तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

सोमवार, 28 मार्च 2016

Whne illegal bangaladeshi will go back

               

कब कम होगी देश की दस करोड आबादी ?
पंकज चतुर्वेदी

इन दिनों असम व पश्‍चिम बंगाल दो ऐसे राज्यों में चुनाव हैं जहां की सामाजिक संरचना को अवैध प्रवासी बांग्‍लादेशियों ने बुरी तरह छिन्न-भिन्न कर दिया है। कुछ राजनीतिक दलों ने इसे अपने एजेंडे में प्राथमिकता से भी रखा है। पिछले साल बांग्लादेष व भारत की कई कालेानियों की अदला बदली के बाद हालांकि उन रास्तों से अवैध घुसपैठ की संभावना क्षीण हुई है, लेकिन असली चुनौती तो इस देा में घुल-मिल गए बगैर बुलाए मेहमानों को पहचानने व उन्हें वापिस करने की है। उनकी भाषा, रहन-सहन और नकली दस्तावेज इस कदर हमारी जमीन से घुलमिल गए हैं कि उन्हें विदेशी सिद्ध करना लगभग नामुमकिन हो चुका है। ये लोग आते तो दीन हीन याचक बन कर हैं, फिर अपने देष को लौटने को राजी नहीं होते हैं । ऐसे लोगो को बाहर खदेड़ने के लिए जब कोई बात हुई, सियासत व वोटों की छीना-झपटी में उलझ कर रह गई । गौरतलब है कि पूर्वोत्तर राज्यों में अषांति के मूल में ये अवैध बांग्लादेषी ही हैं। आज जनसंख्या विस्फोट से देष की व्यवस्था लडखड़ा गई है । मूल नागरिकों के सामने भोजन, निवास, सफाई, रोजगार, षिक्षा, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव दिनों -दिन गंभीर  होता जा रहा है । ऐसे में  अवैध बांग्लादेषी कानून को धता बता कर भारतीयों के हक नाजायज तौर पर बांट रहे हैं । ये लोग यहां के बाषिंदों की रोटी तो छीन ही रहे हैं, देष के सामाजिक व आर्थिक समीकरण भी इनके कारण गड़बड़ा रहे हैं  ।
पिछले साल मेघालय हाई कोर्ट ने भी स्पश्ट कर दिया है कि सन 1971 के बाद आए सभी बांग्लादेषी अवैध रूप से यहां रह रहे है। अनुमान है कि आज कोई दस करोड़ के करीब बांग्लादेषी हमारे देष में जबरिया रह रहे हैं। 1971 की लड़ाई के समय लगभग 70 लाख बांग्लादेषी(उस समय का पूर्वी पाकिस्तान) इधर आए थे । अलग देष बनने के बाद कुछ लाख लौटे भी । पर उसके बाद भुखमरी, बेरोजगारी के षिकार बांग्लादेषियों का हमारे यहां घुस आना अनवरत जारी रहा । पष्चिम बंगाल, असम, बिहार, त्रिपुरा  के सीमावर्ती  जिलों की आबादी हर साल बैतहाषा बढ़ रही है । नादिया जिला (प बंगाल) की आबादी 1981 में 29 लाख थी । 1986 में यह 45 लाख, 1995 में 60 लाख और आज 65 लाख को पार कर चुकी है । बिहार में पूर्णिया, किषनगंज, कटिहार, सहरसा आदि जिलों की जनसंख्या में अचानक वृद्धि का कारण वहां बांग्लादेषियों की अचानक आमद ही है ।
अरूणाचल प्रदेष में मुस्लिम आबादी में बढ़ौतरी सालाना 135.01 प्रतिषत है, जबकि यहां की औसत वृद्धि 38.63 है । इसी तरह पष्चिम बंगाल की जनसंख्या बढ़ौतरी की दर औसतन 24 फीसदी के आसपास है, लेकिन मुस्लिम आबादी का विस्तार 37 प्रतिषत से अधिक है । यही हाल मणिपुर व त्रिपुरा का भी है । जाहिर है कि इसका मूल कारण बांग्लादेषियों का निर्बाध रूप से आना, यहां बसना और निवासी होने के कागजात हांसिल करना है । कोलकता में तो अवैध बांग्लादेषी बड़े स्मगलर और बदमाष बन कर व्यवस्था के सामने चुनौति बने हुए हैं ।
राजधानी दिल्ली में सीमापुरी हो या यमुना पुष्ते की कई किलोमीटर में फेैली हुई झुग्गियां, लाखेंा बांग्लादेषी डटे हुए हैं । ये भाशा, खनपान, वेषभूशा के कारण स्थानीय बंगालियों से घुलमिल जाते हैं । इनकी बड़ी संख्या इलाके में गंदगी, बिजली, पानी की चोरी ही नहीं, बल्कि डकैती, चोरी, जासूसी व हथियारों की तस्करी बैखौफ करते हैं । सीमावर्ती नोएडा व गाजियाबाद में भी इनका आतंक है । इन्हें खदेड़ने के कई अभियान चले । कुछ सौ लोग गाहे-बगाहे सीमा से दूसरी ओर ढकेले भी गए । लेकिन बांग्लादेष अपने ही लोगों को अपनाता नहीं है । फिर वे बगैर किसी दिक्कत के कुछ ही दिन बाद यहां लौट आते हैं । जान कर अचरज होगा कि बांग्लादेषी बदमाषों का नेटवर्क इतना सषक्त है कि वे चोरी के माल को हवाला के जरिए उस पार भेज देते हैं । दिल्ली व करीबी नगरों में इनकी आबादी 10 लाख से अधिक हैं । सभी नाजायज बाषिंदों के आका सभी सियासती पार्टियों में हैं । इसी लिए इन्हें खदेड़ने के हर बार के अभियानों की हफ्ते-दो हफ्ते में हवा निकल जाती है ।
सरकारी आंकड़ा है कि सन 2000 से 2009 के बीच कोई एक करोड़ 29 लाख बांग्लादेषी बाकायदा पासपोर्ट-वीजा ले कर भारत आए व वापिस नहीं गए। असम तो अवैध बांग्लादेषियों की  पसंदीदा जगह है। सन 1985 से अभी तक महज 3000 अवैध आप्रवासियों को ही वापिस भेजा जा सका है।  राज्य की अदालतों में अवैध निवासियों की पहचान और उन्हें वापिस भेजने के कोई 40 हजार मामले लंबित हैं। अवैध रूप से घुसने व रहने वाले स्थानीय लोगों में षादी करके यहां अपना समाज बना-बढ़ा रहे हैं।
दिनों -दिन गंभीर हो रही इस समस्या से निबटने के लिए सरकार तत्काल ही कोई अलग से महकमा बना ले तो बेहतर होगा, जिसमें प्रषासन, पुलिस के अलावा मानवाधिकार व स्वयंसेवी संस्थाओं के लेाग भी हों ं। साथ ही सीमा को चोरी -छिपे पार करने के रैक्ेट को तोड़ना होगा । वैसे तो हमारी सीमाएं बहुत बड़ी हैं, लेकिन यह अब किसी से छिपा नहीं हैं कि बांग्लादेष व पाकिस्तान सीमा पर मानव तस्करी का बाकायदा धंधा चल रहा है, जो कि सरकारी कारिंदों की मिलीभगत के बगैर संभव ही नहीं हैं ।
यहां बसे विदेषियों की पहचान और फिर उन्हें वापिस भेजना एक जटिल प्रक्रिया है । बांग्ला देष अपने लोगों की वापिसी सहजता से नहीं करेगा । इस मामले में सियासती पार्टियों का संयम भी महति है । यदि सरकार में बैठे लोग ईमानदारी से इस दिषा में पहल करते है तो एक झटके में देष की आबदी को कम कर यहां के संसाधनों, श्रम और संस्कारों पर अपने देष के लोगों का हिस्सा बढाया जा सकता है।

पंकज चतुर्वेदी
नेषनल बुक ट्रस्ट
5 वसंत कुंज इंस्टीट्यूशनल एरिया फेज-2 नई दिल्ली 110070





Advocay of water, land and forest : Sanjay Kashyap

जल, जंगल और जमीन का जुनून: संजय कश्यप



वैसे तो वे एक वकील हैं, एक राजनीतिक दल के समर्पित कार्यकर्ता भी हैं, लेकिन उनके दिल और दिमाग में हर समय जो मचलता रहता है, वह है अपनी धरती को आधुनिकता से उपजे प्रदूषण से मुक्त करना। वे हिण्डन नदी बचाने के आन्दोलन में भी उतने ही सक्रिय रहते हैं जितना कि गौरेया संरक्षण में और उतना ही पाॅलीथीन प्रयोग पर पाबन्दी को लेकर। दिल्ली से सटे गाजियाबाद जिले में उनकी पहल पर कई ऐसे काम हो गये जो यहाँ के लाखों बाशिंदों को स्वच्छ हवा-पानी मुहैया करवाने में अनुकरणीय पहल हैं। संजय कश्यप ने एमबीए कर एक कम्पनी में प्रबंधन की नौकरी की और वह भी कश्मीर घाटी में वहाँ वे बाँध व जल प्रबंधन को नजदीक से देखते तो रहे, लेकिन कभी पर्यावरण संरक्षण जैसी कोई भावना दिल में नहीं उपजी।

अचानक पिता का स्‍वास्‍थ्‍य गडबड हुआ तो मजबूरी हुई कि अपने घर गाजियाबाद में ही रहना होगा। यहाँ जब वकालत शुरू की तो अचानक उन्हें बचपन के वे दिन याद आ गये जब शहर के तालाब पर रामलीला के खुद दृश्य मंचित किये जाते थे। लेकिन तब वह रमतेराम तालाब पूरी तरह राम को प्यारा हो चुका था। नगर निगम ने तो मरा घोषित कर उसे भरकर वहाँ एक बड़ा व्यावसायिक परिसर बनाने की ठान ली। संजय अभी भी तालाब के पर्यावरणीय महत्त्व के प्रति उतने भिज्ञ नहीं थे लेकिन वे उस परम्परा को जीवन्त रखना चाहते थे। छह महीने सड़कों पर अदालत में लड़ाई लड़ी गई, शहर के लोगों को भी पहली बार लगा कि तालाब हमारे लिये कितने जरूरी हैं। नगर निगम को अपना फैसला वापिस लेना पड़ा और पहली लड़ाई में ही जीत से कश्यप के हौसले बुलंद हो गये।

इस संघर्ष के दौरान संजय कश्यप राजेन्द्र सिंह, मेधा पाटकर, अनुपम मिश्र आदि के सम्पर्क में आये और उनकी पर्यावरण के प्रति सोच विकसित हुई। फिर ‘अरण्या’ संस्था का गठन, आगरा में यमुना के पानी पर सर्वे जैसे प्रयोग के सुखद परिणाम आने लगे। बरेली में जैविक कृषि को प्रोत्साहित करने के लिये एक केन्द्र खोला व उससे भी सकारात्मक किरणें आई। इस तरह एक अधिवक्ता के जीवन का अभिन्न अंग बन गया- पर्यावरण संरक्षण। उनकी सोच है कि पर्यावरण संरक्षण में एक सशक्त नागरिक हस्तक्षेप होना चाहिये और इसका प्रयोग उनकी संस्‍था ''अरण्‍या'' ने नब्बे के दशक में बरेली के तीन तालाबों के संरक्षण के अपने प्रयोग में किया। बगैर सरकारी मदद के जन संसाधनों से तीन तालाबों की गंदगी साफ कर जब जनता को लगा कि उन्होंने कुछ सकारात्मक किया है तो कश्यप ने पर्यावरण संरक्षण में जन भागीदारी के अपनी मुहीम को आगे बढ़ाया। गाजियाबाद के पक्का तालाब सहित कई मुद्दों पर उन्होंने सीएनएन आईबीएन के लिये सिटिजन्स जर्नलिस्ट बनकर शानदार रपट बनाईं।

सन 2004 में कश्यप ने अपने 150 मित्रों को इस बात के लिये तैयार किया कि 15 दिन में एक दिन बगैर पेट्रोल का दिन मनाएँगे व तब से आज तक यह कारवाँ बढ़ रहा है व कई हजार लोग महीने में कई दिन साईकिल पर चलते हैं। इसी दौर में 20 स्कूलों सहित कई भवनों में वाटर हार्वेस्टिंग के प्रयोग हुये। सन 2006 से 2009 के बीच गाजियाबाद नगर निगम से उनकी टीम ने कुछ जेसीबी मशीन लीं व जिले के 22 तालाबों की सफाई कर डाली। बाद में गाजियाबाद विकास प्राधिकरण के सर्वे में यह स्वीकार किया गया कि तालाबों से गाद निकालने के बाद उन इलाकों का भूजल स्तर अप्रत्याशित रूप से ऊँचा हुआ। हिण्डन नदी की स्वच्छता के लिये कश्यप के आंदोलन, सेमिनार आयोजन व जन जागरूकता अभियान के परिणाम भी अब सामने आने लगे हैं।

‘‘आप एक वकील हैं, गृहस्थ भी हैं और राजनीतिक कार्यकर्ता भी, एक ही दिन में ये तीनों काम कैसे कर पाते हैं?’’ इसके जवाब में कश्यप कहते हैं, ‘‘मैंने पूरे दिन को सेक्टर में बाँट रखा है। सुबह का समय मेरा अपना होता है, ध्यान, पूजा, मनन का। दिन में 10.30 से 3.30 बजे तक कोर्ट। शाम चार से छह परिवार और छह से देर रात तक समाज से जुड़े मुद्दे।’’ वे कहते हैं कि पर्यावरण के लिये कानूनी या प्रशासनिक लड़ाई एक पूरा टीम वर्क है, वे अदालत में नियमों व दस्तावेजों के लिये काम करते हैं तो उनके कुछ साथी लिखा-पढ़ी व फॉलोअप का।

कश्यप इन दिनों हिण्डन में गंदा पानी रोकने, उसे एसटीपी से गुजार कर गंदे पानी का भी वैकल्पिक प्रयोग करने, स्लज को जैविक कृषि के लिये इस्तेमाल करने की योजना पर काम कर रहे हैं। इससे पहले हिण्डन में मूर्ति विसर्जन रोकने की उनकी माँग पर प्रशासन व समाज का रूख सकारात्मक रहा है और अब मूर्तियाँ अलग से अस्थाई तालाबों में विसर्जित की जा रही हैं। कश्यप देश में तालाब संवर्धन प्राधिकरण के गठन तथा खेतों में छोटे निजी तालाबों के खोदने व उनके संरक्षण के लिये सतत काम कर रहे हैं और इसके लिये लोकसभा की संसदीय समिति के समक्ष भी अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत कर चुके हैं।

देश के कोने-कोने में ऐसे ही कई जमीनी कार्यकर्ता बगैर किसी लोभ, लालच के धरती को बचाने के लिये सक्रिय हैं और असल में पर्यावरण संरक्षण का काम सरकारी योजनाओं के वनिस्पत ऐसे ही लोगों की कर्मठता से साकार हो रहा है।

शनिवार, 26 मार्च 2016

Police boots on scribes of Bastar



बस्तर में आईजी कल्लूरी की सरकार ! 6 महीने में 6 पत्रकार शिकार

छह महीने में छह पत्रकार हुये शिकार, अब प्रभात सिंह पर बर्बरता

पंकज चतुर्वेदी

कांकेर। उत्तर बस्तर का जिला मुख्यालय कांकेर। 20 मार्च को होली के पहले का आखिरी रविवार। आमतौर पर यह मौसम जनजातियों के मदमस्त हो कर गीत-संगीत में डूबने का, अपने दुख -दर्द भूल कर प्रकृति के साथ तल्लीन हो जाने का होता है, लेकिन पूरा बाजार उदास था, कुछ सहमा सा। ना मांदर बिक रहे थे ना रंग खरीदने वालों में उत्साह। करीबी जंगलों से आदिवासी ना के बराबर हाट में आए थे। यदि दक्षिण बस्तर यानि सबसे विषम हालात वाले इलाकों की बात करें तो वहां होली या तो सुरक्षाकर्मी मना रहे थे या फिर कुछ सरकारी योजनाओं के तहत पैसा पाने वाले सांस्कृतिक दल। कोई घर से बाहर झांकने को तैयार नहीं, पता नहीं किस तरफ से कोई आकर अपनी चपेट में ले ले। बस्तर अब एक ऐसा क्षेत्र बन चुका है जहां पुलिस कार्यवाही के प्रति प्रतिरोध जताने का अर्थ है, जेल की हवा। यह भी संभावना रहती है कि जेल से बाहर निकलो तो माओवादी अपना निशाना बना ले। पिछले छह महीनों में छह पत्रकार जेल में डाले जा चुके हैं, वह भी निमर्मता से। कुछ पत्रकारों को जबरिया इलाका छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा तो कुछ को धमकियां मिली।

यह जान लें कि बस्तर में पुलिस का हर कानून आईजी, शिवराम कल्लूरी की मर्जी ही है।

माथे पर भभूत का बड़ा सा तिलक लगाए कल्लूरी को रमन सिंह सरकार से छूट है कि वे किसी को भी उठाएं, बंद करें, पीटें, धमकी दें।
यहां एक बात गौर करने वाली है कि पिछले एक साल के दौरान कल्लूरी ने जितने कथित माओवादी मारे या आत्मसमर्पण करवाए, शायद उतने असली माओवादी जंगल में हैं भी नहीं। रही बची कसर पूरी कर दी है भारतीय जनता पार्टी से जुड़े लेागों द्वारा बनाए गए एक संगठन सामाजिक एकता मंच ने। मान लें कि यह संगठन सलवा जुडूम भाग दो ही है। इसके कार्यकर्ता शहरी इलाकों में लोगों को डरा-धमका रहे हैं।
गौर करें कि अभी पिछले चुनाव तक जब बस्तर की बारह विधान सभा सीटों पर भजपा का वर्चस्व रहता था तब ये नेता अपने घर बैठकर तमाशा देखते थे, लेकिन इस बार झीरम घाटी कांड में कई बड़े कांग्रेसी नेताओं के मारे जाने के बाद बस्तर में कांग्रेस का दबदबा बढ़ गया, तो ये नेता नक्सलियों के कथित विरोध में खड़े हो रहे हैं, इसके पीछे की सियासत को जरा गंभीरता से समझना होगा।
इसी संगठन की गुंडागर्दी के चलते लंबे समय से जगदलपुर में रह कर विभिन्न अंग्रेजी अखबारों के लिए काम कर रही मालिनी सुब्रहण्यम को बस्तर छोडकर कर जाना पड़ा। असल में मालिनी उस समय आंख की किरकिरी बन गई थीं जब उन्होंने बीजापुर जिले के बासागुउ़ा थाने के तहत तलाशी के नाम पर 12 आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार की खबर की थी। उसके बाद मालिनी के मकान मलिक को थाने में बैठा लिया गया, उनके घर काम करने वाले नौकरों को पूरे परिवार सहित उलटा लटका कर मारा गया। बाजार में कह दिया गया कि इनको कोई सामान ना बेचे। हार कर फरवरी में मालिनी को बस्तर छोड़ना पड़ा।
कहने की जरूरत नहीं कि इन शिकायतों का कोई अर्थ नहीं है।
ताजा मामला दंतेवाड़ा के पत्रकार प्रभात सिंह की गिरफ्तारी का है। वे पत्रिकाके लिए काम करते हैं और लंबे समय से जंगलों में सुरक्षा बलों द्वारा आदिवासियों पर अत्याचार तथा पुलिस की झूठी कहानियों का पर्दाफाश करते रहे। कुछ महीनों पहले पकड़े गए पत्रकार द्वय सोमारू नाग व संतोश यादव की रिहाई के लिए अभियान चला रहे प्रभात की किसी समय भी गिरफ्तारी होने की आशंका को लेकर लंबे समय से विभन्न अखबारों में खबरें छप रहीं थी। इस आशंका की शिकायत भी की गयी थी, लेकिन एक सप्ताह पहले प्रभात को घर से उठाया गया, फिर दो दिन बाद आईटी एक्ट में गिरफ्तारी दिखाई गई। मसला एक व्हाट्सएप संदेश का था जिसमें गाडकी जगह हिंदी में गलती से चंद्र बिंदु टाईप हो गया था। उसके बाद चार ऐसे ही बेसिर पैर के मामले लादे गए।
पुलिस अभिरक्षा में प्रभात को निर्ममता से पीटा गया, खाना नहीं दिया गया और कहा गया कि पुलिस का विरोध कर रहे थे अब उससे सहयोग की उम्मीद मत रखना।
प्रभात के मामले में मानवाधिकार आयोग ने भी राज्य शासन को नोटिस भेजा है, लेकिन यह किसी से छिपा नहीं है कि ये नोटिस व आयोग तहज हाथी के दांत होते हैं व राज्य शासन की रिपोर्ट को ही आधार मानते हैं।
यहां पत्रकार नेमीचंद जैन व साईं रेड्डी को याद करना भी जरूरी है। कुछ साल पहले देानेां को पुलिस ने माओवादी समर्थक बता कर जेल भेजा। अदालतों ने लचर मामलों के कारण उन्हें रिहा कर दिया, लेकिन बाद में माओवादियों ने उन्हें यह कहकर मार दिया कि वे पुलिस के मुखबिर थे। हालांकि पुलिस कहती है कि दोनों को माओवादियों ने मारा, लेकिन अंदर दबी-छिपी खबरें कुछ और भी कहती है।
बीबीसी के स्थानीय संवाददता आलोक पुतुल और दिल्ली से गए वात्सल्य राय से तो कल्लूरी ने जो कह कर मिलने से इंकार किया, वह बानगी है कि बस्तर में पत्रकारिता किस गंभीर दौर से गुजर रही है। कल्लूरी ने कहा
आपकी रिपोर्टिंग निहायत पूर्वाग्रह से ग्रस्त और पक्षपातपूर्ण है। आप जैसे पत्रकारों के साथ अपना समय बर्बाद करने का कोई अर्थ नहीं है। मीडिया का राष्ट्रवादी और देशभक्त तबका कट्टरता से मेरा समर्थन करता है, बेहतर होगा मैं उनके साथ अपना समय गुजारूं। धन्यवाद।
यह एक लिखित संदेश भेजा गया था। बस्तर के आईजी शिवराम प्रसाद कल्लुरी से कई बार संपर्क करने की कोशिशों के जवाब में उन्होंने पुतुल को यह मैसेज मोबाईल पर भेजा था। कुछ ही देर बाद लगभग इसी तरह का जवाब बस्तर के एसपी आरएन दास ने भेजा,
आलोक, मेरे पास राष्ट्रहित में करने के लिए बहुत से काम हैं। मेरे पास आप जैसे पत्रकारों के लिए कोई समय नहीं है, जो कि पक्षपातपूर्ण तरीके से रिपोर्टिंग करते हैं। मेरे लिए इंतजार न करें।
यही नहीं जब ये पत्रकार जंगल में ग्रामीणों से बात कर रहे थे, तभी उन्हें बताया गया कि कुछ हथियारबंद लोग आपको तलाश रहे हैं और अपनी सुरक्षा के लिए खुद जिम्मेदार होंगे।

बस्तर एक जंग का मैदान बन गया है।

इन दिनों माओवादियों के हाथों कई ग्रामीण मारे जा रहे हैं-मुखबिर होने के शक में, पुलिस ग्रामीणों को पीट रही है कि दादा लोगों को खाना ना दें। लोग पलायन कर रहे हैं। जेल में बंद निर्दोष लोगों की पैरवी करने वाले वकील नहीं मिल रहे हैं। जो कोई भी फर्जी कार्यवाहियों पर रिपोर्ट करे उनकी हालत प्रभात जैसी हो रही है। असल में यह लोकतंत्र के लिए खतरा है जहां प्रतिरोध या असहमति के स्वर को कुचलने के लिए तर्क का नहीं, वरन सुरक्षा बलों के बूटों का सहारा लिया जा रहा है।

Enviorenment , society and Government



राजनीतिः पर्यावरण, समाज और सरकार

महाराष्ट्र के लातूर में पानी की कमी से पलायन, झगड़े व सरकारी टैंकरों की लूट जैसी अराजकता मची है। वहीं होली पर पानी की फिजूलखर्ची न करने के सरकारी आदेश पर कुछ लोग परंपरा का सवाल उठा कर वितंडा खड़ा करते रहे। दिवाली पर आतिशबाजी की हदबंदी के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का किस कदर उल्लंघन होता है, छिपा नहीं है।


इन दिनों अमेरिका के कई राज्यों मे पतझड़ शुरू हो गया है। नियम है कि हर पेड़ से गिरने वाली प्रत्येक पत्ती और यहां तक कि सींक को भी उसी पेड़ को समर्पित किया जाता है। समाज के कुछ लोग पुराने पेड़ों के तनों की मर गई छाल को खरोंचते हैं और इसे भी पेड़ की जड़ों में दफना देते हैं। पेड़ों की पत्तियों को न जलाने और उन्हें जैविक खाद के रूप में संरक्षित करने के नियम व नारे तो हमारे यहां भी हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल महज किसी को नीचा दिखाने या सबक सिखाने के लिए होता है। हम अभी तक पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता का पाठ नहीं सीख पाए हैं। पर्यावरण रक्षा के नाम पर बस कानून की खानापूर्ति करते हैं, चाहे वह वाहनों का प्रदूषण परीक्षण हो या नदी-तालाब को सहेजने का अभियान।
पिछले साठ वर्षों में भारत में पानी के लिए कई भीषण संघर्ष हुए हैं, कभी दो राज्य नदी के जल बंटवारे पर भिड़ गए तो कहीं सार्वजनिक नल पर पानी भरने को लेकर हत्या हो गई। इन दिनों पंजाब, हरियाणा और दिल्ली के बीच नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर घमासान मचा हुआ है। खेतों में नहर से पानी देने को हुए विवादों में तो कई पुश्तैनी दुश्मनियों की नींव रखी हुई है। यह भी कड़वा सच है कि हमारे देश में बहुत-सी औरतें पीने के पानी के जुगाड़ के लिए हर रोज औसतन चार मील पैदल चलती हैं। दूषित जल-जनित रोगों से विश्व में हर वर्ष बाईस लाख लोगों की मौत हो जाती है। इसके बावजूद देश के हर गांव-शहर में कुएं, तालाब, बावड़ी, नदी या समुद्र तक को जब जिसने चाहा है दूषित किया है।
अब साबरमती नदी को ही लें, राज्य सरकार ने उसे बेहद सुंदर पर्यटन स्थल बना दिया, लेकिन इस सौंदर्यीकरण के फेर में नदी का पूरा पर्यावरणीय तंत्र ही नष्ट कर दिया गया। नदी के पाट को एक चौथाई से भी कम कर दिया गया, उसके जलग्रहण क्षेत्र में पक्के निर्माण कर दिए गए। नदी का अपना पानी तो था नहीं, नर्मदा से एक नहर लाकर उसमें पानी भर दिया। अब वहां रोशनी है, चमक-धमक है, बीच में पानी भी दिखता है, लेकिन नहीं है तो नदी और उसके अभिन्न अंग, उसके जल-जीव, दलदली जमीन, जमीन की हरियाली व अन्य जैविक क्रियाएं।
सौंदर्यीकरण के नाम पर नदी की पूरी पारिस्थितिकी को नष्ट करने की कोशिशें महज नदी के साथ नहीं, हर छोटे-बड़े कस्बे के पारंपरिक तालाबों के साथ भी की गर्इं। हाल ही में इटावा के एक पुराने तालाब को सुंदर बनाने के नाम पर उसेसंकरा कर रंगीन टाइल्स लगाने की योजना पर काम चल रहा है। हो सकता है उससे कुछ दिनों के लिए शहर में रौनक आ जाए, लेकिन न तो उसमें पानी एकत्र होगा और न ही वहां एकत्र पानी से जमीन की प्यास बुझेगी। यह भी तय है कि ऐसे तालाब में बाहर से पानी भरना होगा। ऐसा ही पूरे देश के सरोवरों के साथ हुआ। तालाब के जलग्रहण व निकासी क्षेत्र में पक्के निर्माण कर उसका आमाप समेट दिया गया, बीच में कोई मंदिर किस्म की स्थायी आकृति बना दी गई व इसकी आड़ में आसपास की जमीन का व्यावसायिक इस्तेमाल होने लगा।
बलिया (उ.प्र.) का सुरहा ताल तो मशहूर है, लेकिन इसी जिले के एक कस्बे का नाम रत्सड़ इसमें मौजूद सैकड़ों निजी तालाबों के कारण पड़ा था, सर यानी सरोवर से सड़हुआ। हर घर का एक तालाब था, वहां लेकिन जैसे ही कस्बे को आधुनिकता की हवा लगी व घरों में नल लगे, फिर गुसलखाने आए, नालियां आर्इं, इन तालाबों को गंदगी डालने का नाबदान बना दिया गया। फिर तालाबों से बदबू आई तो उन्हें ढंक कर नई कॉलोनियां या दुकानें बनाने का बहाना तलाश लिया गया।
साल भर प्यास से तड़पने वाले बुंदेलखंड के छतरपुर शहर के किशोर सागर का मसला बानगी है कि तालाबों के प्रति सरकारी रुख कितना कोताही भरा है। कोई डेढ़ साल पहले एनजीटी (राष्ट्रीय हरित अधिकरण) के भोपाल पीठ ने सख्त आदेश दिया था कि इस तालाब पर कब्जा कर बनाए गए सभी निर्माण हटाए जाएं। अभी तक प्रशासन माप-जोख नहीं कर पाया है कि कहां से कहां तक व कितने अतिक्रमण को तोड़ा जाए।
गाजियाबाद में पारंपरिक तालाबों को बचाने के लिए एनजीटी के कई आदेश लाल बस्तों में धूल खा रहे हैं। छतरपुर में तालाब से अतिक्रमण हटाने का मामला लोगों को घर से उजाड़ने और निजी दुश्मनी में तब्दील हो चुका है। गाजियाबाद में तालाब के फर्श को सीमेंट से पोत कर उसमें टैंकर से पानी भरने के असफल प्रयास हो चुके हैं। अब हर शहर में कुछ लोग एनजीटी या आरटीआई के जरिये ऐसे मसले उठाते हैं और आम समाज उन्हें पर्यावरण रक्षक से ज्यादा कथित तौर पर दबाव बना कर पैसा वसूलने वाला समझता है। दिल्ली से सटे बागपत जिले में र्इंट के भट्ठों पर पाबंदी लगाने, हटाने, मुकदमा करने के नाम पर हर साल करोड़ों की वसूली होती है। र्इंट भट्ठा वाले और उनके खिलाफ अर्जियां देकर वसूली करने वाले और साथ ही प्रशासन भी यह नहीं सोचता कि इन भट्ठों के कारण जमीन और हवा को हो रहे नुकसान का खमियाजा हमारे समाज को ही भुगतना है।
पिछले दिनों यमुना के पर्यावरणीय तंत्र को जो नुकसान पहुंचाया गया, वह महज एक राजनीतिक विवाद बन कर रह गया। एक पक्ष यमुना के पहले से दूषित होने की बात कर रहा था तो दूसरा पक्ष बता रहा था कि पूरी प्रक्रिया में नियमों को तोड़ा गया। पहला पक्ष पूरे तंत्र को समझना नहीं चाहता तो दूसरा पक्ष समय रहते अदालत नहीं गया व ऐसे समय पर बात को उठाया गया जिसका उद््देश्य नदी की रक्षा से ज्यादा ऐन समय पर समस्याएं खड़ी करना था। लोग उदाहरण दे रहे हैं कुंभ व सिंहस्थ का। वहां भी लाखों लोग आते हैं, लेकिन सिंहस्थ, कुंभ या माघी जैसे मेले नदी के तट पर होते हैं, नदी तट हर समय नदी के बहाव से ऊंचा होता है और वह नदियों के सतत मार्ग बदलने की प्रक्रिया में विकसित होता है, रेतीला मैदान। जबकि किसी नदी का जलग्रहण क्षेत्र, जैसे कि दिल्ली में था, एक दलदली स्थान होता है जहां नदी अपने पूरे यौवन में होती है तो जल का विस्तार करती है। वहां भी धरती में कई लवण होते हैं, ऐसे छोटे जीवाणु होते हैं जो न केवल जल को शुद्ध करते हैं बल्कि मिट्टी की सेहत भी सुधारते हैं।
ऐसी बेशकीमती जमीन को जब लाखों पैर व मशीनें रौंद देती हैं तो वह मृत हो जाती है व उसके बंजर बनने की आशंका रहती है। नदी के जल का सबसे बड़ा संकट उसमें डीडीटी, मलाथियान जैसे रसायनों की मात्रा बढ़ना है। ये केवल पानी को जहरीला नहीं बनाते, बल्कि पानी की प्रतिरोधक क्षमता को भी नष्ट कर देते हैं। सनद रहे, पानी में अपने परिवेश के सामान्य मल, जल-जीवों के मृत अंश व सीमा में प्रदूषण को ठीक करने के गुण होते हैं, लेकिन जब नदी में डीडीटी जैसे रसायनों की मात्रा बढ़ जाती है तो उसकी यह क्षमता चुक जाती है। दिल्ली में मच्छरों से बचाव के लिए सैकड़ों टन रसायन नदी के भीतर छिड़का गया। वह तो भला हो एनजीटी का, वरना कई हजार लीटर कथित एंजाइम भी पानी में फैलाया जाता। अब कथित सफाई का दिखावा हो रहा है, जबकि जलग्रहण क्षेत्र में लगातार भारी वाहन चलने, सफाई के नाम पर गैंती-फावड़े चलाने से जमीन की ऊपरी नम सतह मर गई, उसके प्रति किसी की सोच ही नहीं बन रही है।
हो सकता है कुछ दिनों में वहां जमा कई टन कूड़ा, पानी की खाली बोतलें आदि साफ हो जाएं, लेकिन जिस नैसर्गिकता की सफाई हो गई, उसे लौटाना नामुमकिन है। हमारे पर्व-त्योहार मनाने के तरीके कैसे हों, इस पर भी हम अदालतों या सरकारी आदेशों पर निर्भर होते जा रहे हैं। इन दिनों भीषण सूखे से जूझ रहे महाराष्ट्र के लातूर में पानी की कमी से पलायन, झगड़े व सरकारी टैंकरों की लूट जैसी अराजकता मची है। वहीं होली पर पानी की फिजूलखर्ची न करने के सरकारी आदेश पर कुछ लोग परंपरा का सवाल उठा कर वितंडा खड़ा करते रहे। जबकि आज की होली में न तो पारंपरिक रंग हैं न ही भावना न ही सौहार्द, लेकिन पानी की किफायत की बात उठते ही लोग परंपरा की आड़ लेते हैं। दिवाली पर आतिशबाजी की हदबंदी के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हर साल किस कदर उल्लंघन होता है, किसी से छिपा नहीं है। असलियत यह है कि यदि किसी के घर में कोई बच्चा दमे या सांस की बीमारी का शिकार है तो उसे सुप्रीम कोर्ट का आदेश याद आ जाता है, वरना लोग ऐसे निर्देशों को धुएं में उड़ा देते हैं।
कुल मिलाकर हम अपने समाज को पर्यावरण और परंपराओं के प्रति न तो जागरूक बना पा रहे हैं और न ही प्रकृति पर हो रहे हमलों के प्रभावों को सुनना-समझना चाहते हैं। कुछ लोग एनजीटी या अदालतों में जाते हैं, कुछ ऐसे भी हैं जो ऐसे आदेशों की आड़ में अपनी दुकान चलाते हैं, लेकिन ऐसे लोग बहुत कम हैं जो धरती को नष्ट करने में अपनी भूमिका के प्रति स्वत: सचेत या संवेदनशील होते हैं।

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