तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

Yes We are a Violant Society


हम अहिंसक थे ही कब !



जैसा कि हर 30 जनवरी को होता है, ठीक 11 बजे कहीं सायरन बजेगा तो कहीं अन्य किसी तरह से वक्त की सूचना होगी। दो मिनट का मौन होगा, कुछ स्कूलों में जबरिया मौन रखवाया जाएगा, जहां बच्चे दांत दबा कर हंसेंगे और फिर मौन समाप्त होने के बाद कुछ बच्चों की पिटाई होगी। इस तरह रस्म अदायगी होगी और याद किया जाएगा कि आज वह इंसान हिंसा का शिकार हो कर गोलोकवासी हो गया था, जिसके बारे में कहा जाता है कि उनकी अहिंसा की नीति के बल पर देश को आजादी मिली। भारत की आजादी की लड़ाई या समाज के बारे में देश-दुनिया की कोई भी किताब या नीति पढं़े तो पाएंगे कि हमारा मुल्क अहिंसा के सिद्धांत पर चलता है। एक वर्ग जो अपने पर ‘पिलपिले लोकतंत्र’ का आरोप लगवा कर गर्व महसूस करता है, खुद को गांधीवादी बताता है तो दूसरा वर्ग जो गांधी को
देश के लिए अप्रासंगिक और बेकार मानता है, वह गांधीवादी (?) नीतियों को आतंकवाद जैसी कई समस्याओं का कारक मानता है। असल में इस मुगालते का कभी आकलन किया ही नहीं गया कि क्या हम गांधीवादी या अहिंसक हैं? आज तो यह बहस भी जमकर उछाली जा रही है कि असल में देश को आजादी गांधी या उनकी अहिंसा के कारण नहीं मिली, उसका असल श्रेय तो नेताजी की आजाद हिंद फौज या भगत सिंह की फांसी को जाता है। जाहिर है कि खुला बाजार बनी दुनिया और हथियारों के बल पर अपनी अर्थ नीति को विकसित की श्रेणी में रखने वाले देश हमारी अहिंसा को न तो मानेंगे और न ही मानने देंगे।आए रोज की छोटी-बड़ी घटनाएं गवाह हैं कि हम भी उतने ही हिंसक और अशांति प्रिय हैं, जिसके लिए हम पाकिस्तान या अफगानिस्तान या अमेरिका को कोसते हैं। भरोसा न हो तो अभी कुछ साल पहले ही अफजल गुरु या कसाब की फांसी के बाद आए बयान, जुलूस, मिठाई बांटने, बदला पूरा होने, कलेजे में ठंडक पहुंचने की अनगिनत घटनाओं को याद करें। हम मांगों के लिए हुल्लड़ कर लोगों को सताने या सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान करने, मामूली बात पर हत्या कर देने, पड़ोसी देश के एक के बदले 10 सिर लाने के बयान, एक के बदले 100 का धर्म परिवर्तन करवाने, सुरेंद्र कोली को फांसी पर चढ़ाने को बेताब दिखने वाले जल्लाद के बयान जैसी घटनाएं आए रोज सुर्खियों में आती हैं और आम इंसान का मूल स्वभाव इसे उभरता है। जाहिर है कि बदला पूरा होने की बात करना हमारे मूल हिंसक स्वभाव का ही प्रतीक है। आखिर यह सवाल उठ ही क्यों रहा है? इंसानियत या इंसान को कठघरे में खड़ा करने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए कि यदि एक बार हम मान लेंगे कि हमारे साथ कोई समस्या है तो उसके निदान की अनिवार्यता या विकल्प पर भी विचार करेंगे। हम मुंह में गांधी और बगल में छुरी के अपने दोहरे चरित्र से उबरने का प्रयास करेंगे। जब सिद्धांतत: मानते हैं कि हम तो अहिंसक या शांतिप्रिय समाज हैं तो यह स्वीकार नहीं कर रहे होते हैं कि हमारे समाज के सामने कोई गूढ़ समस्या है, जिसका निदान आवश्यक है। मेनन, अफजल गुरु या कसाब की फांसी पर आतिशबाजी चलाना या मिठाई बांटना उतना ही निंदनीय है, जितना उनको मुकर्रर अदालती सजा के अमल का विरोध। जब समाज का कोई वर्ग अपराधी की फांसी पर खुशी मनाता है तो एकबारगी लगता है कि वह उन निर्दोष लोगों की मौत और उनके पीछे छूट गए परिवार के स्थाई दर्द की अनदेखी कर रहा है। ऐसा इसीलिए होता है, क्योंकि समाज का एक वर्ग मूलरूप से हिंसा-प्रिय है। देश में आए रोज ऐसे प्रदर्शन, धरने, शादी-ब्याह, धार्मिक जुलूस देखे जा सकते हैं, जो उन आत्ममुग्ध लोगों के शक्ति प्रदर्शन का माध्यम होते हैं और उनके सार्वजनिक स्थान पर बलात अतिक्रमण के कारण हजारों बीमार, मजबूर, किसी काम के लिए समय के साथ दौड़ रहे लोगों के लिए शारीरिक-मानसिक पीड़ादायी होते हैं। ऐसे नेता, संत, मौलवी बेपरवाह होते हैं, उन हजारों लोगों की परेशानियों के प्रति। असल में हमारा समाज अपने अन्य लोगों के प्रति संवेदनशील ही नहीं है, क्योंकि मूलरूप से हिंसक-कीड़ा हमारे भीतर कुलबुलाता है। ऐसी ही हिंसा, असंवेदनशीलता और दूसरों के प्रति बेपरवाही के भाव का विस्तार पुलिस, प्रशासन और अन्य सरकारी एजेंसियों में होता है। हमारे सुरक्षा बल केवल डंडे-हथियार की ताकत दिखा कर ही किसी समस्या का हल तलाशते हैं। हकीकत तो यह है कि गांधीजी शुरुआत से ही जानते थे कि हिंसा व बदला इंसान का मूल स्वभाव है व उसे बदला नहीं जा सकता। सन् 1909 में ही, जब गांधीजी महात्मा गांधी नहीं बने थे, एक वकील ही थे, इंग्लैंड से अफ्रीका की अपनी समुद्री यात्रा के दौरान एक काल्पनिक पाठक से बातचीत में माध्यम से ‘हिंद स्वराज’ में लिखते हैं (द कलेक्टेड वर्कर्स ऑफ गांधी, प्रकाशन विभाग, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, खंड 10 पेज 27, 28 और 32)- ‘मैंने कभी नहीं कहा कि हिंदू और मुसलमान लड़ेंगे ही नहीं। साथ-साथ रहने वाले दो भाइयों के बीच अक्सर लड़ाई हो जाती है। कभी-कभी हम अपने सिर भी तुड़वाएंगे ही। ऐसा जरूर होना नहीं चाहिए, लेकिन सभी लेाग निष्पक्ष नहीं होते।’ देश के ‘अहिंसा-आयकान’ गांधीजी अपने अंतिम दिनों के पहले ही यह जान गए थे कि उनके द्वारा दिया गया अहिंसा का पाठ महज एक कमजोर की मजबूरी था। तभी जैसे ही आजादी और बंटवारे की बात हुई समग्र भारत में दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा कत्लेआम हो गया। जून-जुलाई 1947 में गांधीजी ने अपने दैनिक भाषण में कह दिया था- ‘परंतु अब 32 वर्ष बाद मेरी आंख खुली है। मैं देखता हूं कि अब तक जो चलती थी, वह अहिंसा नहीं है, बल्कि मंद-विरोध था। मंद विरोध वह करता है, जिसके हाथ में हथियार नहीं होता। हम लाचारी से अहिंसक बने हुए थे, मगर हमारे दिलों में तो हिंसा भरी हुई थी। अब जब अंग्रेज यहां से हट रहे हैं तो हम उस हिंसा को आपस में लड़ कर खर्च कर रहे हैं।’ गांधीजी अपने आखिरी दिनों इस बात से बेहद व्यथित, हताश भी थे कि वे जिस अहिंसा के बल पर अंग्रेजों को देश से निकालने का दावा करते रहे थे, वह उसे आम लोगों में स्थापित करने में असफल रहे थे। कैसी विडंबना है कि जिस हिंसा को लेकर गांधी दुखी थे, उसी ने उनकी जान भी ली। जिस अहिंसा के बल पर वे स्वराज पाने का दावा कर रहे थे, जब स्वराज आया तो दुनिया के सबसे बड़े नरसंहार, विस्थापन, भुखमरी व लाखों लाशों को साथ लेकर आया। शायद हमें उसी दिन समझ लेना था कि भारत का समाज मूल रूप से हिंसक है, हमारे त्यौहार-पर्व में हम तलवारें चलाकर, हथियार प्रदर्शित कर खुश होते हैं। हमारे नेता सम्मान में मिली तलवारें लहरा कर गर्व महसूस करते हैं। हर रोज बाघा बॉर्डर पर आक्रामक तेवर दिखाकर लोगों में नफरत की आड़ में उत्साह भरना सरकार की नीति है। आम लोग भी कार में खरोंच, गली पर कचरे या एकतरफा प्यार में किसी की हत्या करने में संकोच नहीं करता है। अपनी मांगों को समर्थन में हमारे धरने-प्रदर्शन दूसरों के लिए आफत बन कर आते हैं, लेकिन हम इसे लोकतंत्र का हिस्सा जताकर दूसरों की पीड़ा में अपना दबाव होने का दावा करते हैं।हम आजादी के बाद 68 सालों में छह बड़े युद्ध लड़ चुके हैं, जिनमें हमारे कई हजार सैनिक मारे जा चुके हैं। हमारे मुल्क का एक तिहाई हिस्सा सशस्त्र अलगाववादी आंदोलनों की चपेट में है, जहां सालाना तीस हजार लोग मारे जाते हैं, जिनमें सुरक्षा बल भी शामिल हैं। देश में हर साल पैंतीस से चालीस हजार लोग आपसी दुश्मनियों में मर जाते हैं, जो दुनिया के किसी देश में हत्या की सबसे बड़ी संख्या होती है। हमारा फौज व आंतरिक सुरक्षा का बजट स्वास्थ्य या शिक्षा के बजट से बहुत ज्यादा होता है। सवाल फिर खड़ा होता है कि आखिर हम यह क्यों मान लें कि हम हिंसक समाज हैं? हमें स्वीकार करना होगा कि असहिष्णुता बढ़ती जा रही है। यह सवाल आलेख के पहले हिस्से में भी था। यदि हम यह मान लेते हैं तो हम अपनी शिक्षा, संस्कार, व्यवस्था, कानून में इस तरह की तब्दीली करने पर विचार कर सकते हैं, जो हमारे विशाल मानव संसाधन के सकारात्मक इस्तेमाल में सहायक होगी। हम गर्व से कह सकेंगे कि जिस गांधी के जिस अहिंसा के सिद्धांत को नेल्सन मंडेला से ले कर बराक हुसैन ओबामा तक सलाम करते रहे हैं, हिंदुस्तान की जनता उस पर अमल करना चाहती है। हमारी शिक्षा, नीतियों, महकमों में गांधी एक तस्वीर से आगे बढ़कर क्रियान्वयन स्तर पर उभरंे, इसके लिए जरूरी है कि हम अपनी हिंसक प्रवृत्ति को अपना रोग मानें। वैसे भी गांधी के नशा की तिजारत न करने, अनाज व कपास पर सट्टा न लगाने जैसी नीतियों पर सरकार की नीतियां बिल्कुल विपरीत हैं तो फिर आज अहिंसा की बात करना एक नारे से ज्यादा तो है नहीं।
= पंकज चतुर्वेदी

गुरुवार, 28 जनवरी 2016

Vrikshayurved : traditional knowledge of organic farming Peoples Samachar


वृक्षायुर्वेद यानि सस्ती व सुरक्षित खेती की परंपरा

Peoples samachar 29-1-16
                                       पंकज चतुर्वेदी


बढ़ती आबादी का पेट भरने के लिए अधिक पैदावार का दवाब लगातार जमीन के सत्व को खत्म कर रहा है । हरित क्रांति की नई आंधी सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को ही मार रही है । खेतों में बढ़ती उर्वरकों की मात्रा का ही दुष्परिणाम है कि जमीन के पोषक तत्व जिंक, लोहा, तांबा, मैगजीन, आदि लुप्त होते जा रहे हैं । दूसरी तरफ कीटनाशकों के बढ़ते इस्तेमाल से खाद्ध पदार्थ जहरीले हो रहे हैं । यह बात प्रमाणित हो चुकी है कि भारतीय लोग दुनिया भर के लोगों के मुकाबले कीटनाशकों के सबसे ज्यादा अवशेष अपने भोजन के साथ पेट में पहुंचाते हैं । हमारी अर्थ व्यवस्था के मूल आधार खेती व पशुपालन की इस दुर्दशा से हताश वैज्ञानिकों की निगाहें अब प्राचीन मान्यताओं और पुरातनपंथी मान लिए गए शास्त्रों पर गई है ।

कुछ साल पहले थियोसोफीकल सोसायटी, चैन्नई में कोई पचास से अधिक आम के पेड़ रोगग्रस्त हो गए थे । आधुनिक कृषि-डाक्टरों को कुछ समझ नहीं आ रहा था । तभी समय की आंधी में कहीं गुम हो गया सदियों पुराना ‘‘वृक्षायुर्वेद’’ का ज्ञान काम आया । सेंटर फार इंडियन नालेज सिस्टम (सीआईकेएस) की देखरेख में नीम और कुछ दूसरी जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल किया गया । देखते ही देखते बीमार पेड़ों में एक बार फिर हरियाली छा गई । ठीक इसी तरह चैन्नई के स्टेला मेरी कालेज में बाटनी के छात्रों ने जब गुलमेंहदी के पेड़ में ‘‘वृक्षायुर्वेद’’ में सुझाए गए नुस्खों का प्रयोग किया तो पता चला कि पेड़ में ना सिर्फ फूलों के घने गुच्छे लगे , बल्कि उनका आकार भी पहले से बहुत बड़ा था । वृक्षायुर्वेद के रचयिता सुरपाल कोई एक हजार साल पहले दक्षिण भारत के शासक भीमपाल के राज दरबारी थे । वे वैद्ध के साथ-साथ अच्छे कवि भी थे । तभी चिकित्सा सरीखे गूढ़ विषय पर लिखे गए उनके ग्रंथ वृक्षायुर्वेद को समझने में आम ग्रामीण को भी कोई दिक्कत नहीं आती है ।उनका मानना था कि जवानी,आकर्षक व्यक्तित्व, खूबसूरत स्त्री,बुद्धिमान मित्र, कर्णप्रिय संगीत, सभी कुछ एक राजा के लिए अर्थहीन हैं, यदि उसके यहां चित्ताकर्षक बगीचे नहीं हैं । सुरपाल के कई नुस्खे अजीब हैं -जैसे, अशोक के पेड़ को यदि कोई महिला पैर से ठोकर मारे तो वह अच्छी तरह फलता-फूलता है , या यदि कोई सुंदर महिला मकरंद के पेड़ को नाखुनों से नोच ले तो वह कलियों से लद जाता है । सुरपाल के कई नुस्खेे आसानी से उपलब्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित हैं । महाराष्ट्र में धोबी कपड़े पर निशान लगाने के लिए जिस जड़ी का इस्तेमाल करते हैं, उसे वृक्षायुर्वेद में असरदार कीटनाशक निरुपित किया गया है । भल्लाटका यानि सेमीकार्पस एनाकार्डियम का छोटा सा टुकड़ा यदि भंडार गृह में रख दिया जाए तो अनाज में कीड़े नहीं लगते हैं और अब इस साधारण सी जड़ी के उपयोग से केंसर सरीखी बीमारियों के इलाज की संभावनाओं पर शोध चल रहे हैं ।
पंचामृत यानि गाय के पांच उत्पाद- दूध,दही,घी,गोबर और गौमू़़़त्र के उपयोग से पेड़-पौधों के कई रोग जड़ से दूर किए जा सकते हैं ।‘ वृक्षायुर्वेद ’ में दी गई इस सलाह को वैज्ञानिक रामचंद्र रेड्डी और एएल सिद्धारामैय्या ने आजमाया । टमाटर के मुरझाने और केले के पनामा रोग में पंचामृत की सस्ती दवा ने सटीक असर किया । इस परीक्षण के लिए टमाटर की पूसा-रूबी किस्म को लिया गया सुरपाल के सुझाए गए नुस्खे में थोड़ा सा संशोधन कर उसमें यीस्ट और नमक भी मिला दिया गया । दो प्रतिशत घी, पांच प्रतिशत दही और दूध, 48 फीसदी ताजा गोबर, 40 प्रतिशत गौ मूत्र के साथ-साथ 0.25 ग्राम नमक और इतना ही यीस्ट मिलाया गया । ठीक यही फार्मूला केले के पेड़ के साथ भी आजमाया गया, जो कारगर रहा ।
सीआईकेएस में बीते कई सालों से  वृक्षायुर्वेद और ऐसे ही पुराने ग्रंथों पर शोध चल रहे हैं । यहंा बीजों के संकलन, चयन, और उन्हें सहेज कर रखने से ले कर पौधों को रोपने, सिंचाई, बीमारियों से मुक्ति आदि की सरल पारंपरिक प्रक्रियाओं को लोकप्रिय बनाने के लिए आधुनिक डिगरियों से लैस कई वैज्ञानिक प्रयासरत हैं । पशु आयुर्वेद, सारंगधर कृत उपवन विनोद और वराह मिरीह की वृहत्त्त संहिता में सुझाए गए चमत्कारी नुस्खों पर भी यहां काम चल रहा है । सीआईकेएस में वैज्ञानिक डा के विजयलक्ष्मी अपने बचपन का एक अनुभव बताती हैं कि उनके घर पर लौकी की एक बेल में फूल तो खूब लगते थे, लेकिन फल बनने से पहले झड़ जाते थे ।एक बूढ़े माली ने उस पौधे के पास एक गड्ढा खोद कर उसमें हींग का टुकड़ा दबा दिया । दो हफ्ते में ही फूल झड़ना बंद हो गए और उस साल सौ से अधिक फल लगे । डा विजयलक्ष्मी ने इस घटना के 15 साल बाद जब वृक्षायुर्वेद का अध्यन किया तो पाया कि हींग मूलरूप से ‘वात दोष’ के निराकरण में प्रयुक्त होती है । फूल से फल बनने की प्रक्रिया में ‘वात दोष’ का मुख्य योगदान होता है । इसकी मात्रा में थोड़ा भी असंतुलन होने पर फूल झड़ने लगते हैं । सनद रहे हींग भारतीय रसोई का आम मसाला है और इसका इस्तेमाल मानव शरीर में वात दोष निवारण में होता है । वृक्षायुर्वेद का दावा है कि मानव शरीर की भांति पेड़-पौधों में भी वात, पित्त और कफ के लक्षण होते हैं और इनमें गड़बड़ होने पर वनस्पति बीमार हो जाती हैं ।
इसी प्रकार मवेशियों की सामान्य बीमारियों के घरेलू इलाज के लिए रचित ‘पशु-आयुर्वेद’ भी इन दिनों खासा लोकप्रिय हो रहा है । इस प्राचीन ग्रंथ में पशुओं के जानलेवा रोग खूनी दस्तों की दवा ‘कुटजा’ को बताया गया है । ‘होलोरेना एंटीडायसेंट्रीका’ के वैज्ञानिक नाम वाली यह जड़ी बड़ी सहजता से गांव-खेजों में मिल जामी है । आंव-दस्त में यह बूटी इतनी सुरक्षित है कि इसे नवजात शिशु को भी दिया जा सकता है । ‘पशु-आयुर्वेद’ के ऐसे ही जादुई नुस्खों पर दो कंपनियों ने दवाईयां बना कर बेचना शुरू कर दिया है ।
खेती-किसानी के ऐसे ही कई हैरत अंगेज नुस्खे भारत के गांव-गांव में पुराने, बेकार या महज भावनात्मक साहित्य के रूप में बेकार पड़े हुए हैं । ये हमारे समृद्ध हरित अतीत का प्रमाण तो हैं ही, प्रासंगिक और कारगर भी हैं । अब यह बात सारी दुनिया मान रही है कि प्राचीन भारतीय ज्ञान के इस्तेमाल से कृषि की लागत घटाई जा सकती है । यह खेती का सुरक्षित तरीका भी है, साथ ही इससे उत्पादन भी बढ़ेगा ।

पंकज चतुर्वेदी
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सेक्टर-2
साहिबाबाद
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बुधवार, 27 जनवरी 2016

Primary education must be Nationalised



 प्राथमिक शिक्षा के राष्ट्रीयकरण की जरुरत 

पंकज चतुर्वेदी 

दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के स्कूलों में नर्सरी दाखिले को लेकर अफरातफरी का आलम है। कहीं फार्मों की मनमानी कीमतों को लेकर असंतोष है, तो कोई सरकार द्वारा तय मापदंडों का पालन न होने से नाराज है। स्थिति यह है कि स्कूलों में दाखिले को लेकर कई महीनों से हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मुकदमे चल रहे हैं और न तो पालक और न ही स्कूल इससे संतुष्ट हैं। नर्सरी का खर्च आइआइटी की फीस से भी महंगा हो गया है। देश में स्कूली शिक्षा पर सरकार और समाज इफरात खर्च कर रहे हैं और कोई भी संतुष्ट नहीं है। दिल्ली सरकार नर्सरी दाखिले में अपने नियम तो लागू कराना चाहती है, लेकिन पूरी दिल्ली में उसका एक भी अपना नर्सरी स्कूल नहीं है। यह भी कटु सत्य है कि देश में आज भी प्राईमरी स्तर के पचहत्तर फीसद स्कूल सरकारी हैं और वहां पढ़ाई की गुणवत्ता इतनी कमजोर है कि पैंतालीस फीसद से ज्यादा बच्चे कक्षा पांच से आगे पढ़ने के लायक नहीं होते हैं।
राजधानी से सटे गाजियाबाद के कई नामचीन स्कूलों में बढ़ी फीस का झंझट अब थाना-पुलिस तक पहुंच गया है। स्कूल वाले बच्चों को प्रताड़ित कर रहे हैं, तो अभिभावक पुलिस के पास गुहार लगा रहे हैं। स्कूल हाईकोर्ट की शरण में हैं तो पालक नेताओं की। इस मारामारी में आम निम्न-मध्यवर्गीय आदमी की बुद्धि गुम-सी हो गई है। माहौल ऐसा हो गया है कि बच्चों के मन में स्कूल या शिक्षक के प्रति कोई श्रद्धा नहीं रह गई है। वहीं स्कूल वालों की बच्चों के प्रति न तो संवेदना रह गई है और न ही सहानुभूति। ऐसा अविश्वास का माहौल बन गया है, जो बच्चों का जिंदगी भर साथ नहीं छोड़ेगा। शिक्षा का व्यवसायीकरण कितना खतरनाक होगा, इसका अभी किसी को अंदाजा नहीं है। लेकिन मौजूदा पीढ़ी जब संवेदनहीन होकर अपने ज्ञान को महज पैसा बनाने का जरिया मान कर इस्तेमाल करना शुरू करेगी, तब समाज और सरकार को इस भूल का अहसास होगा। साफ है कि शिक्षा-व्यवस्था अराजकता और अंधेरगर्दी के ऐसे गलियारे में खड़ी है, जहां से एक अच्छा नागरिक बनने की उम्मीद बेमानी होगी। ऐसे में एक ही विकल्प है- सभी को समान स्कूली शिक्षा।
कहा जाता है कि पहले ज्ञानार्जन का अधिकार केवल उच्च वर्ग के लोगों के पास हुआ करता था। इस तथाकथितमनुवाद को कोसने का इन दिनों कुछ फैशन-सा चला है, या यों कहें कि इसे सियासत की सहज राह कहा जा रहा है। लेकिन आज की मुक्त अर्थव्यवस्था से जिस नए मनीवादका जन्म हो रहा है, उस पर चहुं ओर चुप्पी है। लक्ष्मी साथ है तो सरस्वती के द्वार आपके लिए खुले हैं, अन्यथा सरकार और समाज दोनों की नजर में आपका अस्तित्व शून्य है। इस नए मनीवादका सर्वाधिक शिकार प्राथमिक शिक्षा हो रही है। हमारे देश में प्राथमिक स्तर पर ही शिक्षा लोगों का स्तर तय कर रही है। एक तरफ कंप्यूटर, एसी, खिलौनों से सज्जित स्कूल हैं, तो दूसरी ओर श्यामपट््ट, शौचालय जैसी मूलभूत जरूरतों को तरसते बच्चे।
दो-ढाई साल के बच्चों का प्री-स्कूल प्रवेश चुनाव लड़ने जैसा कठिन हो गया है। अगर जुगाड़ लगा कर मध्यवर्ग का कोई बच्चा इन बड़े स्कूलों में पहुंच भी जाए तो वहां के चोंचले झेलना उसके बूते के बाहर होता है। ठीक यही हालात देश के अन्य महानगरों का भी है। बच्चे के जन्मदिन पर स्कूल के सभी बच्चों में कुछ वितरित करना या ट्रीटदेना, सालाना जलसों के लिए स्पेशल ड्रेस बनवाना, साल भर में एक-दो पिकनिक या टूर ये ऐसे व्यय हैं, जिन पर हजारों का खर्च हो जाता है। फिर स्कूल की किताबें, वर्दी, जूते, वगैरह।
करीब अठारह साल पहले केंद्र सरकार के कर्मचारियों के पांचवे वेतन आयोग के समय दिल्ली सरकार ने फीस बढ़ोतरी के मुद्दे पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय से अवकाश प्राप्त सचिव जेवी राघवन की अध्यक्षता में नौ सदस्यों की एक समिति गठित की थी। इस समिति ने दिल्ली स्कूल अधिनियम 1973 में संशोधन की सिफारिश की थी। समिति का सुझाव था कि पब्लिक स्कूलों को बगैर लाभ-हानि के संचालित किया जाना चाहिए। समिति ने पाया था कि कई स्कूल प्रबंधन, छात्रों से उगाही फीस का इस्तेमाल अपने दूसरे व्यवसायों में कर रहे हैं। राघवन समिति ने ऐसे स्कूलों के प्रबंधन के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की अनुशंसा की थी। समिति ने सुझाव दिया था कि छात्रों से वसूले धन का इस्तेमाल केवल छात्रों और शिक्षकों की बेहतरी पर किया जाए।
उसके बाद पांच साल पहले छठवें वेतन आयोग के बाद भी सरकार ने बंसल समिति गठित की, जिसकी सिफारिशें राघवन समिति की तरह ही थीं। ये रिपोर्ट बानगी हैं कि स्कूली-शिक्षा अब एक नियोजित धंधा बन चुकी है। बड़े पूंजीपति, औद्योगिक घराने, माफिया, राजनेता अपने काले धन को छिपाने के लिए स्कूल खोल रहे हैं। वहां किताबों, वर्दी की खरीद, मौज-मस्ती की पिकनिक या हॉबी क्लास, सभी मुनाफे का व्यापार बन चुके हैं। इसके बावजूद इन अनियमितताओं की अनदेखी केवल इसलिए है कि स्कूल प्रबंधन में नेताओं की सीधी साझेदारी है। तिस पर सरकार शिक्षा को मूलभूत अधिकार देने के प्रस्ताव सदन में पारित कर चुकी है।
शिक्षा का सरकारी तंत्र जैसे ठप्प पड़ चुका है। निर्धारित पाठ्यक्रम की पुस्तकें मांग के अनुसार उपलब्ध कराने में एनसीइआरटी सरीखी सरकारी संस्थाएं बुरी तरह विफल रही हैं। जबकि प्राइवेट या पब्लिक स्कूल अपनी मनमानी किताबें छपवा कर कोर्स में लगा रहे हैं। यह पूरा धंधा इतना मुनाफे वाला बन गया है कि अब छोटे-छोटे गांवों में भी पब्लिक या कानवेंट स्कूल खुल रहे हैं। कच्ची झोपड़ियों, गंदगी के बीच, बगैर माकूल व्यवस्था के कुछ बेरोजगार एक बोर्ड लटका कर प्राइमरी स्कूल खोल लेते हैं। इन ग्रामीण स्कूलों के छात्र पहले तो वे लोग होते हैं, जिनके पालक पैसे वाले होते हैं और अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजना हेठी समझते हैं।
कुल मिला कर दोष जर्जर सरकारी शिक्षा व्यवस्था के सिर पर जाता है, जो आम आदमी का विश्वास पूरी तरह खो चुकी है। अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए पालक मजबूरी में इन शिक्षा की दुकानों पर खुद लुटने को पहुंच जाते हैं। लोग भूल चुके हैं कि दसवीं पंचवर्षीय योजना के समापन तक यानी सन 2007 तक शत-प्रतिशत बच्चों को प्राथमिक शिक्षा का सपना बुना गया था, जिसे ध्वस्त हुए नौ साल बीत चुके हैं।
वैसे स्कूल रूपी दुकानों का रोग कोई दो दशक पहले महानगरों से ही शुरू हुआ था, जो अब शहरों, कस्बों से संक्रमित होता हुआ दूरस्थ गांवों तक पहुंच गया है। समाजवाद की अवधारणा पर सीधा कुठाराघात करने वाली यह शिक्षा प्रणाली शुरू से ही उच्च और निम्न वर्ग तैयार कर रही है, जिसमें समर्थ लोग और समर्थ होते हैं, जबकि विपन्न लोगों का गर्त में जाना जारी रहता है।
विश्व बैंक की एक रपट कहती है कि भारत में छह से दस साल के कोई तीन करोड़ बीस लाख बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। रपट में यह भी कहा गया है कि भारत में शिक्षा को लेकर बच्चों में खासा भेदभाव है। लड़कों-लड़कियों, गरीब-अमीर और जातिगत आधार पर बच्चों के लिए पढ़ाई के मायने अलग-अलग हैं। रपट के अनुसार दस वर्ष तक के सभी बच्चों को स्कूल भेजने के लिए तेरह लाख स्कूली कमरे बनवाने होंगे और 740 हजार नए शिक्षकों की जरूरत होगी। सरकार के पास खूब बजट है और उसे निगलने वाले कागजी शेर भी। लेकिन मूल समस्या स्कूली शिक्षा में असमानता की है।
प्राथमिक स्तर की शिक्षण संस्थाओं की संख्या बढ़ना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन देश के भविष्यकी नैतिक शिक्षा का पहला आदर्श शिक्षक जब तीन हजार रुपए पर दस्तखत कर बमुश्किल डेढ़-दो सौ रुपये का भुगतान पा रहा हो तो उससे किस स्तर के ज्ञान की उम्मीद की जा सकती है। जब पहली कक्षा के ऐसे बच्चे को, जिसे अक्षर ज्ञान भी बमुश्किल है, उसे कंप्यूटर सिखाया जाने लगे, महज इसलिए कि पालकों से इस नाम पर अधिक फीस वसूली जा सकती है, तो किस तरह तकनीकी शिक्षा प्रसार की बात सोची जा सकती है? प्राइवेट स्कूलों की आय की जांच, फीस पर सरकारी नियंत्रण, पाठ्यक्रम, पुस्तकों आदि का एकरूपीकरण, सरकारी स्कूलों को सुविधा संपन्न बनाना, आला सरकारी अफसरों और जनप्रतिनिधियों के बच्चों की सरकारी स्कूलों में शिक्षा की अनिवार्यता, निजी संस्था के शिक्षकों का वेतन सुनिश्चित करना सरीखे सुझाव समय-समय पर आते रहे और लाल बस्तों में बंध कर गुम होते रहे हैं।
अतुल्य भारत के सपने को साकार करने की प्राथमिक जरूरत स्तरीय प्राथमिक शिक्षा का लक्ष्य पाने का एकमात्र तरीका है- स्कूली शिक्षा का राष्ट्रीयकरण। अपने दो या तीन वर्ग किलोमीटर के दायरे में आने वाले स्कूल में प्रवेश पाना सभी बच्चों का हक हो, सभी स्कूलों की सुविधाएं, पुस्तकें, फीस एक समान हो, मिड-डे मील सभी को एक जैसा मिले अ‍ौर कक्षा आठ तक के सभी स्कूलों में शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होे। फिर न तो किताबों का विवाद होगा और न ही मदरसों की दुर्दशा पर चिंता। यह सब करने में खर्चा भी अधिक नहीं है, बस जरूरत है तो इच्छाशक्ति की। जो अभिभावक नामचीन निजी स्कूलों में अपने बच्चों के दाखिले के लिए लाखों रुपए डोनेशन देते हैं वे अगर इसका एक अंश अपने घर के पास के सरकारी स्कूल में लगाएंगे, जहां उनका बच्चा पढ़ता है तो स्कूल स्तर पर विषमता की खाई आसानी से पाटी जा सकेगी।

शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

The recruitment procedure of sepoy needs urgent reform

ऐसे कैसे सिपाही भर्ती कर रहे हैं हम 

                                                                               पंकज चतुर्वेदी

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बीते दिनों छतरपुर में थल सेना में सिपाही की भर्ती के लिए आयोजित परीक्षा के दौरान हरपालपुर रेलवे स्टेशन पर जो हुआ, वह निहायत अराजकता, गुंडागर्दी और लफंगई था। कोई बीस हजार युवा जमा हुए, कुछ नाराजगी हुई, फिर पत्थरबाजी, आगजनी, लूटपाट, औरतों से छेड़छाड़। चंबल एक्सप्रेस के प्रत्येक डिब्बे पर लंपटों का कब्जा था, वे औरतों को भगाने के लिए उनके सामने अपने कपड़े उतार रहे थे, विरोध करने वालों को पीट रहे थे। वह भी तब, जब सेना के भर्ती अधिकारी ने रेलवे को लिखित में सूचित किया था कि सेना में भर्ती के लिए अतिरिक्त भीड़ आ सकती है, अत: अतिरिक्त डिब्बे लगाए जाएं। उत्पातियों की बड़ी संख्या के सामने पुलिस असहाय थी। झांसी मंडल में तीन दिनों में तीन बार इस तरह के अराजक दृश्य सामने आए। यह सब करने वाले वे लोग थे, जिनमें से कुछ को भारतीय फौज का हिस्सा बनना था। यह पहली बार नहीं हुआ है कि बेराजगारी से तंग अल्पशिक्षित हजारों युवा फौज में भर्ती होने पहुंच जाते हैं और भर्ती स्थल वाले शहर में तोड़-फोड़, हुड़दंग, तो कहीं मारपीट, अराजकता होती है। 
जिस फौज पर आज भी मुल्क को भरोसा है, जिसके अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठता की मिसाल दी जाती है, उसमें भर्ती के लिए आए युवकों द्वारा इस तरह का कोहराम मचाना, भर्ती स्थल पर लाठीचार्ज होना, जिस शहर में भर्ती हो रही हो, वहां तक जाने वाली ट्रेन या बस में अराजक भीड़ होना या युवाओं का मर जाना जैसी घटनाओं का साक्षी पूरा मुल्क हर साल होता है। इसी का परिणाम है कि फौज व अर्धसैनिक बलों में आए रोज अपने ही साथी को गोली मारने, ट्रेन में आम यात्रियों की पिटाई, दुर्व्यवहार, फर्जी मुठभेड़ करने जैसे आरोप बढ़ रहे हैं। विडंबना यह है कि हालात दिनोंदिन खराब हो रहे हैं, इसके बावजूद थल सेना में सिपाही की भर्ती के तौर-तरीकों में कोई बदलाव नहीं आ रहा है। वही अंग्रेजों की फौज का तरीका चल रहा है- मुफलिस, विपन्न इलाकों में भीड़ जोड़ लो, वह भी बगैर परिवहन, ठहरने या भोजन की सुविधा के और फिर हैरान-परेशान युवा जब बेकाबू हों तो उन पर लाठी या गोली ठोक दो। कंप्यूटर के जमाने में क्या यह मध्यकालीन बर्बरता की तरह नहीं लगता है? जिस तरह अंग्रेज देसी अनपढ़ों को मरने के लिए भर्ती करते थे, उसी तर्ज पर छंटाई, जबकि आज फौज में सिपाही के तौर पर भर्ती के लिए आने वालों में हजारों ग्रेजुएट व व्यावसायिक शिक्षा वाले होते हैं।यह
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हमारे आंकड़े बताते हैं कि हायर सेकेंडरी पास करने के बाद ग्रामीण युवाओं, जिनके पास आगे की पढ़ाई के लिए या तो वित्तीय संसाधन नहीं हैं या फिर गांव से कॉलेज दूर हैं, रोजगार के साधन लगभग न के बराबर हैं। ऐसे में अपनी जान की कीमत पर पेट पालने अैार जान हथेली पर रख कर रोजगार पाने की चुनौतियों के बावजूद ग्रामीण युवा इस तरह की भर्तियों में जाते हैं। थल सेना में सिपाही की भर्ती के लिए सार्वजनिक विज्ञापन दे दिया जाता है कि अमुक स्थान पर पांच या सात दिन की भर्ती-रैली होगी। इसमें तय कर दिया जाता है कि किस दिन किस जिले के लड़के आएंगे। इसके अलावा देश के प्रत्येक राज्य में भर्ती के क्षेत्रीय व शाखा केंद्र हैं, जहां प्रत्येक साढ़े तीन महीने में भर्ती के लिए परीक्षाएं होती रहती हैं। हमारी थल सेना में प्रत्येक रेजीमेंट में अभी भी जाति, धर्म, क्षेत्र के आधार पर भागीदारी का कोटा तय है, जैसे की डोगरा रेजीमेंट में कितने फीसदी केवल डोगरा होंगे या महार रेजीमेंट में महारों की संख्या कितनी होगी। हालांकि अभी 10 दिसंबर, 2012 को ही सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका के एवज में सरकार को कहा है कि सेना में जाति, धर्म, क्षेत्र के आधार पर सिपाही की भर्ती क्यों न बंद की जाए। इस पूरी प्रक्रिया में पहले युवाओं का शारीरिक परीक्षण होता है, जिसमें लंबाई, वजन, छाती की नाप, दौड़ने की क्षमता आदि होता है। इसके बाद मेडीकल और फिर लिखित परीक्षा। अभी ग्वालियर में जो झगड़ा हुआ, वह दौड़ का समय छह मिनट से घटा कर अचानक साढ़े चार मिनट करने पर हुआ था।


भर्ती रैली का विज्ञापन छपते ही हजारों युवा, अपने दोस्तों के साथ भर्ती-स्थल पहुंचने लगते हैं। इसमें भर्ती बोर्ड यह भी ध्यान नहीं रखता कि छतरपुर या ऐसे ही छोटे शहरों की क्षमता या वहां इतने संसाधन मौजूद नहीं होते हैं कि वे पांच दिन के लिए पचास-साठ हजार लोगों की अतिरिक्त क्षमता झेल पाएं। भर्ती का स्थल तय करने वाले यह विचारते ही नहीं है कि उक्त स्थान तक पहुंचने के लिए पर्याप्त सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध भी हंै कि नहीं। और फिर यह तो असंभव ही है कि पचास हजार या उससे ज्यादा लोगों की भीड़ का शारीरिक परीक्षण हर दिन दस घंटे और पांच या सात दिन में ईमानदारी से किया जा सके। आमतौर पर नाप-जोख में ही 70 फीसदी लोगों की छंटाई हो जाती है। फिर इनमें से 50 प्रतिशत मेडिकल में और उनमें से महज 20 प्रतिशत लिखित परीक्षा में उत्तीर्ण हो पाते हैं। यानी पचास हजार में से पांच सौ को छांटने की प्रक्रिया महज तीस-चालीस घटों में। जाहिर है कि ऐसे में कई सवाल उठेंगे ही। कहा तो यही जाता है कि इस तरह की रैलियां असल में अपने पक्षपात या गड़बड़ियों को अमली जामा पहनाने के लिए ही होती हैं। यही कारण है कि प्रत्येक भर्ती केंद्र पर पक्षपात और बेईमानी के आरोप लगते हैं, हंगामे होते हैं और फिर स्थानीय पुलिस लाठियां चटका कर हरी वर्दी की लालसा रखने वालों को लाल कर देती है। हालांकि अभी तक इस तरह का कोई अध्ययन तो नहीं ही हुआ है, लेकिन यह तय है कि इस भर्ती प्रक्रिया में पिटे, असंतुष्ट और परेशान हुए युवाओं के मन में फौज के प्रति वह श्रद्धा का भाव नहीं रह जाता है, जो उनके मन में वहां जाने से पहले होता है। सेना भी इस बात से इनकार नहीं कर सकती है कि बीते दो दशकों के दौरान थल सेना अफसरों की कमी तो झेल ही रही है, नए भर्ती होने वाले सिपाहियों की बड़ी संख्या अनुशासनहीन भी है।
 फौज में औसतन हर साल पचास से ज्यादा आत्महत्या या सिपाही द्वारा अपने साथी या अफसर को गोली मार देने की घटनाएं साक्षी हैं कि अब फौज को अपना मिजाज बदलना होगा। फौजियों, विशेष रूप से एनसीओ और उससे नीचे के कर्मचारियों पर बलात्कार, तस्करी, रेलवे स्टेशन पर यात्रियों के भिड़ने, स्थानीय पुलिस से मारपीट होने के आरोपों में तेजी से वृद्धि हुई है। हो न हो, यह सब बदलते समय के अनुसार सिपाही की चयन प्रक्रिया में बदलाव न होने का दुष्परिणाम ही है। जो सिपाही अराजकता, पक्षपात, शोषण की प्रक्रिया से उभरता है, उससे बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती है। फौज को अपनी भर्ती प्रक्रिया में कंप्यूटर, एनसीसी, स्थानीय प्रशासन का सहयोग लेना चाहिए। भर्ती के लिए भीड़ बुलाने के बनिस्पत ऐसी प्रक्रिया अपनानी चाहिए, जिसमें निराश लोगों की संख्या कम की जा सके। शायद पहले लिखित परीक्षा जिला स्तर पर आयोजित करना, फिर मेडिकल टेस्ट प्रत्येक जिला स्तर पर सालभर स्थानीय सरकारी जिला अस्पताल की मदद से आयोजित करना, स्कूल स्तर पर कक्षा दसवीं पास करने के बाद ही सिपाही के तौर पर भर्ती होने की इच्छा रखने वालों के लिए एनसीसी की अनिवार्यता या उनके लिए अलग से बारहवीं तक का कोर्स रखना जैसे कुछ ऐसे सामान्य उपाय हैं, जो हमारी सीमाओं के सशक्त प्रहरी थल सेना को अधिक सक्षम, अनुशासित और गौरवमयी बनाने में महत्वपूर्ण हो सकते हैं। यह भी किया जा सकता है कि सिपाही स्तर पर भर्ती के लिए कक्षा नौ के बाद अलग से कोर्स कर दिया जाए, ताकि भर्ती के समय मेडिकल की जटिल प्रक्रिया की जरूरत ही न पड़े।

Rivers turns sewars

कूड़ा ढोने का मार्ग बन गई हैं नदियां    



                                                                  पंकज चतुर्वेदी
अब सुनने में आया है कि लखनऊ में शामे अवध की शान गोमती नदी को लंदन की टेम्स नदी की तरह संवारा जाएगा। महानगर में आठ किलो मीटर के बहाव मार्ग को घाघरा और षारदा नहर से जोड़कर नदी को सदानीरा बनाया जाएगा। साथ ही इसके सभी घाट व तटों को चमकाया जाएगा। इस पर खर्च आएगा ‘‘महज ’’ छह सौ करोड़। पूर्व में भी गोमती को पावन बनाने पर कोई 300 करोड़ खर्च हुए थे, लेकिन इसकी निचली लहर में बीओडी की मात्रा तयशुदा मानक से चार गुणा ज्यादा जहरीली ही रही। इससे पहले कॉमनवेल्थ खेलों के पहले दिल्ली में यमुना तट को भी टेम्स की तरह सुदर बनाने का सपना दिया गया था, नदी तो और मैली हो गई हां, जहां नदी का पानी बहना था, वहां कॉमनवेल्थ गेम विलेज, अक्षरधाम मंदिर और ऐसे ही कई निर्माण कर दिए गए। कैसी विडंबना है कि जिस देष का समाज, सभ्यता, संस्कृति, पर्व, जीवकोपार्जन, संस्कार, सभी कुछ नदियों के तट पर विकसित हुआ और उसी पर निर्भर रही है, वहां की हर छोटी-बड़ी नदी अब कूड़ा ढोने का वाहन बन कर रह गई है। विकास की सबसे बड़ी कीमत नदियां चुकाती रही है, क्योंकि जब  विकास की परिभाशा में सबसे आगे  निर्माण कार्य का नाम आता है और इसके लिए अनिवार्य रेत की निकासी नदी से ही होनी है। घरेलू निस्तार, कारखानों का कूड़ा, बेकार पड़ा मलवा या जो कुछ भी अनुपयोगी लगा, उसे नदी में बहा दिया गया। फिर नदी में इतना भी जल नहीं बचा कि वह अपषिश्ट बहा सके।  जब हालात बिगड़ते हैं तो  नदी की सेहत की याद आती है और फिर उसको सुधारने के नाम पर पैसा फूंका जाता है। कुछ दिन सौन्दर्यीकरण के नाम पर भ्रम फैलाया जाता है कि नदी सुधर गई है, लेकिन कास्मेटिक के जरिेये रक्त या अस्थि के रोग ठीक होते नहीं हैं।
बहुत-बहुत पुरानी बात है- हमारे देश में एक नदी थी, सिंधु नदी। इस नदी की घाटी में खुदाई हुई तो मोईन जोदड़ों नाम का पूरा शहर मिला, ऐसा शहर जो बताता था कि हमारे पूर्वजों के पूर्वजों के पूर्वज बेहद सभ्य व सुसंस्कृत थे और नदियों से उनका शरीर-स्वांस का रिश्‍ता था।  नदियों किनारे समाज विकसित हुआ, बस्ती, खेती, मिट्टी व अनाज का प्रयोग, अग्नि का इस्तेमाल के अन्वेषण हुए। मंदिर व तीर्थ नदी के किनारे बसे, ज्ञान व अध्यात्म का पाठ इन्हीं नदियों की लहरों के साथ दुनियाभर में फैला। कह सकते हैं कि भारत की सांस्कृतिक व भावात्मक एकता का सम्वेत स्वर इन नदियों से ही उभरता है। इंसान मशाीनों की खोज करता रहा, अपने सुख-सुविधाओं व कम समय में ज्यादा काम की जुगत तलाशता रहा और इसी आपाधापी में सरस्वती जैसी नदी गुम हो गई। गंगा व यमुना पर अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया। बीते चार दशकों के दौरान समाज व सरकार ने कई परिभाषाएं, मापदंड, योजनाएं गढ़ीं कि नदियों को बचाया जाए, लेकिन विडंबना है कि उतनी ही तेजी से पावनता और पानी नदियों से लुप्त होता रहा।
हमारे देश में 13 बड़े, 45 मध्यम और 55 लघु जलग्रहण क्षेत्र हैं। जलग्रहण क्षेत्र उस संपूर्ण इलाके को कहा जाता है, जहां से पानी बह कर नदियों में आता है। इसमें हिंमखंड, सहायक नदियां, नाले आदि शामिल होते हैं। जिन नदियों का जलग्रहण क्षेत्र 20 हजार वर्ग किलोमीटर से बड़ा होता है , उन्हें बड़ा-नदी जलग्रहण क्षेत्र कहते हैं। 20 हजार से दो हजार वर्ग किजरेमीटर वाले को मध्यम, दो हजार से  कम वाले को लघु जल ग्रहण क्षेत्र कहा जाता है। इस मापदंड के अनुसार गंगा, सिंधु, गोदावरी, कृष्‍णा ब्रह्मपुत्र, नर्मदा, तापी, कावेरी, पेन्नार, माही, ब्रह्मणी, महानदी, और साबरमति बड़े जल ग्रहण क्षेत्र वाली नदियां हैं। इनमें से तीन नदियां - गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र हिमालय के हिमखंडों के पिघलने से अवतरित होती हैं। इन सदानीरा नदियों को ‘हिमालयी नदी’ कहा जाता है। षेश दस को पठारी नदी कहते हैं, जो मूलतः वर्शा पर निर्भर होती हैं।
यह आंकड़ा वैसे बड़ा लुभावना लगता है कि देश का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 32.80 लाख वर्ग किलोमीटर है, जबकि सभी नदियों को सम्मिलत जलग्रहण क्षेत्र 30.50 लाख वर्ग किलोमीटर है। भारतीय नदियों के माग से हर साल 1645 घन किलोलीटर पानी बहता है जो सारी दुनिया की कुल नदियों का 4.445 प्रतिषत है।  आंकडों के आधार पर हम पानी के मामले में पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा समृद्ध हैं, लेकिन चिंता का विशय यह है कि पूरे पानी का कोई 85 फीसदी बारिश के तीन महीनों में समुद्र की ओर बह जाता है और नदियां सूखी रह जाती हैं।
नदियों के सामने खड़े हो रहे संकट ने मानवता के लिए भी चेतावनी का बिगुल बजा दिया है, जाहिर है कि बगैर जल के जीवन की कल्पना संभव नहीं है। हमारी नदियों के सामने मूलरूप से तीन तरह के संकट हैं - पानी की कमी, मिट्टी का आधिक्य और प्रदूशण।
 धरती के तापमान में हो रही बढ़ौतरी के चलते मौसम में बदलाव  हो रहा है और इसी का परिणाम है कि या तो बारिष अनियमित हो रही है या फिर बेहद कम।  मानसून के तीन महीनों में बामुष्किल चालीस दिन पानी बरसना या फिर एक सप्ताह में ही अंधाधंुध बारिश हो जाना या फिर बेहद कम बरसना, ये सभी परिस्थितियां नदियों के लिए अस्तित्व का संकट पैदा कर रही हैं। बड़ी नदियों में ब्रह्मपुत्र, गंगा, महानदी और ब्राह्मणी के रास्तों में पानी खूब बरसता है और इनमें न्यूनतम बहाव 4.7 लाख घनमीटर प्रति वर्गकिलोमीटर होता है। वहीं कृश्णा, सिंधु, तापी, नर्मदा और गोदावरी का पथ कम वर्शा वाला है सो इसमें जल बहाव 2.6 लख घनमीटर प्रति वर्गकिमी ही रहता है। कावेरी, पेन्नार, माही और साबरमति में तो बहाव 0.6 लख घनमीटर ही रह जाता है। सिंचाई व अन्य कार्यों के लिए नदियों के अधिक दोहन, बांध आदि के कारण नदियों के प्राकृतिक स्वरूपों के साथ भी छेड़छाड़ र्हुअ व इसके चलते नदियों में पानी कम हो रहा है।
नदियां अपने साथ अपने रास्ते की मिट्टी, चट्टानों के टकुड़े व बहुत सा खनिज बहा कर लाती हैं। पहाड़ी व नदियों के मार्ग पर अंधाधंुध जंगल कटाई, खनन, पहाड़ों को काटने, विस्फोटकों के इस्तेमाल आदि के चलते थेाडी सी बारिष में ही बहुत सा मलवा बह कर नदियों में गिर जाता है। परिणामस्वरूप् नदियां उथली हो रही हैं, उनके रास्ते बदल रहे हैं और थोड़ा सा पानी आने पर ही ववे बाढ़ का रूप् ले लेती हैं।
आधुनिक युग में नदियों को सबसे बड़ा खतरा प्रदूशण से है। कल-कारखानों की निकासी, घरों की गंदगी, खेतों में मिलाए जा रहे रायायनिक दवा व खादों का हिस्सा, भूमि कटाव, और भी कई ऐसे कारक हैं जो नदी के जल को जहर बना रहे हैं। अनुमान है कि जितने जल का उपयोग किया जाता है, उसके मात्र 20 प्रतिषत की ही खपत होती है, षेश 80 फीसदी सारा कचरा समेटे बाहर आ जाता है। यही अपषिश्ट या माल-जल कहा जाता है, जो नदियों का दुष्मन है। भले ही हम कारखानों को दोशी बताएं, लेकिन नदियों की गंदगी का तीन चौथाई  हिस्सा घरेलू माल-जल ही है।
आज देश की 70 फीसदी नदियां प्रदूषित हैं और मरने के कगार पर हैं। इनमें गुजरात की अमलाखेडी, साबरमती और खारी, हरियाणा की मारकंदा, मप्र की खान, उप्र की काली और हिंडन, आंध्र की मुंसी, दिल्ली में यमुना और महाराष्टकृ की भीमा मिलाकर 10 नदियां सबसे ज्यादा प्रदूषित हैं। हालत यह है कि देश की 27 नदियां नदी के मानक में भी रखने लायक नहीं बची हैं। वैसे गंगा हो या यमुना, गोमती, नर्मदा, ताप्ती, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी, ब्रह्मपुत्र, झेलम, सतलुज, चिनाव, रावी, व्यास, पार्वती, हरदा, कोसी, गंडगोला, मसैहा, वरुणा हो या बेतवा, ढौंक, डेकन, डागरा, रमजान, दामोदर, सुवणर्रेखा, सरयू हो या रामगंगा, गौला हो या सरसिया, पुनपुन, बूढ़ी गंडक हो या गंडक, कमला हो या फिर सोन हो या भगीरथी या फिर इनकी सहायक, कमोेबेश सभी प्रदूषित हैं और अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही हैं। दरअसल पिछले 50 बरसों में अनियंत्रित विकास और औद्योगीकरण के कारण प्रकृति के तरल स्नेह को संसाधन के रूप में देखा जाने लगा, श्रद्धा-भावना का लोप हुआ और उपभोग की वृत्ति बढ़ती चली गई। चंूकि नदी से जंगल, पहाड़, किनारे, वन्य जीव, पक्षी और जन जीवन गहरे तक जुड़ा है, इसलिए जब नदी पर संकट आया, तब उससे जुड़े सभी सजीव-निर्जीव प्रभावित हुए बिना न रहे और उनके अस्तित्व पर भी संकट मंडराने लगा। असल में जैसे-जैसे सभ्यता का विस्तार हुआ, प्रदूषण ने नदियों के अस्तित्व को ही संकट में डाल दिया।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक भारत की कुल 445 नदियों में से आधी नदियों का पानी पीने के योग्य नहीं है। अपशिष्ट जल को साफ करके ये सुनिश्चित किया जा सकता है कि गंदे पानी से जल स्रोत्र प्रदूषित नहीं होंगे। जल संसाधनों का प्रबंधन किसी भी देश के विकास का एक अहम संकेतक होता है। अगर इस मापदंड पर भारत खरा उतरना है तो देश को ताजा पानी पर निर्भरता घटानी होगी और अपशिष्ट जल के प्रशोधन को बढ़ावा देना होगा। जून- 2014 में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में कहा कि राज्यवार प्रदूषित नदियों की सूची में पहले स्थान पर महाराष्ट्र है जहां 28 नदियां प्रदूषित हैं. दूसरे स्थान पर गुजरात है जहां ऐसी 19 नदियां हैं. सूची में 12 प्रदूषित नदियों के साथ उत्तर प्रदेश तीसरे स्थान पर हैं.

कर्नाटक की 11 नदियां प्रदूषित नदियों की सूची में हैं, जबकि मध्यप्रदेश, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु प्रत्येक में 9 नदियां ऐसी हैं. राजस्थान की पांच और झारखंड की तीन नदियां इस सूची में हैं. साथ ही उत्तराखंड और हिमाचल की तीन तीन नदियां शामिल हैं. दिल्ली से गुजरने वाली एक ही नदी यमुना है और वह भी इस सूची में शामिल है।  एक अनुमान है कि आजादी के बाद से अभी तक गंगा की सफाई के नाम पर कोई 20 हजार करोड़ रूप्ए खर्च हो चुके हैं। अप्रेल-2011 में गंगा सफाई की एक योजना सात हजार करोड़ की बनाई गई। विष्व बैंक से इसके लिए कोई एक अरब डालर का कर्जा भी लिया गया, लेकिन ना तो गंगा में पानी की मात्रा बढ़ी और ना ही उसका प्रदूशण घटा। नई सरकार ने गंगा सफाई के लिए अलग से महकमा बनाया है, । गंगा सफाई अभियान की पहली बैठक का व्यय ही 49 लाख रहा । बताया जाता है कि गंगा के पूरे 2400 किलोमीटर रास्ते को ठीक करने के लिए अब अस्सी हजार करोड़ की येाजना बनाई जा रही है। गंगा की समस्या केेवल प्रदूशण नहीं है, तटों का कटाव, बाढ़, रास्ता बदलना जैसे मसले भी इस पावन नदी  के साथ जुड़े हैं। यमुना की कहानी भी कुछ अलग नहीं है । हाल ही में उत्तर प्रदेष सरकार ने दिल्ली को खत लिख कर धमका दिया कि यदि यमुना में गंदगी घोलना बंद नहीं किया तो राजधानी का गंगा-जल रोक देंगे। हालांकि दिल्ली सरकार ने इस खत को कतई गंभीरता से नहीं लिया है, ना ही इस पर कोई प्रतिक्रिया दी है, लेकिन यह तय है कि जब कभी यमुना का मसला उठता है,, सरकार बड़े-बड़े वादे करती है लेकिन क्रियान्वयन स्तर पर कुछ होता नहीं है। फरवरी-2014 के अंतिम हफ्ते में ही षरद यादव की अगुवाई वाली संसदीय समिति ने भी कहा कि यमुना सफाई के नाम पर व्यय 6500 करोड़ रूपए बेकार ही गए हैं क्योंकि नदी पहले से भी ज्यादा गंदी हो चुकी है। समिति ने यह भी कहा कि दिल्ली के तीन नालों पर इंटरसेप्टर सीवर लगाने का काम अधूरा है। गंदा पानी नदी में सीधे गिर कर उसे जहर बना रहा है। विडंबना तो यह है कि इस तरह की चेतावनियां, रपटें ना तो सरकार के और ना ही समाज को जागरूक कर पा रही हैं। दिल्ली मे यमुना को साफ-सुथरा बनाने की कागजी कवायद कोई 40 सालों से चल रह है। सन अस्सी में एक योजना नौ सौ करोड़ की बनाई गई थी। दिसंबर-1990 में भारत सरकार ने यमुना को बचाने के लिए जापान सरकार के सामने हाथ फैलाए थे। जापानी संस्था ओवरसीज इकोनोमिक कारपोरेषन फंड आफ जापान का एक सर्वें दल जनवरी- 1992 में भारत आया था। जापान ने 403 करेड़ की मदद दे कर 1997 तक कार्य पूरा करने का लक्ष्य रखा था। लेकिन यमुना का मर्ज बढ़ता गया और कागजी लहरें उफनती रहीं। अभी तक कोई 1800 करोड़ रूपए यमुना की सफाई के नाम पर साफ हो चुके हैं। इतना धन खर्च होने के बावजूद भी केवल मानसून में ही यमुना में ऑॅक्सीजन का बुनियादी स्तर देखा जा सकता है। इसमें से अधिकांष राषि सीवेज और औद्योगिक कचरे को पानी से साफ करने पर ही लगाई गई।
यमुना की सफाई के दावों में उत्तरप्रदेष सरकार भी कभी पीछे नहीं रही। सन 1983 में उ.प्र. सरकार ने यमुना सफाई की एक कार्ययोजना बनाई। 26 अक्तूबर 1983 को मथुरा में उ.प्र. जल निगम के प्रमुख आरके भार्गव की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय बैठक हुई थी। इसमें मथुरा के 17 नालों का पानी परिषोधित कर यमुना में मिलाने की 27 लाख रूपए की योजना को इस विष्वास के साथ मंजूरी दी गई थी कि काम 1985 तक पूरा हो जाएगा। ना तो उस योजना पर कोई काम हुआ, और ना ही अब उसका कोई रिकार्ड मिलता है। उसके बाद तो कई-कई करोड़ के खेल हुए, लेकिन यमुना दिन-दुगनी, रात चौगुनी मैली होती रही।  आगरा में कहने को तीन सीवर षोधन संयत्र काम कर रहे हैं, लेकिन इसके बाद भी 110 एमएलडी सीवरयुक्त पानी  हर रोज नदी में मिल रहा है। संयत्रों की कार्यक्षमता और गुणवत्ता अलग ही बात है। तभी आगरा में यमुना के पानी को पीने के लायक बनाने के लिए 80 पीपीएम क्लोरीन देनी होती है। सनद रहे दिल्ली में यह मात्रा आठ-दस पीपीएम है।
सरकारी रिकार्ड से मिलने वाली जानकारी तो दर्षाती है कि देष की नदियों में पानी नहीं नोट बहते हैं, वह भी भ्रश्टाचार व अनियमितता के दलदल के साथ। बीते दस सालो ंके दौरान गंगा और यमुना की सफाई पर 1150 करोड़ व्यय हुए, लेकिन हालात बद से बदतर होते गए। सन 2000 से 2010 के बीच देष के बीस राज्यों को नदी संरक्षण ष्योजना के तहत  2607 करोड़ रूप्ए जारी किए गए। इस योजना में कुल 38 नदियां आती है। राश्ट्रीय नदी निदेषालय द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार सन 2001 से 2009-10 तक  दिल्ली में यमुना की सफाई पर 322 करोड़, हरियाणा में 85 करोड़ का खर्च कागजों पर दर्ज है। उ.प्र में गंगा, यमुना, गोमती की सफाई में 463 करोड़ की सफाई हो जाना, बिहार में गंगा के षुद्धिकरण के लिए 50 करोड़ का खर्च सरकारी दस्तावेज स्वीकार करते हैं। गुजरात में साबरमति के संरक्षण पर 59 करोड़, कर्नाटक में भद्रा, तुंगभद्रा,, कावेरी, तुंपा नदी को साफ करने पर 107 करोड़, मध्यप्रदेष में बेतवा, तापी, बाणगंगा, नर्मदा, कृश्णा, चंबल, मंदाकिनी को स्वच्छ बनाने के मद में 57 करोड़ का खर्चा किया गया। इस अवधि में पंजाब में अकेले सतलुज ो प्रदूशण मुक्त करने के लिए सरकार ने 154.25 करोड़ रूपए खर्च किए, जबकि तमिलनाडु में कावेरी, अडियार, बैगी, वेन्नार नदियों की सफाई का बिल 15 करोड़ का रहा। गंगा की जन्म स्थली उत्तराखंड में गंगा को पावन रखने के मद में 47 करोड़ खर्च हुए, जबकि पष्चिम बंगाल में गंगा, दामोदर, महानंदा के संरक्षण के लिए 264 करोड़ का सरकारी धन लगाया गया। कहने की जरूरत नहीं है कि अरबों पीने के बाद नदियों की सेहत कितनी सुधरी है व इस काम में लगी मषीनरी की कितनी।
यह जानना जरूरी है कि नदियों की सफाई, संरक्षण तो जरूरी है, लेकिन इससे भी ज्यादा जरूरी है कि नदियों के नैसर्गिक मार्ग, बहाव से छेड़छाड़ ना हो, उसके तटों पर लगे वनों में पारंपरिक वनों का संरक्षण हो, नदियों के जल ग्रहण क्षेत्र मे आने वाले इलाकों के खेतों में रासायनिक खाद व दवा का कम से कम इस्तेमाल हो। नदी को तो यह कायनात का वरदान होता है कि वह उसके मार्ग में आने वाली अषुद्धियों, गंदगी को पावन बना देती है, लेकिन मिलावट भी प्रकृति-सम्मत हो तब तक ही। नदियों से खनन, उसके तट पर निर्माण कार्य पर पाबंदी में यदि थोड़ी भी ढील दी जाती है तो जान लें कि उसके संरक्षण के लिए व्यय राषि पानी तो नहीं ला सकती , लेकिन एक बार फिर पानी में चली जाएगी।

कुछ प्रमुख नदियों में  प्रदूशण के मुख्य स्त्रोत
क्रमांक     नदी    स्थान    प्रदूशण का कारण
1.    काली    मेरठ    षक्कर, षराब, पेंट साबुन, रेषम, सूत, टिन, ग्लीसरीन कारखाने
2.    यमुना    दिल्ली    डीडीटी, ताप बिजली घर, षहरी गंदगी,
3.    गोमती    लखनऊ    कागज और षहरी गंदगी
4    गंगा    कानपुर    चमड़ा, जूट, व अन्य कारखाने
5.    दजोरा    बरेली    रबर
6.    दामोदर    बोकारो    खाद, स्टील कोयला कारखाने व बिजली घर
7.    हुगली    कोलकाता    कागज, जूट, कपड़ा, पेंट वार्निष रेयान, पालिथिन कारखाने व षहरी गंदगी
8.    सोन     डायमिया नगर     सीमेंट, कागज करखाने
9.    भद्रा     कर्नाटक    कागज, स्टील
10.    कूम    चैन्ने    मोटर कार वर्कषाप, बंकिम नहर, नगरीय कचरा
11    गोदावरी    दक्षिणी राज्य     कागज, सल्फर, सीमेंट, चीनी कारखाने
12    नर्मदा    मध्यप्रदेष     खेती, खाद कागज
13.    हिंडन    सहारनपुर से ग्रेटर नोएडा तक    कारखाने, षहरीय सीवर
 राश्ट्रीय पर्यावरण संस्थान, नागपुर की एक रपट बताती है कि गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी सहित देष की 14 प्रमुख नदियों में देष का 85 प्रतिषत पानी प्रवाहित होता है। ये नदियां इतनी बुरी तरह प्रदूशित हो चुकी हैं कि देष की 66 फीसदी बीमारियों का कारण इनका जहरीला जल है। इस कारण से हर साल 600 करोड़ रूपए के बराबर  सात करोड़ तीस लाख मानव दिवसों की हानि होती है।
अभी तो देश में नदियों की सफाई नारों के षोर और आंकड़ों के बोझ में दम तोड़ती रही हैं। बड़ी नदियों में जा कर मिलने वाली हिंडन व केन जैसी नदियों का तो अस्तित्व ही संकट में है तो यमुना कहीं लुप्त हो जाती है व किसी गंदे नाले के मिलने से जीवित दिखने लगती है। सोन, जोहिला , नर्मदा के उद्गम स्थल अमरकंटक से ही नदियों के दमन की षुरूआत हो जाती है तो कही नदियों को जोड़ने व नहर से उन्हें जिंदा करने के प्रयास हो रहे हैं।  नदी में जहर केवल पानी को ही नहीं मार रहा है, उस पर आश्रित जैव संसार पर भी खतरा होता है। नदी में मिलने वाली मछली केवल राजस्व या आय का जरिया मात्र नहीं है, यह जल प्रदूशण दूर करने में भी सहायक होती हैं।
जल ही जीवन का आधार है, लेकिन भारत की अधिकांष नदियां शहरों के करोड़ों लीटर जल-मल व कारखानों से निकले जहर को ढ़ोने वाले नाले का रूप ले चुकी हैं। नदियों मंे शवबहा देने, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को रोकने या उसकी दिषा बदलने से हमारे देष की असली ताकत, हमारे समृद्ध जल-संसाधन नदियों का अस्तित्व खतरे में आ गया है।


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