तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

Mayor of 9 percent !

नौ फीसदी का मेयर

                                                                     पंकज चतुर्वेदी


दिल्ली से सटे हुए गाजियाबाद में पिछले दिनों नगरनिगम के अध्यक्ष यानि मेयर का उप चुनाव हुआ। एक विधान सभा सीट से भी बड़़े इस चुनाव में कुल मतदाता थे- 11,77,276 । मतदान हुआ महज 18.54 प्रतिषत यानि 2,18,314 और जीते हुए उम्म्ीदवार को मिले वोटों की संख्या थी- 1,15,900। यदि गंभीरता से गणित लगाएं तो कुल मतदाताओं के महज 9.8 प्रतिषत वोट पाने वाला षहर का मेयर बन गया। मतदान 14 फरवरी, रविवार और वेलेन्टाईन डे पर था, प्रेमोत्सव मनाने वाले लेागों की भीड़ से माॅल-हाॅल खचाखच थे, लेकिन मतदाता केंद्र खाली थे। यहां एक बात और गौर करने की है कि केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई स्वच्छता सूची में गाजियाबाद का नंबर पीछे से सातवां है। साफ-सफााई रखना नगर निगम की ही जिम्मेदारी होती है। समझ नही कि यह जनता की निराषा थी,  लापरवाही थी या और कुछ।  अभी कुछ ही दिनों पहले  उ.प्र में ही पंचायत चुनाव हुए तो उसमें नब्बे फीसदी तक वोट पड़े। गांव-गांव में दिन-रात प्रचार व चुनाव चर्चा होती रही। वहीं गाजियाबाद में मेयर जैसे महत्वपूर्ण चुनाव की चर्चा जिला मुख्यालय से 10 किलोमीटर दूर वाली कालोनियां तक में नहीं थी। ना कोई सभा, ना प्रचार, ना पर्चे ना झंडे।  स्वतंत्र और निश्पक्ष चुनावों के लिए पिछले कुछ सालों में चुनावी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण बदलाव भी हुए, लेकिन सबसे अहम संवाल यथावत खड़ा है कि क्या हमारी सरकार वास्तव में जनता के बहुमत की सरकार होती है ? यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांत पर व्यंग्य ही है कि देष की सरकारें आमतौर पर कुल आबादी के 14-15 फीसदी लोगों के समर्थन की ही होती है ।

यह विचारणीय है कि क्या वोट ना डालने वाले 81 फीसदी से ज्यादा लोगों की निगाह में चुनाव लड़ रहे सभी उम्मीदवार या मौजूदा चुनाव व्यवस्था नालायक थी ? जिन परिणामों को राजनैतिक दल जनमत की आवाज कहते रहे हैं, ईमानदारी से आकलन करें तो यह सियासती - सिस्टम के खिलाफ अविष्वास मत था । सुप्रीम कोर्ट के आदेष ‘‘कोई पसंद नहीं’’ पर खुष होने वाले पता नहीं क्यों इतने खुष हैं, हमारे सामने चुनौती लोकतांत्रिक मूल्यों को स्थापित करने की है ना कि उन्हें नकारने की।
जब कभी मतदान कम होने की बात होती है तो प्रषासन व राजनैतिक दल अधिेक गरमी या सर्दी होने, छुट्टी ना होने जैसे कारण गिनाने लगते हैं ।
विडंबना है कि आंकड़ों की बाजीगरी में पारंगत सभी राजननैतिक दल इस साधारण से अंक गणित को ना समझ पाने का बहाना करते हैं ।  लोकतंत्र अर्थात बहुमत की सरकार की हकीकत ये आंकड़े सरेआम उजागर कर देते हैं । लोकतंत्र की मूल आत्मा को बचाने के लिए अधिक से अधिक लोगों को मतदान केंद्र तक पहुचाना जरूरी है । वैसे इस बार ईवीएस के इस्तेमालों से वोटों के इस नुकसान की तो कोई संभावना रह नहीं जाएगी ।
मूल सवाल यह है कि आखिर इतने सारे लोग वोट क्यों नहीं डालते हैं ? गाजियाबाद में कोषांबी, वसुंधरा, बृजविहार इंदिरापुरम जैसी गगनचुंबी, पढ़े-लिखों की कालोनी में 10 से 12 फीसदी वोट ही गिरे।

मतदाताओं की बढ़ती संख्या के साथ-साथ उम्मीदवारों की संख्या अधिक हो रही है । इसकी तुलना में नए मतदाता केंद्रों की संख्या नहीं बढ़ी है। मतदाता सूची में नाम जुड़वाना जठिल है और उससे भी कठिन है अपना मतदाता पहचान पत्र पाना। उसके बाद चुनाव के लिए पहले अपने नाम की पर्ची जुटाओं, फिर उसे मतदान केंद्र में बैठे एक कर्मचारी को दे कर एक कागज पर दस्तखत या अंगूठा लगाओ । फिर एक कर्मचारी आपकी अंगुली पर स्याही लगाएगा । एक अफसर मषीन षुरू करेगा , उसके बाद आप बटन दबा कर वोट डालेंगे । पूरी प्रक्रिया में दो-तीन मिनट लग जाते हैं । प्रत्येक मतदाता केंद्र पर एक हजार से अधिक व कहीं -कहीं दो हजार तक मतदाता हैं । यदि एक मतदाता पर देा मिनट का समय आंकें तो एक घंटे में अधिकतम 30 मतदाता होंगे । इसके चलते मतदाता केंद्रों के बाहर लबी-लंबी लाईनें लग जाती हैं । देष में 40 प्रतिषत से अधिक लोग ऐसे हैं जो कि ‘‘रोज कुआं खेद कर रोज पानी पीते ’’ हैं । यदि वे महज वोट डालने के लिए लाईन में लग कर समय लगाएंगे तो दिहाड़ी मारी जागी व षाम को घर का चूल्हा नहीं जल पाएगा ।
मतदान कम होने का एक कारण देष के बहुत से इलाकों में बड़ी संख्या में महिलाओं का घर से ना निकलना भी है । गाजियाबाद का चुनाव ही बानगी है कि यहां कुल पड़े पदो लाख अठारह हजार चवोटों में से महिलओं के वोट 86 हजार 377 ही हैं। महिलाओं के लिए निर्वाचन में आरक्षण की मांग कर रहे संगठन महिलाओं का मतदान बढ़ाने के तरीकों पर ना तो बात करते हैं, और ना ही प्रयास । इसके अलावा जेल में बेद विचाराधीन कैदियों और अस्पताल में भर्ती मरीजों व उनकी देखभाल में लगे लोगों , चुनाव व्यवस्था में लगे कर्मचारियों, किन्हीं कारणो से सफर कर रहे लोग, सुरक्षा कर्मियों व सीमा पर तैनात जवानेेां के लिए मतदान की माकूल व्यवस्था नहीं है । हमारे देष की डाक से मतदान की प्रक्रिया इतनी गूढ़ है कि नाम मात्र के लेाग ही इसका लाभ उठा पाते हैं । इस तरह लगभग 20 फीसदी मतदाता तो  चाह कर भी मतोत्सव में भागीदारी से वंचित हो जाते हैं । कुछ सालों पहले चुनाव आयोग ने सभी राजनैतिक दलों के साथ एक बैठक में प्रतिपत्र मतदान का प्रस्ताव रखा था । इस प्रक्रिया में मतदाता अपने किसी प्रतिनिधि को मतदान के लिए अधिकृत कर सकता है । इस व्यवस्था के लिए जन प्रतिनिधि अधिनियम 1951 और भारतीय दंड संहिता में संषोधन करना जरूरी है । संसद में बहस का आष्वासन दे कर उक्त अहमं मसले को टाल दिया गया । गुजरात में स्थानीय निकायों के निर्वाचन में अनिवार्य मतदान की कानून लाने का प्रयास किया गया था लेकिन वह सफल नहीं हुआ। यहां जानना जरूरी है कि दुनिया के कई देषों में मतदान अनिवार्य है। आस्ट्रेलिया सहित कोई 19 मुल्कांे में वोट ना डालना दंडनीय अपराध है। क्यों नाह मारे यहां भी बगैर कारण के वोट ना डालने वालों के कुछ नागरिक अधिकार सीमित करने या उन्हें कुछ सरकारी सुविधाओं से वंचित रखने के प्रयोग किये जाएं।
आज चुनाव से बहुत पहले बड़े-बड़े रणनीतिकार  मतदाता सूची का विष्लेशण कर तय कर लेते हैं कि हमें अमुक जाति या समाज के वोट चाहिए ही नहीं। यानी जीतने वाला क्षेत्र का नहीं, किसी जाति या धर्म का प्रतिनिधि होता है। यह चुनाव लूटने के हथकंडे इस लिए कारगर हैं, क्योंकि हमारे यहां चाहे एक वोट से जीतो या पांच लाख वोट से , दोनों के ही सदन में अधिकार बराबर होते है। यदि राश्ट्रपति चुनावों की तरह किसी संसदीय क्षेत्र के कुल वोट और उसमें से प्राप्त मतों के आधार पर सांसदों की हैंसियत, सुविधा आदि तय कर दी जाए तो नेता पूरे क्षेत्र के वोट पाने के लिए प्रतिबद्ध होंगे, ना कि केवल गूजर, मुसलमान या ब्राहण वोट के।  केबिनेट मंत्री बनने के लिए या संसद में आवाज उठाने या फिर सुविधाओं को ले कर निर्वाचित प्रतिनिधियों का उनको मिले कुछ वोटो का वर्गीकरण माननीयों को ना केवल संजीदा बनाएगा, वरन उन्हें अधिक से अधिक मतदान भी जुटाने को मजबूर करेगा। यह तय है कि अब गाजियाबाद के मेयर भी उन्ही इलाकों पर अपना ध्यान देंगे जहां से उन्हें वोट मिले या ज्यादा मिले।
इस समय देष के कलाकार, लेखक, औद्योगिक घराने, मीडिया, सभी अपने-अपने खेमों में सक्रिय हो कर एक दल-विषेश को सत्ता की कुंजी सौंपने के येन-केन-प्रकारेण उपाय कर रहे हें । ऐसे में बुद्धिजीवियों की एक जमात कांे आगे आ कर मतदात- प्रतिषत बढ़ाने के लिए जागरूकता अभियान की बागडोर संभालनी चाहिए । इस कार्य में अखबारों व इलेक्ट्रानिक् मीडिया महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं । राजनैतिक दल कभी नहीं चाहेंगे कि मतदान अधिक हो, क्योंकि इसमें उनके सीमित वोट-बैंक के अल्पमत होने का खतरा बढ़ जाता है । हमारा संसदीय लोकतंत्र भी एक ऐसे अपेक्षाकृत आदर्ष चुनाव प्रणाली की बाट जोह रहा हैं , जिसमें कम से कम मतदान तो ठीक तरीके  से होना सुनिष्चित हो सके ।

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

Examination fobia has killed joy of learning



परीक्षा और सीखने की प्रक्रिया

क्या किसी बच्चे की योग्यता, क्षमता और बुद्धिमत्ता का पैमाना महज अंकों का प्रतिशत ही है? वह भी उस परीक्षा प्रणाली में, जिसकी स्वयं की योग्यता संदेहों से घिरी हुई है?
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सीबीएसई बोर्ड के इम्तहान शुरू क्या हुए- बच्चे, पालक, शिक्षक सभी तनावग्रस्त हैं। किसी को बेहतर संस्थान में दाखिले की चिंता है तो किसी को अपने स्कूल का नाम रोशन करने की तो कोई समाज में अपने रुतबे के लिए बच्चे को सहारा बनाए है। कहने को तो सीबीएसई ने नंबर की जगह ग्रेड को लागू कर दिया है, लेकिन इससे उस संघर्ष का दायरा और बढ़ गया है जो बच्चों के आगे के दाखिले, भविष्य या जीवन को तय करते हैं।
याद करें, चार साल पहले के एनसीईआरटी और सीबीएसई के हवाले से कई समाचार छपे थे कि अब बच्चों को परीक्षा के भूत से मुक्ति मिल जाएगी। नई नीति के तहत अब ऐसी पुस्तकें बन गई हैं जिन्हें बच्चे मजे-मजे पढ़ेंगे। कुछ साल पहले घोषणा की गई थी कि दसवीं के बच्चों को अंक नहीं ग्रेड दिया जाएगा, लेकिन इस व्यवस्था से बच्चों पर दवाब में कोई कमी नहीं आई है। यह विचारणीय है कि जो शिक्षा बारह साल में बच्चों को अपनी भावनाओं पर नियंत्रण करना न सिखा सके, जो विषम परिस्थिति में अपना संतुलन बनाना न सिखा सके, वह कितनी प्रासंगिक व व्यावहारिक है?
ज्यादा नंबर लाने की होड़, दबाव, संघर्ष; और इसके बीच में पिसता किशोर! अभी-अभी बचपन की दहलीज छोड़ी है और पहला अनुभव ही इतना कटु? दुनिया क्या ऐसी ही गलाकाट प्रतिस्पर्द्धा से चलती है? एक तरफ कॉलेजों में दाखिले की मारामारी होगी, तो दूसरी ओर हायर सैकेंडरी में अपनी पसंद के विषय लेने के लिए माकूल अंकों की दरकार का खेल। अब तो बोर्ड के इम्तहान से आगे की गलाकाट ज्यादा बड़ी हो गई है- हर एक बच्चा एआईइइइ, सीपीएमटी के अलावा अलग-अलग राज्यों के इंजीनियरिंग और मेडिकल के दाखिले की परीक्षा की तैयारी में भी लगा है। बीबीए (बैचलर आॅफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन) में दाखिला भी अलग परीक्षा से होना है। जाहिर है कि पाठ्यक्रम के दबाव के साथ-साथ अपने भविष्य और अपने पालकों के अरमानों के दबाव को झेलने के लिए सत्रह-अठारह साल की उमर कुछ कम होती है। नारों से दमकती शिक्षा नीति इस तरह की परीक्षा-प्रणालीसे सफलता की नहीं वरन असफल लोगों की जमात तैयार कर रही है।
क्या किसी बच्चे की योग्यता, क्षमता और बुद्धिमत्ता का पैमाना महज अंकों का प्रतिशत ही है? वह भी उस परीक्षा प्रणाली में, जिसकी स्वयं की योग्यता संदेहों से घिरी हुई है? सीबीएसई की कक्षा दस में पिछले साल दिल्ली में हिंदी में बहुत-से बच्चों के कम अंक रहे। जबकि हिंदी के मूल्यांकन की प्रणाली को गंभीरता से देखें तो वह बच्चों के साथ अन्याय ही है। कोई बच्चा हैजैसे शब्दों में बिंदी लगाने की गलती करता है, किसी को छोटी व बड़ी मात्रा की दिक्कत है।
कोई बच्चा ’, ‘और में भेद नहीं कर पाता है। स्पष्ट है कि यह बच्चे की महज एक गलती है, लेकिन मूल्यांकन के समय बच्चे ने जितनी बार एक ही गलती को किया है, उतनी ही बार उसके नंबर काट लिए गए। यानी मूल्यांकन का आधार बच्चे की योग्यता न होकर उसकी कमजोरी है। यह सरासर नकारात्मक सोच है, जिसके चलते बच्चों में आत्महत्या, पर्चे बेचने-खरीदने की प्रवृत्ति, नकल व झूठ का सहारा लेने जैसी बुरी आदतें विकसित हो रही हैं। शिक्षा का मुख्य उद्देश्य इस नंबर-दौड़ में गुम होकर रह गया है।
छोटी कक्षाओं में सीखने की प्रक्रिया के लगातार नीरस होते जाने व बच्चों पर पढ़ाई के बढ़ते बोझ को कम करने के इरादे से मार्च 1992 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने देश के आठ शिक्षाविदों की एक समिति बनाई थी, जिसकी अगुआई प्रो यशपाल कर रहे थे। समिति ने देश भर की कई संस्थाओं और लोगों से संपर्क किया व जुलाई 1993 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। उसमें साफ लिखा गया था कि बच्चों के लिए स्कूली बस्ते के बोझ से अधिक बुरा है न समझ पाने का बोझ। सरकार ने सिफारिशों को स्वीकार भी कर लिया और एकबारगी लगा कि उन्हें लागू करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। फिर देश की राजनीति मंदिर-मस्जिद जैसे विवादों में ऐसी फंसी कि उस रिपोर्ट की सुध ही न रही।
चूंकि परीक्षा का वर्तमान स्वरूप आनंददायक शिक्षा के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा है, अत: इसके स्थान पर सामूहिक गतिविधियों को प्रोत्साहित व पुरस्कृत किया जाना चाहिए। इसके विपरीत बीते एक दशक में कक्षा में अव्वल आने की गलाकाट होड़ में न जाने कितने बच्चे कुंठा का शिकार हो मौत को गले लगा चुके हैं। हायर सेकेंडरी के नतीजों के बाद ऐसे हादसे सारे देश में होते रहते हैं। अपने बच्चे को पहले नंबर पर लाने के लिए कक्षा एक-दो से ही अभिभावक युद्ध-सा लड़ने लगते हैं।
समिति की दूसरी सिफारिश पाठ्यपुस्तक के लेखन में शिक्षकों की भागीदारी बढ़ा कर उसे विकेंद्रित करने की थी। सभी स्कूलों को पाठ्यपुस्तकों और अन्य सामग्री के चुनाव सहित नवाचार के लिए बढ़ावा दिए जाने की बात भी इस रपट में थी। अब प्राइवेट स्कूलों को अपनी किताबें चुनने का हक तो मिल गया है, लेकिन यह व्यापार बन कर बच्चों के शोषण का जरिया बन गया है। पब्लिक स्कूल अधिक मुनाफा कमाने की फिराक में बच्चों का बस्ता भारी करते जा रहे हैं। सरकार बदलने के साथ किताबें बदलने का दौर एनसीईआरटी के साथ-साथ विभिन्न राज्यों के पाठ्यपुस्तक निगमों में भी जारी है। पाठ्यपुस्तकों को स्कूल की संपत्ति मानने व उन्हें बच्चों को रोज घर ले जाने की जगह स्कूल में ही रखने के सुझाव न जाने किस लाल बस्ते में बंध कर गुम हो गए। जबकि बच्चे बस्ते के बोझ, पाठ्यक्रम की अधिकता, अभिभावकों की अपेक्षाओं से कुंठित होते जा रहे हैं।
कुल मिलाकर परीक्षा व उसके परिणामों ने बच्चों के नैसर्गिक विकास में बाधा का रूप ले लिया है। कहने को तो अंक-सूची पर प्रथम श्रेणी दर्ज है, लेकिन उनकी आगे की पढ़ाई के लिए सरकारी स्कूलों ने भी दरवाजों पर शर्तों की बाधाएं खड़ी कर दी हैं। सवाल यह है कि शिक्षा का उद्देश्य क्या है- परीक्षा में स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करना, विषयों की व्यावहारिक जानकारी देना या फिर एक अदद नौकरी पाने की कवायद?
निचली कक्षाओं में नामांकन बढ़ाने के लिए सर्वशिक्षा अभियान और ऐसी ही कई योजनाएं संचालित हैं। सरकार हर साल अपनी रिपोर्ट में ड्राप आउट’ (बीच में पढ़ाई छोड़ने) की बढ़ती संख्या पर चिंता जताती है। लेकिन कभी किसी ने यह जानने का प्रयास नहीं किया कि अपनी पसंद के विषय या संस्था में प्रवेश न मिलने से कितनी प्रतिभाएं कुचल दी गई हैं। एमए और बीए की डिग्री पाने वालों में कितने ऐसे छात्र हैं जिन्होंने अपनी पसंद के विषय पढ़े हैं। विषय चुनने का हक बच्चों को नहीं बल्कि उस परीक्षक को है जो कि बच्चों की प्रतिभा का मूल्यांकन उनकी गलतियों की गणना के अनुसार कर रहा है।
वर्ष 1988 में लागू शिक्षा नीति (जिसकी चर्चा नई शिक्षा नीति के नाम से होती रही है) के 119 पृष्ठों के दस्तावेज से यह ध्वनि निकलती थी कि अवसरों की समानता दिलाने से शिक्षा में बुनियादी परिवर्तन आएगा। दस्तावेज में भी शिक्षा के उद््देश्यों पर विचार करते हुए स्रोतों की बात आ गई है। उसमें बार-बार आय-व्यय तथा बजट की ओर इशारे किए गए थे। सारांश यह है कि आर्थिक ढांचा पहले तय होगा, फिर शिक्षा का। कई बजट आए और औंधे मुंह गिरे। लेकिन देश की आर्थिक दशा और दिशा का निर्धारण नहीं हो पाया। सो शिक्षा में बदलाव का यह दस्तावेज भी किसी सरकारी दफ्तर की धूल से अटी फाइल की तरह कहीं गुमनामी के दिन काट रहा है।
हमारी सरकार ने शिक्षा विभाग को कभी गंभीरता से नहीं लिया। इसमें इतने प्रयोग हुए कि आम आदमी लगातार कुंद दिमाग होता गया। हम गुणात्मक दृष्टि से पीछे जाते रहे, मात्रात्मक वृद्वि भी नहीं हुई। कुल मिलाकर देखें तो शिक्षा प्रणाली का उद््देश्य और पाठ्यक्रम के लक्ष्य एक दूसरे में उलझ गए व एक गफलत की स्थिति बन गई। स्कूल एक पाठ्यक्रम को पूरा करने की जल्दी, कक्षा में ब्लैकबोर्ड, प्रश्नों को हल करने की जुगत में उलझ कर रह गया।
नई शिक्षा नीति को बनाने वाले एक बार फिर सरकार में हैं। शिक्षा की दिशा-दशा तय करने वाली प्रो यशपाल की टीम की एक बार फिर पूछ बढ़ गई है। क्या ये लोग अपने पुराने अनुभवों से कुछ सीखते हुए बच्चों की बौद्धिक क्षमता के विकास के लिए कारगर कदम उठाते हुए नंबरों की अंधी दौड़ पर विराम लगाने की सुध लेंगे?
यह भी गौरतलब है कि कक्षा बारहवीं की जिस परीक्षा को योग्यता का प्रमाणपत्र माना जा रहा है, उसे व्यावसायिक पाठ्यक्रम वाले महज एक कागज का टुकड़ा मानते हैं। इंजीनियरिंग, मेडिकल, चार्टर्ड एकाउंटेंट; जिस किसी भी कोर्स में दाखिला लेना हो, एक प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण करनी होगी। मामला यहीं नहीं रुकता, बच्चे को बारहवीं पास करने के एवज में मिला प्रमाणपत्र उसकी उच्च शिक्षा की गारंटी भी नहीं लेता। डिग्री कॉलेजों में भी ऊंचे नंबर पाने वालों की सूची तैयार होती है और अनुमान है कि हर साल हायर सेकंडरी (राज्य या केंद्रीय बोर्ड से) पास करने वाले बच्चों का चालीस फीसद आगे की पढ़ाई से वंचित रह जाता है। ऐसे में पूरी परीक्षा की प्रक्रिया और उसके बाद के नतीजों को बच्चों के नजरिए से तौलने-परखने का वक्त आ गया है।
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गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

organic agriculture is only way to save indian farmers

दैनिकजागरण25.2.16
खेतों को जहर बनने से रोकता पारंपरिक खेती का हुनर
पंकज चतुर्वेदी

मध्यप्रदेष का निमाड़ अंचल मिर्ची की खेती के लिए मषहूर है। पिछले साल वहां कई हजार एकड़ की फसल कीड़ा लगने के कारण नश्ट हुई, लेकिन कुछ खेत ऐसे भी थे, जहां बेहतरीन फसल उगी। पता चला कि उन खेतों के किसानों ने किसी तरह का रासायनिक खाद या कीटनाषक का इस्तेमाल नहीं किया था।  वे खेतों मे दूध, हल्दी और गुड़ का छिड़काव करते थे। हर सुबह खेतों के बीच खड़े हो कर घंटी बजाते थे। राज्य के कृशि विभाग के अफसर भी वहां गए और पुश्टि हुई कि किसानों की देषज, पारंपरिक तरकीब काम कर रही है। एक बात और कि फसल की मात्रा भी कम नहीं हुई। भारतीय कृशि के पारंपरिक ज्ञान में कई ऐसे नुस्खे हैं जिन्हे अपनाने से ना केवल खेती की लागत कम होती है, बल्कि फसल मात्रा व ग्रुणवत्ता में भी बेहतर होती है। विडंबना है कि हरित क्रांति के नारे में फंस कर हमारा किसान रासायनिक दवा और खाद के फेर में फंस गया और इसी की परिणति है कि आज किसान कर्ज  में दब कर हताष-परेषान है।
हमारे खेत किस तरह जहरीले बन गए है। उसकी बानगी है दिल्ली से सटे पष्चिम उत्तर प्रदेष के कुछ इलाके। वैसे तो नोएडा की पहचान एक उभरते हुए विकसित इलाके के तौर पर है लेकिन यहां के कई गांव वहां रच-बस चुकी कैंसर की बीमारी के कारण जाने जाते हैं। अच्छेजा गांव में बीते पांच साल में दस लोग इस असाध्य बीमारी से असामयिक काल के गाल में समा चुके हैं। अब अच्छेजा व ऐसे ही कई गांवों में लोग अपना रोटी-बेटी का नाता भी नहीं रखते हैं। दिल्ली से सटे पश्चिम उत्तर प्रदेश का दोआब इलाका, गंगा-यमुना नउी द्वारा सदियों से बहा कर लाई मिट्टी से विकसित हुआ था। यहां की मिट्टी इतनी उपजाऊ थी कि पूरे देश का पेट भरने लायक अन्न उगाने की क्षमता थी इसमें। अब प्रकृति इंसान की जरूरत तो पूरा कर सकती है, लेकिन लालच को नहीं । और  ज्यादा फसल के लालच में यहां अंधाधुंध खाद व कीटनाशकों का जो प्रयोग शुरू हुआ कि अब यहां पाताल से, नदी, से जोहड़ से, खेत से, हवा से  हवा-पानी नहीं मौत बरसती हैं। बागपत से लेकर ग्रेटर नोएडा तक के कोई 160 गंावों में हर साल सैंकड़ों लोग कैंसर से मर रहे हैं। सबसे ज्यादा लेागों को लीवर व आंत का कैंसर हुआ हे। बाल उड़ना, किडनी खराब होना, भूख कम लगना, जैसे रोग तो यहां  हर घर में हैं। सरकार कुछ कर रही है, राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण भी कुछ नोटिस दे रहा है, लेकिन इलाके में खेतों में छिड़कने वाले जहर की बिक्री की मात्रा हर दिन बढ़ रही है।  दुखद है कि अब नदियों के किनारे ‘विष-मानव’ पनप रहे हैं जो कथित विकास की कीमत चुकाते हुए असमय काल के गाल में समा रहे हैं। हमारे देश में हर साल कोई दस हजार करोड़ रूपए के कृषि-उत्पाद खेत या भंडार-गृहों में कीट-कीड़ों के कारण नष्ट हो जाते हैं । इस बर्बादी से बचने के लिए कीटनाशकों का इस्तेमाल बढ़ा हैं । जहां सन 1950 में इसकी खपत 2000 टन थी, आज कोई 90 हजार टन जहरीली दवाएं देश के पर्यावरण में घुल-मिल रही हैं । इसका कोई एक तिहाई हिस्सा विभिन्न सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों के अंतर्गन छिड़का जा रहा हैं ।  सन 1960-61 में केवल 6.4 लाख हेक्टर खेत में कीटनाशकों का छिड़काव होता था। 1988-89 में यह रकबा बढ़ कर 80 लाख हो गया और आज इसके कोई डेढ़ करोड़ हेक्टर होने की संभावना है। ये कीटनाशक जाने-अनजाने में पानी, मिट्टी, हवा, जन-स्वास्थ्य और जैव विविधता को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं। इपले अंधाधुंध इस्तेमाल से पारिस्थितक संतुलन बिगड़ रहा है, सो अनेक कीट व्याधियां फिर से सिर उठा रही हैं। कई कीटनाशियों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ गई है और वे दवाओं को हजम कर रहे हैं। इसका असर खाद्य श्रंखला पर पड़ रहा है और उनमें दवाओं व रसायनों की मात्रा खतरनाक स्तर पर आ गई है। एक बात और, इस्तेमाल की जा रही दवाईयों का महज 10 से 15 फीसदी ही असरकारक होता है, बकाया जहर मिट्टी, भूगर्भ जल, नदी-नालों का हिस्सा बन जाता है। यह दुर्दषा अकेले नोएडा की नहीं, बल्कि देष के अधिकांष खेतों की हो गई है।
 महंगी व नकली के डर से बिकने वाली रासायनिक खादों के विकल्प की ही बात करें तो पुष्तैनी तालाब इस मामले में ‘‘एक पंथ पदो काज’’ हैं। हमारी सरकारें बजट का रोना रोती हैं कि पारंपरिक जल संसाधनों की सफाई के लिए बजट का टोटा है। हकीकत में तालाबों की सफाई और गहरीकरण अधिक खर्चीला काम नही है ,ना ही इसके लिए भारीभरकम मषीनों की जरूरत होती है। यह सर्वविदित है कि तालाबों में भरी गाद, सालों साल से सड़ रही पत्तियों और अन्य अपशिष्ठ पदार्थो के कारण ही उपजी है, जो उम्दा दर्जे की खाद है। रासायनिक खादों ने किस कदर जमीन को चैपट किया है? यह किसान जान चुके हैं और उनका रुख अब कंपोस्ट व अन्य देषी खादों की ओर है। किसानों को यदि इस खादरूपी कीचड़ की खुदाई का जिम्मा सौंपा जाए तो वे वे सहर्ष राजी हो जाते हैं। उल्लेखनीय है कि राजस्थान के झालावाड़ जिले में ‘‘खेतों मे पालिश करने’’ के नाम से यह प्रयोग अत्यधिक सफल व लोकप्रिय रहा है । कर्नाटक में समाज के सहयोग से ऐसे कोई 50 तालाबों का कायाकल्प हुआ है, जिसमें गाद की ढुलाई मुफ्त हुई, यानी ढुलाई करने वाले ने इस बेषकीमती खाद को बेच कर पैसा कमाया। इससे एक तो उनके खेतों को उर्वरक मिलता है, साथ ही साथ तालाबों के रखरखाव से उनकी सिंचाई सुविधा भी बढ़ती है। सिर्फ आपसी तालमेल, समझदारी और अपनी पंरपरा तालाबों के संरक्षण की दिली भावना हो तो ना तो तालाबों में गाद बचेगी ना ही सरकारी अमलों में घूसखोरी की कीच होगी।
बस्तर का कोंडागांव केवल नक्सली प्रभाव वाले क्षेत्र के तौर पर ही सुर्खियों में रहता है, लेकिन यहां डा. राजाराम त्रिपाठी के जड़ीबूटियों के जंगल इस बात की बानगी हैं कि सूखी पत्तियां कितने कमाल की हैं। डा. त्रिपाठी काली मिर्च से लेकर  सफेद मूसली तक उत्पादन करते हैं व पूरी प्रक्रिया में में किसी भी किस्म की रासायनिक खाद, दवा या अन्य तत्व इस्तेमाल नहीं करते हैं। गर्मियों के दिनों में उनके कई एकड़ में फैले जंगलों में साल व अन्य पेड़ों की पत्तियों पट जाती हैं। बीस दिन के भीतर ही वहां मिट्टी की परत होती है। असल में उनके ंजगलों में दीमक को भी जीने का अवसर मिला है और ये दीमक इन पत्तियों को उस ‘‘टाप साॅईल’’ में बदल देती हैं जिसका एक सेंटीमीटर उपजाने में प्रकृति को सदियों का समय लग जाती है।
कुछ साल पहले थियोसोफीकल सोसायटी, चैन्नई में कोई पचास से अधिक आम के पेड़ रोगग्रस्त हो गए थे । आधुनिक कृषि-डाक्टरों को कुछ समझ नहीं आ रहा था । तभी समय की आंधी में कहीं गुम हो गया सदियों पुराना ‘‘वृक्षायुर्वेद’’ का ज्ञान काम आया । सेंटर फार इंडियन नालेज सिस्टम (सीआईकेएस) की देखरेख में नीम और कुछ दूसरी जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल किया गया । देखते ही देखते बीमार पेड़ों में एक बार फिर हरियाली छा गई । ठीक इसी तरह चैन्नई के स्टेला मेरी कालेज में बाटनी के छात्रों ने जब गुलमेंहदी के पेड़ में ‘‘वृक्षायुर्वेद’’ में सुझाए गए नुस्खों का प्रयोग किया तो पता चला कि पेड़ में ना सिर्फ फूलों के घने गुच्छे लगे , बल्कि उनका आकार भी पहले से बहुत बड़ा था । वृक्षायुर्वेद के रचयिता सुरपाल कोई एक हजार साल पहले दक्षिण भारत के शासक भीमपाल के राज दरबारी थे । वे वैद्ध के साथ-साथ अच्छे कवि भी थे । तभी चिकित्सा सरीखे गूढ़ विषय पर लिखे गए उनके ग्रंथ वृक्षायुर्वेद को समझने में आम ग्रामीण को भी कोई दिक्कत नहीं आती है ।उनका मानना था कि जवानी,आकर्षक व्यक्तित्व, खूबसूरत स्त्री,बुद्धिमान मित्र, कर्णप्रिय संगीत, सभी कुछ एक राजा के लिए अर्थहीन हैं, यदि उसके यहां चित्ताकर्षक बगीचे नहीं हैं । सुरपाल के कई नुस्खे अजीब हैं -जैसे, अशोक के पेड़ को यदि कोई महिला पैर से ठोकर मारे तो वह अच्छी तरह फलता-फूलता है , या यदि कोई सुंदर महिला मकरंद के पेड़ को नाखुनों से नोच ले तो वह कलियों से लद जाता है । सुरपाल के कई नुस्खेे आसानी से उपलब्ध जड़ी-बूटियों पर आधारित हैं । महाराष्ट्र में धोबी कपड़े पर निशान लगाने के लिए जिस जड़ी का इस्तेमाल करते हैं, उसे वृक्षायुर्वेद में असरदार कीटनाशक निरुपित किया गया है । भल्लाटका यानि सेमीकार्पस एनाकार्डियम का छोटा सा टुकड़ा यदि भंडार गृह में रख दिया जाए तो अनाज में कीड़े नहीं लगते हैं और अब इस साधारण सी जड़ी के उपयोग से केंसर सरीखी बीमारियों के इलाज की संभावनाओं पर शोध चल रहे हैं ।
पंचामृत यानि गाय के पांच उत्पाद- दूध,दही,घी,गोबर और गौमू़़़त्र के उपयोग से पेड़-पौधों के कई रोग जड़ से दूर किए जा सकते हैं ।‘ वृक्षायुर्वेद ’ में दी गई इस सलाह को वैज्ञानिक रामचंद्र रेड्डी और एएल सिद्धारामैय्या ने आजमाया । टमाटर के मुरझाने और केले के पनामा रोग में पंचामृत की सस्ती दवा ने सटीक असर किया । इस परीक्षण के लिए टमाटर की पूसा-रूबी किस्म को लिया गया सुरपाल के सुझाए गए नुस्खे में थोड़ा सा संशोधन कर उसमें यीस्ट और नमक भी मिला दिया गया । दो प्रतिशत घी, पांच प्रतिशत दही और दूध, 48 फीसदी ताजा गोबर, 40 प्रतिशत गौ मूत्र के साथ-साथ 0.25 ग्राम नमक और इतना ही यीस्ट मिलाया गया । ठीक यही फार्मूला केले के पेड़ के साथ भी आजमाया गया, जो कारगर रहा ।
सीआईकेएस में बीते कई सालों से  वृक्षायुर्वेद और ऐसे ही पुराने ग्रंथों पर शोध चल रहे हैं । यहंा बीजों के संकलन, चयन, और उन्हें सहेज कर रखने से ले कर पौधों को रोपने, सिंचाई, बीमारियों से मुक्ति आदि की सरल पारंपरिक प्रक्रियाओं को लोकप्रिय बनाने के लिए आधुनिक डिगरियों से लैस कई वैज्ञानिक प्रयासरत हैं । पशु आयुर्वेद, सारंगधर कृत उपवन विनोद और वराह मिरीह की वृहत्त्त संहिता में सुझाए गए चमत्कारी नुस्खों पर भी यहां काम चल रहा है ।
खेती-किसानी के ऐसे ही कई हैरत अंगेज नुस्खे भारत के गांव-गांव में पुराने, बेकार या महज भावनात्मक साहित्य के रूप में बेकार पड़े हुए हैं । ये हमारे समृद्ध हरित अतीत का प्रमाण तो हैं ही, प्रासंगिक और कारगर भी हैं । अब यह बात सारी दुनिया मान रही है कि प्राचीन भारतीय ज्ञान के इस्तेमाल से कृषि की लागत घटाई जा सकती है । यह खेती का सुरक्षित तरीका भी है, साथ ही इससे उत्पादन भी बढ़ेगा ।

पंकज चतुर्वेदी
यूजी-1, 3/186 ए राजेन्द्र नगर
सेक्टर-2
साहिबाबाद
गाजियाबाद 201005
9891928376, 0120-4241060

शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

Kashmir should not be out of "kashmir"

कश्मीर को रहने दो कश्मीर तक


                                                                                                                        = पंकज चतुर्वेदी
इन दिनों जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय मामले ने भी जाने-अनजाने में अलगाववादियों के इरादों को ही पंख दिए। जेएनयू में बामुश्किल 20 लोगों के एक संगठन ने देशद्रोही नारे लगाए। इसमें कोई शक नहीं कि उनके खिलाफ वाजिब कार्यवाही भी होनी थी, लेकिन उत्साही लालों ने इसे पूरी यूनिवर्सिटी को ही कठघरे में खड़ा करने का अवसर बना लिया, इसे विपरीत राजनीतिक विचारधारा पर आरोप लगाने का जरिया बनाया और इसी का परिणाम है कि कश्मीर को आत्मनिर्णय का मसला विदेशी मीडिया में उछलने लगा...


अभी तीन-चार साल पहले तक कश्मीर का मसला केवल अलगाववाद का विषय था। गुजरात या देश के किसी दीगर हिस्से में दंगों में यदि मुसलमान मारा जाता था तो कश्मीरी उसकी परवाह नहीं करते थे। यहां तक कि गुजरात दंगों के बाद श्रीनगर की जामा मस्जिद में जुमे की नमाज के बाद गुजरात में हलाक मुसलमानों की आत्मा की शांति के लिए दुआ करने से भी इसलिए मना कर दिया गया था कि जब कश्मीर में कई हजार मुसलमान मर गए तो शेष हिंदुस्तान की किस मस्जिद में दुआ हुई। सनद रहे कि इस मस्जिद के इमाम पाकिस्तान समर्थक अलगाववादी गुट के अगुवा नेता हैं। ठीक उसी तरह हिंदुस्तान के किसी भी हिस्से में कश्मीर की समस्या को मुसलमान की समस्या समझ कर कभी प्रतिक्रिया नहीं हुई। अफजल गुरु की फांसी के बाद दिल्ली, अलीगढ़ से लेकर दूर-दूर तक कुछ प्रतिक्रियाएं हुई थीं, लेकिन समय के साथ वे स्वर उभरे नहीं। मगर आज कुछ लोगों की बद्तमीजी को देश के एक श्रेष्ठ यूनिवर्सिटी की हरकत बनाकर प्रचार करने से एक बात तो साफ है कि पाकिस्तान अपनी उस चाल में कामयाब हो गया, जिसके तहत कश्मीर को दो संप्रदाय का विवाद दिखा कर प्रचारित करना चाहता था। साथ ही वहां के अलगाववाद को इसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर केंद्र में ला दिया। देश को आजादी के साथ ही विरासत में मिली समस्याओं में कश्मीर सबसे दुखती रग है। समय के साथ मर्ज बढ़ता जा रहा है, कई लोग ‘अतीत-विलाप’ कर समस्या के लिए नेहरू या कांग्रेस को दोषी बताते हैं तो देश में ‘एक ही धर्म, एक ही भाषा या एक ही संस्कृति’ के समर्थक कश्मीर को मुसलमानों द्वारा उपजाई समस्या व इसका मूल कारण धारा-370 को निरूपित करते हैं। ऐसा नहीं है कि 1990 के बाद पाकिस्तान-परस्त संगठनों ने कश्मीर के बाहर निर्दोष लोगों की हत्या नहीं की हो, लेकिन पांच-सात साल पहले तक इस देशद्रोही काम में केवल पाकिस्तानी ही शामिल होते थे। जब दुनिया में अलकायदा नेटवर्क तैयार हो रहा था, तभी कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश में इंडियन मुजाहिदीन और उससे पहले सिमी के नाम पर स्थानीय मुसलमानों को गुमराह किया जा रहा था। जब सरकार चेती तब तक कश्मीर के नाम पर बनारस, जयपुर तक में बम फट चुके थे। इन दिनों जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय मामले ने भी जाने-अनजाने में अलगाववादियों के इरादों को ही पंख दिए। सनद रहे श्रीनगर में लगभग हर जुमे को
पाकिस्तान जिंदाबाद या आजादी के नारे लगते हैं, पाकिस्तान के झंडे भी फहराए जाते हैं, लेकिन यह सब महज पुराने श्रीनगर के एक छोटे से इलाके तक सीमित रहता था। जेएनयू में बामुश्किल 20 लोगों के एक संगठन ने देशद्रोही नारे लगाए। इसमें कोई शक नहीं कि उनके खिलाफ वाजिब कार्यवाही भी होनी थी, लेकिन उत्साही लालों ने इसे पूरी यूनिवर्सिटी को ही कठघरे में खड़ा करने का अवसर बना लिया, इसे विपरीत राजनीतिक विचारधारा पर आरोप लगाने का जरिया बनाया और इसी का परिणाम हैं कि कश्मीर को आत्मनिर्णय का मसला विदेशी मीडिया में उछलने लगा। हालांकि अब साफ हो चुका है कि यह बात तथ्यों से परे है कि मुस्लिम बहुल इस क्षेत्र में धारा-370 के कारण ही अलगवादवाद पनप रहा है और इसे तुष्टिकरण नीति के कारण अनदेखा किया जाता है। इस अवधारणा का आधार ही झूठ पर टिका हुआ है। यहां जान लेना जरूरी है कि कश्मीर समस्या का हिंदू-मुस्लिम समस्या से कोई लेना-देना नहीं रहा है। धारा 370 के तहत, कोई भी गैर कश्मीरी, भले ही वह किसी भी जाति-धर्म का हो, जम्मू-कश्मीर राज्य में जमीन नहीं खरीद सकता है। वैसे इस राज्य में मुसलमानों के लगभग बराबर की हिंदुओं, सिखों और बौद्धों की भी जमीनें हैं, लेकिन वे सभी इसी राज्य के मूल निवासी हैं। और हां, यह विशेष स्थिति अकेले कश्मीर के लिए तो है नहीं! अनुच्छेद 371 के तहत किसी गैर हिमाचली को हिमाचल प्रदेश में जमीन खरीदने पर पाबंदी है। महाराष्ट्र में कृषि भूमि वही खरीद सकता है, जो किसान हो। गुजरात, मेघालय, नागालैंड, आसाम, मणिपुर, सिक्किम, आंध्र प्रदेश, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश के साथ-साथ देश के कई आदिवासी बाहुल्य इलाकों में बाहरी लोगों द्वारा जमीन खरीदने पर पाबंदी है। याद करें, पंजाब में तो कोई धारा 370 नहीं है, इसके बावजूद वहां कोई डेढ़ दशक तक आतंकवाद रहा। हिमालय के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में कोई दो लाख बाइस हजार किलोमीटर में फैले जम्मू-कश्मीर राज्य की कश्मीर घाटी में चिनार जंगलों से अलगाववाद के सुर्ख फूल पनपते रहे हैं। 14वीं शताब्दी तक यहां बौद्ध और हिंदू शासक रहे। सन 632 में पैगंबर मुहम्मद के देहावसान के बाद मध्य एशिया में इस्लाम फैला, तभी से मुस्लिम व्यापारी कश्मीर में आने लगे थे। 13वीं सदी में लोहार वंश के अंतिम शासक सुहदेव ने मुस्लिम सूफी-संतों को अपने राज्य कश्मीर में प्रश्रय दिया। बुलबुलशाह ने पहली मस्जिद बनवाई। फकीरों, सूफीवाद से प्रभावित होकर कश्मीर में बड़ी आबादी ने इस्लाम अपनाया, लेकिन वह कट्टरपंथी कतई नहीं थे। इलाके के सभी प्रमुख मंदिरों में पुजारी व संरक्षक मुसलमान ही रहे हैं। 19वीं सदी के प्रारंभ में यहां सिखों का शासन रहा और फिर आजादी तक डोगरा शासक मुस्लिम बहुल वाले कश्मीर में लोकप्रिय शासक रहे। कश्मीर में कट्टरपंथी तत्व सन् 1942 में उभरे, जब पीर सईउद्दीन ने जम्मू-कश्मीर में जमात-ए-इस्लाम का गठन किया। इस पार्टी की धारा-3 में स्पष्ट था कि वह पारंपरिक मिश्रित संस्कृति को नष्ट कर इस्लामी संस्कृति की नींव डालना चाहता था। सन् 1947 में अनमने मन से द्विराष्ट्र के सिद्धांत को स्वीकारते हुए भारत आजाद हुआ। उस समय देश की 562 देसी रियासतें थीं। हैदराबाद और कश्मीर को छोड़कर अधिकांश रियासतों का भारत में विलय सहजता से हो गया। यह प्रामाणिक तथ्य है कि लार्ड माउंटबैटन ने कश्मीर के राजा हरीसिंह को पाकिस्तान में मिलने के लिए दबाव डाला था। राजा हरीसिंह इसके लिए तैयार नहीं थे। 22 अक्टूबर, 1949 को अफगान और बलूच कबाइलियों ने पाकिस्तान के सहयोग से कश्मीर पर हमला कर दिया। भारत ने विलय की शर्त पर कश्मीर के राजा को सहयोग दिया। भारतीय फौजों ने कबाइलियों को बाहर खदेड़ दिया। इस प्रकार 1948 में कश्मीर का भारत में विलय हुआ। भारत और पाकिस्तान का निर्माण ही एक दूसरे के प्रति नफरत से हुआ है। अत: तभी से दोनों देशों की अंतरराष्ट्रीय सीमा के निर्धारण के नाम पर कश्मीर को सुलगाया जाता रहा है। उसी समय कश्मीर को बाहरी पूंजीपतियों से बचाने के लिए कश्मीर को विशेष दर्जा धारा 370 के अंतर्गत दिया गया। तब से धारा 370 (केवल कश्मीर में) का विरोध एक सियासती पार्टी के लिए ईंधन का काम करता रहा है। आतंकवाद एक अंतरराष्ट्रीय त्रासदी है। कश्मीर में सक्रिय कतिपय अलगाववादी ऐसी ही अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सदस्य हैं। उनका कश्मीर में इस्लाम से उतना ही सरोकार है, जितना धारा 370 की सियासत करने वालों का हिंदुत्व से। समाज का एक वर्ग समझता है कि कश्मीर में गोली और लाठी के भय से राष्ट्रद्रोही तत्वों को कुचलना ही मौजूदा समस्या का निदान है। वह यह कुप्रचार करता है कि केवल धार्मिक कट्टरता ही वहां भारत विरोधी जन-उन्मेष का मुख्य कारण है। हालात चाहे जितने भी बद्तर रहे हों, लेकिन समस्या को भारत के लोग एक राजनीतिक या पाकिस्तान-प्रोत्साहित समस्या ही समझते रहे हैं। संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरू की फांसी पर जब सुप्रीम कोर्ट ने अपनी मुहर लगाई थी, तभी से एक बड़ा वर्ग, जिसमें कुछ कानून के जानकार भी शामिल थे, दो बातों के लिए माहौल बनाते रहे थे- एक अफजल को फांसी जरूर हो, हां वे कभी भी उसे बचाना नहीं चाहते थे। दूसरा उसके बाद, फांसी की प्रक्रिया में कभी कानून का पालन न करने तो कभी कश्मीर की अशांति की दुहाई दे कर मामले को देशव्यापी बनाया जाए। याद करें अभी दो साल पहले ही अमेरिका की अदालत ने एक ऐसे पाकिस्तान मूल के अमेरिकी नागरिक को सजा सुनाई थी, जो अमेरिका में कश्मीर के नाम पर लॉबिग करने के लिए फंडिंग करता था और उसके नेटवर्क में कई भारतीय भी शामिल थे। जान कर आश्चर्य होगा कि उनमें कई एक हिंदू हैं। प्रशांत भूषण का बयान लोग भूले नहीं हैं, जिसमें उन्हें कश्मीर में रायशुमारी के आधार पर भारत से अलग होने का समर्थन किया था। जब अफजल गुरु को कानूनी मदद की जरूरत थी, तब उसके लिए सहानुभूति दिखाने वाले किताब लिख रहे थे, अखबारों में प्रचार कर रहे थे और जिन एनजीओ से संबद्ध हैं, उसके लिए फंड जमा कर रहे थे। जबकि उन्हें मालूम था कि अफजल की कानूनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक लड़ी जा सकती थी, न कि अखबारी लेख से। पाकिस्तान परस्त कतिपय संगठनों ने इंडियन मुजाहिदीन जैसे संगठनों में लड़कों को जुटाकर जो अभियान शुरू किया था, उसका अगला पड़ाव था अफजल की फंासी के बाद दिल्ली, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, लखनऊ व कई अन्य जगहों पर केपीटल पनिशमेंट की खिलाफत के नाम पर इसे मानवाधिकार का मसला बनाए रखना। विडंबना है कि ऐसे शिगूफे वे छोड़ रहे हैं, जो लाल झंडे लेकर सर्वहारा वर्ग की बात करते हैं। यदि सत्र न्यायालय से ले कर सुप्रीम कोर्ट तक सात न्यायाधीशों ने पूरे मामले को देखा, सुना है फिर गृह मंत्रालय और उसके बाद राष्ट्रपति ने उसका आकलन किया और उसमें पाया कि अफजल गुरु अपराधी है और वह सजा का हकदार है, ऐसे में केवल सड़क पर नारे उछालने का औचित्य समझ नहीं आता है। लेकिन जेएनयू या जाधवपुर में हुई हरकतों की प्रतिक्रिया में अलगाववादियों को अलग-थलग कर कार्यवाही करना कारगर होगा। यदि किसी बड़े समूह, राजनीतिक दल या संस्थान के सभी लोगों के साथ उन्हें जोड़ कर महज राजनीतिक माइलेज लेने का प्रयास होगा तो यह अलगाववादियों के हाथ मजबूत करने का ही कदम होगा।
श्चष्७००१०१०ञ्चद्दद्वड्डद्बद्य.ष्शद्व

सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

Jail reform can enhance human resourse

जेल बनें इंसानों के रहने लायक

पंकज चतुर्वेदी
शामली, उ.प्र के इकबाल को लखनउ पुलिस ने सन 2007 में आतंकवाद, हत्या के प्रयास सहित आधा दर्जन मामलों में आतंकवादी बता कर जेल भेज दिया था। वह आठ साल जेल में रहा और इसी सप्ताह बाइज्ज्त बरी हो गया। अदालत ने पाया के उस पर लगे सभी आरोप फर्जी व गढ़े हुए थे। अब पता नहीं कि उसकी रिहाई में ‘‘बाइज्ज्त’’ के क्या मायने हैं लेकिन इस काल में उसका जीवन जरूर बदल गया। बाहर आ कर समाज व पुलिस दोनों उसे संदिग्ध नजर से देख रहे हैं, उसे काम पर रखने वाले तैयार नहीं हैं। वही आठ साल जेल में विचाराधीन कैदी के तौर पर हर दिन के तनावों के चलते उसका षारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य भी गड़बड़ा गया है। कहा नहीं जा सकता है कि इस कुंठा व बेज्जती से कब उबर पाएगा।  अब तो सुप्रीे कोर्ट ने भी कह दिया कि  जेल में विचराधीन कैदियों की हालत बहुत बुरी है और  द्वामता से कई सौ गुना ज्यादा भीड़ से भरे जेल इंसन के आत्म सम्मान के मूलभूत अधिकार पर प्रष्न चिन्ह है।। हालांकि यह भी कटु सत्य है कि सुप्रीम कोर्ट के लगातार निर्देषों के बावजूद भी निचली अदालतें जमानत योग्य अपराधों में भी लेागों को जल भेज देती है और पुलिस भी अपने हथकंडे अपना कर जेलों को नरक बना रही है। यहां जानना जरूरी है कि जेल व्यवस्था में सुधार के लिए समुचित व्यवस्था हेतु बीते 35 सालों से सुप्रीम कोर्ट में कई-कई मामले चल रहे हैं व कई में कोर्ट ने निर्देष भी दिए हैं ,लेकिन लचल न्यायिक व्यवस्था के चलते बेगुनाह सालों-साल जेल में रहते हैं व बाहर आते हैं तो उनका तन व मन श्रम करने लायक नहीं रह जाता है।
raj express 15-3-17
दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेष के मेरठ मंडल की जेलों कें ताजे आंकड़े जरा देखें- मेरठ जेल की क्षमता 1707, निरूद्ध बंदी 3357, गाजियाबाद की क्षमता  1704 व बंदी 3631, बुलंदषहर में बंद हैं 2300, जबकि क्षमता है 840। भारत की जेलों में बंद कैदियों के बारे में  सरकार के रिकार्ड में दर्ज आंकड़े बेहद चैंकाने वाले हैं।  अनुमान है कि इस समय कोई चार लाख से ज्यादा लोग देषभर की जेलों में निरूद्ध हैं जिनमें से लगभग एक लाख तीस हजार सजायाफ्ता और कोई दो लाख 80 हजार विचाराधीन बंदी हैं। देष में दलित, आदिवासी व मुसलमानों की कुल आबादी 40 फीसदी के आसपास है, वहीं जेल में उनकी संख्या आधे से अधिक यानि 67 प्रतिषत है। इस तरह के बंदियों की संख्या तमिलनाडु और गुजरात में सबसे ज्यादा है। हमारी दलित आबादी 17 प्रतिषत है जबकि जेल में बंद  लेागों का 22 फीसदी दलितों का है। आदिवासी लगातार सिमटते जा रहे हैं व ताजा जनगणना उनकी जनभागीदारी नौ प्रतिषत बताती है, लेकिन जेल में नारकीय जीवन जी रहे लोगों का 11 फीसदी वनपुत्रों का है। मुस्लिम आबादी तो 14 प्रतिषत है लेकिन जेल में उनकी मौजूदगी 20 प्रतिषत से ज्यादा है। एक और चैंकाने वाला आंकड़ा है कि पूरे देष में प्रतिबंधात्मक कार्यवाहियों जैसे- धारा 107,116,151 या अन्य कानूनों के तहत बंदी बनाए गए लेागें में से आधे मुसलमान होते है। गौरतलब है कि इस तरह के मामले दर्ज करने के लिए पुलिस को वाह वाही मिलती है कि उसने अपराध होने से पहले ही कार्यवाही कर दी। आंचलिक क्षेत्रों में ऐसे मामले न्यायालय नहीं जाते हैं, इनकी सुनवाई कार्यपालन दंडाधिकारी यानि नायब तहसीलदार से ले कर एसडीएम तक करता है और उनकी जमानत पूरी तरह सुनवाई कर रहे अफसरों की निजी इच्छा पर निर्भर होती है।
पिछले साल बस्तर अंचल की चार जेलों में निरूद्ध बंदियों के बारे में ‘सूचना के अधिकार’ के तरह मांगी गई जानकारी पर जरा नजर डालें - दंतेवाड़ा जेल की क्षमता 150 बंदियों की है और यहां माओवादी आतंकी होने के आरोपों के साथ 377 बंदी है जो सभी आदिवासी हैं। कुल 629 क्षमता की जगदलपुर जेल में नक्सली होने के आरोप में 546 लोग बंद हैं , इनमें से 512 आदिवासी हैं। इनमें महिलाएं 53 हैं, नौ लोग पांच साल से ज्यादा से बंदी हैं और आठ लोगों को बीते एक साल में कोई भी अदालत में पेषी नहीं हुई। कांकेर में 144 लोग आतंकवादी होने के आरोप में विचाराधीन बंदी हैं इनमें से 134 आदिवासी व छह औरते हैं इसकी कुल बंदी क्षमता 85 है। दुर्ग जेल में 396 बंदी रखे जा सकते हैं और यहां चार औरतों सहित 57 ‘‘नक्सली’’ बंदी हैं, इनमें से 51 आदिवासी हैं। सामने है कि केवल चार जेलों में हजार से ज्यादा आदिवासियों को बंद किया गया है। यदि पूरे राज्य में यह गणना करें तो पांच हजार से पार पहुंचेगी। नारायणपुर के एक वकील बताते हैं कि कई बार तो आदिवासियों को सालों पता नहीं होता कि उनके घर के मर्द कहां गायब हो गए है।। बस्तर के आदिवासियों के पास नगदी होता नहीं है। वे पैरवी करने वाले वकील को गाय या वनोपज देते हैं।  कई मामले तो ऐसे है कि घर वालों ने जिसे मरा मान लिया, वह बगैर आरोप के कई सालों से जेल में था। ठीक यही हाल झारखंड के भी हैं।
 यहां यह भी जानना जरूरी है कि जेल में श्रम कार्य केवल सजायाफ्ता बंदियो के लिए होता है। विचाराधीन बंदी न्यायिक अभिरक्षा में कहलाते हैं। भारतीय जेलों में 65 प्रतिषत से ज्यादा विचारधीन कैछी ही हैं। जेलों में बढ़ती भीड़, अदालतों पर भी बोझ हैं और हमारे देष की असल ताकत‘‘मानव संसाधन’’ का दुरूपयोग भी। एक तो ऐसे कैदियों के कारण सरकार का खर्च बढ़ रहा है दूसरा सुरक्षा एजेंसियों पर भी भार बढ़ता है। जितने अधिक विचाराधीन बंदी हांेगे, उन्हें अदालत ले जाने के लिए उतना ही अधिक सुरक्षा बल चाहिए। तभी देष में हर दिन सैंकड़ो मामलों में बंदी अदालत नहीं नहीं पहुंच पाते हैं और यह भी अदालतों में मामलों के लंबे खींचने की वजह बनता है। क्या यह संभव नहीं है कि जिन मामलों में जांच पूरी हो गई हो या फिर मामले ज्यादा गंभीर ना हों, उनपके बंदियों को किसी रचनात्मक कार्य में उनकी योग्यता के अनुसार लगा दिया जाए। इस तरह षिक्षक, तकनीकी इंस्ट्रक्टर, यातायात संचालन सहयोगी, अस्पताल में सहायक जैसे कई कामों के लिए  कर्मियों की कमी से  निबटा जा सकता है। साथ ही बंदी के मानव संसाधन के सही इस्तेमाल, उसके सम्मनपूर्वक जीवन के अदालती निर्देषों का भी पालन किया जा सकता है। ऐसे बंदियों को घर मं रहने की छूट कुछ बंदिषों के साथ दी जा सकती है।
हालांकि प्रयास तो यह होना चाहिए कि अपराध कम हों या गैरनियत से किए गए छोटे-मोटे अपराधों के लिए या कम सजा या सामान्य प्रकरणों को अदालत से बाहर निबटाने, पंचायती राज में न्याय को षामिल करने जैसे सुधार कानून में किए जाएं।

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