तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शनिवार, 26 सितंबर 2015

Each and Every Party is similar responsible for communal violance in western UP



मौत-घर बन रहे हैं मुजफ्फरनगर के राहत शिविर

                                                                                            पंकज चतुर्वेदी


दैनिक प्रभात, मेरठ 27.9.15
सितंबर-2013 में पष्चिमी उत्तर  प्रदेश में प्रायोजित हुए दंगों के जख्म से एकबार फिर दर्द का रक्त उभर आया है। हालांकि अभी तक जस्टिस विश्णु सहाय की रपट की आधिकारिक या प्रामाणिक जानकारी तो सामने नहीं आई है, लेकिन इस बात का अंदाजा सभी को हो गया है कि जस्टिस सहाय का भी वही आकलन है जो आम लोगों का- कतिपय सियासती दलों ने वोटों की फसल काटने को दंगों के बीज बोये थे। मौत, पलायन, भुखमरी और दर्द के दरिया को सामने देख कर भी किस तरह नकारा जा सकता है, इसका उदाहरण उत्तर प्रदेश में देखा जा सकता है। पष्चिमी उत्तर प्रदेश का जो इलाका अभी कुछ महीनों पहले तक चीनी की चााशनी के लिए मशहूर था, आज नफरत, हिंसा, अमानावीयता की मंद-मंद आग से तप रहा है। भले ही दंगों की लपटें समाप्त दिख रही है लेकिन उसके दूरगामी दुश्परिणाम समाज शिद्दत से महसूस कर रहा है, विडंबना है कि अविष्वास, गुरबत और सामाजिकता के छिन्न-भिन्न होने का जो सिलसिला सितंबर-2013 में षुरू हुआ था वह दिनों-दिन गहराता जा रहा है।
सरकार व समाज दोनों की राहत की कोशिषें कहीं पर घाव को गहरा कर रहे हैं। मुजफ्फरनगर और उसके करीबी पांच जिलों में आंचलिक गांव तक फैली दंगे के दावानल को आजादी के बाद उ.्रप्र. का सबसे बड़ा दंगा कहा गया जिसमें कोई एक लाख लोग घर-गांव से पलायन करने को मजबूर हुए। अब सामने दिख रहा है कि ना तो इसे अपराध के तौर पर और ना ही सामाजिक समस्या के रूप में आकलिन व निवारण के प्रयास करने में सरकारी मषीनरी विफल रही हे। आज भी दंगा पीडि़त लोग तिल-दर-तिल मर रहे हैं और उनके सामने भविश्य के नाम पर एक ष्याह अंतहीन गली दिख रही है। अपने घ्रों से दूर किसी वीराने में राहत के कुछ पैसों से ईंटों का ढ़ांचा खड़ा कर अपनी जिंदगी को नए सिरे से जोड़ते लोगों की बस्तियों से हर रोज कोई लाश उठ रही है - असल में यह जनाजा मौसम की मार, सरकार की बेरूखी, लाचारी, गुरबत और खौफ के कंधों पर कब्रिस्तान तक जाता है।  यह विडंबना ह कि कतिपय राजनीतिक दल दंगों को महज सुरक्षा या कानून का मसला बता कर पूरी जिम्म्ेदारी सरकार में बैठे लेागों पर डाल देते है।, जबकि हर राजनीतिक दल का यह फर्ज होता है कि जब समाज में तनाव हो तो वह लोगों के बीच जा कर उनमें समन्वय की बात करे।
 याद करें दंगों के तत्काल बाद कड़कड़ती ठंड में राज्य के मुख्य सचिव कहते रहे थे  कि ठंड से कोई मरता नहीं है, जबकि डाक्टरों की रपट गवाह है कि मारे गए अधिकांश बच्चे निमोनिया से ही अकाल-मृत्यू के शिकार हुए है। उसके बाद षामली और मुजफ्फरनगर के प्रषासन ने राहत शिविरों को ही बुलडोजर चला कर उजाड़ दिया था। जब हल्ला हुआ तो कलेक्टर, मुजफ्फरनगर द्वारा  राज्य षासन को भेजी गई आख्या में कहा गया था कि शिविरों में अधिकांश लोग वे हैं, जिनके गांव में दंगा भड़का ही नहीं था, या फिर उन्हें मुआवजा मिल चुका है। कलेक्टर साहब ने यह भी फरमाया था कि  प्रषासन ने लोगों को पक्के भवनों में रहने के लिए जगह दी है, लेकिन वे लोग जानबूझ कर खुले में रह रहे हैं।
इस बीच दंगों के कारण हुए समाज को नुकसान सामने आने लगे हैं। यह सभी जानते हैं कि देश की कुल गन्ने की फसल व चीनी उत्पादन का बड़ा हिस्सा पष्चिमी उ.प्र.के सात जिलों से आता है। इस बार किसान अपना गन्ना लेकर तैयार था तो चीनी मिल दाम को लेकर मनमानी पर उतारूं थी। भारतीय किसान यूनियन ने जब इसका विरोध करने के मोर्चे निकाले तो उस पर दंगों का साया साफ दिखा- प्रदर्षन बेहद फीके रहे क्योंकि ऐसे धरने-जुलूसों में तरन्नुम में नारे लगाने वाले, नए-नए जुमले गढ़ने वाले मुसलमान उसमें षामिल ही नहीं थे। कुंद धार आंदोलन होने का ही परिणाम रहा कि किसान को मन मसोस कर मिल मालिक की मर्जी के मुताबिक गन्ना देना पड़ा।  दंगे के दौरान जिस तरह कई जगह खड़ी फसलों को आग के हवाले किया गया, जिस तरह दूसरे समुदाय के लोगों के खेतों पर कतिपय लोगों ने अपने खूंटे गाड़ दिए, इसके दुश्पणिाम अगले साल देखने को मिलेंगे- यह बात किसान भी समझ गए हैं। गांव-गांव में जाटों के खेतों पर मजदूरी करने वाले मुसलमान भूमिहीनों ने कभी यह समझाा ही नही था कि वह किसी गैर के यहां मजदूरी कर रहा है, लेकिन अब ना तो वह भरोसा रहा और ना ही वह मेहनतकश हाथ वहां बचे हैं।
षामली जिले के मलकपुर, सुनेती गांवों के बाहर खुले मैदान हों या फिर मुजफ्फरनगर के लोई, जोउला या कबाड़ के बाहर खेत- दूर से तो वहां रंगबिरंगी पन्नी व चादरों के कैंप किसी मेला-मिलाद की तरह दिखते हैं, लेकिन वहां हर रंगीन चादर के चीने हजारों दर्द पल रहे हैं किसी का गांव में दो मंजिला मकान व लकड़ी का कारखाना था, आज वह कैंप के बाहर कचरे की तरह पड़े पुराने कपड़ों में से अपने नाप की कमीज तलाश रहा है। बीते दो सालों में कई सौ से ज्यादा बच्चियों का निकाह जायज उम्र से पहले करने के पीछे भी उन बच्चियों की रक्षा कैंप में ना होने की त्रासदी है।
सबसे बुरी हालत देश का भविश्य कहे जाने वाले बच्चों की है। इन दंगों की पुनर्वास बस्तियों के बाहर कई सौ ऐसे किषोर मिल जाएंगे जो कभी कालेज या हायर सैकेंडरी स्कूलों में जाते थे। दंगे में उनकी किताबों- कापियों, पुराने सनद-दस्तावेजों सभी को राख में बदल दिया है। उन्होंने इतनी कटुता देख ली कि व अब दूसरे कौम के लोगों के साथ एक भवन में पढ़ना नहीं चाहते । वहीं नफरस व आषंका का माहौल दूसरे फिरके में भी है। अपने घर-गांव से विस्थापित ना तो किसी नई जगह दाखिला ले सकते हैं और ना ही अपने पुराने स्कूल-कालेजों में जा सकते हैं, कारण उनके पास निवास के प्रमाण पत्र जैसे कागजात भी नहीं बचे है।। ये लड़के या तो छोटे-मोटे काम कर रहे हैं या फिर आवारागिर्दी। जब मां-बाप एक-एक निवाले की जुगाड़ में सारा दिन बिताते हैं तो उन तीन हजार से ज्यादा स्कूली बच्चों की परवाह कैसे की जा सकती है जिनके लिए कैंपों में शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। जरा सोचंे कि अभी भी खौ।फ के साये में जी रहे इन चालीस हजार से ज्यादा लोगों के कई हजार बच्चे बगैर माकूल शिक्षा या प्रशिक्षण के, इस तरह के षोशत-भयावह और अन्याय के महौल से बड़े हो कर किस तरह मुल्क के विकास में योगदान दे पाएंगे।
कहने को राज्य सरकार ने राहत शिविारों से घर ना लौट रहे लोगों को पांच-पांच लाख रूपए दे कर बसाने की योजना बनाई थी और इसके तहत पदो हजार से ज्यादा लोगों को मुआवजा भी दिया गया । इसके एवज में उनसे हलफनामे लिए गए कि वे कभी भी अपने घर-गांव नहीं लौटेंगे। जरा गौर करें कि यह कितनी असहनीय व सरकार की असहाय होने की योजना है। सरकार में बैठे लोग गांव-गंाव में देानेां फिरकों के बीच विष्वास बहाली नहीं कर पा रहे हैं या फिर एक साजिश के तहत उन विस्थापित लोगों के घर-खेतों पर कतिपय लोगों को कब्जा करने की छूट दी जा रही है। संयुक्त परिवार में रह रहे लोगों को मुआवजे के लिए आपस में झगड़ा होना, इतने कम पैसे में नए सिरे से जीवन षुरू कठिन होना लाजिमी है। सनद रहे कि इलाके के गांवों में मुसलमानेां की घर वापिसी पर मुकदमें वापिस लेने, साथ में हुक्के के लिए नहीं बैठने, मनमर्जी दर पर मजदूरी करने जैसी शर्तें थोपी गईं, इसकी जानकारी पुलिस को भी है, लेकिन विग्रह की व्यापकता और उनका प्रशिक्षण इस तरह का ना होने से हालात जस के तस बने हुए हैं।
जिन दंगों ने डेढ सौ से ज्यादा जान लीं, जिसमें कई करोड़ की संपत्ति नश्ट हुई, जिसके कारण एक लाख से ज्यादा लोग पलायन करने पर मजबूर हुए, सबसे बड़ी बात जिस दंगे ने आपसी विष्वास और भाईचारे के भव्य महल को नेस्तनाबूद कर दिया- ऐसे गंभीर अपराध पर प्रषासन की कार्यवाही इतनी लचर थी कि इसके सभी आरोपी सहजता से जेल से बाहर आ गए और मुजरिम नहीं, हीरो के रूप में बाहर आए।
जस्टिस सहाय की रपट से किसी को भी न्याय की उम्मीद नहीं है, हकीकत में जनता हताश है अपने राजनीतिक नुमाईंदों से क्योंकि दंगों के दौरान सभी दल के नेता महज पदो फिरकों में बंट गए थे। दंगे के बाद जबरिया गवाही बदलवाने, मुकदमों सें नाम हटवाने का दवाब बनाने, राहत या जरूरी कागजासत बनवाने में दलाली लेने  जैसे कार्यों में हर दल के रूतबेदार लोग दंगा पीडि़तों का षोशण करते रहे। कई बुर्जुग कहते हैं कि इतना अविष्वास तो सन 47 में भी नहीं था, तब गांव-गांव में कांगेस का कार्यकर्ता लेागों को पाकिस्तान जाने से रोकने को आगे खड़ाा था, वहीं दंगों से निबटने को जाट मुसलमानों की ढाल बने थे। पष्चिमी उ.प्र के हालातों को सामान्य बनाने के लिए किसी सरकारी दस्तावेज या कानून से कहीं ज्यादा मानवीय और दूरगामी योजना की जरूरत है। इलाके के पुनर्वास शिविरों में कई मुस्लिम तंजीमें इमदाद के काम कर रही है। जाहिर है कि लोग उनसे ही प्रभावित होंगे और इसके असर कहीं ना कही दुखदाई भी हो सकते हैं।

सोमवार, 21 सितंबर 2015

more pesticides, more powerful mosquito,more dengue

डेंगू के डंक को जहरीला बनाती दवाएं

उम्मीद के मुताबिक इस वर्ष बारिश नहीं हुई है। भादौ में गरमी अपना पूरा रंग दिखा रही है। इतना अधिक जलभराव भी नहीं हुआ, लेकिन उमस, गंदगी और लापरवाही के चलते मच्छर और उससे उपजे डेंगू का असर दिनों-दिन गहरा होता जा रहा है। दिल्ली में एक बच्चे की मौत व उसके गम में उसके माता-पिता द्वारा आत्महत्या करने की घटना ने तो पूरे देश को हिला दिया है। अकेले दिल्ली-एनसीआर में बीते एक हμते में कई मरीज सरकारी अस्पताल तक पहुंचे हैं। यहां डाक्टरों के बैठने के कमरों को भी वार्ड में बदल दिया गया है। राजस्थान के कई जिलों से लेकर बंगाल के दूरस्थ इलाकों तक राऊरकेला जैसे औघेगिक शहर से ले कर महाराष्ट्र के कोकण क्षेत्र तक प्रत्येक क्षेत्र में औसतन हर रोज दस मरीज अस्पताल पहुंच रहे हैं। हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले ही चेता चुका था कि इस साल दिल्ली में डेंगू महामारी बन सकता है। स्थानीय प्रशासन व स्वास्थ्य विभाग इंतजार कर रहा है कि कुछ ठंड पड़े तो समस्या अपने आप समाप्त हो जाए।
Peoples samachar 225-9-15
अखबारों व विभिन्न प्रचार माध्यमों में भले ही खूब विज्ञापन दिख रहे हों, लेकिन राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के हर शहर-गांव, कालोनी में डेंगू के मरीजों की बाढ़ अस्पतालोें की ओर आ रही है। गाजियाबाद जैसे जिलों के अस्पताल तो बुखार-पीड़ितों से पटे पड़े हैं। अब तो इतना खौफ है कि साधारण बुखार का मरीज भी बीस-पच्चीस हजार रूपए दिए बगैर अस्पताल से बाहर नहीं आ रहा है। डॉक्टर जो दवाएं दे रहे हैं उनका असर भगवान-भरोसे है। वहीं डेंगू के मच्छरों से निबटने के लिए दी जा रही दवाएं उलटे उन मच्छरों को ताकतवर बना रही हैं। डेंगू फैलाने वाले ‘एडिस’ मच्छर सन 1953 में अफ्रीका से भारत आए थे। उस समय कोई साढ़े सात करोड़ लोगों को मलेरिया वाला डेंगू हुआ था , जिससे हजारों मौतें हुई थीं। अफ्रीका में इस बुखार को डेंगी कहते हैं। यह तीन प्रकार का होता है। एक वह, जोकि चार-पांच दिनों में अपने आप ठीक हो जाता है, लेकिन इसके बाद मरीज को महीनों तक बेहद कमजोरी रहती है। दूसरे किस्म में मरीज को हेमरेज हो जाता है, जो उसकी मौत का कारण भी बनता है। तीसरे किस्म के डेंगू में हेमरेज के साथ-साथ रोगी का ब्लड प्रेशर बहुत कम हो जाता है, इतना कि उसके मल -द्वार से खून आने लगता है व उसे बचाना मुश्किल हो जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक डेंगू के वायरस भी चार तरह के होते हैं- सीरो-1,2, 3 और 4। यदि किसी मरीज को इनमें से किन्हीं दो तरह के वायरस लग जाएं तो उसकी मौत लगभग तय होती है। ऐसे मरीजों के शरीर पर पहले लाल- लाल दाने पड़ जाते हैं। इसे बचाने के लिए शरीर के पूरे खून को बदलना पड़ता है। सनद रहे कि डेंगू से पीड़ित मरीज को 104 से 107 डिग्री बुखार आता है। इतना तेज बुखार मरीज की मौत का पर्याप्त कारण हो सकता है। डेंगू का पता लगाने के लिए मरीज के खून की जांच करवाई जाती है, जिसकी रिपोर्ट आने में भी दो-तीन दिन लगते हैं। तब तक मरीज की हालत लाइलाज हो जाती है। यदि इस बीच गलती से भी बुखार उतारने की कोई उलटी-सीधी दवा मरीज को दे दी जाए तो उसकी तबीयत और अधिक बिगड़ जाती है। भारतीय उपमहाद्वीप में मच्छरों की मार बढ़ने का बड़ा कारण यहां बढ़ रहे दलदली क्षेत्र को कहा जा रहा है। थार के रेगिस्तान की इंदिरा गांधी नहर और ऐसी ही सिंचाई परियोजनाओं के कारण दलदली क्षेत्र तेजी से बढ़ा है। इन दलदलों में नहरों का साफ पानी भर जाता है और यही ‘एडीस’ मच्छर का आश्रय-स्थल बनते हैं। ठीक यही हालात देश के महानगरों की है जहां, थोड़ी सी बारिश के बाद सड़कें भर जाती हैं। ब्रिटिश गवरमेंट पब्लिक हेल्थ लेबोरेट्री सर्विस(पीएचएलसी) की एक अप्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के गरम होने के कारण भी डेंगूरूपी मलेरिया प्रचंड रूप धारण कर सकता है। जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि गरम और उमस भरा मौसम, खतरनाक और बीमारियों को फैलाने वाले कीटाणुओं और विषाणुओं के लिए संवाहक जीवन-स्थिति का निर्माण कर रहे हैं। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि एशिया में तापमान की अधिकता और अप्रवाही पानी के कारण मलेरिया के परजीवियों को फलनेफू लने का अनुकूल माहौल मिल रहा है। बहरहाल डेंगू के मरीज बढ़ रहे हैं और नगर निगम के कर्मचारी घर-घर जाकर मच्छर के लार्वा चैक करने की औपचारिकता निभा रहे हैं। सरकारी लाल बस्तों में दर्ज है कि हर साल करोड़ों रूपए के डीडीटी, बीएचसी, गेमैक्सिन, वीटेकस और वेटनोवेट पाउडर का छिड़काव हर मुहल्ले में हो रहा है, ताकि डेंगू फैलाने वाले मच्छर ना पनप सकें । हकीकत तो यह है कि मच्छर इन दवाओं को खा-खा कर और अधिक खतरनाक हो चुके हैं। यदि किसी कीट को एक ही दवा लगातार दी जाए तो वह कुछ ही दिनों में स्वयं को उसके अनुरूप ढ़ाल लेता है। हालात इतने बुरे हैं कि ‘पाईलेथाम’और ‘मेलाथियान’ दवाएं फिलहाल तो मच्छरों पर कारगर हैं, लेकिन दो-तीन साल में ही ये मच्छरों को और जहरीला बनाने वाली हो जाएंगी। भले की देश के मच्छरों ने अपनी खुराक बदल दी हो, लेकिन अभी भी हमारा स्वास्थ्य -तंत्र ‘‘क्लोरोक्वीन’’ पर ही निर्भर है। हालांकि यह नए किस्म के मलेरिया यानी डेंगू पर पूरी तरह अप्रभावी है। डेंगू के इलाज में ‘प्राइमाक्वीन’ कुछ हद तक सटीक है, लेकिन इसका इस्तेमाल तभी संभव है, जब रोगी के शरीर में ‘‘जी-6 पी.डी.’’नामक एंजाइम की कमी ना हो। यह दवा रोगी के यकृत में मौजूद परजीवियों का सफाया कर देती है। विदित हो कि एंजाइम परीक्षण की सुविधा देश के कई जिला मुख्यालयों पर भी उपलब्ध नहीं है, अत: इस दवा के इस्तेमाल से डॉक्टर भी परहेज करते हैं। इसके अलावा ‘क्वीनाईन’ नामक एक महंगी दवा भी उपलब्ध है, लेकिन इसकी कीमत आम मरीज की पहुंच के बाहर है। जहां देश का चिकित्सा तंत्र आंख बंद कर एड्स जैसी अंतरराष्ट्रीय प्रायोजित बीमारियों के पीछे भाग रहा है, वहीं मच्छर जैसा साधारण कीट हमारी ही दवाएं खा कर अधिक ताकत के साथ हमले कर रहा है। यह मान लेना चाहिए कि डेंगू से निबटने के लिए सारे साल तैयारी करनी होगी और प्रयास यह करना होगा कि यह बीमारी कम से कम लोगों को अपनी गिरμत में ले। अब डेंगू का मच्छर रात में भी काटने लगा है। कुल मिला कर मच्छर और उससे फैल रहे रोगों से निबटने की सरकारी रणनीति ही दोषपूर्ण है। हम मच्छर को पनपने दे रहे हैं, फिर उसे मारने के लिए दवा का इंतजाम तलाश रहे हैं। उसके बाद जब मरीज आते है। तो उनकी तिमारदारी की व्यवस्था होती है। जबकि जरूरत इस बात की है कि मच्छरों की पैदावार रोकने, उनकी प्रतिरोध क्षमता का आकलन कर नई दवाएं तैयार करने का काम त्वरित गति और प्राथमिकता से होना चाहिए। इसके बाद लोगों को जागरूक बनाने तथा इलाज की व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत है।
                                                                                                                                                                   (आलेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं।) 
                                                                                                                                                                                          पंकज चतुर्वेदी
                                                                                        

शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

Season of festivals of pollution

आया मौसम प्रदूषण का 

बारिश के बादल अपने घरों को लौट रहे हैं, सुबह सूरज कुछ देर से दिखता है और जल्दी अंधेरा छाने लगा है, मौसम का यह बदलता मिजाज असल में उमंगों, खुशहाली के स्वागत की तैयारी है। सनातन मान्यताओं की तरह प्रत्येक शुभ कार्य के पहले गजानन गणपति की आराधना अनिवार्य है और इसीलिए उत्सवों का प्रारंभ गणेश चतुर्थी से ही होता है। अब दुर्गा पूजा या नवरात्रि, दीपावली से लेकर होली तक एक के बाद एक के आने वाले त्योहार असल में किसी जाति-पंथ के नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं के प्रतीक हैं। विडंबना है कि जिन त्यौहारों के रीति रिवाज, खानपान कभी समाज और प्रकृति के अनुरूप हुआ करते थे, आज पर्व के मायने हैं पर्यावरण, समाज और संस्कृति सभी का क्षरण।खूब हल्ला हुआ, निर्देश, आदेश का हवाला दिया गया, अदालतों के फरमान बताए गए, लेकिन गणपति का पर्व वही पुरानी गति से ही मनाया जा रहा है। महाराष्ट्र, उससे सटे गोवा, आंध्र प्रदेश व तेलगांना, छत्तीसगढ़, गुजरात व मध्य प्रदेश के मालवा-निमाड़ अंचल में पारंपरिक रूप से मनाया जाने वाला गणेशोत्सव अब देश में हर गांव-कस्बे तक फैल गया है। दिल्ली में ही हजार से ज्यादा छोटी-बड़ी मूर्तियां स्थापित हैं। यही नहीं मुंबई के प्रसिद्ध लालबाग के राजा की ही तरह विशाल प्रतिमा, उसी नाम से यहां देखी जा सकती है। पारंपरिक तौर पर मूर्ति मिट्टी की बनती थी, जिसे
MP Jansandesh Satna 19-9-15
प्राकृतिक रंगों, कपड़ों आदि से सजाया जाता था। आज प्रतिमाएं प्लास्टर ऑफ पेरिस से बन रही हैं, जिन्हें रासायनिक रंगों से पोता जाता है। कुछ राज्य सरकारों ने प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों को जब्त करने की चेतावनी भी, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया और पूरा बाजार घटिया रासायनिक रंगों से पुती प्लास्टर ऑफ पेरिस की प्रतिमाओं से पटा हुआ है। इंदौर के पत्रकार सुबोध खंडेलवाल ने गोबर व कुछ अन्य जड़ी बूटियों को मिला कर ऐसी गणेश प्रतिमाएं बनवाईं, जो पानी में एक घंटे में घर में ही घुल जाती हैं, लेकिन बड़े गणेश मंडलों ने ऐसे पर्यावरण-मित्र प्रयोगों को स्वीकार नहीं किया। पंडालों को सजाने में बिजली, प्लास्टिक आदि का इस्तमेाल होता है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में कला के नाम पर भौंडे प्रदर्शन व अश्लीलता का बोलबाला है। अभी गणेशात्सव का समापन होगा ही कि नवरात्र में दुर्गा पूजा शुरू हो जाएगी। यह पर्व भी लगभग पूरे भारत में मनाया जाने लगा है। हर गांव-कस्बे में एक से अधिक स्थानों पर सार्वजनिक पूजा पंडाल बन रहे हैं। बीच में विश्वकर्मा पूजा भी आ गई और अब इनकी प्रतिमाएं बनाने का रिवाज भी शुरू हो गया है। वहीं प्रतिमा स्थापना के नाम पर तो लोग कई हजार करोड़ का चंदा भी वसूल लेते हैं। एक अनुमान है कि हर साल देश में इन तीन महीनों के दौरान 10 लाख से ज्यादा प्रतिमाएं बनती हैं और इनमें से 90 फीसदी प्लास्टर ऑफ पेरिस की होती हैं। इस तरह देश के ताल-तलैया, नदियों-समुद्र में नब्बे दिनों में कई सौ टन प्लास्टर ऑफ पेरिस, रासायनिक रंग, पूजा सामग्री मिल जाती है। पीओपी ऐसा पदार्थ है, जो कभी समाप्त नहीं होता है। इससे वातावरण में प्रदूषण की मात्रा के बढ़ने की संभावना बहुत अधिक है। प्लास्टर ऑफ पेरिस, कैल्शियम सल्फेट हेमी हाइड्रेट होता है जो कि जिप्सम यानी कैल्शियम सल्फेट डीहाइड्रेट से बनता है, चूंकि ज्यादातर मूर्तियां पानी में न घुलने वाले प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी होती हैं, उन्हें विषैले व पानी में न घुलने वाले नॉन बायोडिग्रेडेबेल रंगों में रंगा जाता है, इसलिए हर साल इन मूर्तियों के विसर्जन के बाद पानी की बॉयोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड तेजी से घट जाती है, जो जलजन्य जीवों के लिए कहर बनता है। चंद साल पहले मुंबई से वह विचलित करने वाला समाचार मिला था, जब मूर्तियों के धूमधाम से विसर्जन के बाद लाखों की तादाद में जुहू किनारे मरी मछलियां पाई गई थीं।केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा दिल्ली में यमुना नदी का अध्ययन इस संबंध में आंखें खोलने वाला रहा है कि किस तरह नदी का पानी प्रदूषित हो रहा है। बोर्ड के निष्कषोंर् के मुताबिक नदी के पानी में पारा, निकल, जस्ता, लोहा, आर्सेनिक जैसी भारी धातुओं का अनुपात दिनोंदिन बढ़ रहा है।इन आयोजनों में व्यय की गई बिजली से 500 से अधिक गांवों को सालभर निर्बाध बिजली दी जा सकती है। नवरात्र के दौरान प्रसाद के नाम पर व्यर्थ हुए फल, चने-पूड़ी से कई लाख लोगों का पेट भरा जा सकता है। इस अवधि में होने वाले ध्वनि प्रदूषण, चल समारोहों के कारण हुए जाम से फुंके ईंधन व उससे उपजे धुएं से होने वाले पर्यावरण के नुकसान का तो हिसाब लगाना ही मुश्किल है। दुर्गा पूजा से उत्पन्न प्रदूषण से प्रकृति संभल पाती नहीं है और दीपावली आ जाती है। आतिशबाजी का जहरीला धुआं, तेल के दीयों के बनिस्पत बिजली का बढ़ता इस्तेमाल, दीपावली
PRABHAT, MEERUT, 20-9-15
में स्नेह भेंट की जगह लेन-देन या घूस उपहार का बढ़ता प्रकोप, कुछ ऐसे कारक हैं जो सर्दी के मौसम की सेहत को ही खराब कर देते हैं। यह भी जानना जरूरी है कि अब मौसम धीरे-धीरे बदल रहा है और ऐसे में हवा में प्रदूषण के कण नीचे रह जाते हैं, जो सांस लेने में भी दिक्कत पैदा करते हैं। सबसे बड़ी बात धीरे-धीरे सभी पर्व व त्यौहारों के सार्वजनिक प्रदर्शन का प्रचलन बढ़ रहा है और इस प्रक्रिया में ये पावन-वैज्ञानिक पर्व लंपटों व लुच्चों का साध्य बन गए हैं। प्रतिमा लाना हो या विसर्जन, लफंगे किस्म के लड़के मोटरसाईिकल पर तीन-चार लदे-फदे, गाली गलौज, नशा, जबरिया चंदा वूसली, सड़क जामकर नाचना, लड़कियों पर फब्तियों कसना, कानून तोड़ना अब जैसे त्यौहारों का मूल अंग बनता जा रहा है। इस तरह का सामाजिक व सांस्कृतिक प्रदूषण नैसर्गिक प्रदूषण से कहीं कम नहीं है। सवाल खड़ा होता है कि तो क्या पर्व-त्यौहारों का विस्तार गलत है? इन्हें मनाना बंद कर देना चाहिए? एक तो हमें प्रत्येक त्यौहर की मूल आत्मा को समझना होगा, जरूरी तो नहीं कि बड़ी प्रतिमा बनाने से ही भगवान ज्यादा खुश होंगे! क्या छोटी प्रतिमा बना कर उसका विसर्जन जल-निधियों की जगह अन्य किसी तरीके से करके, प्रतिमाओं को बनाने में पर्यावरण मित्र सामग्री का इस्तेमाल करने जैसे प्रयोग तो किए जा सकते हैं। पूजा सामग्री में प्लास्टिक या पोलीथिन का प्रयोग वर्जित करना, फूल-ज्वारे आदि को स्थानीय बगीचे में जमीन में दबा कर उसका कंपोस्ट बनाना, चढ़ावे के फल , अन्य सामग्री को जरूरतमंदों को बांटना, बिजली की जगह मिट्टी के दीयों का प्रयोग ज्यादा करना, तेज ध्वनि बजाने से बचना जैसे साधारण से प्रयोग हैंं, जो पवोंर् से उत्पन्न प्रदूषण व उससे उपजने वाली बीमारियों पर काफी हद तक रोक लगा सकते हैं। पर्व आपसी सौहार्द बढ़ाने, स्नेह व उमंग का संचार करने के और बदलते मौसम में स्फूर्ति के संचार के वाहक होते हैं। इन्हें अपने मूल स्वरूप में अक्षुण्ण रखने की जिम्मेदारी भी समाज की है।

रविवार, 13 सितंबर 2015

An overview on vishw Hindi Sammelan Bhopal

उम्मीदों आशंकाओं  और बाजार की हिंदी-वैश्विकता 
                                                                                                                          पंकज चतुर्वेदी

राज एक्सप्रेस . म प्र १४ सितम्बर 15
जहां एक वीरान सा लाल मिट्टी वाला मैदान था, उसे खूबसूरत पंडाल से पाट दिया गया है। सैंकड़ों वातानुकूलित सयंत्र बाहर की 39 डिगरी तापमान को 18 तक सर्द बनाए हुए हैं। उद्घाटन सत्र में प्रधानमंत्री, तीन-तीन वरिष्ठ  केंबिनेट मंत्री -श्रीमती सुषमा  स्वराज, डा. हर्ष वर्धन और रविशंकर प्रसाद, दो राज्य मंत्री केरण रिजूज और वी के सिंह, तीन राज्यपाल- रामनरेष यादव, सुश्री मृदुला सिन्हा, और केषरीनाथ त्रिपाठी। दो राजयों के मुख्यमंत्री - शि वराज सिंह चौहान  व रघुवरदास, एक दर्जन से ज्यादा सांसद, मप्र के कई मंत्री व विधायक.......। ऐसे अवसर बहुत ही कम आते हैं जब इतने सारे अतिविशिष्ट लोग किसी गैरराजनीतिक अवसर पर एकसाथ जमा हों।  और इतने बड़े-बड़े लेागों को सुनने के लिए एकत्र जनता-जनार्दन भी कम नहीं है। वह तो समापन समारोह में प्रख्यात अभिनेता अमिताभ बच्चन के दांत के दर्द के कारण आने से मना कर दिया, वरना भीड़ को संभालना मुश्किल  हो जाता।
बड़े से आकर्षक  पंडाल में देश -दुनिया के हिंदी प्रेमी, लेखक तो थें ही, भोपाल शहर का पूरा भाजपा कैडर सम्मेलन की सुचारू व्यवस्था के लिए बतौर प्रबंधक उपस्थित रहा। यहां अलग-अलग रंग के प्रवेश  पत्र हैं-  कोक रंग के भूरे कार्डधारी विषिश्ट अतिथि यानि जिनके आवागनम, ठहरने, स्थानीय आवागमन, भेाजन आदि की व्यवस्था पूरी तरह सरकार ने की है। ऐसे लेाग ज्यादा से ज्यादा 200 होंगे। फिर थे हरे कार्ड वाले अतिथि,  ये केवल नाम के अतिथि हैं ये अपनी गांठ से पैसा लगा कर आए , अपनी जेब से होटल में ठहरे  और सम्मेलन स्थल तक आने जाने का व्यय भी खुद वहन किया । इनकी संख्या भी 500 से ज्यादा नहीं होगी।  फिर है नीले कार्ड वाले प्रतिनिधि- इनमें जिलों से आए, विभिन्न संस्थाओं से आए  व पंजीयन राशि  चुका कर आए लोग हैं। ये होंगे कोई दो हजार। कह सकते हैं कि लगभग तीन हजार लोग हिंदी सम्मेलन से सीधे जुड़े हुए हैं। अब सम्मेलन स्थल पर सबसे ज्यादा लेाग हैं जिनके गले में भगवा रंग का रिबन हैं और उसी ंरग का पास। ये हें प्रबंधक। ये सुरक्षा, भेाजन से ले कर सभी जगह पर छाए हुए हैं। और इनकी संख्या तीन हजार से कम नहीं होगी। इनमें कुछ बच्चे माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विष्वविद्यालय के भी हैं जिनकी ड्यूटी, समाचार बनाने, कुछ विशिष्ट  लोगों को एस्कार्ट करने में है।
परिसर में घुसते ही दो किस्म की प्रदर्शनी  थीं,- दीवाने आम और दीवाने खास । दीवाने खास यानि मध्यप्रदेश शा सन व सिहंस्थ पर प्रस्तुति। बेहतरीन तरीके से प्रस्तुत व वातानुकूलति। उसके ठीक सामने है- ‘‘हिंदी: कल आज और कल’’ के नाम से प्रदर्शनी । यही हिंदी का असली चैहरा है। प्रदर्शनी के पाष्र्व पर बेहद बुझे से रंग का गहरा नीला कपड़ा लगा दिया गया है जो रोशनी को भी सोख रहा है और वहां प्रदर्षित सामग्री की चटक को भी। चूंकि प्रदर्शनी का यह हिस्सा हिंदी की असली तस्वीर है सो घुसते से ही माईक्रो साॅफ्ट, एप्पल, गूगल, वेबदुनिया आदि बहुराष्ट्रीय  कंपनियों को स्थान दिया गया है। सबसे आखिर में भारत सरकार के शा सकीय प्रकाश कों- राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, प्रकाश न विभाग, साहित्य अकादेमी, केंद्रीय हिंदी निदेषालय, विज्ञान प्रसार आदि को रखा गया है। कहने की जरूरत नहीं कि यह हिस्सा वातानुकूलित  तो थे ही नहीं, प्रदर्षनी के पिछले हिस्से तक पंखे तक नहीं थे। यहां प्रदर्षित पुस्तकों की बिक्री की अनुमति भी नहीं थी। जहां तक ‘‘बाजार ’’ था, वहां तक लोगों की सहूलियत का खयाल रखा गया, जहां साहित्य या ज्ञान था, वहां अंधकार, गरमी और असहजता को छोड़ दिया गया।
चाय-काफी, पानी आदि की असीमित व्यवस्था। राज्य सरकार के मुख्यमंत्री व कई मंत्री लगभग सारा दिन यहीं रहते। विमर्षों के दौरान कभी भी कोई हाल खाली नहीं रहा। जहां कहीं कुर्सियां खाली दिखती, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विष्वविद्यालय व अटल बिहारी हिंदी विष्वविद्यालय के बच्चों की खेप तत्काल भेज दी जाती। हां, चर्चा के लिए बने हाॅल इतने करीब थे कि एक सत्र की आवाजें दूसरे हाॅल में जाती थीं और कई बार इससे व्यवधान भी होता। विभिन्न योजनओं के तह हिंदी सीख रहे विदेषी बच्चे मीडिया के आकर्शण का केेंद्र रहे। उल्लेखनीय है कि पत्रकारों को विभिन्न सत्रों में प्रवेष की अनुमति नहीं थी, उन्हें दिन भर हुए विमर्ष की जानकारी एकत्र करने के लिए तीन बजे होने वाले संवाददाता सम्मेलन का इंतजार करना पड़ रहा था।
सम्मेलन के लिए विदेष मंत्रालय के भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिशद की पत्रिका ‘‘गगनांचल’’ का उल्लेख भी बेहद अहम हैं क्योंकि इसका विमोचन स्वयं प्रधानमंत्री ने किया था। इसके संपादक ने अपने उद्बोधन में लिखा है ‘‘लवस्कार‘‘ पता नहीं यह प्रूफ की गलती है या फिर ‘‘हिंगलिष’’ का भोंडा प्रदर्षन। पत्रिका में पू्रूफ और संपादन की अपार गलतियां हैं। एक ही पेज पर ‘‘हिंदी ’’ कहीं बिंदी से लिखा है तो अगली पंक्ति में ही आधे ‘न’ से। एकरूपता, संक्षिप्तता और सहजता के मूल संपादकीय सिद्धांतों की खेले आम ‘‘हिंदी’’ की गई है। यह पत्रिका सभी विदेषी मंत्रालयों, हिंदी प्रषिक्षण केंद्र जाते हैं और यह हिंदी सम्मेलन के प्रति गंभीरता की बानगी है। वहींे विदेष मंत्रालय द्वारा प्रकाषित स्मारिका,  और ‘‘जोहान्सबर्ग से आगे’’ पुस्तक, राश्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा सभी अतिथियों को भेंटस्वरूप दी गई पुस्तक ‘‘हिंदी भाशाःस्वरूप, षिक्षण और वैष्विकता’’ बेहद स्तरीय व संग्रहणीय हैं।
हिंदी सम्मेलन का अगला हिस्सा था, विभिन्न हिंदी विद्वानों के नाम पर बने सभागार और जहां तक हिंदी सम्मेलन के सत्रों का सवाल है वे बेहद महत्वपूर्ण विशयों पर थे - सभी निहायत व्याहवारिक और परिणामोन्मुखिी और चूंिक सभी सत्रों की अध्यक्षता या वक्ता राज्यपाल से ले कर केंद्रीय मंत्री तक ने की  तो जाहिर है कि यहां व्यक्त किए गए विचार व सुझावों को  क्रियान्वयन स्तर तक ले जाने में कोई दिक्कत नहीं होगी। हां कुछ सत्रों में वक्ता ऐसे भी हैं जिनका उस क्षेत्र में योगदान या अनुभव उतना नहीं है जितना कि अन्य लोगों का है, ऐसे विशय में एक सबसे महत्वपूर्ण है-बाल साहित्य।  विदेषों में हिंदी षिक्षण को लेकर सत्र का आयोजन वास्तव में हिंदी के वैष्विक प्रसार का सार्थक कदम हैं तो विदेष नीति में हिंदी, भाशा के कूटनीतिक महत्व का नया आयाम है। विदेष नीति में हिंदी को लेकर आयोजित सत्र में कई महत्वपूर्ण सुझाव भी आए जिनमें विदेषी दूतावासों में हिंदी में कामकाज, पासपोर्ट में अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी आदि । हिंदी में प्रकाषन वाले सत्र के दौरान विदेषों मे ंरहने वाले हिंदी प्रेमियों की कृतियों के प्रकाषन की व्याहवारिक दिक्कतों पर बेहद परिणामदायी विमर्ष हुआ। प्रषासन और अदालतों में हिंदी पर भी महत्वपूर्ण सत्र रहे और यहां से निकले सुझावों पर अमल षुरू हुआ तो आम लोगों को इस सम्मलेन का महत्व पता चलेगा और लोगों को अहसास होगा कि जनता द्वारा चुकाए गए करों से आयोजित करोड़ों रूपए के व्यय वाले सम्मेलनों में भले ही उन्हें प्रवेष ना मिला हो, लेकिन भीतर जो विमर्ष हुए और जो परिणाम निकले, वह उनके लिए ही थे। इसमें कोई नहीं कि अपनी भव्यता और भीड़ के लिए 10वंा विष्व हिंदी सम्मेलन सालों तक याद रहेगा।

गुरुवार, 10 सितंबर 2015

Our wariors of 71 war will never come back

तो अब कभी भी लौटेंगे हमारे 1971 के जांबाज


                                                                                      पंकज चतुर्वेदी
एक सितंबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने जो जवाब दिया, उससे तो स्पष्ट हो गया है कि इंतजार, उम्मीदों के 44 साल बेकार गए और सन 1971 में पाकिस्तान युद्ध के दौरान देश का इतिहास ही नहीं, विश्व का भूगोल बदलने वाले वे 54 रणबांकुरे कभी लौट कर घर नहीं आऐंगे, जो पाकिस्तानी जेलों में थे। भारत के कई प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान की जेलों में गए, संसद में कम से कम 24 बार सरकार कहती रही कि हमारे बहादुर जवानों के पाकिस्तान में होने की संभावना है। लेकिन अब सरकार ने भी कह दिया कि चूंकि पाकिस्तान अपनी जेलों में किसी भी युद्ध बंदी की मौजूदगी से इनकार करता है, सो उनमें से कोई जीवित नहीं है। जानकर आश्चर्य होगा कि उन 54 में से तीन का कोई सेवा रिकार्ड भी उपलब्ध नहीं है, जाहिर है कि ऐसे में उनके परिवारों को पेंशन व अन्य सुविधाएं मिलना भी मुश्किल होगा। ऐसा नहीं है कि हमारे 54 रणबांकुरों के पाकिस्तानी जेलों में होने की बात महज संभावना के आधार पर उठाई जाती रही हो। उन जवानों के परिवारीजन अपने लोगों के जिंदा होने के सबूत भी देते हैं, लेकिन भारत सरकार महज औपचारिकता निभाने से अधिक कुछ नहीं करती है। इस बीच ऐसे फौजियों की जिंदगी पर बालीवुड में कई फिल्में बन गई हैं और उन्हें दर्शकों ने सराहा भी। लेकिन वे नाम अभी भी गुमनामी के अंधेरे में हैं, जिन्हें न तो शहीद माना जा सकता है और न ही गुमशुदा।उम्मीद के हर कतरे की आस में तिल-दर-तिल घुलते इन जवानों के परिवारीजन अब लिखा-पढ़ी करके थक गए हैं। दिल मानता नहीं है कि उनके अपने भारत की रक्षा वेदी पर शहीद हो गए हैं। 1971 के युद्ध के दौरान जिन 54 फौजियों के पाकिस्तानी गुनाहखानों में होने के दावे हमारे देशवासी करते रहे हैं, उनमें से 40 का पुख्ता विवरण उपलब्ध हैं। इनमें 6 मेजर, 1 कमांडर, 2 फ्लाइंग आफिसर, 5 कैप्टन, 15 फ्लाइट लेफ्टिनेंट, 1 सेकेंड फ्लाइट लेफ्टिनेंट, 3 स्कावर्डन लीडर, 1 नेवी पालयट कमांडर, 3 लांसनायक, और 3 सिपाही हैं।एक लापता फौजी मेजर
MP jansandesh 12-9-15
अशोक कुमार सूरी के पिता डॉ. आरएलएस सूरी के पास तो कई पक्के प्रमाण हैं, जो उनके बेटे के पाकिस्तानी जेल में होने की कहानी कहते हैं। डॉ. सूरी को 1974 व 1975 में उनके बेटे के दो पत्र मिले, जिसमें उसने 20 अन्य भारतीय फौजी अफसरों के साथ, पाकिस्तान जेल में होने की बात लिखी थी। 1979 में डॉ. सूरी को किसी अंजान ने फोन करके बताया कि उनके पुत्र को पाकिस्तान में उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रदेश की किसी भूमिगत जेल में भेज दिया गया है। मेजर सूरी सिर्फ 25 साल की उम्र में ही गुम होने का किस्सा बन गए। पाकिस्तान जेल में कई महीनों तक रहने के बाद लौटे एक भारतीय जासूस मोहन लाल भास्कर ने, लापता विंग कमाडंर एचएस गिल को एक पाक जेल में देखने का दावा किया था। लापता फ्लाईट लैफ्टिनेंट वीवी तांबे को पाकिस्तानी फौज द्वारा जिंदा पकड़ने की खबर ‘संडे पाकिस्तान आब्जर्वर’ के पांच दिसंबर 1971 के अंक में छपी थी। वीर तंाबे का विवाह बैडमिंटन की राष्ट्रीय चैंपियन रहीं दमयंती से हुआ था। शादी के मात्र डेढ़ साल बाद ही लड़ाई छिड़ गई थी। तब से 44 साल हो गए, दमयंती अपने पति की राह देख रही हैं। सेकेंड लेफ्टिनेंट सुधीर मोहन सब्बरवाल जब लड़ाई के लिए घर से निकले थे, तब मात्र 23 साल उम्र के थे। कैप्टर रवींद्र कौरा को अदम्य शौर्य प्रदर्शन के लिए सरकार ने वीर चक्र से सम्मानित किया था, लेकिन वे अब किस हाल में और कहां हैं, इसका जवाब देने में सरकार असफल रही है।पाकिस्तान के मरहूम प्रधानमंत्री जुल्फकार अली भुट्टो को फांसी दिए जाने के तथ्यों पर छपी एक किताब भारतीय युद्धवीरों के पाक जेल में होने का पुख्ता सबूत मानी जा सकती है। बीबीसी संवाददाता विक्टोरिया शोफील्ड की किताब ‘भुट्टो: ट्रायल एंड एक्सीक्यूशन’ के पेज 59 पर भुट्टो को फांसी पर लटकाने से पहले कोट लखपतराय जेल लाहौर में रखे जाने का जिक्र है। किताब में लिखा है कि भुट्टो को पास की बैरक से हृदयविदारक चीख पुकार सुनने को मिलती थीं। भुट्टो के एक वकील ने पता किया था कि वहां 1971 के भारतीय युद्ध बंदी हैं। जो लगातार उत्पीड़न के कारण मानसिक विक्षिप्त हो गए थे। सुप्रीम कोर्ट में सरकार के सालिसिटर जनरल ने यह भी कहा कि यह मामला अंतरराष्ट्रीय अदालत में नहीं ले जाया जा सकता। यहां पता चलता है कि युद्ध के बाबत संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्धारित कायदे कानून महज कागजी दस्तावेज हैं। इनका क्रियान्वयन से कोई वास्ता नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के विएना समझौते में साफ जिक्र है कि युद्ध के पश्चात, रेडक्रास की देखरेख में तत्काल सैनिक अपने-अपने देश भेज दिए जाएंगे। दोनों देश आपसी सहमति से किसी तीसरे देश को इस निगरानी के लिए नियुक्त कर सकते हैं। इस समझौते में सैनिक बंदियों पर क्रूरता बरतने पर कड़ी पाबंदी है। लेकिन भारत-पाक के मसले में यह कायदा-कानून कहीं दूर-दूर तक नहीं दिखा। 1972 में अतंरराष्ट्रीय रेडक्रास ने भारतीय युद्ध बंदियों की तीन लिस्ट जारी करने की बात कही थी। लेकिन सिर्फ दो सूची ही जारी की गईं।
प्रभात, मेरठ 13 सितंबर 15
एक गुमशुदा फ्लाइंग आफिसर सुधीर त्यागी के पिता आरएस त्यागी का दावा है कि उन्हें खबर मिली थी कि तीसरी सूची में उनके बेटे का नाम था। लेकिन वो सूची अचानक नदारद हो गई।भारत सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारी मानते रहे हैं कि हमारी फौज के कई जवान पाक जेलों में नारकीय जीवन भोग रहे हैं। उन्हें शारीरिक यातनाएं दी जा रही हैं। करनाल के करीम बख्श और पंजाब के जागीर सिंह का पाक जेलों में लंबी बीमारी व पागलपन के कारण निधन हो गया। 1971 की लड़ाई में पाकिस्तान द्वारा युद्ध बंदी बनाया गया सिपाही धर्मवीर 1981 में जब वापस आया तो पता लगा कि यातनाओं के कारण उसका मानसिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया है। लापता फौजियों के परिवारीजनों का दावा है कि कुछ युद्ध बंदी कोट लखपतराय लाहौर, फैसलाबाद, मुलतान, मियांवाली और बहावलपुर जेल में हैं। पर दावों पर राजनीति के दांवपंच हावी हैं।विएना समझौता के तहत सैनिकों के मारे जाने के बाबत जो प्रमाण होने चाहिए, पाकिस्तान सरकार उनमें से एक भी प्रमाण इन 54 जवानों के लिए दे नहीं पाई है। अलबत्ता पाकिस्तान सरकार ने लापता फौजियों को जेल में पहचानने के लिए एक भारतीय प्रतिनिधिमंडल को आने का न्यौता दिया था। पाकिस्तान के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को भी जेल दिखाने के नाटक किए जाते रहे। लेकिन अपनी एक गलती छिपाने के लिए पकिस्तान सरकार ने भारतीय अभिभावकों के सामने 160 साधारण भारतीय बंदी शिनाख्त के लिए पेश किए। इनमें से एक भी फौजी नहीं था। जेल अधिकारियों ने ही दबी जुबान में कह दिया कि उन्हें गलत जगह भेजा गया है। भारत की सरकार लापता फौजियों के परिवारीजनों को अभी तक सिर्फ आस दे रही थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में दायर जवाब के बाद वह उम्मीद भी टूट गई है। काश, 1971 की लड़ाई जीतने के बाद भारत ने पाकिस्तान के 93,000 बंदियों को रिहा करने से पहले अपने एक-एक आदमी को वापस लिया होता। पूरे पांच साल तक प्रधानमंत्री रहे पीवी नरसिंहराव भी भूल चुके थे कि उन्होंने जून 90 में बतौर विदेश मंत्री एक वादा किया था कि सरकार अपने बहादुर सैनिक अधिकारियों को वापस लाने के लिए कोई भी कीमत चुकाने को तैयार हैं। लेकिन देश के सर्वोच्च पद पर रहने के दौरान अपनी कुर्सी बचाने के लिए हर कीमत चुकाने की व्यस्तता में उन्हें उन सैनिक परिवारों के आंसुओं की नमी का एहसास तक नहीं हुआ।44 साल के लंबे अंतराल में हमारा लंबा-चौड़ा प्रशासनिक व गुप्तचर तंत्र, उन वीरों की वापसी तो दूर की बात है, वो प्रमाण भी सरकारी तौर पर मुहैया नहीं करवा पाया है, जिसके बूते पर हमारे जवानों के सलामत पाकिस्तानी जेल में होने का दावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किया जा सकता और अब सभी उम्मीदों के दरवाजे हमेशा के लिए बंद कर दिए गए।


flood :Eating growing economy of India

देश को पीछे ढकेलता सैलाब

राष्‍ट्रीय सहारा , 10 सितंबर 15

                                                   पंकज चतुर्वेदी
पिछले कुछ सालों के आंकड़ें देखें तो पाएंगे कि बारिश की मात्रा भले ही कम हुई है, लेकिन बाढ़ से तबाह हुए इलाके में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। कुछ दशक पहले जिन इलाकों को बाढ़ से मुक्त क्षेत्र माना जाता था, अब वहां की नदियां भी उफनने लगी हैं। हालांकि मौसम बीतते ही उन इलाकों में फिर पानी का संकट छा जाता है वर्ष 1995-2005 के दशक के दौरान बाढ़ से हुए नुकसान का सरकारी अनुमान 1805 करोड़ था जो अगले दशक यानी 2005-2015 में 4745 करोड़ हो गया है। यह आंकड़ा ही बानगी है कि बाढ़ किस निर्ममता से हमारी अर्थव्यवस्था को चट कर रही है
कड़ों में देखें तो देश के बड़े हिस्से में मानसून नाकाफी रहा है, लेकिन जहां जितना पानी बरसा है, उसने अपनी तबाही का दायरा बढ़ा दिया है। पिछले कुछ सालों के आंकड़ें देखें तो पाएंगे कि बारिश की मात्रा भले कम हुई है, लेकिन बाढ़ से तबाह इलाके में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। कुछ दशक पहले जिन इलाकों को बाढ़मुक्त क्षेत्र माना जाता था, अब वहां की नदियां भी उफनने लगी हैं। हालांकि मौसम बीतते ही उन इलाकों में पानी का संकट छा जाता है। असल में बाढ़ महज एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि देश के गंभीर पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक संकट का कारक बन गई है। हमारे पास बाढ़ से निबटने को महज राहत कार्य या यदा-कदा कुछ बांध या जलाशय निर्माण का विकल्प है, जबकि बाढ़ के विकराल होने के पीछे नदियों का उथला होना, जलवायु परिवर्तन, बढ़ती गर्मी, रेत खनन और जमीन का कटाव जैसे कई कारण दिनों-दिन गंभीर होते जा रहे हैं। जिन सड़कों, खेत या इमारतों को बनाने में दशकों लग जाते हैं, उसे बाढ़ का पानी पलक झपकते उजाड़ देता है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 1951 में भारत की बाढ़ग्रस्त भूमि की माप एक करोड़ हेक्टेयर थी। 1960 में यह ढ़ाई करोड़ हेक्टेयर हो गई। 1978 में बाढ़ से तबाह जमीन 3.4 करोड़ हेक्टेयर थी। आज देश के कुल 329 मिलियन (दस लाख) हेक्टेयर में से चार करोड़ हेक्टेयर इलाका बाढ़ की चपेट में हर साल बर्बाद होता है। 1995-2005 के दशक के दौरान बाढ़ से हुए नुकसान का सरकारी अनुमान 1805 करोड़ था जो अगल दशक यानी 2005-2015 में 4745 करोड़ हो गया है। यह आंकड़ा ही बानगी है कि बाढ़ किस निर्ममता से हमारी अर्थव्यवस्था चट कर रही है। बिहार का 73 प्रतिशत हिस्सा आधे साल बाढ़ और शेष दिन सुखाड़ का दंश झेलता है और यही वहां के पिछड़ेपन, पलायन और परेशानियों का कारण है। यह विडंबना है कि राज्य का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा नदियों के रौद्र रूप से पस्त रहता है। असम में इन दिनों 18 जिलों के कोई साढ़े सात लाख लोग नदियों के रौद्र रूप के चलते घर-गांव से पलायन कर गए है और ऐसा हर साल होता है। अनुमान है कि यहां सालाना कोई 200 करोड़ का नुकसान होता है जिसमें मकान, सड़क, मवेशी, खेत, पुल, स्कूल, बिजली, संचार आदि शामिल हैं। मूलभूत सुविधाएं खड़ा करने में दस साल लगते हैं, जबकि हर साल औसतन इतना नुकसान हो जाता है। यानी असम हर साल विकास की राह पर 19 साल पिछड़ता जाता है। केंद्र हो या राज्य, सरकारों का ध्यान बाढ़ के बाद राहत कायरे व मुआवजे पर होता है। 
lokmat samachar maharashtra
आजादी के 67 साल बाद भी हम बाढ़ नियंतण्रकी कोई मुकम्मल योजना नहीं दे पाए हैं। यदि इस अवधि में राज्य में बाढ़ से हुए नुकसान व बांटी गई राहत राशि को जोड़ें तो पाएंगे कि इतने धन में एक नया सुरक्षित असम खड़ा हो सकता था। देश को सबसे ज्यादा सांसद देने वाले उत्तर प्रदेश की उर्वरा धरती, कर्मठ लोग, अयस्क व अन्य संसाधनों के बावजूद विकास की सही तस्वीर न उभर पाने का एक बड़ा कारण हर साल आने वाली बाढ़ से होने वाला नुकसान भी है। बीते एक दशक के दौरान राज्य में बाढ़ के कारण 45 हजार करोड़ रपए कीमत की तो महज खड़ी फसल नष्ट हुई है। सड़क, सार्वजनिक संपत्ति, इंसान, मवेशी आदि के नुकसान अलग हैं। राज्य सरकार की रपट को भरोसे लायक मानें तो 2013 में राज्य में नदियों के उफान के कारण 3259.53 करोड़ का नुकसान हुआ था जो आजादी के बाद का सबसे बड़ा नुकसान था। अब तो देश के शहरी क्षेत्र भी बाढ़ की चपेट में आ रहे हैं। इसके कारण भौतिक नुकसान के अलावा मानव संसाधन का जाया होना तो असीमित है। सनद रहे कि देश के 800 से ज्यादा शहर नदी किनारे बसे हैं। कई ऐसे कस्बे जो अनियोजित विकास की पैदाइश हैं, शहरी नालों के कारण बाढ़ग्रस्त हो रहे हैं। 1953 से लेकर 2010 तक हम बाढ़ के उदर में 8,12,500 करोड़ रपए फूंक चुके हैं जबकि बाढ़ उन्मूलन के नाम पर व्यय राशि 1,26,000 करोड़ है। यह धनराशि मनरेगा के एक साल के बजट का करीब चार गुना है। आमतौर पर यह धनराशि नदी प्रबंधन, बाढ़ चेतावनी केंद्र बनाने और बैराज बनाने पर खर्च की गई लेकिन सभी उपाय बेअसर ही रहे हैं। आने वाले पांच साल के दौरान बाढ़ उन्मूलन पर होने वाले खर्च का अनुमान 57 हजार करोड़ आंका गया है। सनद रहे कि हम अब तक एक सदी पुराने र्ढे पर बाढ़ को देख रहे हैं, यानी कुछ बांध या तटबंध बनाना, कुछ राहत सामग्री बांट देना, कुछ ऐसे कार्यालय बना देना जो बाढ़ की आशंका की सूचना लोगों को दे सकें। बारिश के बदलते मिजाज, भू-उपयोग के तरीकों में बदलाव ने बाढ़ के संकट को जिस तरह बदला है, उसे देखते हुए तकनीक व योजना में आमूल-चूल परिवर्तन जरूरी है। वैसे शहरीकरण, वन विनाश और खनन तीन प्रमुख कारण बाढ़ विभीषिका में उत्प्रेरक का कार्य कर रहे हैं। प्राकृतिक हरियाली उजाड़ कंक्रीट का जंगल सजाया जाता है तो जमीन की जल सोखने की क्षमता तो कम होती ही है, सतही जल की बहाव क्षमता भी कई गुना बढ़ जाती है। शहरीकरण के कूड़े ने भी समस्या बढ़ायी है। यह कूड़ा नालों से होते हुए नदियों में पहुंचता है। इससे नदी की जल ग्रहण क्षमता कम होती है।पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश अनियंत्रित शहरीकरण के कारण ही बाढ़ग्रस्त हो रहे हैं। इससे वहां भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं और इसका मलबा भी नदियों में ही जाता है। पहाड़ों पर खनन से दोहरा नुकसान है। इससे वहां की हरियाली उजड़ती है और फिर खदानों से निकली धूल और मलबा नदी-नालों में अवरोध पैदा करता है। हिमालय से निकलने वाली नदियों के मामले में तो मामला और गंभीर हो जाता है। सनद रहे कि हिमालय, पृवी का सबसे कम उम्र का पहाड़ है। इसकी विकास प्रक्रिया जारी है, तभी इसे ‘‘जीवित-पहाड़’ भी कहा जाता है। यहां का बड़ा भाग कठोर-चट्टान न होकर, कोमल मिट्टी है। बारिश या बर्फ के पिघलने पर, जब पानी नीचे की ओर बहता है तो साथ में पर्वतीय मिट्टी भी बहा लाता है। पर्वतीय नदियों में आई बाढ़ के कारण यह मिट्टी नदी के तटों पर फैल जाती है। इनका पानी जिस तेजी से चढ़ता है, उसी तेजी से उतर जाता है। इसके कारण नदियों के तट बेहद उपजाऊ हुआ करते हैं। लेकिन अब नदियों को जगह-जगह बांधा जा रहा है, सो बेशकीमती मिट्टी अब बांधों में ही रुक जाती है और नदियों को उथला बनाती रहती है। साथ ही पहाड़ी नदियों में पानी चढ़ तो जल्दी जाता है, पर उतरता धीरे-धीरे है।मौजूदा हालात में बाढ़ महज प्राकृतिक प्रकोप नहीं, बल्कि मानवजन्य साधनों का त्रासदी है। ऐसे में बाढ़ के बढ़ते सुरसा-मुख पर अंकुश लगाने के लिए शीघ्र कुछ करना होगा। कुछ लोग नदियों को जोड़ने में इसका निराकरण खोज रहे हैं। हकीकत में नदियों के प्राकृतिक बहाव, तरीकों, विभिन्न नदियों के ऊंचाई-स्तर में अंतर जैसे विषयों का हमारे यहां कभी निष्पक्ष अध्ययन नहीं किया गया और इसी का फायदा उठा उछ ठेकेदार, सीमेंट के कारोबारी और भूमाफिया इस तरह की सलाह देते हैं। पानी को स्थानीय स्तर पर रोकना, नदियों को उथला होने से बचाना, बड़े बांध पर पाबंदी, नदियों के करीबी पहाड़ों की खुदाई पर रोक और नदियों के प्राकृतिक मार्ग से छेड़छाड़ रोकना कुछ ऐसे सामान्य प्रयोग हैं जो बाढ़ सरीखी भीषण विभीषिका का वाजिब जवाब हो सकते हैं।

बुधवार, 9 सितंबर 2015

Quality of Hindi books must be maintain for Hindi promotion

गुणवत्ता आधारित कृतियों का ही प्रकाशन हो

पंकज चतुर्वेदी

7बात कुछ साल पहले की है। एक छोटे से प्रकाशक ने नई दिल्ली के आईटीओ के करीब हिंदी भवन में पूरे दिन का साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित किया। कुछ पुस्तकों का लोकार्पण, कुछ चर्चाएं, कविता पाठ और कुछ राजनेताओं का अभिनंदन भी। नारायण दत्त तिवारी से लेकर डॉ गिरजा व्यास तक अलग- अलग सत्रों में अतिथि थे। हर बार मालाएं पहनाई जातीं, नेताओं की ठकुर सुहाती और फिर चमकीले कागज में लिपटी किताबों को खोला जाता। इतने बड़े हॉल में श्रोता जुटाना प्रत्येक सत्र की समस्या था। कुछ नेताओं के चमचे-कलछी, लोकार्पित पुस्तकों के लेखकों के नाते-रिश्तेदार, प्रकाशक के दूर-करीब के सभी नातेदार (जिनका साहित्य या पठन से दूर-दूर तक वास्ता नहीं था), इस तरह बमुश्किल 100 लोग जुटते थे। चूंकि प्रत्येक सत्र के बाद स्वल्पाहार की व्यवस्था थी, अत: सत्र समाप्त होते-होते हाल भरने लगता। आखिरी सत्र था- हिंदी पर संकट। सत्र में
Peoples Samachar MP 10-9-15
बामुश्किल 20 लोग थे। दिसंबर की सर्दी थी और ढलती शाम में खुले आंगन में गरम-गरम मिक्स पकौड़ों का दौर चलने लगा। भीड़ इतनी कि एक-एक पकौड़े के लिए मारा- मार मची थी। तभी अपनी प्लेट और दूसरे की प्लेट से अपने कपड़े संभालते हुए हिंदी के वरिष्ठ आलोचक डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी ने ठहाका लिया, ‘‘जब तक हमारे देश में पकौड़े हैं, हिंदी को कोई संकट नहीं है।’’ कई लोगों की हंसी हवा में गूंजी। लेकिन डॉ त्रिपाठी की बात वैसे ही आई-गई हो गई, जैसे कि पूरे देश में हर साल होने वाली हजारों साहित्यिक गोष्ठियों में लिए गए संकल्प और नारे कुछ ही घंटों में सुप्त हो जाते हैं। आमतौर पर हिंदी के अधिकांश लेखक, प्रकाशक यहां तक कि पाठक भी हिंदी-जगत की दयनीयता का रोना रोते देखे जाते हैं। प्रकाशक कहता है कि हिंदी में किताबें बिकती नहीं हैं, लेकिन वह बड़े-बड़े लोकार्पण समारोहों में खूब पैसा बहाता है। लेखक अपनी गरीबी का रोना रोता दिखता है, लेकिन अपनी गांठ के पैसे से किताब छपवा कर यार-दोस्तों में वितरित करने के लोभ-संभरण से बच नहीं पाता है। पाठक अच्छी किताबों की कमी का रोना रोता है, लेकिन सौ रूपए से अधिक की कितबा खरीदने पर घर का बजट बिगड़ने की दुहाई देने लगता है। हां ! साहित्य से जुड़े तीनों वर्ग यह कहते नहीं अघाते हैं कि वे तो साहित्य-सेवा के लिए प्रतिबद्ध हैं, सो घर फंूक तमाशा देख रहे हैं। लेकिन इस ‘दरिद्रता’ की हकीकत ये आंकड़े उजागर करते हैं- हमारे देश में हर साल लगभग 85 हजार पुस्तकें छप रही हैं, इनमें 25 प्रतिशत हिंदी, 20 प्रतिशत अंग्रेजी और शेष 55 प्रतिशत अन्य भारतीय भाषाओं में हैं। लगभग 16 हजार प्रकाशक सक्रिय रूप से इस कार्य में लगे हैं। प्रकाशक के साथ, टाईप सेंटर, संपादक, प्रूफ रीडर, बाईंडिग, कटिंग, विपणन जैसे कई अन्य कार्य भी जुडेÞ हैं। जाहिर है कि यह समाज के बड़े वर्ग के रोजगार का भी साधन है। विश्व बाजार में भारतीय पुस्तकों का बेहद अहम स्थान है। एक तो हमारी पुस्तकों की गुणवत्ता बेहतरीन है, दूसरा इसकी कीमतें कम हैं। भारतीय पुस्तकें विश्व के 130 से अधिक देशों को निर्यात की जाती हैं। हाल ही में नई दिल्ली में संपन्न पुस्तक मेले में हिंदी के प्रकाशकों को एक साथ एक हॉल में रखा गया था। गिनती के 10 प्रकाशकों के यहां जम कर भीड़ होती थी। वहां नामचीन लेखक सारा-सारा दिन बिताते थे। हर शाम चमकीली पन्नी में लिपटी किताबों के लोकार्पण की औपचारिकता होती थी। ना किताब पर विमर्श, ना ही उसकी विषय-वस्तु पर चर्चा, और ना ही उसकी तुलना। बस लेखक की महानता पर कुछ जुमले और उसके बाद आसपास के सोशलाईट क्लब या होटलों की ओर जाता एक काफिला। शराब, खाना, निंदा-रस का पान और उसी के बीच किताबों की थोक सप्लाई की जुगत। कई बार किसी पाठ्य-पुस्तक में अपनी किताब फंसाने की जोड़- तोड़। ऐसे तो हो गया भाषा व साहित्य का विकास। मेला हो या फिर गोष्ठियां, वातानुकूलित परिवेश में भी पसीने से तर-बतर लोकार्पण करते और पुस्तकें बिकने के लिए सरकार, समाज और टीवी को कोसते इन बुजुर्गवार से जब पूछो कि आप इतनी मेहनत क्यों कर रहे हैं? तत्काल संत बन जाते हैं - ‘‘ हम तो हिंदी की, साहित्य की सेवा कर रहे हैं।’’ तो क्या साहित्य इतना दयनीय हो गया है कि उसे सेवा की जरूरत पड़ रही है? साहित्य तो पहले समाज को दिशा और दशा देने का साधन था। अब क्या साहित्य ही दीन-हीन हो गया है? बीते दो दशकों के दौरान सूचना और ज्ञान का विस्फोट हुआ। इंटरनेट पर करोड़ों अरबों पेज सूचनाएं भरी हुई हैं- इसमें कई करोड़ साहित्य से संबंधित हैं, विश्व साहित्य से संबंधित। युग आ गया तुलना का और उसमें श्रेष्ठ के आगे बढ़ने का। कुछ दशकों पहले तक शिक्षा समाज के एक सीमित वर्ग का हक हुआ करता था। ऐसे मनुवादियों के बोले-लिखे गए शब्द ब्रह्म वाक्य होते थे। वे क्या कह या लिख रहे हैं उसका आकलन करने वाले सामित थे, वैश्विक स्तर पर उसकी तुलना करने वाले तो विरले ही थे। विज्ञान और तकनीकी ने उस ‘ज्ञान के एकाधिकार’ को समाप्त कर दिया है। ऐसे में खुद को बाजार में दिखाने, अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने और अपने लेखन को विशिष्ट बताने के लिए कुछ लेखकों ने गोष्ठियों का सहारा ले रखा है। यदि देशभर की सरकारी गोष्ठियों का आकलन करें तो पाएंगे कि वही 100-50 चेहरे कभी मंचासीन होते हैं तो कहीं सामने कुर्सियों पर और उन्हीं में से कुछ शाल ओढ़ कर नारियल व चैक पकड़ते दिख जाएंगे। कुछ बड़े प्रकाशक बड़े ही शातिर अंदाज में अपनी पुस्तकों के लोकार्पण समारोहों का आयोजन करते हैं। उसमें आमंत्रित एक-एक व्यक्ति उनकी पुस्तकों की थोक बिक्री के माध्यम होते हैं। हाल ही में दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हिंदी की एक लेखिका के कैलाश मानसरोवर यात्रा के संस्मरणों की पुस्तक का लोकार्पण हुआ। आमंत्रण कार्ड पर बड़े ही सुगठित शब्दों में कार्यक्रम के पश्चात रसरंजन के लिए आमंत्रण का उल्लेख था। कितना निरीह है हिंदी का प्रकाशन जगत और कितनी साहित्य सेवा हो रही है? हिंदी प्रकाशन जगत के साथ सबसे बड़ी समस्या है, प्रकाशक बनने के लिए किसी प्रकार का कोई बंधन या कानून ना होना। कोई भी व्यक्ति कभी-भी अपने नाम से घर के पते से या गुमनाम पते से प्रकाशक बन सकता है। एक ही प्रकाशक कई-कई अलग-अलग नामों से पुस्तकें छाप सकता हैं। ना तो किसी पंजीयन की जरूरत है और ना ही किसी निरीक्षण या नियंत्रण का डर। जिस किसी को भ्रम हो गया कि वह लेखक बन सकता है, अपने माता-पिता, गुरू या प्रेयसी को समर्पित कर एक पुस्तक छाप डालता है। इनमें कवियों की संख्या बहुत बड़ी है। और ऐसे लेखकों की आत्मसंतुष्टि साहित्यिक आयोजन के नाम पर कुछ लोगों को जुटाने व उन्हें खिलाने-पिलाने का जरिया होती है। गोष्ठी में लेखक की तारीफ होती है, रचना का उल्लेख तक नहीं होता। यदि रसरंजन की व्यवस्था हो तो लेखक की तुलना प्रेमचंद या निराला से करने की हिमाकत करने से भी नहीं चूकते हैं। इस तरह के आयोजनों और पुस्तकों के प्रकाशन के कई दूरगामी खतरे हैं: 1.अच्छी पठन सामग्री ऐसी अधकचरा पुस्तकों के बीच कहीं छिप जाती हैं। लगातार स्तरहीन पुस्तकें देखने के बाद आम पाठक का ध्यान पठन से भटक जाता है। 2. गोष्ठियों में उठाए गए मुद्दों पर जब अमल होता नहीं देखते हैं तो नए लेखकों, पाठकों और आम लोगों के मन में पुस्तकें व लेखकों के प्रति अविश्वास का भाव उसी तरह जाग जाता है, जैसा वे राजनेताओं के बारे में सोचते हैं। 3. फिजूलिया प्रकाशनों से कागज का अपव्यय होता है, जोकि सीधे-सीधे पर्यावरणीय संकट को बढ़ावा देता है। इसका विपरीत असर बाजार में कागज के मूल्यों में वृद्धि के रूप में छात्रों व अन्य प्रकाशकों को भी झेलना पड़ता है। 4. स्तरहीन आयोजन समय, श्रम और संसाधन की फिजूलखर्ची होते हैं। कई बार अच्छे पाठक व लेखक ऐसे आयोजनों से केवल इस लिए दूर हो जाते हैं कि ऐसे आयोजनों की कुख्याति होती है।
                                                                                                                                                                    (आलेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं।)
                                              

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