उखड़ आती हैं । यहां से तारकोल व रोढ़ी के फैलव व फटाव की शुरूआत होती है ।
सही सुपरवीजन नहीं होने के कारण सड़क का ढलाव ठीक न होना भी सड़क कटने का बड़ा कारण है । सड़क बीच में से उठी हुई व सिरों पर दबी होना चाहिए, ताकि उस पर पानी पड़ते ही किनारों की ओर बह जाए । लेकिन षहरी सड़कों का तो कोई लेबल ही नहीं होता है । बारिष का पानी यहां-वहां बेतरतीब जमा होता है और यह जान लेना जरूरी है कि पानी सड़क का सबसे बड़ा दुष्मन है । सड़क किनारे नालियों की ठीक व्यवस्था न होना भी सड़क की दुष्मन है । नालियों का पानी सड़क के किनारों को काटता रहता है । एक बार तारकोल कटा तो वहां से गिट्टी, बोल्डर का निकलना रुकता नहीं है ।
सड़कों की दुर्गति में हमारे देष का उत्सव-धर्मी चरित्र भी कम दोशी नहीं है । महानगरों से ले कर सुदूर गांवों तक घर में षादी हो या भगवान की पूजा, किसी राजनैतिक दल का जलसा हो या मुफत लगा लंगर ; सड़क के बीचों-बीच टैंट लगाने में कोई संकोच नहीं होता है । टैंट लगाने के लिए सड़कों पर चार-छर्ह इंच गोलाई व एक फीट गहराई के कई छेद करे जाते हैं । उत्सव समाप्त होने पर इन्हें बंद करना अपनी षान में गुस्ताखी माना जाता है । इन छेदों में पानी भरता है और सड़क गहरे तक कटती चली जाती है । कुछ दिनेंा बाद कटी-फटी सड़क के लिए सरकार को कोसने वालों में वे भी षामिल होते हैं ,जिनके कुकर्मों का खामियाजा जनता के पैसे से बनी सड़क को उठाना पड़ रहा होता है ।
नल, टेलीफोन, सीवर , पाईप गैस जैसे कामों के लिए सरकारी मकहमे भी सड़क को चीरने में कतई दया नहीं दिखाते हैं । सरकारी कानून के मुताबिक इस तरह सड़क को नुकसान पहुंचाने से पहले संबंधित महकमा स्थानीय प्रषासन के पास सड़क की मरम्मत के लिए पैसा जमा करवाता है । लेकिन सड़कों की दुर्गति यथावत रहती है । नया मकान बनाने या मरम्मत करवाने के लिए सड़क पर ईंटें, रेत व लोहे का भंडार करना भी सड़क की आयु घटाता है । हमारे देया की नई कालेानियों में भी पानी की मुख्य लाईन का पाईप एक तरफ ही होता है, यानी जब दूसरी ओर के बाशिंदे को अपने घर तक पाईप लाना है तो उसे सउ़क खोदना ही होगा । एक बार खुदी सड़क की मरम्मत लगभग नामुमकिन हेाती है । सड़क पर घ्टिया वाहनोें का संचालन भी उसका बड़ा दुश्मन है । यह दुनिया में शायद भारत में ही देखने को मिलेगा कि सरकारी बसें हों या फिर डग्गामारी करती जीपें, निर्धारित से दुगनी तक सवारी भरने पर रोक के कानून महज पैसा कमाने का जरिया मात्र हाते हैं । ओवरलोड वाहन, खराब टायर, दोयम दर्जे का ईंधन ये सभी बातें भी सरकार के चिकनी रोड के सपने को साकार होने में बाधाएं हैं ।
सवाल यह खड़ा होता है कि सड़क-संस्कार सिखाएगा कौन ? ये संस्कार सड़क निर्माण में लगे महकमों को भी सीखने होगंे और उसकी योजना बनाने वाले इंजीनियरों को भी । संस्कार से सज्जित होने की जरूरत सड़क पर चलने वालों को भी है और यातायात व्यवस्था को ठीक तरह से चलाने के जिम्मेदार लोगों को भी । सड़क के संस्कार अक्षुण्ण रहें , यह सुनिष्चित करने का जिम्मा उन एजंसियों का भी है जो सड़क से टोल टैक्स उगाह रहे हैं तो उन लोगों पर भी जो अपने रूतबे या भदेसपन का नाजायज फायदा उठा कर सड़क के कानूनों को तोड़ते हैं । सड़क घेर कर उत्सव मनाने वालों या उस पर बिल्डिंग मटैरियल फैलाने वालों पर पर कड़ी कानूनी कार्यवाही करना महति है ,क्योंकि सुदर सड़कें किसी राश्ट्र की प्रगति की प्रतीक हैं और सड़क पर अनाधिकृत कब्जा करने वाले देष की प्रगति के बाधक हैं ।
वैसे तो यह समाज व सरकार दोनों की साझा जिम्मेदारी है कि सड़क को साफ, संुदर और सपाट रखा जाए । लेकिन हालात देख कर लगता है कि कड़े कानूनों के बगैर यह संस्कार आने से रहे ।

पंकज चतुर्वेदी
नेषनल बुक ट्रस्ट
5 नेहरू भवन
वसंत कुंज इंस्टीट्यूषनल एरिया‘-2
नई दिल्ली-110070

रविवार, 20 जुलाई 2014

DAFAN HOTE DARIYA, My book on traditional water tanks is now in paperback

देश के कुछ प्रमुख तालाबों पर मेरी पुस्‍तक ''दफन हाते दरिया'' अब पेपर बेक में आ गई हैा प्रकाशक ने मेरे अनुरोध पर इसकी कीमत भी बेहद वाजिब रखी हैा मात्र रू 195/ इस पुस्‍तक में कश्‍मीर से ले कर मणिपुर व कन्‍याकुमारी से ले कर दिल्‍ली तक के तालाबों की दशिा व दशा पर मेरा शेध है लगभग साढे तीन साल लगे थे इसे पूरा करने में , इसका हार्ड बाउंड तो फरवरी में ही आ गया था, लेकिन पेपर बेक ज्‍यादा आकर्षक है , इसे आप इस पते से मंगवा सकते हैं यश पब्लिकेशंस, 1 /10753, गली नं 3 सुभाष पार्क, नवीन शाहदरा, कीर्ति मंदिर के पास, दिल्‍ली 110032 संपर्क 9899938522 http://www.yashpublications.com/ आन लाईन खरीदने के लिए यह लिंक है http://www.hindibook.com/index.php?p=sr&Uc=HB-401957 और http://www.amazon.in/Books-Pankaj-Chaturvedi/s?ie=UTF8&page=1&rh=n%3A976389031%2Cp_27%3APankaj+Chaturvedi — with Ashish Garg and 4 others.

शनिवार, 19 जुलाई 2014

AYURVED FOR SAFE AGRICULTURE

AMAR UJALA 20-7-14http://epaper.amarujala.com/svww_index.php

वृक्षायुर्वेद यानि सस्ती व सुरक्षित खेती की परंपरा
                                       पंकज चतुर्वेदी


बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए अधिक पैदावार का दवाब लगातार जमीन के सत्व को खत्म कर रहा है । हरित क्रांति की नई आंधी सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को ही मार रही है । खेतों में बढ़ती उर्वरकों की मात्रा का ही दुष्परिणाम है कि जमीन के पोषक तत्व जिंक, लोहा, तांबा, मैगजीन, आदि लुप्त होते जा रहे हैं । दूसरी तरफ कीटनाशकों के बढ़ते इस्तेमाल से खाद्ध पदार्थ जहरीले हो रहे हैं । यह बात प्रमाणित हो चुकी है कि भारतीय लोग दुनिया भर के लोगों के मुकाबले कीटनाशकों के सबसे ज्यादा अवशेष अपने भोजन के साथ पेट में पहुंचाते हैं । हमारी अर्थ व्यवस्था के मूल आधार खेती व पशुपालन की इस दुर्दशा से हताश वैज्ञानिकों की निगाहें अब प्राचीन मान्यताओं और पुरातनपंथी मान लिए गए शास्त्रों पर गई है ।

कुछ साल पहले थियोसोफीकल सोसायटी, चैन्नई में कोई पचास से अधिक आम के पेड़ रोगग्रस्त हो गए थे । आधुनिक कृषि-डाक्टरों को कुछ समझ नहीं आ रहा था । तभी समय की आंधी में कहीं गुम हो गया सदियों पुराना ‘‘वृक्षायुर्वेद’’ का ज्ञान काम आया । सेंटर फार इंडियन नालेज सिस्टम (सीआईकेएस) की देखरेख में नीम और कुछ दूसरी जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल किया गया । देखते ही देखते बीमार पेड़ों में एक बार फिर हरियाली छा गई । ठीक इसी तरह चैन्नई के स्टेला मेरी कालेज में बाटनी के छात्रों ने जब गुलमेंहदी के पेड़ में ‘‘वृक्षायुर्वेद’’ में सुझाए गए नुस्खों का प्रयोग किया तो पता चला कि पेड़ में ना सिर्फ फूलों के घने गुच्छे लगे , बल्कि उनका आकार भी पहले से बहुत बड़ा था । वृक्षायुर्वेद के रचयिता सुरपाल कोई एक हजार साल पहले दक्षिण भारत के शासक भीमपाल के राज दरबारी थे । वे वैद्ध के साथ-साथ अच्छे कवि भी थे । तभी चिकित्सा सरीखे गूढ़ विषय पर लिखे गए उनके ग्रंथ वृक्षायुर्वेद को समझने में आम ग्रामीण को भी कोई दिक्कत नहीं आती है ।उनका मानना था कि जवानी,आकर्षक व्यक्तित्व, खूबसूरत स्त्री,बुद्धिमान मित्र, कर्णप्रिय संगीत, सभी कुछ एक राजा के लिए अर्थहीन हैं, यदि उसके यहां चित्ताकर्षक बगीचे नहीं हैं । सुरपाल के कई नुस्खे अजीब हैं -जैसे, अशोक के पेड़ को यदि कोई महिला पैर से ठोकर मारे तो वह अच्छी तरह फलता-फूलता है , या यदि कोई सुंदर महिला मकरंद के पेड़ को नाखुनों से नोच ले तो वह कलियों से लद जाता है । सुरपाल के कई नुस्खेे आसानी से उपलब्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित हैं । महाराष्ट्र में धोबी कपड़े पर निशान लगाने के लिए जिस जड़ी का इस्तेमाल करते हैं, उसे वृक्षायुर्वेद में असरदार कीटनाशक निरुपित किया गया है । भल्लाटका यानि सेमीकार्पस एनाकार्डियम का छोटा सा टुकड़ा यदि भंडार गृह में रख दिया जाए तो अनाज में कीड़े नहीं लगते हैं और अब इस साधारण सी जड़ी के उपयोग से केंसर सरीखी बीमारियों के इलाज की संभावनाओं पर शोध चल रहे हैं ।
पंचामृत यानि गाय के पांच उत्पाद- दूध,दही,घी,गोबर और गौमू़़़त्र के उपयोग से पेड़-पौधों के कई रोग जड़ से दूर किए जा सकते हैं ।‘ वृक्षायुर्वेद ’ में दी गई इस सलाह को वैज्ञानिक रामचंद्र रेड्डी और एएल सिद्धारामैय्या ने आजमाया । टमाटर के मुरझाने और केले के पनामा रोग में पंचामृत की सस्ती दवा ने सटीक असर किया । इस परीक्षण के लिए टमाटर की पूसा-रूबी किस्म को लिया गया सुरपाल के सुझाए गए नुस्खे में थोड़ा सा संशोधन कर उसमें यीस्ट और नमक भी मिला दिया गया । दो प्रतिशत घी, पांच प्रतिशत दही और दूध, 48 फीसदी ताजा गोबर, 40 प्रतिशत गौ मूत्र के साथ-साथ 0.25 ग्राम नमक और इतना ही यीस्ट मिलाया गया । ठीक यही फार्मूला केले के पेड़ के साथ भी आजमाया गया, जो कारगर रहा ।
सीआईकेएस में बीते कई सालों से  वृक्षायुर्वेद और ऐसे ही पुराने ग्रंथों पर शोध चल रहे हैं । यहंा बीजों के संकलन, चयन, और उन्हें सहेज कर रखने से ले कर पौधों को रोपने, सिंचाई, बीमारियों से मुक्ति आदि की सरल पारंपरिक प्रक्रियाओं को लोकप्रिय बनाने के लिए आधुनिक डिगरियों से लैस कई वैज्ञानिक प्रयासरत हैं । पशु आयुर्वेद, सारंगधर कृत उपवन विनोद और वराह मिरीह की वृहत्त्त संहिता में सुझाए गए चमत्कारी नुस्खों पर भी यहां काम चल रहा है । सीआईकेएस में वैज्ञानिक डा के विजयलक्ष्मी अपने बचपन का एक अनुभव बताती हैं कि उनके घर पर लौकी की एक बेल में फूल तो खूब लगते थे, लेकिन फल बनने से पहले झड़ जाते थे ।एक बूढ़े माली ने उस पौधे के पास एक गड्ढा खोद कर उसमें हींग का टुकड़ा दबा दिया । दो हफ्ते में ही फूल झड़ना बंद हो गए और उस साल सौ से अधिक फल लगे । डा विजयलक्ष्मी ने इस घटना के 15 साल बाद जब वृक्षायुर्वेद का अध्यन किया तो पाया कि हींग मूलरूप से ‘वात दोष’ के निराकरण में प्रयुक्त होती है । फूल से फल बनने की प्रक्रिया में ‘वात दोष’ का मुख्य योगदान होता है । इसकी मात्रा में थोड़ा भी असंतुलन होने पर फूल झड़ने लगते हैं । सनद रहे हींग भारतीय रसोई का आम मसाला है और इसका इस्तेमाल मानव शरीर में वात दोष निवारण में होता है । वृक्षायुर्वेद का दावा है कि मानव शरीर की भांति पेड़-पौधों में भी वात, पित्त और कफ के लक्षण होते हैं और इनमें गड़बड़ होने पर वनस्पति बीमार हो जाती हैं ।
इसी प्रकार मवेशियों की सामान्य बीमारियों के घरेलू इलाज के लिए रचित ‘पशु-आयुर्वेद’ भी इन दिनों खासा लोकप्रिय हो रहा है । इस प्राचीन ग्रंथ में पशुओं के जानलेवा रोग खूनी दस्तों की दवा ‘कुटजा’ को बताया गया है । ‘होलोरेना एंटीडायसेंट्रीका’ के वैज्ञानिक नाम वाली यह जड़ी बड़ी सहजता से गांव-खेजों में मिल जामी है । आंव-दस्त में यह बूटी इतनी सुरक्षित है कि इसे नवजात शिशु को भी दिया जा सकता है । ‘पशु-आयुर्वेद’ के ऐसे ही जादुई नुस्खों पर दो कंपनियों ने दवाईयां बना कर बेचना शुरू कर दिया है ।
खेती-किसानी के ऐसे ही कई हैरत अंगेज नुस्खे भारत के गांव-गांव में पुराने, बेकार या महज भावनात्मक साहित्य के रूप में बेकार पड़े हुए हैं । ये हमारे समृद्ध हरित अतीत का प्रमाण तो हैं ही, प्रासंगिक और कारगर भी हैं । अब यह बात सारी दुनिया मान रही है कि प्राचीन भारतीय ज्ञान के इस्तेमाल से कृषि की लागत घटाई जा सकती है । यह खेती का सुरक्षित तरीका भी है, साथ ही इससे उत्पादन भी बढ़ेगा ।

पंकज चतुर्वेदी
यूजी-1, 3/186 ए राजेन्द्र नगर
सेक्टर-2
साहिबाबाद
गाजियाबाद 201005
9891928376, 0120-4241060
                                

शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

YES WE ARE VIOLANT

RAJ EXPRESS BHOPAL 19-7-14http://epaper.rajexpress.in/Details.aspx?id=228064&boxid=33262242
हम  मूलरूप से हिंसक ही हैं !
पंकज चतुर्वेदी
भारत की आजादी की लड़ाई या समाज के बारे में देष-दुनिया की कोई भी किताब या नीति पढ़े ंतो पाएंगे कि हमारा मुल्क अहिंसा के सिद्धांत चलता है। एक वर्ग जो अपने पर ‘‘पिलपिले लोकतंत्र’ का आरोप लगवा कर गर्व महसूस करता है, खुद को गांधीवादी बाता है तो दूसरा वर्ग जो गांधी को देष के लिए अप्रासंगिक और बेकार मानता है वह भी ‘देष की गांधीवादी’(?) नीतियों को आतंकवाद जैसी कई समस्याओं का कारक मानता है। असल में इस मुगालते का कभी आकलन किया ही नहीं गया कि क्या हम गांधीवादी या अहिंसक हैं? आए रोज की छोटी-बड़ी घटनाएं गवाह हैं कि हम भी उतने ही हिंसक और अषांति प्रिय हैं जिसके लिए हम पाकिस्तान या अफगानिस्तान या अमेरिरका को कोसते हैं। भरोसा ना हो तो अफजल गुरू या कसाब की फंासी के बाद आए बयान, जुलूस, मिठाई बांटने, बदला पूरा होने, कलेजे में ठंडक पहुंचने की अनगिनत घटनाओं को याद करें। उ.प्र के मुरादाबाद में एक मंदिर से लाउड स्पीकर उतारने मात्र के बवाल पर ट्रेन की पटरी व कलेक्टर की आंख उखाड देने जैसी घटनाएं आए  रोज हो रही हैं। जाहिर है कि बदला पूरा होने की बात करना हमारे मूल हिंसक स्वभाव का ही प्रतीक है।
यह सवाल क्यों खड़ा कर रहा हूं ? इंसानियत या इंसान को कटघरे में खड़ा करने के लिए नहीं , बलिक इस लिए कि यदि एक बार हम मान लेगंे कि हमारे साथ कोई समस्या है तो उसके निदान की अनिवार्यता या विकल्प पर भी विचार करेंगे। जब सिद्धांततः मानते हैं कि हम तो अहिंसक या षांतिप्रिय समाज हैं तो  यह स्वीकार नहीं कर रहे होते हैं कि हारे समाज के सामने कोई गूढ समस्या है जिसका निदान महति है। अफजल  गुरू या कसाब की फंासी पर आतिषबाजी चलाना, या मिठाई बांटना उतना ही निंदनीय है जितना उनको मुकर्रर अदालती सजा के अमल का विरोध । जब समाज का कोई वर्ग अपराधी की फंासी पर खुषी मनाता है तो एकबारगी लगता है कि वह उन निर्दोश लोगों की मौत और उनके पीछे छूट गए परिवार के स्थाई दर्द की अनदेखी कर रहा है। ऐसा इसी लिए होता है क्योंकि समाज का एक वर्ग मूलरूप् से हिंसा-प्रिय है। देष में आए रोज ऐसे प्रदर्षन, धरने, षादी-ब्याह, धार्मिक जुलूस देखे जा सकते हैं जो उन आत्ममुग्ध लोगों के षक्ति प्रदर्षन का माध्यम होते हैं और उनके सार्वजनिक स्थान पर बलात अतिक्रमण के कारण हजारों बीमार, मजबूर, किसी काम के लिए समय के के साथ दौड़ रहे लोगों के लिए षारीरिक-मानसिक पीड़ादायी होते हैं। ऐसे नेता, संत, मौलवी बेपरवाह होते हैं उन हजारों लेागों की परेषानियों के प्रति। असल में हमारा समाज अपने अन्य लोगों के प्रति संवेदनषील ही नहीं है क्योंकि मूलरूप से हिंसक-कीड़ा हमारे भीतर कुलबुलाता है। ऐसी ही हिंसा, असंवेदनषीलताऔर दूसरों के प्रति बेपरवाही के भाव का विस्तार पुलिस, प्रषासन और अन्य सरकारी एजेंसियो मं होता हे। हमारे सुरक्षा बल केवल डंडे  - हथियार की ताकत दिखा कर ही किसी समस्या का हल तलाषते हैं।
हकीकत तो यह है कि देष के ‘अहिंसा-आयकान’ गांधीजी अपने अंतिम दिनों के पहले ही यह जान गए थे कि उनके द्वारा दिया गया अहिंसा का पाठ महज एक कमजोर की मजबूरी था। तभी जैसे ही आजादी और बंटवारे की बात हुई समग्र भारत में दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा कत्लेआम हो गया। जून-जुलाई 1947 में गांधीजी ने अपने दैनिक भाशण में कह दिया था -‘‘ परंतु अब 32 वर्श बाद मेरी आंख खुली है। मैं देखता हूं कि अब तक जो चलती थी वह अहिसा नहीं है, बल्कि मंद-विरोध था। मंद विरोध वह करता है जिसके हाथ में हथियार नहीं होता। हम लाचारी से अहिंसक बने हुए थे, मगर हमारे दिलों में तो हिंसा भरी हुई थी। अब जब अंग्रेज यहां से हट रहे हैं तो हम उस हिंसा को आपस में लड़ कर खर्च कर रहे हैं।’’ गांधीजी अपने आखिरी दिनों इस बात से बेहद व्यथित, हताष भी थे कि वे जिस अहिंसा के बल पर अंग्रेजों को देष से निकालने का दावा करते रहे थे , वह उसे आम लोगों में स्थापित करने में असफल रहे थे। कैसी विडंबना है कि जिस हिंसा को ले कर गांधी दुखी थे, उसी ने उनकी जान भी ली।
षायद हमें उसी दिन समझ लेना था कि भारत का समाज मूल रूप से हिंसक है, हमारे त्योहर-पर्व में हम तलवारें चला कर , हथियार प्रदर्षित कर खुष होते हैं। हमारे नेता सम्मान में मिली तलवारें लहरा कर गर्व महसूस करते हैं। आम लोग भी कार में खरोंच, गली पर कचरे या एकतरफा प्यार में किसी की हत्या रकने में संकोच नहीं करता हे। अपनी मांगों को समर्थन में हमारे धरने-प्रदर्षन दूसरों के लिए आफत बन कर आते हैं,लेकिन हम इसे लोकतंत्र का हिस्सा जता कर दूसरों की पीड़ा में अपना दवाब  होने का दावा करते हैं।
हम आजादी के बाद 67 सालों में छह बड़े युद्ध लड़ चुके हैं जिनमें हमारे कई हजार सैनिक मारे जा चुके हैं। हमारे मुल्क का एक तिहाई हिस्सा  सषस्त्र अलगाववादी आंदोलनों की चपेट में हैं जहां सालाना तीस हजार लोग मारे जाते हैं, जिनमें सुरक्षा बल भी षामिल हैं। देष में हर साल पैंतीस से चालीस हजार लोग आपसी दुष्मनियों में मर जाते हैं जो दुनिया के किसी देष में हत्या की सबसे बड़ी संख्या होती है। हमारा फौज व आंतरिक सुरक्षा का बजट स्वास्थ्य या षिक्षा के बजट से बहुत ज्यादा होता है।
हम क्यों मान लें कि हम हिंसक समाज हैं ? हमें स्वीकार करना होगा कि असहिश्णुता बढ़ती जा रही है। यह सवाल आलेख के पहले हिस्से में भी था। यदि हम यह मान लेते हैं तो हम अपनी षिक्षा, संस्कार, व्यवस्था, कानून में इस तरह की तब्दीली करने पर विचार कर सकते है जो हमारे विषाल मानव संसाधन के सकारात्मक इस्तेमाल में सहायक होगी। हम गर्व से कह सकेंगे कि जिस गांधी के जिस अहिंसा के सिद्धांत को नेल्सन मंडेला से ले कर बराक हुसैन ओबामा तक सलाम करते रहे हैं; हिंदुस्तान की जनता उस पर अमल करना चाहती है।

Flood : men made disaster

बाढ़ की विभीषिका का सच


पंकज चतुव्रेदी
RASHTRIY SAHARA 19-7-14 http://rashtriyasahara.samaylive.com/newsview.aspx?eddate=7/19/2014%2012:00:00%20AM&pageno=10&edition=9&prntid=75016&bxid=155813641&pgno=10

यह त्रासदी ही है कि देश के कुछ हिस्सों में बेशक सूखे के हालात हों और कागजों में सूखा दर्ज हो रहा हो लेकिन बरसात के मौसम में देश के बड़े भाग में नदियों के उफन कर तबाही मचाने की खबरे भी समानांतर आने लगती हैं। पिछले कुछ सालों के आंकड़ें देखें तो पाएंगे कि बारिश बेशक कम हुई, लेकिन बाढ़ से तबाह हुए इलाके में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। कुछ दशकों पहले जिन इलाकों को बाढ़ मुक्त क्षेत्र माना जाता था, अब वहां की नदियां भी उफनने लगी हैं और मौसम बीतते ही, उन इलाकों में एक बार फिर पानी का संकट छा जाता है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 1951 में बाढ़ग्रस्त भूमि की माप एक करोड़ हेक्टेयर थी। 1960 में यह ढाई करोड़ हेक्टेयर हो गई । 1978 में बाढ़ से तबाह जमीन 3.4 करोड़ हेक्टेयर थी और 1980 में यह आंकड़ा चार करोड़ पर पहुंच गया। अभी यह तबाही कोई सात करोड़ हेक्टेयर होने की आशंका है। सूखे के लिए कुख्यात राजस्थान भी नदियों के गुस्से से अछूता नहीं रह पाता है। देश में बाढ़ की पहली दस्तक असम में होती है। असम का जीवन कही जाने वाली ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां मई-जून के मध्य में ही विकराल होने लगती हैं। हर साल लाखों लोग बाढ़ पीड़ित शरणार्थी बनकर भटकने लगते हैं। सरकार उन्हें कुछ तात्कालिक सहायता तो देती है लेकिन बाढ़ प्रभावित बस्तियों को सुरक्षित स्थान पर बसाने के लिए कभी नहीं सोचा गया। बाढ़ से उजड़े लोगों को पुनर्वास के नाम पर एक बार फिर वहीं बसा दिया जाता है, जहां छह महीने बाद जल प्लावन होना तय होता है। पहाड़ों की बेतरतीब खुदाई, अनियोजित शहरीकरण और सड़कों का निर्माण इस राज्य में बाढ़ से तबाही के लिए काफी हद तक जिम्मेदार है। देश के कुल बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का 16 फीसद बिहार में है। यहां कोशी, गंड़क, बूढ़ी गंड़क, बाधमती, कमला, महानंदा, गंगा आदि नदियां तबाही लाती हैं। इन पर तटबंध बनाने का काम केन्द्र सरकार से पर्याप्त सहायता न मिलने के कारण अधूरा पड़ा है। यहां बाढ़ का मुख्य कारण नेपाल में हिमालय से निकलने वाली नदियां हैं। ‘बिहार का शोक’
कही जाने वाली कोशी के उपरी भाग पर कोई 70 किलोमीटर लंबाई का तटबंध नेपाल में है लेकिन इसके रखरखाव और सुरक्षा पर सालाना खर्च होने वाला करीब 20 करोड़ रुपया बिहार सरकार वहन करती है। हालांकि तटबंध भी बाढ़ से निबटने में सफल नहीं रहे हैं। कोशी के तटबंधों के कारण उसके तट पर बसे चार सौ गांव आज डूब क्षेत्र में हैं। इसकी सहयोगी कमला-बलान नदियों के तटबंध के गाद भराव से ऊंचा होने के कारण बाढ़ की तबाही अब पहले से भी अधिक होती है। फरक्का बराज की दोषपूर्ण संरचना के कारण भागलपुर, नौगछिया, कटिहार, मुंगेर, पूर्णिया, सहरसा आदि में बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र बढ़ता जा रहा है। विदित हो कि आजादी से पहले अंग्रेज सरकार ने बाढ़ नियंतण्रमें बड़े बांध या तटबंधों को तकनीकी दृष्टि से उचित नहीं माना था। तत्कालीन गवर्नर हेल्ट की अध्यक्षता में पटना में हुए एक सम्मेलन में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सहित कई विद्वानों ने बाढ़ के विकल्प के रूप में तटबंधों की उपयोगिता को नकारा था। इसके बावजूद आजादी के बाद हर छोटी- बड़ी नदी को बांधने का काम जारी है। बगैर सोचे समझे नदी-नालों को बांधने के कुप्रभावों का ताजातरीन उदाहरण मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में बहने वाली ‘केन’ है। बुंदेलखंड को वाढ़ से सुरक्षित माना जाता रहा है लेकिन गत डेढ़ दशक से केन भी अप्रत्याित ढंग से उफन कर पन्ना, छतरपुर और बांदा जिले में जबरदस्त नुकसान कर रही है। केन के अचानक रौद्र होने का कारण छोटे-बड़े बांध हैं। केन बांदा जिले में चिल्ला घाट के पास यमुना में मिलती है। जब अधिक बारिश होती है या किन्हीं कारणों से यमुना में जल आवक बढ़ती है तो इसके बांधों के कारण इसका जल स्तर बढ़ जाता है। उधर केन और उसके सहायक नालों पर हर साल सैकड़ों ‘स्टाप-डेम’ बनाए जा रहे हैं, जो इतने घटिया हैं कि थोड़े से पानी के जमा होने पर टूट जाते हैं। केन में बारिश का पानी बढ़ता है, फिर ‘स्टापडे मों’ के टूटने का जल-दबाव बढ़ता है। केन की राह में स्थित ‘ओवर-एज’ बांधों में भी टूट-फूट होती रहती है और केन क्षमता से अधिक पानी लेकर यमुना की ओर लपलपाती है। वहां का जल स्तर इतना ऊंचा होता है कि केन के प्राकृतिक मिलन स्थल का स्तर नीचे रह जाता है। शहरीकरण, वन विनाश और खनन तीन प्रमुख कारण बाढ़ विभीषिका में उत्प्रेरक का कार्य कर रहे हैं। प्राकृतिक हरियाली उजाड़ कर बनाये गए कंक्रीट के जंगल जमीन की जल सोखने की क्षमता कम कर देते है, और सतही जल की बहाव क्षमता कई गुना बढ़ जाती है। शहरों के कूड़े ने भी समस्या बढ़ायी है। यह कूड़ा नालों से होते हुए नदियों में पहुंचता है। फलस्वरूप नदी की जल ग्रहण क्षमता कम होती जाती है। पंजाब और हरियाणा में बाढ़ का कारण जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में हो रहा अनियंत्रित शहरीकरण ही है। इससे वहां भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं और मलबा भी नदियों में ही जाता है। पहाड़ों पर खनन से वहां की हरियाली उजड़ती है और फिर खदानों से निकली धूल और मलबा नदी-नालों में अवरोध पैदा करता है। सनद रहे हिमालय पृथ्वी का सबसे कम उम्र का पहाड़ है और इसकी विकास प्रक्रिया जारी है। इसका बड़ा भाग कठोर-चट्टानें न हो कर मिट्टी है। बारिश या बर्फ पिघलने पर जब यहां पानी नीचे की ओर बहता है तो साथ में मिट्टी भी बहा ले जाता है। इन नदियों का पानी जिस तेजी से चढ़ता है, उसी तेजी से उतर जाता है। इस मिट्टी के कारण नदियों के तट बेहद उपजाऊ हुआ करते हैं लेकिन अब इन नदियों को जगह-जगह बांधा जा रहा है, इसलिए बेशकीमती उपजाऊ मिट्टी बांधों में ही रुक जाती है और नदियों को उथला बनाती रहती है। कहने का आशय सिर्फ इतना है कि मौजूदा हालात में बाढ़ महज प्राकृतिक प्रकोप नहीं, बल्कि मानवजन्य त्रासदी भी है। इस पर अंकुश लगाने के लिए गंभीरता से सोचना होगा। कुछ लोग नदियों को जोड़ना इसका निराकरण खोज रहे हैं। हकीकत में नदियों के प्राकृतिक बहाव, तरीकों, विभिन्न नदियों के ऊंचाई-स्तर में अंतर जैसे विषयों का हमारे यहां निष्पक्ष अध्ययन किया ही नहीं गया है और इसी का फायदा उठा कर स्वार्थी लोग इस तरह की सलाह देते हैं। पानी को स्थानीय स्तर पर रोकना, नदियों को उथला होने से बचाना, बड़े बांध पर पाबंदी, नदियों के करीबी पहाड़ों के खनन पर रोक और नदियों के प्राकृतिक मार्ग से छेड़छाड़ रोकना ऐसे सामान्य प्रयोग हैं, जो बाढ़ की विभीषिका का मुंह-तोड़ जवाब हो सकते हैं।

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

who is eating food subsidy? poor or mediatar

DAINIK JAGRAN NATIONAL EDITION 16-7-14http://epaper.jagran.com/epaper/16-jul-2014-262-National-Page-1.html
गरीबों से ज्यादा भरे पेट वालों के लिए है खाद्य सुरक्षा योजनाएं
पंकज चतुर्वेदी
छत्तीसगढ़ में हाल ही में राज्यभर में बीपीएल व अन्य राषन कार्डों की जांच हुई तो पता चला कि 66 लाख कार्डों में से 19 फीसदी फर्जी थे जो 63 हजार मेट्रीक टन चावल हड़प कर च्ुके हैं। अनुमान है कि है कि हर महीने इस तरह 151 करोड का घोटाला हो रहा था। यदि इसमें नमक, दाल, केरोसीन को भी जोड़ लिया जाए तो हर महीने 165 करोड़ का घपला है। विदित हो कि राज्य में बीपीएल परिवारों को 35 किलो अनाज एक या दो रूप्ए किलो पर तथा दो किलो नमक, 1.3 किलो चीनी और चार किजो केरोसीन इन कार्ड पर मिलता है। यह उस राज्य की हालत है जिसकी सार्वजनिक वितरण प्रणाली को देष में श्रेष्‍ठतम माना गया था और कहा गहा गया था कि सार्क देष छत्तीसगढ़ से गरीब लोगों को भूखा रहने से बचाने का प्रषिक्षण लेंगे। यह हल उस राज्य का है जिसकी नजीर दुनियाभर में दी जाती है तो अनुमान लगा लें कि दीगर सूबों में गरीबों का अनाज कहां जा रहा होगा । सनद रहे नई सरकार के नए बजट में खाद्य सुरक्षा के मद में बीते साल के 92 हजार करोड़ की तुला में सवा लाख करोड़ का प्रावधा है।
THE SEA EXPRESS AGRA 20-7-14http://theseaexpress.com/Details.aspx?id=65485&boxid=30578380
यदि आजादी के बाद से अभी तक देश में गरीबों के उत्थान के लिए चलाई गई योजनओं पर व्यय राशि को जोड़े तो इस मद पर इतना धन खर्च हो चुका है कि देश में किसी को भी दस लाख रूपए से कम का मालिक नहीं होना था, हर व्यक्ति के सिर पर छत होना था और अब इस तरह की योजनाओं पर सरकारी इमदाद की जरूरत नहीं पड़नी थी। अब यह किसी से छिपा नहीं है कि ऐसी योजनाओं का असल लाभ हितग्राहियों तक क्यों नहीं पहुंचा और हर साल गरीबों की संख्या व उसी की तुलना में सरकारी इमदाद बढ़ता जा रहा है। यही नहीं ऐसी योजनाओं के चलते देश में काला धन बढ़ रहा है जो अर्थ व्वस्था व कराधान देानेां के लिए घातक है।
इस बार तो चुनावों के दौरान सुप्रीम कोर्ट व चुनाव आयोग दोनों ने चेताया था कि सभी राजनीतिक दलों को ‘‘मुफ्त उपहार‘‘ जैसे लुभावने वायदों से बचना चाहिए। उ.प्र. में मुफ्त लेपटाप वितरण योजना को अंततः बंद करना पड़ा व अब सरकार को समझ आया कि मूलभूत सुविधाओं के विकास के बगैर लोगों को इस तरह की उपहार योजनाओं से बरगलाया नहीं जा सकता। केंद्र की नई सरकार का पहला बजट बस आने ही वाला है और जनता की उम्मीदों के दवाब के साथ-साथ सरकार यह भी जानती है कि विकास के लिए धन जुटाने के लिए कुछ कड़वे फैसले लेने पड़ सकते हैं। षायद अब वक्त आ गया है कि सरकार वास्तविक जरूरतमंदों तक इमदाद पहुंचाने के लिए कुछ वैकल्पिक व्यवस्था करे और सरकार का खजाना खाली कर कतिपय माफिया का पेट भरने वाली योजनाओं को अलविदा कहे। इसमें अनाज का वितरण भ्रश्टाचार और सरकार की सबसिडी का सबसे बड़ा हिस्सा चट कर रहा है। इस समय हर साल 15 से 16 लाख मेट्रीक टन अनाज ऐसी योजनाओं के जरिए वितरित होता है। खाद्य पदार्थ  वितरण के लिए आज चावल की खरीद रू. 14 प्रति किलो सरकार करती है, यह गोडाउन से होते हुए राषन की दुकान तक पहुंचता है तो दाम रू. 24 प्रति किलो हो जाता है। जबकि इसका वितरण एक या दो रूपए किलो में होता है। असली दाम व बिक्री के बीच के अंतर को सरकार उस पैसे से पूरा करती है जिसे विभिन्न टैक्सों द्वारा वसूला जाता है। इस तरह हर साल कोई 1,250 अरब रूपए की सबसिडी का बोझ सरकारी खजाने पर पड़ता है। मंत्रालय की रिपेार्ट स्वीकार करती है कि पीडीए यानी सार्वजनिक वितरण प्रणाली में लीकेज 40 प्रतिषत है। इसी से अंदाज लगा लें कि इस मद में ही हर साल कितनी बउ़ी राषि देष में काले धन को बढ़ा रही है।
उत्तर प्रदेष का तो बड़ा ही विचित्र मामला है- गरीबों व गरीबी की रेखा से नीेचे रहने वालों के लिए सस्ती दर पर अनाज वितरित करने की कई योजनाओं - अन्तोदय, जवाहर रोजगार योजना, स्कूलों में बच्चों को मिडडे मील, बपीएल कार्ड वालों को वितरण आदि के लिए सन 2001 से 2007 तक राज्य को भेजे गए अनाज की अधिकांष हिस्सा गोदामों से सीधे बाजार में बेच दिया गया। घोटालेबाजों की हिम्मत और पहंुच तो देखो कि कई-कई रेलवे की मालगाडि़यां बाकायदा बुक की गईं और अनाज को बांग्लादेष व नेपाल के सीमावर्ती जिलों तक ढोया गया और वहां से बाकायदा ट्रकों में लाद कर बाहर भेज दिया गया। खबर तो यह भी है कि कुछ लाख टन अनाज तो पानी के जहाजों से सुदूर अफ्रीकी देषों तक गया। ऐसा नहीं कि सरकारों को मालूम नहीं था कि इतना बड़ा घोटाला हो रहा है, फिर भी पूरे सात साल तक सबकुछ चलता रहा। अभी तक इस मामले में पांच हजार एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं। हालंाकि कानून के जानकार कहतेक हैं कि इसे इतना विस्तार इसी लिए दिया गया कि कभी इसका ओर-छोर हाथ मंे ही ना आए।
नवंबर-20074 में उ.प्र. के खाद्य-आपूर्ति विभाग के सचिव ने बांग्ला देष व अन्य देषों को भेजे जा रहे अनाज के बारे में जानकारी मांगी।  दिसंबर-2004 में रेलवे ने उन जिलों व स्टेषनों की सूची मुहैया करवाई जहां से अनाज बांग्ला देष भेजनंे के लिए विषेश गाडि़यां रवाना होने वाली थीं।  वर्श 2005 में लखीमपुरी खीरी के कलेक्टर सहित  कई अन्य अफसरों की सूची सरकार को मिली, जिनकी भूमिका अनाज घोटाले मंें थी। सन 2006 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने ई ओ डब्लू को इसकी जांच सौंपी थी और तब अकेले बलिया जिले में 50 मुकदमें दर्ज हुए। राज्य में सरकार बदली व जून-2007 में मायावती ने जांच का काम स्पेषल टास्क फोर्स को सौंपा, जिसकी जांच के दायरे में राज्य के 54 जिले आए और तब कोई पांच हजार मुकदमें कायम किए गए थे। सितंबर-2007 में राज्य सरकार ने घोटाले की बात स्वीकार की और दिसंबर-2007 में मामला सीबीआई को सौंपा गया। पता नहीं क्यों सीबीआई जांच में हीला-हवाली करती रही, उसने महज तीन जिलों में जांच का काम किया।
सन 2010 में इस पर एक जनहित याचिका सुपी्रम कोर्ट में दायर की गई, जिसे बाद में हाई कोर्ट, इलाहबाद भेज दिया गया। 03 दिसंबर 2010 को लखनऊ बैंचे ने जांच को छह महीने इमें अपूरा करने के आदेष दिए लेकिन अब तीन साल हो जाएंगे, कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं है। विडंबना है कि जांच एजेंसियां अदालत को सूचित करती रहीं कि यह घोटाला इतना व्यापक है कि उसकी जांच के लिए उनके पास मषीनरी नहीं है। इसमें तीस हजार मुकदमें और कई हजार लोगों की गिरफ्तारी करनी होगी। इसके लिए जांच एजेंसी के पास ना तो स्टाफ है और ना ही दस्तावेज एकत्र करने लायक व्यवस्था। प्रारंभिक जांच में मालूम चला है कि राज्य के कम से कम 31 जिलों में बीते कई सालों से यह नियोजित अपराध चल रहा था। सरकार कागज भर रही थी कि इतने लाख गरीबों को इतने लाख टन अनाज बांटा गया, जबकि असली हितग्राही खाली पेट इस बात से बेखबर थे कि सरकार ने उनके लिए कुछ किया भी है। जब हाई कोर्ट ने आदेष दिया तो सीबीआई ने अनमने मन से छह जिलों में कुछ छापे मारे, कुछ स्थानीय स्तर के नेताओं के नाम उछले। फिर अप्रैल-2011 में राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई और हाई कोर्ट के उस आदेष को चुनौती दे डाली जिसमें सीबीआई जांच का निर्देष दिया गया था। जाहिर है कि मामला लटक गया, या यों कहें कि लटका दिया गया। छत्तीसगढ़ और उत्तरप्रदेष तो बानगी मात्र हैं, षायद ही देष का कोई ऐसा राज्य हो जहां फर्जी राषनकार्ड व उसके नाम पर अनाज वितरण के घपले ना होते हों।
यह भी सही है कि देष में कई करोड़ लोग दो जून की रोटी नहीं जुटा पा रहे हैं, कुपोशण एक कडवी सच्चाई और उनके लिए कल्याणकारी योजनाएं भी जरूरी हैं। लेकिन वास्तविक हितग्राहियां की पहचान करना, खरीदे गए अनाज को उस तक पहुंचाने के व्यय को यदि नियोजित किया जाए तो इस मद का 25 फीसदी बजट को बचाना बेहद सरल है। एक सल में 25 से 30 लाख करोड़ को माफिया के हाथों में जाने से रेाकने के लिए कुछ तकनीकी, प्रषासनीक व नैतिक कार्यवाही समय की मांग है।

शनिवार, 12 जुलाई 2014

TERROR OF KAWADIYA THE SEA EXPRESS AGRA 13-7-14

THE SEA EXPRESS, AGRA 13-7-14 http://theseaexpress.com/Details.aspx?id=65261&boxid=30791518
आस्था पर भारी पड़ती अराजकता
पंकज चतुर्वेदी
देहरादून से ले कर दिल्ली और फरीदाबाद से करनाल तक के तीन राज्यों के कोई 70 जिले आगामी 13 जुलाई से 25 जुलाई तक कांवड़ यात्रा को ले कर भयभीत और आषंकित हैं। याद करें पिछले साल अकेले गाजियाबाद जिले में कांवडि़यों द्वारा रास्ता बंद करने, मारापीटी करने, वाहनों को तोड़ने की पचास से ज्यादा घटनाएं हुई थीं। हरिद्वार में तो कुछ विदेषी महिलाओं ने बाकायदा पुलिस में रपट की थी कि कांवडि़यों ने उनसे छेड़छाड़ की है। बीते एक दषक के दौरान देखा गया है कि कांवड़ यात्रा के दस दिनों में दिल्ली से ले कर हरियाणा-राजस्थान व उधर हरिद्वार को जाने वाली सड़कों पर अराजक बेसबाल, व अन्य षस्त्रधारी युवकों का अराजक कब्जा हो जाता है। इस बार मामला बेहद संवेदनषील है- एक तो कांवउ़ की अवधि में ही रमजान का महीना है , दूसरा कांवड़ यात्रा के प्रमुख मार्गों में पड़ने वाला पष्चिमी उत्तर प्रदेष बीते साल के भयावह दंगों के दर्द से अभी उबर नहीं पाया है और मुरादाबाद जिले के छोटे से कस्बे कांठ के एक मंदिर में लाउड स्पीकर लगाने जैसे गौण मसले पर हिंसा हो चुकी है।
जनसंदेश टाईम्‍स उप्र 15/7/14
जैसा कि हर बार होता है, इस बार भी डाक कांवड पर पाबंदी, डीजे बजाने पर रोक जैसे जुमले उछाले जा रहे हैं, लेकिन यह तय है कि इनका पालन होना मुष्किल ही होता है और यही अराजकता आम लोगों के लिए संकट के दस दिन बन कर आती है। बडे -बड़े वाहनों पर पूरी सड़क घेर कर, उद॰ंडों की तरह डंडा-लाठी-बेसबाल लहराते हुए, श्रद्धा से ज्यादा आतंक पैदा कर रहे कांवडि़ए सड़कों पर आ जाते हैं ।

याद करें पिछले साल का श्रावण का महीना और दिल्ली से हरिद्वार जाने वाला राजमार्ग - एक हत्या, डेढ़ सौ दुकानों में आगजनी व तोड़फोड़, कई बसों को नुकसान, सैंकडों लोगों की पिटाई, स्कूल-दफ्तर बंद, लाखेंा बच्चों की पढ़ाई का नुकसान, जनजीवन अस्त व्यस्त । वह भी तब जब दस हजार पुलिस वालों की दिन-रात ड्यूटी लगी हुई थी । यह कहानी किसी दंगे - फसाद की नहीं बल्कि ऐसी श्रद्धा की है जो कि  अराजकता का रूप लेती जा रही है । पिछले साल और इससे भी कई पिछले सालों के दौरान श्रावण की षिवरात्रि से पहलेे लगातार दस दिनों तक देष की राजधानी दिल्ली और उसके आसपास 200 किलोमीटर के दायरे में इस तरह का आतंक धर्म के कंधों पर सवार हो कर निर्बाध चलता है। इसमें कितना धर्म या श्रद्धा थी , इसका आकलन कोई नहीं कर पाया।
साल-दर-साल बढ़ रहे जुनून से स्पश्ट है कि आने वाले सालों में केसरिया कपड़े पहन कर सड़कों पर आतंक फैलाने वालों की बढ़ती संख्या समाज के लिए चिंता का विशय है। दिल्ली से हरिद्वार के व्यस्ततम राश्ट्रीय राजमार्ग को आगामी पांच अगस्त तक बंद किया जा रहा है । दिल्ली में यूपी बार्डर से ले कर आईएसबीटी और वहां से रोहतक व गुड़गावं जाने वाले राश्ट्रीय राजमार्ग को जगह-जगह निर्ममता से खोद कर बड़े-बड़े पंडाल लगाए जा रहे हैं । राजधानी में भले ही बिजली की कमी हो, लेकिन बिजली को चुरा कर सडकों को कई-कई किलोमीटर तक जगमगाने की तैयारियां अपने अंतिम दौर में है । हरिद्वार से ले कर दिल्ली तक के करोड़ों लोगों की जान सांसत में है कि इस बार ये क्या गुल खिलाएंगे । सनद रहे पिछले साल इन भगवा हाफ पैंट-टीषर्ट धारी भोले भक्तों ने एक हत्या, डेढ़ सौ दुकानों में आगजनी व तोड़फोड़, लगभग 40 बसों को नुकसान, अनगिनत लोगों की पिटाई कर धर्म की पताका को फहराया था । इस बार भी ये षिव भक्त 10 दिनों तक लाखों बच्चों की पढ़ाई और कई षहरों के जनजीवन को अस्त व्यस्त रखने की अपनी परंपरा को दोहराएंगे। अनुमान है कि इस बार कांवड़ यात्रा पहले से अधिक भव्य होी, इसके कुछ राजनीतिक कारण भी हैं।
अपने मन की मुराद पूरी होने या देष-समाज की सुख-समृद्धि की मनोकामना के लिए श्रावण के महीने में हरिद्वार, देवघर(झारंखंड), काषी जैसे प्रसिद्ध षिवालयों से पैदल कांवड़ में जल ले कर अपने गांवों को षिवालयों तक आने की परंपरा सैंकड़ों साल पुरानी है । अभी कुछ साल पहले तक ये सात्विक कांवडिये अनुषासन व श्रद्धा में इस तरह डूबे रहते थे कि राह चलते लोग स्वयं ही उनको रास्ते दे दिया करते थे । बावरी मस्जिद विध्वंस के बाद देष में धर्म की राजनीति व हिंदु धर्म के तालीबानीकरण का जो दौर षुरू हुआ, उसका असर कांवड़ यात्रा पर साल-दर-साल दिखने लगा ।  पहले संख्या में बढ़ौतरी हुई, फिर उनकी सेवा के नाम पर लगने वाले टेंटों-षिविरों की संख्या बढ़ी । गौरतलब है कि इस तरह के षिविर व कांवड़ ले कर आ रहे ‘‘भोलों’’ की ‘‘सेवा’’ के सर्वाधिक षिविर दिल्ली में लगते हैं , जबकि कांवडि़यों में दिल्ली वालों की संख्या बामुष्किल 10 फीसदी होती है ।
अब कांवडियों का आतंक है । किसी का जल छलक गया, किसी को सड़क के बीच में चलने के दौरान माूमली टक्कर लग गई , तो खैर नहीं है । हाकी, बेसबाल के बल्ले, भाले, त्रिषूल और ऐसे ही हथियारों से लैस ये ‘भोले’ तत्काल ‘‘भाले’’ बन जाते हैं और कानून-व्यवस्था, मानवता और आस्था सभी को छेद देते हैं ।
इन कांवडियों के कारण राश्ट्रीय राजमार्ग पर एक सप्ताह तक पूरी तरह चक्का जाम रहना देष के लिए अरबों रुपए का नुकसान करता है । इस रास्ते में पड़ने वाले 74 कस्बों, षहरों का जनजीवन भी थम जाता है । बच्चों के स्कूलों की छुट्टी करनी पड़ती है और सरकारी दफ्तरों में काम-काज लगभग ना के बराबर होता है । गाजियाबाद महानगर में तो लोगों का घर से निकलना दुष्वार हो जाता है । षहर में फल, सब्जी, दूध की आपूर्ति  बुरी तरह प्रभावित होती है ।
दिल्ली की एक तिहाई आबादी यमुना-पार रहती है । राजधानी की विभिन्न संस्थाओं में काम करने वाले कोई सात लाख लोग जी.टी.रोड के दोनो तरफ बसी गाजियाबाद जिले की विभिन्न कालोनियों में रहते हैं । इन सभी लोगों के लिए कांवडियों के दिनों में कार्यालय जाना त्रासदी से कम नहीं होता । गाजियाबाद-दिल्ली सीमा पर अप्सरा बार्डर पूरी तरह कांवडियों की मनमानी की गिरफ्त में रहता है, जबकि इस रास्ते से गुरूतेग बहादुर अस्पताल जाने वाले गंभीर रोगियों की संख्या प्रति दिन हजारों में होती है । ये लोग सड़क पर तड़पते हुए देखे जाते हैंे । चूंकि मामला धर्म से जुडा होता है, सो कोई विरोध की सोच भी नहीं सकता । फिर कांवड़ सेवा केंद्रों की देखरेख में लगे स्वंयसेवकों के हाथों में चमकते त्रिषूल, हाकियां, बेसबाल के बल्ले व लाठियां किसी की भी जुबान खुलने ही नहीं देती है ।
धर्म, आस्था, पर्व, संकल्प, व्रत, ये सभी भारतीय संस्कृति व लोकजीवन के अभिन्न अंग हैं, लेकिन जब यह लोकजीवन के लिए ही अहितकर और धर्म के लिए अरुचिकर हो जाए तो इसकी प्रक्रिया पर विचार करना , इसकी मूल मंषा को अक्षुण्ण रखने के लिए अत्यावष्यक है । धर्म दूसरों के प्रति संवेदनषील हो, धर्म का पालन करने वाला स्वयं को तकलीफ दे कर जन कल्याण की सोचे; यह हिंदु धर्म की मूल भावना है । कांवडि़यों की यात्रा में यह सभी तत्व नदारद हैं ।
फिल्मी पेरोडियों की धुन पर नाचना, जगह-जगह रास्ता जाम करना, आम जन जीवन को अस्त-व्यस्त कर देना, सड़कों पर हंगामा करना और जबरिया वसूले गए चंदों से चल रहे षिविरों में आहार लेना; किसी भी तरह धार्मिक नहीं कहा जा सकता है । जिस तरह कांवडियों की संख्या बढ़ रही है, उसको देखते हुए सरकार व समाज दोनों को ही इस पावन पर्व को दूशित होने से बचाने की जिम्मेदारी है । कांवडियों का पंजीयन, उनके मार्ग पर पैदल चलने लायक पतली पगडंडी बनाना, महानगरों में कार्यालय व स्कूल के समय में कांवडियों के आवागमन पर रोक, कांवड लाने की मूल धार्मिक प्रक्रिया का प्रचार-प्रसार, सड़क घेर कर षिविर लगाने पर पाबंदी जैसे कदम लागू करने के लिए अभी से कार्यवाही प्रारंभ करना जरूरी है । सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस धार्मिक अनुश्ठान में सांप्रदायिक संगठनों की घुसपैठ को रोका नहीं गया तो देष को जो नुकसान होगा, उससे बड़ा नुकसान हिंदु धर्म को ही होगा ।
आस्था के नाम पर अराजकता पर अंकुष आखिर कौन लगाएगा ? स्वयं समाज या सरकार ? कावंडियों के नाम पर दुकानदारी कर रहे लोग क्या कभी सड़क, सफाई, षिक्षा, भ्रश्टाचार जैसे मूलभूत मसलों पर अपने घर- गांव छोड़ कर डंडे ले कर सड़क पर आने की हिम्मत करते हैं ? कभी नहीं । जाहिर है कि इस भगवा बटालियन को तैयार करने में कतिपय लोगों के व्यावसायिक हित हैं तो कुछ के राजनैतिक । जरूरत इस बात की है कि धर्म के नाम पर लेागों को भ्रमित करने के इन कुत्सित प्रयासों का खुल कर विरोध हो और चैहरे बेनकाब किए जाएं । यह जानने का प्रयास कतई नहीं होता है कि इन कावंडियों के कारण कितने लेाग अस्पताल नहीं पहुंच पा रहे हैं और कितनों के नौकरी के इंटरव्यू छूट गए । कितनों को मजबूरी में महंगी सब्जी व दूध खरीदना पड़ रहा है और कितनी कालोनियां इनकी बिजली चोरी के कारण अंधेरे में हैं ।  आज जब कांवड मार्ग पर सांप्रदायिक तनाव और आतंकवाद दोनो का ख्तरा है, ऐसे में यह कानून-व्यवस्था से कहीं ज्यादा सामाजिक जिम्मेदारी है कि धर्म के नाम पर ऐसी अराजकताओं से परहेज किया जाए।
पंकज चतुर्वेदी
यू जी -1 ए 3/186, राजेन्द्र नगर सेक्टर-2 साहिबाबाद, गाजियाबाद 201005


शुक्रवार, 11 जुलाई 2014

Heavy ship can hurt Ganga

यदि गंगा में बनारस से कोलकता तक बडे पानी के जहाज चलेंगे तो क्‍या पर्यावरण सुधरेगा ? मुझे लगता है कि जहाज चलने से जल जीव ज्‍यादा मरते हैं, मछली, कछुए तो नदी की जान होते हैं और जहाज चलने से तेल रिसने व जलने से प्रदूषण अधिक होता है, लगता है कि गंगा का इस तरह से विकास करने पर फिर से विचार करना चाहिए] प्रस्‍तावित रास्‍ता 1620 किलामीटर का है पटना हाेतु हुए हल्दिया तक का , जहाज चलाने के लिए गहरे पानी की जरूरत होती है और इसके लिए ड्रजिंग की जाती है, कई बार गहराई से ड्रेजिंग करने पर भूजल की झिरों को नुकसान होता है, जिससे सब बेसिन के भूजल भंडार सूख जाते हैं, गंगा पहाड से आती है और अपने साथ बहतु सा मलवा और रेत लाती है जो मैदानेां पर आ कर टिकता है, कई जहग इससे उपजाउ जमीन बनती है, ऐसे में गंगा के नैसर्गिक स्‍वरूप से छेडछाड करना खतरनाक हो सकता है

बुधवार, 9 जुलाई 2014

raj express bhopal 10-7-14
सियासत की चैखट पर दम तोड़ गया एक और जन अंदोलन
पंकज चतुर्वेदी

अरविंद केजरीवाल दिल्ली के 49 दिन के मुख्यमंत्री बन गए और उनकी वह धार उतर गई, जिसके लिए कभी उनके साथ लाखों-लाख युवा थे । अन्ना हजारे के जन लोकपाल  और भ्रश्टाचार विरोधी आंदोलन की दुर्गति के लिए उनके द्वारा ममता बनर्जी को मसर्थन देने के बाद दिल्ली में आयोजित फुस्स रैली को याद रखना काफी है। इससे पहले एक ऐसा व्यक्ति जिसे पूरे देष में निर्विवाद रूप से एक योग षिक्षक और अच्छे संचारक के रूप में सम्मान मिला था, जब उसने काले धन के मुद्दे पर जन आंदोलन षुरू करना चाहा तो कुछ ही दिनों में ही उनका असली मसला गौण हो गया और पुलिस ज्यादती, बाबा का निजी जीवन और उनके समर्थकों की राजनीतिक अभिलाशाएं , ऐसा ही ना जाने क्या-क्या उभरने लगा।
अन्ना हजारे और केजरीवाल ने भले ही जन आंदोलन खड़ा किया हो लेकिन जैसे-जैसे वे सियासत के करीब आए, लोग उनसे दूर होते चले गए। अब खुद केजरीवाल अपने राजीनीतिक फैसलों को गलत ठहरा रहे हैं, लेकिन काठ की हांडी बार-बार तो चूल्हे पर चढती नहीं है।  भारत में आजादी के बाद ऐसा पहली बार नहीं हुआ था कि कोई गैरराजनैतिक जन आंदोलन खड़ा हुआ और कुछ ही दिन में वह फुस्स हो कर दिषा भटक गया।  याद करें सन 1973 की, जब मोरबी, अमदाबाद के इंजीनियरिंग कालेज के छा़त्रों के होस्टल के मेस के बढ़े बिल देने पर षुरू हुआ विवाद महंगाई, भ्रश्टाचार, षिक्षा- सुधार और बेरोजगारी के खिलाफ ‘नवनिर्माण समिति’ के आंदोलन के रूप में देषव्यापी बना। लोकनायक जयप्रकाष के संपूर्ण क्रांति की नीतिगत दिषा उसी से तय हुई, आपातकाल लगा, इंदिरा गांधी की बुरी तरह पराजय हुई और उसके बाद संपूर्ण क्रांति के सपने ध्वस्त करने में जनता पार्टी की सरकार को ढाई साल भी नहीं लगे। ताकत पानी ज्यादा कठिन नहीं होता, मुष्किल होता है उस ताकत को धारण करना और उसका सकारात्मक इस्तेमाल करना। बाबू जयप्रकाष उसमें असफल रहे और उसके बाद पूरे देष में कभी भी बदलाव या स्वतःस्फूर्त आंदोलन की कोई बयार नहीं आई।
इससे पहले सन 1967 में बंगाल के एक अनजान गांव नक्सलबाडी से षुरू हुआ अन्याय और षोशण के खिलाफ हिंसक आदंालन नक्सलवाद भले ही आज देष के एक तिहाई हिस्से में फैल गया हो, लेकिन अब वह जन आंदोलन नहीं रह गया। बंदूक या हिंसा के बल पर कुछ लोगों को डराने-धमकाने या सषस्त्र बलों पर घात लगा कर हमला कर देने मात्र से सत्ता की नीतियां बदलने से रही। उस जन आंदोलन में अब तक बीस हजार से अधिक लोग मारे जा चुके हैं, जबकि संगठन आतंकवादी घोशित कर दिए गए हैं और कुल मिला कर वे अपनी दिषा भी भटक चुके हैं।कष्मीर का पृथकतावादी आंदोलन पहले भले ही एक राज्य के घाटी वाले हिस्से तक सीमित रहा हो, लेकिन अब तो पूरी तरह अपने मूल विशय से ही भटक चुका हे। कष्मीर की आजादी या स्वायत्तता से ज्यादा पाकिस्तान परस्ती या वहां से मिल रहे पैसे पर ऐष करना उस आंदोलन की नियति बन चुका है। विदेषियों यानी बांग्लादेषियों को अपनी जमीन से खदेड़ने का असम का छात्र आदंोलन राज्य में सत्ता पाते ही दिग््भ्रमित हो गया, तीन-चैथाई बहुमत के बावजूद युवा जोष कुछ सकारात्मक कर नहीं पाया,। यह जरूर हुआ कि राज्य में उनकी छबि भ्रश्ट, निकम्मों की जरूर बन गई। मान्यवर कांषीराम का बामसेफ आंदोलन सत्ता पाने की ललक में कई बार पटरियों से नीचे उतरा। और बीते लोकसभा चुनाव में उसकी उ.प्र में क्या हालत हुई, सबके सामने है।
सन 1990 में मंडल आयोग की रिपेार्ट के खिलाफ आरक्षण-विरोधी आदंालन की यादें भी लोगों के जेहन में धुंधली या विस्तृत हो चुकी हैं। दिल्ली में राजीव गोस्वामी नामक युवक ने खुद को जलाने का प्रयास किया और वह रातो-रात पूरे देष का हीरो बन गया। लेाग भूल चुके हैं कि 24 सितंबर 1990 को दिल्ली के देषबंधु सांध्य कालेज के छात्र सुरेन्द्र सिंह चैहान ने सरेआम खुद को जला कर मार डाला था और अपने आत्महत्या-नोट में लिखा था कि वह सरकार की आरक्षण नीति के विरोध में अपनी जान दे रहा है। देष के कई हिस्सों में सेना को बुलाना पड़ा था। उसके बाद राममंदिर के षंखनाद ने उस जन आंदेालन ही नहीं उसकी यादों को भी गर्त में डाल दिया। राजीव गोस्वामी गुमनामी की जिंदगी जीते हुए दो साल पहले ही असमय मर गया।  हालांकि रामजन्म भूमि आंदोलन भी सत्ता षिखर पर पहुंच कर ध्वस्त हो गया और लोगों को पता चल गया कि  अयोध्या में विवादास्पद ढंाचा गिराना या मंदिर बनाना तो बस बहाना था, असली मकसद तो सत्ता की मलाई पाना था।
सन 1985 से चल रहे नर्मदा बचाओं आदंालन, गुजरात में दंगों के बाद पीडि़तों को न्याय दिलवाने के लिए जन आंदोलन, सिंगूर और जंगल महल के विद्रोह; ऐसे अनगिनत आदंालन गिनाए जा सकते हैं जिसने जन आकांक्षाओं को उभारा, उनकी उम्मीदें  जगाईं लेकिन उनका अंत आम लोगों को ठगने, दिग्भ्रमित करने जैसी निराषाओं से ही हुआ। आखिर क्यों जन आंदोलन जनता की आषाओं की कसौटी पर खरे नहीें उतर पाते हैं ? क्या जन-ज्वार के बीच कतिपय सता लोलुप राजनीतिक दलों की घुसपैठ होना और धीरे से आंदोलन पर अपना एजेंडा थोप देना, आम लोगों के सरोकारों के प्रति आंदोलन की दिषा भटका देता है ? क्या अभी तक जन आंदोलन अपरिपक्व हैं और वे भीड़ को जुटा लेने के बाद अपने होष और जोष खो देते हैं ? या फिर जन आंदोलनों के नायक सरकार की दवाब-प्रकिया के आगे डगमगा जाते हैं और ना चाहते हुए भी एक कदम ऐसा उठा लेते हैं जो उनके लिए अधोगति का मार्ग प्रषस्त कर देता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि जन आंदालन महज सत्ता बदलने का जरिया बनते जा रहे हैं, जबकि उनका काम व्यवस्था को बदलने का होना चाहिए और यह काम जमीनी स्तर का है जबकि आंदोलनकर्ता उसके लिए उच्च नेतृत्व पर दवाब डालते हैं।
एक स्वस्थ्य, सषक्त और उभरते हुए लोकतंत्र में यह जरूरी है कि षासन को नियंत्रित करने के लिए कुछ गैर राजनैतिक और निस्वार्थ षक्तियां जन जागरण करती रहें। विडंबना है कि जो षक्तियां इस हेतु आगे आती हैं, वे येन-केन प्रकारेण वोट की राजनीति में फंस जाती है।ं ऐसे निस्वार्थ आंदोलन व दवाब के अभाव में ना तो हम आने वाली पीढि़यों को तैयार कर पा रहे हैं और ना ही जन-नेता ऐसी कोई नजीर दे पा रहे हैं जिससे बगैर सत्ता लोलुपता के  लोकतंत्र को मजबूत करने, प्रषासन में पारदर्षिता और कल्याणकारी योजनाओं को उनके असली हितग्राहियों तक पहुंचाने के कार्य के लिए आम लोग प्रेरित हो सकें।
पंकज चतुर्वेदी
साहिबाबाद
गाजियाबाद 201005
9891928376, 0120-4241060


सोमवार, 7 जुलाई 2014

Why Beijng is so neat and clean

चीन की राजधानी पेकिंग में सफाई कर्मचारी साईकिल पर चलते हैं, उनके पास एक चिमटे जैसा हथियार होता है जिससे वे चलते चलते कूडा उठा कर अपने साईड में लगे डस्‍ट बीन में डाल लेते हैं, उनकी साईकिल पर झाडू, पंजा, फिनाईल कपडे जैसी कई चीजें होती हैं, एक बाजार के हिस्‍से में एक कर्मचारी की उ्रयूटी होती है जो लगातार वहां चक्‍कर लगाता है , बारशि हाने पर बडे बडे वाईपर वाले अलग से कर्मचारी आते हैं, काश हमारे राजनेता ऐसे प्रयोग सीख कर आते



शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

Tian'anman Square Beijing

यह है पेकिंग का मशहूर तियोनमेन चौक, जिसने कई क्रांति, बदलाव, खूनखराबा देखा है, लेकिन वहां का विस्‍तार, सुंदरता, साफ सफाई, दर्शनीय है








बुधवार, 2 जुलाई 2014

The Brahmmputra : sorrow of asma

DAILY NEWS. JAIPUR http://dailynewsnetwork.epapr.in/298126/Daily-news/03-07-2014#page/8/1
असम की बाढ़ का हो कोई स्थाई निदान
पंकज चतुर्वेदी

इस साल कुछ जल्दी ही तबाही आई । जून के आािर सप्ताह में बारिष षुरू हुई और एक हफ्ते में ही गुवाहाटी सहित कई जिलों में बाढ़ से त्राहि-त्राहि मच गई। कोई 120 गांव पूरी तरह उजड़ गए है। अभी सितंबर महीने तक जम कर झमा-झम बारिष होना है । असम में प्राकृतिक संसाधन, मानव संसाधन और बेहतरीन भा।ैगोलिक परिस्थितियां होने के बावजूद यहां का समुचित विकास ना होने का कारण हर साल पांच महीने ब्रहंपुत्र का रौद्र रूप होता है जो पलक झपकते ही सरकार व समाज की सालभर की मेहनत को चाट जाता है। वैसे तो यह नद सदियों से बह रहा है । बारिष में हर साल यह पूर्वोत्तर राज्यों में गांव-खेत बरबाद करता रहा है । वहां के लेागों का सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक जीवन इसी नदी के चहुओर थिरकता है, सो तबाही को भी वे प्रकृति की देन ही समझते रहे हैं । लेकिन पिछले कुछ सालों से जिस तरह सें बह्मपुत्र व उसके सहायक नदियों में बाढ़ आ रही है,वह हिमालय के ग्लेेषियर क्षेत्र में मानवजन्य छेड़छाड़ का ही परिणाम हैं । यह बात सरकार में बैठे लोग अच्छी तरह जानते हैं कि आने वाले सालों में राज्य में बाढ़ की स्थिति बद से बदतर होगी, बावजूद इसके उनका ध्यान बाढ़ आने के बाद राहत बांटने की योजनाओं में ज्यादा है, ना कि बाढ़ रोकने के तरीके खोजने में ।
 sea express, agra 6-7-14http://theseaexpress.com/Details.aspx?id=65012&boxid=31021554
इन दिनों राज्य के दस जिलों के 28 राजस्व सर्किल के 615 गांव पूरी तरह जल मग्न हैं। एषिया का सबसे बड़ा नदी-द्वीप माजुली और एक सींग के गैंडे के लिए प्रख्यात कांजीरंगा नेषनल पार्क बुरी तरह प्रभावित हैं। माजुली में ब्रहपुत्र का जल स्तर व बहाव की गति बढने के कारण मिट्टी का क्षरण गंभीर हो गया है। कांजीरंगा में भूरा पहाड़ी, बागोटी आदि स्थानों पर कई-कई फुट पानी हैं और वहां कई हिरण व अन्य जानवर मारे जा चुके लखमीपुर, बरपेटा, कामरूप और धेमाजी जिले तो बीते कई सालों से बारिष के तीन महीनों में षेश दुनिया से कटा रहने को अभिषप्त हैं । गौरतलब है कि पिछले साल बाढ़ ने राज्य में कुल 411 करोड़ की बरबादी की थी । इस बार के हालात बताते हैं कि नुकसान गत वर्श से दुगना ही होगा ।
ब्रह्मपुत्र भारत की एक  बिरली नदी है जो कि नर है । ब्रह्मपुत्र यानि ब्रह्मा के पुत्र का उदगम तिब्बत में मानसरोवर के पास कोंग्यू-षू नामक झील में 5150 मीटर ऊंचाई पर है। बंगाल की खाड़ी तक का इसकी कुल लंबाई 2880 किमी है और यह अलग-अलग नामों से तिब्बत व बांग्लादेष में बहती है। 1700 कितमी तक तोयह हिमालय श्रंखला के समानांतर बहती है । दिबाांब और लोहित के इसमें समाने से पहले इसके कई अन्य नाम प्रचलित हैं । असम में इसे बूढ़ा लोहित यानि बूढ़ी लाल नदी भी कहा जाता है।
भारत में यह छह राज्यों - अरूणाचल प्रदेष, असम,नागालेंड,,  मेघालय, पष्चिम बंगाल और सिक्किम से गुजरती है और इसके तट के बाषिंदों का जीवकोपार्जन इसी पर निर्भर हैं । लेकिन असम की सबसे बड़ी त्रासदी भी यही है । बिगड़ैल घोड़े की तरह यहां-वहां भागती, जब-तब राह बदलता ब्रह्मपुत्र हर साल अपने प्रवाह में लाखों लोगों का सुख-चैन बहा कर ले जाता है ।
पिछले कुछ सालों से इसका प्रवाह दिनोंदिन रौद्र होने का मुख्य कारण इसके पहाड़ी मार्ग पर अंधाधुंध जंगल कटाई माना जा रहा है । ब्रह्मपुत्र का प्रवाह क्षेत्र उत्तुंग पहाडि़यों वाला है, वहां कभी घने जंगल हुआ करते थे । उस क्षेत्र में बारिष भी जम कर होती है । बारिष की मोटी-मोटी बूंदें पहले पेड़ंों पर गिर कर जमीन से मिलती थीं, लेकिन जब पेड़ कम हुए तो ये बूंदें सीधी ही जमीन से टकराने लगीं । इससे जमीन की टाप साॅईल उधड़ कर पानी के साथ बह रही है । फलस्वरूप नदी के बहाव में अधिक मिट्टी जा रही है । इससे नदी उथली हो गई है और थोड़ा पानी आने पर ही इसकी जल धारा बिखर कर बस्तियों की राह पकड़ लेती है ।
नदी पर बनाए गए अधिकांष तटबंध व बांध 60 के दषक में बनाए गए थे । अब वे बढ़ते पानी को रोक पाने में असमर्थ हैं । फिर उनमें गाद भी जम गई है, जिसकी नियमित सफाई की कोई व्यवस्था नहीं हैं। पिछले साल पहली बारिष के दवाब में 50 से अधिक स्थानों पर ये बांध टूटे थे । इस साल पहले ही महीने में 27 जगहों पर मेढ़ टूटने से जलनिधि के गांव में फैलने की खबर है। वैसे मेढ़ टूटने की कई घटनाओं में खुद गांव वाले ही षामिल होते हैं । मिट्टी के कारण उथले हो गए बांध में जब पानी लबालब भर कर चटकने की कगार पर पहुंचता है तो गांव वाले अपना घर-बार बचाने के लिए मेढ़ को तोड़ देते हैं । उनका गांव तो थोड़ सा बच जाता है, पर करीबी बस्तियां पूरी तरह जलमग्न हो जाती हैं ।
ब्रह्मपुत्र व उसके सखा-सहेली नदियों की बढ़ती लहरों से मिट्टी क्षरण या तट कटाव की गंभीर समस्या लाइलाज होती जा रही है । दुनिया का सबसे बड़ा नदी-द्वीप माजुली को तो अस्तित्व ही खतरे में हैं । माजुली का क्षेत्रफल पिछले पांच दषक में 1250 वर्गकिमी ये सिमट कर 800 वर्गकिमी हो गया हैं । असम का गौरव कहे जाने वाला कांजीरंगा राश्ट्रीय उद्यान बाढ़ के चलते उजड़ने की कगार पर पहुंच गया हैं । सनद रहे यह जंगल एक सींग वाले दुर्लभ गैंडों का सुरक्षित प्र्यावास माना जाता रहा है । 430 वर्गकिमी में फेले इस जंगल में कोई 1550 दुर्लभ गैंडे रहते हैं । इस प्रजाति के गैंडों की दुनियाभर में कुल आबादी का यह 60 फीसदी हैं। इस बार बरसात के षुरूआत में ही कांजीरंगा का 95 फीसदी पानी में डूब चुका हैं । पानी से बचने के लिए गैंडे, गौर-भैंसे, हिरण आदि सड़क पर आ रहे हैं और तेज रफ्तार वाहनों की चपेट में आ कर मारे जा रहे हैं । कुछ जानवर करबी-आंगलांग पहाड़ी की ओर गए तो वहां षिकारियों के निषाने पर आ गए ।
हर साल की तरह इस बार भी सरकारी अमले बाढ़ से तबाही होने के बाद राहत सामग्री बांटने के कागज भरने में जुट गए हैं । विडंबना ही हैं कि राज्य में राहत सामग्री बांटने के लिए किसी बजट की कमी नहीं हैं, पर बाढ़ रोकने के लिए पैसे का टोटा है । बाढ़ नियंत्रण विभाग का सालाना बजट महज सात करोड़ है, जिसमें से वेतन आदि बांटने के बाद बाढ़ नियंत्रण के लिए बामुष्किल एक करोड़ बचता हैं । जबकि मौजूदा मेढ़ों व बांधों की सालाना मरम्मत के लिए कम से कम 70 करोड़ चाहिए । यहां बताना जरूरी है कि राजय सरकार द्वारा अभी तक इससे अधिक की राहत सामग्री बंाटने का दावा किया जा रहा हैं ।
ब्रह्मपुत्र घाटी में तट-कटाव और बाढ़ प्रबंध के उपायों की योजना बनाने और उसे लागू करने के लिए दिसंबर 1981 में ब्रह्मपुत्र बोर्ड की स्थापना की गई थी । बोंर्ड ने ब्रह्मपुत्र व बराक की सहायक नदियों से संबंधित योजना कई साल पहले तैयार भी कर ली थी । केंद्र सरकार के अधीन एक बाढ़ नियंत्रण महकमा कई सालों से काम कर रहा हैं और उसके रिकार्डमें ब्रह्मपुत्र घाटी देष के सर्वाधिक बाढ़ ग्रस्त क्षेत्रों में से हैं । इन महकमों नेेे इस दिषाा में अभी तक क्या कुछ किया ? उससे कागज व आंकड़ेां को जरूर संतुश्टि हो सकती है, असम के आम लेागों तक तो उनका काम पहुचा नहीं हैं ।
असम को सालाना बाढ़ के प्रकोप से बचाने के लिए ब्रह्मपुत्र व उसकी सहायक नदियों की गाद सफाई, पुराने बांध व तटबंधों की सफाई, नए बांधों को निर्माण जरूरी हैं । लेकिन सियासती खींचतान के चलते जहों जनता ब्रह्मपुत्र की लहरों के कहर को अपनी नियति मान बैठी है, वहीं नेतागण एकदूसरे को आरोप के गोते खिलवाने की मषक्कत में व्यस्त हो गए हैं । हां, राहत सामग्री की खरीद और उसके वितरण के सच्चे-झूठे कागज भरने के खेल में उनकी प्राथमिकता बरकारार हैं ।

पंकज चतुर्वेदी
साहिबाबाद, गाजियाबाद
201005

मंगलवार, 1 जुलाई 2014

India need lots of children books

दैनिक हिंदुस्तान, ०२-०७-२०१४ http://paper.hindustantimes.com/epaper/viewer.aspx
बच्चों को चाहिए ढेर सारी किताबें!

पंकज चतुर्वेदी
बाल मन और जिज्ञासा एक-दूसरे के पूरक षब्द ही हैं । वहीं जिज्ञासा का सीधा संबंध है कौतुहल से है । शिशु काल में उम्र बढ़ने के साथ ही अपने परिवेष की हर गुत्थी को सुलझाने की जुगत लगाना बाल्यावस्था की मूल-प्रवृत्ति है ।  भौतिक सुखों व बाजारवाद की बेतहाशा दौड़ के बीच दूषित  हो रहे सामाजिक परिवेश  और बच्चों की नैसर्गिक जिज्ञासु प्रवृत्ति पर बस्ते के बोझ के कारण एक बोझिल सा माहैल पैदा हो गया है । ऐसे में  बच्चों के चारों ओर बिखरे संसार की रोचक जानकारी सही तरीके से देना बच्चों के लिए राहत देने वाला कदम होता है। पुस्तकें इसका सहज, सर्वसुलभ और सटीक माध्यम रही हैं। भले ही षहरों में रहने वाले बच्चों का एक वर्ग इंटरनेट व अन्य माध्यमों से ज्ञानवान बन रहा है, लेकिन आज भी देष के आम बच्चे को ज्ञान, मनोरंजन, और भविष्य  की चुनौतियों का मुकाबला करेन के काबिल बनाने के लिए जरूरी पुस्तकों की बेहद कमी महसूस होती है। विषेशरूप से हिंदी व अन्य भारतीय भाशाओं में एक तो किताबें बहुत कम हैं, फिर उनकी सुदूर आंचलिक क्षेत्र की बात छोउ़ दें, दिल्ली-मुंबई जैसे नगरों में भी उपलब्धता बेहद कमजोर है।
आज बालक बड़े अवश्य हो रहे हैं, लेकिन अनुभव जगत के नाम पर एक बड़े शून्य के बीच । पूरे देष के बच्चों से जरा चित्र बनाने को कहें. तीन-चैथाई बच्चे पहाड़, नदी, झोपड़ी और उगता सूरज उकेर देंगे। बकाया बच्चे टीवी पर दिखने वाले डिज्नी चैनल के कुछ चरित्रों के चित्र बना देंगे। यह बात साक्षी है कि स्पर्ष, ध्वनि, दृष्टि के बुनियादी अनुभवों की गरीबी, बच्चों की नैसर्गिक क्षमताओं को किस हद तक खोखला किए दे रही है । ऐसे में बच्चों पढ़ी गई एक किताब ना केवल रिश्तों के प्रति उसे संवेदनशील बनाती है, बल्कि उसके कौतुहल और कल्पना के संसार को भी संपन्न बनाती है।
देश की आजादी की पहली क्रांति 1857 के समय पूरे देश  यानी अफगानिस्तान से ले कर कन्याकुमारी तक की , साक्षरता दर महज एक फीसदी थी। आजादी के समय भी हमारी साक्षरता दर बेहद दयनीय ही थी। आज हमारे यहां शिक्षा भी एक क्रांति के रूप में आई है। भले ही अभी जरूरत के मुताबिक स्कूल कम हैं, मौजूदा सरकारी स्कूल भौतिक व अन्य सुविधाओं में बेहद कमजोर है। लेकिन यह हम सभी स्वीकार करेंगे कि अब गांव या मजरे में स्कूल खुलना उतना ही बड़ा विकास का काम माना जाता है, जितना कि सड़क बनना या अन्य कोई काम । लेकिन इस ज्ञान की गंगा ने लोगों को पढना तो सीखा दिया लेकिन उसे गढ़ना नहीं सीखा पाया। बच्चेंा पर स्कूल में पढ़ाई का बोझ बढ़ता जा रहा है- ऐसी पढ़ाई का बोझा , जिनका बच्चों की जिंदगी , भाषा और संवेदना से कोई सरोकार नहीं है । ऐसी पढ़ाई समाज के क्षय को रोक नहीं सकती, उसे बढ़ावा ही दे सकती हैं । 
भारत में बाल साहित्य की पुस्तकों का अतीत अभी 200 साल का भी नहीं हुआ है। 14वीं सदी में अमीर खुसरो ने पहेलियों और मुरकियों को लिखा था जिनका लक्षित वर्ग बच्चों को माना गया था। 1817 में कोलकाता में कुछ ईसाई मिशनिरयिों ने बच्चों के लिए पुस्तकों का प्रकाशन शुरू  किया था। राजा शिव  प्रसाद सिंह सितारे हिंद ने 1867 में बच्चों के लिए कहानियां और 1876 में लड़कों के लिए कहानियां नाम से अपने संग्रह प्रकाशित करवाए थे। कहा जा सकता है कि आधुनिक मुद्रण में बच्चों की हिंदी में पहली किताबें वही थीं। एक फीसदी से 74 प्रतिशत साक्षरता की दर का उछाल की तुलना करें तो बच्चों के लिए पाठ्येत्तर पुस्तकों के प्रकाशन का आंकड़ा बेहद निराशा जनक ही दिखता है।
21वी सदी में विकास की उपलब्धियों और उससे उपजी त्रासदियों के बीच जो असमानता रही, वह हिंदी के बाल साहित्य में भी देखी गई। ‘‘आवषश्यकता अविष्कार  की जननी है’’ वाले पुराने सिद्धांत के अनुरूप जैसे-जैसे साक्षरता दर बढ़ी, वैसे-वैसे किताबों की मांग भी बढ़ी। एक स्तर पर पहुंच कर जब नीति-निर्धारकों को लगा कि अब षिक्षा में गुणवत्ता जरूरी है तो पाठ्येतर पुस्तकों की जरूरत व मांग बढ़ी। शुरूआती दिनों में हमारा बाल साहित्य पंचतंत्र, हितोपदेश् , जातक, पौराणिक व दंत कथाओं तक ही सीमित रहा। कहा गया कि बाजार उभार में है सो प्रकाशक एक ऐसा सुुरक्षित रास्ता पकड़ना चाहते हैं जहां उन्हें घाटा ना लगे। इक्कीसवीं सदी में वैष्वीकरण ने पूरी दुनिया के दरवाजे एक-दूसरे के लिए खोल दिए। टेलीविजन, इंटरनेट क्रंाति ने सूचना का प्रवाह इतना तीव्र कर दिया कि कई बार भारत जैसे विकासमान देष की बाल पीढ़ी लड़खड़ा सी गई, लेकिन उसका एक फायदा बाल पुस्तकों को जरूर हुआ- उसकी विषय  वस्तु, क्वालिटी आदि में सुधार आया। हालांकि अभी यह भी बेहद शुरूआती दौर में हैं। बीते कुछ सालों से सरकारी सप्लाई ने तो इस क्षेत्र को बहुत नुकसान किया है, कई प्रकाशक जिनके पास ना तो बाल साहित्य के संपादक हैं और ना ही उनको इसकी समझ- वही पुरानी राम-कृष्ण, हनुमान की कहानियों को अपने रूतबे या बटुए के बदौलत सप्लाई में खपा रहे हैं। यह भी जरूरी नहीं है कि बच्चों को पुरानी कहानियों, लोककथाओं या परीकथाओ को प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन ऐसी सामग्री प्रस्तुत करते समय बच्चों की मानवीय संवदेनाओं और उसके सीखने की प्रवृति को ध्यान में रखना जरूरी है। हिंसा, बदला, सत्ता संघर्श, कुटिलता जैसी कथानक बच्चों के लिए हानिकारण और उत्तेजनात्मक होते हैं। वे ना तो उसके सांस्कृतिक और ना ही सामाजिक या पर्यावरणीय मूल्यों में उत्थान लाते हैं। आने वाले समय में ऐसे मूल्य एक अच्छा नागरिक बनाने का अनिवार्य मानदंड होंगे।
हालांकि कई प्रकाशक बहुत छोटे बच्चों के लिए पुस्तकें प्रकाशित कर रहे हैं - जिनमें शब्द बहुत कम हैं और बेहतरीन रंगीन चित्र हैं, लेकिन विडंबना है कि अभ्ी तक ऐसे लेखकों को बाल साहित्यकार के रूप में पहचान नहीं मिली है। जब तक मोटा संग्रह ना हो, तब तक लेखक कैसा ? इस मानसिक अवधारणा से ग्रस्त हिंदी बाल साहित्य का आलोचना संसार लेखकों के उस वर्ग के लिए निरूत्साहकारी बना हुआ है जो उन बच्चों के लिए एक सौ बीस करोड से अधिक की आबादी वाले इस देष में छह से 17 वर्श के स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या लगभग 35 करोड़ है । इसके अलावा कई करोड़ ऐसी बच्चियां व लड़के भी हैं, जो कि अपने देष, काल और परिस्थितियों के कारण स्कूल नहीं जा पा रहे हैं । इतना बड़ा बाजार और पुस्तकें ना के बराबर । अनुमान है कि हमारे देष में सभी भाशाओं में मिला कर पाठ्येत्तर विज्ञान पुस्तकों का सालाना आंकड़ा मुष्किल से दो हजार को पार कर पाता है और हिंदी में तो यह बामुष्किल 600 है। यह एक कटु सत्य है कि दूरस्थ अंचलों को छोड़ दें, दिल्ली जैसे महानगर में एक फीसदी बच्चों के पास उनके पाठ्यक्रम के अलावा कोई पुस्तक पहुंच ही नहीं पाती है । उन बच्चों के लिए बाल साहित्य के मायने एक उबासी देने वाली, कठिन परिभाशाओं और कठिन कहे जाने वाला ग्रंथ मात्र है । लेकिन इन बच्चों को जब कुछ प्रयोग करने को कहा जाता है या फिर यूं ही अपनी प्रकृति में विचरण के लिए कहा जाता है तो वे उसमें डूब जाते हैं । पुस्तक मेलों में ही देख लें, जहां जादू, मनोरंजक खेल, कंप्यूटर पर नए प्रयोग सिखाने वाली सी.डी. बिक रही होती है, वहां बच्चों की भीड़ होती है । जाहिर है कि बच्चों की पुस्तकें विशय, प्रस्तुति, भाशा सभी कुछ में बदलाव मांग रही हैं। ऐसा नहीं है कि प्रकाषक इसे समझ नहीं रहा है, ऐसा हो भी रहा है, लेकिन गति अभी धीमी है।
यह विडंबना है कि हिंदी के बड़े लेखक बच्चों के लिए लिखने से बचते हैं, जबकि मराठी, बांग्ला में ऐसा नहीं है। एक बात और आंचलिक क्षेत्र में रहने वाला लेखक बेहद उत्साही और कर्मठ है, लेकिन उन तक नए षोध, प्रयोग, नीतियां पहुंच नहीं पाती हैं। आज जरूरी है कि बच्चों की पठन अभिरूचि में बदलाव, उनकी अपेक्षाओं, अंतरराश्ट्रीय परिदृष्य आदि को ध्यान में रख कर आंचलिक क्षेत्रों तक षोध हों, लोगों को अंग्रेजी ही नहीं भारत की अन्य भाशाओं में बाल साहित्य पर हो रहे काम की जानकारी मिले, हिंदी के बड़े लेखक बच्चों के लिए लिखने के लिए आगे आएं। बाल साहित्य में मनोरंजन, कौतुहल, पाठकों के भविश्य की चुनौतियों, आधुनिक दृश्टिकोण पर सामग्री समय की मांग है। बच्चों के लिए लेखक को अपनी नाम-लिप्सा से दूर हो कर आज के समय के मुताबिक नए विशयों पर पुस्तकें तैयार करना चाहिए। उदाहरण के लिए आजादी के 67 साल बाद भी हम राजषाही पर लिखना पसंद कर रहे हैं, जबकि हमें लोकतंत्रात्मक मूल्यों के सषक्तिकरण के लिए अपनी कलम का इस्तेमाल करना चाहिए।
लेखकों को भी अपने पैसे से खुद की पुस्तकें छपवाने और उसे निषुल्क बांटने से परहेज करना होगा। जब तक लेखक महंगा नहीं होगा, तब तक ना तो उसका सम्मान बढेगा और ना ही बाल पुस्तकों का। यदि कुछ संस्थाएं अच्छी पुस्तकें प्रकाषित करें, उन्हें पाठकों तक ले जाने के लिए प्रदर्षनी लगाएं तो एक सकारात्मक प्रयास होगा । पठनीयता को बढ़ावा दिए बगैर पुस्तकों की गुणवत्ता नहीं बढ़ाई जा सकेगी। जरूरी है कि अधिक से अधिक ऐसे लेखक आगे आएं जो बहुत छोटे बच्चों- प्री स्कूल  या प्राईमरी स्तर की मनोरंजक, सूचनाप्रद, वैज्ञानिक दृश्टिकोण वाली पुस्तकों को लिख सकें और चित्रांकन कर सकें।

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