तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

रविवार, 30 अगस्त 2015

PANI WALE MASTER JI . (Teacher on the work of water awareness )

पानी वाले मास्टरजी



Author: 
 पंकज चतुर्वेदी

शिक्षक दिवस पर विशेष


.‘‘अरे जल्दी से टोटी बन्द कर ले, मास्टरजी आ रहे हैं।’’ ऐसी पुकार गाज़ियाबाद के आसपास के गाँवों में अक्सर सुनाई दे जाती है। त्रिलोक सिंह जी, गाज़ियाबाद से सटे गाँव गढ़ी के हैं। गाज़ियाबाद के सरस्वती विद्या मन्दिर में अंग्रेजी के अध्यापक हैं, लेकिन क्या स्कूल और क्या समाज, उनकी पहचान ही ‘पानी वाले मास्टरजी’ की हो गई है।

बीते दस सालों में मास्टरजी भी सौ से ज्यादा गाँवों में पहुँच चुके हैं, पाँच हजार से ज्यादा ग्रामीणों और दस हजार से ज्यादा बच्चों के दिल-दिमाग में यह बात बैठ चुके हैं कि पानी किसी कारखाने में बन नहीं सकता और इसकी फिजूलखर्ची भगवान का अपमान है। उनकी इस मुहिम में उनकी पत्नी श्रीमती शोभा सिंह भी महिलाओं को समझाने के लिये प्रयास करती हैं।

त्रिलोक सिंह जी अपने विद्यालय में बेहद कर्मठता से बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाते हैं और उसके बाद बचे समय के हर पल को अपने आसपास इस बात का सन्देश फैलाने में व्यतीत करते हैं कि जल नहीं बचाया तो जीवन नहीं बचेगा। मास्टर त्रिलोक सिंह जी ना तो किसी संस्था से जुड़े हैं और ना ही कोई संगठन बनाया है.... बस लोग जुड़ते गए कारवाँ बनता गया.... की तर्ज पर उनके साथ सैंकड़ों लोग जुड़े गए हैं।

घर से आर्थिक रूप से सम्पन्न श्री त्रिलोक सिंह जी ने अंग्रेजी में एमए और फिर बीएड करने के बाद सन् 1998 में एक शिक्षक के रूप में समाज की सेवा करने का संकल्प लिया। उन्होंने अपना गाँव गढ़ी नहीं छोड़ा व वहीं से गाज़ियाबाद आना-जाना जारी रखा। बात सन् 2006 की गर्मियों की थी, गढ़ी गाँव में हर घर में सबमर्सिबल पम्प लग रहे थे। लेकिन बिजली का संकट तो रहता ही था। जैसे ही बिजली आती, सारा गाँव अपने-अपने पम्प खोल लेता, कोई कार धोता तो कोई भैंसे नहलाता।

गाँव की पुरानी जोहड़ों पर अवैध कब्जे हो चुके थे, सो बहते पानी को जाने का कोई रास्ता नहीं होता था। सारा पानी ऐसे ही गलियों में जमा हो जाता। बिजली जाती तो पूरे गाँव में पानी का संकट हो जाता, बस तभी मास्टरजी के दिमाग में यह बात आई कि हम जिस पानी को निर्ममता से फैला रहे हैं वह बड़ी मुश्किल से धरती की छाती चीर कर उपजाया जा रहा है और इसकी भी एक सीमा है।

श्री सिंह ने सबसे पहले इस बात को अपनी पत्नी को समझाया। मास्टरजी के अनुसार,‘‘पत्नी को समझाना बेहद कठिन होता है, सो सबसे पहले मैंने अपनी पत्नी को ही बताया कि जरूरत से ज्यादा पानी बहाना अच्छी बात नहीं है। जब वह समझ गई तो पास-पड़ोस को बताया फिर मुहल्ले को और उसके बाद पूरे गाँव को यह समझाने में दिक्कत नहीं हुई।’’

श्री सिंह बताते हैं कि पहले जब हैण्डपम्प थे तो लोग बस अपनी जरूरत का पानी निकालते थे, लेकिन बिजली की मोटर के कारण एक बाल्टी पानी की जरूरत पर दो बाल्टी फैलाने लगे हैं। मास्टर त्रिलोक सिंह ने अपने गाँव गढ़ी के बाद उस गाँव को चुना जहाँ से उन्होंने प्राइमरी स्कूल किया था, यानी सिकरोड। फिर तो यह सिलसिला चल निकला। रजापुर ब्लाक के 32 गाँव, मुरादनगर के 36 और भोजपुर के दस गाँवों में मास्टरजी की चौपाल हो चुकी है।

वहाँ पानी व्यर्थ ना बहाने, पारम्परिक जोहड़ व तालाबों के संरक्षण और भूजल के बचाने की बात जीवन का मूलमंत्र बन चुकी है। कई गाँवों के प्रधानों ने अपने तालाब-जोहड़ से अतिक्रमण हटवाए, उन पर बाउंड्री वाल बनवाई। श्री सिंह के प्रयासों से जल संरक्षण के कई मामले राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) भी गए। स्वयं उनके गाँव गढ़ी में तालाब की ज़मीन पर पानी की टंकी बनाने के मामले में एनजीटी सरकरी टंकी को हटाने के आदेश दे चुकी है।

श्री सिंह इन दिनों पारम्परिक बम्बे यानि नालों में अविरल जल बहाव के लिये संघर्ष कर रहे हैं। सुल्तानपुर, असालतपुर, सिकरोड, हरसावा से गुजरने वाले पारम्परिक बम्बे के बन्द होने से बारिश के पानी के प्रवाह में दिक्कत हो रही है। मास्टरजी अब उन गाँवों में जाकर श्रमदान के जरिए नाले को खोलने पर काम कर रहे हैं।

मास्टरजी अपने स्कूल के बच्चों को छोटी-छोटी आदतें डलवाते हैं-जैसे स्कूल से घर लौटने पर यदि पानी की बोतल में पानी शेष हो तो उसे नाली में बहाने की जगह गमलों में डालना, अपने घर में वाहन धोने के लिये पाइप के स्थान पर बाल्टी का इस्तेमाल, गिलास में उतना ही पानी लेना जितनी प्यास हो।

दिसम्बर-2014 में त्रिलोक सिंह जी ने गाज़ियाबाद शहर में हजारों बच्चों की एक जागरुकता रैली निकाली, जिसके समापन पर कलेक्टर को ज्ञापन देकर भूजल के व्यावसायिक देाहन कर रहे टैंकर माफ़िया पर कड़ाई से रोक की माँग की गई और उसका असर भी हुआ।

‘‘आप स्कूल में शिक्षण के बाद इतना समय कैसे निकाल लेते हैं?’’ इस प्रश्न के जवाब में श्री सिंह कहते है, ‘‘मैं बच्चों को कभी ट्यूशन नहीं पढ़ाता। स्कूल के बाद जो भी समय बचता है या घर से स्कूल आने-जाने के रास्ते में जब कभी, जहाँ कहीं भी अवसर मिलता है, मैं लोगों को जल संरक्षण का सन्देश देने में अपना समय लगाता हूँ। यही मेरा शौक है और संकल्प भी।’’

मास्टर त्रिलोक सिंह बानगी हैं कि विद्यालय स्तर पर पर्यावरण संरक्षण की बात करने के लिये किसी पाठ्यक्रम या पुस्तकों से ज्यादा जरूरत है एक दृढ़ इच्छा शक्ति व स्वयं अनुकरणीय उदाहरण बनने की।

शनिवार, 29 अगस्त 2015

Billionaires God of hungry worshipers

Prabhat, Meerut, 30-8-15

भूखे भक्तों ंके ‘कुबेर’ देवता

mp Jansandesh , Satna 29-8-15
                                                                      पंकज चतुर्वेदी

भारत आज भी सोने की चिडि़या है, लेकिन उसका सोना व धन भगवान के पास बंधेज रखा है। असलियत में यदि भारत के ‘‘भगवान’’ अपना खजाना खोल दे ंतो चुटकी बजाते ही भुखमरी, कर्ज, बेरोजगारी, अषिक्षा जैसी समयाएं दूर हो जाएंगी। संसाधन जुटने लगेंगे।  याद करें महाराश्ट्र का मेलघाट इलाका बीते कई सालों से कुपेाशण के कारण षिषुओं की मौत की त्रासदी से जूझ रहा है। देष की 43 फीसदी आबदी के कुपोशणग्रस्त होना वास्तव में राश्ट्रीय षर्म की  बात है। भरपेट भोजन के लिए तरस रहे मेलघाट से कुछ ही किलोमीटर दूर है साईंबाबा का स्थान षिरडी जिसकी सालाना आय 210 करोड़ रूपए है। मंदिर के पास 32 करोड़ के तो सोना-चांदी के वो आभूशण हैं जो भक्तों ने वहां चढ़ाए हैं। प्रदेष के सबसे अमीर मंदिर की कुल संपत्ति 450 करोड़ से अधिक है। यहां यह भी जानना जरूरी है कि जिस साईंबाबा को भक्त सोने-हीरे के मुकुठ व चांदी की पालकी में बैठाने पर तुले हैं, उन्होंने अपाना पूरा जीवन एक जीर्ण-षीर्ण इमारत में टाट के टुकड़े के साथ व्यतीत किया था। इसी प्रदेष की राजधानी मुंबई का सिद्धीविनायक मंदिर भी वीआईपी धार्मिकस्थल है, जिसकी सालाना आय 46 करोड़ के पार है। मंदिर के पास 125 करोड़ के तो फिक्स डिपोजिट ही हैं। ये तो वे मंदिर हैं जो बीते दो दषकों के दौरान ज्यादा चर्चा में आए और इन्हें मध्यवर्ग के पसंदीदा तीर्थ कहा जाता है। देष के यदि प्राचान मंदिरों की ओर देखें तो इतनी दौलत वहां अटी पड़ी है कि वह देष की दो पंचवर्शीय योजना में भी खर्च नहीं की जा सकती है। सुनने में आया है कि केंद्र सरकार अब स्वयंभु भगवानों की अकूत दौलत पर जांच करवाने जा रही है। कम से कम एक बार मंदिरों की कुल संपत्त् िका आकलन तो होना चाहिए ताकि यह धन भारत की समृद्धि का अंतरराश्ट्रीय मापदंड बन सके।
दक्षिण भारत के प्रसिद्ध तिरूमला मंदिर की कुल संपति, मुल्क के सबसे अमीर मुकेष अंबउानी के पूरे व्यापारकि साम्राज्य से भी ज्यादा है। भारत में 10 लाख से ज्यादा मंदिर हैं, तिस पर कतिपय लोग यह कहते नहीं अघाते हैं कि विदेषी-मुसलमान हमलावरों ने भारत के मंदिरों को खूब लूटा व नश्ट किया। देष के सौ मंदिर ऐसे हैं जिनके सालाना चढ़ावे में इताना धन आता है कि वह भारत सरकार के सालाना बजट की कुल योजना व्यय के बराबर होता है। देष के दस मंदिरों की कुल संपत्ति देष के सबसे अधिक धनवान 500 लोगों की कुल संपदा के बराबर हैै।  मंदिरों का अभी तक उपलब्ध रिकार्ड के अनुसार कुल सात अरब डालर का सोना यहां धर्म के नाम पर जुड़ा हुआ है। केरल के पद्मनाभ मंदिर के केवल एक तहखाने से पांच लाख करोड़ के हीरे, जवाहरात, आभूशण मिले हैं। त्रावनकोर रियासत के इस मंदिर की सुरक्षा में अब ब्लेक कैट कमांडो तैनात हैं, मामला अदालतों में चल रहा है। कहा जा रहा है कि यदि सभी तहखाने खोल दिए जाएं तो उसमें इतनी दौलत है कि षायद रिजर्व बैंक के पास भी इतनी मुद्रा-क्षमता नहीं होगी। उड़ीसा के बड़ा हिस्सा लगातार भुखमरी और अकाल का षिकार रहता है। कालाहांडी से बामुष्किल 250 किलोमीटर दूर पुरी के जगन्नाथ मंदिर में भी कई ऐसे कमरे हैं जिनमें छिपी संपदा अकूत है। पिछले साल वहां के एक कमरे को अनजाने में खोला गया तो उसमें कई टन चांदी की सिल्लियां निकली थीं। फिर आस्थाओं का वास्ता दे कर वहां के खजाने को उजागर होने से रोक दिया गया। केरल के त्रिषूर जिले के सबरीमाला पहाडि़यों के बीच स्थित कृश्ण भगवान के गुरूवायूर मंदिर की सालाना आय कई करोड़ हे। मंदिर के नाम से बैंक में 125 करोड़ के फिक्स डिपोजिट हैं। आंध्रप्रदेष के तिरूपति बालाजी को विष्व का सबसे अमीर मंदिर माना जाता है। इसके खजाने में आठ टन जेवर हैं। इसकी सालाना आय 650 करोड़ हे। बैंकों में मंदिर की ओर से 3000 किलो सोना और 1000 करोड़ के फिक्स जमा किए गए हैं। यहां औसतन हर रोज साठ हजार से एक लोख लोग आते हैं। अकेले पैसों की गनती के लिए वहां 20 लोग काम करते हैं। यहां क संपत्ति भारत के कुल बजट का पचासवां हिस्सा है। यानी जितना पैसा देष के एक सौ बीस करोड़ लोगों के लिए मयस्सर है  उसके पचासवे हिस्से पर केवल एक किलोमीटर में फैले तिरूपति मंदिर का हक है। यहां यह बता दें कि कर्नाटक में येदुरप्पा की कुर्सी खाने वाले अवैध खनिज कांड के खलनायक रेड्डी बंधुओं ने पिछले ही साल यहां  16 किलो वजन का सोने का मुकुट चढ़या था, जिसकी कीमत उस समय पैंतालीस करोड़ आंकी गई थी। यह बानगी है कि इन मंदिरों का खजाना किस तरह की कमाई से भरा जाता है। 
प्रत्येक देष अपने पास सोने का एक आरक्षित भंडार रखता है जो उसके रसूख व आपात स्थिति में सहारा देता है। भारत के पास ऐसा रिजर्व गोल्ड 557.7 टन है, जबकि अमेरिका के पास यह रिजर्व स्टाक 8133.5 टन है। जान कर आंखे खुली रहा जाएंगी कि भारत के कुछ मंदिरों में जाहिरा तौर पर 22 हजार टन सोना है। यानि अमेरिका के रिजर्व स्टाक से ढाई गुणा व भारत के स्टाक से 4000 गुणा ज्यादा। अनुमान है कि इस सोने की कीमत पचास हजार करोड होगी। यदि इसे देष के हर इंसान में बांटा जाए तो प्रत्येक को 40 हजार मिलेंगे।वहीं इससे भारत का पूरा विदेषी कर्जा उतर सकता है।
तिरूपति के बाद सबसे अमीर मंदिरों में जम्मू के कटरा से उपर पहाड़ों पर स्थित वैश्णो देवी मंदिर का नाम आता है। यहां आने वाले श्रद्धांलुओं की संख्या तिरूपति के आसपास ही है।  यह मंदिर अपेक्षाकृत नया है, लेकिन इसकी आय सालाना पाचं सौ करोड़ को पार कर चुकी है।  ऐसा नहीं कि मंदिरों के धनवान होने में उनके पुरातन होने का केाई योगदान होता हे। दिल्ली के अक्षरधाम मदिर को ही लें, इसकी आय देखते ही देखते कई करोड़ सालाना हो गई हे। उज्जैन के महाकालेष्वर, गुजरात का द्वारिकाधीष व सोमनाथ मंदिर, मथुरा के द्वारिकाधीष व जन्मभूमि मंदिरों, बनारस के बाबा विष्वनाथ, गोहाटी की कामाख्या देवी जैसे कई ऐसे मंदिर हैं जहां की आय-व्यय पर सरकार का दखल बहुत कम है। ये धार्मिक स्थल घनघोर अव्यवस्थओं और नागरिक-सुविधाओं के नाम पर बेहद दीन-हीन हैं, लेकिन उनकी हर दिन की चढ़ौअत कई-कई गांवों के हजारों घरों का चूल्हा जलाने के बराबर है।
लोगों द्वारा आस्था से चढ़ाए गए चंदे के इस्तेमाल की हकीकत  उनके आॅडिट द्वारा सामने आती है।, हालांकि मंदिर कभी भी अपना आय-व्यय सार्वजनिक नहीं करते और समय-समय पर वहां के धन का राजनीतिक कार्यों में दुरूप्योग की खबरें भी आती हैं।  देष के चुनिंदा कुछ मंदिरों का आर्थिक लेखा-जोखा बताता है कि करोड़ों करोड़ की कमाई का बामुष्किल 1.40 प्रतिषत पैसा मंदिर के रखरखाव पर व्यय होता है।  भक्तों की भगवान को समर्पित निधि में से 28 टका तो वहां काम कर रहे कर्मचारियों के वेतन पर जाता है, जबकि दान या सार्वजनिक काम पर कोई सात फीसदी व्यय होता है। सबसे ज्यादा व्यय 33 प्रतिषत ‘‘अन्य’’ मद में होता है जो सबसे ज्यदा संदेह पैदा करता है।
धन जुटाने में ‘‘जिंदा भगवान’’ भी पीछे नहीं हैं।  पिछले सालों पुट्टापर्थी के सत्य साईं बाबा के निधन के बाद खुलासा हुआ था कि अकेले उनके कमरे से ही 40 करोड़ नगद और 77 लाख के जेवरात मिले थे। सत्य साइं्र बाबा की विरासत कई हजार करोड़ की है। विदेषों से काला धन लाने के नाम पर आंदोलनरत बाबा रामदेव के पास कई हजार एकड़ जमीन है और उन्हांेने महज दस सालों में 1100 करोड़ का साम्राज्य खड़ा कर लिया है। राधा स्वामी, व्यास की पूरे देष में सत्संग के नाम पर इतनी जमीन है कि उसकी कुल कीमत कई हजार करोड़ होगी। हाल ही में चर्चा में रहे हरियाणा के रामपाल की व्यापारिक साम्राज्य चैंकाने वाला है। महर्शि महेष योगी का वित्तीय-साम्राज्य की तो गणना ही नहीं हो सकी। राधे मां का  धन-संसार एक हजार करोड़ का है तो आषुमल यानि आषाराम के पास अरबों की तो केवल जमीने ही है।।
ऐसा नहीं है कि केवल हिंदु मत के भगवान ही संपत्ति जोड़ने मे ंयकीन रखते हैं, सिखों के गुरूद्वारे , विषेश रूप से अमृतसर का हरिमिंदर साहेब या स्वर्ण मंदिर, दिल्ली का बंगला सोहब व षीषगंज भी भक्तों की चढ़ौत से मालामाल रहते हैं। बोधगया के मंदिर में भी अकूत दौलत है। जैनियो ंके मंदिर तो वैभव का भंडार होते हैं।  देष की मस्जिदों की बीते साल में  अचानक सूरत बदलना भी गौरतलब है। वैसे अजमेर षरीफ, मुंबई की हाजी मलंग  व दिल्ली की निजामुद्दीन दरगाह पर अच्छी-खासी चढ़ौत आती है।
क्या कभी कोई यह कहने की हिम्मत जुटा पाएगा कि देष के सामने भगवान के कारण खडे हुए इतने बड़े संकट से जूझने के लिए मंदिरों में बंद अकूत खजानों के इस्तेमाल का रास्ता खोले ? क्या कभी र्काइे इन अरबपति मंदिरों को उनके सामाजिक सरोकारों का ध्यान दिलवा कर वहां आ रह कमाई को षिक्षा, स्वास्थय, भ्ूाख जैसे  कार्यों पर खर्च करने के लिए प्रेरित करेगा? यह सही है कि कुछ धार्मिक संस्थाएंव बाबा-बैरागी इस दिषा में कुछ ऐसे काम करते हैं, लेकिन उनका योगदान उनकी कमाई की तुलना में राई बराबर ही होता है। और क्या कभी कोई यह कर पाएगा कि मंदिरों व अन्य धार्मिक स्थलों पर चढ़ौत चढ़ाने वाले से यह सुनिष्चित करने को कहा जाएगा कि उसके द्वारा चढ़ाई गई रकम दो-नंबरे की आय का हिस्सा नहीं है?ें
पंकज चतुर्वेदी
यू जी -1 ए 3/186, राजेन्द्र नगर सेक्टर-2
साहिबाबाद, गाजियाबाद
201005
संपर्क: 9891928376, 011- 26707758(आफिस),

शुक्रवार, 28 अगस्त 2015

Fishermen of Pakistan and India: In enemy waters

सीमा विवाद में नरक भोगते मछुआरे

                                                                     पंकज चतुर्वेदी


RAJ EXPRESS M.PM. 29-8-15
‘‘इब्राहीम हैदरी(कराची)का हनीफ जब पकड़ा गया था तो महज 16 साल का था, आज जब वह 23 साल बाद घर लौटा तो पीढि़यां बदल गईं, उसकी भी उमर ढल गई। इसी गांव का हैदर अपने घर तो लौट आया, लेकिन वह अपने पिंड की जुबान ‘‘सिंधी’’ लगभग भूल चुका है, उसकी जगह वह हिंदी या गुजराती बोलता है। उसके अपने साथ के कई लोगों का इंतकाल हो गया और उसके आसपास अब नाती-पोते घूम रहे हैं जो पूछते हैं कि यह इंसान कौन है।’’ उफा में हुई भारत-पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के बीच की वार्ता के बाद दोनों देषों की जेलों में बंद मछुआरों की हो रही रिहाई के साथ ही ऐसी कई कहानियां सामने आ रही हैं। दोनों तरफ लगभग एक से किस्से हैं, दर्द हैं- गलती से नाव उस तरफ चली गई, उन्हें घुसपैठिया या जासूस बता दिया गया, सजा पूरी होने के बाद भी रिहाई नहीं, जेल का नारकीय जीवन, साथ के कैदियों द्वारा षक से देखना, अधूरा पेट भोजन, मछली पकड़ने से तौबा....। एक दूसरे देष के मछुआरों को पकड़ कर वाहवाही लूटने का यह सिलसिला ना जाने कैसे सन 1987 में षुरू हुआ और तब से तुमने मेरे इतने पकड़े तो मैं भी तुम्हारे उससे ज्यादा पकडूंगा की तर्ज पर समुद्र में इंसानों का षिकार होने लगा।
न्‍यू ब्राईट टाईम्‍स गुडगावं 30 अगस्‍त 15
भारत और पाकिस्तान में साझा अरब सागर के किनारे रहने वाले कोई 70 लाख परिवार सदियों से समु्रद से निकलने वाली मछलियों से अपना पेट पालते आए हैं। जैसे कि मछली को पता नहीं कि वह किस मुल्क की सीमा में घुस रही है, वैसे ही भारत और पाकिस्तान की सरकारें भी तय नहीं कर पा रही हैं कि आखिर समु्रद के असीम जल पर कैसे सीमा खींची जाए।  कच्छ के रन के पास सर क्रकी विवाद सुलझने का नाम नहीं ले रहा है। असल में वहां पानी से हुए कटाव की जमीन को नापना लगभग असंभव है क्योंकि पानी से आए रोज जमीन कट रही है और वहां का भूगोल बदल रहा है।  देानेां मुल्कों के बीच की कथित सीमा कोई 60 मील यानि लगभग 100 किलोमीटर में विस्तारित है। कई बार तूफान आ जाते हैं तो कई बार मछुआरों को अंदाज नहीं रहता कि वे किस दिषा में जा रहे हैं, परिणामस्वरूप वे एक दूसरे के सीमाई बलों द्वारा पकड़े जाते हैं। कई बार तो इनकी मौत भी हो जाती है व घर तक उसकी खबर नहीं पहुंचती।
जब से षहरी बंदरगाहों पर जहाजों की आवाजाही बढ़ी है तब से गोदी के कई-कई किलोमीटर तक तेल रिसने ,षहरी सीवर डालने व अन्य प्रदूशणों के कारण समु्रदी जीवों का जीवन खतरे में पड़ गया है। अब मछुआरों को मछली पकड़ने के लिए बस्तियों, आबादियों और बंदरगाहों से काफी दूर निकलना पड़ता है। जो खुले समु्रद में आए तो वहां सीमाओं को तलाषना लगभग असंभव होता है और वहीं देानेां देषों के बीच के कटु संबंध, षक और साजिषों की संभावनाओं के षिकार मछुआरे हो जाते है।। जब उन्हें पकड़ा जाता है तो सबसे पहले सीमा की पहरेदारी करने वाला तटरक्षक बल अपने तरीके से पूछताछ व जामा तलाषी करता है। चूंकि इस तरह पकड़ लिए  गए लोगों को वापिस भेजना सरल नहीं है, सो इन्हें स्थानीय पुलिस को सौंप दिया जाता है। इन गरीब मछुआरों के पास पैसा-कौडी तो होता नहीं, सो ये ‘‘गुड वर्क’’ के निवाले बन जाते हैं। घुसपैठिये, जासूस, खबरी जैसे मुकदमें उन पर होते है।। वे दूसरे तरफ की बोली-भाशा भी नहीं जानते, सयो अदालत में क्या हो रहा है, उससे बेखबर होते है।। कई बार इसी का फायदा उठा कर प्रोसिक्यूषन उनसे जज के सामने हां कहलवा देता है और वे अनजाने में ही देषद्रोह जैसे अरोप में पदोश बन जाते हैं। कई-कई सालों बाद उनके खत  अपनों के पास पहुंचते है।। फिर लिखा-पढ़ी का दौर चलता है। सालों-दषकों बीत जाते हैं और जब दोनों देषेां की सरकारें एक-दूसरे के प्रति कुछ सदेच्छा दिखाना चाहती हैं तो कुछ मछुआरों को रिही कर दिया जाता है। पदो महीने पहले रिहा हुए पाकिस्तान के मछुआरों के एक समूह में एक आठ साल का बच्चा अपने बाप के साथ रिहा नहीं हो पाया क्योंकि उसके कागज पूरे नहीं थे। वह बच्चा आज भी जामनगर की बच्चा जेल में है। ऐसे ही हाल ही में पाकिस्तान द्वारा रिहा किए गए 163 भारतीय मछुआरों के दल में एक दस साल का बच्चा भी है जिसने सौंगध खा ली कि वह भूखा मर जाएगा, लेकिन मछली पकड़ने को अपना व्यवसाय नहीं बनाएगा।
यहां जानना जरूरी है कि दोनेां देषों के बीच सर क्रीक वाला सीमा विवाद भले ही ना सुलझे, लेकिन मछुआरों को इस जिल्ल्त से छुटकारा दिलाना कठिन नहीं है। एमआरडीसी यानि मेरीटाईम रिस्क रिडक्षन सेंटर की स्थापना कर इस प्रक्रिया को सरल किया जा सकता है। यदि दूसरे देष का कोई व्यक्ति किसी आपत्तिजनक वस्तुओं जैसे- हथियार, संचार उपकरण या अन्य खुफिया यंत्रों के बगैर मिलता है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए। पकड़े गए लोगों की सूचना 24 घंटे में ही दूसरे देष को देना, दोनों तरफ माकूल कानूनी सहायत मुहैया करवा कर इस तनाव को दूर किया जा सकता है। वैसे संयुक्त राश्ट्र के समु्रदी सीमाई विवाद के कानूनों यूएनसीएलओ में वे सभी प्रावधान मौजूद हैं जिनसे मछुआरों के जीवन को नारकीय होने से बचाया जा सकता है। जरूरत तो बस उनके दिल से पालन करने की है।


गुरुवार, 27 अगस्त 2015

Nationalisation of school education is only solution for unified education

क्यों न हो स्कूलों का राष्ट्रीयकरण!

= पंकज चतुर्वेदी

इन दिनों राजधानी और एनसीआर में दो हजार से अधिक पब्लिक स्कूल चल रहे हैं, जिनमें लगभग 40 लाख बच्चे पढ़ते हैं। 18 साल पहले दिल्ली सरकार ने फीस बढ़ोतरी के मुद्दे पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय से अवकाश प्राप्त सचिव जेवी राघवन की अध्यक्षता में नौ सदस्यों की एक कमेटी गठित की थी। इस समिति ने दिल्ली स्कूल एक्ट 1973 में संशोधन की सिफारिश की थी। समिति का सुझाव था कि पब्लिक स्कूलों को बगैर लाभ-हानि के संचालित किया जाना चाहिए...


फरवरी-मार्च आते ही देश के लगभग सभी बड़े शहरों में नर्सरी स्कूलों में एडमिशन को लेकर बवाल हो जाते हैं। कहीं फार्म की मनमानी कीमतों को लेकर असंतुष्टि रहती है तो कोई सरकार द्वारा तय मानदंडों का पालन न होने से रूष्ट। हालात इतने बद्तर हैं कि तीन साल के बच्चे को स्कूल में दाखिल करवाना आईआईटी की फीस से भी महंगा हो गया है। माहौल ऐसा हो गया है कि बच्चों के मन में स्कूल या शिक्षक के प्रति कोई श्रद्धा नहीं रह गई है। वहीं स्कूल वालों की बच्चों के प्रति न तो संवेदना रह गई है और न ही सहानुभूति। ऐसा अविश्वास का माहौल बन गया है, जो बच्चे का जिंदगीभर साथ नहीं छोड़ेगा। शिक्षा का व्यापारीकरण कितना खतरनाक होगा, इसका अभी किसी को अंदाजा नहीं है। लेकिन मौजूदा पीढ़ी जब संवेदनहीन होकर अपने ज्ञान को महज पैसा बनाने की मशीन बनाकर इस्तेमाल करना शुरू करेगी, तब समाज और सरकार को इस भूल का एहसास होगा। दिल्ली में तो कई पालक अपने बच्चे का दाखिला करवाने के लिए फर्जी आय प्रमाण पत्र बनवाने से भी नहीं चूके और ऐसे कई लेाग जेल में हैं व बच्चे स्कूल से बाहर सड़क पर। कहा जाता है कि उन दिनों ज्ञानार्जन का अधिकार केवल उच्च वर्ग के लोगों के पास हुआ करता था। इस ‘तथाकथित’ मनुवाद को कोसने का इन दिनों कुछ फैशन-सा चला है, या यों कहें कि इसे सियासत की सहज राह कहा जा रहा है। लेकिन आज की खुले बाजार वाली मुक्त अर्थव्यवस्था से जिस नए ‘मनीवाद’ का जन्म हो रहा है, उस पर चहुंओर चुप्पी है। लक्ष्मी साथ है तो सरस्वती के द्वार आपके लिए खुले हैं, अन्यथा सरकार और समाज दोनों की नजर में आपका अस्तित्व शून्य है। इस नए ‘मनुवाद’, जो मूल रूप से ‘मनी वाद’ है, का सर्वाधिक शिकार प्राथमिक शिक्षा ही रही है। यह सर्वविदित है कि प्राथमिक शिक्षा किसी बच्चे के भविष्य की बुनियाद है। हमरे देश में प्राथमिक स्तर पर ही शिक्षा लोगों का स्तर तय कर रही है। एक तरफ कंप्यूटर, एसी, खिलौनों से सज्जित स्कूल हैं तो दूसरी ओर ब्लैक बोर्ड, शौचालय जैसी मूलभूत जरूरत को तरसते बच्चे। देश की राजधानी दिल्ली सहित बड़े शहरों में में दो-ढाई साल के बच्चों का कतिपय नामीगिरामी प्री-स्कूल प्रवेश चुनाव लड़ने के बराबर कठिन माना जाता हैं। यदि जुगाड़ लगा कर कोई मध्यम वर्ग का बच्चा इन बड़े स्कूलों में पहुंच भी जाए तो वहां के ढकोसले-चोंचले झेलना उसके बूते के बाहर होता है। ठीक यही हालात देश के अन्य महानगरों के भी हैं। बच्चे के जन्मदिन पर स्कूल के सभी बच्चों में कुछ वितरित करना या ‘ट्रीट’ देना, सालाना जलसों के लिए स्पेशल ड्रेस बनवाना, सालभर में एक-दो पिकनिक या टूर ये ऐसे व्यय हैं, जिन पर हजारों का खर्च यूं ही हो जाता है। फिर स्कूल की किताबें, वर्दी, जूते, वो भी स्कूल द्वारा तयशुदा दुकानों से खरीदने पर स्कूल संचालकों के वारे-न्यारे होते रहते हैं। इन दिनों राजधानी और एनसीआर में दो हजार से अधिक पब्लिक स्कूल चल रहे हैं, जिनमें लगभग 40 लाख बच्चे पढ़ते हैं। 18 साल पहले दिल्ली सरकार ने फीस बढ़ोतरी के मुद्दे पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय से अवकाश प्राप्त सचिव जेवी राघवन की अध्यक्षता में नौ सदस्यों की एक कमेटी गठित की थी। इस समिति ने दिल्ली स्कूल एक्ट 1973 में संशोधन की सिफारिश की थी। समिति का सुझाव था कि पब्लिक स्कूलों को बगैर लाभ-हानि के संचालित किया जाना चाहिए। कमेटी ने पाया था कि कई स्कूल प्रबंधन, छात्रों से उगाही फीस का इस्तेमाल अपने दूसरे व्यवसायों में कर रहे हैं। वीरा राघवन कमेटी ने ऐसे स्कूलों के प्रबंधन के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की अनुशंसा भी की थी। कमेटी ने सुझाव दिया था कि छात्रों से वसूले धन का इस्तेमाल केवल छात्रों और शिक्षकों की बेहतरी पर ही किया जाए। राघवन साहब की सिफारिशें तो 18 सालों में कभी मूर्त रूप ले नहीं पाईं, फिर छह साल पहले बंसल कमेटी ने भी ऐसे ही सुझाव दे डाले। इन दोनों कमेटियों की रिपोर्ट बानगी हैं कि स्कूली शिक्षा अब एक नियोजित ध्ंाधा बन चुका है। बड़े पूंजीपति, औद्योगिक घराने, माफिया, राजनेता अपने काले धन को सफेद करने के लिए स्कूल खोल रहे हैं। वहां किताबों, वर्दी की खरीद, मौज-मस्ती की पिकनिक या हॉबी क्लास, सभी मुनाफे का व्यापार बन चुका है। इसके बावजूद इन अनियमितताओं की अनदेखी केवल इसीलिए है क्योंकि ऐसे स्कूलों में नेताओं की सीधी साझेदारी है। तिस पर सरकार शिक्षा को मूलभूत अधिकर देने का प्रस्ताव सदन में पारित कर चुकी है। घूम-फिर कर बात एक बार फिर विद्यालयों के दुकानीकरण पर आ जाती है। शिक्षा का सरकारी सिस्टम जैसे जाम हो गया है। निर्धारित पाठ्यक्रम की पुस्तकें मांग के अनुसार उपलब्ध कराने में एनसीईआरटी सरीखी सरकारी संस्थाएं बुरी तरह फेल रही हैं। जबकि प्राइवेट या पब्लिक स्कूल अपनी मनमानी किताबें छपवा कर कोर्स में लगा रहे हैं। यह पूरा धंधा इतना मुनाफे वाला बन गया है कि अब छोटे-छोटे गांवों में भी पब्लिक या कानवेंट स्कूल कुकुरमुत्तों की तरह उग रहे हैं। कच्ची झोपड़ियों, गंदगी के बीच, बगैर माकूल बैठक व्यवस्था के कुछ बेरोजगार एक बोर्ड लटका कर प्राइमरी स्कूल खोल लेते हैं। इन ग्रामीण स्कूलों के छात्र पहले तो वे होते हैं, जिनके पालक पैसे वाले होते हैं और अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजना हेठी समझते हैं। फिर कुछ ऐसे अभिभावक, जो खुद तो अनपढ़ होते हैं लेकिन अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने की महत्वाकांक्षा पाले होते हैं, अपना पेट काट कर ऐसे पब्लिक स्कूलों में अपने बच्चों को भेजने लगते हैं। कुल मिलाकर दोष जर्जर सरकारी शिक्षा व्यवस्था के सिर पर जाता है। जो आम आदमी का विश्वास पूरी तरह खो चुकी हंै। अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए पालक मजबूरीवश इन शिक्षा की दुकानों पर खुद लुटने को पहुंच जाते हैं। लोग भूल चुके हैं कि दसवीं पंचवर्षीय योजना के समापन तक यानी सन् 2007 तक शत-प्रतिशत बच्चों को प्राथमिक शिक्षा का सपना बुना गया था, जिसे ध्वस्त हुए छह साल बीत चुके हैं। वैसे स्कूलरूपी दुकानों का रोग कोई दो दशक पहले महानगरों से ही शुरू हुआ था, जो अब शहरों, कस्बों से संक्रमित होता हुआ अब दूरस्थ गांवों तक पहुंच गया है। समाजवाद की अवधारणा पर सीधा कुठाराघात करने वाली यह शिक्षा प्रणाली शुरुआत से ही उच्च और निम्न वर्ग तैयार कर रही है, जिसमें समर्थ लोग और समर्थ होते हैं, जबकि विपन्न लोगों का गर्त में जाना जारी रहता है। विश्व बैंक की एक रपट कहती है कि भारत में छह से 10 साल के कोई तीन करोड़ बीस लाख बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। रपट में यह भी कहा गया है कि भारत में शिक्षा को ले कर बच्चों-बच्चों में खासा भेदभाव है। लड़कों-लड़कियों, गरीब-अमीर और जातिगत आधार पर बच्चों के लिए पढ़ाई के मायने अलग-अलग हैं। रपट के अनुसार 10 वर्ष तक के सभी बच्चों को स्कूल भेजने के लिए 13 लाख स्कूली कमरे बनवाने होंगे और 740 हजार नए शिक्षकों की जरूरत होगी। सरकार के पास खूब बजट है और उसे निगलने वाले कागजी शेर भी। लेकिन मूल समस्या स्कूली शिक्षा में असमानता की है। प्राथमिक स्तर की शिक्षण संस्थाओं की संख्या बढ़ना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन ‘देश के भविष्य’ की नैतिक शिक्षा का पहला आदर्श शिक्षक जब बामुश्किल हजार-डेढ़ हजार रुपए का भुगतान पा रहा हो तो उससे किस स्तर के ज्ञान की उम्मीद की जा सकती है। जब पहली कक्षा के ऐसे बच्चे को, जिसे अक्षर ज्ञान भी बामुश्किल है, उसे कंप्यूटर की ट्रेनिंग दी जाने लगे, महज इसलिए कि पालकों से इसके नाम पर अधिक फीस घसीटी जा सकती है, तो किस तरह तकनीकी शिक्षा प्रसार की बात सोची जा सकती है? प्राइवेट स्कूलों की आय की जांच, फीस पर सरकारी नियंत्रण, पाठ्यक्रम, पुस्तकों आदि का एकरूपीकरण, सरकारी स्कूलों को सुविधा संपन्न बनाना, आला सरकारी अफसरों और जनप्रतिनिधियों के बच्चों की सरकारी स्कूलों में शिक्षा की अनिवार्यता, निजी संस्था के शिक्षकों के सुरक्षित वेतन की सुनिश्चित व्यवस्था सरीखे सुझाव समय-समय पर आते रहे और लाल बस्तों में बंध कर गुम होते रहे हैं। अतुल्य भारत के सपने को साकार करने की प्राथमिक जरूरत स्तरीय प्राथमिक शिक्षा का लक्ष्य पाने का केवल एकमात्र तरीका है- स्कूली शिक्षा का राष्ट्रीयकरण। अपने दो या तीन वर्ग किलोमीटर के दायरे में आने वाले स्कूल में प्रवेश पाना सभी बच्चों का हक हो, सभी स्कूलों की सुविधाएं, पुस्तकें, फीस एकसमान हो, मिड डे मील सभी को एक जैसा मिले अैार कक्षा आठ तक के सभी स्कूलों में शिक्षा का माध्यम मातृ-भाषा हो। ऐसे में इलाहबाद हाई कोर्ट के उस आदेश का स्वत: पालन हो जाएगा, जिसमें अफसर, नेताओं के बच्चे की सरकारी स्कूलों में अनिवार्य शिक्षा का आदेश है। फिर न तो भगवा या लाल किताबों का विवाद होगा और न ही मदरसों की दुर्दशा पर चिंता। यह सब करने में खर्चा भी अधिक नहीं है, बस जरूरत होगी तो इच्छा शक्ति की। शायद यह चुनाव इसका मार्ग प्रशस्त करे, बस जरूरत है कि सड़कों पर प्रदर्शन करने के बनिस्पत अभिभावक राष्ट्रीय पार्टियों के नेताओं की इस दिशा में जवाबदारी तय करें।(लेखक नेशनल बुक ट्रस्ट इंडिया के सहायक संपादक हैं)
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शनिवार, 22 अगस्त 2015

sex Market on cyber world

Prabhat Meerut 23-8-15
सायबर पर फना होती यौन वर्जनाएं
पंकज चतुर्वेदी

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को गलत नहीं कहा कि वह लोगों के बेड रूम में दखल नहीं कर सकती, लेकिन जब लोगों का बेड रूम या निजी जीवन साईबर-संजाल की मंडी पर बिके और उसे देख कर लेाग चस्के लें तो जाहिर है कि सरकार की सामाजिक जिम्म्ेदारीब नती ही है। इंटरनेट पर कई करोड़ ऐसे वीडियो, फोटो, क्लीप उपलब्ध हैक्ं जिसमें होटल में ठहरे, पार्क में बैठे या किसी के भरोसे को खुफिया कैेमरे में टूटने के अंतरंग पल जाहिरा हो रहे हैं। कई बार लेागों को पता ीह नहीं चलता कि वे जिस हांटल में ठहरे थे या किसी षो रूम के ट्रयल रूम में कपड़े बदल रहे थ्ळो, उसकी तस्वीरे नेट पर खूब देखी जा रही हैं। बीते दिनों यह तसल्ली कुछ ही घंटे की रही कि चलों अब इंटरनेट पर कुछ सौ नंगी वेबसाईट नहीं खुलेंगी। एक तरफ कुछ ‘‘अभिव्यक्ति की आजादी’’ का नारा लगा कर नंगी साईटो ंपर पाबंदी की मुखालफत करते दिखे तो दूसरी ओर ऐसी साईटों से करोड़ो ंपीटने वाले सुपप्रीम कोर्ट के आदेष का छिद्रान्वेशण कर अपनी दुकान बचाने पर जुट गए। एक दिन भी नहीं बीता और अष्लीलता परोसने वाली अधिकांष साईट फिर बेपर्दा हो गईं। कुल मिला कर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने हाथ खड़े कर दिए कि सभी नंगी वेबसाईटों पर रोक लगाना संभव नहीं है। संचार के आधुनिक साधन इस समय जिस स्तर पर अष्लीलता का खुला बाजार बन गए हैं, यह किसी से दबा-छुपा नहीं है। कुछ ही महीने पहले ही देष के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीष ने भी नेट पर परोसे जा रहे नंगे बाजार पर चिंता जताई थी। यह विष्वव्यापी है और जाहिर है कि इस पर काबू पाना इतना सरल नहीं होगा। लेकिन दुर्भाग्य है कि हमारे देष के संवाद और संचार के सभी लोकप्रिय माध्यम देह-विमर्ष में लिप्त हैं, सब कुछ खुला-खेल फर्रूकाबादी हो रहा है।  अखबार, मोबाईल फोन, विज्ञापन; सभी जगह तो नारी-देह बिक रही है। अब नए मीडिया यानि वाट्सएप, वी चेट जैसी नई संचार तकनीकों ने वीडियो व चित्र भेजना बेहद आसान कर दिया है और कहना ना होगा कि इस नए संचार ने देह मंडी को और सुलभ कर दिया है। नंगेपन की तरफदारी करने वाले आखिर यह क्यों नहीं समझ रहे कि देह का खुला व्यापार युवा लेागों की कार्य वसृजन-क्षमता को जंग लगा रहा है। जिस वक्त उन्हें देष-समाज के उत्थान पर सोचना चाहिए, वे अंग-मोह में अपना समय , उर्जा व षरीर बर्बाद कर रहे है।।
अष्लीलता,या कंुठा और निर्लज्जता का यह खुला खेल आज संचार के ऐसेे माध्यम पर चल रहा है, जो कि हमारे देष का सबसे तेजी से बढ़ता उद्योग है । अपने मोबाईल पर ‘एडीयू’ टाईप करें (एडीयू यानि एडल्ट) पांच अंक वाले लोकप्रिय नंबर पर मैसेज करें । पलक झपकते ही आपके मोबाईल पर मैसेज होगा, जिसमें आपसे षपथ ली जाएगी कि आप वयस्क हैं । और फिर ऐसे ही द्विअर्थी भद्दे चुटकुलों की भरमार षुरू हो जाएगी । मामला यहीं नहीं रूकता है, चटपट उन्हें अपने मित्रों या परिचितों को फारवर्ड करने की होड़ लग जाती है और जवाब में ऐसी ही और गंदगी आ जाती है । इससे भी आगे इनकी चर्चा यार-दोस्तों और तो और परिवार में भी  होने लगती है । जो संचार माध्यम लोगों को जागरूक बनाने या फिर संवाद का अवसर देने के लिए हैं, वे अब धीरे-धीरे देह-मंडी बनते जा रहे हैं । क्या इंटरनेट ,क्या फोन,  और क्या अखबार ? टीवी चैनल तो यौन कंुठाआंे का अड्डा बन चुके हैं ।
इस समय देष में कोई 80 करोड़ मोबाईल उपभोक्ता हैं । हर दिन पचास करोड़ एसएमएस मैसेज इधर से उधर होने की बात  सरकारी तौर पर स्वीकार की गई है । इसमें से 40 प्रतिषत संदेष ऐसे ही गंदे चुटकुलों के होते हैं । यहां जानना जरूरी है कि इस तरीके से चुटकुलों के माध्यम से सामाजिक प्रदूशण फैलाने में मोबाईल सेवा देने वाला आपरेटर तो कमा ही रहा है, 58888 या ऐसे ही नंबरों की कंपनियां भी चांदी काट रही हैं , क्यांेकि हर ऐसे संदेष पर उनका हिस्सा तय होता है । लड़कियों से डेटिंग, बातचीत भी एसएमएस पर उपलब्ध हैं और ये अलग किस्म का यौन व्यापार है । एक अंजान महिला (इसमें भी षक है कि दूसरी तरफ कोई महिला ही है) से लिखा-पढ़ी में अष्लील बातें करें और अपनी कुठा षांत करें । यह बात दीगर है कि इस खेल के खिलाडि़यों के लिए महिला महज एक उपभोग का षरीर रह जाती है । अब तो वहाट्सएप् व ऐसे ही कई उपकरण मौजूद हैं जो दृष्य-श्रव्य व सभी तरह के संदेष पलक झपकते ही दुनिया के किसी भी कोने में विस्तारित हो जाते है। इन पर कोई अंकुष तो है नहीं, सो इस पर वह सब सरेआम हो रहा है जो कई बार वेबसाईटों पर भी ना हों।
बीएसएनएल के मोबाईल के मैदान में उतरने के बाद मोबाईल फोन गांव-गांव तक पहुंच गया है । दिल्ली, मुंबई ही नहीं इंदौर, अमदाबाद जैसे षहरों के स्कूली बच्चे भी इससे लैस दिखते हैं । विभिन्न मोबाईल कंपनियों का रिकार्ड गवाह है कि पिछले कुछ सालों से एसएमएस  और व्हाट्सएप का इस्तेमाल रिकार्ड तोड़ बढ़ा है । फिर अब तो पिक्चर मैसेज की बात हो रही है । कई बार तो मैसेज के चैनलों में ट्राफिक जाम हो रहा है। यह विडंबना ही है कि संचार की इतनी बेहतरीन सेवा का इस्तेमाल अष्लील चुटकुलों, भद्दे मजाक और भाशा अपभं्रष के लिए हो रहा है । मैसेज के अधिकांष चुटकुले यौन संबंध, स्त्री-देह के आकार-प्रकार, उसके वीभत्स उपभोग पर ही होते हैं । ऐसे जोक्स को पढ़ने व उन्हें आगे बढ़ाने का रोग महिलाओं में भी घर करना षर्म की ही बात हैं ।
आज आम परिवार में महसूस किया जाने लगा है कि ‘‘ नान वेज ’’ कहलाने वाले लतीफे अब उम्र-रिष्तों की दीवारें तोड़ कर घर के भीतर तक घुस रहे हैं । यह भी स्पश्ट हो रहा है कि संचार की इस नई तकनीक ने महिला के समाज में सम्मान को घुन लगा दी है । टेलीफोन जैसे माध्यम का इतना विकृत उपयोग भारत जैसे विकासषील देष की समृद्ध संस्कृति,सभ्यता और समाज के लिए षर्मनाक है । इससे एक कदम आगे एमएमएस का कारोबार है । आज मोबाईल फोनों में कई-कई घंटे की रिकार्डिग की सुविधा उपलब्ध है । इन फाईलों को एमएमएस के माध्यम से देशभर में भेजने पर न तो कोई रोक है और न ही किसी का डर । तभी डीपीएस, अक्षरधाम, मल्लिका, मिस जम्मू कुछ ऐसे एमएमएस है, जोकि देश के हर कोने तक पहुंच चुके हैं । अपने मित्रों के अंतरंग क्षणों को धोखे से मोबाईल कैमरे में कैद कर उसका एमएमएस हर जान-अंजान व्यक्ति तक पहुंचाना अब आम बात हो गई है । किसी भी सुदूर कस्बे में दो जीबी का माईक्रो एसडी कार्ड तीन सौ रूपए में ‘लोडेड’ मिल जाता है - लोडेड यानी अष्लील वीडियो से लबरेज।
आज मोबाईल हैंड सेट में इंटरनेट कनेक्शन आम बात हो गई है  और इसी राह पर इंटरनेट की दुनिया भी अधोपतन की ओर है। नेट के सर्च इंजन पर न्यूड या पेार्न टाईप कर इंटर करें कि हजारों-हजार नंगी औरतों के चित्र सामने होंगे । अलग-अलग रंगों, देष, नस्ल,उम्र व षारीरिक आकार के कैटेलाग में विभाजित ये वेबसाईटें गली-मुहल्लों में धड़ल्ले से बिक रहे इंटरनेट कनेक्शन वाले मोबाईल फोन खूब खरीददार जुटा रहे हैं । साईबर पर मरती संवेदनाओं की पराकाश्ठा ही है कि राजधानी दिल्ली के एक प्रतिश्ठित स्कूल के बच्चे ने अपनी सहपाठी छात्रा का चित्र, टेलीफोन नंबर और अष्लील चित्र एक वेबसाईट पर डाल दिए । लड़की जब गंदे टेलीफोनों से परेषान हो गई तो मामला पुलिस तक गया । ठीक इसी तरह नोएडा के एक पब्लिक स्कूल के बच्चों ने अपनी वाईस पिं्रसिपल को भी नहीं बख्शा । फेसबुक और अन्य सोषल साईट को सेक्स की मंडी बने हुए हैं वहां भाभी जैसे पवित्र रिष्ते से ले कर लड़कियों के आम नाम तक हजारों हजार नंगे फोटो से युक्त पेज बने हुए हैं। कुछ साईट तो कार्टून -स्केच में वेलम्मा व सविता भाभी के नाम पर हर दिन हजारों की धंधा कर रही हैं।
अब तो वेबसाईट पर भांति-भांति के तरीकों से संभोग करने की कामुक साईट भी खुलेआम है । गंदे चुटकुलों का तो वहां अलग ही खजाना है । चैटिंग के जरिए दोस्ती बनाने और फिर फरेब, यौन षोशण के किस्से तो आए रोज अखबारों में पढ़े जा सकते हैं । षैक्षिक,वैज्ञानिक,समसामयिक या दैनिक जीवन में उपयोगी सूचनाएं कंप्यूटर की स्क्रीन पर पलक झपकते मुहैया करवाने वाली इस संचार प्रणाली का भस्मासुरी इस्तेमाल बढ़ने में सरकार की लापरवाही उतनी ही देाशी है, जितनी कि समाज की कोताही । चैटिंग सेे मित्र बनाने और फिर आगे चल कर बात बिगड़ने के किस्से अब आम हो गए हैं । इंटरनेट ने तो संचार व संवाद का सस्ता व सहज रास्ता खोला था । ज्ञान विज्ञान, देष-दुनिया की हर सूचना इसके जरिए पलक झपकते ही प्राप्त की जा सकती है । लेकिन आज इसका उपयोग करने वालों की बड़ी संख्या के लिए यह महज यौन संतुश्टि का माध्यम मात्र है । वैसे इंटरनेट पर नंगई को रोकना कोई कठिन काम नहीं है, चीन इसकी बानगी है, जहां पूरे देष में किसी भी तरह की पोर्न साईट या फेसबुक पर पूरी तरह पाबंदी है। एक तो उन्हें खोला ही नहीं जा सकता, यदि किसी ने हैक कर ऐसा कुछ किया तो पकड़े जाने पर कड़ी सजा का प्रावधान हे। बीजिंग जैसे षहर में वाई-फाई और थ्रीजी युक्त मोबाईल आम हैं, लेकिन मजाल हैकि कोई ऐसी-वैसी साईट देख ले। यह सब बहुत ही समान्य तकनीकी प्रणाली से किया जा सकता है।
दिल्ली सहित महानगरों से छपने वाले सभी अखबारों में एस्कार्ट, मसाज, दोस्ती करें जैसे विज्ञापनों की भरमार है। ये विज्ञापन बाकायदा विदेषी बालाओं की सेवा देने का आफर देते हैं। कई-कई टीवी चैनल स्टींग आपरेषन कर इन सेवाओं की आड़ में देह व्यापार का खुलासा करते रहे है।। हालांकि यह भी कहा जाता रहा है कि अखबारी विज्ञापनों की दबी-छिपी भाशा को तेजी से उभर रहे मध्यम वर्ग को सरलता से समझााने के लिए ऐसे स्टींग आपरेषन प्रायोजित किए जाते रहे हैं। ना तो अखबार अपना सामाजिक कर्तव्य समझ रहे हैं और ना ही सरकारी महकमे अपनी जिम्मेदारी। दिल्ली से 200-300 किलोमीटर दायरे के युवा तो अब बाकायदा मौजमस्ती करने दिल्ली में आते हैं और मसाज व एस्कार्ट सर्विस से तृप्त होते हैं।
मजाक,हंसी और मौज मस्ती के लिए स्त्री देह की अनिवार्यता का यह संदेष आधुनिक संचार माध्यमों की सबसे बड़ी त्रासदी बन गया हैं । यह समाज को दूरगामी विपरीत असर देने वाले प्रयोग हैं । चीन , पाकिस्तान के उदाहरण हमारे सामने हैं , जहां किसी भी तरह की अष्लील साईट खोली नहीं जा सकती। यदि हमारा सर्च इंजन हो तो हमें गूगल पर पाबंदी या नियंत्रित करने  में कोई दिक्कत नहीं होगी और एक बार गूगल बाबा से मुक्ति हुई, हम वेबसाईटों पर अपने तरीके से निगरानी रख सकेंगें। कहीं किसी को तो पहल करनी ही होगी , सो सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीष पहल कर चुके हैं। अब आगे का काम नीति-निर्माताओं का है।

पंकज चतुर्वेदी
सहायक संपादक
नेषनल बुक ट्रस्ट

बुधवार, 19 अगस्त 2015

fearless criminal careless policing

क्यों नहीं रहा पुलिस का डर
पंकज चतुर्वेदी 

आजादी के बाद लोकतांत्रिक सरकारों ने पुलिस को कानून के मातहत जन-हितैषी संगठन बनाने की बातें तो कीं, लेकिन इसमें संकल्पबद्धता कम और दिखावा ज्यादा रहा। वास्तव में राजनीतिक दलों को यह समझते देर नहीं लगी कि पुलिस उनके निजी हितों के पोषण में कारगर सहायक हो सकती है और उन्होंने सत्तासीन पार्टी के लिए इसका भरपूर दुरुपयोग किया। परिणामत: आम जनता व पुलिस में अविश्वास की खाई बढ़ती चली गई और समाज में असुरक्षा व अराजकता का माहौल बन गया...


Daily News activist , lucknow, 20-8-15
लग रहा है कि समूचा देश अपराध की चपेट में है। बलात्कार, छेड़छाड़, लूट की घटनाओं से आम जनता हलकान है। यह तो सामने आ गया है कि यदि पुलिस मुस्तैद होती, फोर्स का सही इस्तेमाल होता तो यह आग इतना विकराल रूप नहीं लेती। वैसे भी पिछले कुछ सालों से पूरे देश में सरेआम अपराधों की जैसे झड़ी ही लग गई है। भीड़भरे बाजार में जिस तरह से हथियारबंद अपराधी दिनदहाड़े लूटमार करते हैं, महिलाओं की जंजीर व मोबाइल फोन झटक लेते हैं, एटीएम मशीन उखाड़ कर ले जाते हैं। इससे साफ है कि अपराधी पुलिस से दो कदम आगे हैं और उन्हें कानून या खाकी वर्दी की कतई परवाह नहीं है। पुलिस को मिलने वाला वेतन और कानून व्यवस्था को चलाने के संसाधन जुटाने पर उसी जनता का पैसा खर्च हो रहा है, जिसके जानोमाल की रक्षा का जिम्मा उन पर है। ऐसा नहीं है कि पुलिस खाली हाथ हैं, आए रोज कथित बाइकर्स गैंग पकड़े जाते हैं, बड़े-बड़े दावे भी होते हैं, लेकिन अगले दिन ही उससे भी गंभीर अपराध सुनाई दे जाते हैं। लगता है कि दिल्ली व पड़ोसी इलाकों में दर्जनों बाइकर्स गैंग काम कर रहे हैं और उन्हें पुलिस का कोई खौफ नहीं हैं। अकेले गाजियाबाद जिले की हिंडन पार की कालोनियों में हर रोज झपटमारी की दर्जनों घटनाएं हो रही हैं और अब पुलिस ने मामले दर्ज करना ही बंद कर दिया है। जिस गति से आबादी बढ़ी उसकी तुलना में पुलिस बल बेहद कम है। मौजूद बल का लगभग 40 प्रतिशत नेताओं व अन्य महत्वपूर्ण लोगों की सुरक्षा में व्यस्त है। खाकी को सफेद वर्दी पहना कर उन्हीं पर यातायात व्यवस्था का भी भार है। अदालत की पेशियां, अपराधों की तफ्तीश, आए रोज हो रहे दंगे, प्रदर्शनों को झेलना। कई बार तो पुलिस की बेबसी पर दया आने लगती है। मौजूदा पुलिस व्यवस्था वही है, जिसे अंग्रेजों ने 1857 जैसी बगावत की पुनरावृत्ति रोकने के लिए तैयार किया था। अंग्रेजों को बगैर तार्किक क्षमता वाले आततायियों की जरूरत थी, इसलिए उन्होंने इसे ऐसे रूप में विकसित किया कि पुलिस का नाम ही लोगों में भय का संचार करने को पर्याप्त हो। आजादी के बाद लोकतांत्रिक सरकारों ने पुलिस को कानून के मातहत जन-हितैषी संगठन बनाने की बातें तो कीं, लेकिन इसमें संकल्पबद्धता कम और दिखावा ज्यादा रहा। वास्तव में राजनीतिक दलों को यह समझते देर नहीं लगी कि पुलिस उनके निजी हितों के पोषण में कारगर सहायक हो सकती है और उन्होंने सत्तासीन पार्टी के लिए इसका भरपूर दुरुपयोग किया। परिणामत: आम जनता व पुलिस में अविश्वास की खाई बढ़ती चली गई और समाज में असुरक्षा व अराजकता का माहौल बन गया। शुरू-शुरू में राजनीतिक हस्तक्षेप का प्रतिरोध भी हुआ। थाना प्रभारियों ने विधायकों व मंत्रियों से सीधे भिड़ने का साहस दिखाया, पर जब ऊपर के लोगों ने स्वार्थवश हथियार डाल दिए, तब उन्होंने भी दो कदम आगे जाकर राजनेताओं को ही अपना असली आका बना लिया। अंतत: इसकी परिणति पुलिस-नेता-अपराधी गठजोड़ में हुई, जिससे आज पूरा समाज इतना त्रस्त है कि सर्वोच्च न्यायालय तक ने पुलिस में कुछ ढांचागत सुधार तत्काल करने की सिफारिशें कर दीं। लेकिन लोकशाही का शायद यह दुर्भाग्य ही है कि अधिकांश राज्य सरकारें सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को नजरअंदाज कर रही हैं। परिणति सामने है- पुलिस अपराध रोकने में असफल है। कानून व्यवस्था या वे कार्य, जिनका सीधा सरोकार आम जन से होता है, उनमें थाना स्तर की ही मुख्य भूमिका होती है। लेकिन अब हमारे थाने बेहद कमजोर हो गए हैं। वहां बैठे पुलिसकर्मी आमतौर पर अन्य किसी सरकारी दफ्तर की तरह क्लर्क का ही काम करते हैं। थाने आमतौर पर शरीफ लोगों को भयभीत और अपराधियों को निरंकुश बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आज जरूरत है कि थाने संचार और परिवहन व अन्य अत्याधुनिक तकनीकों से लैस हों। बदलती परिस्थितियों के अनुसार थानों का सशक्तीकरण महति है। आज अपराधी थाने में घुस कर हत्या तक करने में नहीं डरते। कभी थाने उच्चाधिकारियों और शासन की प्रतिष्ठा की रक्षा के सीमावर्ती किलों की भांति हुआ करते थे। जब ये किले कमजोर हो गए तो अराजक तत्वों का दुस्साहस इतना बढ़ गया कि वे जिला पुलिस अधीक्षक से मारपीट और पुलिस महानिदेशक की गाड़ी तक को रोकने से नहीं डरते हैं। रही बची कसर जगह-जगह अस्वीकृत चौकियों, पुलिस सहायता बूथों, पिकेटों आदि की स्थापना ने पूरी कर दी है। इससे पुलिस-शक्ति के भारी बिखराव ने भी थानों को कमजोर किया है। थानों में स्ट्राइकिंग फोर्स नाममात्र की बचती है। इससे किसी समस्या के उत्पन्न होने पर वे त्वरित प्रभावी कार्यवाही नहीं कर पाते हैं। तभी पुलिस थानों के करीब अपराध करने में अब अपराधी कतई नहीं घबराते हैं। पुलिस सुधारों में अपराध नियंत्रण, घटित अपराधों की विवेचना और दर्ज मुकदमें को अदालत तक ले जाने के लिए अलग-अलग विभाग घटित करने की भी बात है। सनद रहे, अभी ये तीनों काम एक ही पुलिस बल के पास है, तभी आज थाने का एक चौथाई स्टाफ हर रोज अदालत के चक्कर लगाता रहता है। नियमित पेट्रोलिंग लगभग न के बराबर है। यह भी एक दुखद हकीकत है कि पुलिस को गश्त के लिए पेट्रोल बहुत कम या नहीं मिलता है। पुलिसकर्मी अपने स्तर पर इंधन जुटाते हैं, जाहिर है कि इसके लिए गैरकानूनी तरीकों का सहारा लेना ही पड़ता होगा। उत्तर प्रदेश में कई थाने ऐसे हैं, जहां टेलीफोन कनेक्शन कट चुके हैं। राजधानी के समीपवर्ती गाजियाबाद जिले की पुलिस तो अभी भी सन् 65 के मॉडल की जीप पर गश्त कर रही है, जबकि अपराधी पलक झपकते ही हवा से बातें करने वाली मोटरसाइकिल पर सवार होते हैं। यहां उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान के कराची में पुलिस विशेष रूप से तैयार किए गए तिपहिया स्कूटरों पर गश्त करती है। एक तो उस पर एक साथ तीन पुलिसवाले सवार हो जाते हैं, फिर इसमें इंर्धन का खर्च कम है और साथ ही यह तेज गति से गलियों में भी दौड़ लेता है। इन दिनों पुलिस सुधार का हल्ला चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट भी इस बारे में निर्देश दे चुका है, लेकिन देश का नेता पुलिस के उपनिवेशिक चेहरे को बदलने में अपना नुकसान महसूस करता है। तभी विवेचना और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए अलग-अलग एजेंसियों की व्यवस्था पर सरकार सहमत नहीं हो पा रही है। वे नहीं चाहते हैं कि थाना प्रभारी जैसे पदों पर बहाली व तबादलों को समयबद्ध किया जाए। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दंगों में एक समाज विशेष के पुलिस वालों ने अल्पसंख्यकों की खूब गरदनें कटवाईं। जब पुलिस का जाति व सांप्रदायीकरण इस स्तर पर होगा या है तो जन सरोकार का गर्त में जाना लाजिमी ही है। इसी का परिणाम है कि उत्तर प्रदेश में अपराधी पुलिस की कमजोरियों का भरपूर लाभ उठा रहे हैं। ऐसा ही देश के अन्य राज्यों में भी होता है। सभी जानते हैं कि अमुक दरोगा किसका आदमी है। वैसे भी अपराधों में इजाफा नगरीय अपसंस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा है। कोई एक दशक पहले दिल्ली नगर निगम के स्लम विभाग द्वारा करवाए गए एक सर्वेक्षण की रिपोर्ट भले ही कहीं लाल बस्ते में बंध कर गुम हो गई है, लेकिन वह है आज भी प्रासंगिक। निगम के स्लम तथा जेजे विभाग की रिपोर्ट में कहा गया था कि राजधानी में अपराधों में ताबड़तोड़ बढ़ोतरी के सात मुख्य कारण हैं- अवांछित पर्यावरण, उपेक्षा तथा गरीबी, खुले आवास, बड़ा परिवार, अनुशासनहीनता व नई पीढ़ी का बुजुगोंर् के साथ अंतर्विरोध और नैतिक मूल्यों में गिरावट। पुलिस की मौजूदा व्यवस्था इन कारकों के प्रति कतई संवेदनशील नहीं है। वह तो डंडे और अपराध हो जाने के बाद अपराधी को पकड़ कर जेल भेजने की सदियों पुरानी नीति पर ही चल रही है। जबकि आज जिस तरह समाज बदल रहा है, उसमें संवेदना और आर्थिक सरोकार प्रधान होते जा रहे हैं, ऐसे में सुरक्षा एजेंसियों की जिम्मेदारी, कार्य प्रणाली व चेहरा सभी कुछ बदलना जरूरी है। आज जरूरत डंडे का दवाब बढ़ाने की नहीं है, सुरक्षा एजेंसियों को समय के साथ आधुनिक बनाने की है।


My two translated books for children

 मेरी दो अनूदित पुस्‍तकें
आज ही मेरे द्वारा अनूदित दो पुस्‍तकें आई हैं, इन्‍हें नेशनलबुक ट्रस्‍ट के लिए ही अनुवाद किया था, इसको मिला कर कुल 50 पुस्‍तकें हो गईं मेरे द्वारा अनूदित
दोनों पुस्‍तकें छोटे बच्‍चों के लिए हैा उत्‍पल तालुकदार की कहानी एक  आलसी चूहे की है जिसे जब असल जीवन संघर्ष से सामना होता है तो उसका लालच, नादानी, आलस सब दूर हो जाता हैा उत्‍पल खुद चित्रकार हैं व कहानी के साथ चित्र मना तिगुना कर देते हैं, पुस्‍तक की कीमत रूञ 50.00 है.
  दूसरी पुस्‍तक '' जब मिलें तो अभिवादन करें'' बताती है कि देश दुनिया के जहव जंतु, इंसान जब कभी एक दूसरे से मिलते हैं तो अपने अपने तरीके से अभिवादन करते हैं और ऐसा हमें भी करना चाहिए, एस श्‍यामला की इस पुस्‍तक के चित्र प्रख्‍यात कलाकार अतनु रॉय के हैं ा इसका दाम 35.00 रूपए हैा इन्‍हें नेशनल बुक ट्रस्‍ट की साईट से खरीदा जा सकता



मंगलवार, 18 अगस्त 2015

Non- textbook can change learning process of primary school

राष्ट्रीय सहारा , १९ अगस्त १५  

व्यावहारिक शिक्षा की ओर बढ़ें कदम


पंकज चतुर्वेदी 
सरकार में बैठे लोग यह समझ गए हैं कि जब तक देश की साक्षरता दर नहीं बढ़ेगी, तब तक हर साल की अरबों रपए की कल्याणकारी योजनाओं का पानी में जाना जारी रहेगा। सारे देश में प्राथमिक शिक्षा की पहुंच अधिक से अधिक लोगों तक करने के नए-नए प्रयोग चल रहे हैं। यह भी स्वीकार किया जाने लगा है कि हमारी पाठ्य पुस्तकों में कहीं न कहीं कोई कमी अवश्य है तभी बच्चा वाक्यों को ‘‘डिकोड’ करना तो सीख लेता है , लेकिन उसके व्यावहारिक प्रयोग से अनभिज्ञ रहता है। इसे भी स्वीकार किया जाने लगा है कि सरकारी स्कूलों की हालत सुधारे बगैर देश में प्राथमिक शिक्षा की गाड़ी सड़क पर लाना असंभव ही है। देश के लाखों लाख सरकारी स्कूल- कई लाख में भवन नहीं हैं, कई लाख में एक ही शिक्षक कई-कई कक्षाओं को पढ़ाता है, कई हजार में ब्लैक बोर्ड और चाक जैसी सुविधाएं नहीं हैं। ऐसे स्कूलों की संख्या भी हजारों में है, जो कि केवल कागजों पर हैं।इसके बावजूद जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम (डीपीईपी), सर्व शिक्षा अभियान, जनशाला और ऐसी ही अन्य अनेक योजनाओं के माध्यम से सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने के भरसक प्रयास हो रहे हैं। अब गांव-गांव के स्कूलों तक भी बच्चों की पुस्तकें पहुंच रही हैं- रंग-बिरंगी कहानियों की पुस्तकें, ज्ञानवर्धक और रोचक पुस्तकें, शिक्षकों के लिए प्रेरक व दिशा निर्देशक पुस्तकें! प्रत्येक शिक्षक को भी हर साल पांच सौ रपए दिए जा रहे हैं कि वे अपनी पसंद की शिक्षण-सहायक सामग्री खरीद लें। अधिकांश स्थानों पर शिक्षक पुस्तकें ही खरीद रहे हैं। यानी, हर स्कूल तक पुस्तकें पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया है।इतनी पुस्तकें हैं, लेकिन पाठक नहीं हैं । यह सत्य का दूसरा पहलू है। पढ़ने वाले तो हैं, लेकिन पुस्तकें पाठकों तक देने में कई व्यवधान भी हैं। समय नहीं हैं, साधन नहीं हैं और स्थान नहीं हैं। लेकिन इन तीन ‘‘स’ के बीच जिन शिक्षकों के पास चौथा ‘‘स’ है, वहां पुस्तकें पाठकों तक पहुंुंच रही हैं और बच्चे उनका मजा उठा रहे हैं। इससे उनका शैक्षिक व बौद्धिक स्तर भी ऊंचा हो रहा है। यह चौथा ‘‘ स’ है- संकल्प। कुछ नया करने व मिलने वाले वेतन को न्यायोचित ठहराने का संकल्प ।इसमें दो राय नहीं कि समूचे प्रशासनिक ढांचे को बदलना तत्काल संभव नहीं हैं, लेकिन उस बदलाव के इंतजार में वर्तमान और भविष्य दोनों को नष्ट कर देना भी समझदारी नहीं है। ऐसी स्थिति में अलग तरह की पुस्तकों के माध्यम से सरकारी स्कूल के शिक्षकों की व्यावहारिक परेशानियों को ध्यान में रखते हुए एक ऐसा गतिविधि केंद्र विकसित करने के सुझाव दिया जा सकता है जो कि बच्चों के लिए तो लाभदायक होगा ही, शिक्षक भी इससे बेहद लाभान्वित होंगे ।वास्तव में शिक्षा के निमित्त स्कूल महज एक तरफा संवाद का माध्यम नहीं होना चाहिए जिसमें शिक्षक केवल पाठय़ पुस्तक को पढ़ाते हुए बच्चों को समझा रहा है और बच्चे सुन रहे हों। स्कूल बच्चों के लिए घुटनभरा कमरा न बन कर रह जाए, इसके लिए छोटी-छोटी गतिविधियां बेहद लाभकारी हैं। स्कूल में एक ऐसा कोना अनिवार्यत: हो जहां बच्चा अपने मन की बात शिक्षक से कह सके। वह जो कुछ करना चाहता है- गाना, बजाना, चित्र बनाना, लिखना, प्रकृति को देखना-यानी जो कुछ वह चाहता है, उसे करने का अवसर मिले और वह अपने समाज व परिवेश को समझ सके। यदि थोड़ा सा प्रयास किया जाए तो स्कूल बच्चों का पसंदीदा मनोरंजक स्थल बन सकता है। साथ में गैर-पाठ्य पुस्तकें भी हों तो रचनात्मकता और सीखने की प्रक्रिया को सही दिशा मिलना तय है।आकस्मिक या मनमर्जी से समय का इस्तेमाल भी बच्चों की रचनात्मकता विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इससे बच्चों को पारंपरिक पढ़ाई की एक तरह की दिनर्चया से छूट मिलती है और उनमें आत्मनिर्भरता बढ़ती है। मिशिगन विविद्यालय के सामाजिक शोध विभाग ने हाल में इस बारे में एक शोध भी किया था। बच्चों का जीवन स्कूल व घर दोनों जगह बड़ों द्वारा बनाए गए कानूनों व टाइम टेबिल में बंधा होता है। वह भी हर दिन एक सरीखा। यहां तक कि बच्चों के लिए बड़ों द्वारा बनाये खेल भी कहीं न कहीं उनको तनाव देते हैं, क्योंकि उनमें बड़ों के मानसिक स्तर के नियम, बंधन होते हैं, जीतने का अव्यक्त तनाव होता है। प्रयोग के तौर पर बच्चों को अपने खुद के खेल और कायदे-कानून बनाने का मौका दें। या फिर स्कूल में बच्चों की दिनर्चया में अचानक बदलाव करें। जैसे किसी दिन पहले गणित पढ़ाई तो अगले दिन की शुरुआत हिन्दी से की जा सकती है। खेल के समय, बाल सभा, बाहर घूमने, प्रकृति विचरण जैसे गतिविधियों के लिए बगैर किसी पूर्व सूचना के समय निकालने का भी बच्चों के व्यक्तित्व विकास पर अलग प्रभाव डालेगा। स्कूल में बच्चों को यह भी सिखाना जरूरी है कि क्रोध, खुशी, अनिच्छा जैसी भावनाओें पर जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया देने से कैसे बचा जाए। सामाजिक जुड़ाव यानी बच्चे का अपने गांव, मुहल्ले, घर-परिवेश से भावनात्मक जुड़ाव बना रहे, इसके लिए भी व्यावहारिक स्तर पर शुरू से प्रयास जरूरी हैं ।आमतौर पर स्कूलों में खेल का समय बीच में या फिर आखिर में होता है जबकि 10-12 साल के बच्चों के लिए शारीरिक मेहनत उनके सीखने व याद करने की प्रक्रिया में ग्लूकोज जैसा काम करती है। अत: स्कूलों में खेलकूद जैसी गतिविधियां शुरू में ही रखी जानी चाहिए। इससे बच्चे का स्कूल में मन भी लगेगा, साथ ही वे शारीरिक रूप से बौद्धिक कार्य करने के लिए भी तैयार रहेंगे। एक प्राथमिक स्कूल के शिक्षक की भूमिका बच्चे को ज्ञान देने वाले या फिर मनोरंजन करने वाले से अधिक उसके सहयोगी की होना चाहिए। वह केवल यह देख्ेा कि बच्चा किस दिशा में जा रहा है। बच्चा जब पहले-पहल चलना सीखता है तो उसका लड़खड़ाना वाजिब है, इसी तरह सीखने-सिखाने की शुरुआती प्रक्रिया में बच्चे के लड़खड़ाने पर शिक्षक को उसे तत्काल संभालने की कोशिश से बचना चाहिए। बच्चे अपने अनुभव और प्रयोगों से जल्दी व ज्यादा सीखते हैं ।बच्चों की सृजनात्मकता विकसित करने के लिए उन्हें अपने परिवेश से ही उदाहरण चुनने के लिए प्रेरित करना चाहिए। खेत-खलिहान के काम, मवेशी चराने, गृहिणी की दिनर्चया या मकान या सड़क बना रहे मजदूर की गतिविधियों में भी सृजनात्मकता की स्थितियां समझी-बूझी जा सकती हैं। शिक्षक, समाज और बच्चों के बीच दिनों-दिन बढ़ रहे अविास को समाप्त करने के लिए कुछ छोटी-छोटी जिम्मेदारियों को साझा करने के प्रयोग शुरू करने चाहिए। इस कार्य में बच्चे और समुदाय दोनों को ही शामिल किया जाना चातहए गांव या मोहल्ले का छोटा सा पुस्तकालय स्कूल में शुरू करना इस दिशा में बड़ी रचनात्मक पहल हो सकता है।

शनिवार, 15 अगस्त 2015

religion, independence and Bhagat Singh

आजादी के असली मायने क्‍या हैं , यह बात सरदार भगत सिंह के इस लेख की आखिरी पंक्ति में है , इसे पूरा पढें, मैं आपके ''लाईक'' का अचार नहीं डालूंगा, लेकिन यदि आप इसे पूरा बांचेगे व व इस पर चर्चा करेंगे तो मुझ पर अहसान होगा

धर्म और हमारा स्वतन्त्रता संग्राम


मई, 1928 के ‘किरती’ में यह लेख छपा। जिसमें भगत सिंह ने धर्म की समस्या पर प्रकाश डाला है।


अमृतसर में 11-12-13 अप्रैल को राजनीतिक कान्फ्रेंस हुई और साथ ही युवकों की भी कान्फ्रेंस हुई। दो-तीन सवालों पर इसमें बड़ा झगड़ा और बहस हुई। उनमें से एक सवाल धर्म का भी था। वैसे तो धर्म का प्रश्न कोई न उठाता, किन्तु साम्प्रदायिक संगठनों के विरुद्ध प्रस्ताव पेश हुआ और धर्म की आड़ लेकर उन संगठनों का पक्ष लेने वालों ने स्वयं को बचाना चाहा। वैसे तो यह प्रश्न और कुछ देर दबा रहता, लेकिन इस तरह सामने आ जाने से स्पष्ट बातचीत हो गयी और धर्म की समस्या को हल करने का प्रश्न भी उठा। प्रान्तीय कान्फ्रेंस की विषय समिति में भी मौलाना जफर अली साहब के पाँच-सात बार खुदा-खुदा करने पर अध्यक्ष पण्डित जवाहरलाल ने कहा कि इस मंच पर आकर खुदा-खुदा न कहें। आप धर्म के मिशनरी हैं तो मैं धर्महीनता का प्रचारक हूँ। बाद में लाहौर में भी इसी विषय पर नौजवान सभा ने एक मीटिंग की। कई भाषण हुए और धर्म के नाम का लाभ उठाने वाले और यह सवाल उठ जाने पर झगड़ा हो जाने से डर जाने वाले कई सज्जनों ने कई तरह की नेक सलाहें दीं।

सबसे ज़रूरी बात जो बार-बार कही गयी और जिस पर श्रीमान भाई अमरसिंह जी झबाल ने विशेष ज़ोर दिया, वह यह थी कि धर्म के सवाल को छेड़ा ही न जाये। बड़ी नेक सलाह है। यदि किसी का धर्म बाहर लोगों की सुख-शान्ति में कोई विघ्न डालता हो तो किसी को भी उसके विरुद्ध आवाज़ उठाने की जरूरत हो सकती है? लेकिन सवाल तो यह है कि अब तक का अनुभव क्या बताता है? पिछले आन्दोलन में भी धर्म का यही सवाल उठा और सभी को पूरी आज़ादी दे दी गयी। यहाँ तक कि कांग्रेस के मंच से भी आयतें और मंत्रा पढ़े जाने लगे। उन दिनों धर्म में पीछे रहने वाला कोई भी आदमी अच्छा नहीं समझा जाता था। फलस्वरूप संकीर्णता बढ़ने लगी। जो दुष्परिणाम हुआ, वह किससे छिपा है? अब राष्ट्रवादी या स्वतंत्राता प्रेमी लोग धर्म की असलियत समझ गये हैं और वही उसे अपने रास्ते का रोड़ा समझते हैं।

बात यह है कि क्या धर्म घर में रखते हुए भी, लोगों के दिलों में भेदभाव नहीं बढ़ता? क्या उसका देश के पूर्ण स्वतंत्राता हासिल करने तक पहुँचने में कोई असर नहीं पड़ता? इस समय पूर्ण स्वतंत्राता के उपासक सज्जन धर्म को दिमागी गु़लामी का नाम देते हैं। वे यह भी कहते हैं कि बच्चे से यह कहना किµईश्वर ही सर्वशक्तिमान है, मनुष्य कुछ भी नहीं, मिट्टी का पुतला हैµबच्चे को हमेशा के लिए कमज़ोर बनाना है। उसके दिल की ताव़$त और उसके आत्मविश्वास की भावना को ही नष्ट कर देना है। लेकिन इस बात पर बहस न भी करें और सीधे अपने सामने रखे दो प्रश्नों पर ही विचार करें तो हमें नज़र आता है कि धर्म हमारे रास्ते में एक रोड़ा है। मसलन हम चाहते हैं कि सभी लोग एक-से हों। उनमें पूँजीपतियों के ऊँच-नीच की छूत-अछूत का कोई विभाजन न रहे। लेकिन सनातन धर्म इस भेदभाव के पक्ष में है। बीसवीं सदी में भी पण्डित, मौलवी जी जैसे लोग भंगी के लड़के के हार पहनाने पर कपड़ों सहित स्नान करते हैं और अछूतों को जनेऊ तक देने की इन्कारी है। यदि इस धर्म के विरुद्ध कुछ न कहने की कसम ले लें तो चुप कर घर बैठ जाना चाहिये, नहीं तो धर्म का विरोध करना होगा। लोग यह भी कहते हैं कि इन बुराइयों का सुधार किया जाये। बहुत खूब! अछूत को स्वामी दयानन्द ने जो मिटाया तो वे भी चार वर्णों से आगे नहीं जा पाये। भेदभाव तो फिर भी रहा ही। गुरुद्वारे जाकर जो सिख ‘राज करेगा खालसा’ गायें और बाहर आकर पंचायती राज की बातें करें, तो इसका मतलब क्या है?

धर्म तो यह कहता है कि इस्लाम पर विश्वास न करने वाले को तलवार के घाट उतार देना चाहिये और यदि इधर एकता की दुहाई दी जाये तो परिणाम क्या होगा? हम जानते हैं कि अभी कई और बड़े ऊँचे भाव की आयतें और मंत्रा पढ़कर खींचतान करने की कोशिश की जा सकती है, लेकिन सवाल यह है कि इस सारे झगड़े से छुटकारा ही क्यों न पाया जाये? धर्म का पहाड़ तो हमें हमारे सामने खड़ा नज़र आता है। मान लें कि भारत में स्वतंत्राता-संग्राम छिड़ जाये। सेनाएँ आमने-सामने बन्दूकें ताने खड़ी हों, गोली चलने ही वाली हो और यदि उस समय कोई मुहम्मद गौरी की तरहµजैसी कि कहावत बतायी जाती हैµआज भी हमारे सामने गायें, सूअर, वेद-वु़$रान आदि चीज़ें खड़ी कर दे, तो हम क्या करेंगे? यदि पक्के धार्मिक होंगे तो अपना बोरिया-बिस्तर लपेटकर घर बैठ जायेंगे। धर्म के होते हुए हिन्दू-सिख गाय पर और मुसलमान सूअर पर गोली नहीं चला सकते। धर्म के बड़े पक्के इन्सान तो उस समय सोमनाथ के कई हजार पण्डों की तरह ठाकुरों के आगे लोटते रहेंगे और दूसरे लोग धर्महीन या अधर्मी-काम कर जायेंगे। तो हम किस निष्कर्ष पर पहंुचे? धर्म के विरुद्ध सोचना ही पड़ता है। लेकिन यदि धर्म के पक्षवालों के तर्क भी सोचे जायें तो वे यह कहते हैं कि दुनिया में अँधेरा हो जायेगा, पाप पढ़ जायेगा। बहुत अच्छा, इसी बात को ले लें।

रूसी महात्मा टॉल्स्टॉय ने अपनी पुस्तक (Essay and Letters) में धर्म पर बहस करते हुए उसके तीन हिस्से किये किये हैं —

1. Essentials of Religion, यानी धर्म की ज़रूरी बातें अर्थात सच बोलना, चोरी न करना, गरीबों की सहायता करना, प्यार से रहना, वगै़रा।

2. Philosophy of Religion, यानी जन्म-मृत्यु, पुनर्जन्म, संसार-रचना आदि का दर्शन। इसमें आदमी अपनी मर्जी के अनुसार सोचने और समझने का यत्न करता है।

3. Rituals of Religion, यानी रस्मो-रिवाज़ वगै़रा। मतलब यह कि पहले हिस्से में सभी धर्म एक हैं। सभी कहते हैं कि सच बोलो, झूठ न बोलो, प्यार से रहो। इन बातों को कुछ सज्जनों ने Individual Religion कहा है। इसमें तो झगड़े का प्रश्न ही नहीं उठता। वरन यह कि ऐसे नेक विचार हर आदमी में होने चाहिये। दूसरा फिलासफी का प्रश्न है। असल में कहना पड़ता है कि Philosophy is the out come of Human weakness, यानी फिलासफी आदमी की कमजोरी का फल है। जहाँ भी आदमी देख सकते हैं। वहाँ कोई झगड़ा नहीं। जहाँ कुछ नज़र न आया, वहीं दिमाग लड़ाना शुरू कर दिया और ख़ास-ख़ास निष्कर्ष निकाल लिये। वैसे तो फिलासफी बड़ी जरूरी चीज़ है, क्योंकि इसके बगै़र उन्नति नहीं हो सकती, लेकिन इसके साथ-साथ शान्ति होनी भी बड़ी ज़रूरी है। हमारे बुजुर्ग कह गये हैं कि मरने के बाद पुनर्जन्म भी होता है, ईसाई और मुसलमान इस बात को नहीं मानते। बहुत अच्छा, अपना-अपना विचार है। आइये, प्यार के साथ बैठकर बहस करें। एक-दूसरे के विचार जानें। लेकिन ‘मसला-ए-तनासुक’ पर बहस होती है तो आर्यसमाजियों व मुसलमानों में लाठियाँ चल जाती हैं। बात यह कि दोनों पक्ष दिमाग को, बुद्धि को, सोचने-समझने की शक्ति को ताला लगाकर घर रख आते हैं। वे समझते हैं कि वेद भगवान में ईश्वर ने इसी तरह लिखा है और वही सच्चा है। वे कहते हैं कि कुरान शरीप़$ में खु़दा ने ऐसे लिखा है और यही सच है। अपने सोचने की शक्ति, (Power of Reasoning) को छुट्टी दी हुई होती है। सो जो फिलासफी हर व्यक्ति की निजी राय से अधिक महत्त्व न रखती हो तो एक ख़ास फिलासफी मानने के कारण भिन्न गुट न बनें, तो इसमें क्या शिकायत हो सकती है।

अब आती है तीसरी बात – रस्मो-रिवाज़। सरस्वती-पूजावाले दिन, सरस्वती की मूर्ति का जुलूस निकलना ज़रूरी है उसमें आगे-आगे बैण्ड-बाजा बजना भी ज़रूरी है। लेकिन हैरीमन रोड के रास्ते में एक मस्जिद भी आती है। इस्लाम धर्म कहता है कि मस्जिद के आगे बाजा न बजे। अब क्या होना चाहिये? नागरिक आज़ादी का हक (Civil rights of citizen) कहता है कि बाज़ार में बाज़ा बजाते हुए भी जाया जा सकता है। लेकिन धर्म कहता है कि नहीं। इनके धर्म में गाय का बलिदान ज़रूरी है और दूसरे में गाय की पूजा लिखी हुई है। अब क्या हो? पीपल की शाखा कटते ही धर्म में अन्तर आ जाता है तो क्या किया जाये? तो यही फिलासफी व रस्मो-रिवाज़ के छोटे-छोटे भेद बाद में जाकर (National Religion) बन जाते हैं और अलग-अलग संगठन बनने के कारण बनते हैं। परिणाम हमारे सामने है।

सो यदि धर्म पीछे लिखी तीसरी और दूसरी बात के साथ अन्धविश्वास को मिलाने का नाम है, तो धर्म की कोई ज़रूरत नहीं। इसे आज ही उड़ा देना चाहिये। यदि पहली और दूसरी बात में स्वतंत्रा विचार मिलाकर धर्म बनता हो, तो धर्म मुबारक है।

लेकिन अगल-अलग संगठन और खाने-पीने का भेदभाव मिटाना ज़रूरी है। छूत-अछूत शब्दों को जड़ से निकालना होगा। जब तक हम अपनी तंगदिली छोड़कर एक न होंगे, तब तक हमें वास्तविक एकता नहीं हो सकती। इसलिए ऊपर लिखी बातों के अनुसार चलकर ही हम आजादी की ओर बढ़ सकते हैं। हमारी आज़ादी का अर्थ केवल अंग्रेजी चंगुल से छुटकारा पाने का नाम नहीं, वह पूर्ण स्वतंत्राता का नाम हैµजब लोग परस्पर घुल-मिलकर रहेंगे और दिमागी गुलामी से भी आज़ाद हो जायेंगे।

रविवार, 9 अगस्त 2015

murder of women on the name of witch hunting


         
             औरत को मारने के बहाने
                     पंकज चतुर्वेदी
Jagran 10-8-15
यह घटना है  राज्य की राजधानी रांची से सटे मांडल ब्लाक के कंजिया टोली की। महज 80 घरों वाला गांव है यह। बीते कुछ महीनों में गांव के चार बच्चे बीमारी से मरे। गांव के कुछ लोगों ने पंचायत की और निर्णय ले लिया कि यह सब उन पांच औरतों के कारण हो रहा है जो ‘‘डायन’’ हैं। जब यह चल रहा था तो पुलिस का गष्ती दल गांव में पहुंचा, उन्होंने नियंत्रण का प्रयास किया, लेकिन हथियारबंद गांववालों ने पुलिस टुकड़ी को ही खदेड़ दिया। पांच औरतों, जिनमें एक मां-बेटी भी थी, घर से निकाला गया, उनके कपड़े उतार कर घसीटा गया, फिर भालों से गोद कर व पत्थर से कुचल कर मौत के घाट उतार दिया गया। जब तक बड़ी पुलिस टुकड़ी आती, पांचों औरतें मांस का निर्जीव लोथड़ा बन गई थीं। यही नहीं जब पुलिस ने इन हत्या के आरोप में कुछ लोगों को पकड़ा तो भारी भीड़ इसका विरोध करने थाने पहुंच गई। मारी गई एक औरत 40 साल की है, षेश 55 से 60 के बीच की हैं। विडंबना है कि औरतों की इस नृषंस हत्या के पर्व में स्वयं कई औरतें भी षामिल थीं। झारखंड में गत एक दषक में कोई 1200 औरतों को इसी तरह मध्यकालीन बर्बरता का षिकार बनाए जाने की बात सरकरी रिकार्ड कहता है। महिला सषक्तीकरण की तकरीर करने वालों को षायद यह पता भी नहीं हैं कि पूरे देष के कोई आधा दर्जन राज्यों में ऐसे ही हर साल सैंकड़ों औरतों को बर्बर तरीके से मारा जा रहा है । वह भी ‘डायन’ के अंधविश्वास की आड़ में ।
देष के आदिवासी अंचलों में जमीन हदबंदी कानूनों के लचरपन और पंचायती राजनीति के नाम पर शुरू हुईं जातीय दुश्मनियों की परिणति महिलाओं की हत्या के रूप में हो रही है । कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर राज्य शासन ने एक जांच रिर्पोट तैयार की है जिसमें बताया गया है कि अंधविश्वास , अझान और अशिक्षा के कारण टोनही या डायन करार दे कर किस तरह निरीह महिलाओं की आदिकालीन लोमहर्षक ढ़ंग से हत्या कर दी जाती है । औरतों को ना केवल जिंदा जलाया जाता है, बल्कि उन्हें गांव में नंगा घुमाना, बाल काट देना, गांव से बाहर निकाल देना जैसे निर्मम कृत्य भी डायन या टोनही के नाम पर होते रहते हैं। इन शर्मनाक घटनाओं का सर्वाधिक अफसोसजनक पहलू यह है कि इन महिला प्रताडनाओं के पीछे ना सिर्फ महिला की प्रेरणा होती है,बल्कि वे इन कुकर्मों में बढ़-चढ़ कर पुरूषों का साथ भी देती हैं ।
आदिवासी बाहुल्य छत्तीसगढ़ राज्य में बेगा, गुनियाओं और ओझाओं के झांसे मंे आ कर पिछले तीन वर्षों में तीन दर्जन से अधिक औरतों को मार डाला गया है । कोई एक दर्जन मामलों में आदमियों को भी ऐसी मौत झेलनी पड़ी है । मरने वालों में बूढ़े लोगों की संख्या ज्यादा है । किसी को जिंदा जलाया गया तो किसी को जीवित ही दफना दिया गया । किसी का सिर धड़ से अलग करा गया तो किसी की आंखें निकाल ली गईं । ये आंकड़े मात्र वही हैं जिनकी सूचना पुलिस तक पहुंची । खुद पुलिस भी मानती है कि दर्ज नहीं हो पाए मामलों की संख्या सरकारी आंकड़ों से कहीं अधिक है । प्रशासन के रिकार्ड मुताबिक बीते तीन सालों के दौरान सरगुजा में आठ, बिलासपुर में सात, रायपुर में पांच, रायगढ़ में चार, राजनांदगांव व दंतेवाडा में दो-दो और बस्तर में एक ऐसा मामला कायम हुआ है । यहां जानना जरूरी है कि बस्तर, दंतेवाडा के बड़े हिस्से में पुलिस या नागरिक प्रशासन अभी तक नहीं पहुंच पाया है । यही वे क्षेत्र हैं जहां अंधविश्वास का कुहासा सर्वाधिक है ।  लोग भूल गए होंगे कि पिछले साल असम में जनजातिय बाहुल्य कार्बी आंगलांग जिले में एक राश्ट्रीय स्तर की एथेलेटिक को कुछ लेाग डायन बता कर निर्ममता से पीटा था। कहते हैं कि गांव में कुछ षराब मर गए और एक युवक ने आत्महत्या कर ली। देवजानी नामक जेवलिन थ्रो की राश्ट्रीय स्तर पर स्वर्ण पदक विजेता व भारत का अंतरराश्ट्रीय प्रतियोगिता में प्रतिनिधित्व कर चुकी देवजानी को मछली पकड़ने के जाल में बांध कर तब तक पीटा गया, जब तक वह अधमरी नहीं हो गई। देवजानी तीन बच्चों की मां थी। असम राज्य में गत पांच सालों के दौरान ऐसे कोई 90 मामले सामने आए हैं जब किसी औरत को डायन बता कर जलाया, गला काटा या प्रताडि़त किया गया हो। किसी गांव में कोई बीमारी फैले या मवेशी मारे जाएं या फिर किसी प्राकृतिक विपदा की मार हो, आदिवासी इलाकों में इसे ‘टोनही’ का असर मान लिया जाता है । भ्रांति है कि टोनही के बस में बुरी आत्माएं होती हैं, इसी के बूते पर वह गांवों में बुरा कर देती है । ग्रामिणों में ऐसी धारणाएं फैलाने का काम नीम-हकीम, बेगा या गुनिया करते हैं । छत्तीसगढ़ हो या निमाड़, या फिर झाखंड व ओडिषा ; सभी जगह आदिवासियों की अंधश्रद्धा इन झाड़-फंूक वालों में होती है । इन लोगों ने अफवाह उड़ा रखी है कि ‘टोनही’ आधी रात को निर्वस्त्र हो कर शम्सान जाती है और वहीं तंत्र-मंत्र के जरिए बुरी आत्माओं को अपना गुलाम बना लेती है । उनका मानना है कि देवी अवतरण के पांच दिनों- होली,हरेली,दीवाली और चैत्र व शारदीय नवरात्रि के मौके पर ‘टोनही’ सिद्धी प्राप्त करती है । गुनियाओं की मान्यता के प्रति इस इलाके में इतनी अगाध श्रद्धा है कि ‘देवी अवतरण’ की रातों में लोग घर से बाहर निकलना तो दूर, झांकते तक नहीं हैं । गुनियाओं ने लोगों के दिमाग में भर रखा है कि टोनही जिसका बुरा करना चाहती है, उसके घर के आस-पास वह अभिमंत्रित बालों के गुच्छे, तेल, सिंदूर, काली कंघी या हड्डी रख देती है ।
अधिकांश आदिवासी गांवों तक सरकारी स्वास्थ महकमा पहुंच नहीं पाया है । जहां कहीं अस्पताल खुले भी हैं तो कर्मचारी इन पुरातनपंथी वन पुत्रों में अपने प्रति विश्वास नहीं उपजा पाए है । तभी मवेशी मरे या कोई नुकसान हो, गुनिया हर मर्ज की दवा होता है । उधर गुनिया के दांव-पेंच जब नहीं चलते हैं तो वह अपनी साख बचाने कि लिए किसी महिला को टोनही घोषित कर देता है । गुनिया को शराग, मुर्गे, बकरी की भेंट मिलती है; बदले में किसी औरत को पैशाचिक कुकृत्य सहने पड़ते हैं । ऐसी महिला के पूरे कपड़े उतार कर गांव की गलियों में घुमाया जाता है, जहां चारों तरफ से पत्थर बरसते हैं । ऐसे में हंसिए से आंख फोड़ दी जाती है ।
मप्र के झाबुआ-निमाड़ अंचल में भी महिलाओं को इसी तरह मारा जाता है ; हां, नाम जरूर बदल जाता है - डाकन । गांव की किसी औरत के शरीर में ‘माता’ प्रविष्ठ हो जाती है । यही ‘माता’ किसी दूसरी ‘माता’ को डायन घोषित कर देती है । और फिर वही अमानवीय यंत्रणाएं शुरू हो जाती हैं । अकेले झाबुआ जिले में हर साल 10 से 15 ‘डाकनों’ की नृशंस हत्या होती हैं । इसी तरह के अंधविष्वास और त्रासदी से झारखंड, ओडिषा, बिहार, बंगाल और असम के जनजातिय इलाके भी ग्रस्त हैं। सन 2011 में 243 औरतों को डाकन बता कर मार देने की बात राश्ट्रीय अपराध रिकार्ड्स ब्यूरो बताता हे। सन 2012 में इसी आरोप में माारी गई दौ सैंकडा से ज्यादा औरतों में से कोई पचास अकेले रहती थीं।
रूरल लिटिगेषन एंड एंटाइटिलमेंट केंद्र नामक गैरसरकारी संगठन की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दे कर डायन-कुप्रथा पर रोक लगाने की मांग की गई थी, जिसे गत 12 मार्च 2010 को सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए निरस्त कर दिया कि इस याचिका को हाईकोर्ट में लगाना चाहिए। संस्था ने आकंडे पेष किए कि गत 15 सालों से देष के विभिन्न राज्यों में 2500 से अधिक औरतों को डायन करार दे कर मारा जा चुका है।
ठेठ आदिम परंपराओं में जी रहे आदिवासियों के  इस दृढ़ अंध विश्वास का फायदा इलाके के असरदार लोग बड़ी चालाकी से उठाते है । अपने विरोधी अथवा विधवा-बूढ़ी औरतों की जमीन हड़पने के लिए ये प्रपंच किए जाते हैं । थोड़े से पैसे या शराब के बदौलत गुनिया बिक जाता है और किसी भी महिला को टोनही घोषित कर देता है । अब जिस घर की औरत को ‘दुष्टात्मा’ बता दिया गया हो या निर्वस्त्र कर सरेआम घुमाया गया हो, उसे गांव छोड़ कर भागने के अलावा कोई चारा नहीं बचता है । कई मौकों पर ऐसे परिवार की बहु-बेटियों के साथ गुनिया या असरदार लोग कुकृत्य करने से बाज नहीं आते हैं । यही नहीं अमानवीय संत्रास से बचने के लिए भी लोग ओझा को घूस देते हैं ।
मप्र शासन की जांच रपट में कई रोंगटे खड़े कर देने वाले हादसों का जिक्र है । लेकिन अब अधिकारी सांसत में हैं कि अनपढ़ आदिवासियों को इन कुप्रथाओं से बचाया कैसे जाए । एक तरफ आदिवासियों के लिए गुनिया-ओझा की बात पत्थर की लकीर होती है, तो दूसरी ओर इन भोले-भाले लोगों के वोटों के ठेकेदार ‘परंपराओं’ में सरकारी दखल पर भृकुटियां तान कर अपना उल्लू सीधा करने में लगे रहते हैं । गुनिया-ओझा का कोप भाजन होने से अशिक्षित आदिवासी ही नहीं, पढ़े-लिखे समाज सुधारक व धर्म प्रचारक भी डरते हैं । तभी इन अंचलों में सामुदायिक स्वास्थ, शिक्षा या धर्म के क्षेत्र में काम कर रहे लोग भी इन कुप्रथाओं पर कभी कुछ खुल कर नहीं बोलते हैं  कारण- गुनिया की नाराजगी मोल ले कर किसी का भी गांव में घुस पाना नामुमकिन ही है । कहने को झारंखंड सरकार ने इस कुप्रथा के खिलाफ एक डोक्यूमेंट्री फिल्म भी बनवाई थी, लेकिन गुनिया-ओझा के डर से उसका सही तरीके से प्रदर्षन भी नहीं हुआ।
मिथ्या धारणाओं से ओतप्रोत जनजातीय लोगों में औरत के प्रति दोयम नज़रिया वास्तव में उनकी समृद्ध परंपराओं का हिस्सा नहीे हैं । यह तो हाल के कुछ वर्षों में उनके बीच बढ़ रहे बाहरी लोगों के दखल और भौतिक सुखों की चाहत से उपजे हीन संस्कारों की हवस मात्र है ।

पंकज चतुर्वेदी
नेषनल बुक ट्रस्ट, इंडिया
5 नेहरू भवन वसंत कुंज इंस्टीट्यूषनल एरिया फेज-2
नई दिल्ली-110070

ban on porn site is necessary

प्रतिबंध पर इतना हंगामा क्यों!
                                                                                                                                                                 पंकज चतुर्वेदी
LOKMAT SAMACHAR, AMHARASHTRA 10-8-15
 य ह तसल्ली कुछ ही घंटे की रही कि चलो अब इंटरनेट पर कुछ सौ अश्लील वेबसाइट नहीं खुलेंगी. एक तरफ कुछ 'अभिव्यक्ति की आजादी' का नारा लगा कर इन साइटों पर पाबंदी की मुखालफत करते दिखे तो दूसरी ओर ऐसी साइटों से करोड.ों पीटने वाले सुप्रीम कोर्ट के आदेश का छिद्रान्वेषण कर अपनी दुकान बचाने पर जुट गए.
एक दिन भी नहीं बीता और अश्लीलता परोसने वाली अधिकांश साइट फिर बेपर्दा हो गईं. कुल मिला कर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने हाथ खडे. कर दिए कि सभी अश्लील वेबसाइटों पर रोक लगाना संभव नहीं है. संचार के आधुनिक साधन इस समय जिस स्तर पर अश्लीलता का खुला बाजार बन गए हैं, यह किसी से दबा-छुपा नहीं है. कुछ ही महीने पहले ही देश के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने भी नेट पर परोसे जा रहे अश्लील बाजार पर चिंता जताई थी. यह विश्‍वव्यापी है और जाहिर है कि इस पर काबू पाना इतना सरल नहीं होगा. लेकिन दुर्भाग्य है कि हमारे देश के संवाद और संचार के सभी लोकप्रिय माध्यम देह-विर्मश में लिप्त हैं, सब कुछ खुला-खेल फरुखाबादी हो रहा है.
अखबार, मोबाइल फोन, विज्ञापन सभी जगह तो नारी-देह बिक रही है. अब नए मीडिया यानी वॉट्स एप, वी चैट जैसी नई संचार तकनीकों ने वीडियो व चित्र भेजना बेहद आसान कर दिया है और कहना होगा कि इस नए संचार ने देह मंडी को और सुलभ कर दिया है.
नंगेपन की तरफदारी करने वाले आखिर यह क्यों नहीं समझ रहे कि देह का खुला व्यापार युवा लोगों की कार्य व सृजन-क्षमता को जंग लगा रहा है. जिस वक्त उन्हें देश-समाज के उत्थान पर सोचना चाहिए, वे अंग-मोह में अपना समय व शरीर बर्बाद कर रहे हैं. आज मोबाइल हैंड सेट में इंटरनेट कनेक्शन आम बात हो गई है और इसी राह पर इंटरनेट की दुनिया भी अधोपतन की ओर है.
मजाक, हंसी और मौज मस्ती के लिए स्त्री देह की अनिवार्यता का संदेश आधुनिक संचार माध्यमों की सबसे बड.ी त्रासदी बन गया है. यह समाज को दूरगामी विपरीत असर देने वाले प्रयोग हैं. चीन, पाकिस्तान के उदाहरण हमारे सामने हैं, जहां किसी भी तरह की अश्लील साइट खोली नहीं जा सकती. यदि हमारा सर्च इंजन हो तो हमें गूगल पर पाबंदी या नियंत्रित करने में कोई दिक्कत नहीं होगी और हम वेबसाइटों पर अपने तरीके से निगरानी रख सकेंगे. कहीं किसी को तो पहल करनी ही होगी, सो सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पहल कर चुके हैं. अब आगे का काम नीति-निर्माताओं का है. 

Stop wastage of food


असमानता के बीच अन्न की बर्बादी

= पंकज चतुर्वेदी
जिस देश में नए अनाज को रखने के लिए गोदामों में जगह नहीं है, जहां सामाजिक जलसों में परोसा जाने वाला आधे से ज्यादा भोजन कूड़ाघर का पेट भरता है, वहां ऐसे भी लोग हैं जो अन्न के एक दाने के अभाव में दम तोड़ देते हैं। पिछले महीने छत्तीसगढ़ में एक बच्चा भूख से मर गया। विकास, विज्ञान, संचार व तकनीक में हर दिन कामयाबी की नई ऊंचाई छूने वाले मुल्क में इस तरह बेरोजगारी व खाना न मिलने से होने वाली मौतें मानवता व हमारे ज्ञान के लिए भी कलंक हैं...


पिछले महीने 80 साल बाद जारी किए गए सामाजिक, आर्थिक और जातीय जनगणना के आंकड़े भारत की चमचमाती तस्वीर के पीछे का विद्रूप चेहरा उजागर करने के लिए काफी हैं। देश के 51.14 प्रतिशत परिवारों की आय का जरिया महज अस्थाई मजदूरी है। 4.08 लाख परिवार कूड़ा बीनकर तो 6.68 लाख परिवार भीख मांग कर अपना गुजारा करते हैं। गांव में रहने वाले 39.39 प्रतिशत परिवारों की औसत मासिक आय दस हजार रुपए से भी कम है। आय और व्यय में असमानता की हर दिन गहरी होती खाई का ही परिणाम है कि कुछ दिनों पहले ही संयुक्त राष्ट्र के खाद्य व कृषि संगठन द्वारा जारी की गई रपट में बताया गया है कि भारत में 19.4 करोड़ लोग भूखे सोते हैं, हालांकि सरकार के प्रयासों से पहले से ऐसे लोगों की संख्या कम हुई है। हमारे यहां बीपीएल यानी गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों की संख्या को लेकर भी गफलत है, हालांकि यह आंकड़ा 29 फीसदी के आसपास सर्वमान्य है। भूख, गरीबी, कुपोषण व उससे उपजने वाली स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधन प्रबंधन की दिक्कतें देश के विकास में सबसे बड़ी बाधक हैं। हमारे यहां न तो अन्न की कमी है और न ही रोजगार के लिए श्रम की। कागजों पर योजनाएं भी हैं, नहीं है तो उन योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार स्थानीय स्तर की मशीनरी में जिम्मेदारी व संवेदना की। जिस देश में नए खरीदे गए अनाज को रखने के लिए गोदामों में जगह नहीं है, जहां सामाजिक जलसों में परोसा जाने वाला आधे से ज्यादा भोजन कूड़ाघर का पेट भरता है, वहां ऐसे भी लोग हैं जो अन्न के एक दाने के अभाव में दम तोड़ देते हैं। पिछले महीने छत्तीसगढ़ में एक बच्चा भूख से मर गया। सनद रहे कि छत्तीसगढ़ की सार्वजनिक वितरण प्रणाली की मिसाल देश-दुनिया में दी जाती है। मारे गए बच्चे का बाप बेरोजगार था व उसके पास मनरेगा का जॉब कार्ड भी नहीं था। बंगाल के बंद हो गए चाय बागानों में आए रोज मजूदरों के भूख के कारण दम तोड़ने की बात हो या फिर महाराष्ट्र में अरबपति शिरडी मंदिर के पास ही मेलघाट में हर साल हजारों बच्चों की कुपोषण से मौत की खबर या फिर राजस्थान का बारां जिला हो या मध्यप्रदेश का शिवपुरी जिला, सहरिया आदिवासियों की बस्ती में पैदा होने वाले कुल बच्चों में अस्सी फीसदी के उचित खुराक न मिल पाने के कारण कम उम्र में ही मर जाने के मामले इस देश में हर रोज हो रहे हैं, लेकिन विज्ञापन में मुस्कुराते चेहरों, दमकती सुविधाओं के फेर में वास्तविकता से परे उन्मादित भारतवासी तक ऐसी खबरें या तो पहुंच नहीं रही हैं या उनकी संवेदनाओं को झकझोर नहीं रही हैं। देशभर के शहरों-कस्बों से आए रोज गरीबी, कर्ज व भुखमरी के कारण आत्महत्या की खबरें आती हंै, लेकिन वे किसी अखबार की छोटी सी खबर बन कर समाप्त हो जाती हैं। भूख से मौत वह भी उस देश में जहां खाद्य और पोषण सुरक्षा की कई योजनाएं अरबों रुपए की सब्सिडी पर चल रही हैं, जहां मध्यान्य भोजन योजना के तहत हर दिन 12 करोड़ बच्चों को दिन का भरपेट भोजन देने का दावा हो, जहां हर हाथ को काम व हर पेट को भोजन के नाम पर हर दिन करोड़ों का सरकारी फंड खर्च होता हो, दर्शाता है कि योजनाओं व पात्रों के बीच अभी भी पर्याप्त दूरी है। वैसे भारत में हर साल पांच साल से कम उम्र के 10 लाख बच्चों के भूख या कुपोषण से मरने के आंकड़े संयुक्त राष्ट्र संगठन ने जारी किए हैं। ऐसे में नवरात्रि पर गुजरात के गांधीनगर जिले के एक गांव में माता की पूजा के नाम पर 16 करोड़ रुपए दाम के साढ़े पांच लाख किलो शुद्ध घी को सड़क पर बहाने, मध्यप्रदेश में एक राजनीतिक दल के महासम्मेलन के बाद नगर निगम के सात ट्रकों में भर कर पूड़ी व सब्जी कूड़ेदान में फेंकने की घटनाएं बेहद दुभाग्यपूर्ण व शर्मनाक प्रतीत होती हैं।हर दिन कई लाख लोगों के भूखे पेट सोने के गैर सरकारी आंकड़ों वाले भारत देश के ये आंकड़े भी विचारणीय हैं। देश में हर साल उतना गेहूं बर्बाद होता है, जितना आस्ट्रेलिया की कुल पैदावार है। नष्ट हुए गेहूं की कीमत लगभग 50 हजार करोड़ होती है और इससे 30 करोड़ लोगों को सालभर भरपेट खाना दिया जा सकता है। हमारा 2.1 करोड़ टन अनाज केवल इसलिए बेकार हो जात है, क्योंकि उसे रखने के लिए हमारे पास माकूल भंडारण की सुविधा नहीं है। देश के कुल उत्पादित सब्जी-फल का 40 फीसदी कोल्ड स्टोरेज व समय पर मंडी तक नहीं पहुंच पाने के कारण सड़ जाता है। औसतन हर भारतीय एक साल में 6 से 11 किलो अन्न बर्बाद करता है। जितना अन्न हम एक साल में बर्बाद करते हैं, उसकी कीमत से ही कई सौ कोल्ड स्टोरेज बनाए जा सकते हैं जो फल-सब्जी को सड़ने से बचा सके। एक साल में जितना सरकारी खरीदी का धान व गेहूं खुले में पड़े होने के कारण मिट्टी हो जाता है, उससे ग्रामीण अंचलों में पांच हजार वेयर हाउस बनाए जा सकते हैं। यह आंकड़ा किसी से दबा-छुपा नहीं है, बस जरूरत है तो एक प्रयास करने की। यदि पंचायत स्तर पर ही एक कुंटल अनाज का आकस्मिक भंडारण व उसे जरूरतमंद को देने की नीति का पालन हो तो कम से कम कोई भूखा तो नहीं मरेगा। बुंदेलखंड के पिछड़े जिले महोबा के कुछ लेागों ने ‘रोटी बैंक’ बनाया है। बैंक से जुड़े लोग भोजन के समय घरों से ताजा बनी रोटियां एकत्र करते हैं और उन्हें अच्छे तरीके से पैक कर भूखे तक पहुंचाते हैं। बगैर किसी सरकारी सहायता के चल रहे इस अनुकरणीय प्रयास से हर दिन 400 लेागों को भोजन मिल रहा है। बैंक वाले बासी या ठंडी रोटी लेते नहीं हैं, ताकि खाने वाले का आत्मसम्मान भी जिंदा रहे। यह बानगी है कि यदि इच्छा शक्ति हो तो छोटे से प्रयास भी भूख पर भारी पड़ सकते हैं। विकास, विज्ञान, संचार व तकनीक में हर दिन कामयाबी की नई ऊंचाई छूने वाले मुल्क में इस तरह बेरोजगारी व खाना न मिलने से होने वाली मौतें मानवता व हमारे ज्ञान के लिए भी कलंक हैं। हर जरूरतमंद को अन्न पहुंचे इसके लिए सरकारी योजनाओं को तो थोड़ा चुस्त-दुरुस्त होना होगा, समाज को भी थोड़ा संवेदनशील बनना होगा। हो सकता है कि हम इसके लिए पाकिस्तान से कुछ सीख लें, जहां शादी व सार्वजनिक समारोह में पकवान की संख्या, मेहमानों की संख्या तथा खाने की बर्बादी पर सीधे गिरफ्तारी का कानून है। जबकि हमारे यहां होने वाले शादी समारोह में आमतौर पर 30 प्रतिशत खाना बेकार जाता है। गांव स्तर पर अन्न बैंक, प्रत्येक गरीब, बेरोजगार के आंकड़े रखना जैसे कार्य में सरकार से ज्यादा समाज को अग्रणी भूमिका निभानी होगी। बहरहाल हमें एकमत से स्वीकार करना होगा कि अंबिकापुर जिले में एक आदिवासी बच्चे की ऐसी मौत हम सभी के लिए शर्म की बात है। यह विडंबना है कि मानवता पर इतना बड़ा धब्बा लगा और उस इलाके के एक कर्मचारी या अफसर को सरकार ने दोषी नहीं पाया, जबकि ये अफसरान इलाके की हर उपलब्धि को अपनी बताने से अघाते नहीं हैं। भूख व कुपोषण जैसे मसलों पर अफसरान की जिम्मेदारी तय करने में कड़ाई, मुफ्त बंटने वाले भोजन की गुणवत्ता से समझौता न करने और ग्रामीण स्तर पर खाद्य सुरक्षा की येाजना व क्रियान्वयन हमें भूख से मौत जैसे सामाजिक कलंक से मुक्ति दिलवा सकता है।

बुधवार, 5 अगस्त 2015

THINK FOR ALTERNATIVE OF ATOMIC POWER FOR ELECTRICITY

6 अगस्त हीरोशिमा अणु बम की 70वी बरसी पर खास

कई फुकुशीमा  पनप रहे हैं भारत में!

पंकज चतुर्वेदी

 बीते कुछ सालों से मुल्क की सियासत के केंद्र में बिजली है - कहीं सस्ती या मुफ्त बिजली के वायदे हैं तो कहीं ज्यादा बिजी बिलों को ले कर तकरार। यूपीए-1 तो बिजली के लिए अमेरिका के साथ परमाणु समझौते को ले कर पूरी सरकार को दांव पर लगा चुका था। लेकिन बिजली की लालसा में लोग चार साल पहले जापान में आई सुनामी के बाद फुकुषिमा के परमाणु बिजली संयंत्र का रिसाव अकेले जापान ही नहीं आधा दर्जन देषों के अस्तित्व पर संकट बन गया था। उस समय सारी दुनिया में बहस चली थी कि परमाणु उर्जा कितनी उपयोगी और खतरनाक है। सभी ने माना था कि परमाणुु षक्ति को बिजली में बदलना षेर पर सवारी की तरह है- थोड़ा चूके तो काल का ग्रास बनना तय है। लेकिन विडंबना है कि भारत में देष के भाग्यविधात उन लाखों लोगों के प्रति बेखबर हैं जो कि देष का परमाणु-संपन्न बनाने की कीमत पीढि़यों से विकिरण की त्रासदी सह कर चुका रहे हैं। एटमी ताकत पाने के तीन प्रमुख पद हैं - यूरेनियम का खनन, उसका प्रसंस्करण और फिर विस्फोट या परीक्षण। लेकिन जिन लोगों की जान-माल की कीमत पर इस ताकत को  हासिल किया जा रहा है; वे नारकीय जीवन काट रहे हैं ?
परमाणु उर्जा से बनने वाली बिजली का उपभोग करने वाले नेता व अफसर तो दिल्ली या किसी शहर में सुविधा संपन्न जीवन जी रहे हैं , परंतु हजारों लोग ऐसे भी हैं जो इस जुनून की कीमत अपना जीवन दे कर चुका रहे हैं । जिस जमीन पर परमाणु ताकत का परीक्षण किया जाता रहा है, वहां के लोग पेट के खातिर अपने ही बच्चों को अरब देशों में बेच रहे हैं । जिन इलाकों में एटमी ताकत के लिए रेडियो एक्टिव तत्व तैयार किए जा रहे हैं, वहां की अगली पीढ़ी तक का जीवन अंधकार में दिख रहा है । जिस जमीन से परमाणु बम का मुख्य मसाला खोदा जा रहा है, वहां के बाशिंदे तो जैसे मौत का हर पल इंतजार ही करते हैं ।
PRABHAT MEERUT , 9-8-15
झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के जादुगोड़ा में भारत की पहली और एकमात्र यूरेनियम की खान है । यहां से अयस्क का खनन किया जाता है और उसे परिशोधन के लिए हजार किमी दूर हैदराबाद भेजा जाता है । इस प्रक्रिया में शेष बचे जहरीले कचरे को एक बार फिर जादुगोड़ा ला कर आदिवासी गांवों के बीच दफनाया जाता है । यूरेनियम कारपोरेशन आफ इंडिया (यूसिल) लाख दावा करे कि खनन या कचरे का जन-जीवन पर कोई असर नहीं पड़ रहा है । पर हकीकत यह है कि पिछले तीन-चार सालों में यहां एक सैंकड़ा से अधिक असामयिक मौतें हुई हैं । खुद युसिल का रिकार्ड बताता है कि यूरेनियम खनन और उसके कचरे के निबटारे में लगे 21 लोग सन 1996 में मारे गए । ऐसे ही मरने वालों की संख्या 1995 में 14 और 1994 में 21 थी । ये सभी मौतें टीबी, ल्यूकेमिया, केंसर जैसी बीमारियों से हुई हैं और इसके मूल में रेडियो विकिरण ही था । उसके बाद कंपनी ने रिकार्ड को उजागर करना ही बंद कर दिया है, लेकिन गैरसरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि साल का अंक बढ़ने के साथ-साथ मौत के आंकड़े भी बढ़ रहे हैं।
सिंहभूम जिले के सिविल सर्जन ने विकिरण से प्रभावित कई लोगों की पहचान भी की है । इलाके के आदिवासी विकिरण-मुक्त जीवन के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं । पिछले कई सालों से आंदोलन, लाठीचार्ज, धरने, गिरफ््तारियां, उत्पीड़न यहां के बाशिंदों की नियति बन गया है । जब कोई मौत होती है तो गुस्सा भड़कता है । प्रशासन के आश्वासन मिलते हैं । ‘राष्ट्र गौरव’ की बेदी पर बलि होने के लिए एक बार फिर भूखे-मजबूर आदिवासियों की नई जमात खड़ी हो जाती है ।
रावतभाटा(राजस्थान) में परमाणु शक्ति से बिजली बनाने का संयत्र लगा है , लेकिन एटमी ताकत को बम में बदलने के लिए जरूरी तत्व जुटाने का भी यह मुख्य जरिया है । कुछ साल पहले गुजरात इंस्टीट्यूट आफ डेवलपमेंट रिसर्च ने रावतभाटा के आसपास 17 दिन तक विस्तृत अध्यन किया था । संस्था के लोगों ने कोई छह हजार घरों पर पड़ताल की थी । इन्होंने पाया कि रावतभाटा के करीबी गांवों में अन्य गांवों की तुलना में जन्मजात विकलांगता की दर तीन गुना अधिक है । गर्भपात, मरे हुए बच्चे पैदा होना, स्त्रियों में बांझपन आदि का प्रतिशत भी बहुत उंचा है । इस बिजली घर से पांच किमी दूर स्थित तमलाव गांव में बोन ट्यूमर, थायराइड ग्लैंड, सिस्टिक ट्यूमर जैसी बीमारियां हर घर की कहानी है । केंद्र के कर्मचारियों और वहां रहने वालों के बच्चे टेढ़े-मेढ़े हाथ-पांव और अविकसित अंग पैदाइशी होना आम बात हो गई है । यहां तक कि पशुओं की संख्या भी कम होती जा रही है । बकरियों में विकलांगता और गर्भपात की घटनाएं बढ़ी हैं ।
इस सर्वेक्षण में कई डाक्टर भी थे । उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी है कि विकिरण की थोड़ी सी मात्रा भी शरीर में परिवर्तन के लिए काफी होती है । विकिरण जीव कोशिकाओं को क्षति ग्रस्त करता है । इससे आनुवांशिकी कोशिकाओं में भी टूट-फूट होती है । आने वाली कई पीढि़यों तक अप्रत्याशित बीमारियों की संभावना बनी रहती है ।
शौर्य भूमि पोकरण में भव्य स्मृति स्थल बनाने के लिए करोड़ों का खर्चा करने के लिए आतुर संगठनों ने कभी यह जानने की जुर्रत नहीं की कि तपती मरूभूमि में जनजीवन होता कैसा है । परीक्षण-विस्फोट से डेढ़ सौ मकान पूरी तरह बिखर गए थे । साल भर के लिए पानी इकट्ठा रखने वाले ‘टांकों’ के टांके टूट गए । ऐवज में सरकार ने जो मुआवजा बांटा था उससे एक कमरा भी खड़ा नहीं होना था । धमाके के बाद जब इलाके में नाक से खून बहने और अन्य बीमारियों की खबरें छपीं तो खुद प्रधानमंत्री ने किसी भी तरह के विकिरण कुप्रभाव ना होने के बयान दिए थे । जबकि भूगर्भीय परीक्षण के बाद रेडियोधर्मी जहर के रिसाव की मात्रा और उसके असर पर कभी कोई जांच हुई ही नहीं है । राजस्थान विश्वविद्यालय के एक शोधकर्ता डा अग्रवाल ने पाया था कि 1974 में विस्फोट के बाद पोकरण व करीबी गांवों में केंसर के रोगियों की संख्या में बढ़ौतरी हुई है ।
पोकरण क्षेत्र सरकारी उपेक्षा का किस हद तक शिकार है, इसकी बानगी है कि यहां पेट पालने के लिए लोग अपने बच्चों को बेच रहे हैं । पोकरण और इसकी पड़ौसी पंचायत शिव के कोई एक दर्जन गांव-ढ़ाणियों से हर साल सैंकड़ों बच्चे ऊंट दौड़ के लिए खाड़ी देशों को जाते हैं । ये बच्चे 12 से 14 साल उम्र और 30-35 किलो वजन के होते हैं । इनका वजन नहीं बढ़े इसके लिए उन्हें खाना-पीना कम दिया जाता है । जेसलमेर जिले के भीखोडोई , फलसूंड , बंधेव , फूलोसर व राजमथाई और बाडमेर के उंडू , कानासर , आरंग , रतेउ ,केसुआ आदि गांवों के लड़के अरब देशों को गए हैं । ये गरीब मुसलमान , सुतार , राजपूत और जाट बिरादरी के हैं ।
अपने घरों के लिए पेट की जुगाड़ बने ये बच्चे जब विदेश से लौटे तो पैसा तो खूब लाए पर असामान्य हो गए । वे तुतलाने और हकलाने लगे । कई बच्चे शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग हो गए । हर समस्या की तरह इस पर भी सरकार का तो यही कहना है कि इलाके से कोई बच्चा नहीं गया है । पर वास्तविकता को यी बात उजागर करती है कि अकेले पोकरण से हर साल 30 से 50 पासपोर्ट बन रहे हैं । जेसलमेर जिले में हर साल डेढ़ हजार पासपोर्ट बन रहे हैं ।
‘जय जवान-जय किसान’  के साथ ‘‘जय विज्ञान ’’ के नारे की प्रासंगिकता पोकरण  के इस पहलू से संदिग्ध हो जाती है । इस घोर रेगिस्तान में ना तो उद्योग-धंधे खुल सकते हैं और ना ही व्यापार की संभावनाएं हैं । ऊपर से एक तरफ प्रकृति की मार है तो दूसरी ओर ‘जय विज्ञान’ का आतंक । आखिर किस बात का गौरव है ?
यह विडंबना ही है कि भारत में इन तीनों स्तर पर जन-जीवन भगवान भरोसे है । षायद इस बात का आकलन किसी ने किया ही नहीं कि परमाणु ताकत से बिजली बना कर हम जो कुछ पैसा बचाएंगे या कमाएंगे; उसका बड़ा हिस्सा जन-स्वास्थ्य पर खर्च करना होगा या फिर इससे अधिक धन का हमारा मानव संसाधन बीमारियों की चपेट में होगा।
आने वाली पीढ़ी के लिए उर्जा के साधन जोड़ने के नाम पर एटमी ताकत की तारीफ करने वाले लोगों को यह जान लेना चाहिए कि क्षणिक भावनात्मक उत्तेजना से जनता को लंबे समय तक बरगलाया नहीं जा सकता है । यदि हमारे देश के बाशिंदे बीमार, कुपोषित और कमजोर होंगे तो लाख एटमी बिजली घर या बम भी हमें सर्वशक्तिमान नहीं बना सकते हैं ।

पंकज चतुर्वेदी


Karnataka on atomic warning

कर्णाटक पर मंडराता परमाणु खतरा 


पिछले दिनों कर्नाटक पुलिस ने आतंकवादियों के ऐसे गिरोह को पकड़ा है, जो राज्य के कैगा स्थित परमाणु सयंत्र में धमाके करना चाहते थे। वैसे तो यह बात आम लोगों को समझ आने लगी है कि परमाणु ऊर्जा से बिजली पाना एक महंगा सौदा है, लेकिन कर्नाटक राज्य में परमाणु परियोजनाओं के लिए इस साजिश का खुलासा एक खतरे की घंटी है। यह खतरा अब आम लोग समझने लगे हैं कि यदि परमाणु बिजली घर से हो रहा रिसाव समुद्र में मिल गया तो कई-कई हजार किलोमीटर दूर तक के देशों में रेडिएशन की त्रासदी होना तय है। विडंबना है कि हमारा देश इस खतरे के प्रति आंखें मूंदे हुए है और अकेले कर्नाटक में 16 परमाणु रिएक्टर लगा दिए गए हैं। ऐसा भी नहीं कि राज्य के बिजली घरों पर पहले खतरे नहीं आए हों। कुछ साल पहले कैगा के परमाणु रिएक्टर के कोई 50 कर्मचारी बीमार हुए थे और तब पता चला था कि रिएक्टर कर्मचारियों के पानी में रेडियोएक्टिव जहर मिलाया गया था। पहले तो आम नागरिक ही नहीं राजनेता भी गदगद थे कि केंद्र सरकार उनके राज्य के विकास के लिए कितना क्या कर रही है। बड़े-बड़े सयंत्र लग रहे हैं, जिनसे बिजली के साथ-साथ रोजगार भी मिलेगा। जापान त्रासदी के बाद जब नींद खुली तो बहुत देर हो चुकी थी। आज अपने दुखद भविष्य की संभावनाओं से सिहर उठते कर्नाटकवासियों का यह सवाल अनुत्तरित ही है कि परमाणु परियोजनाओं का जखीरा उनके यहां जमा करने के लिए आखिर सरकार इतनी मेहरबान क्यों है। कुछ साल पहले समुद्र के भीतर कई किलोमीटर गहराई में आए भूचाल ने दक्षिणी राज्यों में प्रलय ला दिया था। हालांकि कर्नाटक इस तबाही से बचा रहा, लेकिन सुनामी के कारण तमिलनाडु के कलपक्कम परमाणु बिजलीघर की सुरक्षा को लेकर जो सवाल खड़े हुए हैं, उनसे कर्नाटक भी अछूता नहीं है। यही नहीं कर्नाटक जिस तरह से आतंकवादियों के लगातार निशाने पर है, उससे यहां के परमाणु रिएक्टर यहां के बाशिंदों के लिए खतरे का आगाज ही हैं। हमारे देश के परमाणु ऊर्जा विभाग की मौजूदा कुल 55 परियोजनाओं में से 16 कर्नाटक में हैं। आने वाले दिनों में देश की परमाणु ऊर्जा निर्भरता पूरी तरह इस राज्य पर होगी। हालात इतने दूभर होंगे कि दुर्भाग्यवश किसी एक परियोजना में कोई दुर्घटना हो गई या फिर बाहरी हमला हो गया तो समूचे दक्षिणी भारत का नामोनिशान मिट जाएगा। परमाणु उर्जा केंद्रों की स्थापना भले ही शांतिपूर्ण कायोंर् के लिए की गई हो पर वे हमारी सुरक्षा व्यवस्था के लिए तो खतरा होते ही हैं। इससे अधिक भयावह यह है कि समूचे राज्य में हवाई हमलों से बचने के लिए न तो सुरक्षित बंकर हैं और न ही परमाणु विस्फोट से आहतों की देखभाल के लिए विशेष अस्पताल। और फिर सुनामी ने खतरों की नई चुनौती खड़ी कर दी है।कैगा में परमाणु रिएक्टरों की संख्या छह हो गई है। प्रदेश के उत्तरी कन्नड़ा क्षेत्र में यूरेनियम का खनन होता है। इसकी पीले रंग की टिकिया बना कर परिष्करण के लिए हैदराबाद भेजा जाता है। वहां से प्राप्त धातु का इस्तेमाल कैगा में बिजली बनाने के लिए होता है। हालांकि सरकारी तौर पर कभी नहीं स्वीकारा जाता है कि हैदराबाद से आए परिष्कृत यूरेनियम को रतनहल्ली स्थित ‘अतिगोपनीय’ रेयर अर्थ मटेरियल प्लांट में भी भेजा जाता है। बंगलुरु में एटोमिक रिसर्च लेबोरेट्री है और गौरीबिडनूर में भूकंप अनुसंधान केंद्र। कोलार स्वर्ण खान यानी केपीएफ की बेकार हो गई जमीन में परमाणु सयंत्रों से निकले कचरे को दफनाने के निर्णय ने तो इलाके में दहशत फैला दी है। परमाणु कचरे को कांचन तकनीक यानी विट्रीफीकेशन के जरिए कांच में मिलाया जाएगा फिर इसे तहखानों में गाड़ेंगे। बहरहाल वैज्ञानिक इस प्रक्रिया को पूरी तरह निरापद बताते हैं, लेकिन सदियों तक सक्रिय रहने वाले रेडियो एक्टिव संक्रमण का खौफ तो बरकरार रहेगा ही। यह एक कड़वा सच है कि हमारे वैज्ञानिकों ने इस तरह परमाणु कचरे के निबटान के दूरगामी परिणामों पर ढंग से सोचा ही नहीं है।गोगी-गुलबर्गा, अराबाइलु-बिस्कोडउत्तरी कन्नड़ा और भरमसागर-चिकमंगलूर में यूरेनियम की खोज के लिए खुदाई चल रही है। यूरेनियम कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया यानी यूसिल ने बलकुंज-दक्षिण कन्नड़ा, अदवी-धारवाड़ और देवगंधनहल्ली-चिकमंगलूर में कुछ स्थानों को यूरेनियम खनन के लिए चुना है। सनद रहे यूरेनियम खनन के गंभीर खतरों के मद्देनजर कनाडा, स्वीडन जैसे देशों ने अपनी जमीन पर ऐसे खनन पर पूर्णतया पाबंदी लगा रखी है। ये देश परमाणु ऊर्जा के इस ईंधन को पाने के लिए कांगों सरीखे तीसरी दुनिया के विपन्न देशों को आसरा बनाए हुए हैं। याद हो यूरेनियम की खुदाई का महज एक फीसदी ही इस्तेमाल होता है। शेष रह गए जानलेवा रेडियोधर्मी खनिज को हवा, पानी और प्रकृति के भरोसे लावारिस छोड़ दिया जाता है। भारत में अभी तक यूरेनियम खनन के दौरान सुरक्षा के उपायों पर गंभीरता से विचार ही नहीं किया गया है। कैगा के बिजलीघर के विकास के अगले चरण में तीन और रिएक्टर लगाए जा रहे हैं। समाज के हर तबके से इसके विरोध में आवाजें उठ रही हैं। प्रसिद्ध लेखक व पर्यावरणविद् डॉ. शिवराम कारंत ने कैगा में परमाणु सयंत्र लगाने के औचित्य पर याचिका अदालत में लगाई थी। भूगर्भ वैज्ञानिकों के अनुसार कैगा भूकंप संभावित क्षेत्र में आता है। यह क्षेत्र प्राकृतिक वैविध्य से भरपूर, सदाबहार समसीतोष्ण वर्षा जंगल के ठीक बीच में स्थित है। इन जंगलों में सुपारी और इलायची का खेती होती है, जो हजारों किसानों के जीवनयापन का जरिया है। यहां मध्यम और बड़ी कुल आठ पन बिजली परियोजनाएं हैं, जिनमें से कुछ तो ठीक जल उदगम स्थल पर हैं। करीब ही स्थित कालिंदी नदी पेय जल का स्रोत है। दुर्भाग्य यह है कि इतना सबकुछ महाराष्ट्र के लिए हो रहा है। यहां तक कि इसके निर्माण कार्य में कर्नाटक सरकार की कोई भूमिका नहीं है। हां, इन परियोजनाओं के लिए सड़क, पानी सरीखी आधारभूत सुविधाएं जुटाने की जिम्मेदारी जरूर प्रदेश शासन पर है। उदाहरण के लिए काली नदी पर बनाए गए कद्रा बांध को ही लें। इसका निर्माण महज इसलिए किया गया है कि कैगा परमाणु सयंत्रों के टावरों को ठंडा रखने के लिए आवश्यक पानी लगातार मिलता रहे। भगवान न करे यदि रिसाव या लीकेज हो गया तो मंगलौर से ले कर गोवा तक के अरब सागर तट पर रहने वाले लाखों लोगों का जीवन नरक हो जाएगा। गोपनीय और रहस्यमयी रेयर अर्थ मटेरियल प्लांट, रतनहल्ली को ही लें। यह बात प्रशासन सदैव छिपाता रहा है कि कावेरी नदी पर बने केआरएस बांध की झील के जलग्रहण क्षेत्र पर स्थित इस कारखाने में बनता क्या है। लेकिन दबी जुबान चर्चा यही है कि यहां परमाणु बम का मूल मसाला बनता है। हो सकता है कि सामरिक महत्व के कारण इस सयंत्र का खुलासा करना संभव न हो। पर इस गोपनीयता की आड़ में लाखों लोगों के जीवन के साथ खिलवाड़ करना कहां तक उचित है। यहां का रेडियो एक्टिव प्रदूषण हवा, पानी और मिट्टी के जरिए लोगों के शरीर को खोखला बना रहा है। संयंत्र में उपजे भारी ताप को शांत करने के लिए केआरएस बांध से ही पानी लिया जाता है और फिर उसे यहीं बहा भी दिया जाता है। जबकि यह बात सर्वविदित है कि संयंत्र की निकासी में यूरेनियम-235, 238 और 239 के लेथल आईसोटोप्स की बड़ी मात्रा होती है। इस बांध से मांडया और मैसूर में लाखों एकड़ खेत सींचे जाते हैं, बंगलुरु शहर को पेय जल का आपूर्ति भी होती है।कर्नाटक में यूरेनियम की उपलब्धता के अलावा और क्या कारण हैं कि इसे परमाणु सरीखे संवेदनशील मामले के लिए निरापद माना गया? सरकारी जवाब है कि यह प्रदेश भारत के पारंपरिक दुश्मन राष्ट्रों चीन और पाकिस्तान से पर्याप्त दूरी पर है। लेकिन कभी यह नहीं विचारा गया कि अंतरराष्ट्रीय समग्र परिदृश्य में पड़ोसी देशों के बनिस्पत अमेरिका भारत के लिए बड़ा खतरा है। भौगोलिक रूप से अमेरिका समुद्री तटों से लाखों किमी दूरी पर बेहद सुरक्षित है। लेकिन उसके दियागो-गार्सिया स्थित फौजी छावनी की कन्याकुमारी से दूरी मात्र 1500 किमी है। इस छावनी में कम से कम 35 एटमी मिसाइलें भारत के प्रमुख शहरों को निशाना बना कर तैनात हैं। जाहिर है कि इनमें से कई एक का निशाना कर्नाटक के परमाणु सयंत्र होंगे ही। गौरतलब है कि कोई भी पड़ोसी देश परमाणु हथियार का इस्तेमाल कर खुद भी उसके प्रकोप से बच नहीं सकता है। इस तरह के खतरे दूरस्थ दुश्मनों से ही अधिक हैं।कर्नाटकवासी मानते हैं कि उनका सीधा-साधा स्वभाव इस आफत का बड़ा कारण है। याद हो केरल की समुद्री रेत में मौजूद मोनाजाइट से ‘थोरियम’ के प्रसंस्करण की अच्छी संभावनाएं हैं। लेकिन वहां के जागरूक लोगों के विरोध के चलते ऐसा नहीं हो पा रहा है। आंध्र प्रदेश में नार्गाजुन बांध के समीप परमाणु संयंत्र लगाने की योजना 1980 में भारी विरोध के कारण निरस्त करनी पड़ी थी। भारत में परमाणु ऊर्जा के प्रारंभिक योजनाकार और परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष रहे डॉ. राजा रामन्ना मूल रूप से कर्नाटक के ही थे। इस राज्य में परमाणु ऊर्जा की इतनी अधिक योजनाओं का एक कारण यह भी माना जाता है।1986 में इंग्लैंड के एक सांसद टोनी बेन ने कहा था कि परमाणु ऊर्जा वह तकनीक है, जिस पर पूर्ण नियंत्रण रख पाना मानव समाज के बस की बात नहीं है। प्राकृतिक संपदाओं और नैसर्गिक खूबसूरती के बीच पारंपरिक जीवन जीने के आदी कर्नाटकवासियों को विकास के नाम पर मौत की सौगात देने वाले योजनाकारों को पिछले दिनों आए समुद्री कहर को दृष्टिगत रख कर्नाटक में इतनी सारी परमाणु परियोजनाओं पर पुनर्विचार करना चाहिए।

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