तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

terrosrism and youth policy



आतंकवाद और चैराहे पर खड़े युवाओं के सवाल

                                     ...पंकज चतुर्वेदी

vision muslim today, april-15
जब कहीं कोई बम धमाका होता है तो कोई सुरक्षा व्यवस्था को लचर कहता है, तो कोई कैमरे लगाने की मांग ; एक वर्ग पाकिस्तान पर हमला करने का उन्माद फैलाने लगता है ; कोई चाहता है कि पोटा फिर से ले आओ तो कोई भारत में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी की कारस्तानी को युवाओं से जोड़ कर जाहिरा बयान देता है। । लेकिन कोई यह मानने को तैयार नहीं है कि उनके सुझावों को मान लिया जाए या फिर उन सभी बातों को भी मान लिया जाए  तो भी देश-दुनिया को दहशतगर्दी से पूरी मुक्ति मिल जाएगी।  असल सवाल कहीं गौण है कि आखिर हमारी युवा नीति (वैसे तो ऐसी कोई नीति है ही नहीं ) में  क्या ऐसी कमी है कि हमारा युवा अपने ही लोगों के खिलाफ हथियार उठा रहा है। बीते कुछ सालों में यह देखा गया है कि हमारे देश में घटित अधिकांष आतंकवादी घटनाओं में हमारे देश के ही युवा शामिल रहे हैं। यही नहीं इनमें से कई खासे पढ़े-लिखे भी हैं। यह और तकलीफदेह है कि ऐसे युवा या तो आंचलिक ग्रामीण इलाके के हैं या फिर छोटे कस्बों के। हां, इस हकीकत को स्वीकारने के लिए दिल्ली-पटना के धमाकों के साथ-साथ छत्तीसगढ़-झाारखंड की नक्सली हिंसा, उत्तर-पूर्व के संघर्शों को भी एक साथ आंकना-परखना होगा।
यह शक के दायरे में है कि हमारा राजनीतिक नेतृृत्व देश के युवा का असली मर्म समझ पा रहा है। महंगाई की मार के बीच उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं का रोजगार, घाटे का सौदा होती खेती और विकास के नाम पर हस्तांतरित होते खेत, पेट भरने व सुविधाओं के लिए षहरों की ओर पलायन। ग्रामीण युवाओं की ये दिक्कतें क्या हमारे नीति निर्धारकों की समझ में है? क्या भारत के युवा को केवल रोजगार चाहिए ? उसके सपने का भारत कैसा है ? वह सरकार और समाज में कैसी भागीदारी चाहता है? ऐसे ही कई सवाल तरूणाई के ईर्दगिर्द टहल रहे हैं, लगभग अनुत्तरित से। तीन दषक पहले तक कालेज  सियासत के ट्रेनिंग सेंटर होते थे, फिर छात्र राजनीति में बाहरी दखल इतना बढा कि एक औसत परिवार के युवा के लिए छात्र संघ का चुनाव लड़ना असंभव ही हो गया। युवा मन की वैचारिक प्रतिबद्धता जाति,धर्म, क्षेत्र जैसे खांचों में बंट गई है और इसका असर देा की राजनीति पर भी दिख रहा है। कल तक एक पार्टी को कोसने वाला अगले ही दिन दल बदल लेता है, बगैर किसी संकोच-षर्म के।
सरकारी मीडिया हो या स्वयंसेवी संस्थाएं, जिस ने भी युवा वर्ग का जिक्र किया तो, अक्सर इसका ताल्लुक शहर में पलने वाले कुछ सुविधा-संपन्न लड़के-लड़कियों से ही रहा । जींस और रंग बिंरगी टोपियां लगाए, लबों पर फर्राटेदार हिंगरेजी और पश्चिमी सभ्यता का अधकचरा मुलम्मा चढ़े युवा । यह बात भूला ही दी जाती है कि इनसे कहीं पांच गुनी बड़ी और इनसे बिलकुल भिन्न युवा वर्ग की ऐसी भी दुनिया है, जो देश पांच लाख गांवों में हैं । तंगी, सुविधाहीनता व तमाम उपेक्षाओं की गिरफ्त में फंसी एक पूरी कुंठित पीढ़ी । गांव की माटी से उदासीन और शहर की चकाचैंध छू लेने की ललक साधे युवा शक्ति । भारतीय संस्कार, संस्कृति और सभ्यता की महक अभी कहीं शेष है तो वह है ग्रामीण युवा पीढ़ी । यथार्थता, जिंदादिली और अनुशासन सरीखे गुणों को शहरी सभ्यता लील चुकी है । एक तरफ ग्रामीण युवक तत्पर, मेहनती, संलग्नशील व विश्वसनीय है तो दूसरी ओर नारों, हड़तालों और कृत्रिम सपनों में पले-पघे शहरी युवा । वस्तुतया कुशल जन-बल के निर्माण के लिए ग्रामीण युवक वास्तव में कच्चे मालकी तरह है , जिसका मूल्यांकन कभी ठीक से किया ही नहीं जाता और लाजिमी है कि उनके विद्रोह हो कोई सा भी रंग दे दिया जाता है।
गांवों में आज ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजुएट डिग्रीधारी युवकों के बजाए मध्यम स्तर तक पढ़े-लिखे और कृषि-तकनीक में पारंगत श्रमशील युवाओं की भारी जरूरत है । अतः आंचलिक क्षेत्रों में डिग्री कालेज खोलने के बनिस्पत वहां खेती-पशुपालन-ग्रामीण प्रबंधन के प्रायोगिक प्रशिक्षण संस्थान खोलना ही उपयोगी होगा । ऐसे संस्थानों में माध्यमिक स्तर की शिक्षा के बाद एक साल के कोर्स रखे जा सकते हैं, साथ ही वहां आए  युवकों को रोजगार की गारंटी देना होगा । इस तरह प्रशिक्षित युवकों का गांव में रहने व ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ओर रुझान खुद-ब-खुद आएगा । इससे एक तो गांवों में आधुनिकता की परिभाषा खुद की तय होगी साथ ही ग्रामीण युवाओं को शहर भागने या अज्ञात भविष्य के लिए शून्य में भटकने की नौबत नहीं आएगी ।
सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश को ओलंपिक या अन्य अंतरराष्ट्ररीय खेलों में कम पदक मिलने पर सड़क से संसद तक चर्चा होती रहीं है । लेकिन क्या कभी किसी ने खयाल किया कि खेलनीति के सरकारी बजट का कितना हिस्सा जन्मजात खिलाड़ी यानि ग्रामीण युवकों पर खर्च होता है । ग्रामीण खेलों की सरकारी उपेक्षा का दर्दनाक पहलू हरियाणा, झारखंड या उत्तर-पूर्वी राज्यों में देखा जा सकता है वहां गांव-गांव में खेल की परंपरा रही है । इनमें बेहतरीन खिलाड़ी छोटी उम्र में तैयार किए जाते थे । उन्हें कभी सरकारी प्रश्रय मिला नहीं । सो धीरे-धीरे से अखाड़े अपराधियों के अड्डे बन गए। अब ठेका हथियाने, जमीन कब्जाने या चुनावों में वोट लूटने सरीखे कार्यों में इन अखाड़ों व खिलाडि़यों का उपयोग आम बात है । जरूरत है तो बस उन्हें थोड़े से प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं के कानून-कायदें सिखाने की । काष गांवों में खेल-कूद प्रषिक्षण का सही जरिया बन पाए।
एक बात और, इस समय देश का लेाकतंत्र गांवों की ओर जा रहा है, लाखों पंच, सरपंच, पार्शद नेतृत्व की नई कतार तैयार कर रहे हैं। इन लोगों को सही प्रषिक्षण मिले- योजना बनाने, क्रियान्वयन और वित्तीय प्रबंधन का, इन लोगों को अवसर मिलें, नए भारत के निर्माण में, इन लोगों को प्रसिद्धी मिले दूरस्थ गांवों, मजरों में पसीना बहाने पर ; क्या कोई ऐसी योजना सरकार तैयार कर पाएगी ?
गांवों में बसने वाले तीन चैथाई नवयुवकों की उपेक्षा से कई राष्ट्रीय स्तर पर कई समस्याएं भी खड़ी हो रही हैं । कश्मीर हो या उत्तर-पूर्व, जहां भी सशस्त्र अलगाववाद की हवा बह रही है, वहां हथियार थामने वाले हाथों में ग्रामीण युवाओं की संख्या ही अधिक हैं । हमारी शिक्षा में कुछ बात तो ऐसी है कि वह ऐसे युवाओं को देश, राश्ट्रवाद, जैसी भावनाओं से परिपूर्ण नहीं कर पाया। क्रिकेट के मैदान पर तिरंगे ले कर उधम मचाने वाले युवाओं का भी देश-प्रेम के प्रति दृश्टिकोण महज नेताओं को गाली देने या पाकिस्तान को मिटा देने तक ही सीमित है। यह हमारी पाठ्य पुस्तकों  और उससे उपज रही शिक्षा का खोखला दर्षन नहीं तो और क्या है ? बातें युवाओं की लेकिन नीति में दिषाहीन, अनकहे सवालों से जझते युवा ।

पंकज चतुर्वेदी
सहायक संपादक
नेषनल बुक ट्रस्ट इंडिया
 नेहरू भवन, वसंत कुंज इंस्टीट्यूषनल एरिया फेज-2
 वसंत कुंज, नई दिल्ली-110070
 संपर्क- 9891928376




मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

Calamity, rumors and insensitivity

राष्ट्रीय सहारा २९-४-२०१५ 

आपदा का समय और अफवाहें

                                                   पंकज चतुर्वेदी 

नेपाल और भारत के कुछ हिस्सों में जब भूकंप से आई तबाही की दिल दहला देने वाली तस्वीरें सामने आ रही थीं, जब संवेदनशील लोग व सरकारें इस आपदा से पीड़ित लोगों तक त्वरित राहत पहुंचाने के लिए चिंतित थे, कुछ लोग ऐसे भी थे जो एसएमएस, व्हाट्सएप और अन्य संचार माध्यमों से चांद का मुंह टेढ़ा होने, नासा के हवाले से अगले भूकंप का समय बताने जैसी अफवाहें उड़ाकर जनमानस में दहशत पैदा कर रहे थे। हद तो तब हो गई जब उल्टा चांद निकलने, कयामत की घड़ी पास आने व अगले भूकंप का समय बताने के संदेशों ने लेगों में घबराहट, बैचेनी, फैला दी। इस मामले में खुद नासा को दखल देते हुए बताना पड़ा कि न तो उसकी संस्था ने कोई भविष्यवाणी की है और न वह यह काम करते हैं लेकिन तब तक लंपट किस्म के लोग अपनी हरकतों में कामयाब हो चुके थे। ऐसी स्थिति में दो महीने पहले तक जो लोग नये आईटी एक्ट की धारा 66 ए को समाप्त करने के लिए प्राणपण से जुटे थे, उन्हें पहली बार लगा कि काश कोई कानून होता जो इन अफवाहबाजों पर रोक लगा सकता।
राज एक्‍सप्रेस, भोपाल 30 अप्रेल 15
 मौजूदा दौर में सोशल मीडिया व व्हाट्सएप जैसे औजारों ने अफवाहों की धार को बेहद तीखा व त्वरित कर दिया है। सेकेंड्स और मिनटों में अफवाहें अब बेहद खतरनाक होती जा रही हैं। कभी बिहार में नमक की कमी का हल्ला तो कभी किसी बाबा की भविष्यवाणी पर खजाने मिलने की उत्तेजना। जबकि असल में इसके छुपे हुए मकसद कुछ और ही होते हैं। बीते साल घटित दुर्भाग्यपूर्ण मुजफ्फरनगर दंगे में सोशल मीडिया के जरिये फैली अफवाहों की भी बड़ी भूमिका थी। इससे पहले इंदौर के चंदन नगर में भी बेसिर-पैर की झूठी खबरों ने दंगा करवा दिया था। जिन राज्यों में विधान सभा चुनाव होने हैं, उनके गली-कस्बे तक ऐसी-ऐसी अफवाहें हर रोज हवा में तैरती हैं कि मारा-मारी की नौबत आ जाती है। अफवाहें कितनी विध्वंसकारी होती है, इसकी एक बानगी करीब दो साल पहले दक्षिण के राज्यों में भी देखने को मिली थी, जब बंगलूरू का रेलवे प्लेटफार्म उन लोगों से पट गया जो सुदूर उत्तर-पूर्वी राज्यों से वहां रोजगार या शिक्षा के लिए आए थे। चौबीस घंटे में ही ऐसी अफवाहें हैदराबाद और पुणो में भी फैल गईं और पूर्वोत्तर के लोगों का वहां से पलायन शुरू हो गया। यह बात सभी स्वीकार रहे हैं कि आज फेस बुक-ट्वीटर जैसे व्यापक असर वाले सोशल मीडिया माध्यम अफवाह फैलाने वालों के पसंदीदा अस्त्र बनते जा रहे हैं। एक तो इसमें फर्जी पहचान के साथ पंजीकृत लोगों को खोजना मुश्किल होता है, और खोज भी लिया तो इनके सर्वर अमेरिका में होने के कारण मुकदमें को अंजाम तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त सबूत जुटाना नामुमकिन सा होता है। अब तो आईटी एक्ट की धारा 66 ए का भय भी नहीं है जिसमें इलेक्ट्रानिक संचार माध्यमों के माध्यम से अफवाह, फर्जी एकांउट बना गलत सूचना देने पर कड़ी सजा का प्रावधान था। उस धारा को सुप्रीम कोर्ट ने समाप्त क्या किया, अफवाही व उपद्रवी लोगों की बन आयी है। अब फेसबुक और ट्वीटर पर नकली चित्रों के साथ भड़काऊ और आग उगलने वाली हजारों पोस्ट लगाई जा रही हैं। लगता है कि संचार के आधुनिक साधन लोगों को भड़काने के ज्यादा काम आ रहे हैं। अफवाहें फैला माहौल बिगाड़ने के लिए संचार माध्यमों के दुरुपयोग का चलन बीते पांच-छह सालों से पंजाब में भी बखूबी हुआ है। आर्थिक समृद्धि के मार्ग पर तेजी से बढ़ते इस राज्य में अफवाहों का बाजार भी उतनी ही तेजी से विकसित हो रहा है। ये अफवाहें लोगों के बीच भ्रम पैदा करते हुए आम जन-जीवन प्रभावित कर रही हैं और कई बार भगदड़ तक के हालात निर्मित होते रहे हैं। विडंबना है कि बेसिर-पैर की इन लफ्फाजियों पर अंकुश लगाने में सरकार व समाज दोनों असफल रहे हैं। यह जीवट, लगन व कर्मठता पंजाब की ही हो सकती है, जहां लोगों ने खून-खराबे के दौर से बाहर निकल राज्य को ताकतवर बनाया। बीते एक दशक के दौरान पंजाब के गांवों-गांवों तक विकास की धारा बही है। वहां संचार तकनीक के अत्याधुनिक साधन जन-जन तक पहुंचे हैं, लेकिन पिछले कुछ समय से यही माध्यम अफवाहों के वाहक भी बने हैं। पिछले साल एक बार फिर गणोश भगवान को दूध पिलाने की अफवाह की शुरुआत पंजाब से ही हुई थी और जरा देर के लिए खबर का सीधा प्रसारण भी होने लगा। इसी साल के शुरू में रोटी-प्याज मांगने वाली औरत, दरवाजे पर हल्दी के छापे लगाने की बात और ऐसी ही कई अफवाहें मध्यप्रदेश व उत्तरप्रदेश के ग्रामीण इलाकों में फैली थीं। मुंह नोचवा बंदर की अफवाहें भी हर तीन-चार साल में देश के अलग-अलग हिस्सों में फैलती रहती हैं।बेसिर पैर की तमाम तरह की अफवाहें कहां से शुरू होती हैं, कौन इन्हें फैलाता है और कौन इस झूठ को सच बनाने के कुतर्क देता है, यह सब खोजने की परवाह किसी को नहीं होती है। बची-खुची कसर चौबीसों घंटे कुछ
PRABHAT,MEERUT, 3-5-15
तीखा परोसने के लिए लालायित टीवी चैनल पूरी कर देते हैं। एक बात गौर करने की है कि मोबाइल या इंटरनेट से अफवाहें फैलाने में पंजाब या ऐसे इलाके ज्यादा अव्वल हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होती जा रही है और जो विकास के पथ पर तेज दौड़ रहे हैं। इन अफवाहों को फैलाने की मंशा तो अब तक साफ नहीं हो पाई है लेकिन एक बड़े वर्ग का मानना है कि इसके पीछे संचार क्रांति की तिजारत में लगे लोग हो सकते हैं। ऐसे सनसनीखेज मैसेज प्राइवेट मोबाइल कंपनियों के दिमाग की उपज भी हो सकते हैं जिनके जरिये वे रातों-रात लाखों-करोड़ों का ध्ांधा कर लेती हैं। सनद रहे कि पंजाब, कर्नाटक, पुणो जैसे इलाकों के दूरस्थ ग्रामीण अंचलों तक मोबाइल ग्राहकों की संख्या देश के शीर्ष आंकड़ों में हैं। इसी तरह इन राज्यों में गांव-गांव तक केबल टीवी का संजाल है। ऐसी खबरें ग्रामीण दर्शकों की संख्या और इसके बल पर टीवी कंपनियों की रेटिंग बढ़ाने का माध्यम बन गई हैं । कहा जाता है कि किसी खबर के फैलने व उसके समाज पर असर को आंकने के सव्रें के तहत ऐसी लप्पेबाजियों को उड़ाया जा रहा है। वैसे आज तकनीक इतनी एडवांस है कि किसी एसएमएस की शुरुआत या सोशल साइट पर भड़काऊ संदेश देने वाले का पता लगाना कठिन नहीं है, फिर भी इतने संवेदनशील मसले पर पुलिस व प्रशासन का टालू रवैया अलग तरह की आशंका खड़ी करता है। बहरहाल अफवाहों की परिणति संकटकाल में चल रहे राहत कायरें में व्यवधान के तौर पर भी होती है। अफवाहें अनैतिक व गैरकानूनी भी हैं। ऐसे में संवेदनशील इलाकों की सरकारों में बैठे लोगों का आंखें मूंदे रखना गंभीर परिणाम भी दे सकता है 

शनिवार, 25 अप्रैल 2015

BETTER CROP ALSO TEARS FARMERS

prabhat, meerut 26-4-15
आफत का आलू

पंकज चतुर्वेदी
वह था तो मेकेनिकल इंजीनियर, लेकिन नौकरी नहीं मिली तो पिता के साथ खेती करने लगा था। पांच बीघा में आलू बोए थे और जब बंपर फसल तैयार हुई तो मंडी में दाम इतने कम हो गए कि आलू खेत से उखाड़ने का खर्चा भी निकलना मुष्किल था। कर्जा था, आगे की जिंदगी भी थी, हताषा इतनी बढ़ी कि 24 साल के प्रोबीन कुमार लाहा ने मौत को गले लगा लिया। पष्चिम बंगाल के  वर्द्धमान जिले में यह बीते दो महीने में 12वीं खुदकुषी है। पष्चिमी उत्तर प्रदेष में किसानों ने जब आलू बोए थे तो प्रति बीघा की लागत ही 16 हजार रूपए आई। फसल बहुत बढि़ष हुई और जब माल मंडी आया तो दाम 400 रूपए कुंटल से ज्यादा नहीं मिल रहे हैं। यदि किसान चाहे कि माल कोल्ड स्टोरजे में रख दे तो वह भी लबालब हैं। जहां थोड़ी सी जगह भी है तो 240 रूपए कुंटल से कम पर  कोई राजी नहीं हो रहा है। सनद रहे कि पिछले साल मार्च-अप्रैल में मंडी में आलू का भाव हजार रूपए कंुटल था।
jansandesh times up 27-4-15
इन दिनों दिल्ली  और उसके आसपास सब्जी मंडी में आलू 20 रूपए के सवा किलो बिक रहा है, यानि कम से कम 12 रूपए किलो। वहीं किसान से खरीदी चार रूपए किलो ही है। जरा सोचें कि खेत से रसोई के बीच तीन गुने का अंतर है और इसे वह हजम कर रहे हैं जिन्होंने ना तो बीज, खाद डाला है, ना ही अपनी रातें खेत में बिताई हैं, जिसने ना तो मजदूरी की है और ना ही जिसकी अपनी जमीन है। कैसी विडंबना है कि जिस आलू, के लिए अभी एक महीने पहले तक मारा-मारी मची थी ,वह अब मारा-मारा घूम रहा है। यह पहली बार नहीं हुआ है कि जब किसान की हताषा आम आदमी पर भारी पड़ी है। पूरे देष की खेती-किसानी अनियोजित ,षोशण की षिकार व किसान विरोधी है। तभी हर साल देष के कई हिस्सों में अफरात फसल को सड़क पर फैंकने और कुछ ही महीनों बाद उसी फसल की त्राहि-त्राहि होने की घटनाएं होती रहती हैं। किसान मेहनत कर सकता है, अच्छी फसल दे सकता है, लेकिन सरकार में बैठे लोगों को भी उसके परिश्रम के माकूल दाम , अधिक माल के सुरक्षित भंडारण के बारे में सोचना चाहिए। षायद इस छोटी सी जरूरत को मुनाफाखोरों और बिचैलियों के हितों के लिए दरकिनार किया जाता है।
एक मोटा अनुमान है कि हमारे देष में हर साल कोई 75 हजार करोड के फल-सब्जी, माकूल भंडारण के अभाव में नश्ट हो जाते हैं।  आज हमारे देष में कोई 6300 कोल्ड स्टोरजे हैं जिनकी क्षमता 3011 लाख मेट्रीक टन की है।  जबकि हमारी जरूरत 6100 मोट्रीक टन क्षमता के कोल्ड स्टोरेज की है। मोटा अनुमान है कि इसके लिए लगभग 55 हजार करोड रूप्ए की जरूरत है। जबकि इससे एक करोड़ 20 लाख किसानों को अपने उत्पाद के ठीक दाम मिलने की गारंटी मिलेगी। वैसे जरूरत के मुताबिक कोल्ड स्आरेज बनाने का व्यय सालाना हो रहे नुकसान से भी कम है। चाहे आलू हो या मिर्च या ऐसेी ही फसल, इनकी खासियत है कि इन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। टमाटर, अंगूर आदि का प्रसस्करण कर वह प्र्याप्त लाभ देती हैं। सरकार मंडियों से कर वूसलने, वहां राजनीति करने में तो आगे रहती है, लेकिन वेयर हाउस या कोल्ड स्टोरेज स्थापित करने की उनकी जिम्मेदारिया पर चुप रहती हे। यही तो उनके द्वारा किसान के षोशण का हथियार भी बनता हे। भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 31.8 प्रतिशत खेती-बाड़ी में तल्लीन कोई 64 फीसदी लोगों के पसीने से पैदा होता है । दुखद कि देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ कहलाने वाली खेती के विकास के नाम पर बुनियादी सामाजिक सुधारों को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है । पूरी तरह प्रकृति की कृपा पर निर्भर किसान के श्रम की सुरक्षा पर कभी गंभीरता से सोचा ही नहीं गया । फसल बीमा की कई योजनाएं बनीं, उनका प्रचार हुआ, पर हकीकत में किसान यथावत ठगा जाता रहा- कभी नकली दवा या खाद के फेर में तो कभी मौसम के हाथों । किसान जब ‘‘केष क्राप’’ यानी फल-सब्जी आदि की ओर जाता है तो आढ़तियों और बिचैलियों के हाथों उसे लुटना पड़ता है। पिछले साल उत्तर प्रदेष में 88 लाख मीट्रिक टन आलू हुआ था तो आधे साल में ही मध्यभारत में आलू के दाम बढ़ गए थे। इस बार किसानों ने उत्पादन बढ़ा दिया, अनुमान है कि इस बार 125 मीट्रिक टन आलू पैदा हो रहा है। कोल्ड स्टोरेज की क्षमता बामुष्किल 97 लाख मीट्रिक टन की है। जाहिर है कि आलू या तो सस्ते- मंदे दामों में बिकेगा या फिर फिर किसान उसे खेत में ही सड़ा देगा- आखिर आलू उखाड़ने, मंडी तक ले जाने के दाम भी तो निकलने चाहिए।
हर दूसरे-तीसरे साल कर्नाटक कंे कई जिलों के किसान अपने तीखे स्वाद के लिए मषहूर हरी मिर्चों को सड़क पर लावारिस फैंक कर अपनी हताषा का प्रदर्षन करते हैंे। तीन महीने तक दिन-रात खेत में खटने के बाद लहलहाती फसल को देख कर उपजी खुषी किसान के ओठों पर ज्यादा देर ना रह पाती है। बाजार में मिर्ची की इतनी अधिक आवक होती है कि खरीदार ही नहीं होते। उम्मीद से अधिक हुई फसल सुनहरे कल की उम्मीदों पर पानी फेर देती है- घर की नई छप्पर, बहन की षादी, माता-पिता की तीर्थ-यात्रा; ना जाने ऐसे कितने ही सपने वे किसान सड़क पर मिर्चियों के साथ फैंक आते हैं। साथ होती है तो केवल एक चिंता-- मिर्ची की खेती के लिए बीज,खाद के लिए लिए गए कर्जे को कैसे उतारा जाए? सियासतदां हजारेंा किसानों की इस बर्बादी से बेखबर हैं, दुख की बात यह नहीं है कि वे बेखबर हैं, विडंबना यह है कि कर्नाटक में ऐसा लगभग हर साल किसी ना किसी फसल के साथ होता है। सरकारी और निजी कंपनियां सपने दिखा कर ज्यादा फसल देने वाले बीजों को बेचती हैं, जब फसल बेहतरीन होती है तो दाम इतने कम मिलते हैं कि लागत भी ना निकले।
देष के अलग-अलग हिस्सों में कभी टमाटर तो कभी अंगूर, कभी मूंगफली तो कभी गोभी किसानों को ऐसे ही हताष करती है। राजस्थान के सिरोही जिले में जब टमाटर मारा-मारा घूमता है तभी वहां से कुछ किलोमीटर दूर गुजरात में लाल टमाटर के दाम ग्राहकों को लाल किए रहते हैं। दिल्ली से सटे पष्चिमी उत्तर प्रदेष के कई जिलों में आए साल आलू की टनों फसल बगैर उखाड़े, मवेषियों को चराने की घटनाएं सुनाई देती हैं। आष्चर्य इस बात का होता है कि जब हताष किसान अपने ही हाथों अपनी मेहनत को चैपट करता होता है, ऐसे में गाजियाबाद, नोएडा, या दिल्ली में आलू के दाम पहले की ही तरह तने दिखते हैं। राजस्थान, मध्यप्रदेष, महाराश्ट्र, और उप्र के कोई दर्जनभर जिलों में गन्ने की खड़ी फसल जलाने की घटनांए हर दूसरे-तीसरे साल होती रहती है। जब गन्ने की पैदावार उम्दा होती है तो तब षुगर मिलें या तो गन्ना खरीद पर रोक लगा देती हैं या फिर दाम बहुत नीचा देती हैं, वह भी उधारी पर। ऐसे में गन्ना काट कर खरदी केंद्र तक ढो कर ले जाना, फिर घूस दे कर पर्चा बनवाना और उसके बाद भुगतान के लिए दो-तीन साल चक्कर लगाना; किसान को घाटे का सौदा दिखता है। अतः वह खड़ी फसल जला कर अपने
कृशि प्रधान अर्थव्यवस्था वाले देष में कृशि उत्पाद के न्यूनतम मूल्य, उत्पाद खरीदी, बिचैलियों की भूमिका, किसान को भंडारण का हक, फसल-प्रबंधन जैसे मुद्दे, गौण दिखते हैं और यह हमारे लोकतंत्र की आम आदमी के प्रति संवेदनहीनता की प्रमाण है। सब्जी, फल और दूसरी कैष-क्राप को बगैर सोचे-समझे प्रोत्साहित करने के दुश्परिणाम दाल, तेल-बीजों(तिलहनों) और अन्य खाद्य पदार्थों के उत्पादन में संकट की सीमा तक कमी के रूप में सामने आ रहे हैं। आज जरूरत है कि खेतों में कौन सी फॅसल और कितनी उगाई जाए, पैदा फसल का एक-एक कतरा श्रम का सही मूल्यांकन करे; इसकी नीतियां तालुका या जनपद स्तर पर ही बनें। कोल्ड स्टोरेज या वेअर हाउस पर किसान का कब्जा हो, साथ ही प्रसंस्करण के कारखाने छोटी-छोटी जगहों पर लगें। यदि किसान रूठ गया तो ध्यान रहे, कारें तो विदेष से मंगवाई जा सकती हैं, एक अरब की आबादी का पेट भरना संभव नहीं होगा।

पंकज चतुवैदी
साहिबाबाद, गाजियाबाद
201005
9891928376

गुरुवार, 23 अप्रैल 2015

Where has gone missing children?

देह-व्यापार में सिसकता बचपन
पंकज चतुर्वेदी


बात अभी 17 अप्रेल की है, गुमशुदा बच्चों के मामले में ढिलाई बरतने पर सुप्रीम कोर्ट ने ना केवल केंद्र सरकार को खूब कोसा, बल्कि महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय के सचिव पर पचास हजार का जुर्माना लगाते हुए तलब भी किया है। सोशल जस्टिस बेंच इस बात से बेहद नाराज था कि  कानून बनने के 15 साल बीत गए लेकिन केंद्र सरकार संसद के ही बनाये हुए कानून का पालन नहीं कर रही है। यहां बच्चे गायब हो रहे हैं और सरकार चिट्टी भेजने में लगी है। कोर्ट ने कहा कि इसे प्रशासन की अफसोसजनक हालत ही कहा जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार द्वारा बाल अधिकार संरक्षण आयोग  के अध्यक्ष व सदस्य की नियुक्ति होने पर भी नाखुषी जताई।  इसके अलावा राज्यों में एडवाइजरी बोर्ड के गठन न करने पर भी चिंता जताई। कोर्ट ने अगली सुनवाई एक मई को तय की है व सरकार को सारी  रिपोर्ट देने को कहा है। इससे पहले कोर्ट कई राज्यों के मुख्य सचिव और डीजीपी को तलब कर चुका है। सरकार मे बैठे लोग आंकड़ों से खेलते रहते हैं, अपनी खाल बचाने के लिए हलफनामें देते रहते हैं, लेकिन यह षर्मनाक सच है कि दिल्ली व उसके आसपास के जिलों से हर साल सबसे ज्यादा बच्चे गुम होते हैं।
Prajatantra Live 24-4-15

बाक्स
मध्यप्रदेष
प्रदेश में गुमशुदा बच्चों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है।  खासतौर पर बच्चियों के गुम होने की घटनाएं बढ़ी हैं। पहले तो पुलिस इन गुमशुदा बच्चों को ढूंढने में इतनी सक्रिय नहीं थी, लेकिन  वर्ष 2012 में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद से पुलिस के रवैये में बदलाव आया है और वे इन मामलों को गंभीरता से लेने  लगी है। फिर भी पुलिस की सारी कवायदों के बाद मार्च 2015  में ऑपरेशन स्माइल के तहत 710 गुमशुदा बच्चे ही बरामद किये गये।  इनमें 516 बालिकाएं है, जबकि बालकों की संख्या मात्र 194। यह अलग बात है, कि  फरवरी 2015 से यह आंकड़ा लगभग ड्योढा है। फरवरी में 490 गुमशुदा बच्चे बरामद किये गये थे, जिनमें 354 बालिकाएं और 136 बालक थे।
गौरतलब है, कि पिछले कुछ वर्षों में प्रदेश में बच्चियों के गायब होने की शिकायतों में आश्चर्यजनक ढंग से बढ़ोत्तरी हुई है। इनमें से कु छ की बरामदगी तो ऑपरेशन स्माइल के तहत हुई है, लेकिन बड़ी संख्या में बच्चियां आज भी लापता है। पुलिस मुख्यालय से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में अभी भी लगभग साढ़े 3 हजार बच्चे गायब हैं, इनमें ढाई हजार से अधिक लड़कियां हैं। इनमें सबसे ज्यादा बच्चे इंदौर जिले से (262) हैं। जिसमें बच्चियों की संख्या 198 हैं। दूसरे स्थान पर जबलपुर है, जहां 227 बच्चों की बरामदगी आज तक नहीं हो पायी है। इनमें बच्चियों की संख्या 125 है। तीसरे स्थान पर सतना जिला है, जहां 175 बच्चे गायब हैं, इनमें 127 बच्चियॉं शामिल हैं चैथे स्थान पर छतरपुर है, जहां 153 गुमशुदा बच्चे के नाम थानों में दर्ज है और इनमें से 128 बच्चियॉं हैं।  प्रदेश की राजधानी भोपाल से 135 बच्चे गायब हैं, (100 बच्चियॉं) हैं। इसी तरह छिंदवाड़ा जिले से 132, (101 बच्चियॉं), शहडोल में 124, (78 बच्चियॉं), रीवा में 104, (84 बच्चियॉं) मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान के गृह जिले  विदिशा से 83, (67 बच्चियॉं), धार में 108,  (90 बच्चियॉं), खण्डवा में 74, (58 बच्चियॉं), होशंगाबाद में 71 (52 बच्चियॉं), बैतूल में 68 (60 बच्चियॉं), ग्वालियर में 81,  (62 बच्चियॉं), सागर में 92, (73 बच्चियॉं) और रतलाम में 80, (67 बच्चियॉं) के नाम विभिन्न थानों में दर्ज हैं। जबकि कई जिलों में गुमशुदा बच्चों की संख्या काफी कम है जैसे- शाजापुर में 22, लेकिन यहां भी गुमशुदा बच्चियों की संख्या अधिक है यानी 22 में से 15 बच्चियां।


भारत सरकार के राश्ट्रीय अपराध अनुसंधान ब्यूरो के आंकड़े गवाह हैं कि देष में हर साल औसतन नब्बे हजार बच्चे गुमने की रपट थानों तक पहुंचती हैं, इनमें से तीस हजार से ज्यादा का पता नहीं लग पाता है। पाता। पिछले साल संसद में पेश एक आंकड़े के मुताबिक सिर्फ 2011 से 2014 के बीच सवा तीन लाख बच्चे लापता हो गए। जब भी इतने बड़े पैमाने पर बच्चों के गुम होने के तथ्य आते हैं तो सरकारी तंत्र रटे-रटाए औपचारिक स्पष्टीकरणों और समस्या के समाधान के लिए नए उपाय करने की बातों से आगे कुछ नहीं कर पाता।यह बात भी सरकारी रिकार्ड में दर्ज है कि भारत में कोई 900संगठित गिरोह , जिनके सदस्यों की संख्या पांच हजार के आसपास है जो बच्चे चुराने के काम में नियोजित रूप से सक्रिय हैं। लापता बच्चों से संबंधित आंकड़ों की एक हकीकत यह भी है कि राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो सिर्फ अपहरण किए गए बच्चों की गिनती बताता है। फिर, ज्यादातर मामलों में पुलिस प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार कर देती है या टालमटोल करती है।




गुमषुदा बच्चों की सूचना पर वेबसाईट
विभिन्न सरकारी महकमों, स्वयंसेवी संस्थाओं व आम लोगों द्वारा गुमषुदा बच्चों की सूचना, उनके मिलने की संभावना व अन्य सहयोग के लिए एक वेबसाईट  काम कर रही है - ीजजचरूध्ध्ूूूण्जतंबाजीमउपेेपदहबीपसकण्हवअण्पदध्जतंबाबीपसक
यहां पर गुम हुए बच्चें को तलाषने में लगे संगठनों को एकीकृत सूचना मिल जाती है। यह वेबसाईट है तो बेहद उपयोगी व बहुआयामी, लेकिन इसकी दिक्क्त है कि यह केवल अंग्रेजी में उपलब्ध है। फिर जिन घरों से बच्चे गुमने की सबसे ज्यादा सूचना आती है वे परिवार इतने पढे लिखे नहीं होते कि वेबसाईट पर जा सकें। हालांकि बच्चों के गुमने बाबत मदद के लिए 919830920103 नंबर पर फोन भी किया जा सकता है। यह विड।बना है कि इतनी अत्याध्ुानिक तकनीक से लैस इस वेबसाईट पर पुलिस वाले जाते ही नहीं है और उनका जोर रहता है कि बच्चों के गुमने की कम से कम रपट थाने में दर्ज हो

बच्चों के गुम होने के संदर्भ में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की एक रिपोर्ट बेहद डरावनी व सभ्य समाज के लिए षर्मनाक है। इसमें कहा गया है कि देश में हर साल दर्ज होने वाली 45 हजार से ज्यादा बच्चों की गुमशुदगी की रिपोर्ट में से तकरीबन 11 हजार बच्चों का कोई नामोनिशान तक नहीं मिल पाता है। इनमें से आधे जबरन देह व्यापार में धकेल दिए जाते हैं, षेश से बंधुआ मजदूरी कराई जाती है या फिर उन्हें भीख मांगने पर मजबूर किया जाता है। कोई डेढ लाख बच्चे उनके मां-बाप द्वारा ही बंधुआ मजदूरी के लिए बेचे जाते हैं। यह भी चैंकाने वाला तथ्य है कि दो लाख बच्चे तस्करी कर विदेष भेजे जाते हैं जहां उनसे जानवरों की तरह काम लिया जाता है। मानवाधिकर आयोग और यूनिसेफ की एक रिपोर्ट को मानें तो  गुम हुए बच्चों में से 20 फीसद बच्चे विरोध और प्रतिरोध के कारण मार दिए जाते हैं। कुछ बच्चे अंग तस्करों के हाथों भी फंसते  हैं । यह एक दुखद लेकिन चैंकाने वाला तथ्य है कि भारत में हर दसवां बच्चा यौन षोशण का षिकार हो रहा है। यही नहीं सुप्रीम कोर्ट भी चेता चुकी है कि हमारा देष बाल वैष्यावृति के लिए एषिया की सबसे बड़ी मंडी के रूप में उभर रहा है।
भारत में अक्सर गरीब, पिछडे और अकाल ग्रस्त इलाकों में लड़कियों को उनके पालकों को मीठे-मीठे लुभावनों में फंसा कर  षहरों में लाया जाता है और उन्हें देह व्यापार में ढकेल दिया जाता है।  गरीब देषो में आर्थिक स्थिति में बहुत भिन्नता है, इसलिए दूरदराज के किसी कस्बे में बिना किसी हुनर के भी ऊंची मजदूरी पर रोजगार दिलाने के रंगीन सपने कभी-कभी परिवार  परिवार वालों को आसानी से लुभा जाते हैं। कई बार षादी के झांसे में भी लड़कियों को फंसाया जाता है। दिल्ली विष्वविद्यालय में स्कूल आफ सोषल वर्क के डा. केके मुखोपाध्याय के एक षोध-पत्र में लिखा है कि बाल वेष्यावृति का असल कारण विकास से जुड़ा हुआ है और इसे अलग से आर्थिक या सामाजिक समस्या नहीं माना जा सकता । इस षेाध में यह भी बात स्पश्ट हुई है कि  छोटी उम्र में ही वेष्यावृृति के लिए बेची-खरीदी गई बच्चियों में से दो-तिहाई अनुसूचित, अनुसूचित जनजातियों या बेहद पिछड़ी जातियों से आती हैं। केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड ने कुछ साल पहले एक सर्वेक्षण करवाया था जिसमें बताया गया था कि देष में लगभग एक लाख वेष्याएं हैं जिनमें से 15 प्रतिषत 15 साल से भी कम उम्र की हैं।  हालांकि गैर सरकारीसंगठनों का दावा है कि ये आंकड़े हकीकत से कई गुणा कम है। असल में देष में पारंपरिक रूप से  कम उम्र की कोई 10 लाख बच्चियां देह व्यापार के नरक में छटपटा रही हैं।
विदित हो अभी एक साल पहले ही दिल्ली पुलिस ने राजधानी से लापता बच्च्यिों की तलाष में एक ऐसे गिरोह को पकड़ा था जो बहुत छोटी बच्चियों को उठाता था, फिर उन्हें राजस्थान की पारंपरिक वैष्यावृति के लिए बदनाम एक जाति को बेचा जाता था। अलवर जिले के दो गांवों में पुलिस के छापे से पता चला कि कम उम्र की बच्चियों का अपरहण किया जाता है। फिर उन्हें इन गांवों में ले जा कर ‘बलि के बकरे’’ की तरह खिलाया-पिलाया जाता है। गाय-भैंस से ज्यादा दूध लेने के लिए लगाए जाने वाले हार्मोन के इंजेक्षन ‘‘आॅक्सीटासीन’’ दे कर छह-सात साल की उम्र की इन लड़किया को कुछ ही दिनों में 14-15 साल की तरह किषोर बना दिया जाता और फिर उन्हें यौन संबध बनाने के लिए मजबूर किया जाता था। ऐसा नहीं है कि दिल्ली पुलिस के उस खुलासे के बाद यह धिनौना धंधा रूक गया। अभी अलवर, मेरठ, आगरा, मंदसौर सहित कई जिलों के कई गांव इस पैषाचिक कृत्य के लिए सरेआम जाने जाते हैं। पुलिस से छापे मारती है, बच्चियों को महिला सुधार गृह भेज दिया जाता है। फिर दलाल लोग ही बच्चियों के परिवारजन बन कर उन्हें महिला सुधार गृह से छुड़वाते हैं और सुदूर किसी मंडी में फिर उन्हें बेच देते हैं।
बच्चियों की खरीद-फरोख्त करने वाले दलाल स्वीकार करते हैं कि एक नाबालिक  कुवांरी बच्ची को धंधे वालोें तक पहुंचाने के लिए उन्हे ंचैगुना दाम मिलता है। वहीं कम उम्र की बच्ची के लिए ग्राहक भी ज्यादा दाम देते हैं। फिर कम उम्र की लड़की ज्यादा सालों तक धंधा करती है। तभी दिल्ली व कई बड़े षहरों में हर साल कई छोटी बच्चियां गुम हो जाती हैं और पुलिस कभी उनका पता नहीं लगा पाती है।
इस बात को ले कर सरकार बहुत कम गंभीर है कि भारत  बांग्लादेष, नेपाल जेसे पड़ोसी देषों की गरीब बच्चियों की तिजारत का अतंरराश्ट्रय बाजार बन गया है। जधन्य तरीके से पेट पालने वाले हर बच्चे के जीवन का अतीत बेहद दर्दनाक ही होता हे। भले ही मुफलिसी को बाल वैष्यावृृति के लिए प्रमुख कारण माना जाए, लेकिन इसके और भी कई कारण हैं जो समाज में मौजूद विकृृत मन और मस्तिश्क के साक्षी हैं।
एक तो एड्स के भूत ने योनाचारियों को भयभीत कर रखा है सो वे छोटी बच्चियों की मांग ज्यादा करते हैं, फिर कुछ नीम हकीमों ने भी फैला रखा है कि यौन-संक्रमण रोग ठीक करने के लिए बहुत कम उम्र की बच्ची से यौन संबंध बनाना कारगर उपाय हे। इसके अलावा देष में कई सौ लोग इन मासूमों का इस्तेमाल पोर्न वीडियों व फिल्में बनाने में कर रहे हैं। अरब देषो में भातर की गरीब मुस्लिम लड़कियों को बाकायदा निकाह करवा कर सप्लाई किया जाता है। हैदराबाद तो इसकी सर्व सुलभ मंडी है। ताईवान, थाईलेंड जैसे देह-व्यापार के मषहूर अड्डो की सप्लाई- लाईन भी भारत बन रहा है। यह बात समय-समय पर सामने आती रहती है कि गोवा, पुश्कर जेसे अंतरराश्ट्रीय पर्यटकों के आकर्शण केंद्र बच्चियों की खपत के बड़े केंद्र हैं।
कहने को तो सरकारी रिकार्ड में कई बड़े-बड़े दावे व नारे हैं- जैसे कि सन 1974 में देष की संसद ने बच्चों के संदर्भ में एक राश्ट्रीय नीति पर मुहर लगाई थी ,जिसमें बच्चों को देष की अमूल्य धरोहर घोशित किया गया था। भारतीय दंड संहिता  की धारा 372 में नाबालिक बच्चों की खरीद-फरोख्त करने पर 10 साल तक सजा का प्रवधान है। असल में इस धारा में अपराध को सिद्ध करना बेहद कठिन है, क्योंकि अभी हमारा समाज बाल-वैष्यावृति जैसे कलंक से निकली किसी भी बच्ची के पुनर्वास के लिए सहजता से  राजी नहीं है। एक बार जबरिया ही सही इस फिसलन में जाने के बाद खुद परिवार वाले बच्ची को अपनाने को तैयार नहीं होते, ऐसे में भुक्तभोगी से किसी के खिलाफ गवाही की उममीद नहीं की जा सकती हे। दुनिया के 174 देषों, जिसमें भारत भी षामिल है, के संयुक्त राश्ट्र बाल अधिकार समझौते की धारा 34 में स्पश्ट उल्लेख है कि बच्चों को सभी प्रकार के यौन उत्पीड़न से निरापद रखने की जिम्मेदारी सरकार पर है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह बात किताबों से आगे नहीं हे।
कहने को तो देष का संविधान बिना किसी भेदभाव के बच्चों की देखभाल, विकास और अब तो षिक्षा की भी गारंटी देता है, लेकिन इसे नारे से आगे बढ़ाने के लिए ना तो इच्छा-षक्ति है और ना ही धन, जबकि गरीबी, बेराजगारी, पलायन, सामाजिक कुरीतियों, रूढिवादी लोगों के लिए बच्चियों को देह व्यापार के ध्ंाधे में ढकेलने के लिए उनका आर्थिक और आपराधिक तंत्र बेहद ताकतवर है। कहने को कई आयोग बने हुए हैं, लेकिन वे विभिन्न सियासती दलों के लोगों को पद-सुविधा देने से आगे काम नहीं कर पा रहे हैं।
आज बच्चियों को केवल जीवित रखना ही नहीं, बल्कि उन्हें इस तरह की त्रासदियों से बचाना भी जरूरी है और इसके लिए सरकार की सक्रियता, समाज की जागरूकता और पारंपरिक लोक की सोच में बदलाव जरूरी है।

पंकज चतुर्वेदी


Libya violence : threat to Africa

अशांत अफ्रीका कहीं उपजा न दे लीबिया में विद्रोह


ट्यूनीशिया, नाइजर, चाड और मिस्र से घिरा लीबिया अब दुनिया के लिए नए खतरे के रूप में ‘आजाद’ हो चुका है। इससे पहले इराक और अफगानिस्तान को भी आजाद किया गया, जो अब दुनियाभर में आतंक के कारक बन गए हैं। 41 साल तक लीबिया पर शासन करने वाला मुअम्मर गद्दाफी बीते दो दशकों से अमेरिका की आंख का कांटा बना हुआ था। इस मार्च में गद्दाफी सरकार के पतन के चार साल हो गए हैं और हकीकत यह है कि लीबिया यानी अरब-अफ्रीका के बीच का एक संपन्न देश अब लंबे समय तक के लिए अशांत और आतंकवादग्रस्त क्षेत्र में तब्दील हो चुका है। वहां न तो सरकार है, न ही अर्थतंत्र, आईएस के आतंकवादियों व तस्करों के लिए यह मुफीद जगह बन गया है। संयुक्त राष्ट्र ने इस देश को हथियार खरीदने पर पाबंदी लगा रखी है, सो यहां चल रहा नशे के बदले हथियार का खेल पूरी दुनिया के लिए खतरा बन रहा है। विडंबना यह है कि कभी धर्मनिरपेक्ष, विशेष रूप से भारतीयों के लिए सुरक्षित जीवनयापन का स्थान लीबिया, अब रंगभेद व कट्टरपंथियों के हाथों में आ चुका है। मुल्क में जहां कभी भी काले लोग दिख रहे हैं, उन्हें विद्रोही सेना के लोग यह कहकर सरेआम मार रहे हैं कि ये गद्दाफी के भाड़े के सैनिक हैं। बेनगाजी सहित कई इलाकों के स्कूलों को गद्दाफी समर्थकों से पूछताछ का यातनागृह बना दिया गया है। वहां बीते चार सालों से पढ़ाई बंद है और सरकारी स्कूल पूछताछ के नाम पर हो रही अमानवीय हरकतों, लाशों और खून-मांस के लोथड़ों से पटे पड़े हैं। अंदाजा है कि विद्रोही सेना के हाथों मारे गए गद्दाफी समर्थकों की संख्या हजारों-हजार में है। असल में लीबिया टुकड़ों में बंटा हुआ जमीन का टुकड़ा मात्र है। वह फटे हुए चादर की तरह है, जहां शक्ति के लिए संघर्ष चल रहा है। जहां आम लीबियाई अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए क्षेत्रीय, राजनीतिक और कबीलाई मतभेदों के बीच जी रहा है। वहां दो अलग-अलग गुटों के संगठन हैं, जो एक-दूसरे के विरुद्ध हैं। हर एक के पास अपनी सेना, अपना प्रधानमंत्री और अपनी सरकार है और दोनों ही अपने वैधानिक होने का दावा करते हैं। यदि आप पूर्वी लीबिया के बएदा और टोब्रक में हैं, तो वहां अंतरराष्ट्रीय रूप से मान्यता प्राप्त सरकार है, जिसको जनरल खलीफा हफ्तार का समर्थन है और यदि आप पश्चिमी लीबिया के त्रिपोली में हैं, जहां तेल मंत्रालय है, नेशनल ऑयल कारपोरेशन है तो यहां मिलिशियाई गुटों द्वारा समर्थित स्वयंभू इस्लामी सरकार है, जिसके नीतिगत समझौते उन कट्टर इस्लामिक मिलिशियाई गुटों से भी हैं, जिन पर उसकी कोई पकड़ नहीं है। पूरे देश में दो किस्म की सरकारें हैं- त्रिपोली में उमर अल हसी का शासन है तो तोबरूक में अब्दुल्ला अल थानी का। वहां के तेल के कुओं से उत्पादन नहीं हो रहा है, क्योंकि उन पर कभी एक गुट तो कभी दूसरे गुट के हमले होते रहते हैं। तेल से होने वाली आय पच्चीस फीसदी भी नहीं बची है और देश के लगभग सभी बैंक दीवालिया घोषित हो चुके हैं। लोगों का पलायन जारी है और हर गांव-कस्बा युद्ध का मैदान बना हुआ है। इधर मिस्र भी दाएश (आईएस का संगठन) को मजा चखाने के लिए लीबिया पर हवाई हमले कर रहा है, जिसका खामियाजा भी स्थानीय जनता को ही भुगतना पड रहा है। यहां जानना जरूरी है कि अफ्रीका का साहेल क्षेत्र यानी सहारा रेगिस्तान से ले कर सूडान सवानास तक का इलाका, जिसमें चाड, नाइजर, नाइजीरिया, माली, इथोपिया जैसे कई देश आते हैं, इन दिनों नशे की तस्करी करने वालों का खुला मैदान बना हुआ है। सनद रहे कि गद्दाफी ने अपने देश की दक्षिणी सीमाओं पर इस तरह की अत्याधुनिक व संवेदनशील मशीनें लगवा रखीं थीं जोकि नशीली चीजों की छोटी मात्रा को भी तत्काल पकड़ लेती थीं। लगातार युद्ध के कारण लीबिया की सीमाओं पर लगे यंत्र काम नहीं कर रहे हैं। आईएस और एक्यूआईएम संगठन के लोगों की हशीश से भरी गाड़ियां नाइजर के रास्ते लीबिया के दक्षिणी इलाकों से घुसती हैं और वहां से अत्याधुनिक हथियार ले कर लौटती हैं। याद करें, लीबिया में जन-विद्रोह के शुरुआती दिनों में लोगों ने फौज के हथियार डिपो लूट लिए थे। बताया जा रहा है कि अब यही हथियार हशीश के बदले आईएस नेटवर्क तक पहुंच रहे हैं।तेल के भंडारों के कारण समृद्ध उत्तरी अफ्रीका के देश लीबिया में 42 साल तक शासक रहे कर्नल गद्दाफी ने अमेरिका के दबाव को कभी नहीं माना, शायद इसीलिए उन्हें सत्ता से हटाने के लिए अमेरिका ने नाटो की अगुवाई में अपने सैन्य विमानों से पूरे मुल्क के चप्पे-चप्पे पर बमबारी करवा दी। इराक में अमेरिका ने अपनी सेना के बल पर सत्ता परिवर्तन करवाया, आज भी देश अंदरूनी असंतोष और आतंकवाद से जूझ रहा है। शायद ही कोई ऐसा दिन जाता हो, जब वहां बम धमाकों में निर्दोष लोग मारे न जाएं। अफगानिस्तान में अमेरिका के बल पर बनी सरकार की आज भी काबुल के बाहर नहीं चलती है। शेष मुल्क अभी भी विद्रोही तालिबान के इशारे पर नाच रहा है। एशिया के बाद अफ्रीका में इस तरह के असंतोष का उभरना आने वाली दुनिया की शांति, विकास और खुशहाली के लिए गंभीर खतरा है। अब ब्रिटेन की सरकार ने स्वीकार कर लिया है कि लीबिया से हो रहा बड़ी संख्या में अवैध आव्रजन पूरे यूरोप के लिए खतरा बन रहा है। हालांकि ब्रितानी सरकार को यह भी स्वीकार करना था कि आतंकवादी आमतौर पर स्थानीय असंतोष, लचर आर्थिक व्यवस्था, लापरवाह सीमाई सतर्कता जैसे मुद्दों को आधार बना कर अपना विस्तार करते हैं और लीबिया का ताजातरीन तख्ता पलट ऐसे सभी हालातों को जन्म दे चुका है। अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को यह विचार करना होगा कि हथियारों के बल पर वैचारिक टकराव की नीति निर्दोष लोगों की जिंदगी पर खतरा ही होती है। किसी भी विद्रोह को समाप्त करने के लिए ताकत के बल पर दबाना और वैचारिक रूप से संतुष्ट करना, दोनों ही बराबर मात्रा में एकसाथ लागू करना जरूरी होता है।
= पंकज चतुर्वेदी

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

Public needs to be learn how to use road



कौन सिखाएगा सड़क-संस्कार ?

                                                                          पंकज चतुर्वेदी

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देश की राजधानी दिल्ली हो या राज्य की जयपुर या भोपाल या फिर दूरस्थ गांवों तक, आम आदमी इस बात से सदैव रूष्‍ट  मिलता है कि उसके यहां की सड़क टूटी है, संकरी है, या काम की ही नहीं है। लेकिन समाज कभी नहीं समझता कि सड़कों की दुर्गति करने में उसकी भी भूमिका कम नहीं है। अब देशभर में बाईस लाख करोड़ खर्च कर सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है । ष्वेत क्रांति व हरित क्रांति के बाद अब देश सड़क-क्रांति की ओर अग्रसर है । यह तो जान लेना चाहिए कि सड़क निर्माण पर खर्च होने वाली राशि कहीं आसमान से नहीं टपकेगी । यह हमारी-तुम्हारी जेब से ही निकाली जाएगी , टैक्स के नाम पर या और किसी माध्यम से । इतनी बड़ी राशि खर्च कर तैयार सड़कों का रखरखाव भी महंगा होगा । अभी तक देश में बिछी सड़कों के जाल के रखरखाव पर सालाना खर्च इससे भी अधिक होता है।
लेकिन यह नसीहत कौन दे कि कि लोगों को अब सड़क-इस्तेमाल करने के संस्कार सीखने होंगे । अभिप्राय तो सही तरीके से ड्रायविंग या पैदल चलने वालों को रास्ता देने के शिष्‍टाचार से होगा । यह एक चिंता का विषय है कि जिस देश में हर साल लगभग एक लाख लोग सड़क हादसों में मारे जा रहे हों, वहां तेज गति के वाहन चलने वाले सुपरफास्ट एक्सप्रेस वे बनाना कहां तक न्यायोचित व प्रासंगिक है ? एक्सप्रेस वे पर चलने के सामान्य शिश्टाचार की धज्जियां उड़ती देखना हो तो राजधानी दिल्ली से 30-40 किमी दूरी पर मथुरा या करनाल हाईवे पर देख सकते हैं । यहां विपरीत दिषा में चलते वाहन, बैलगाड़ी या ट्रैक्टर का मनमाने तरीके से संचालन, ‘‘जुगाड’’़ जैसे गैरकानूनी वाहनों में भरी भीड़ व ओवरलोड टैंपों या बसों की भागमभाग , ओवरटक करते वाहन देखे जा सकते हैं । सड़क के व्यस्ततम समय में टोल नाकों पर वाहनों की लंबी लाईन, और वहां पहले निकलने की जुगाड़ में एक दूसरे को धकियाते वाहन और उनको नियंत्रित करने वाली किसी व्यवस्था का न होना दर्षाता है कि हिंदुसतान के लेाग अभी ऐसी सड़कों पर चलने के लायक नहीं हैं । साथ ही हमारी व्यवस्थाएं भी इतनी चाक चैबंद नहीं हैं कि 100 या 120 किमी प्रतिघंटे की गति से वाहन दौड़ाने वाली सड़कों पर ख्ूानी खेल होने से रोक सके । सुपरफास्ट ट्राफिक के लिए बनी सड़कों के फ्लाई ओवरों पर साईकल रिक्शा, या रेहड़ी का बीच में ही अटक जाना व उसके पीछे ओटोमोबाईल वाहनों का रेंगना सड़क के साथ-साथ इंघन की भी बर्बादी करता है, लेकिन इस की देखभाल के लिए कोई नहीं है ।
कुल मिला कर हमारी सोच बेहद थोथी है । दिल्ली से ग्रेटर नोएडा के बीच सरपट रोड के दोनो ओर अब मकान और दुकान ही देखने लगे हैं । गे्रटर नोएडा से आगरा के बीच ताज एक्सप्रेस वे पर पांच नए शहर बसाने के लिए बड़े-बड़े प्राईवेट बिल्डरों को ठेका दिया जा रहा है । जाहिर है कि यहां की संभावित लाखों-लाख आबादी अपने दैनिक उपयोग के लिए इसी एक्सप्रेस -वे का इस्तेमाल करेगी । इस पर इक्का-तांगा भी चलेंगे और साईकिल और रिक्शा भी ।  जाहिर है कि इस सड़क की हालत बहुत-कुछ राजधानी दिल्ली की आउटर रिंग रोड की तरह हो जाएगी । भले ही पाकिस्तान की वित्तीय व प्रशासनीक स्थिति हमसे देायम हो, लेकिन वहां यूरोप-अमेरिका की तर्ज पर हाईवे पर चप्पे-चप्पे पर कैमरे लगे हैं । हाईवे पर कम स्पीड के वाहन चलने पर पाबंदी है और बेतरतीब गाड़ी पार्क करने का मतलब तत्काल भारी जुर्माना हैं । यही नहीं निर्धारित स्पीड से अधिक पर गाड़ी चलाने पर कैमरे में कैद हो कर भारी जुर्माना लगाया जाता हैं ।  लेकिन हमारे देश में एक भी सड़क ऐसी नहीं है, जिस पर कानून का राज हो । गोपीनाथ मुंडे, राजेश पायलेट, साहिब सिंह वर्मा जैसे कद्दावर नेताओं को हम सड़क की साधारण लापरवाहियों के कारण गंवा चुके हैं । लेकिन सरकार में बैठे लोग माकूल कानूनों के प्रति बेपरवाह हैं ।
सड़कों पर इतना खर्च हो रहा है, उसके रखरखाव करने वाले महकमों के वेतन व सुविधाओं पर हर रोज लगभग दो करोड़ रूपए खर्च हो रहे हैं इसके बावजूद सड़कों पर चलना यानी अपने को, सरकार को व उस पर चल रहे वाहनों को कोसने का नाम हो गया है । पहले तो देखें कि सड़क की दुर्गति कैसे होती है । सड़कों के निर्माण में नौसिखियों व ताकतवर नेताओें की मौजूदगी कमजोर सड़क की नींव खोेद देती है । यह विडंबना है कि देशभर में सड़क बनाते समय उसके सुपरवीजन का काम कभी कोई तकनीकी विषेशज्ञ नहीं करता है । सड़क ढ़ालने की मषीन के चालक व एक मुंषी, जो बामुष्किल आठ दर्जा पास होता है, सड़क बना डालता है । यदि कुछ विरले मामलों को छोड़ दिया जाए तो सड़क बनाते समय डाले जाने वाले बोल्डर, रोड़ी, मुरम की सही मात्रा कभी नहीं डाली जाती है । षहरों में तो सड़क किनारे वाली मिट्टी उठा कर ही पत्थरों को दबा दिया जाता है । कच्ची सड़क पर वेक्यूम सकर से पूरी मिट्टी साफ कर ही तारकोल डाला जाना चाहिए, क्योंकि मिट्टी पर गरम तारकोल वैसे तो चिपक जाता है, लेकिन वजनी वाहन चलने पर वहीं से उधड़ जाता है । इस तरह के वेक्यूम-सकर से कच्ची सड़क की सफाई कहीं भी नहीं होती है । हालांकि इसे बिल जरूर फाईलों में होते है।  इसी तरह सड़क बनाने से पहले पक्की सड़क के दोनों ओर कच्चे में खरंजा लगाना जरूरी होता है । यह तारकोल को फल्ने से रोकता है व इस में राड़ी मिल कर खरंजे के दवाब में एक सांचे सी ढ़ल जाती है । आमतौर पर ऐसे खरंजे कागजों में ही सिमटे होते हैं । कहीं ईंटें बिछाई भी जाती हे। तो उन्हें मुरम या सीमेंट से जोड़ने की जगह महज वहां से खोदी मिट्टी पर टिका दिया जाता है । इससे थोड़ा पानी पड़ने पर ही ईंटें ढ़ीली हो कर उखड़ आती हैं । यहां से तारकोल व रोढ़ी के फैलव व फटाव की शुरूआत होती है ।
सही सुपरवीजन नहीं होने के कारण सड़क का ढलाव ठीक न होना भी सड़क कटने का बड़ा कारण है । सड़क बीच में से उठी हुई व सिरों पर दबी होना चाहिए, ताकि उस पर पानी पड़ते ही किनारों की ओर बह जाए । लेकिन षहरी सड़कों का तो कोई लेबल ही नहीं होता है । बारिष का पानी यहां-वहां बेतरतीब जमा होता है और यह जान लेना जरूरी है कि पानी सड़क का सबसे बड़ा दुष्मन है । सड़क किनारे नालियों की ठीक व्यवस्था न होना भी सड़क की दुष्मन है । नालियों का पानी सड़क के किनारों को काटता रहता है । एक बार तारकोल कटा तो वहां से गिट्टी, बोल्डर का निकलना रुकता नहीं है ।
सड़कों की दुर्गति में हमारे देश का उत्सव-धर्मी चरित्र भी कम दोशी नहीं है । महानगरों से ले कर सुदूर गांवों तक घर में षादी हो या भगवान की पूजा, किसी राजनैतिक दल का जलसा हो या मुफत लगा लंगर ; सड़क के बीचों-बीच टैंट लगाने में कोई संकोच नहीं होता है । टैंट लगाने के लिए सड़कों पर चार-छर्ह इंच गोलाई व एक फीट गहराई के कई छेद करे जाते हैं । उत्सव समाप्त होने पर इन्हें बंद करना अपनी षान में गुस्ताखी माना जाता है । इन छेदों में पानी भरता है और सड़क गहरे तक कटती चली जाती है । कुछ दिनेंा बाद कटी-फटी सड़क के लिए सरकार को कोसने वालों में वे भी षामिल होते हैं ,जिनके कुकर्मों का खामियाजा जनता के पैसे से बनी सड़क को उठाना पड़ रहा होता है ।
नल, टेलीफोन, सीवर , पाईप गैस जैसे कामों के लिए सरकारी मकहमे भी सड़क को चीरने में कतई दया नहीं दिखाते हैं । सरकारी कानून के मुताबिक इस तरह सड़क को नुकसान पहुंचाने से पहले संबंधित महकमा स्थानीय प्रषासन के पास सड़क की मरम्मत के लिए पैसा जमा करवाता है । लेकिन सड़कों की दुर्गति यथावत रहती है । नया मकान बनाने या मरम्मत करवाने के लिए सड़क पर ईंटें, रेत व लोहे का भंडार करना भी सड़क की आयु घटाता है । हमारे देया की नई कालेानियों में भी पानी की मुख्य लाईन का पाईप एक तरफ ही होता है, यानी जब दूसरी ओर के बाशिंदे को अपने घर तक पाईप लाना है तो उसे सउ़क खोदना ही होगा । एक बार खुदी सड़क की मरम्मत लगभग नामुमकिन हेाती है । सड़क पर घ्टिया वाहनोें का संचालन भी उसका बड़ा दुश्मन है । यह दुनिया में शायद भारत में ही देखने को मिलेगा कि सरकारी बसें हों या फिर डग्गामारी करती जीपें, निर्धारित से दुगनी तक सवारी भरने पर रोक के कानून महज पैसा कमाने का जरिया मात्र हाते हैं । ओवरलोड वाहन, खराब टायर, दोयम दर्जे का ईंधन ये सभी बातें भी सरकार के चिकनी रोड के सपने को साकार होने में बाधाएं हैं ।
सवाल यह खड़ा होता है कि सड़क-संस्कार सिखाएगा कौन ? ये संस्कार सड़क निर्माण में लगे महकमों को भी सीखने होगंे और उसकी योजना बनाने वाले इंजीनियरों को भी । संस्कार से सज्जित होने की जरूरत सड़क पर चलने वालों को भी है और यातायात व्यवस्था को ठीक तरह से चलाने के जिम्मेदार लोगों को भी । सड़क के संस्कार अक्षुण्ण रहें , यह सुनिष्चित करने का जिम्मा उन एजंसियों का भी है जो सड़क से टोल टैक्स उगाह रहे हैं तो उन लोगों पर भी जो अपने रूतबे या भदेसपन का नाजायज फायदा उठा कर सड़क के कानूनों को तोड़ते हैं । सड़क घेर कर उत्सव मनाने वालों या उस पर बिल्डिंग मटैरियल फैलाने वालों पर पर कड़ी कानूनी कार्यवाही करना महति है ,क्योंकि सुदर सड़कें किसी राश्ट्र की प्रगति की प्रतीक हैं और सड़क पर अनाधिकृत कब्जा करने वाले देश की प्रगति के बाधक हैं ।
वैसे तो यह समाज व सरकार दोनों की साझा जिम्मेदारी है कि सड़क को साफ, संुदर और सपाट रखा जाए । लेकिन हालात देख कर लगता है कि कड़े कानूनों के बगैर यह संस्कार आने से रहे ।

पंकज चतुर्वेदी
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