तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2015

Mental health needs serious attention of society


हम भी इंसान हैं ?

MP Jansandesh 30-10-15
                                पंकज चतुर्वेदी
बढ़ती जरूरतें, जिंदगी में बढ़ती भागदौड़, रिष्तों के बंधन ढ़ीले होना; इस दौर की कुछ ऐसी त्रासदियां हैं जो इंसान को भीतर ही भीतर खाए जा रही है। ये सब ऐसे विकारों को आमंत्रित कर रहा है, जिनके प्रारंभिक लक्षण नजर आते नहीं हैं, जब मर्ज बढ़ जाता है तो बहुत देर हो चुकी होती है। विडंबना है कि सरकार में बैठे नीति-निर्धारक मानसिक बीमारियों को अभी भी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं।  इसे हास्यास्पद कहें या शर्म कि ‘जय विझान’ के युग में मनोविकारों को एक रोग के बनिस्पत ऊपरी व्याधा या नियति समझने वालों की संख्या बहुत अधिक है । तभी ऐसे रोगों के इलाज के लिए डाक्टरों के बजाए पीर-फकीरों, मजार-मंदिरों पर अधिक भीड़ होती है । सामान्य डाक्टर मानसिक रोगों को पहचानने और रोगियों को मनोचिकित्सक के पास भेजने में असमर्थ रहते हैं । इसके चलते ओझा,पुरोहित,मौलवी,तथाकथित यौन विशेषझ अवैध रूप से मनोचिकित्सक का दुष्कार्य कर रहे हैं ।
Daily News Activist, Lucknow 31-10-15
‘नंग-धड़ंग, सिर पर कचरे का बोझ, जहां कहीं जगह मिली सो गए, कुछ भी खा लिया, किसी ने छेड़ा तो पत्थर चला दिए ।’’ भारत के हर शहर-कस्बे में ऐसे महिला या पुरूष चरित्रों की मौजूदगी लगभग जरूरी है। आम लोगों की निगाह में ये भूत-प्रेत के प्रकोपधारी, मजनू, बदमाश या फिर देशी-विदेशी जासूस होते हैं । यह विड़ंबना है कि वे जो हैं, उसे ना तो उनके अपने स्वीकारते हैं और ना ही पराए । शरीर के अन्य विकारों की तरह मस्तिष्क अव्यवस्थित होने के कारण बीमार, मानसिक रोगी ! इसी तरह महानगर की सड़कों पर आए रोज छोटी-छोटी बात पर खून-खराबा, गलत निर्णय; ये सब भी मानसिक असंतुलन का ही नतीजा होता है।
 विश्व स्वास्थ संगठन ने ‘स्वास्थ’ की परिभाषा में स्पष्ट किया है कि ‘‘शारीरिक,मानसिक और सामाजिक रूप से स्वास्थ की अनुकूल चेतना । ना कि केवल बीमारी की गैर मौजूदगी ।’’  इस प्रकार मानसिक स्वास्थ, एक स्वस्थ शरीर का जरूरी हिस्सा है । यह हमारे देश की कागजी राष्ट्रीय स्वास्थ नीति में भी दर्ज है । वैसे 1982 में मानसिक स्वास्थ कार्यक्रम शुरू हुआ था । एक दस्तावेज के मुताबिक करीब तेरह करोड़ भारतीयों को किसी ना किसी रूप में मानसिक चिकित्सा की जरूरत है । प्रत्येक हजार जनसंख्या में 10 से 20 लोग जटिल मानसिक रोगों से ग्रस्त हैं । जबकि दुखदाई और आर्थिक अक्षमता पैदा करने वाले भावुक रोगों के शिकार लोगों की संख्या इसका तीन से पांच गुना है । आम डाक्टर के पास आने वाले आधे मरीज मरीज उदासी,भूख,नींद, और सेक्स इच्छा में कमी आना,हस्त मैथुन,स्वप्न दोष जैसी शिकायतें ले कर आते हैं । वास्तव में वे किसी ना किसी मानसिक रोग के शिकार होते हैं ।
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इतने लोगों के इलाज के लिए कोई 32 हजार मनोचिकित्सकों की जरूरत है, जबकि देषभर में इनकी संख्या बामुष्किल साढ़े तीन हजार है और इनमें भी तीन हजार तो चार महानगरों तक ही सिमटे हैं। सन 1795 मंे पाइनल नामक व्यक्ति ने पेरिस में मानसिक रोगियों का मानवीय संवेदनाआंे के साथ इलाज करना शुरू किया था । इससे पहले ऐसे रोगियों को जंजीरों से जकड कर रखा जाता था । देखा गया कि ऐसे मरीज उत्तेजित होकर तोड़-फोड़ करते थे । पाइनल का प्रयोग सफल रहा । इसी सामाजिक सुधार से प्रेरित होकर अमेरिका में बेंजामिन रश और ब्रिटेन में कोनोली व ट्यूक ने मनोरोगियों की ‘‘सामाजिक मनोविकार चिकित्सा ’’ श्ुारू की ।
भारत में पागलपन कानून 1912 में बनाया गया था , जिसमें अदालती प्रमाण पत्र के जरिए रोगियों को केवल पागलखानों में इलाज की सीमा तय की गई थी । लेकिन 1987 में इस कानून में बदलाव किया गया और मरीज को खुद की इच्छा पर भर्ती होने, सामान्य अस्पतालों में भी इलाज कराने जैसी सुविधाएं दी गई हैं।
दिनों दिन बढ़ रही भौतिक लिप्सा और उससे उपजे तनावों व भागमभाग की जिंदगी के चलते भारत में मानसिक रोगियों की संख्या पश्चिमी देशों से भी ऊपर जा रही है । विशेष रूप से महानगरों में ऐसे रोग कुछ अधिक ही गहराई से पैठ कर चुके हैं ।  दहशत और भय के इस रूप को फोबिया कहा जाता है ।इसकी शुरुआत होती है चिडचिडेपन से । बात-बात पर बिगड़ना और फिर जल्द से लाल-पीला हो जाना ऐसे ‘रोगियों’ की आदत बन जाती हैं । काम से जी चुराना, बहस करना और खुद को सच्चा साबित करना इनके प्रारंभिक लक्षण हैं । भय की कल्पनाएं इन लोगों को इतना जकड़ लेती हैं कि उनका व्यवहार बदल जाता है  जल्दी ही दिमाग प्रभावित होता है और पनप उठते है मानसिक रोग ।
जहां एक ओर मर्ज बढ़ता जा रहा है, वहीं हमारे देश के मानसिक रोग अस्पताल सौ साल पुराने पागलखाने  के खौफनाक रूप से ही जाने जाते हैं । ये जर्जर,डरावनी और संदिग्ध इमारतें मानसिक रोगियों की यंत्रणाओं, उनके प्रति समाज के उपेक्षित रवैए और सरकारी उदासीनता की मूक गवाह हैं । मानसिक विक्षिप्त लोगों को समाज से दूर उंची चाहरदीवारियों में नारकीय जीवन जीने को मजबूर करना क्या मौलिक अधिकारों का हनन नहीं है ? छोटे-छोटे दड़बेनुमा जेल की कोठरियां । वहां जानवरों से भी बदतर भरे मरीज कहीं पेड़ या खंबों से बंधे महिला-पुरुष । उनकी देखभाल के लिए सरकार से मोटा वेतन पा रहे लोगों के अमानवीय अत्याचार। अधिकांश रोगियों के लिए तो यह ताजिंदगी सजा है ।अदालत से सजायाफ्ता आजीवन कैदी तो कुछ साल बाद छूट भी जाता है, लेकिन पागलखानों से मुक्ति कतई संभव नहीं है । अलबत्ता तो वहां का माहौल उन्हें ठीक होने नहीं देता है, यदि कोई ठीक हो जाए समाज उन्हें स्वीकार नहीं करता है । फलस्वरूप एक बार सींखचों के पीछे जाना यानि मौत होने तक शेष दुनिया से कट जाना होता है ।
 चाहे बिल्लोज पुरा, आगरा का पागलखाना हो या बरेली, रांची का या फिर शाहदरा,दिल्ली का मनोरोग अस्पताल; कोई भी अपने रोगियों के हितों व अधिकारों की रक्षा करने में सफल नहीं रहे हैं । यहां ऐसे रोगियों की संख्या सैंकड़ों में है जो पिछले 35-40 सालों से कैद है । कहीं जमीन-जायदाद पर कब्जा करने के लिए अपने ही रिश्तेदारों को पागल ठहराने की साजिश है तो कहीं  सामाजिक रुतबे में ‘‘पागलखाना रिटर्न’’ का धब्बा लगने की हिचक । मरीज ठीक हो गया, लेकिन घर वालों ने अपने पते ही गलत लिखवाए। कई मरीज तो इस त्रासदी के कारण ठीक होने के बाद फिर से अपना मानसिक संतुलन खो देते है।।
देश के मानसिक स्वास्थ कार्यक्रम,1982 में रोगियों के पुनर्वास, इसके कारणों पर नियंत्रण, दूरस्थ अंचलों के डाक्टरों को विशेष ट्रेनिंग सहित ना जाने क्या-क्या लुभावने कार्यक्रम दर्ज हैं । लेकिन वास्तविकता के धरातल पर मानसिक रोगी सरकार व समाज दोनों की हेय दृष्टि से आहत है । हमारे देश की एक अरब होती आबादी के लिए केवल 42 मानसिक  रोग अस्पताल हैं, जहां 20,000 बिस्तर हैं । यह जरूरत का एक फीसदी भी नहीं है । राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ कार्यक्रम की एक रिपोर्ट भी इस बात का प्रमाण है कि ऐसे रोगियों की बड़ी संख्या इलाज का खर्च उठाने में असमर्थ है । सरकारी अस्पतालों के नारकीय माहौल में जाना उनकी मजबूरी होता है ।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग मानता रहा है कि देश भर के पागलखानों की हालत बदतर है । इसे सुधारने के लिए कुछ साल पहले बंगलौर के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ और चेतना विझान संस्थान (निमहान्स) मे एक परियोजना शुरू की गई थी । लेकिन उसके किसी सकारात्मक परिणाम की जानकारी नहीं है । यह परियोजना भी नाकाफी संसाधनों का रोना रोते हुए फाईलों में ठंडी हो गई । वैसे तो 1987 में सुप्रीम कोर्ट भी मानसिक अस्पतालों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करवाने के निर्देश दे चुका है । आदेश के बाद दो-चार दिन तो सरकार सक्रिय दिखी,पर स्थितियों में लेशमात्र सुधार नहीं हुआ । बानगी के तौर पर देश के सबसे पुराने आगरा के पागलखाने के हालात को देखें । 40 एकड़ में फैली इस ‘ ‘जेल’ के  रखरखाव का सालाना बजट मात्र ढाई लाख है । यहां स्टाफ तो 500 का है, लेकिन डाक्टर व नर्स मिला कर 30 भी नहीं  हैं । अधिकांश डाक्टरों के वहीं पास में निजी क्लानिक हैं । वैसे यहां 400 से अधिक मरीज नहीं रखे जा सकते, पर इनकी संख्या कभी भी 700 से कम नहीं रही है । इतने मरीजों को साल भर खाना देने का बजट मात्र 14 लाख और कपड़ों पर व्यय की सीमा दो लाख रुपए है । साढ़े तीन सौ मुस्टंडे अटेंडेंट, जिनके आतंक से रोगी थर-थर कांपते हैं, की मौजूदगी में मरीजों के तन तक क्या पहुंचता होगा, इसकी कल्पना ही रौंगटे खड़े कर देती है ।
एक तो अभी तक ऐसा पाठ्यक्रम स्कूली षिक्षा मं षामिल नहीं कर पाए हैं जो कि मानसिक रोगों को अन्य बीमारियों की तरह सामान्य रोग बताने में सफल हो। दूसरा समाज में इसके प्रति जागरूकता के लिए सरकार व समाज की सुप्तावस्था भी है।  हमारे देश में कुत्ते-बिल्लियों की ठीक तरह से देखभाल के लिए अखबारों के नियमित कालम छपते हैं । इलेक्ट्रानिक्स मीडिया पर भी वे प्राथमिकता से हैं । लेकिन मानव योनि में जन्मे, किन्हीं हालातों के शिकार हो कर मानसिक संतुलन खोए लोगों के पशु से भी बदतर जीवन पर ना तो सरकार गंभीर है और ना ही समाज संवेदनशील !



 पंकज चतुर्वेदी

सोमवार, 26 अक्तूबर 2015

Voice against Jam


जानलेवा बन रही है जाम की समस्या

                                                 पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार
Hindustan 27-10-15
यह एक गंभीर चेतावनी है कि आने वाले दशक में दुनिया में वायु प्रदूषण के शिकार सबसे ज्यादा लोग दिल्ली में होंगे। एक अंतरराष्ट्रीय शोध रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर प्रदूषण स्तर को काबू में नहीं किया गया, तो साल 2025 तक दिल्ली में हर साल करीब 32,000 लोग जहरीली हवा के शिकार बन असमय ही मौत के मुंह में चले जाएंगे।

प्रतिष्ठित नेचर  पत्रिका में प्रकाशित ताजा शोध के मुताबिक, दुनिया भर में 33 लाख लोग हर साल वायु प्रदूषण के शिकार बनते हैं। यही नहीं, सड़कों पर बेवजह घंटों जाम में फंसे लोग मानसिक रूप से भी बीमार होते जा रहे हैं।

हमारे यहां शहर के रास्ते हों या हाई-वे, बनते समय तो वे चौड़े दिखते हैं, पर दो-तीन वर्षों में ही संकरे दिखने लग जाते हैं। दरअसल, हमारे महानगरों से लेकर कस्बों तक और सुपर हाई-वे से लेकर गांव की पतली सड़क तक, लोग अपने वाहनों या जरूरी सामान को सड़क पर रखना अपना अधिकार समझते हैं। जाहिर है, जो सड़क वाहनों के चलने के लिए बनाई गई है, उसके बड़े हिस्से में बाधा होगी, तो यातायात प्रभावित होगा ही।

यातायात जाम का बड़ा कारण सड़कों का दोषपूर्ण डिजाइन भी है, जिसके चलते थोड़ी-सी बारिश में उन पर जल भराव या मोड़ पर अचानक यातायात के धीमा होने की समस्या पैदा हो जाती है या फिर गड्ढ़े बन जाते हैं। पूरे देश में सड़कों पर अवैध व ओवरलोड वाहनों पर तो जैसे अब कोई रोक ही नहीं है। इसके अलावा, मिलावटी ईंधन, घटिया ऑटो पार्ट्स भी वाहनों से निकलने वाले धुएं के जहर कई गुना कर देते हैं। वाहन सीएनजी से चले या फिर डीजल या पेट्रोल से, यदि उसमें क्षमता से ज्यादा वजन होगा, तो उससे निकलने वाला धुआं जानलेवा ही होगा।

दूसरी तरफ, पूरे देश में स्कूलों और सरकारी कार्यालयों के खुलने व बंद होने के समय लगभग एक समान हैं। इसका परिणाम यह है कि हर छोटे-बड़े शहर में सुबह से सड़कों पर जाम दिखने लगता है। ठीक यही हाल दफ्तरों के वक्त में भी होता है।

नए मापदंड वाले वाहन यदि 40 या उससे अधिक की गति में चलें, तो उनसे बहुत कम प्रदूषण होता है। लेकिन यदि ये फर्स्ट गियर में ही रेंगते रहे, तो उनसे सॉलिड पार्टिकल, सल्फर डाई ऑक्साइड और कार्बन मोनो ऑक्साइड बेहिसाब उत्सर्जित होती हैं। सवाल उठता है कि क्या स्कूलों के खुलने और बंद होने के समय में बदलाव करके इस जाम के तनाव से मुक्ति नहीं पाई जा सकती? इसी तरह, कुछ कार्यालयों की बंदी के दिन शनिवार-रविवार की जगह दूसरे दिवस में नहीं किए जा सकते?

शहरों की हवा को प्रदूषण मुक्त करने और जाम की समस्या को निपटाने के लिए जो कार्यालय जरूरी न हों, या राजधानियों में जिन दफ्तरों का मंत्रालयों से सीधा ताल्लुक न हो, उन्हें दूर के शहरों में भेजा सकता है। इससे नए शहरों में रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और लोगों का पलायन भी कम होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2015

Boiling Punjab is warning for India

भारी पड़ सकती है पंजाब की अनदेखी

Raj Express 24-10-15
MP Jansandesh 24-10-15
                                                                      पंकज चतुर्वेदी
पंजाब बुरी तरह सुलग रहा है, कोई दो दशक बाद  वहां इतनी बड़ी संख्या में अर्धसैनिक बलों को उतारना पड़ा है। यही नहीं पंजाब की आग अब पडोसी राज्य हरियाणा तक फैल गई है। 23 अक्तूबर को सिरसा, अंबाला सहित कई जिलों में बंद व जुलूस निकाले गए जिससे जीटी रोड ठप रही । यदि पंजाब पुलिस पर एतबार करें तो मसला और भी गंभीर है क्योंकि इस पूरे उपद्रव के तार दूर देशों से जुड़े हैं। उधर जनता को एतबार नहीं है कि पंजाब पुलिस ने इस कांड में जिन पदो लेागों को पकड़ा है, वे असली अपराधी हैं। कोई पदो सप्ताह पहले पाकिस्तान की सीमा के करीबी फरीदकोट जिले के बरगड़ी गांव में पवित्र ग्रंथ श्री गुरूग्रंथ सहिब के 110 पन्ने कटे-फटे हालात में सड़कों पर मिले। बताया गया कि यह पन्ने जून महीने में बुर्ज जवाहर सिंह गांव के गुरूद्वारे से चोरी किए गए ग्रंथ साहेब के हैं। जरा याद करें यह बात उसी जून की है जब पंजाब में खलिस्तान समर्थकों ने खूब सिर उठाया था, ब्लू स्टार की बरसी के नाम पर जगह-जगह जलसे हुए थे। सटे हुए जम्मू में तो कई दिन कर्फ्यु लगाना पड़ा था क्योंकि वहां पुलिस से भिडंत में कई मौत हुई थीं। जून महीने के आसपास ही मनिंदरजीत सिंह बिट्टा की हत्या के लिए बम फोड़कर नौ लोगों की हत्या के अपराधी देवेन्द्रपाल सिंह भुल्ल्र को दिल्ली की तिहाड़ जेल से तबादला करवा कर अमृतसर बुलाया गया और वहां एक अस्पताल में एसी कमरे में रखा गया।
पिछले दस दिनों से पंजाब के अमृतसर, तरनतारन, लुधियाना जैसे संवेदनषील 12 जिलों में सड़क जाम, हिंसा, बाजार बंद चल रहा है। गुरू ग्रंथ साहिब की बेअदबी के मामले में पदो भाई रूपिंदर सिंह व जसविंदर सिंह को पकड़ा गया। जनता द्वारा पिटाई के कारण रूपिंदर को अस्पताल में भर्ती करना पड़ा। उसी दौरान उसके पास आस्ट्रेलिया, दुबई, अमेरिका से कुछ संदिग्ध फोन आए।  अब पुलिस का दावा है कि इस अशांति के पीछे बहुत बड़ी साजिश हे। चूंकि पंजाब में बड़ी मात्रा में विदेशी निवेश आ रहा है, सो कुछ लोग साजिश रच कर इसमें बाधा पहुंचा रहे हैं। पुलिस का कहना है कि इस हिंसा के लिए पांच जिलों में कुछ लोगों को विदेश से लाखों रूपए मिले हैं । खैर इस कांड से राज्य की दुनिया में बदनामी तो हुई ही, कबड्डी का विश्‍व कप का आयोजन निरस्त करना पड़ा।
यदि सिंख गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी की मानें तो राज्य में हालात बिगड़ने का मुख्य कारण पुलिस की लापरवाही और मामले को सही तरीके से डील नहीं करना है। एसजीपीसी के प्रधान अवतार सिंह मक्कड़ कहते हैं कि यह पंजाब पुलिस व खुफिया तंत्र के निकम्मेपन का परिणाम है कि यह आग गांव-गांव तक पहुंच गई। प्रशासन मामले की गंभीरता को समझ ही नहीं प्या और लेागों की भावनाओं को समझने की जगह उसने बल प्रयोग किया। सिख पंथ का एक धड़ा ऐसा भी है जो कि गुरू ग्रंथ साहिब को नुकसान पहुंचाने के लिए डेरा सच्चा सौदा के गुरमीत राम रहीम के अनुयायिोंा को देाशी मानता है। सनद रहे डेरे का प्रभाव पंजाब के मालवे व मंड में काफी है और पिछले दिनों अकाल तख्त ने राम हरीम को दी गई एक माफी को वापिस ले लिया था व उन्हे तन्खैया बताया था। पिछले साल गुरमीत राम रहीम ने गुरू गोबिद सिंह जी की तरह भेष रख कर प्रवचन दिए थे और अकाल तख्त ने इसे गुरू महाराज के प्रति असम्मान कहा था। राम रहीम ने अकाल तख्त के सामने पेष हो कर माफी मांगी थी और उन्हें तख्त ने पहले माफ कर दिया था, लेकिन दस दिन पहले माफी को निरस्त कर दिया था। तख्त दमदमा साहेब के पूर्व  जत्थेदार बलवंत सिंह नंदगढ़ का अरोप है कि गुरू ग्रंथ साहिब को नुकसान पुहंचा कर पंजाब में अशांति पहुंचाने का खेल डेरे का है।
इस पूरे तमाशे के पीछे एक सुगबुगाहट यह भी है कि बीते एक महीने से पंजाब में चल रहा किसान आंदेालन सरकार के लिए आफत बनता जा रहा था। किसान पांच दिन रेल की पटरी पर बैठे रहे व राज्य में एक भी ट्रैन नहीं चली। किसान झुकने को तैयार नहीं थे, सो एक साजिश के तहत धार्मिक मसला खड़ा कर दिया गया जिससे किसान आंदोलन की हवा निकल जाए।
यह किसी से छिपा नहीं है कि राज्य सरकार काफी कुछ पंथिक एजेंडे की ओर मुड़ रही है और इसमें वे लेाग सहानुभति पा रहे है। जो पृथकतावादी  या हिंसा में सजायाफ्ता हैं। राज्य सरकार में साझा भाजपा को इस तरह के लेागोें के प्रति नरम रूख रास नहीं आ रहा है और अपनी डोलती सरकार को साधने के लिए राज्य में यदा‘कदा धर्म के नाम पर लेागों को उकसाया जाता है।
बेहतर आर्थिक स्थिति के मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ने वाले पंजाब राज्य में आतंकवादियों पर नरम रवैया तथा अफवाहों का बाजार भी उतना ही तेजी से विकसित हो रहा है, जितनी वहां की समृद्धता । ऐसी सच्ची-झूठी खबरें लोगों के बीच भ्रम, डर व आशंकाएं पैदा कर रही हैं, आम जन-जीवन को प्रभावित कर रही हैं और कई बार भगदड़ के हालात निर्मित कर रही हैं । विडंबना है कि बेसिर पैर की इन लफ्फाजियों के पीछे असली मकसद को पता करने में सरकार व समाज दोनो ही असफल रहे हैं । यह जीवट, लगन और कर्मठता पंजाब की ही हो सकती है, जहां के लोगों ने खून-खराबे के दौर से बाहर निकल कर राज्य के विकास के मार्ग को चुना व उसे ताकतवर बनाया । बीते एक दशक के दौरान पंजाब के गांवों-गांवों तक विकास की धारा बही है । संचार तकनीक के सभी अत्याधुनिक साधन वहां जन-जन तक पहुंचे हैं, पिछले कुछ सालों में यही माध्यम वहां के अफवाहों का वाहक बना है ।
फेसबुक या गूगल पर खोज करें तो खालिस्तान, बब्बर खालसा, भिंडरावाले जैसे नामों पर कई सौ पेज वबेसाईट उपलब्ध हैं। इनमें से अधिकांष विदेषों से संचालित है। व कई एक पर टिप्पणी करने व समर्थन करने वाले पाकिस्तान के हैं। यह बात चुनावी मुद्दा बन कर कुछ हलकी कर दी गई थी कि पंजाब में बड़ी मात्रा में मादक दवाओं  की तस्करी की जा रही है व युवा पीढ़ी को बड़ी चालाकी से नषे के संजाल में फंसाया जा रहा है। सारी दुनिया में आतंकवाद अफीम व ऐसे ही नषीले पदार्थों की अर्थ व्यवस्था पर सवार हो कर परवान चढा हे। पंजाब में बीते दो सालें में कई सौ करोड़ की हेरोईन जब्त की गई है व उसमें से अधिकांष की आवक पाकिस्तान से ही हुई। स्थानीय प्रषासन ने इसे षायद महज तस्करी का मामला मान कर कुछ गिरफ्तारियों के साथ अपनी जांच की इतिश्री समझ ली, हकीकत में ये सभी मामले राज्य की िफजा को खराब करने का प्रयास रहे हैं।
जरा कुछ महीनों पीछे ही जाएं, सितंबर- 2014 में बब्बर खालसा का सन 2013 तक अध्यक्ष रहा व बीते कई दषकों से पाकिस्तान में अपना घर बनाएं रतनदीप सिंह की गिरफ्तारी पंजाब पुलिस ने की। उसके बाद  जनवंबर- 14 में ही दिल्ली हवाई अड्डे से खलिस्तान लिबरेषन फोर्स के प्रमुख हरमिंदर सिंह उर्फ मिंटू को एक साथी के साथ गिरफ्तार किया गया। ये लेाग थाईलैंड से आ रहे थे। पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के मामले में सजायाफ्ता व  सन 2004 में अतिसुरक्षित कहे जाने वाली चंडीगढ की बुढैल जेल से सुरंग बना कर फरार हुए जगतार सिंह तारा को जनवरी-2015 में थाईलैंड से पकड़ा गया। एक साथ विदेषों में रह कर खालिस्तानी आंदोलन को जिंदा रखने वाले षीर्श आतंकवादियों के भारत आने व गिरफ्तार होने पर भले ही सुरक्षा एजेंसिंयां अपनी पीठ ठोक रही हों, हकीकत तो यह है कि यह उन लोगों का भारत में आ कर अपने नेटवर्क विस्तार देने की येाजना का अंग था। भारत में जेल अपराधियों के लिए सुरक्षित अरामगाह व साजिषों के लिए निरापद स्थल रही है। रही बची कसर जनवरी-15 में ही राज्य के मुख्मंत्री प्रकाष सिंह बादल ने 13 कुख्यात सजा पाए आतंकवादियों को समय से पहले रिहा करने की मांग कर दी थी जिसमें जगतार सिंह तारा भी एक था। कुल मिला कर देखे तो जहां एक तरफ राज्य सरकार पंथक एजेंडे की ओर लौटती दिख रही है तो इलाके में मादक पदार्थों की तस्करी की जड़ तक जाने के प्रयास नहीं हो रहे हैं।
यह कैसी विडंबना है कि पंजाब के अखबारों में शहीदी समागम के नाम पर करोड़ांे के विज्ञापन दिए जाते हैं और सरकार इस पर मौन रहती है। जरा विचार करें कि यदि कष्मीर में मकबूल भट्ट या अषफाक गुरू के लिए ऐसे ही विज्ञापन अखबारों में छपे तो क्या सरकार, समाज व मीडिया इतना ही मौन रहेगा? इस बार सबसे बड़ी चिंता का विशय यह है कि सिख अतिवादियों कें महिमामंडन का काम पंजाब से बाहर निकल कर जम्मू से शुरू हुआ व वहां भिंडरावाले समर्थकों ने तीन दिन तक सुरक्षा बलों का खूब दौड़ाया। जब वहां सेना तैनात की गई तो मामला शांत हुआ। आतंकवाद , अलगाववाद या ऐसी ही भड़काउ गतिविधियों के लिए आ रहे पैसे, प्रचार सामग्री और उत्तेजित करने वाली हरकतों पर निगाह रखने में हमारी खुफिया एजेंसियां या तो लापरवाह रही हैं या षासन ने उन्हें गंभीरता से नहीं लिया। फिर ऐसे में दो दशक पहले तक संवेदनशील रहे सीमावर्ती राज्य की सरकार में बैठे लोगों का इस मामले में आंखें मूंदे रखना कहीं कोई गंभीर परिणाम भी दे सकता है ।

पंकज चतुर्वेदी



बुधवार, 21 अक्तूबर 2015

Not law but strong Social change is require for women saftey

    दरिंदगी पर क्यों नहीं लग पा रही लगाम

 

 

                                     


हाल के ही दिनों में दिल्ली कई-कई बार शर्मसार हुई. अगस्त में ओखला में सात साल की बच्ची के साथ शारीरिक शोषण कर उसके नाजुक अंगों को चाकू से गोद दिया गया. सितंबर में द्वारका में पांच साल की बच्ची के साथ कुछ ऐसा ही हुआ. 11 अक्तूबर को केशवपुरम में एक झुग्गी बस्ती की बच्ची के साथ कुकर्म कर उसे रेल की पटरियों पर मरने को छोड. दिया गया. यह तो बस फौरी घटनाएं हैं और वह भी महज दिल्ली की. दामिनी कांड में सजा होने के बाद व उससे पहले भी ऐसी दिल दहला देने वाली घटनाएं होती रहीं, उनमें से अधिकांश में पुलिस की लापरवाही चलती रही, वरिष्ठ नेता बलात्कारियों को बचाने वाले बयान देते रहे. दिल्ली में दामिनी की घटना के बाद हुए देशभर के धरना-प्रदर्शनों में शायद करोड.ों मोमबत्तियां जल कर धुआं हो गई हों, संसद ने नाबालिग बच्चियों के साथ छेड.छाड. पर कड.ा कानून भी पास कर दिया हो, निर्भया के नाम पर योजनाएं भी हैं लेकिन समाज के बडे. वर्ग पर, दिलो-दिमाग पर औरत के साथ हुए दुर्व्यवहार को लेकर जमी भ्रांतियों की कालिख दूर नहीं हो पा रही है.
ऐसा नहीं है कि समय-समय पर बलात्कार या शोषण के मामले चर्चा में नहीं आते हैं और समाजसेवी संस्थाएं इस पर काम नहीं करती हैं. फिर भी ऐसा कुछ तो है ही जिसके चलते लोग इन आंदोलनों, विमशरें, तात्कालिक सरकारी सक्रिताओं को भुला कर गुनाह करने में हिचकिचाते नहीं हैं. आंकडे. गवाह हैं कि आजादी के बाद से बलात्कार के दर्ज मामलों में से छह फीसदी में भी सजा नहीं हुई. जो मामले दर्ज नहीं हुए वे न जाने कितने होंगे. 
जब तक बलात्कार को केवल औरतों की समस्या समझ कर उस पर विचार किया जाएगा, जब तक औरत को समाज की समूची इकाई न मान कर उसके विर्मश पर नीतियां बनाई जाएंगी; परिणाम अधूरे ही रहेंगे. फिर जब तक सार्वजनिक रूप से मां-बहन की गाली बकने को धूम्रपान की ही तरह प्रतिबंधित करने जैसे आधारभूत कदम नहीं उठाए जाते, अपने अहं की तुष्टि के लिए औरत के शरीर का विर्मश सहज मानने की मानवीय वृत्ति पर अंकुश नहीं लगाया जा सकेगा. एक तरफ से कानून और दूसरी ओर से समाज के नजरिए में बदलाव की कोशिश एकसाथ किए बगैर बलात्कार के घटनाओं को रोका नहीं जा सकेगा.
लोकमतसमाचारमहाराष्‍ट् 22 अक्‍तूबर 15
बी ते शुक्रवार को दिल्ली में दो बच्चियों के साथ कुकर्म हुआ- ढाई साल व चार साल की बच्चियां. अभी पिछले सप्ताह ही चार साल की बच्ची के साथ दरिंदों ने न केवल मुंह काला किया था बल्कि उसे कई जगह ब्लेड मार कर घायल कर दिया था. दिल्ली से सटे नोएडा के छिजारसी गांव में उसी शुक्रवार की रात 12वीं में पढ.ने वाली एक बच्ची ने इसलिए आत्महत्या कर ली, क्योंकि उसे गांव के कुछ शोहदे लगातार छेड. रहे थे और उनके परिवार द्वारा पुलिस में कई बार गुहार लगाने के बावजूद लफंगों के हौसले बुलंद ही रहे. चार साल पहले दिल्ली व देश के कई हिस्सों में 'दामिनी' के लिए खड.ा हुआ आंदोलन, आक्रोश, नफरत सभी कुछ विस्मृत हो चुका है.

सोमवार, 19 अक्तूबर 2015

Only law can not prevent sexual attacks on women

राज एक्सप्रेस मप्र २० अक्टूबर १५
मोमबत्ती की ऊष्मा वहां तक क्यों नहीं पहुंचती ?
पंकज चतुर्वेदी
यह सप्ताह चन रहा है नारी शक्ति की पूजा का और छोटी बच्चियों को अपने घर बुला कर उनके चरण पखारने का और ऐसे में बीते षुक्रवार को दिल्ली में दो बच्चियों के साथ कुकर्म हुआ- ढाई साल व चार साल की बच्चियां। अभी पिछले सप्ताह ही एक चार साल की बच्ची के साथ दरिंदों ने ना केवल मुंह काला किया था बल्कि उसे कई जगह ब्लैड मार कर घायल कर दिया था। दिल्ली से सटे नोएडा के छिजारसी गांव में उसी ष्ुाक्रवार की रात 12वीं में पढने वाली एक बच्ची ने इस लिए आत्महत्या कर ली, क्योंकि उसे गांव के कुछ षोहदे लगातार छेड़ रहे थे और उनके परिवार द्वारा पुलिस में कई बार गुहार लगाने के बावजूद लफंगों के हौंसल बुलंद ही रहे। चार साल पहले दिल्ली व देष के कई हिस्सों में उस अनाम अंजान ‘‘दामिनी’ के लिए खड़ा हुआ आंदोलन, आक्रोष, नफरत सभी कुछ विस्मृत हो चुका है। अभी दिल्ली के ईद-गिर्द एक सप्तहा में ही जो कुछ हो गया, उस पर महज कुछ सियासी तीरबाजी या स्थानीय गरीब लोगों द्वारा गुस्से का इजहार कहीं ना कहीं इस बात पर तो सवाल खड़े करता ही है कि कहीं विरोध एक नियोजित एकांकी होता है जिसके मंचन के पात्र, संावद, मीडिया आदि सभी कुछ कहीं बुनी जाती है और उसके निर्देषक महज सत्ता तक पुहंचने के लिए बच्चियों के साथ वहषियाना व्यवहार को मौके की तरह इस्तेमाल करते हैं। या फिर जंतर मंतर पर प्रज्जवलित होने वाली मोमबत्तिया केवल उन्ही लोेगों का झकझोर पा रही हैं जो पहले से काफी कुछ संवदेनषील है- समाज का वह वर्ग जिसे इस समस्या को समझना चाहिए -अपने पुराने रंग में ही है - इसमें आम लोग हैं, पुलिस भी है और समूचा तंत्र भी।
अभी हाल के ही दिनों में दिल्ली  कई-कई बार षर्मसार हुई। अगस्त में ओखला में एक सात साल की बच्ची के साथ षारीरिक षोशण कर उसके नाजुक अंगों को चाकू से गोद दिया गया। सितंबर में द्वारका में एक पांच साल की बच्ची के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। अभी 11 अक्तूबर को केषवपुरम में एक झुग्गी बस्ती की बच्ची के साथ कुकर्म कर उसे रेल की पटरियों पर मरने को छोड़ दिया गया। यह तो बस फौरी घटनाएं हैं और वह भी महज दिल्ली की। दामिनी कांड में सजा होने के बाद व उससे पहले भी ऐसी दिल दहला देने वाली घटनाएं होती रहीं, उनमें से अधिकांष में पुलिस की लापरवाही चलती रही, वरिश्ठ नेता बलात्कारियों कों बचाने वाले बयान देते रहे । दिल्ली में दामिनी की घटना के बाद हुए देषभर के धरना-प्रदर्षनों में षायद करोड़ो मोमबत्तिया जल कर धुंआ हो गई हों, संसद ने नाबालिक बच्चियों के साथ छेडछाड़ पर कड़ा कानून भी पास कर दिया हो, निर्भया के नाम पर योजनाएं भी हैं लेकिन समाज के बड़े वर्ग पर दिलो-दिमाग पर औरत के साथ हुए दुव्र्यवहार को ले कर जमी भ्रांतियों की कालिख दूर नहीं हो पा रही हे। ग्रामीण समाज में आज भी औरत पर काबू रखना, उसे अपने इषारे पर नचाना, बदला लेने - अपना आतंक बरकरार रखने के तरीके आदि में औरत के षरीर को रोंदना एक अपराध नहीं बल्कि मर्दानगी से जोड़ कर ही देखा जाता हे। केवल कंुठा दूर करने या दिमागी परेषानियों से ग्रस्त पुरूश का औरत के षरीर पर बलात हमला महज महिला की अस्मत या इज्जत से जोड़ कर देखा जाता हे। यह भाव अभी भी हम लोगों में पैदा नहीं कर पा रहे हैं कि बलात्कार करने वाला मर्द भी अपनी इज्जत ही गंवा रहा है। हालांकि जान कर आष्चर्य होगा कि चाहे दिल्ली की 45 हजार कैदियों वाली तिहाड़ जेल हो या फिर दूरस्थ अंचल की 200 बंदियों वाली जेल ; बलात्कार के आरोप में आए कैदी की , पहले से बंद कैदियों द्वारा दोयम दर्जें का माना जाता है और उसकी पिटाई या टाॅयलेट सफाई या जमीन पर सोने को विवष करने जैसे स्वघोशित नियम लागू हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जेल जिसे असामाजिक लोगों की बस्ती कहा जाता है, जब वहां बलात्कारी को दोयम माना जाता है तो बिरादरी-पंचायतें- पुलिस इस तरह की धारणा क्यों विकसित नहीं कर पा रही हैं। खाप, जाति बिरादरियां, पंचायतें जिनका गठन कभी समाज के सुचारू संचालन के इरादे से किया गया था अब समानांतर सत्ता या न्याय का अड्डा बन रही है तो इसके पीछे वोट बैंक की सियासत होना सर्वमान्य तथ्य है।
ऐसा नही है कि समय-समय पर  बलात्कार या षोशण के मामले चर्चा में नहीं आते हैं और समाजसेवी संस्थाएं इस पर काम नहीं करती हैं, । इक्कीस साल पहले भटेरी गांव की साथिन भंवरी देवी  को बाल विवाह के खिलाफ माहौल बनाने की सजा सवर्णों द्वारा बलात्कार के रूप में दी गई थीं उस ममाले को कई जन संगठन सुप्रीम कोर्ट तक ले गए थे और उसे न्याय दिलवाया था। लेकिन जान कर आष्चर्य होगा कि वह न्याय अभी भी अधूरा है । हाई कोर्ट से उस पर अंतिम फैसला नहीं आ पाया है । इस बीच भंवरी देवी भी साठ साल की हो रही हैं व दो मुजरिमों की मौत हो चुकी है। ऐसा कुछ तो है ही जिसके चलते लोग इन आंदालनो, विमर्षों, तात्कालिक सरकारी सक्रिताओं को भुला कर गुनाह करने में हिचकिचाते नहीं हैं। आंकडे गवाह हैं कि आजादी के बाद से बलात्कार के दर्ज मामलों में से छह फीसदी में भी सजा नहीं हुई। जो मामले दर्ज नहीं नहीं हुए वे ना जाने कितने होंगे।
फांसी की मांग, नपुंसक बनाने का षोर, सरकार को झुकाने का जोर ; सबकुछ अपने अपने जगह लाजिमी हैं लेकिन जब तक बलात्कार को केवल औरतों की समस्या समझ कर उस पर विचार किया जाएगा, जब तक औररत को समाज की समूची ईकाई ना मान कर उसके विमर्ष पर नीतियां बनाई जाएंगी; परिणा अधूरे ही रहें्रे। फिर जब तक सार्वजनिक रूप से मां-बहन की गाली बकना , धूम्रपान की ही तरह प्रतिबंधित करने जैसे आघारभूत कदम नहीं उठाए जाते  , अपने अहमं की तुश्टि के लिए औरत के षरीर का विमर्ष सहज मानने की मानवीय वत्त्ृिा पर अंकुष नहीं लगाया जा सकेगा। भले ही जस्टिस वर्मा कमेटी सुझाव दे दे, महिला हेल्प लाईन षुरू हो जाए- एक तरफ से कानून और दूसरी ओर से समाज के नजरिये में बदलाव की कोषिष एकसाथ किए बगैर असामनता, कुंठा, असंतुश्टि वाले समाज से ‘‘रंगा-बिल्ला’’ या ‘‘राम सिंह-मुकेष’’ की पैदाईष को रोका नहीं जा सकेगा।

रविवार, 18 अक्तूबर 2015

pulses away from AAM AADMI

दाल रोटी खाओ प्रभु के गुण गाओ ....?


पीपुल्स समाचार मध्य प्रदेश १९ अक्टूबर १५
इस साल की शुरूआत में ही मौसम विभाग ने कम बारिष की चेतावनी दी थी और उसके बाद बेमौसम बारिश ने देशभर में खेती-किसानी का जो नुकसान हुआ था उसी समय कृषि मंत्रालय ने घोषणा कर दी थी कि इसका असर दाल पर जबरदस्त होगा। यह पहली बार भी नहीं हो रहा है कि मांग की तुलना में दाल की आपूर्ति या उत्पादन कम होने से बाजार में दाल के दामों ने हाहाकार मचाया है। प्रत्येक वर्ष की तरह इस साल भी दाल आयात करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई, लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि विदेशों से दाल मंगवा कर ना तो हम आम आदमी की थाली में दाल की वापसी कर सकते हैं और न ही इसकी कीमतों पर नियंत्रण। जरूरत इस बात की है कि हमारे खेतों में दाल की बुवाई का रबवा बढ़े साथ ही किसान को दाल की उपज के लिए प्रोत्साहन मिले। भारत में दालों की खपत 220 से 230 लाख टन की सालाना, जबकि कृषि मंत्रालय मार्च में कह चुका था कि इस बार दाल का उत्पादन 184.3 लाख टन रह सकता है जो पिछले साल के उत्पादन 197.8 लाख टन से बेहद कम है। दाल की कमी होने से इसके दाम भी बढे, नजीतन आम आदमी प्रोटीन की जरूरतों की पूर्ति के लिए दीगर अनाजों और सब्जियों पर निर्भर होना शुरू कर दिया। जाहिर है अब दूसरे अनाजों व सब्जियों में भी कमी होगी और दाम में उनके दाम बढ़ेंगे।
सनद रहे कि गत 25सालों से हम हर साल दालों का आयात कर रहे हैं, लेकिन दाल के उत्पादन और इसकी खेती में रकबा बढ़ाने की किसी ठोस योजना नहीं बनाई जा रही है। यहां जानना जरूरी है कि भारत दुनियाभर में दाल का सबसे बड़ा खपतकर्ता, पैदा करने वाला और आयात करने वाला देश है। दुनिया में दाल के कुल खेतों का 33 प्रतिशत हमारे यहां है जबकि खपत 22 फीसदी है। इसके बावजूद अब वे दिन सपने हो गए है जब आम-आदमी को ‘‘दाल-रोटी खाओ, प्रभ्ुा के गुण गाओ’’ कह कर कम में ही गुजारा करने की सीख दी जाती थी। आज दाल अलबत्ता तो बाजार में मांग की तुलना में बेहद कम उपलब्ध है, और जो उपलब्ध भी है तो उसकी कीमत चुकाना आम-आदमी के बस के बाहर हो गया है। वर्ष 1965-66 में देश का दलहन उत्पादन 99.4 लाख टन था, जो 2006-07 आते-आते 145.2 लाख टन ही पहुंच पाया। सन 2008-09 में देश के 220.9 लाख हैक्टर खेतों में 145.7 लाख टन दाल पैदा हो सकी। इस अवधि में देश की जनसंख्या में कई-कई गुना वृद्धि हुई है, जाहिर है आबादी के साथ दाल की मांग भी बढ़ी। हरित क्रांति के दौर में दालों की उत्पादकता दर, अन्य फसलों की तुलना में बेहद कम रही है । दलहन फसलों की बुवाई के रकबे में वृद्धि न होना भी चिंता की बात है। सन 1965-66 में देश के 227.2 लाख हेक्टेयर खेतों पर दाल बोई जाती थी, सन 2005-06 आते-आते यह घट कर 223.1 लाख हेक्टेयर रह गया। वर्ष 1985-86 में विश्व में दलहन के कुल उत्पादन में भारत का योगदान 26.01 प्रतिशत था, 1986-87 में यह आंकड़ा 19.97 पर पहुंच गया। सन 2000 आतेआत् ो इसमें कुछ वृद्धि हुई और यह 22.64 फीसदी हुआ। लेकिन ये आंकड़े हकीकत में मांग से बहुत दूर रहे। पिछले साल देश के बाजारों में दालों के रेट बहुत बढ़े थे, तब आम आदमी तो चिल्लाया था, लेकिन आलू-प्याज के लिए कोहराम काटने वाले राजनैतिक दल चुप्पी साधे रहे। पिछले साल सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एमएमटीसी ने नवंबर तक 18,000 टन अरहर और मसूर की दाल आयात करने के लिए वैश्विक टेंडर को मंजूरी दी थी। माल आया भी, उधर हमारे खेतों ने भी बेहतरीन फसल उगली। एक तरफ आयातित दाल बाजार में थी, सो किसानों को अपनी अपेक्षित रेट नहीं मिला। दाल के उत्पादन को प्रोत्साहित करने के इरादे से केंद्र सरकार ने सन 2004 में इंटीग्रेटेड स्कीम फार आईल सीड, पल्सेज, आईल पाम एंड मेज (आईएसओपीओएम) नामक योजना शुरू की थी । इसके तहत दाल बोने वाले किसानों को सबसिडी के साथ-साथ कई सुविधाएं देने की बात कही गई थी । वास्तव में यह योजना नारा बनकर रह गई। इससे पहले चौथी पंचवर्षीय योजना में ‘‘इंटेंसिव पल्सेस डिस्ट्रीक्ट प्रोग्राम’’ के माध्यम से दालों के उत्पादन को बढ़ावा देने का संकल्प लाल बस्तों से उबर नहीं पाया। सन 1991 में शुरू हुई राष्ट्रीय दलहन विकास परियोजना भी आधे-अधूरे मन से शुरू योजना थी, उसके भी कोई परिणाम नहीं निकले। जहां सन 1950-51 में हमारे देश में दाल की खपत प्रति व्यक्ति/प्रति दिन 61 ग्राम थी, वह 2009-10 आते-आते 36 ग्राम से भी कम हो गई। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) की मानें तो हमारे देश में दलहनों के प्रामाणिक बीजों की सालाना मांग 13 लाख क्विंटल है, जबकि उपलब्धता महज 6.6 लाख क्विंटल। यह तथ्य बानगी है कि सरकार दाल की पैदावार बढ़ाने के लिए कितनी गंभीर है। यह दुख की बात है कि भारत , जिसकी अर्थव्यवस्था का आधार कृषि है, वहां दाल जैसी मूलभूत फसलों की कमी को पूरा करने की कोई ठोस कृषि-नीति नहीं है। कमी हो तो बाहर से मंगवा लो, यह तदर्थवाद देश की परिपक्व कृषि-नीति का परिचायक कतई नहीं है। नेशनल सैंपल सर्वे के एक सर्वेक्षण के मुताबिक आम भारतीयों के खाने में दाल की मात्रा में लगातार हो रही कमी का असर उनके स्वास्थ्य पर दिखने लगा है। इसके बावजूद दाल की कमी कोई राजनैतिक मुद्दा नहीं बन पा रहा है। शायद सभी सियासती पार्टियों की रूचि देश के स्वास्थ्य से कहीं अधिक दालें बाहर से मंगवाने में हैं। तभी तो इतने शोर-शराबे के बावजूद दाल के वायदा कारोबार पर रोक नहीं लगाई जा रही है। इससे भले ही बाजार भाव बढ़े, सटोरियों को बगैर दाल के ही मुनाफा हो रहा है।

शुक्रवार, 16 अक्तूबर 2015

Import can not fulfil demand of pulses

आयात से नहीं भरेगा दाल का कटोरा

पंकज चतुर्वेदी

वरिष्ठ पत्रकार
लोकमत समाचार,महराष्‍ट्र 17अक्‍तूबर15
साल की शुरुआत में ही मौसम विभाग ने कम बारिश की चेतावनी दी थी और उसके बाद बेमौसम बारिश से देशभर में खेती-किसानी का जो नुकसान हुआ था, उसी समय कृषि मंत्रालय ने घोषणा कर दी थी कि इसका असर दाल पर जबर्दस्त होगा. यह पहली बार नहीं हो रहा है कि मांग की तुलना में दाल की आपूर्ति या उत्पादन कम होने से बाजार में दाल के दामों ने हाहाकार मचाया है. हर बार की तरह इस साल भी दाल आयात करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई लेकिन यहां यह समझना जरूरी है कि विदेशों से दाल मंगवाकर न तो हम आम आदमी की थाली में दाल की वापसी कर सकते हैं और न ही इसकी कीमतों पर नियंत्रण. जरूरत इस बात की है कि हमारे खेतों में दाल की बुवाई का रकबा बढे. व किसान को भी दाल उगाने के लिए प्रोत्साहन मिले. 
भारत में दालों की खपत 220 से 230 लाख टन सालाना है, जबकि कृषि मंत्रालय मार्च में कह चुका था कि इस बार दाल का उत्पादन 184. 3 लाख टन रह सकता है जो पिछले साल के उत्पादन 197. 8 लाख टन से काफी कम है. दाल की कमी होने से इसके दाम भी बढे., नतीजतन आम आदमी ने प्रोटीन की जरूरतों की पूर्ति के लिए दीगर अनाजों और सब्जियों पर निर्भर होना शुरू कर दिया. इस तरह दूसरे अनाजों व सब्जियों की भी कमी और दाम में बढ.ोत्तरी होगी. सनद रहे कि गत 25 सालों से हम हर साल दालों का आयात तो कर रहे हैं लेकिन दाल में आत्मनिर्भर बनने के लिए इसका उत्पादन और रकबा बढ.ाने की कोई ठोस योजना नहीं बन पा रही है. 
यहां जानना जरूरी है कि भारत दुनियाभर में दाल का सबसे बड.ा खपतकर्ता, पैदा करने वाला और आयात करने वाला देश है. दुनिया में दाल के कुल खेतों का 33 प्रतिशत हमारे यहां है जबकि खपत 22 फीसदी है. इसके बावजूद अब वे दिन सपने हो गए हैं जब आम-आदमी को 'दाल-रोटी खाओ, प्रभुा के गुण गाओ' कहकर कम में ही गुजारा करने की सीख दे दी जाती थी. आज दाल बाजार में मांग की तुलना में बेहद कम उपलब्ध है और जो उपलब्ध भी है उसकी कीमत चुकाना आम-आदमी के बस के बाहर है. नेशनल सैंपल सर्वे के एक सर्वेक्षण के मुताबिक आम भारतीयों के खाने में दाल की मात्रा में लगातार हो रही कमी का असर उनके स्वास्थ्य पर दिखने लगा है. इसके बावजूद दाल की कमी राजनैतिक मुद्दा नहीं बन पा रहा है. ल्ल■ आम भारतीयों के खाने में दाल की मात्रा में लगातार हो रही कमी का असर उनके स्वास्थ्य पर दिखने लगा है.








Hindustan 

हिंदुस्‍तान,17अक्‍तूबर15
यह पहली बार भी नहीं हो रहा है कि मांग की तुलना में दाल की आपूर्ति या उत्पादन कम होने से बाजार में दाल के दामों ने हाहाकार मचाया है। हर बार की तरह इस साल भी दाल आयात की प्रक्रिया शुरू हो गई है, लेकिन सच यह है कि विदेश से दाल मंगवाकर न तो हम आम आदमी की थाली में दाल की वापसी कर सकते हैं, और न ही इसकी कीमतों पर नियंत्रण।

समाधान एक ही है कि हमारे खेतों में दाल की बुवाई का रकबा बढ़े व किसान को दाल उगाने के लिए प्रोत्साहन मिले। पिछले 25 साल से हम दालों का आयात कर रहे हैं, लेकिन उनका उत्पादन और रकबा बढ़ाने की कोई ठोस योजना नहीं बना पाए।

भारत में दालों की खपत 220 से 230 लाख टन सालाना है, जबकि कृषि मंत्रालय मार्च में कह चुका था कि इस बार दाल का उत्पादन 184.3 लाख टन रह सकता है, जो पिछले साल के उत्पादन 197.8 लाख टन से काफी कम है। दाल की कमी होने से इसके दाम भी बढ़े, और आम आदमी ने प्रोटीन की जरूरत के लिए दीगर अनाजों व सब्जियों पर निर्भर होना शुरू कर दिया।

इससे इन अनाजों और सब्जियों की भी कमी व दाम में बढ़ोतरी होगी। भारत दुनिया में दाल का सबसे बड़ा खपतकर्ता, पैदा करने वाला और आयात करने वाला देश है। 1965-66 में देश का दलहन उत्पादन 99.4 लाख टन था, जो 2006-07 के आते-आते 145.2 लाख टन ही पहुंच पाया। जबकि इस दौरान आबादी में कई गुना बढ़ोतरी हुई। इस दौरान गेहूं की फसल 104 लाख टन से बढ़कर 725 लाख टन और चावल की पैदावार 305.9 लाख टन से बढ़कर 901.3 लाख टन हो गई।

पिछले साल भी बाजार में दालों के रेट बहुत बढ़े थे, तब आम आदमी तो चिल्लाया था, लेकिन आलू-प्याज के लिए कोहराम काटने वाले राजनीतिक दल चुप्पी साधे रहे। पिछले साल सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी एमएमटीसी ने नवंबर तक 18,000 टन अरहर और मसूर की दाल आयात करने के लिए वैश्विक टेंडर को मंजूरी दी थी। उधर हमारे खेतों ने भी बेहतरीन फसल उगली। आयातित दाल बाजार में थी, सो किसानों को अपेक्षित रेट नहीं मिला। निराशा की हालत में किसानों ने अगली फसल में  दालों से एक बार फिर मुंह मोड़ लिया।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की बात पर गौर करें, तो देश में दलहनों के प्रामाणिक बीजों की हर साल मांग 13 लाख कुंतल है, जबकि उपलब्धता महज 6.6 लाख कुंतल। यह बताता है कि सरकार दाल की पैदावार बढ़ाने के लिए कितनी गंभीर है। नेशनल सैंपल सर्वे के के अध्ययन बताते हैं कि आम भारतीयों के खाने में दाल की मात्रा में लगातार हो रही कमी का असर उनके स्वास्थ्य पर भी दिखने लगा है। इसके बावजूद दाल की कमी देश में कोई राजनीतिक मुद्दा नहीं बन पा रही है। शायद सभी सियासी पार्टियों की रुचि देश के स्वास्थ्य से कहीं अधिक दालें बाहर से मंगवाने में है। 

मंगलवार, 13 अक्तूबर 2015

Najafgarh lake: A forbidden Treasure of water

इस प्यास को हमने ही बुलाया है

रविवार, 11 अक्तूबर 2015

Bisahada establish example for t India

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बिसाहडा ने दिया संदेश दुनिया को बता दो


बिसाहड़ा निवासी हकीमू की दो बेटियों रेशमा और जैतून की बारात आ चुकी हैं। बारात पड़ोसी गांव प्यावली और दूसरी सादुदल्ला पुर से आई है। रेशमा की शादी प्यावली गांव के रहने वाले मोबिन से मुकर्रर हुई है, जबकि जैतून की शादी सदल्लापुर के युवक नाजिम से तय हुई है।
जिस समय सारे टीवी चैनल भारत की कानपुर में दक्षणि अफ्रीका के हाथों हार पर मातम मना रहे थे, ठीक उसी समय दादरी का वह बिसाहडा गांव, जाे अभी एक सप्‍ताह पहले तक दुनिया में भारत के लिए शर्म का कारण बना था, उसने जता दिया कि असली भारत अपसी सौहार्द , समन्‍वय और स्‍नेह का हैा गांव के ही दिवंगत इखलाक के पडोसी मुहम्‍म्‍द हकीम की दो बेटियों का निकाह पूरे गांव ने मिल जुल कर कियाा
गांव में तनाव को देखकर दुल्हों के घर वालों ने बिसाहड़ा में बारात लाने से इंकार कर दिया था। तीनों और के लोगों ने बैठकर तय किया कि दादरी के किसी मैरिज होम में शादी कर ली जाएगी। जब यह बात गांव में पहुंची तो गांव के बुजुर्ग सहमत नहीं हुए। बुजुर्गों ने बीते शुक्रवार को पंचायत की। फैसला दिया कि बेटी हकीमू की नहीं हैं, बिसाहड़ा गांव की हैं। अगर शादी दादरी में हुई तो गांव के माथे पर एक और कलंक लग जाएगा। गांव से ही बेटियों की डोली उठेंगी।
और आज ऐसा हुआ भी पूरे गांव ने बारात का स्‍वागत किया, बारात को सरकारी स्‍कूल में ठहराया गया, हिंदुओं ने तीन हजार लोगों के लिए शाकाहारी खाना बनवाया और बारातियों के साथ साथ सभी ने खाना साथ खाया, प्रशासन और पुलिस के साथ साथ गांव के लगभग हर घर ने बच्चियों को भेंट दी, इस शादी पर आया खर्च और स्‍वागत सत्‍कार पूरी तरह गांव के हिंदुओं ने ही कियाा
गावं के लोग बधाई के पाञ हैं कि उनके कारण हम दुनिया को बता पा रहे हैं कि इखलाक वाला दुखद, शर्मनाक हादसा हो गया, लेकिन हम उससे उबरना भी जानते हैा सच में लगा कि प्रमेचंद की कहानी के ''अलगू चौधरी व शेख जुम्‍मन'' का गांव है बिसाहडा
यही नहीं आज पूरे गांव के हिंदुओं ने चंदा कर गांव में ही मस्जिद बनाने का भी एलान कर दियाा
हां, ऐसा नहीं है कि शैतान किस्‍म के लेाग अभी भी चुप बैठे हैं, वे ''कथित निर्दोश'' लेागों को फंसाने के आरोप में एक जाति वि शेष की पंचायत, आसपास के गांव वलों को जोडने की कवायद भी कर रहे हैं , यदि ऐसे लेाग फिर जमा होते हें तो यह प्रशासन की असफलता होगी, गांव के लोगों ने तो अपना काम कर दिया हैा
मैंने कभी नहीं कहा कि मेरी किसी पोस्‍ट को साझा करें, लेकिन मैं चाहूंगा कि इसे अंग्रेजी, उर्द व अन्‍य भाषाओं में अनुवाद भी करें व साझा करें ताकि दुनिया जान लें कि असलील बिसाहडा कैसेा है
सलाम बिसाहडा

शनिवार, 10 अक्तूबर 2015

A SUCSSESFUL DECADE OF RIGHT TO INFORMATION ACT-2005 11th October 2015

देश को आजादी के बाद सबसे बडी आजादी देने वाले कानून के दस साल हो गए, जिलसके चलते सरकार का लेखा जोखा आम आदमी को उपलब्‍ध होने का जरिया खुला, एक ऐसा कानून जिससे अफसरान व दफतर खौफ खाते हैं और कहा जा सकता है कि देश की दूसरी असली क्रांति का जनक यही कानून है , लंबी लोकतांञिक बहस, विमर्श, पारदर्शिता के बाद 12 अक्‍तूबर 2005 को सूचना का अधिकार अर्थात राईट टू इन्फाॅरमेशन कानून जम्‍मू कश्‍मीर के अलावा पूरे देश में लागू हुआ था, आरटीआई का अर्थ है सूचना का अधिकार और इसे संविधान की धारा 19 (1) के तहत एक मूलभूत अधिकार का दर्जा दिया गया है। धारा 19 (1), जिसके तहत प्रत्‍येक नागरिक को बोलने और अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता दी गई है और उसे यह जानने का अधिकार है कि सरकार कैसे कार्य करती है, इसकी क्‍या भूमिका है, इसके क्‍या कार्य हैं आदि।इसकी सफलता की लाखों कहानियां गांव कस्‍बों तक फैली हैं , इस दिन को याद करें, ''सूचना का अधिकार अर्थात राईट टू इन्फाॅरमेशन'' के एक दशक पूरा होने पर बधाई, शुभकामनाएं
गाय गोबर, दंगों को याद करने वालों जरा कुछ सकारात्‍मक अतीत को भी याद कर लिया करो

Drought and migration become regular feature of Bundelkhand

पानीदार बुन्देलखण्ड सूख रहा है

इंटरनेशनल नेचुरल डिजास्टर रिडक्शन दिवस, 13 अक्टूबर 2015 पर विशेष


.मध्यप्रदेश की सरकार ने अभी पांच जिलों की 33 तहसीलों को सूखग्रस्त घोषित कर दिया है जिसमें बुंदेलखंड के टीकमगढ़ जिले की सभी तहसीलें हैं। टीकमगढ जिले के जतारा ब्लाक के जल संसाधन विभाग के तहत आने वाले 26 तालबों में अभी एक फुट पानी भी नहीं है। छतरपुर के हालात भी बदतर हैं।लेकिन हालात छतरपुर व पन्ना के भी कम खतरनाक नहीं है।। गांव-गांव में हैंडपंप सूख गए हैं
MP Jansandesh 17-10-15
और कस्बों में पानी के लिए आए रोज झगड़े हो रहे हैं। टीकमगढ़ जिले के आधे से ज्यादा गांव वीरान हो गए है। तो रेलवे स्टेषन से सटे कस्बों- खजुराहो, हरपालपुर, मउरानीपुर, बीना आदि के प्लेटफार्म पूरी गृहस्थी पोटली में बांधे हजारों लोगों से पटे पड़े हैं जो पानी के अभाव में गांव छोड़कर पेट पालने के लिए दिल्ली, पंजाब या लखनउ जा रहे हैं। आमतौर पर ऐसा पलायन दीवाली के बाद होता था, लेकिन इस बार खाली पेट व सूखा गला दोना ही मजबूर कर रहा है अपनेद पुष्तैनी घरों से दूर दीवाली के दीये जलाने को। आषाढ़ में जो बरसा बस वही था, लगभग पूरा सावन-भादो निकल गया है और जो छिटपुट बारिश हुई है, उससे बुन्देलखण्ड फिर से अकाल-सूखा की ओर जाता दिख रहा है। यहाँ सामान्य बारिश का तीस फीसदी भी नहीं बरसा, तीन-चौथाई खेत बुवाई से ही रह गए और कोई पैंतीस फीसदी ग्रामीण अपनी पोटलियाँ लेकर दिल्ली-पंजाब की ओर काम की तलाश में निकल गए हैं।

PRABHAT, MEERUT 18-10-15
मनरेगा में काम करने वाले मजदूर मिल नहीं रहे हैं। ग्राम पंचायतों को पिछले छह महीने से किये गए कामों का पैसा नहीं मिला है सो नए काम नहीं हो रहे हैं। सियासतदाँ इन्तजार कर रहे हैं कि कब लोगों के पेट से उफन रही भूख-प्यास की आग भड़के और उस पर वे सियासत की हांडी खदबदाएँ। हालांकि बुन्देलखण्ड के लिये यह अप्रत्याशित कतई नहीं है, बीते कई सदियों से यहाँ हर पाँच साल में दो बार अल्प वर्षा होती ही है। 

गाँव का अनपढ़ भले ही इसे जानता हो, लेकिन हमारा पढ़ा-लिखा समाज इस सामाजिक गणित को या तो समझता नहीं है या फिर नासमझी का फरेब करता है, ताकि हालात बिगड़ने पर ज्यादा बजट की जुगाड़ हो सके। ईमानदारी से तो देश का नेतृत्व बुन्देलखण्ड की असली समस्या को समझ ही नहीं पा रहे हैं।

बुन्देलखण्ड की असली समस्या अल्प वर्षा नहीं है, वह तो यहाँ सदियों, पीढ़ियों से होता रहा है। पहले यहाँ के बाशिन्दे कम पानी में जीवन जीना जानते थे। आधुनिकता की अंधी आँधी में पारम्परिक जल-प्रबन्धन तंत्र नष्ट हो गए और उनकी जगह सूखा और सरकारी राहत जैसे शब्दों ने ले ली। 

अब सूखा भले ही जनता पर भारी पड़ता हो, लेकिन राहत का इन्तजार सभी को होता है- अफसरों, नेताओं सभी को। इलाके में पानी के पारम्परिक स्रोतों का संरक्षण व पानी की बर्बादी को रोकना, लोगों को पलायन के लिये मजबूर होने से बचाना और कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना; महज ये तीन उपचार बुन्देलखण्ड की तकदीर बदल सकते हैं।

मध्य प्रदेश के सागर सम्भाग के पाँच, दतिया, और जबलपुर, सतना जिलों का कुछ हिस्सा और उत्तर प्रदेश के झाँसी सम्भाग के सभी सात जिले बुन्दलेखण्ड के पारम्परिक भूभाग में आते हैं। बुन्देलखण्ड की विडम्बना है कि एक सांस्कृतिक और सामाजिक एक रूप भौगोलिक क्षेत्र होने के बावजूद यह दो राज्यों- मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में बँटा हुआ है। 

कोई 1.60 लाख वर्ग किमी क्षेत्रफल के इस इलाके की आबादी तीन करोड़ से अधिक है। यहाँ हीरा, ग्रेनाईट की बेहतरीन खदानें हैं, जंगल तेंदू पत्ता, आँवला से पटे पड़े हैं, लेकिन इसका लाभ स्थानीय लोगों को नहीं मिलता है। दिल्ली, लखनऊ और उससे भी आगे पंजाब तक जितने भी बड़े निर्माण कार्य चल रहे हैं उसमें अधिकांश में ‘‘गारा-गुम्मा’’ (मिट्टी और ईंट) का काम बुन्देलखण्डी मजदूर ही करते हैं। 

शोषण, पलायन और भुखमरी को वे अपनी नियति समझते हैं। जबकि खदानों व अन्य करों के माध्यम से बुन्देलखण्ड सरकारों को अपेक्षा से अधिक कर उगाह कर देता है, लेकिन इलाके के विकास के लिये इस कर का 20 फीसदी भी यहाँ खर्च नहीं होता है।

बुन्देलखण्ड के पन्ना में हीरे की खदानें हैं, यहाँ का ग्रेनाईट दुनिया भर में धूम मचाए हैं। यहाँ की खदानों में गोरा पत्थर, सीमेंट का पत्थर, रेत-बजरी के भण्डार हैं। इलाके के गाँव-गाँव में तालाब हैं, जहाँ की मछलियाँ कोलकाता के बाजार में आवाज लगा कर बिकती हैं। इस क्षेत्र के जंगलों में मिलने वाले अफरात तेंदू पत्ता को ग्रीन-गोल्ड कहा जाता है। 

आँवला, हर्र जैसे उत्पादों से जंगल लदे हुए हैं। लुटियन की दिल्ली की विशाल इमारतें यहाँ के आदमी की मेहनत की साक्षी हैं। खजुराहो, झाँसी, ओरछा जैसे पर्यटन स्थल साल भर विदेशी घुमक्कड़ों को आकर्षित करते हैं। अनुमान है कि दोनों राज्यों के बुन्देलखण्ड मिलाकर कोई एक हजार करोड़ की आय सरकार के खाते में जमा करवाते हैं, लेकिन इलाके के विकास पर इसका दस फीसदी भी खर्च नहीं होता है।

बुन्देलखण्ड के सभी कस्बे, शहर की बसाहट का एक ही पैटर्न रहा है - चारो ओर ऊँचे-ऊँचे पहाड़, पहाड़ की तलहटी में दर्जनों छोटे-बड़े ताल-तलैया और उनके किनारों पर बस्ती। टीकमगढ़ जैसे जिले में अभी तीन दशक पहले तक हजार से ज्यादा तालाब थे। पक्के घाटों वाले हरियाली से घिरे व विशाल तालाब बुन्देलखड के हर गाँव- कस्बे की सांस्कृतिक पहचान हुआ करते थे। 

ये तालाब भी इस तरह थे कि एक तालाब के पूरा भरने पर उससे निकला पानी अगले तालाब में अपने आप चला जाता था, यानी बारिश की एक-एक बूँद संरक्षित हो जाती थी। चाहे चरखारी को लें या छतरपुर को सौ साल पहले वे वेनिस की तरह तालाबों के बीच बसे दिखते थे। अब उपेक्षा के शिकार शहरी तालाबों को कंक्रीट के जंगल निगल गए। रहे- बचे तालाब शहरों की गन्दगी को ढोनेे वाले नाबदान बन गए।

गाँवों की अर्थ व्यवस्था का आधार कहलाने वाले चन्देलकालीन तालाब सामन्ती मानसिकता के शिकार हो गए। सनद रहे बुन्देलखण्ड देश के सर्वाधिक विपन्न इलाकों में से है। यहाँ ना तो कल-कारखाने हैं और ना ही उद्योग-व्यापार। महज खेती पर यहाँ का जीवनयापन टिका हुआ है। 

कुछ साल पहले ललितपुर जिले में सीटरस फलों जैसे संतरा, मौसम्बी, नीबू को लगाने का सफल प्रयोग हुआ था। वैज्ञानिकों ने भी मान लिया था कि बुन्देलखण्ड की पथरीली व अल्प वर्षा वाली जमीन नागपुर को मात कर सकती है। ना जाने किस साज़िश के तहत उस परियोजना का न तो विस्तार हुआ और ना ही ललितपुर में ही जारी रहा।

कभी पुराने तालाब जीवनरेखा कहलाते थे। समय बदला और गाँवों में हैंडपम्प लगे, नल आये तो लोग इन तालाबों को भूलने लगे। कई तालाब चौरस मैदान हो गए कई के बन्धान टूट गए। तो जो रहे बचे, तो उनकी मछलियों और पानी पर सामन्तों का कब्जा हो गया। तालाबों की व्यवस्था बिगड़ने से ढीमरों की रोटी गई। तालाब से मिलने वाली मछली, कमल-गट्टे, यहाँ का अर्थ-आधार हुआ करते थे। वहीं किसान सिंचाई से वंचित हो गया। कभी तालाब सूखे तो भूगर्भ जल का भण्डार भी गड़बड़ाया।

बुन्देलखण्ड के सभी कस्बे, शहर की बसाहट का एक ही पैटर्न रहा है - चारो ओर ऊँचे-ऊँचे पहाड़, पहाड़ की तलहटी में दर्जनों छोटे-बड़े ताल-तलैया और उनके किनारों पर बस्ती। टीकमगढ़ जैसे जिले में अभी तीन दशक पहले तक हजार से ज्यादा तालाब थे। पक्के घाटों वाले हरियाली से घिरे व विशाल तालाब बुन्देलखड के हर गाँव- कस्बे की सांस्कृतिक पहचान हुआ करते थे। ये तालाब भी इस तरह थे कि एक तालाब के पूरा भरने पर उससे निकला पानी अगले तालाब में अपने आप चला जाता था, यानी बारिश की एक-एक बूँद संरक्षित हो जाती थी।आज के अत्याधुनिक सुविधा सम्पन्न भूवैज्ञानिकों की सरकारी रिपोर्ट के नतीजों को बुन्देलखण्ड के बुजुर्गवार सदियों पहले जानते थे कि यहाँ की ग्रेनाईट संरचना के कारण भूगर्भ जल का प्रयोग असफल रहेगा। तभी हजार साल पहले चन्देलकाल में यहाँ की हर पहाड़ी के बहाव की ओर तालाब तो बनाए गए, ताकि बारिश का अधिक-से-अधिक पानी उनमें एकत्र हो, साथ ही तालाब की पाल पर कुएँ भी खोदे गए। लेकिन तालाबों से दूर या अपने घर-आँगन में कुँआ खोदने से यहाँ परहेज होता रहा।

गत् दो दशकों के दौरान भूगर्भ जल को रिचार्ज करने वाले तालाबों को उजाड़ना और अधिक-से-अधिक टयूबवेल, हैण्डपम्पों को रोपना ताबड़तोड़ रहा। सो जल त्रासदी का भीषण रूप तो उभरना ही था। साथ-ही-साथ नलकूप लगाने में सरकार द्वारा खर्च अरबों रुपए भी पानी में गए। क्योंकि इस क्षेत्र में लगे आधेेेे से अधिक हैण्डपम्प अब महज ‘शो-पीस’ बनकर रह गए हैं। साथ ही जलस्तर कई मीटर नीचे होता जा रहा है। इससे खेतों की तो दूर, कंठ तर करने के लिये पानी का टोटा हो गया है।

कभी बुन्देलखण्ड के 45 फीसदी हिस्से पर घने जंगल हुआ करते थे। आज यह हरियाली सिमट कर 10 से 13 प्रतिशत रह गई है। यहाँ के जंगलों में रहने वाले आदिवासियों सौर, कौंदर, कौल और गोंडों की यह जिम्मेदारी होती थी कि वे जंगल की हरियाली बरकरार रखे। ये आदिवासी वनोपज से जीवीकोपार्जन चलाते थे, सूखे गिरे पेड़ों को ईंधन के लिये बेचते थे। लेकिन आजादी के बाद जंगलों के स्वामी आदिवासी वनपुत्रों की हालत बंधुआ मजदूर से बदतर हो गई। 

ठेकेदारों ने जमके जंगल उजाड़े और सरकारी महकमों ने कागजों पर पेड़ लगाए। बुन्देलखण्ड में हर पाँच साल में दो बार अल्प वर्षा होना कोई आज की विपदा नहीं है। फिर भी जल, जंगल, जमीन पर समाज की साझी भागीदारी के चलते बुन्देलखण्डी इस त्रासदी को सदियों से सहजता से झेलते आ रहे थे।

पलायन, यहाँ के सामाजिक विग्रह का चरम रूप है। मनरेगा भी यहाँ कारगर नहीं रहा है। स्थानीय स्तर पर रोज़गार की सम्भावनाएँ बढ़ाने के साथ-साथ गरीबों का शोषण रोककर इस पलायन को रोकना बेहद जरूरी है। यह क्षेत्र जल संकट से निबटने के लिये तो स्वयं समर्थ है, जरूरत इस बात की है कि यहाँ की भौगोलिक परिस्थितियों के मद्देनज़र परियोजनाएँ तैयार की जाएँ। विशेषकर यहाँ के पारम्परिक जल स्रोतों का भव्य अतीत स्वरूप फिर से लौटाया जाये। यदि पानी को सहेजने व उपभोग की पुश्तैनी प्रणालियों को स्थानीय लोगों की भागीदारी से संचालित किया जाये तो बुन्देलखण्ड का गला कभी रीता नहीं रहेगा।

यदि बुन्देलखण्ड के बारे में ईमानदारी से काम करना है तो सबसे पहले यहाँ के तालाबों का संरक्षण, उनसे अतिक्रमण हटाना, तालाब को सरकार के बनिस्पत समाज की सम्पत्ति घोषित करना सबसे जरूरी है। नारों और वादों से हटकर इसके लिये ग्रामीण स्तर पर तकनीकी समझ वाले लोगों के साथ स्थायी संगठन बनाने होंगे। 

दूसरा इलाके के पहाड़ों को अवैध खनन से बचाना, पहाड़ों से बहकर आने वाले पानी को तालाब तक निर्बाध पहुँचाने के लिये उसके रास्ते में आये अवरोधों, अतिक्रमणों को हटाना जरूरी है। बुन्देलखण्ड में केन, केल, धसान जैसी गहरी नदियाँ हैं जो एक तो उथली हो गई हैं, दूसरा उनका पानी सीधे यमुना जैसी नदियों में जा रहा है। 

इन नदियों पर छोटे-छोटे बाँध बाँधकर पानी रोका जा सकता है। हाँ, केन-धसान नदियों को जोड़ने की अरबों रुपए की योजना पर फिर से विचार भी करना होगा, क्योंकि इस जोड़ से बुन्देलखण्ड घाटे में रहेगा। सबसे बड़ी बात, स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय लोगों की निर्भरता बढ़ानी होगी।

कुछ जगह हो सकता है कि राहत कार्य चले, हैण्डपम्प भी रोपे जाएँ, लेकिन हर तीन साल में आने वाले सूखे से निबटने के दीर्घकालीन उपायों के नाम पर सरकार की योजनाएँ कंगाल ही नजर आती है। स्थानीय संसाधनों तथा जनता की क्षमता-वृद्धि, कम पानी की फसलों को बढ़ावा, व्यर्थ जल का संरक्षण जैसे उपायों को ईमानदारी से लागू करे बगैर इस शौर्य-भूमि का तकदीर बदलना नामुमकिन ही है।

cow is not a political animal

महज नारों से नहीं बचेगा गौवंश 


गाय हमारी माता है, गाय को बचाना है, गाय देश की पहचान है आदि नारे समय-समय पर हवा में तिरते हैं, कुछ गोष्ठी, सेमिनार-जुलूस और उसके बाद फिर वही ढाक के तीन पात। सड़क पर ट्रकों में लदी गायों को पुलिस को पकड़वा कर, उन गाड़ियों में आग लगा कर व कुछ लोगों को पीट कर लोग मान लेते हैं कि उन्होंने बड़ा धर्म-रक्षा का काम कर दिया। ऐसी हरकतों में लिप्त कुछ चेहरे चुनावों में चमकते हैं और फिर सत्ता-सुख में भारत माता के साथ ही गौ माता को भी भूल जाते हैं। आंकड़े बताते हैं कि हमारे गांवों में खेती के रकबे कम हो रहे हैं, बैल पर आधारित खेती की जोत तेजी से घट रही है। यही नहीं, हमारी गाय का दूध दुनिया में सबसे कम है, इसके साथ ही गांवों के शहर की और दौड़ने या फिर शहरों के गांवों की ओर संकुचित होने के चलते ग्रामीण अंचलों में घर के आकार छोटे हो रहे हैं और ऐसे में गाय-बैल रखने की जगह निकालना कठिन होता जा रहा है। जब तक ऐसी व्यावहारिक बातों को सामने रख कर गौ-धन संरक्षण की बात नहीं होगी, तबतक बात नहीं बन सकती। गौवंश से पे्रम की हकीकत पूरे बुंदेलखंड में देखी जा सकती है, जहां साल के आठ महीने गाय सड़कों पर बैठी रहती हैं, जब उसके बच्चा देने व दूध के दिन आते हैं तो मालिक घर ले जाता है, वरना सभी हाईवे रात में गायों से पटे होते हैं व गाय वहां सड़क दुर्घटना का सबसे बड़ा कारक होती है। मानव सभ्यता के आरंभ से ही गौवंश इंसान के विकास पथ का सहयात्री रहा है। मोहन जोदड़ों व हड़प्पा से मिले अवशेष साक्षी हैं कि पांच हजार साल पहले भी हमारे यहां गाय-बैल
PRABHAT, MEERUT, 11-10-15
पूजनीय थे। आज भी भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मूल आधार गौवंश है। हालांकि भैंस के बढ़ते प्रचलन तथा कतिपय कारखाना मालिकों व पेट्रो उद्योग के दवाब में गांवों में अब टै्रक्टर व अन्य मशीनों का प्रयोग बढ़ा है, लेकिन यह बात अब धीरे-धीरेे समझ आने लगी है कि हल खींचने, पटेला फेरने, अनाज से दानों व भूसे को अलग करने फसल काटने, पानी खींचने और अनाज के परिवहन में छोटे किसानों के लिए बैल न केवल किफायती है, बल्कि धरती व पर्यावरण का संरक्षक भी है। आज भी अनुमान है कि बैल हर साल एक अरब 20 करोड़ घंटे हल चलाते हैं। गौ रक्षा के क्षेत्र में सक्रिय लोगों को यह बात जान लेनी चाहिए कि अब केवल धर्म, आस्था या देवी-देवता के नाम पर गाय को बचाने की बात करना न तो व्याहवारिक है और न तार्किक। जरूरी है कि लोगों को यह संदेश दिया कि गाय केवल अर्थव्यवस्था ही नहीं, पर्यावरण की भी संरक्षक है और इसीलिए इसे बचाना जरूरी है। बस्तर अंचल का एक जिला मुख्यालय है कोंडागांव। कहने को यह जिला मुख्यालय है, लेकिन आज भी निपट गांव ही है। कहने की जरूरत नहीं कि वहां नक्सलियों की अच्छी पकड़ है। यहां पर डॉ. राजाराम त्रिपाठी ने जड़ी बूटियों के जंगल लगा रखे हैं। कोई 140 किस्म की जड़ी बूटियां यहां से दुनियाभर के कई देशों में जाती हैं। डॉ. त्रिपाठी के उत्पादों की खासियत है कि उसमें किसी भी किस्म का कोई भी रसायन नहीं होता है। उनके जंगलों में 300 से ज्यादा गायें हैं। आसपास के इलाकों में जब कोई कहता है कि उनकी गाय बीमार है, बेकार है या लावारिस छोड़ देता है तो डॉ. त्रिपाठी उसे अपने यहां ले आते हैं, उसका इलाज करते हैं व अन्य गाय-समूह के साथ जंगलों में छोड़ देते हैं। इन गायों के गोबर व मूत्र से ही वे जड़ी-बूटियों के झाड़ों की रक्षा करते हैं और इसीलिए वे गायों की रक्षा करते हैं। डॉ. त्रिपाठी बताते हैं कि गायों के चलने से उनके खुरों से जमीन की एक किस्म की मालिश होती है, जो उसकी उर्वरा व प्रतिरोधी शक्ति को बढ़ावा देती है। कहने की जरूरत नहीं है कि डॉ. त्रिपाठी की गाय में श्रद्धा है, लेकिन उन्होंने इस श्रद्धा को अपने व्यवसाय से जोड़ा तथा दुनिया में देश का नाम भी रोशन किया।हरियाणा के रोहतक जिले के डीघल या पश्चिमी दिल्ली में कई स्थानों पर ऐसी कई गौशालाएं हैं, जहां बीमार-अशक्त गायों को आसरा दिया जाता है। वहां गायों के लिए पंखे लगे हैं, उन्हें अच्छी खुराक दी जाती है, लेकिन इन स्थानों पर गाय का दूध बेचना या उसे किसी उत्पाद का व्यावसायिक इस्तेमाल नहीं होता है। एक बारगी भावनात्मक स्तर पर यह पावन लगता है, लेकिन एक तरह से यह संसाधनों का दुरुपयोग है। यदि गौशाला में रहने वाली तीन-चार सौ गायों के गोबर से केवल बायो गैस के माध्यम से ईंधन बचाया जाए या कुछ बिजली बचाई जाए तो यह अन्य लोगों के लिए अनुकरणीय उदाहरण होगा और लोग इस कार्य के लिए प्रेरित होंगे। अब गौशाला चलाने के लिए पशु आहार के लिए भी भावनाओं से काम नहीं चलना चाहिए। गाय को क्या खिलाया जाए व कितना खिलाया जाए, इसके लिए उसको समझना भी जरूरी है। जहां तक संभव हो गाय को हरा व गूदेदार चारा देना चाहिए। हरे चारे के कारण उम्रदराज व अशक्त जानवर भी मजबूत हो जाते हैं। बारीक कटा हुआ चारा खिलाना कम खर्चीला होता है। इससे न केवल चारे को बचाया जा सकता है, वरन इससे पशु में काम करने की ताकत ज्यादा आती है, क्योंकि यह पचता सहजता से जाता है। गाय को बचाने की बात करने में जरा भी ईमानदारी हो तो सबसे पहले देश के लगभग सभी हाईवे पर बारिश के मौसम की रातों में जा कर देखना होगा कि आखिर हजारों-हजार गायें सड़क पर क्यों बैठी होती हैं। जरा ध्यान से देखें इस झुंड में एक भी भैंस नहीं मिलती। जाहिर है कि गाय को पालने का खर्च इतना है कि उसके दूध को बेच कर पशु-पालक की भरपाई होती नहीं है। भारत की गाय का दुग्ध उत्पादन दुनिया में सबसे कम है। डेनमार्क में दूध देने वाली प्रत्येक गाय का वार्षिक उत्पादन औसत 4101 लीटर है, स्विट्जरलैंड में 4156 लीटर, अमेरिका में 5386 और इंग्लैंड में 4773 लीटर है। वहीं भारत की गाय सालाना 500 लीटर से भी कम दूध देती है। उधर यदि बरेली के आईवीआरआई यानी इंडियन वेटेनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट में जा कर देखें तो वहां केवल चार किस्म की भारतीय गौ नस्लों पर काम हो रहा है और वृंदावनी व थारपार जैसी किस्म की गायें एक दिन में 22 लीटर तक दूध देती हैं। हां, ये गायें कुछ महंगी जरूर हैं, सो इनका प्रचलन बहुत कम है। जाहिर है कि भारत में गाय पालना बेहद घाटे का सौदा है। तभी जब गाय दूध देती है तब तो पालक उसे घर रखता है और जब वह सूख जाती है तो सड़क पर छोड़ देता है। बारिश के दिनों में गाय को कहीं सूखी जगह बैठने को नहीं मिलती, वह मक्खियों व अन्य कीटों से तंग रहती है, सो हाईवे पर कुनबे सहित बैठी होती हैं। विडंबना है कि हर दिन इस तरह मुख्य सड़क पर बैठी या टहलती गायों की असामयिक मौत होती है और उनके चपेट में आ कर इंसान भी चोटिल होते हैं और इस तरह आवारा गाय आम लोगों की संवेदना भी खो देती है। कुछ गांवों में गौ पालन के सामुदायिक प्रयोग किए जा सकते हैं। इसमें पूरे गांव की गायों का एक साथ पालन, उससे मिलने वाले उत्पाद का एकसाथ विपणन और उससे होने वाली आय का सभी गौ पालकों में समान वितरण जैसे प्रयोग करने जरूरी हैं। विडंबना है कि देशभर के अधिकांश गावों में सार्वजनिक गौचर की भूमि अवैध कब्जों में है। सामुदायिक पशु पालन से ऐसी चरती की जमीनों की मुक्ति का रास्ता निकलेगा। ग्रामीण सड़क परिवहन में बैल का इस्तेमाल करने के कुछ कानून बनें, गाय की खुराक, उसको रखने के स्थान की साफ-सफाई आदि का मानकीकरण जरूरी हो। पशु चिकित्सक के पाठ्यक्रम में भारतीय नस्ल के गाय-बैल के रोगों पर विशेष सामग्री हो। भारवाहक या खेत में काम करने वाले बैल के भोजन, स्वास्थ्य और काम करने के घंटों पर स्पष्ट व कठोर मार्गदर्शन हों। ये कुछ छोटे-छोटे प्रयोग ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सामजिक ताने-बाने को मजबूत करेंगे ही, गाय का भी संरक्षण करेंगे।यदि वास्तव में गाय को बचाना है तो उसके धार्मिक पक्ष के बनिस्पत उसके व्यावसायिक पक्ष को ज्यादा उजागर करना होगा, साथ ही बूढ़ी या अशक्त हो गए ढोरों के लिए समाज व सरकार की मदद से अच्छे आश्रय स्थल बनाने की दीर्घकालीन योजना भी बनानी जरूरी हैं, ताकि गौपालक उनके बेकार होने के हालात में उसे कसाई के हाथों देने की जगह ऐसी गौशालाओं में उन्हें पहुंचाने पर विचार कर सकें। गाय को बचाने के लिए नारों या जुमलों की नहीं, सशक्त कदमों की जरूरत है।

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