तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2014

news paper by the children, for the children

अभी दो दिनों तक लखनउ में 35 बच्‍चों के साथ काम किया, ये बच्‍चे मडियादोह, ठाकुरगंज, जानकीपुरम, अकबरपुर जैेसे इलाकों से थे, जब इनसे पूछा गया कि ये अपने अखबार में क्‍या चाहते हैं तो स्‍कूल व मुहल्‍ले से जुडी कुल 28 स्‍टोरी सामने आईं, उन्‍हें समस्‍या व विशेषता में बांटा गया, अब इसमें राशन की दुकान में कम सामान मिलने की बात है तो संजय कुम्‍हार की शिल्‍प कला की भी, इसमें गंदे पानी व बिजली की समस्‍या है तो मिड डे मील का मेन्‍यू भी, बच्‍चों ने चिञ भी बनाए
दूसरा काम एक स्‍पेशल फीचर किया, प्रहशक्षण परिसर में लायब्रेरी, पालतु जानवर, वर्मी कल्‍चर, बगीचे, अन्‍य प्रशिक्षण, भोजनालय अ‍ादि पर बच्‍चों ने आठ पेज पर 16 स्‍टोरी कींा इसमें साक्षात्‍कार व स्‍वयं निरीक्षण पदधति को अपनाया गयाा
विज्ञान फाउंडेशन के संदीप खरे जी ने एक बडा निर्णय लिया है, एक तो बच्‍चों द्वारा अपने स्‍कूल व मोहल्‍ले की समस्‍याओं पर तैयार अखबार को छपवाया जाएगा और उनके इलाकों में भेजा जाएगा, इसका विमोचन 14 नवंबर को होगा, और फिर हर महीने बच्‍चों की खबरों के साथ ऐसा ही अखबार निकलेगा,
कार्यशाला में दस नाम सामने आए और फिर चुनाव के जरिये तय हुआ कि अखबार का नाम होगा ''मेरी खबर, मेरी नजर''
मुझे भरेसा है कि ये बच्‍चे आने वाले दिनों के जागरूक नागरिक , अपने आसपास के प्रति सजग और अच्‍छे लेखक व पञकार बनेंगे
Pankaj Chaturvedi's photo.अपने गली मोहल्ले का अखबार बनाते बच्चे। 35 बच्चे लखनऊ के निम्न मध्यम और ग्रामिण अंचल से हैं।अपनी दिक्कतों विशेषताओ को चिन्ह्नना और उन्हें व्यक्त करना सिखाने का प्रयास कर रहा हूँ।ये बच्चे गन्दगी पानी सड़क के अलावा अतिक्रमण तेज रफ़्तार वाहन की दिक्कतों को समझते हें। मुहल्के में मेहंदी लगाने वाली रुखसाना और मिटटी के खिलोने बनाने वाले संजय की तारीफ़ करते हैं। स्कुल में मिड डे मील की बात करते हैं। अच्छे शिक्षक की तारीफ़ भी करते हैं।

Pankaj Chaturvedi's photo.लखनऊ के मदियाड़ो अकबर पुर ठाकुर गंज जानकीपुरम जैसे इलाकों के आये बच्चों ने अपना अखबार बनाया। उन्होंने ही दस नाम सुझाये फिर लोकतंत्रात्मक तरीके से एक नाम-मेरी नज़र मेरी खबर को तय किया। इसमें राशन की दुकान भी हे और मिड डे मिल भी। अच्छे शिक्षक भी है। असल में यह बच्चों क8 अपनी अभिव्यक्ति हैं
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Pankaj Chaturvedi's photo.Pankaj Chaturvedi's photo.Pankaj Chaturvedi's photo.
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आपको याद होगा कि पिछले महीने के आखिरी दिनों में हमने लखनउ में बेहद कमजोर वित्‍तीय हालात के बच्‍चों के साथ दो दिन का एक वर्कशाप किया था, जिसमें उन्‍हें एक अखबार के लिए खबर जुटाना, उसे पेश करना आदि की बातें सिखाई थीं ,बच्‍चों ने सादे कागज पर डम्‍मी भी बनाई थी और अब यह छप कर तैयार है
इसका विमोचन 14 नवंबर बाल दिवस को लखनउ में ही होगा, मेरे दोस्‍त, शुभचिंतक, बच्‍चों को स्‍नेह करने वाले, जो भी साथी लखनउ में हैं, बच्‍चों के इस विमाचन के लिए समय जरूर निकालें, आयोजन कहीं सीतापुर रेाड के अकबर पुर, जानकीपुरम, मडियादो या ठाकुर गंज के आसपास होगा, एक बात और अब यह अखबर हर महीने निकलेगा, बच्‍चे ही उसके संवाददाता, चित्रकार, ंसपादक होंगे, यह अखबार नहीं बच्‍चों की जागरूकता की नि शानी है, शुक्रिया संदीप खरे, रिचा, संजय व विज्ञान फाउंडेान की पूरी टीम,
कौन कौन साथी 14 नवंबर की सहमति देता है, इंतजार रहेगा, जो साथी अपने परिवार , यार दोस्‍तों के साथ इन उभरते पत्रकारों, उनकी अभिव्‍यक्‍त करने की ताकत से रूबरू होना चाहते हैं, समय, स्‍थान के बारे में लखनउ में दोस्‍त संदीप खरे से बात कर सकते हैं, उनका नंबर है 9415011703
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मंगलवार, 28 अक्तूबर 2014

Peace talk is only solution of Naxalism

क्या बातचीत से हल नहीं हो सकता नक्सलवाद मुद्दा ?

पंकज चतुर्वेदी

JAGRAN NATIONAL EDITION 29-10-14
http://epaper.jagran.com/epaper/29-oct-2014-262-edition-National-Page-1.html
बीते दो महीनों से बस्तर के अखबबारों में ऐसी खबरे खूब आ रही है कि अमुक दुर्दांत नक्सलवादी ने आत्मसमर्पण कर दिया, साथ में यह भी हो ता है कि नक्सलवादी  शोषण करते हैं, उनकी ताकत कम हो गई है  सो वे अपने हथियार डाल रहे हैं । हाल ही में झारखंड का एक मंत्री गिरफ्तार किया गया क्योंकि वह नक्सलियों का गिरोह संचालित करता था, उन्हें हथियार व अन्य इमदाद मुहैया करवाता था। ऐसा नहीं हैं कि इन दो किस्म की खबरों के बीच नक्सली गतिविधियां हो नहीं रही है। जिन गांवों में कोई भी सरकारी या सियासती दल नहीं पहुंच पाता है, वहां नक्सली जुलूस निकाल रहे हैं, आम सभा कर रहे हैं और जनता को बता रहे हैं कि सरकार व पुलिस उन पर अत्याचार करती है । उनकी सभाओं में खासी भीड़ भी पहुंच रही है।  नक्सली इलाकों मे सुरक्षा बलों को ‘‘खुले हाथ‘‘ दिए गए हैं। बंदूकों के सामने बंदूकें गरज रही हैं, लेकिन कोई मांग नहीं कर रहा है कि स्थाई शांति  के लिए कहीं से पहल हो।
यदि अरण्य में नक्सली समस्या को समझना है तो बस्तर अंचल की चार जेलों में निरूद्ध बंदियों के बारे में ‘सूचना के अधिकार’ के तरह मांगी गई जानकारी पर भी गौर करना जरूरी होगा। दंतेवाड़ा जेल की क्षमता 150 बंदियों की है और यहां माओवादी आतंकी होने के आरोपों के साथ 377 बंदी है जो सभी आदिवासी हैं। कुल 629 क्षमता की जगदलपुर जेल में नक्सली होने के आरोप में 546 लोग बंद हैं , इनमें से 512 आदिवासी हैं। इनमें महिलाएं 53 हैं, नौ लोग पांच साल से ज्यादा से बंदी हैं और आठ लोगों को बीते एक साल में कोई भी अदालत में पेषी नहीं हुई। कांकेर में 144 लोग आतंकवादी होने के आरोप में विचाराधीन बंदी हैं इनमें से 134 आदिवासी व छह औरते हैं इसकी कुल बंदी क्षमता 85 है। दुर्ग जेल में 396 बंदी रखे जा सकते हैं और यहां चार औरतों सहित 57 ‘‘नक्सली’’ बंदी हैं, इनमें से 51 आदिवासी हैं।सामने है कि केवल चार जेलों में हजार से ज्यादा आदिवासियों को बंद किया गया है। यदि पूरे राज्य में यह गणना करें तो पांच हजार से पार पहुंचेगी। इसके साथ ही एक और चैंकाने वाला आंकडा गौरतलब है कि ताजा जनगणना बताती है कि बस्तर अंचल में आदिवासियों की जनसंख्या ना केवल कम हो रही है, बल्कि उनकी प्रजनन क्षमता भी कम हो रही है। सनद 2001 की जनगणना में यहां आबादी वृद्धि की दर 19.30 प्रतिशत थी। सन 2011 में यह घट कर 8.76 रह गई है। चूंकि जनजाति समुदाय में कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुरीतियां हैं ही नहीं, सो बस्तर, दंतेवाडा, कांकेर आदि में शेष देश के विपरीत महिला-पुरुष  का अनुपात बेहतर है। यह भी कहा जाता है कि आबादी में कमी का कारण हिंसा से ग्रस्त इलाकों से लोगों का बड़ी संख्या में पलायन है। ये आंकडे चीख-चीख कर कह रहे हैं कि आदिवासियांे के नाम पर बने राज्य में आदिवासी की सामाजिक हालत क्या है। यदि सरकार की सभी चार्जषीटों को सही भी मान लिया जाए तो यह हमारे सिस्टम के लिए शोचनीय नहीं है कि आदिवासियों का हमारी व्यवस्था पर भरोसा नहीं है और वे हथियार के बल पर अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए मजबूर हैं। इतने दमन पर सभी दल मौन हैं ौर यही नक्सलवाद के लिए खाद-पानी है।
अब भारत सरकार के गृहमंत्रालय की आठ साल पुरानी एक रपट की धूल हम ही झाड़ देते हैं - सन 2006 की ‘‘आंतरिक सुरक्षा की स्थिति’’ विषय पर रिपोर्ट में स्पष्ट बताया गया था कि देश का कोई भी हिस्सा नक्सल गतिविधियों से अछूता नहीं है। क्योंकि यह एक जटिल प्रक्रिया है - राजनीतिक गतिविधियां, आम लोगों को प्रेरित करना, शस्त्रों का प्रशिक्षण और कार्यवाहियां। सरकार ने उस रिपोर्ट में स्वीकारा था कि देश के दो-तिहाई हिस्से पर नक्सलियों की पकड़ है। गुजरात, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर में भी कुछ गतिविधियां दिखाई दी हैं। दो प्रमुख औद्योगिक बेल्टों - ‘भिलाई-रांची, धनबाद-कोलकाता’ और ‘मुंबई-पुणे-सूरत-अहमदाबाद’ में इन दिनों नक्सली लोगों को जागरूक करने का अभियान चलाए हुए हैं। इस रपट पर कार्यवाही, खुफिया सूचना, दूरगामी कार्ययाोजना का कहीं अता पता नहीं है। बस जब कोई हादसा होता है तो सश स्त्र बलों को खूनखराबे के लिए जंगल में उतार दिया जाता है, लेकिन इस बात पर कोई जिम्मेदारी नहीं तय की जाती है कि एक हजार नक्सली हथियार ले कर तीन घंटों तक गोलियां चलाते हैं, सड़कों पर लैंड माईन्य लगाई जाती है और मुख्य मार्ग पर हुई इतनी बड़ी योजना की खबर किसी को नहीं लगती है।
भारत सरकार मिजोरम और नगालैंड जैसे छोटे राज्यों में शांति  के लिए हाथ में क्लाशनेव रायफल ले कर सरेआम बैठे उग्रवादियों से ना केवल बातचीत करती है, बल्कि लिखित में युद्ध विराम जैसे समझौते करती है। कष्मीर का उग्रवाद सरेआम अलगाववाद का है और तो भी सरकार गाहे-बगाहे हुरीयत व कई बार पाकिस्तान में बैठे आतंकी आकाओं से शांतिपूर्ण हल की गुफ्तगु करती रहती है, फिर नक्सलियों मे ऐसी कौन सी दिक्कत है कि उनसे टेबल पर बैठ कर बात नहीं की जा सकती- वे ना तो मुल्क से अलग होने की बात करते हैं और ना ही वे किसी दूसरे देश  से आए हुए है। कभी विचार करें कि सरकार व प्रशा सन में बैठे वे कौन लोग है जो हर हाल में जंगल में माओवादियों को सक्रिय रखना चाहते हैं, जब नेपाल में वार्ता के जरिये उनके हथियार रखवाए जा सकते थे तो हमारे यहां इसकी कोशिशें  क्यों नहीं की गईं।  याद करें 01 जुलाई 2010 की रात को आंध््राप्रदेश  के आदिलाबाद जिले के जंगलों में महाराश्ट्र की सीमा के पास सीपीआई माओवादी की केंद्रीय कमेटी के सदस्य चेरूकुरी राजकुमार उर्फ आजाद और देहरादून के एक पत्रकार हेमचंद्र पांडे को पुलिस ने गोलियों से भून दिया था। पुलिस का दावा था कि यह मौतें मुठभेड में हुई जबकि तथ्य चीख-चीख कर कह रहे थे कि इन दोनों को 30 जून को नागपुर से पुलिस ने उठाया था। उस मामले में सीबीआई जांच के जरिए भले ही मुठभेड़ को असली करार दे दिया गया हो, लेकिन यह बात बड़ी साजिश  के साथ छुुपा दी गई कि असल में वे दोनों लोग स्वामी अग्निवेश  का एक खत ले कर जा रहे थे, जिसके तहत शीर्ष नक्सली नेताओं को केंद्र सरकार से शांति वार्ता करना था। याद करें उन दिनों तत्कालीन गृह मंत्री चिदंबरम ने अपना फैक्स नंबर दे कर खुली अपील की थी कि माओवादी हमसे बात कर सकते हैं। उस धोखें के बाद  नक्सली अब किसी भी स्तर पर बातचीत से डरने लगे हैं। इस पर निहायत चुप्पी बड़ी साजिश  की ओर इशा रा करती है कि वे कौन लोग हैं जो नक्सलियों से शांति वार्ता में अपना घाटा देखते हैं। यदि आंकड़ों को देखें तो सामने आता है कि जिन इलाकां में लाल-आतंक ज्यादा है, वहां वही राजनीतिक दल जीतता है जो वैचारिक रूप से माओ-लेनिन का सबसे मुखर विरोधी है।
एक तरफ सरकारी लूट व जंगल में घुस कर उस पर कब्जा करने की बेताबी है तो दूसरी ओर आदिवासी क्षेत्रों के सरंक्षण का भरम पाले खून बहाने पर बेताब ‘दादा’ लोग। बीच में फंसी है सभ्यता, संस्कृति, लोकतंत्र की साख। नक्सल आंदोलन के जवाब में ‘सलवा जुड़ुम’ का स्वरूप कितना बदरंग हुआ और इसकी परिणति दरभा घाटी में किस नृशंसता   से हुई ; सबके सामने है। बंदूकों को अपनो पर ही दाग कर खून तो बहाया जा सकता है, नफरत तो उगाई जा सकती है, लेकिन देश  नहीं बनाया जा सकता। तनिक बंदुकों को नीचे करें, बातचीत के रास्तें निकालें, समस्या की जड़ में जा कर उसके निरापद हल की कोशिश  करें- वरना सुकमा की दरभा घाटी या बीजापुर के आर्सपेटा में खून के दरिया ऐसे ही बहते रहेंगे। अब यह साफ होता जा रहा है कि नक्सलवाद सभी के लिए वोट उगाहने का जरिया मात्र है, वरना हजारों लोगों के पलायन, लाखें लोगों के सुरक्षा बलों के कैंप में रहने से बेपरवाही नहीं होती।

शनिवार, 25 अक्तूबर 2014

Diwari Garbage has proved that we only through slogans

तो क्या हम केवल नारे लगाना जानते हैं ?

द सी एक्‍सप्रेस, आगरा, http://theseaexpress.com/epapermain.aspx
                                                                 पंकज चतुर्वेदी
दीवाली के कोई दो सप्ताह पहले प्रधानमंत्री ने एक पहल की, निहायत एक सामाजिक पहल, अनिवार्य पहल और देष की छबि दुनिया में सुधारने की ऐसी पहल जिसमें एक आम आदमी भी भारत-निर्माण में अपनी सहभागिता बगैर किसी जमा-पूंजी खर्च किए दे सकता था- स्वच्छ भारत अभियान। पूरे देश में झाडू लेकर सड़कों पर आने की मुहीम सी छिड़ गई - नेता, अफसर, गैरसरकारी संगठन, स्कूल, हर जगह सफाई अभियान की ऐसी धूम रही कि बाजार में झाड़ुओं के दाम आसमान पर पहुंच गए। और फिर आ गई दीपावली, हर घर में साफा-सफाई का पर्व, कहते हैं कि जहां गंदगी होती है वहां लक्ष्मीजी जाती नहीं हैं, सो घरों का कूड़ा सड़कों पर डालने का दौर चला। हद तो दीपावली की रात को हो गई, बीते पांच सालों के दौरान सबसे ज्यादा आतिषबाजी इस रात चली, ना कायदेां की चिंता रही , ना नियमों की परवाह। सुबह सारी सड़कें जिस तरह गंदगी, कूड़े से पटीं थीं, उससे साफ हो गया कि हमारा सफाई अभियान अभी दिल-दिमाग से नहीं केवल मुंह जबानी खर्च पर ही चल रहा है।
देश के स्वास्थ्य मंत्री व गत तीस सालों से हर रोज सैंकड़ों मरीजों को देख रहे वरिष्‍ठ चिकित्सक डा. हर्षवर्धन ने तो साफ-साफ अपील की कि आतिशबाजी से लोगों के सुनने की क्षमता प्रभावित होती है, उससे निकले धुएं से हजारों लोग सांस लेने की दिक्कतों के स्थाई मरीज बन जाते हैं, पटाखों का धुआं कई महीनों का प्रदूषण बढ़ा जाता है। डाक्टर हर्षवर्धन ने आतिशबाजी रहित दीपावली मनाने की अपील की, जिसे मीडिया ने भी बहुत तवज्जों नहीं दिया। इसके बावजूद उन्हीं की पार्टी के लोगों ने दो राज्यों में चुनाव जीत से लेकर दीपावली के तीन दिनों में सबसे ज्यादा गंदगी सड़कों व वायुमंडल में घोल दी। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री ने कहीं भी किसी तरह की आतिशबाजी नहीं चलाई। इससे भी अधिक दुखद बात यह है कि झाड़ू ले कर सफाई करने के फोटो अखबार में छपवाने वाले बगैर आतिशबाजी के दीपावली मनाने की मुहिम पर आक्रामक हो कर उसे ‘‘धर्म-विरोधी’’ निरूपित कर रहे हैं। कुछ लोग इदउलजुआ पर मांसाहार का विरोध व दीपावली पर पटाकों के विरोध करने को फैशन बता कर मखौल उडा रहे हैं। कुछ लोग इसे निजी व देश की खुशी बढ़ने से जोड़ रहे हैं। हकीकत तो यह है कि कई साल पहले सुप्रीम कोर्ट भी आदेश दे चुकी है कि रात में 10 बजे के बाद आतिशबाजी ना हो क्योंकि इससे बीमार, अशक्त लोगों को असीम दिक्कतें होती हैं। धमाकेां की आवाज को ले कर भी 80 से 100 डेसीमल की सीमा है, लेकिन दस हजार पटाकों की लड़ी या दस सुतली बम एकसाथ जला कर अपनी आस्था या खुशी का इजहार करने वालों के लिए कानून-कायदे कोई मायने नहीं रखते।
इस बार पूरे देश में आतिशबाजी के कारण छोटे-बड़े हजार से ज्यादा अग्निकांड हो चुके हैं, जिसमें दिल्ली से सटे फरीदाबाद में आतिशबाजी बाजार का पूरा फुंकना तथा गाजियाबाद के इंदिरापुरम में पटाके की चिंगारी से पूरे फर्नीचर बाजार का धुआं होना भी शामिल है, कई करोड़ की राख बना चुका है।  चीन से आए गैरकानूनी पटाकों को चलाने में ना तो देशप्रेम आड़े आया और ना ही वैचारिक प्रतिबद्धता। कुछ लोग सफाई कर्मचारियों को कोस रहे हैं कि सड़कों पर आतिशबाजी का मलवा साफ करने वे सुबह जल्दी आए नहीं, यह सोचे बगैर कि वे भी इंसान हैं और उन्होंने भी बीती रात दीवाली मनाई होगी। यह बात लोग, विषेशरूप से झाड़ू हाथ में ले कर दुनिया बदलने के नारे देने वाले राजनीतिक कार्यकर्ता, यह नहीं समझ लेते कि हमारे देष में सफाई से बड़ी समस्या अनियंत्रित कूड़ा है। पहले कूड़ा कम करने के प्रयास होना चाहिए, साथ में उसके निस्तारण के। दीवाली के धुएं व कूड़े ने यह बात तो सिद्ध कर दी है कि अभी हम मानसिक तौर पर प्रधानमंत्रीजी की अपील के क्रियान्वयन व अमल के लिए तैयार नहीं हुए हैं। जिस घर में छोटे बच्चे, पालतु जानवर या बूढ़े व दिल के रोग के मरीज हैं जरा उनसे जा कर पूछें कि परंपरा के नाम पर वातावरण में जहर घोलना कितना पौराणिक, अनिवार्य तथा धार्मिक है। एक बात और भारत में दीवाली पर पटाके चलाने की परंपरा भी डेढ सौ साल से ज्यादा पुरानी नहीं है और इस दौर में कुरीतियां भंग भी हुई व नई बनी भीं, परंपरा तो उसे कहा नहीं जा सकता ।
शायद यह भारत की रीति ही है कि हम नारेां के साथ आवाज तो जोर से लगाते हैं लेकिन उनके जमीनी धरातल पर लाने में ‘किंतु-परंतु’ उगलने लगते हैं। कहा गया कि भातर को आजादी अहिंसा से मिली, लेकिन जैसे ही आजादी मिली, दुनिया के सबसे बड़े नरसंहारों में से एक विभाजन के दौरान घटित हो गया और बाद में अहिंसा का पुजारी हिंसा के द्वारा ही गौलोक गया। ‘‘यहां शराब नहीं बेची जाती है’’ या ‘‘देखो गधा मूत रहा है’’ से लेकर ‘दूरदृष्‍िट- पक्का इरादा’, ‘‘अनुशासन ही देश को महान बनाता है’’ या फिर छुआछूत, आतंकवाद, सांप्रदायिक सौहार्द या पर्यावरण या फिर ‘बेटी बचाओ’- सभी पर अच्छे सेमीनार होते हैं, नारे व पोस्ट गढ़े जाते हैं, रैली व जलसे होते हैं, लेकिन उनकी असलियत दीवाली पर हुई हरकतों पर उजागर होती है। हर इंसान चाहता है कि देश मे बहुत से शहीद भगत सिंह पैदा हों, लेकिन उनके घर तो अंबानी या धोनी ही आए, पड़ोस में ही भगत सिंह जनम्ें, जिसके घर हम कुछ आंसु बहाने, नारे लगाने या स्मारक बनाने जा सकें। जब तक खुद दीप बन कर जलने की क्षमता विकसित नहीं होगी, तब तक दीया-बाती के बल पर अंधेरा जाने से रहा। अब तो लगता है कि सामुदायिक व स्कूली स्तर पर इस बात के लिए नारे गढ़ने होंगे कि नारों को नारे ना रहने दो, उन्हें ‘नर-नारी’ का धर्म बना दो।

बुधवार, 22 अक्तूबर 2014

My articles on India Water portal

इंडिया वाटर पोर्टल ने मेरे बहुत से लेखों को एक जगह जमा कर दिया है, यह सभी पानी, पर्यावरण व समाज से जुडे हैं जब समय मिले तो देखें http://hindi.indiawaterportal.org/pankajchaturvedi

मंगलवार, 21 अक्तूबर 2014

दो सरकारी योजनाएं, सार्वजनिक वितरण प्रणाली तथा मनरेगा, लंपट लोगों के घर भरने का जरिया बन गई हैं, इसमें कोई शक नहीं कि गरीब लोगों के आर्थिक व सामजिक उत्‍थान के लिए कुछ किया जाना सरकार व समाज का फर्ज है, लेकिन ऐसी योजनाएं तो गरीबों से ज्‍यादा अफसरों व दलालों के घर भर रही हैं, इस मुद्रदे पर मेरा लेख राज एक्‍सप्रेस, भोपाल के संपादकीय पेज पर हैं , इसका लिंक हैhttp://epaper.rajexpress.in/epapermain.aspx?edcode=25&eddate=10%2f22%2f2014 और इसे मेरे ब्‍लॉग पर भी पढ सकते हैं pankajbooks.blogspot.in
RAJ EXPRESS BHOPAL 22-10-14


गरीबों से ज्यादा भरे पेट वालों के लिए है खाद्य सुरक्षा योजनाएं
पंकज चतुर्वेदी
छत्तीसगढ़ में हाल ही में राज्यभर में बीपीएल व अन्य राशन कार्डों की जांच हुई तो पता चला कि 66 लाख कार्डों में से 19 फीसदी फर्जी थे जो 63 हजार मेट्रीक टन चावल हड़प कर चुके हैं। अनुमान है कि है कि हर महीने इस तरह 151 करोड का घोटाला हो रहा था। यदि इसमें नमक, दाल, केरोसीन को भी जोड़ लिया जाए तो हर महीने 165 करोड़ का घपला है। विदित हो कि राज्य में बीपीएल परिवारों को 35 किलो अनाज एक या दो रूप्ए किलो पर तथा दो किलो नमक, 1.3 किलो चीनी और चार लीटर केरोसीन इन कार्ड पर मिलता है। यह उस राज्य की हालत है जिसकी सार्वजनिक वितरण प्रणाली को देश में श्रेष्‍ठतम माना गया था और कहा गहा गया था कि सार्क देश छत्तीसगढ़ से गरीब लोगों को भूखा रहने से बचाने का प्रशिक्षण लेंगे। यह हाल उस राज्य का है जिसकी नजीर दुनियाभर में दी जाती है तो अनुमान लगा लें कि दीगर सूबों में गरीबों का अनाज कहां जा रहा होगा । सनद रहे नई सरकार के नए बजट में खाद्य सुरक्षा के मद में बीते साल के 92 हजार करोड़ की तुला में सवा लाख करोड़ का प्रावधान है।
यदि आजादी के बाद से अभी तक देश में गरीबों के उत्थान के लिए चलाई गई योजनाओं पर व्यय राशि को जोड़े तो इस मद पर इतना धन खर्च हो चुका है कि देश में किसी को भी दस लाख रूपए से कम का मालिक नहीं होना था, हर व्यक्ति के सिर पर छत होना था और अब इस तरह की योजनाओं पर सरकारी इमदाद की जरूरत नहीं पड़नी थी। अब यह किसी से छिपा नहीं है कि ऐसी योजनाओं का असल लाभ हितग्राहियों तक क्यों नहीं पहुंचा और हर साल गरीबों की संख्या व उसी की तुलना में सरकारी इमदाद बढ़ता जा रहा है। यही नहीं ऐसी योजनाओं के चलते देश में काला धन बढ़ रहा है जो अर्थ व्यवस्था व कराधान देानेां के लिए घातक है।
इस बार तो चुनावों के दौरान सुप्रीम कोर्ट व चुनाव आयोग दोनों ने चेताया था कि सभी राजनीतिक दलों को ‘‘मुफ्त उपहार‘‘ जैसे लुभावने वायदों से बचना चाहिए। उ.प्र. में मुफ्त लेपटाप वितरण योजना को अंततः बंद करना पड़ा व अब सरकार को समझ आया कि मूलभूत सुविधाओं के विकास के बगैर लोगों को इस तरह की उपहार योजनाओं से बरगलाया नहीं जा सकता। केंद्र की नई सरकार का पहला बजट बस आने ही वाला है और जनता की उम्मीदों के दवाब के साथ-साथ सरकार यह भी जानती है कि विकास के लिए धन जुटाने के लिए कुछ कड़वे फैसले लेने पड़ सकते हैं। शायद अब वक्त आ गया है कि सरकार वास्तविक जरूरतमंदों तक इमदाद पहुंचाने के लिए कुछ वैकल्पिक व्यवस्था करे और सरकार का खजाना खाली कर कतिपय माफिया का पेट भरने वाली योजनाओं को अलविदा कहे। इसमें अनाज का वितरण भ्रष्‍टाचार और सरकार की सबसिडी का सबसे बड़ा हिस्सा चट कर रहा है। इस समय हर साल 15 से 16 लाख मेट्रीक टन अनाज ऐसी योजनाओं के जरिए वितरित होता है। खाद्य पदार्थ  वितरण के लिए आज चावल की खरीद रू. 14 प्रति किलो सरकार करती है, यह गोडाउन से होते हुए राषन की दुकान तक पहुंचता है तो दाम रू. 24 प्रति किलो हो जाता है। जबकि इसका वितरण एक या दो रूपए किलो में होता है। असली दाम व बिक्री के बीच के अंतर को सरकार उस पैसे से पूरा करती है जिसे विभिन्न टैक्सों द्वारा वसूला जाता है। इस तरह हर साल कोई 1,250 अरब रूपए की सबसिडी का बोझ सरकारी खजाने पर पड़ता है। मंत्रालय की रिपेार्ट स्वीकार करती है कि पीडीएस यानी सार्वजनिक वितरण प्रणाली में लीकेज 40 प्रतिशत है। इसी से अंदाज लगा लें कि इस मद में ही हर साल कितनी बड़ी राषि देष में काले धन को बढ़ा रही है।
उत्तर प्रदेश का तो बड़ा ही विचित्र मामला है- गरीबों व गरीबी की रेखा से नीेचे रहने वालों के लिए सस्ती दर पर अनाज वितरित करने की कई योजनाओं - अन्तोदय, जवाहर रोजगार योजना, स्कूलों में बच्चों को मिडडे मील, बीपीएल कार्ड वालों को वितरण आदि के लिए सन 2001 से 2007 तक राज्य को भेजे गए अनाज की अधिकांष हिस्सा गोदामों से सीधे बाजार में बेच दिया गया। घोटालेबाजों की हिम्मत और पहंुच तो देखो कि कई-कई रेलवे की मालगाडि़यां बाकायदा बुक की गईं और अनाज को बांग्लादेश व नेपाल के सीमावर्ती जिलों तक ढोया गया और वहां से बाकायदा ट्रकों में लाद कर बाहर भेज दिया गया। खबर तो यह भी है कि कुछ लाख टन अनाज तो पानी के जहाजों से सुदूर अफ्रीकी देशों तक गया। ऐसा नहीं कि सरकारों को मालूम नहीं था कि इतना बड़ा घोटाला हो रहा है, फिर भी पूरे सात साल तक सबकुछ चलता रहा। अभी तक इस मामले में पांच हजार एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं। हालंाकि कानून के जानकार कहते  हैं कि इसे इतना विस्तार इसी लिए दिया गया कि कभी इसका ओर-छोर हाथ मंे ही ना आए।
नवंबर-20074 में उ.प्र. के खाद्य-आपूर्ति विभाग के सचिव ने बांग्ला देश व अन्य देशों को भेजे जा रहे अनाज के बारे में जानकारी मांगी।  दिसंबर-2004 में रेलवे ने उन जिलों व स्टेशनों की सूची मुहैया करवाई जहां से अनाज बांग्ला देश भेजने के लिए विशेष गाडि़यां रवाना होने वाली थीं।  वर्ष 2005 में लखीमपुरी खीरी के कलेक्टर सहित  कई अन्य अफसरों की सूची सरकार को मिली, जिनकी भूमिका अनाज घोटाले मंें थी। सन 2006 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने ई ओ डब्लू को इसकी जांच सौंपी थी और तब अकेले बलिया जिले में 50 मुकदमें दर्ज हुए। राज्य में सरकार बदली व जून-2007 में मायावती ने जांच का काम स्पेशल टास्क फोर्स को सौंपा, जिसकी जांच के दायरे में राज्य के 54 जिले आए और तब कोई पांच हजार मुकदमें कायम किए गए थे। सितंबर-2007 में राज्य सरकार ने घोटाले की बात स्वीकार की और दिसंबर-2007 में मामला सीबीआई को सौंपा गया। पता नहीं क्यों सीबीआई जांच में हीला-हवाली करती रही, उसने महज तीन जिलों में जांच का काम किया।
सन 2010 में इस पर एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई, जिसे बाद में हाई कोर्ट, इलाहबाद भेज दिया गया। 03 दिसंबर 2010 को लखनऊ बैंच ने जांच को छह महीने इसे पूरा करने के आदेश दिए लेकिन अब चार साल हो जाएंगे, कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं है। विडंबना है कि जांच एजेंसियां अदालत को सूचित करती रहीं कि यह घोटाला इतना व्यापक है कि उसकी जांच के लिए उनके पास मशीनरी नहीं है। इसमें तीस हजार मुकदमें और कई हजार लोगों की गिरफ्तारी करनी होगी। इसके लिए जांच एजेंसी के पास ना तो स्टाफ है और ना ही दस्तावेज एकत्र करने लायक व्यवस्था। प्रारंभिक जांच में मालूम चला है कि राज्य के कम से कम 31 जिलों में बीते कई सालों से यह नियोजित अपराध चल रहा था। सरकार कागज भर रही थी कि इतने लाख गरीबों को इतने लाख टन अनाज बांटा गया, जबकि असली हितग्राही खाली पेट इस बात से बेखबर थे कि सरकार ने उनके लिए कुछ किया भी है। जब हाई कोर्ट ने आदेश दिया तो सीबीआई ने अनमने मन से छह जिलों में कुछ छापे मारे, कुछ स्थानीय स्तर के नेताओं के नाम उछले। फिर अप्रैल-2011 में राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई और हाई कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दे डाली जिसमें सीबीआई जांच का निर्देष दिया गया था। जाहिर है कि मामला लटक गया, या यों कहें कि लटका दिया गया। छत्तीसगढ़ और उत्तरप्रदेश तो बानगी मात्र हैं, शायद ही देश का कोई ऐसा राज्य हो जहां फर्जी राशनकार्ड व उसके नाम पर अनाज वितरण के घपले ना होते हों।
यह भी सही है कि देष में कई करोड़ लोग दो जून की रोटी नहीं जुटा पा रहे हैं, कुपोषण एक कडवी सच्चाई और उनके लिए कल्याणकारी योजनाएं भी जरूरी हैं। लेकिन वास्तविक हितग्राहियां की पहचान करना, खरीदे गए अनाज को उस तक पहुंचाने के व्यय को यदि नियोजित किया जाए तो इस मद का 25 फीसदी बजट को बचाना बेहद सरल है। एक साल में 25 से 30 लाख करोड़ को माफिया के हाथों में जाने से रेाकने के लिए कुछ तकनीकी, प्रशासनीक व नैतिक कार्यवाही समय की मांग है।
एक तरीका है कि हर साल कुछ लाख लोगों के खातों में पांच-पांच लाख जमा करवाए जाएं और उसके ब्याज से उनका खर्च चले। इस तरह मूल पूंजी बैंक से कमाध्यम से सरकार के पास होगी व गरीब परिवारों को सबसिडी नहीं देना होगी। वैसे हाल ही में केद्र सरकार की प्रत्येक सांसद द्वारा एक गांव को गोद लेने की योजना भी इसमें सकारात्मक भूमिका निभा सकती है।

शनिवार, 18 अक्तूबर 2014

Do not waste Cow dung

THE SEA EXPRESS AGRA 19-10-14http://theseaexpress.com/epapermain.aspx
गोबर को ‘गोबर’ ही ना समझो !
पंकज चतुर्वेदी
अपने खेतों में गाय का गोबर डालें । जमीन सुधारने के लिए कैंचुओं की सेवा लें, वह भी बगैर कोई मजदूरी चुकाए । थोड़ा सा ग्रह-नक्षत्र की स्थिति पर नजर रखें । पाएंगे कि आपकी हारी-थकी धरती को नया जीवन मिल गया है । आधुनिक खेती के तहत रासायनिक खाद और दवाओं के इस्तेमाल से आहत और बांझ हो रही जमीन को राहत देने के लिए फिर से पलट कर देखना होगा । कुछ विदेशी किसानों ने भारत की सदियों पुरानी पारंपरिक कृषि प्रणाली को अपना कर चमत्कारी नतीजे प्राप्त किए हैं ।
कहा जाता था कि भारत सोने की चिडि़या था । हम गलत अनुमान लगाते हैं कि हमारे देश में पीले रंग की धातु सोने का अंबार था । वास्तव में हमारे खेत और हमारे मवेशी हमारे लिए सोने से अधिक कीमती थे । कौन कहता है कि अब भारत सोने की चिडि़या नहीं रहा । सोना अभी भी यहां के चप्पे-चप्पे में बिखरा हुआ है । दुर्भाग्य है कि उसे चूल्हों में जलाया जा रहा है । दूसरी तरफ अन्नपूर्णा जननी धरा तथाकथित नई खेती के प्रयोगों से कराह रही है ।
रासायनिक खाद से उपजे विकार अब तेजी से सामने आने लगे है । दक्षिणी राज्यों में सैंकड़ों किसानों के खुदकुशी करने के पीछे रासाायनिक दवाओं की खलनायकी उजागर हो चुकी है । इस खेती से उपजा अनाज जहर हो रहा है । रासायनिक खाद डालने से एक दो साल तोे खूब अच्छी फसल मिलती है । फिर जमीन बंजर होती जाती है ।
जमीन हमारी मां है । बेशकीमती मिट्टी की ऊपरी परत( टाप सोईल ) का एक इंच तैयार होने में 500 साल लगते हैं । जबकि खेती की आधुनिक प्िरक्रया के चलते एक इंच टाप सोईल मात्र 16 वर्ष में नष्ट हो रही है । रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल के कारण मिट्टी सूखी और बेजान हो जाती है । यही भूमि के क्षरण का मुख्य कारण है । वहीं गोबर से बनी कंपोस्ट या प्राकृतिक खाद से उपचारित भूमि की नमी की अवशोषण क्षमता पचास फीसदी बढ़ जाती है ।  फलस्वरूप मिट्टी ताकतवर, गहरी और नम रहती है । इससे मिट्टी का क्षरण भी रुकता है ।
यह बात सभी मानते है कि कृत्रिम उर्वरक यानी रासायनिक खादें मिट्टी में मौजूद प्राकृतिक खनिज लवणों का भारी मात्रा में शोषण करते हैं । इसके कारण कुछ समय बाद जमीन में जरूरी खनिज लवणों की कमी आ जाती है । जैसे कि नाईट्रोजन के उपयोग से भूमि में प्राकृतिक रूप से उपलब्ध पोटेशियम का तेजी से क्षरण होता है । इसकी कमी पूरी करने के लिए जब पोटाश प्रयोग में लाते हैं तो फसल में एस्कोरलिक एसीड (विटामिन सी) और केरोटिन की काफी कमी आ जाती है । इसी प्रकार सुपर फास्फेट के कारण मिट्टी में तांबा और जस्ता चुक जाता है । जस्ते की कमी के कारण शरीर की वृद्धि और लैंगिक विकास में कमी, घावों के भरने में अड़चन आदि रोग लग जाते हैं । नाईट्रोजन,फास्फोरस और पोटाश उर्वरकों से संचित भूमि में उगाए गेंहू और मक्का में प्रोटीन की मात्रा 20 से 25 प्रतिशत कम होती है ।
रासायनिक दवाओं और खाद के कारण भूमिगत जल के दूषित होने की गंभीर समस्या भी खड़ी हो रही है । गौरतलब है कि अभी तक ऐसी कोई तकनीकी विकसित नहीं हुई है जिससे भूजल को रासायनिक जहर से मुक्त किया जा सके । ध्यान रहे अब धरती पर जल संकट का एक मात्र निदान भूमिगत जल ही बचा है ।
न्यूजीलेंड एक विकसित देश है। यहां आबादी के बड़े हिस्से का जीवनयापन पशु पालन से होता है । यहां के लेाग दूध और उससे बनी चीजों का व्यापार करते हैं । इस देश में पीटर प्राक्टर पिछले 30 वर्षों से जैविक खेती के विकास में लगे हैं । पीटर का कहना है कि यदि अब खेतों को रसायनांे से मुक्त नहीं किया गया तो मनुष्य का समूचा शरीर ही जहरीला हो जाएगा । वे बताते हैं कि उनके देश में फास्फाईड के अंधाधंुध इस्तेमाल से खेतों की जमीन बीमार हो गई है । साथ ही इन रसायनों के प्रयोग के बाद शेष बचा कचरा धरती के लिए कई अन्य पर्यावरणीय संक्ट पैदा कर रहा है । जैसे एक टन यूरिया बनाने के लिए पांच टन कोयला फंूकना पड़ता है ।
पीटर के मुताबिक जैविक खेती में गाय के सींग की भूमिका बेहद चमत्कारी होती है । वे कहते हैं कि सितंबर महीने में गहरे गड्ढे में गाय का गोबर भरें । साथ में टोटके के तौर पर गाय के सींग का एक टुकड़े को दबा दें । फरवरी या मार्च में इस सींग और कंपोस्ट को निकाल लें । खाद तो अपनी जगह काम करेगी ही, यह सींग का टुकड़ा भी जिस खेत में गाड़ देंगे वहां बेहतरीन व रोग मुक्त फसल होगी । प्राक्टर ने यह प्रयोग नारियल की खोल, प्लास्टिक के सींग आदि के साथ भी किए । परंतु उन्होंने पाया कि गाय के सींग से तैयार मिट्टी सामान्य मिट्टी से 15 गुना और कैंचुए द्वारा उगली हुई मिट्टी से दुगनी अधिक उर्वरा व सक्रिय थी ।
सींग के साथ तैयार कंपोस्ट को कोई 30 लीटर पानी में घोलें । इसे सूर्योदय के पहले सुबह खेतों में छिड़कें । ऐसी जमीन पर पैदावार अधिक पौष्टिक होती है , जमीन की उर्वरा शक्ति बढ़ती है और कीटनाशकों के उपयोग की जरूरत नहीं पड़ती है ।
पीटर का सुझाव है कि इस कार्य के लिए बरसाती या कुएं का प्रदूषण रहित पानी हलका सा गर्म हो तो परिणाम बेहतर होते है । यही नहीं जिन लोगों को दूध या उसके उत्पादों से एलर्जी हो, वे यदि जैविक खाद से उत्पन्न उत्पादों का भक्षण करने वाले मवेशियों के दूध का इस्तेमाल करें तो उन्हें कोई तकलीफ नहीं होगी । ऐसे खेतों में पैदा आलू व अन्य कंदमूलों का स्वाद कुछ अलग होता है ।
न्यूजीलेंड सरीखे धुर आधुनिक देश के इस कृषि वैझानिक ने पाया कि अच्छी फसल के लिए गृह-नक्षत्रों की चाल का भी खयाल करना चाहिए । वे टमाटर का बीज लगाने के लिए शनि के प्रभाव और चंद्रमा की पूर्ण कला(पूर्णिमा) का इंतजार करते हैं । वे ऐसा मानते है कि ऐसे समय लगाए गए टमाटर में कभी रोग नहीं लगते हैं ।
कुछ साल पहले हालैंड की एक कंपनी ने भारत को गोबर निर्यात करने की योजना बनाई थी तो खासा बवाल मचा था । लेकिन यह दुर्भाग्य है कि इस बेशकीमती कार्बनिक पदार्थ की हमारे देश में कुल उपलब्धता आंकने के आज तक कोई प्रयास नहीं हुए । अनुमान है कि देश में कोई 13 करोड़ मवेशी हैं , जिनसे हर साल 120 करोड़ टन गोबर मिलता है । उसमें से आधा उपलों के रूप में चूल्हों में जल जाता है । यह ग्रामीण उर्जा की कुल जरूरत का 10 फीसदी भी नहीं है । 1976 में राष्ट्रीय कृषि आयोग की रिपोर्ट में कहा गया था कि गोबर को चूल्हे में जलाया जाना एक अपराध है ।  ऐसी और कई रिपोर्टें सरकारी बस्तों में बंधी होंगी । लेकिन इसके व्यावहारिक इस्तेमाल के तरीके ‘‘गोबर गैस प्लांट’’ की दुर्गति यथावत है । राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत निर्धारित लक्ष्य के 10 फीसदी प्लांट भी नहीं लगाए गए हैं और ऐसे प्लांट सरकारी सबसिडी गटकने से ज्यादा काम में नहीं हैं। उर्जा विशेषज्ञ मानते हैं कि हमारे देश में गोबर के जरिए 2000 मेगावाट उर्जा उपजाई जा सकती है ।
सनद रहे कि गोबर के उपले जलाने से बहुत कम गर्मी मिलती है । इस पर खाना बनाने में बहुत समय लगता है । यानी गोबर को जलाने से बचना चाहिए । यदि इसका इस्तेमाल खेतों में किया जाए तो अच्छा होगा । इससे एक तो महंगी रासायनिक खादों व दवाओं का खर्चा कम होगा । साथ ही जमीन की ताकत भी बनी रहेगी । पैदा फसल शुद्ध होगी, यह भी बड़ा फायदा होगा ।
यदि गांव के कई लोग मिल कर गोबर गैस प्लांट लगा लें तो इसका उपयोग रसोई में अच्छी तरह होगा । गैस प्लांट से निकला कचरा बेहतरीन खाद का काम करेगा । इस तरह गोबर एक बार फिर हमारे देष को सोने की चिडि़या बना सकता है । जरूरत तो बस इस बात की है कि इसका उपयोग ठीक तरीके से किया जाए ।

पंकज चतुर्वेदी
साहिबाबाद, गाजियाबाद 201005

शुक्रवार, 17 अक्तूबर 2014

Armed Forces : Ignorance resulting violance


सुरक्षा बल: अनदेखी से उपजता असंतोष
DAINIK JAGRAN 18-10-14http://epaper.jagran.com/epaper/18-oct-2014-262-edition-National-Page-1.html
पंकज चतुर्वेदी
कांचीपुरम(तमिलनाडु)के परमाणु सयंत्र में तैनात सीआईएसएफ के प्रधान आरक्षक  विजय प्रताप सिंह को जैसे ही सुबह ड्यूटी के लिए हथियार मिले, उसने ताबड़तोड़ फायरिंग कर अपने ही तीन साथियों को मार डाला। वह सन 1990 में  साल से फौज में था, उम्र 45 साल ही हुई थी। हालांकि सीआईएसएफ सबसे अनुशासित अर्धसैनकि बलों में से हैं और उनके यहां इस तरह की घटना 10 साल बाद हुई है। आंकड़े गवाह हैं कि बीते एक दशक में अपने ही लोगों के हाथों या आत्महत्या में मरने वाले सुरक्षाकर्मियों की संख्या देषद्रोहियों से मोर्चा लेने में षहीदों से ज्यादा दूसरी तरफ फौज व सुरक्षा बलों में काबिल अफसरों की कमी, लोगों को नौकरी छोड़ कर जाना और क्वाटर गार्ड या फौजी जेलों में आरोपी कर्मियों की संख्या में इजाफा, अदालतों में मुकदमेंबाजी दिनो-दिन बढ़ रही हैं।
लोग भूल गए होंगे कि मई 2001 में एक फौजी सिपाही सुबाराम को फांसी की सजा सुनाई गई थी क्योंकि उसने अपने अफसर को गोली मार दी थी।  असल में सुबाराम  अपने साथियों की हत्या करने वाले आतंकवादियों को पनाह देने वालों को हाथों-हाथ सजा देना चाहता था, जबकि राजनीतिक आदेशों से बंधे अफसरों ने ऐसा करने से रोका था। उसके सब्र का बांध टूटा व उसने खुद के अफसर को ही मार डाला। पिछले कुछ सालों के दौरान सीमावर्ती और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में  ऐसी घटनांए होना आम बात हो गई है जिसमें कोई उन्मादी सिपाही अपने साथियों को मार देता है या फिर खुद की जीवनलीला समाप्त कर लेता है।  इन घटनाओं से आ रही दूरगामी चेतावनी की घंटी को अंग्रेजी कायदेां मे ंरचे-पगे फौजी आलाकमान ने कभी सलीके से सुनने की कोशशि ही नहीं की, जबकि फौजी के शौर्य और बलिदान से छितरे खून को अपना वोट बैंक में बदलने को तत्पर नेता इसे जानबूझ कर अनसुना करते हैं।  सेना  व अर्ध सैनिक बल के आला अफसरों पर लगातार विवाद होना, उन पर घूसखोरी के आरोप,सीमा या उपद्रवग्रस्त इलाकों में जवानों को माकूल सुविधाएं या स्थानीय मदद ना मिलने के कारण उनके साथियों की मौतों, सिपाही स्तर पर भर्ती में घूसखोरी की खबरों आदि के चलते अनुषासन की मिसाल कहे जाने वाले हमारे सुरक्षा बल(जिनमें फौज व अर्ध सैनिक बल शामिल हैं) का मनोबल गिरा है।
INEXT INDORE 21-10-14
 बीते दस सालों में फौज के 1018 जवान व अफसर खुदकुशी कर चुके हैं। थल सेना के 119 जवानों ने सन 119 में खुदकुशी कर ली थी , यह आंकड़ा सन 2010 में 101 था। केंद्रीय आरक्षित पुलिस बल यानी सीआरपीएफ के 42 जवानों ने 2011 में और 28 ने 2010 में आत्म हत्या की थी। बीएसएफ में यह आंकड़ा 39 और 29(क्रमश- 2011 व 2010) रही है। इंडो तिब्बत सीमा बल यानी आईटीबीपी में  3 और पांच लोगों ने क्रमषः सालों में आत्म हत्या की। वहीं अपने साथी को ही मार देने के औसतन बीस मामले हर साल सभी बलों में मिल कर सामने आ रहे हैं। ब्यूरो आफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ने कोई दस साल पहले एक जांच दल बनाया था जिसकी रिपोर्ट जून -2004 में आई थी। इसमें घटिया सामाजिक परिवेष, प्रमोशन की कम संभावनाएं, अधिक काम, तनावग्रस्त कार्य, पर्यावरणीय बदलाव, वेतन-सुविधाएं जैसे मसलों पर कई सिफारिशें की गई थीं । इनमें संगठन स्तर पर 37 सिफारिशें, निजी स्तर पर आठ और सरकारी स्तर पर तीन सिफारिशें थीं। इनमें छुट्टी देने की नीति में सुधार, जवानों से नियमित वार्तालाप , शिकायत निवारण को मजबूत बनाना, मनोरंजन व खेल के अवसर उपलब्ध करवाने जैसे सुझाव थे। इन पर कागजी अमल भी हुआ, लेकिन जैसे-जैसे देष में उपद्रव ग्रस्त इलाका बढ़ता जा रहा है अर्ध सैनिक बलों व फौज के काम का दायरे में विस्तार हो रहा है।
सनद रहे सेना कभी आक्रमण के लिए और अर्धसैनिक बल निगरानी व सुरक्षा के लिए हुआ करते थे, लेकिन आज फौज की तैनाती और आपरेषन में राजनैतिक हितों के हावी होने का परिणाम है कि कश्‍मीर में फौज व अध्र्य सैनिक बल चैबीसों घंटे तनावग्रस्त रहते हें। एक तरफ अफसरों के मौखिक आदेश हैं तो दूसरी ओर बेकाबू आतंकवादी, तीसरी तरफ सियासती दांवपेंच हैं तो चैथी ओर घर-परिवार से लगातार दूर रहने की चिंता। यही नहीं यदि कियी जवान से कुछ गलती या अपराध हो जाए तो उसके साथ न्याय यानी कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया भी गौरतलब हैं।  पहले से तय हो जाता हे कि मूुजरिम ने अपराध किया है और उसे कितनी सजा देनी है। इधर फौजी  क्वाटर गार्ड में नारकीय जीवन बिताता है तो दूसरी ओर उसके परिवार वालों को खबर तक नहीं दी जाती। नियमानुसार अरोपी के परिवाजन को ‘चार्ज षीट’ के बारे में सूचित किया जाना चाहिए, ताकि वे उसके बचाव की व्यवस्था कर सकें। लेकिन अधिकांष मामलों में सजा पूरी होने तक घर वालों को सूचना ही नहीं दी जाती है। उल्लेखनीय है कि अधिकांष जवान दूरस्थ ग्रामीण अंचलों से बेहद कम आय वाले परिवारों से आते हैं।
देष में अभी भी फौजी व अर्ध सैनिक बलों की वर्दी के प्रति विष्वास बचा हुआ है , शायद इस लिए के आम फाैजी समाज से ज्यादा घुल-मिल नहीं पाता है और ना ही अपना दर्द बयां कर पाता है। वहां की अंदरूनी कहानी कुछ और है। किसी भी बल की आत्मा कहे जाने वाला सिपाही-वर्ग अपने ही अफसर के हाथों शोषण व उत्पीडन का शिकार होता हे।  देहरादून, महु, पुणे, चंडीगढ़ जैसी  फौजी बस्तियों में  सेना के आला रिटायर्ड अफसरों की कोठियों के निर्माण में रंगरूट यानी नयी भर्ती वाला जवान ईंट-सीमेंट की तगारियों ढोते मिल जाएगा।  जिस सिपाही को देश की चैाकसी के लिए तैयार किया जाता है वह डेढ सौ रूप्ए रोज के मजदूरों की जगह काम करने पर मजबूर होता है।  रक्षा मंत्रालय हर साल कई-कई निर्देश सभी यूनीटों में भेजता है कि फौजी अफसर अपने घरों में सिपाहियों को बतौर बटमेन( घरेलू नौकर) ना लगाएं, फिर भी बीस-पच्चीस हजार का वेतन पाने वाले दो-तीन जवान हर अफसर के घर सब्जी ढोते मिल जाते हैं।
आमतौर पर जवानों को अपने घर-परिवार को साथ रखने की सुविधा नहीं होती हे। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि गैर अधिकारी वर्ग के अस्सी फीसदी सुरक्षाकर्मी छावनी इलाकों में घुटनभरे कमरे में मच्छरदानी लगी एक खटिया, उसके नीचे रखा बड़ा सा बक्सा में ही अपना जीवन काटते हैं उसके ठीक सामने अफसरों की ‘‘पांच सितारा मैस’’ होती है। सेना व अर्ध सैनिक मामलों को राश्ट्रहित का बता कर उसे अतिगोपनीय कह दिया जाता है और ऐसी दिक्कतों पर अफसर व नेता सार्वजनिक बयान देने से बचते हैं। जबकि वहां मानवाधिकारों और सेवा नियमों का जम कर उल्लंघन होता रहता है। आज विभिन्न हाई कोर्ट में सैन्य बलों  से जुड़े आठ हजार से ज्यादा मामले लंबित हैं। अकेले सन 2009 में  सुरक्षा बलों के 44 हजार लोगों द्वारा इस्तीफा देने, जिसमें 36 हजार सीआरपीएफ व बीएसएफ के हैं, संसद में एक सवाल में स्वीकारा गया है। 
साफ दिख रहा है कि जवानों के काम करने के हालात सुधारे बगैर मुल्क के सामने आने वाली सुरक्षा चुनौतियों से सटीक लहजे में निबटना कठिन होता जा रहा है। अब जवान पहले से ज्यादा पढ़ा-लिखा आ रहा है, वह पहले से ज्यादा संवेदनशील और सूचनाओं से परिपूर्ण है; ऐसे में उसके साथ काम करने में अधिक जागरूकता व सतर्कता की जरूरत है। नियमित अवकाश, अफसर से बेहतर संवाद, सुदूर नियुक्त जवान के परिवार की स्थानीय परेषानियों के निराकरण के लिए स्थानीय प्रशासन की प्राथमिकता व तत्परता, जवानों के मनोरजंन के अवसर, उनके लिए पानी , चिकत्सा जैसी मूलभूत सुविधाओं को पूरा करना आदि ऐसे कदम हैं जो फौज में अनुशासन व कार्य प्रतिबद्धता, देानो को बनाए रख सकते हैं।
पंकज चतुर्वेदी
9891928376

सोमवार, 13 अक्तूबर 2014

WE HAVE BEEN ENHANCING GARBAGE

जीवन का यह कूड़ा तो हमने ही बढ़ाया है
पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार


DAINIK HINDUSTAN 14-10-2014
http://paper.hindustantimes.com/epaper/viewer.aspx
भले ही हम कूड़े को अपने पास फटकने नहीं देना चाहते हों, लेकिन विडंबना है कि यह कूड़ा हमारी गलतियों या बदलती आदतों के कारण ही दिन-दोगुना, रात-चौगुना बढ़ रहा है। नेशनल एनवॉयर्नमेंट इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट, नागपुर के मुताबिक, देश में हर साल 44 लाख टन खतरनाक कचरा निकल रहा है। हमारे देश में औसतन प्रति व्यक्ति 20 से 60 ग्राम कचरा हर दिन पैदा करता है। इनमें से आधे से अधिक तो कागज, लकड़ी वगैरह होते हैं, जबकि 22 फीसदी कूड़ा-कबाड़ा घरेलू गंदगी होती है। इस कचरे का निपटान पूरे देश के लिए समस्या बनता जा रहा है।
दिल्ली नगर निगम कई-कई सौ किलोमीटर दूर दूसरे राज्यों में कचरे का डंपिंग ग्राउंड तलाश रहा है। जरा सोचें कि इतने कचरे को एकत्र करना, फिर उसे दूर तक ढोकर ले जाना कितना महंगा और जटिल काम है। यह सरकार भी मानती है कि देश के कुल कूड़े का महज पांच प्रतिशत का ईमानदारी से निपटान हो पाता है। राजधानी दिल्ली का तो 57 फीसदी कूड़ा परोक्ष-अपरोक्ष रूप से यमुना में बहा दिया जाता है। कागज, प्लास्टिक, धातु जैसा बहुत-सा कूड़ा तो कचरा बीनने वाले जमा करके रिसाइकिलिंग वालों को बेच देते हैं। सब्जी के छिलके, खाने-पीने की चीजें, मरे हुए जानवर आदि कुछ समय में सड़-गल जाते हैं। इसके बावजूद ऐसा बहुत कुछ बच जाता है, जो हमारे लिए बड़े संकट का रूप लेता जा रहा है।
कचरे को बढ़ाने का काम समाज ने ही किया है। अभी कुछ साल पहले तक स्याही वाला फाउंटेन पेन होता था, फिर ऐसे बॉल-पेन आए, जिनकी केवल रीफिल बदलती थी। आज बाजार में ऐसे पेनों का बोलबाला है, जो खतम होने पर फेंक दिए जाते हैं। बढ़ती साक्षरता के साथ ऐसे पेनों का इस्तेमाल और उसका कचरा बढ़ रहा है। तीन दशक पहले एक व्यक्ति साल भर में बमुश्किल एक पेन खरीदता था और आज औसतन हर साल एक दर्जन पेनों की प्लास्टिक प्रति व्यक्ति खपत है। बाजार से शेविंग किट, दूध और पानी की खरीद तक में यह कूड़ा बढ़ रहा है। अनुमान है कि पूरे देश में हर रोज चार करोड़ दूध की थैलियां व दो करोड़ पानी की बोतलें कूड़े में फेंकी जाती हैं। फेंकी गई पॉलीथिन की थैलियों की मात्रा का तो अनुमान ही मुश्किल है। इन्होंने हर इलाके को कूड़ेघर में बदल दिया है।
लेकिन सबसे खतरनाक कूड़ा तो बैटरियों, कंप्यूटरों, मोबाइलों का है। इनमें पारा, कोबाल्ट और न जाने कितने किस्म के जहरीले तत्व होते हैं। एक अलग तरह का बड़ा खतरा मेडिकल कचरे का है। इसमें से अधिकांश सामग्रियां गलती-सड़ती नहीं हैं और जमीन में जज्ब होकर मिट्टी की गुणवत्ता को प्रभावित करने और भूगर्भ जल को जहरीला बनाने का काम करती हैं। ठीक इसी तरह का जहर बैटरियों व बेकार मोबाइल से भी उपज रहा है। जब तक हम इस कचरे के निपटान की पक्की व्यवस्था नहीं करते, कोई भी सफाई अभियान अधूरा रहेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

Must to know that what type of releaf is requred during disasters

यह तो जान लो कि जरूरत क्या है ?
पंकज चतुर्वेदी
युद्ध हो, भूकंप या बाढ़ या आतंकवादी हमला, भारत के नागरिकों की खासियत है कि ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण अवसरों पर उनके हाथ मदद व सहयेाग के लिए हर समय खुले रहते हैं। छोटे-छोटे गांव-कस्बे तक  आम लोंगो ंसे इमदाद जुटाने के कैंप लग जाते हैं, गली-गली लोग झोली फैला कर घूमते हैं, अखबारों में फोटो छपते हैं कि मदद के ट्रक रवाना किऐ गए। फिर कुछ दिनों बाद आपदा ग्रस्त इलाकों के स्थानीय व राज्य प्रशासन की लानत-मनानत करने वाली खबरें भी छपती हैं कि राहत सामग्री लावारिस पड़ी रही व जरूरतमंदों तक पहुंची ही नहीं। हो सकता है कि कुछ जगह ऐसी कोताही भी होती हो, हकीकत तो यह है कि आम लोगों को यही पता नहीं होता है कि किस आपदा में किस समय किस तरह की मदद की जरूरत है। अब श्रीनगर-कश्‍मीर के जल प्लावन को ही लें, देशभर में कपड़ा-अनाज जोड़ा जा रहा है, और दीगर वस्तुएं जुटाई जा रही हैं, पैसा भी। यह जानने का कोई प्रयास नहीं कर रहा है कि आज वहां तत्काल किस चीज की जरूरत हैं।
श्रीनगर व घाटी की इन दिनों सबसे बड़ी समस्या है, भरे पानी को निकालना, कीचड़ हटाना, मरे जानवरों व इंसानों का निस्तारण करना और सफाई करना। इसके लिए तत्काल जरूरत है पानी के बड़े पंपों की, जेसीबी मशीन, टिप्पर व डंपर की, इंधन की, गेती-फावड़ा दस्ताने, गम बूट की। जब तक गंदगी, मलवा, पानी हटेगा नहीं, तब तक जीव को फिर से पटरी पर लाना मुश्‍किल है। यह भी तय है कि किसी भी सरकारी सिस्टम में इतनी भारी व महंगी मशीने तत्काल खरीदना संभव  नहीं होता। यदि समाज के लोग इस तरह के औजार-उपकरण खरीद कर राज्य सरकार को भेंट दें तो पुनर्वास कार्य सही दिशा में चल पाएंगे। इसके साथ ही वहां जरूरत है साफ पीने के पानी की तो बगैर बिजली वाले फिल्टर, बड़े आरओ, बैटरी, इनवर्टर व आम लोगों के लिए मोमबत्तियां व माचिस की वहां बेहद जरूरत है। कारण, वहां बिजली की सप्लाई सामान्य करने में बहुत से अडंगे हैं। बिजली के तार खंभे, इंस्लेटर व उसे स्थापित करने वाला स्टाफ .... महीनों का काम है। ऐसे में छोटे जनरेटर, इन्वर्टर, बेहद महत्वपूर्ण हैं।
ऐसा नहीं है कि बड़ी व्यवस्थाएं जुटाने के लिए आम , पीडि़त लोगों का ध्यान ही नहीं रखा जाए। इन लोगों के लिए पीने के पानी की बोतलें, डेटाल, फिनाईल, नेफथेलीन की गोलियां, क्लोरिन की गोलियां, पेट में संक्रमण, बुखार जैसी बीमारियों की दवाएं, ग्लूकोज पाउडर, सेलाईन, औरतो के लिए सेनेटरी नेपकीन, फिलहाल तत्काल जरूरत की चीजें हैं। अब यदि आम लोग अपने घर के पुराने ऊनी कपडों की गठरियां या गेंहू चावल वहां भेजेेंगे तो तत्काल उसका इस्तेमाल हो नहीं पाएगा। परिणाम स्वरूप वे लावारिस सड़ते रहेंगे और हरी झंडे दिखा कर फोटो खिंचाने वाले लोग हल्ला करते रहेंगे कि मेहनत से जुटाई गई राहत सामग्री राज्य सरकार इस्तेमाल नहीं कर पाई। यदि हकीकत में ही कोई कुछ भेजना चाहता है तो सीमेंट, लोहा जैसी निर्माण सामग्री के ट्रक भेजने के संकल्प लेना होगा।
कश्‍मीर में ढाई लाख लोग अपने घर-गांव से विस्थापित हुए हैं। वहां के बाजार बह गए हैं। वाहन नष्‍ट हो गए हैं। ऐसे में हुए जान-माल के नुकसान के बीमा दावों का तत्काल व सही निबटारा एक बड़ी राहत होता है। चूंंकि राज्य सरकार का बिखरा-लुटा-पिटा अमला अभी खुद को ही संभालने में लगा है और वहां इससे उपज रहे असंतोष को भुनाने में हुरियत के कतिपय शैतान नेता चालें चल रहे हैं।  हुए नुकसान के आकलन, दावों को प्रस्तुत करना, बीमा कंपनियों पर तत्काल भुगतान के लिए दवाब बनाने आदि कार्यों के लिए बहुत से पढ़े-लिखें लोगों की वहां जरूरत है। ऐसे लोगों की भी जरूरत है जो दूर दराज में हुए माल-असबाब के नुकसान की सूचना, सही मूल्यांकन को सरकार तक पहुंचा सकें व यह सुनिश्‍चित करें कि केंद या राज्य सरकार की किन योजनाआें का लाभ उन्हें मिल सकता है। 
कश्‍मीर में स्कूल, बच्चों के बस्ते, किताबें सब कुछ सैलाब में बह गया है। इस समय कोई  साठ हजार बच्चों को बस्ते, कापी-किताबों, पैंसिल, पुस्तकों की जरूरत है। इस बार नवरात्रि में कन्या भोज की जगह हर घर से यदि एक-एक बच्चे के लिए बस्ता, कंपास, टिफिन बाक्स, वाटर बोटल, पांच नोट बुक, पेन-पैंसिल का सैट वहां चला जा तो कश्‍मीर के भविश्य के सामने छाया धुंधलका छंटने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी।  वहां की पाठ्य पुस्तकों को फिर से छपवाना पड़ेगा, ब्लेक बोर्ड व फर्नीचर बनावाना पड़ेगा, । इसके लिए राज्य के छोटे-छोटे क्लस्टर में , मुहल्लों में संस्थागत या निजी तौर पर बच्चों के लिए काम करने की जरूरत है। इसके साथ उनके पौष्‍टिक आहार के लिए बिस्किट, सूखे मेवे जैसे खराब ना होने वाले  भोज्य पदार्थ की मांग वहां है। सबसे बड़ी बात ठंड सिर पर खड़ी है और वहां 40 दिन बाद तापमान शून्य के नीचे होगा व ऐसे में खुले आसमान के नीचे रातें काटना मौत से मुलाकात के बराबर होगा। ऐसे में वहां वाटर प्रूफ टैंट की बड़ी जरूरत होगी।
यदि आवश्‍यकता के अनुरूप दान या मदद ना हो तो यह समय व संसाधन दोनेां का नुकसान ही होता है। यह सही है कि हमारे यहां आज तक इस बात पर कोई दिशा निर्देश बनाए ही नहीं गए कि आपदा की स्थिति में किस तरह की तात्कालिक तथा दीर्घकालिक सहयोग की आवश्‍यकता होती है। असल में यह कोई दान या मदद नहीं है, हम एक मुल्क का नागरिक होने का अपना फर्ज अदा करने के लिए अपने संकटग्रस्त देश

जनसंदेश टाईम्‍स, उप्र 13ञ10ञ14http://www.jansandeshtimes.in/index.php?spgmGal=Uttar_Pradesh/Varanasi/Varanasi/13-10-2014&spgmPic=9
वासियों के साथ खड़े होते हैं। ऐसे में यदि हम  जरूरत के मुताबिक काम करें तो हमारा सहयोग सार्थक होगा।

शनिवार, 11 अक्तूबर 2014

Ghaziabad : colonies on water bodies

पश्‍िचमी उत्तर प्रदेश: तालाबों पर कब्जे से रूठा पानी

द सी एक्‍सप्रेस, आगरा 12.10.14http://theseaexpress.com/epapermain.aspx

 

पंकज चतुर्वेदी
दिल्ली के पूर्वी हिस्से की सड़कों से सटा हुआ है उत्तरप्रदेश का गाजियाबाद जिला। कहने को देश-दुनिया का सबसे तेजी से विस्तार पाता जिला है। आखिर हों भी क्यों ना ,गाजियाबाद भले ही उ.प्र में हो लेकिन शहरीकरण व उससे संबद्ध त्रासदियों में वह दिल्ली के कदम-दर-कदम साथ है। यहां भी भयंकर जनसंख्या विस्फोट है, यहां भी अनियोजित शहरीकरण है, यहां भी जमीन की कीमतें बेशकीमती हैं और उसी तरह यहां भी जब जिसे मौका मिला तालाब को हड़प कर कंक्रीट के जंगल रोपे गए। कई-कई पूरी कोलोनियां, सरकारी भी, तालाबों को सुखा कर बसा दी गईं। गगनचुंबी इमारतों में रहने वाले सर पर छत के सपने के पूरा होने पर इतने मुग्ध थे कि उन्हें खबर ही नहीं रही कि जीने के लिए जल भी जरूरी है, जिसे सुखा कर उन्होंने अपना सपना पूरा किया है।
गाजियाबाद जिले में कुल 1288 हेक्टेयर भूभाग में 65 तालाब व झीलें हैं, जिनमें से 642 हेक्टेयर ग्राम समाज, 68.5 मछली पालन विभाग और 588 हेक्टेयर निजी लोगों के कब्जे में है। तकरीबन सौ तालाबों पर लोगों ने कब्जा कर मकान-दुकान बना लिए हैं। यहां पर दो पांच एकड़ क्षेत्रफल के 53 तालाब हैं, पांच से 10 हैक्टर वाले 03, 10 से 50 हैक्टर का एक तालाब कागजों पर दर्ज है। इनमें से कुल 88 तालाब पट्टे वाले और 13 निजी हैं। जिले की 19.2 हैक्टर में फैली मसूरी झील, इलाके सबसे बड़ी हसनपुर झील(37.2 हैक्टर), 4.8 हैक्टर वाली सौंदा झील और धौलाना का 7.9 हैक्टर में फैला तालाब अभी भी कुछ आस जगाते हैं।  गाजियाबाद शहर यानी नगर निगम के तहत कुछ दशक पहले तक 135 तालाब हुआ करते थे, इनमें से 29 पर तो कुछ सरकारी महकमों ने ही कब्जा कर लिया। गाजियाबाद विकास प्राधिकरण ने रहीसपुर, रजा पुर, दमकनपुर, सिहानी आदि 10 तालाबों पर तो अपनी कालोनियां ही बना डालीं।  आवास विकास परिषद ने 05, यूपीएसआईडीसी ने 12 और सीपीडब्लूडी व नगर निगम ने एक-एक तालाब पर अपना कब्जा ठोक दिया। षहर के 28 तालाब अभी भी अपने अस्तित्व की लड़ाई समाज से लड़ रहे हैं जबकि 78 तालाबों को रसॅूखदार लोग पी गए। जाहिर है कि जब बाड़ ही खेत चर रही है तो उसका बचना संभव ही नहीं है। अब एक और हास्यास्पद बात सुनने में आई है कि कुछ सरकारी महकमे हड़प किए गए तालाबों के बदले में और कहीं जमीन देने व तालाब खुदवाने की बात कर रहे हैं।
गाजियाबाद महानगर पुरानी बस्ती है, यहां थोड़ी भी बारिश हो जाए तो पूरा शहर जलमग्न हो जाता है। मुख्य सड़कें एक घंटे की बारिश में घुटने-घुटने पानी से लबा-लब होती हैं, लेकिन शहर के रमतेराम रोड़ स्थित पुराने तालाब में एक बूंद पानी नहीं रहता है। सनद रहे कि इस तालाब के रखरखाव पर विकास प्राधिकरण ने पूरे पांच करोड़ खर्च किए है। असल में हुआ यह कि तालाब के चारों आेर जम कर कंक्रीट पोता गया, सीढि़यां पक्की कर दी गईं, लेकिन बारिश का पानी जिन सात रास्तों से तालाब तक पहुंचता था, उन्हें भी कंक्रीट से बंद कर दिया गया। अब रमतेराम रोड़ पर पानी भरता है, लेकिन तालाब में नहीं, जबकि कभी यह तालाब पूरे शहर को पानी आपूर्ति करता था। कोई चार सौ साल पुराने इस तालाब का क्षेत्रफल अभी तीन दशक पहले तक 17 हजार वर्गमीटर दर्ज था। अब इसके नौ हजार वर्गमीटर पर कब्जा हो चुका है और रही बची कसर इसके चारों आरे पक्की दीवार खड़ी कर पूरी हो गई है। अब यह एक सपाट मैदान है जहां बच्चे खेलते हैं या भैंसे चरती हैैं या फिर लोग कूड़ा डालते हैं। जाहिर है कि कुछ साल इसमें पानी आएगा नहीं और इसकी आड़ लेकर वहां कब्जा हो जाएगा। ठीक यही कहानी मकनपुर के तालाब की है, इसे पक्का बना दिया गया, यह विचारे बगैर कि तालाब की तली को तो कच्चा ही रखना पड़ता है।
शहर के मोहन नगर के करीब अर्थला तालाब कभी करीबी हिंडन के सहयोग से सदा-नीरा रहता था। राज्य के सरकारी महकमे ग्रामीण अभियंत्रण सेवा यानी आरईएस की ताजा रपट में बताया गया है कि वर्श 2008 से 2010 के बीच इस झील की जमीन पर 536 मकान बनाए गए। इंजीनियरों ने मकान में लगने मटेरियल की जांच कर उनकी उम्र निर्धारित की और उसकी रपट कमिश्‍नर को सौंप दी। अब कुछ अफसर अपनी नौकरी व मकान मालिक अपने घर बचाने के लिए सियाासती जुगत लगा रहे हैं।
कहने की जरूरत नहीं है कि प्रकृति के साथ हुए इस अमानवीय व्यवहार पर यहां की अदालतें भी कागजी शेर की तरह बस आदेश ही देती रहीं। गाजियाबाद में तालाबों के सम्ृद्ध दिन लौटाने के लिए संघर्श कर रहे एक वकील संजय कश्‍यप ने जब सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी तो बताया गया कि सन 2005 में बनाए गए मास्टर प्लान में जिन 123 तालाबों का वजूद स्वीकारा गया था, उनमें से 82 पर अवैध कब्जे हो गए है। पता नहीं इतनी बड़ी स्वीकरोक्ति में प्रशासन की मासूमियत थी या लाचारी । हालांकि राजस्व रिकार्ड गाजियाबद नगर निगम सीमा के भीतर 147 तालाबों की बात कहता है, जबकि नगर निगम का सर्वे 123 की। सरकारी अफसर कहते हैं कि इनमें से केवल 45 तालाब ही ऐसे हैं जिन्हे बचाया जा सकता है। शहर के मकनपुर, सिहानी, मोरटा, शाहपुर, बम्हेटा, सादिक नगर, काजीपुरा, नायफल, कोटगांव, भोपुरा, पसांडा, सिकंदरपुर, रहीसपुर, महरौली, रजापुर, झंडापुर, साहिबाबाद गांव,महाराजपुर आदि इलाकों में रिकार्ड में तालाब है लेकिन हकीकत में वहां कालेानियां खड़ी है। यह पूरा घोटाला कई-कई अरब का है और इसमें हर दल-गुट- माफिया के लोग षामिल है। भूजल का स्तर बढ़ाने के नाम पर राज्य में कई साल से आदर्ष तालाब निर्माण योजना चल रही है और इसे आंकड़ों की कसौटी पर देखें तो पाएंगे कि तालाबों में नोटों की खेप तो उतारी गई, लेकिन बदले में नतीजा शून्य ही रहा। अकेले गाजियाबाद जिले में बीते छह सालों के दौरान जिन 814 तालाबों पर कई करोड़ रूपए खर्च किए गए उनमें से 324 तो बारिश में भी रीते पड़े हैं। आंकडे कहते है। कि गाजियाबद जिले की कुल 405 ग्राम पंचायतों में 2431 छोटे-बड़े ताल-तलैया हैं, जिनमें से 93 को आदर्श तालाब घोशित किया गया है। इन पर अभी तक कोई 15 करोड़ रूपए का सरकारी व्यय किया जा चुका है। सरकारी रिकार्ड यह भी स्वीकार करता है कि ग्रामीण इलाकों के 302 तालाबों पर कतिपय असरदार लोगों ने अवैध कब्जे कर रखे हैं। हालांकि इस बात को बड़ी चतुराई से छिपाया जाता है कि इन कब्जे वाले इलकों में अब षायद ही तालाब का कोई अस्तित्व बचा है।
जिस तेजी से गाजियाबाद जिले का शहरीकरण हुआ, वहां की समृद्ध तालाब परंपरा पर कागजों पर करोड़ो खर्च किए गए, जबकि असल में तालाबों की संख्या हजारों में है। इन तालाबों को पाट कर कालेानी, बारातघर, स्कूल आदि बने, जिनके अब बाकायदा पक्के रिकार्ड हैं। यहां हर घर-कालेनी में पानी का संकट खड़ा है। षहर का तीन-चैथई हिस्सा भूजल पर निर्भर है और जिस तेजी से तालाब समाप्त हुए, उसके चलते यहां का भूजल स्तर भी कई सौ फुट नीचे जा चुका है और इसे खतरनाक जल स्तर वाले क्षेत्र के तौर पर अधिसूचित किया गया है। बगैर पानी के बस रही कालोनियां मानवीय सभ्यता के विकास की सहयात्री तो हो नहीं पाएंगी, आखिर समस्या को हमने ही न्योता दिया है तो भुगतना भी हमें ही पड़ेगा।

रविवार, 5 अक्तूबर 2014

when and how our warriors come back?


अब तो लौट आएं हमारे लापता फौजी!

                    ... पंकज चतुर्वेदी

दैनिक हिंदुस्‍तान 6 अक्‍तूबर 2014 http://paper.hindustantimes.com/epaper/viewer.aspx
अभी 23 सितंबर,2014 को देष की सर्वोच्च अदालत ने अब केद्र सरकार को जवाब देने के लिए छह
देश की नई पीढ़ी को तो शायद यह भी याद नहीं होगा कि 1971 में पाकिस्तान युद्ध में देश का इतिहास व विश्‍व का भूगोल बदलने वाले कई रणबांकुरे अभी भी पाकिस्तान की जेलों में नारकीय जीवन बिता रहे हैं । उन जवानों के परिवारजन अपने लेागों के जिंदा होने के सबूत देते हैं, लेकिन भारत सरकार महज औपचारिकता निभाने से अधिक कुछ नहीं करती है । इस बीच ऐसे फौजियों की जिंदगी पर बालीवुड में कई फिल्में बन गई हैं और उन्हें दर्षकों ने सराहा भी । लेकिन वे नाम अभी भी गुमनामी के अंधेरे में हैं जिन्हें ना तो शहीद माना जा सकता है और ना ही गुमशुदा ।
उम्मीद के हर कतरे की आस में तिल-दर-तिल घुलते इन जवानों के परिवारजनए अब लिखा-पढ़ी करके थक गए हैं । दिल मानता नहीं हैं कि उनके अपने भारत की रक्षा वेदी पर शहीद हो गए हैं । 1971 के युð के दौरान जिन 54 फौजियों के पाकिस्तानी गुनाहखानों में होने के दावे हमारे देशवासी करते रहे हैं ,उनमें से 40 का पुख्ता विवरण उपलब्ध हैं । इनमें 6-मेजर, 1-कमाडंर, 2-फ्लाईंग आफिसर, 5-कैप्टन, 15-फ्लाईट लेफ्टिनेंट, 1-सेकंड फ्ला.लेफ्टि, 3-स्कावर्डन लीडर, 1-नेवी पालयट कमांडर, 3-लांसनायक, और 3-सिपाही हैं ।
एक लापता फौजी मेजर अशोक कुमार सूरी के पिता डा. आरएलएस सूरी के पास तो कई पक्के प्रमाण हैं, जो उनके बेटे के पाकिस्तानी जेल में होने की कहानी कहते हैं । डा. सूरी को 1974 व 1975 में  उनके बेटे के दो पत्र मिले, जिसमें उसने 20 अन्य भारतीय फौजी अफसरों के साथ, पाकिस्तान जेल में होने की बात लिखी थी । पत्रों का बाकायदा ‘‘हस्तलिपि परीक्षण’’ करवाया गया और यह सिद्ध भी हुआ कि यह लेखनी मेजर सूरी की ही है।1979 में डा. सूरी को किसी अंजान ने फोन करके बताया कि उनके पुत्र को पाकिस्तान में उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रदेश की किसी भूमिगत जेल में भेज दिया गया है । मेजर सूरी सिर्फ 25 साल की उम्र में ही गुम होने का किस्सा बन गए ।
पाकिस्तान जेल में कई महीनों तक रहने के बाद लौटे एक भारतीय जासूस मोहन लाल भास्कर ने, लापता विंग कमाडंर एचएस गिल को एक पाक जेल में देखने का दावा किया था । लापता फ्लाईट लैफ्टिनेंट वीवी तांबे को पाकिस्तानी फौज द्वारा जिंदा पकड़ने की खबर, ‘संडे पाकिस्तान आब़जर्वर’ के पांच दिसंबर 1971 के अंक में छपी थी । वीर तांबे का विवाह बेडमिंटन की राष्ट्रीय चेंपियन रहीं दमयंती से हुआ था । शादी के मात्र डेढ़ साल बाद ही लड़ाई छिड़ गई थी । सेकंड लेफ्टिनेंट सुधीर मोहन सब्बरवाल जब लड़ाई के लिए घर से निकले थे, तब मात्र 23 साल उम्र के थे । केप्टर रवीन्द्र कौरा को अदभ्य शौर्य प्रदर्शन के लिए सरकार ने ‘वीर चक्र’ से सम्मानित किया था, लेकिन वे अब किस हाल में और कहां हैं, इसका जवाब देने में सरकार असफल रही है । ।
पाकिस्तान के मरहूम प्रधानमंत्री जुल्फकार अली भुट्टो को फांसी दिए जाने के तथ्यों पर छपी एक किताब भारतीय युद्धवीरों के पाक जेल में होने का पुख्ता सबूत मानी जा सकती है । बीबीसी संवाददाता विक्टोरिया शोफील्ड की किताब ‘भुट्टो: ट्रायल एंड एक्सीक्यूशन’ के पेज 59 पर भुट्टो को फांसी पर लटकाने से पहले कोट लखपतराय जेल लाहौर में रखे जाने का जिक्र है । किताब में लिखा है कि भुट्टो को पास की बैरक से हृदयविदारक चीख पुकार सुनने को मिलती थीं । भुट्टो के एक वकील ने पता किया था कि वहां 1971 के भारतीय युद्ध बंदी है । जो लगातार उत्पीड़न के कारण मानसिक  विक्षिप्त हो गए थे ।
कई बार लगता है कि इन युद्धवीरों की वापिसी के मसले को सरकार भूल ही गई हैं । यहां पता चलता है कि युद्ध बाबत संयुक्त राष्ट् संघ के निर्धारित कायदे कानून महज कागजी दस्तावेज हैं । इनका क्रियान्वयन से कोई वास्ता नहीं है । संयुक्त राष्ट् के विएना समझौते में साफ जिक्र है कि युद्ध के पश्चात, रेड़क्रास की देखरेख में तत्काल सैनिक अपने-अपने देश भेज दिए जाएंगे । दोनों देश आपसी सहमति से किसी तीसरे देश को इस निगरानी के लिए नियुक्त कर सकते हैं । इस समझौते में सैनिक बंदियों पर क्रूरता बरतने पर कड़ी पाबंदी है । लेकिन भारत-पाक के मसले में यह कायदा-कानून कहीं दूर-दूर तक नहीं दिखा । 1972 में अतंर्राष्ट्ीय रेडक्रास ने भारतीय युद्ध बंदियों की तीन लिस्ट जारी करने की बात कही थी । लेकिन सिर्फ दो सूची ही जारी की र्गइं । एक गुमशुदा फ्लाईग आफ्सिर सुधीर त्यागी के पिता आरएस त्यागी का दावा है कि उन्हें खबर मिली थी कि तीसरी सूची में उनके बेटे का नाम था । लेकिन वो सूची अचानक नदारत हो गई ।
भारत सरकार के वरिष्ठ अधिकारी मानते हैं कि हमारी फौज के कई जवान पाक जेलों में नारकीय जीवन भोग रहे हैं । उन्हें शारीरिक यातनाएं दी जा रही हैं । करनाल के करीम बख्श और पंजाब के जागीर सिंह का पाक जेलों में लंबी बीमारी व पागलपन के कारण निधन हो गया । 1971 की लड़ाई में पाकिस्तान द्वारा युद्ध बंदी बनाया गया सिपाही धर्मवीर 1981 में जब वापिस आया तो पता लगा कि यातनाओं के कारण उसका मानसिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया है । सरकार का दावा है कि कुछ युद्ध बंदी कोट लखपतराय लाहौर, फैसलाबाद, मुलतान, मियांवाली और बहावलपुर जेल में है । पर दावों पर राजनीति के दांव पंेच हावी हैं ।
भारत की सरकार लापता फौजियों के परिवारजनों को सिर्फ आस दिए हैं कि उनके बेटे-भाई जीवित हैं । लेकिन कहां है किस हाल में हैं ? कब व कैसे वापिस आएंगे ? इसकी चिंता ना तो हमारे राजनेताओं को है और ना ही आला फौजी अफसरों को । काश 1971 की लड़ाई जीतने के बाद भारत ने पाकिस्तान के 93,000 बंदियों को रिहा करने से पहले अपने एक-एक आदमी को वापिस लिया होता । पूरे पांच साल तक प्रधानमंत्री रहे पीवी नरसिंहराव भी भूल चुके थे कि उन्होंने जून 90 में बतौर विदेश मंत्री एक वादा किया था कि सरकार अपने बहादुर सैनिक अधिकारियों को वापिस लाने के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं । लेकिन देश के सर्वोच्च पद पर रहने के दौरान अपनी कुर्सी बचाने के लिए हर कीमत चुकाने की व्यस्तता में उन्हें सैनिक परिवारों के आंसूओं की नमी का एहसास तक नहीं हुआ। अपने परिवारजनों को वापिस लाने के लिए प्रतिबद्ध संगठन के लोग सन 2007 में रक्षा मंत्री ए के एंटोनी से मिले थे और उन्हें आष्वासन दिया गया था  विशेष कमेटी बना कर लापता फौजियों की तलाश की जाएगी। पांच साल बीत गए अभी तक कोई कमेटी बन नहीं पाई।
हमारे लापता फौजी और उनकी तलाश में लगे परिवारजनों को ना तो मीडिया पहचानता है, ना ही सलमान खान या फिर अक्षय खन्ना(जिन्होंने इसी विशय पर एक फिल्म भी की थी); ना ही मोमबत्ती ले कर न्याय का झंडा बुलंद करने वाले ना ही खुद को पूर्व फौजी बताने वाले अन्ना हजारे। काश! देश पर मर मिटने वालों का चैहरा, मीडिया में बिकता होता।

  पंकज चतुर्वेदी
यू जी -1 ए 3/186, राजेन्द्र नगर सेक्टर-2 साहिबाबाद, गाजियाबाद 201005
संपर्क: 9891928376, 011- 26707758(आफिस),




RAJ EXPRESS BHOPAL http://epaper.rajexpress.in/epapermain.aspx  6-10-2014
हफ्ते का समय दिया है कि सन 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान पाकिस्तान द्वारा बंदी बनाए हमारे जांबाज सैनिकों की स्थिति क्या है। मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा ने केंद्र सरकार के इस कथन को  भी संज्ञान लिया कि यह ऐसा मामला नहीं है कि इसे अंतरराश्ट्रीय अदालत में ले जाया जाए। अदालत ने कहा कि ऐसे नाजुक, गंभीर और संवेदनशील पहलू से निबटने के लिए सकारात्मक रवैया अपनाना जरूरी है। केंद्र की नई सरकार के पाकिस्तान से जो शुरूआती रिश्‍ते बने थे उससे उम्मीदें जागी थीं, लेकिन अब हालता तनावग्रस्त हैं और बीच में खड़ा है कश्‍मीर। क्या उम्मीद की जा सकती है कि अब दोनों मुल्क की सरकारें अपने आपसी ताल्लुक सुधारेंगी व उन फौजियों की भी चिंता करेंगी जो बीते 43 सालों से पाकिस्तानी जेलों में हिंदुस्तान की रक्षा करने की कीमत चुका रहे हैं ? लगभग हर साल संसद में विदेष मंत्री बयान भी देते हैं कि पाकिस्तानी जेलों में आज भी सन 1971 के 54 युद्धबंदी सैनिक हैं, लेकिन कभी लोकसभा में प्रस्ताव या संकल्प पारित नहीं हुआ कि हमारे जाबांजों की सुरक्षित वापिसी के लिए सरकार कुछ करेगी।

DDA flats : away from approch of AAM ADMI

DAINIK JAGRAN 6-10-2014http://epaper.jagran.com/epaper/06-oct-2014-262-edition-National-Page-1.html


आखिर डीडीए किसके साथ ?
पंकज चतुर्वेदी
दिल्ली विकास प्राधिकरण(डीडीए) ने हाल ही में 25,034 फ्लेटों की बिक्री की घोषणा की है । हजारों फार्म बिक गए और इसी बीच ड्रा निकलने से पहले ही मकान के दाम खुद डीडीए ने बढा दिए। । कहा जाता है कि डीडीए आम लोगों के लिए मकान बनाता है । लेकिन इन फ्लेटों की कीमतों को देख कर तो नहीं लगता कि इसके हितग्राही आम लोग होंगे । कोई भी दो बेड रूम वाला फ्लेट 41 लाख से कम नहीं है । इसका फार्म जमा करने के लिए नगद एक लाख देने होंगे ।  जाहिर है कि एक औसत नौकरी करने वाले के लिए ईमानदारी से इतना पैसा जुटाना लगभग मुश्किल ही है । हालांकि मकान आदमी की मूलभूत जरूरत माना जाता है, लेकिन दिल्ली के बाजार में आएं तो पाएंगे कि मकान महज व्यापार बना गया है । एक तरफ षहर में हजारों परिवार सिर पर छत के लिए व्याकुल हैं, दूसरी ओर सरकारी आंकड़े बताते हैं कि महानगर में साढ़े तीन लाख मकान खाली पडे हैं । यदि करीबी उपनगरों नोएडा, गुडगांव, गाजियाबाद, फरीदाबाद को भी शामिल कर लिया जाए तो ऐसे मकानों की संख्या छह लाख से अधिक होगी, जिसके मालिक अनयंत्र बेहतरीन मकान में रहते हैं और यह बंद पड़ा मकान उनके लिए शेयर बाजार में निवेष की तरह है । आखिर हो भी क्यों नहीं, बैकों ने मकान कर्ज के लिए दरवाजे खोल रखे हैं , लोग कर्जा ले कर मकान खरीदते हैं , फिर कुछ महीनों बाद जब मकान के दाम देा गुना होते हैं तो उसे बेच कर नई प्रापर्टी खरीदने को घूमने लगते हैं । तुरत-फुरत आ रहे इस पैसे ने बाजार में दैनिक उपभोग की वस्तुओं के रेट भी बढ़ाए हैं, जिसका खामियाजा भी वे ही भोग रहे हैं, जिनके लिए सिर पर छत एक सपना बन गया है ।
मकान के जरूरत के बनिस्पत बाजार बनने का सबसे बड़ा खामियाजा समाज का वह तबका उठा रहा है, जिसे मकान की वास्तव में जरूरत है । यदि केंद्र सरकार की नौकरी को आम आदमी का आर्थिक स्थिति का आधार माने तो दिल्ली या उसके आसपास के उपनगरों में  आम आदमी का मकान लेनाा एक सपने के मानिंद है । 16500 मूल वेतन और 5400 ग्रेड पे पाने वाला कर्मचारी सरकार में पहले दर्जे का अफसर कहलाता है । यदि वह अपने दफ्तर से मकान के लिए कर्ज लेना चाहे तो उसे उसके मूल वेतन के पचास गुणे के बराबर पैसा मिल सकता है । अन्य बैंक या वित्तीय संस्थाएं भी उसकी ग्राॅस सैलेरी का सौ गुणा देते हैं । दोनों स्थितियों में उसे मकान के लिए मिलने वाली रकम 15 से 16 लाख होती है । इतनी कीमत में दिल्ली के डीडीए या अन्य करीबी राज्यों के सरकारी निर्माण का एक बेडरूम का फ्लेट भी नहीं मिलेगा । गाजियाबाद के इंदिरापुरम में दो बेडरूम फ्लेट 50 लाख से कम नहीं है । गुडगांव और नोएडा के रेट भी इससे दुगने ही है । यदि कोई 20 लाख कर्ज लेता है और उसे दस या पंद्रह साल में चुकाने की योजना बनाता है तो उसे हर महीने न्यूनतम 22 हजार रूपए बतौर ईएमआई चुकाने होंगे । यह आंकड़े गवाह हैं कि इतना पैसे का मकान खरीदना आम आदमी के बस के बाहर है ।
इन दिनों विकसित हो रही कालोनियां किस तरह पूंजीवादी मानसिकता की शिकार है कि इनमें गरीबों के लिए कोई स्थान नहीं रखे गए हैं ।  हर नवधनाढ्य को अपने घर का काम करने के लिए नौकर चाहिए, लेकिन इन कालोनियों में उनके रहने की कहीं व्यवस्था नहीं है । इसी तरह बिजली, नल जैसे मरम्मत वाले काम ,दैनिक उपयोग की छोटी दुकानें वहां रहने वालों की आवष्यकता तो हैं , लेकिन उन्हें पास बसाने का ध्यान नियेजक ने कतई नहीं रखा । शहर के बीच से झुग्गियां उजाड़ी जा रही है और उन्हें बवाना, नरेला, जैसे सुदूर ग्रामीण अंचलों में भेजा जा रहा है । सरकार यह भी प्रचार कर रही है कि झुगगी वालों के लिए जल्दी ही बहुमंजिला फ्लेट बना दिए जाएंगे ।  लेकिन यह तो सोच नहीें  कि उन्हें घर के पास ही रोजगार कहां से मिलेगा । डीडीए का ईडब्लूएस यानि आर्थिक तौर पर कमजोर श्रेणी के मकानों की संख्या 10 हजार है और इसके लिए एक लाख रूप्ए सालाना की आय सीमा रखी है, लेकिन मकान की कीमत सात लाख से कम नहीं है।  जरा सोचें कि एक लाख रूप्ए सालाना आय वाले को कोई बैंक पांच लाख का भी कर्ज क्यों देगा। फिर उसका प्रस्तावित मकान शहर से इतना दूर है कि उसे काम के लिए आने-जाने के लिए चार पांच घंटे व दो सौ रूप्ए रोज खर्च करने होंगे। यह बात किसी से दुपी नहीं है कि इन दिनों डीडीए के फ्लेट के लिए अर्जी लेने व जमा करने वालों में प्रापर्टी डीलर के नौकर, परिचित, रिश्‍तेदार ही हैं, जिन्हें केवल अपनी पहचान, आय, रहवास का प्रमाण पत्र देना होता है व मकान निकलने पर उसके बदले प्रापर्टी डीलर कुछ हजार उन्हे दे देता है। पांच साल बाद उस फ्लेट की कीमत सरकारी कीमत की दुगनी-तिगुनी होती है और यदि किसी के हिस्से दो फ्लेट भी आ गए तो पांच साल में पैसा दुगना करने से कोई रोक नहीं सकता है।
डीडीए के मकान बेहद औसत दर्जें के होते हैं, जिन्हें वह मिलता है। उसे उसके फर्ष से लेकर षौचालय तक में अपना पैसा लगाना होता है, जिसमें दो लाख ऊपर से लगना लाजिमी हे। इतने ही दाम में निजी बिल्डर एनसीआर में  सुसज्जित मकान देता है, जिसे ‘रेडी टु मूव’ कहा जा सकता है। यानि असल में जिसे रहने के लिए लेना है वह तो पहले ही निजी बिल्डर का खरीद चुका होता है, डीडीए का यह ड्रा शायद दस फीसदी लोगों की उम्मीद भी नहीं है, यह तो मकानों के दलालों, दो ंनबर का पैसा बनाने वालों के लिए ही बड़ा अवसर है।
वैसे भी राष्‍ट्रीय राजधानी क्षेत्र का सपना भर्रा कर गिर चुका है । यह महानगर अब और भीड़ ,मकान, परिवहन झेलने में अक्षम है । एक तरफ मकान बाजार में महंगाई बढ़ाने का पूंजीवादी खेल बन रहे हैं तो दूसरी ओर सिर पर छत के लिए तड़पते लाखों-लाख लोग हैं । कहीं पर दो-तीन एकड़ कोठियों में पसरे लोकतंत्र के नवाब हैं तो पास में ही कीड़ों की तरह बिलबिलाती झोपड़-झुग्गियों में लाखों लोग । जिस तरह हर पेट की भूख रोटी की होती है, उसी तरह एक स्वस्थ्य- सौम्य समाज के लिए एक स्वच्छ, सुरक्षित आवास आवष्यक है । फिर जब मकान रहने के लिए न हो कर बाजार बनाने के लिए हो ! इससे बेहतर होगा कि मकानों का राश्ट्रीयकरण कर व्यक्ति की हैसियत, जरूरत, कार्य-स्थल से दूरी आदि को मानदंड बना कर उन्हें जरूरतमंदों को वितरित कर दिया जाए । साथ में शर्त हो कि जिस दिन उनकी जरूरत दिल्ली में समाप्त हो जाएगी, वे इसे खाली कर अपने पुश्‍तैनी बिरवों में लौट जाएंगे ।
पंकज चतुर्वेदी


शनिवार, 4 अक्तूबर 2014

sewar becomes gheto

The Sea Express 5-10-2014http://theseaexpress.com/epapermain.aspx
         मौतघर बनते सीवर !
                                                             पंकज चतुर्वेदी
देश में में हर साल हजार से ज्यादा लोग जाम सीवर की मरम्मत करने के दौरान दम घुटने से मारे जाते हैं । हर मौत का कारण सीवर की जहरीली गैस बताया जाता है । पुलिस ठेकेदार के खिलाफ लापरवाही का मामला दर्ज कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है। शायद यह पुलिस को भी नहीं मालूम है कि सीवर सफाई का ठेका देना हाईकोर्ट के आदेष के विपरीत है। समाज के जिम्मेदार लोगों ने कभी महसूस ही नहीं किया कि नरक-कुंड की सफाई के लिए बगैर तकनीकी ज्ञान व उपकरणों के निरीह मजदूरों को सीवर में उतारना अमानवीय है।
जब गरमी अपना रंग दिखाती है, तो गहरे सीवरों में पानी कुछ कम हो जाता है। सरकारी फाईलें भी बारिश की तैयारी के नाम पर सीवरों की सफाई की चिंता में तेजी से दौड़ने लगती हैं । लेकिन इस बात को भूला आदेश दिया जाता है कि 40-45 तापमान में सीवर की गहराई निरीह मजदूरों के लिए मौतघर बन जाती है। यह विडंबना है कि सरकार व सफाईकर्मचारी आयोग सिर पर मैला ढ़ोन की अमानवीय प्रथा पर रोक लगाने के नारों से आगे इस तरह से हो रही मौतों पर ध्यान ही नहीं देता है। राष्‍ट्रीय मानवाधिकार आयोग और मुंबई हाईकोर्ट ने पांच साल पहले सीवर की सफाई के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे, जिनकी परवाह और जानकारी किसी को नहीं है। वैसे तो  लाखों रूपए बजट वाला यह काम कागजों पर ही अधिक होता है । जहां हकीकत में सीवर की सफाई होती भी है तो कई सरकारी कागजों कोे रद्दी का कागज मान कर होती है । नरक कुंड की सफाई का जोखिम उठाने वाले लेागों की सुरक्षा-व्यवस्था के कई कानून हैं और मानव अधिकार आयोग के निर्देष भी । चूंकि इस अमानवीय त्रासदी में मरने वाले अधिकांश लोग असंगठित दैनिक मजदूर होते हैं,, अतः ना तो इस पर विरोध दर्ज होता है और ना ही भविष्‍य में ऐसी दुघटनाएं रोकने के उपाय ।
कोर्ट के निर्देशों के अनुसार सीवर की सफाई करने वाली एजंसी के पास सीवर लाईन के नक्‍शे, उसकी गहराई से संबंधित आंकड़े होना चाहिए। सीवर सफाई का दैनिक रिकार्ड, काम में लगे लोगों की नियमित स्वास्थ्य की जांच, आवश्‍यक सुरक्षा उपकरण मुहैया करवाना, काम में लगे कर्मचारियों का नियमित प्रशिक्षण, सीवर में गिरने वाले कचरे की नियमित जांच कि कहीं इसमें कोई रसायन तो नहीं गिर रहे हैं; जैसे निर्देशों का पालन होता कहीं नहीं दिखता है।
भूमिगत सीवरों ने भले ही शहरी जीवन में कुछ सहूलियतें दी हों, लेकिन इसकी सफाई करने वालों के जीवन में इस अंधेरे नाले में और भी अंधेरा कर दिया है । अनुमान है कि हर साल देश भर के सीवरों में औसतन 1000 से 1300 लोग दम घुटने से मरते हैं । जो दम घुटने से बच जाते हैं उनका जीवन सीवर की विषैली गंदगी के कारण नरक से भी बदतर हो जाता है । देश में दो लाख से अधिक लोग जाम हो गए सीवरों को खोलने , मेनहोल में घुस कर वहां जमा हो गई गाद, पत्थर को हटाने के काम में लगे हैं । कई-कई महीनों से बंद पड़े इन गहरे नरक कुंडों में कार्बन मोनो आक्साईड, हाईड्रोजन सल्फाईड, मीथेन जैसी दमघोटू गैसें होती हैं ।
यह एक शर्मनाक पहलू है कि यह जानते हुए भी कि भीतर जानलेवा गैसें और रसायन हैं, एक इंसान दूसरे इंसान को बगैर किसी बचाव या सुरक्षा-साधनों के भीतर ढकेल देता है । सनद रहे कि महानगरों के सीवरों में  महज घरेलू निस्तार ही नहीं होता है, उसमें ढ़ेर सारे कारखानों की गंदगी भी होती है । और आज घर भी विभिन्न रसायनों के प्रयोग का स्थल बन चुके हैं । इस पानी में ग्रीस-चिकनाई, कई किस्म के क्लोराईड व सल्फेट, पारा, सीसा के यौगिक, अमोनिया गैस और ना जाने क्या-क्या होता है । सीवरेज के पानी के संपर्क में आने पर सफाईकर्मी  के शरीर पर छाले या घाव पड़ना आम बात है । नाईट्रेट और नाईट्राईड के कारण दमा और फैंफड़े के संक्रमण होने की प्रबल संभावना होती है । सीवर में मिलने वाले क्रोमियम से शरीर पर घाव होने, नाक की झिल्ली फटने और फैंफड़े का कैंसर होने के आसार होते हैं । भीतर का अधिक तापमान इन घातक प्रभावों को कई गुना बढ़ा देता है । यह वे स्वयं जानते हैं कि सीवर की सफाई करने वाला 10-12 साल से अधिक काम नहीं कर पाता है, क्योंकि उनका शरीर काम करने लायक ही नहीं रह जाता है । ऐसी बदबू ,गंदगी और रोजगार की अनिष्चितता में जीने वाले इन लोगों का शराब व अन्य नशे की गिरफ्त में आना लाजिमी ही है और नशे की यह लत उन्हें कई गंभीर बीमारियों का शिकार बना देती है ।  आमतौर पर ये लोग मेनहोल में उतरने से पहले ही शराब चढ़ा लेते हैं, क्योंकि नशे के सरूर में वे भूल पाते हैं कि काम करते समय उन्हें किन-किन गंदगियों से गुजरना है । गौरतलब है कि शराब के बाद शरीर में आक्सीजन की कमी हो जाती है, फिर गहरे सीवरों में तो यह प्राण वायु होती ही नहीं है । तभी सीवर में उतरते ही इनका दम घुटने लगता है । यही नहीं सीवर के काम में लगे लोगों को सामाजिक उपेक्षा का भी सामना करना होता है ।, इन लोगों के यहां रोटी-बेटी का रिश्‍ता करने में उनके ही समाज वाले परहेज करते हैं ।
दिल्ली में सीवर सफाई में लगे कुछ श्रमिकों के बीच किए गए सर्वे से मालूम चलता है कि उनमें से 49 फीसदी लोग सांस की बीमारियों, खांसी व सीने में दर्द के रोगी हैं । 11 प्रतिशत को डरमैटाइसिस, एक्जिमा और ऐसे ही चर्म रोग हैं । लगातार गंदे पानी में डुबकी लगाने के कारण कान बहने व कान में संक्रमण, आंखों में जलन व कम दिखने की षिकायत करने वालों का संख्या 32 फीसदी थी । भूख ना लगना उनका एक आम रोग है । इतना होने पर भी सीवरकर्मियों को उनके जीवन की जटिलताओं की जानकारी देने के लिए ना तो सरकारी स्तर पर कोई प्रयास हुए हैं और ना ही किसी स्वयंसेवी संस्था ने इसका बीड़ा उठाया है ।  अहमदाबाद की एक संस्था कामगार स्वास्थ्य सुरक्षा मंडल ने कुछ वर्ष पहले इस दिशा में मामूली पहल अवश्‍य की थी ।
वैसे यह सभी सरकारी दिशा-निर्देशों में दर्ज हैं कि सीवर सफाई करने वालों को गैस -टेस्टर(विशैली गैस की जांच का उपकरण), गंदी हवा को बाहर फैंकने के लिए ब्लोअर, टार्च, दस्ताने, चश्‍मा और कान को ढंकने का कैप, हैलमेट मुहैया करवाना आवष्यक है । मुंबई हाईकोर्ट का निर्देश था कि सीवर सफाई का काम ठेकेदारों के माध्यम से कतई नहीं करवाना चाहिए। यहां जान लेना होगा कि अब दिल्ली व अन्य महानगरों में सीवर सफाई का अधिकांश काम ठेकेदारें द्वारा करवाया जला रहा है, जिनके यहां दैनिक वेतन पर कर्मचारी रखे जाते हैं ।
सफाई का काम करने के बाद उन्हें पीने का स्वच्छ पानी, नहाने के लिए साबुन व पानी तथा स्थान उपलब्ध करवाने की जिम्मेदारी भी कार्यकारी एजेंसी की है । राष्‍ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी इस बारे में कड़े आदेश जारी कर चुका है । इसके बावजूद ये उपकरण और सुविधाएं गायब है ।
आज के अर्थ-प्रधान और मशीनी युग में सफाईकर्मियों के राजनीतिक व सामाजिक मूल्यों के आकलन का नजरिया बदलना जरूरी है । सीवरकर्मियों को देखें तो महसूस होता है कि उनकी असली समस्याओं के बनिस्पत भावनात्मक मुद्दों को अधिक उछाला जाता रहा है । केवल छुआछूत या अत्याचार जैसे विषयों पर टिका चिंतन-मंथन उनकी व्यावहारिक दिक्कतों से बेहद दूर है ।सीवर में काम करने वालों को आर्थिक संबल और स्वास्थ्य की सुरक्षा मिल जाए जो उनके बीच नया विश्‍वास पैदा किया जा सकता है ।




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