तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

गुरुवार, 28 अप्रैल 2016

Beware of desert which coming nearer to you


दुनिया में बढ़ रहे मरुस्थल

                                                                                                                       = पंकज चतुर्वेदी
पर्यावरणीय संकट का कुप्रभाव लगातार जलवायु परिवर्तन के रूप में तो सामने आ ही रहा है, जंगलों की कटाई व कुछ अन्य कारकों के चलते दुनिया में तेजी से पांव फैला रहे रेगिस्तान का खतरा धरती पर जीवन की उपस्थिति को दिनोंदिन कमजोर करता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की रपट कहती है कि दुनिया के कोई 100 देशों में उपजाऊ या हरियाली वाली जमीन रेत के ढेर से ढक रही है और इसका असर एक अरब लोगों पर पड़ रहा है...

एक तरफ परिवेश में कार्बन की मात्रा बढ़ रही है तो दूरी ओर ओजोन परत में हुए छेद में दिनोंदिन विस्तार हो रहा है। इससे उपजे पर्यावरणीय संकट का कुप्रभाव लगातार जलवायु परिवर्तन के रूप में तो सामने आ ही रहा है, जंगलों की कटाई व कुछ अन्य कारकों के चलते दुनिया में तेजी से पांव फैला रहे रेगिस्तान का खतरा धरती पर जीवन की उपस्थिति को दिनोंदिन कमजोर करता जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम यानी यूनेप की रपट कहती है कि दुनिया के कोई 100 देशों में उपजाऊ या हरियाली वाली जमीन रेत के ढेर से ढक रही है और इसका असर एक अरब लोगों पर पड़ रहा है। उल्लेखनीय है कि यह खतरा पहले से रेगिस्तान वाले इलाकों से इतर है। मरुस्थलीयकरण दुनिया के सामने बेहद चुपचाप, लेकिन खतरनाक तरीके से बढ़ रहा है। इसकी चपेट में आए इलाकों में लगभग आधे अफ्रीका व एक-तिहाई एशिया के देश हैं। यहां बढ़ती आबादी के लिए भोजन, आवास, विकास आदि के लिए बेतहाशा जंगल उजाड़े गए। फिर यहां नवधनाढ्य वर्ग ने वातानुकूलन जैसी ऐसी सुविधओं का बेपरवाही से इस्तेमाल किया, जिससे ओजोन परत का छेद और बढ़ गया। याद करें कि 70 के दशक में अफ्रीका के साहेल इलाके में भयानक अकाल पड़ा था, तब भी संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों ने चेताया था कि लगातार सूखी या बंजर हो रही जमीन के प्रति बेपरवाही रेत के अंबार को न्यौता दे रही है। उसी समय कुछ ऐसी सिंचाई प्रणालियां शुरू हुइंर्, जिससे एकबारगी तो हरियाली आती लगी, लेकिन तीन दशक बाद वे परियोजनाएं बंजर, दलदली जमीन उपजाने लगीं। ऐसी ही जमीन, जिसकी टॉप सॉईल मर जाती है, देखते ही देखते मरुस्थल का बसेरा होती है।
जाहिर है कि रेगिस्तान बनने का खतरा उन जगहों पर ज्यादा है, जहां पहले उपजाऊ जमीन थी और अंधाधुंध खेती या भूजल दोहन या सिंचाई के कारण उसकी उपजाऊ क्षमता खत्म हो गई। ऐसी जमीन पहले उपेक्षित होती है और फिर वहां लाइलाज रेगिस्तान का कब्जा हो जाता है। यहां जानना जरूरी है कि धरती के महज सात फीसदी इलाके में ही मरुस्थल है, लेकिन खेती में काम आने वाली लगभग 35 प्रतिशत जमीन ऐसी भी है, जो शुष्क कहलाती है और यही खतरे का केंद्र है। बेहद हौले से और तत्काल न दिखने वाली गति से विस्तार पा रहे रेगिस्तान का सबसे ज्यादा असर एशिया में ही है। इसरो का एक शोध बताता है कि थार रेगिस्तान अब राजस्थान से बाहर निकल कर कई राज्यों में जड़ जमा रहा है। हमारे 32 प्रतिशत भूभाग की उर्वर क्षमता कम हो रही है, जिसमें से महज 24 फीसदी ही थार के ईद-गिर्द के हैं। सन 1996 में थार का क्षेत्रफल एक लाख 96 हजार 150 वर्ग किलोमीटर था, जोकि आज दो लाख आठ हजार 110 वर्ग किलोमीटर हो गया है। भारत की कुल 328.73 मिलियन जमीन में से 105.19 मिलियन जमीन पर बंजर ने अपना डेरा जमा लिया है, जबकि 82.18 मिलियन हेक्टेयर जमीन रेगिस्तान में बदल रही है। यह हमारे लिए चिंता की बात है कि देश के एक-चौथाई हिस्से पर आने वाले सौ साल में मरुस्थल बनने का खतरा आसन्न है। हमारे यहां सबसे ज्यादा रेगिस्तान राजस्थान में है, कोई 23 मिलियन हेक्टेयर। गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और जम्मू-कश्मीर की 13 मिलियन भूमि पर रेगिस्तान है तो अब उड़ीसा व आंध्र प्रदेश में रेतीली जमीन का विस्तार देखा जा रहा है। अंधाधुंध सिंचाई व जमकर फसल लेने के दुष्परिणाम की बानगी पंजाब है, जहां दो लाख हेक्टेयर जमीन देखते ही देखते बंजर हो गई। भटिंडा, मानसा, मोगा, फिरोजपुर, मुक्तसर, फरीदकोट आदि में जमीन में रेडियो एक्टिव तत्व की मात्रा सीमा तोड़ चुकी है और यही रेगिस्तान की आमद का संकेत है। भारत के संदर्भ में यह तो स्पष्ट है कि हम वैश्विक प्रदूषण व जलवायु परिवर्तन के शिकार तो हो ही रहे हैं, जमीन की बेतहाशा जुताई, मवेशियों द्वारा हरियाली की अति चराई, जंगलों का विनाश और सिंचाई की दोषपूर्ण परियोजनाएं हैं।
बारीकी से देखें तो इन कारकों का मूल बढ़ती आबादी है। हमारा देश आबादी नियंत्रण में तो सतत सफल हो रहा है, लेकिन मौजूदा आबादी का ही पेट भरने के लिए हमारे खेत व मवेशी कम पड़ रहे हैं। ऐसे में एक बार फिर मोटे अनाज को अपने आहार में शामिल करने, ज्यादा पानी वाली फसलों को अपने भोजन से कम करने जैसे प्रयास किया जाना जरूरी हैं। सिंचाई के लिए भी छोटी, स्थानीय तालाब, कुओं पर आधारित रहने की अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा। यह स्पष्ट है कि बड़े बांध जितने महंगे व अधिक समय में बनते हैं, उनसे उतना पानी तो मिलता नहीं है, वे नई-नई दिक्कतों को उपजाते हैं, सो छोटे तटबंध, कम लंबाई की नहरों के साथ-साथ रासायनिक खाद व दवाओं का इस्तेमाल कम करना रेगिस्तान के बढ़ते कदमों पर लगाम लगा सकता है। भोजन व दूध के लिए मवेशी पालन तो बढ़ा, लेकिन उनकी चराई की जगह कम हो गई। परिणामत: मवेशी अब बहुत छोटी-छोटी घास को भी चर जाते हैं और इससे जमीन नंगी हो जाती है। जमीन खुद की तेज हवा और पानी से रक्षा नहीं कर पाती है, मिट्टी कमजोर पड़ जाती है और सूखे की स्थिति में मरुस्थलीकरण का शिकार हो जाती है। मरुस्थलों के विस्तार के साथ कई वनस्पति और पशु प्रजातियों की विलुप्ति हो सकती है, वहीं गरीबी, भुखमरी और पानी की कमी इससे जुड़ी अन्य समस्याएं हैं।रियो डी जेनेरियो में हुए धरती बचाओ सम्मेलन में भी इस बात पर सहमति बनी थी कि रेगिस्तान रोकने के लिए नई तकनीक के बनिस्पत पारंपरिक तरीके ज्यादा कारगर हैं, जिसमें जमीन की नमी बरकरार रखने, चारागाह-जंगल बचाने व उसके प्रबंधन के सामाजिक तरीकों, फसल में विविधता लाने जैसी हमारी बिसराई गई अतीत की तकनीकें प्रमुख हैं। बढ़ता रेगिस्तान गरीबी को जन्म देता है और गरीबी, असंतोष का कारण बनती है और इसका अंतिम पड़ाव अशांति, युद्ध, टकराव ही होता है और ऐसे हालात मंे किसी भी समाज का जीना संभव नहीं होगा।
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Grabage from "Development "

विकास की अंधी दौड में उपजता जहरीला कचरा 

                                                                                                    पंकज चतुर्वेदी

हमारी सुविधाएं, विकास के प्रतिमान और आधुनिकता के आईने जल्दी ही हमारे लिए गले का फंदा बनने वाला है। देश के सबसे बड़े व्यापारिक संगठन एसोचेम ने भी चेतानवी दी है कि आगामी 2018 तक भारत में हर साल 30 लाख मेट्रीक टन ई-कचरा उत्पादित होने लगेगा और यदि इसके सुरक्षित निबटारे के लिए अभी से काम नहीं किया गया तो देश की धरती, हवा और पानी में इतना जहर घुल जाएगा कि उसका निदान होना मुश्किल होगा। कहते हैं ना कि हर सुविधा या विकास की माकूल कीमत चुकानी ही होती है, लेकिन इस बात का नहीं पता था कि इतनी बड़ी कीमत चुकानी होगी। सनद रहे आज देश में लगभग 18.5 लाख टन ई-कचरा हर साल निकल रहा है। इसमें मुंबई से सबसे यादा एक लाख बीस हजार मे.टन, दिल्ली से 98 हजार मे.ट.और बंगलुरु से 92 मे.ट. कचरा है। दुर्भाग्य है कि इसमें से महज ढाई फीसदी कचरे का ही सही तरीके से निबटारा हो रहा है। बाकि कचरा अवैध तरीके से निबटने के लिए छोड़ दिया जाता है। इस कचरे से बहुमूल्य धातु निकालने का काम दस से 15 साल की आयु के कोई पांच लाख बचे जुड़े हुए हैं और ऐसे बचों की सांस व शरीर में हर दिन इतना विष जुड़ रहा है कि वे शायद ही अपनी जवानी देख पाएं।
15 साल पुरानी वह घटना शायद ही किसी को याद हो, जब दिल्ली स्थित एशिया के सबसे बड़े कबाड़ी बाजार मायापुरी में कोबाल्ट का विकिरण फैल गया था, जिसमें एक मौत हुई व अन्य पांच जीवन भर के लिए बीमार हो गए थे। दिल्ली विश्वविद्यालय के रसायन विभाग ने एक बेकार पड़े उपकरण को कबाड़े में बेच दिया व कबाड़ी ने उससे धातु निकालने के लिए उसे जलाना चाहा था। उन दिनों व हादसा उच न्यायालय तक गया था। आज तो देश के हर छोटे-बड़े शहर में हर दिन ऐसे हजारों उपकरण तोड़े-जलाए जा रहे हैं जिनसे निकलने वाले अपशिष्ट का मानव जीवन तथा प्रकृति पर दुष्प्रभाव विकिरण से कई गुणा यादा है। यह भी तथ्य है कि हर दिन ऐसे उपकरणों में से कई हजार खराब होते हैं या पुराने होने के कारण कबाड़े में डाल दिए जाते हैं। ऐसे सभी इलेक्ट्रानिक्स उपकरणों का मूल आधार ऐसे रसायन होते हैं जो जल, जमीन, वायु, इंसान और समूचे पर्यावरण को इस हद तक नुकसान पहुंचाते हैं कि उससे उबरना लगभग नामुमकिन है। यही ई-कचरा कहलाता है और अब यह वैश्विक समस्या बन गया है।
इस कचरे से होने वाले नुकसान का अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि इसमें 38 अलग प्रकार के रासायनिक तत्व शामिल होते हैं जिनसे काफी नुकसान भी हो सकता है। जैसे टीवी व पुराने कम्प्यूटर मॉनिटर में लगी सीआरटी (केथोंड रे ट्यूब) को रिसाइकल करना मुश्किल होता है। इस कचरे में लेड, मरक्यूरी, केडमियम जैसे घातक तत्व भी होते हैं। दरअसल ई-कचरे का निपटान आसान काम नहीं है क्योंकि इसमें प्लास्टिक और कई तरह की धातुओं से लेकर अन्य पदार्थ रहते हैं। सबसे खतरनाक कूड़ा तो बैटरियों, कंप्यूटरों और मोबाईल का है। इसमें पारा, कोबाल्ट, और ना जाने कितने किस्म के जहरीले रसायन होते हैं। कैडमियम से फेफड़े प्रभावित होते हैं, जबकि कैडमियम के धुएं और धूल के कारण फेफड़े व किडनी दोनों को गंभीर नुकसान पहुंचता है। एक कंप्यूटर का वजन लगभग 3.15 किलो ग्राम होता है। इसमें 1.90 किग्रा सीसा और 0.693 ग्राम पारा और 0.04936 ग्राम आर्सेनिक होता हे। जो जलाए जाने पर सीधे वातावरण में घुलते हैं। ठीक इसी तरह का जहर बैटरियों व बेकार मोबाईलों से भी उपज रहा है। सेंटर फॉर साइंस एंड इन्वाइरनमेंट (सीएसई) ने कुछ साल पहले जब सर्किट बोर्ड जलानेवाले इलाके के आसपास शोध कराया तो पूरे इलाके में बड़ी तादाद में जहरीले तत्व मिले थे, जिनसे वहां काम करने वाले लोगों को कैंसर होने की आशंका जताई गई, जबकि आसपास के लोग भी फसलों के जरिए इससे प्रभावित हो रहे थे।
भारत में यह समस्या लगभग 25 साल पुरानी है, लेकिन सूचना प्रोद्योगिकी के चढ़ते सूरज के सामने इसे पहले गौण समझा गया, जब इस पर कानून आए तब तक बात हाथ से निकल चुकी थी। घरों और यहां तक कि बड़ी कंपनियों से निकलने वाला ई-वेस्ट यादातर कबाड़ी उठाते हैं। वे इसे या तो किसी लैंडफिल में डाल देते हैं या फिर कीमती मेटल निकालने के लिए इसे जला देते हैं, जो कि और भी नुकसानदेह है।
वैसे तो केंद्र सरकार ने सन् 2012 में ई-कचरा (प्रबंधन एवं संचालन नियम) 2011 लागू किया है, लेकिन इसमें दिए गए दिशा-निर्देश का पालन होता कहीं दिखता नहीं है। म.प्र. में भी खतरनाक अपशिष्ट (प्रबंधन, हैंडलिंग एवं सीमापार संचलन)अधिनियम-2008 में ही इलेक्ट्रॉनिक व इलेक्टिक वस्तुओं से निकलने वाले कचरे के प्रबंधन की व्यवस्था कई साल पहले से ही लागू कर दी गई थी, लेकिन म.प्र. प्रदूषण बोर्ड द्वारा लगातार इसकी अनदेखी की जा रही है।
अभी मई-2015 में ही संसदीय समिति ने देश में ई-कचरे के चिंताजनक रफ्तार से बढ़ने की बात को रेखांकित करते हुए इस पर लगाम लगाने के लिए विधायी एवं प्रवर्तन तंत्र स्थापित करने की सिफारिश की है ताकि भारत को विकसित देशों के ई-कचरा निपटारा करने का स्थल बनने से रोका जा सके। कई रिपोर्टो में इस बात के संकेत प्राप्त हुए हैं कि ई-कचरा विकसित देशों से एशिया, अफ्रीका और लातीन अमेरिकी देशों में भेजे जा रहे हैं और यह उपयोग किये गए उत्पाद के नाम पर भेजे जा रहे हैं ताकि इसके रिसाइकिल करने के खर्च से बचा जा सके। पर्यावरण मंत्रलय के लिए 2015-16 की अनुदान की मांगों से संबंधित समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि समिति देश को विकसित देशों के ई-कचरा निपटारा करने का स्थल बनने से रोकने के लिए इस पर लगाम लगाने के लिए विधायी एवं प्रवर्तन तंत्र स्थापित करने की सिफारिश की है।
असल में ई-कचरे के आतंक के समाधान का मंत्र है - जागरूकता व बचाव ही असली निदान है। ई-वेस्ट से निपटने का सबसे अछा मंत्र रिड्यूस, रीयूज और रीसाइकलिंग का है। रिड्यूज यानि कम से कम कचरा जमा करें, यानि जब तक जरूरी ना हो, अपने इलेक्ट्रानिक उपकरण बदलें नहीं। यदि उपकरण काम कर रहा है तो उसे किसी जरूरतमंद को इस्तेमाल करने दें। रीयूज यानि फिर से इस्तेमाल करना। यदि उपकरण में कोई मामूली कमी है। तो उसकी मरम्मत करवा कर अधिक दिनों तक प्रयोग में लाएं। रीसाइकलिंग का अर्थ कतई वे तरीके नहीं है जिनकी चर्चा ऊपर आलेख में की गई है। हमारे देश में हालांकि बहुत कम हैं, लेकिन कई कंपनियां काम कर रही हैं जो ई-कचरे का निबटारा वैज्ञानिक तरीके से करती हैं। अपने बेकार उपकरण कबाड़ी को नहीं, बल्कि ऐसी कंपनियों को दें। नया इलेक्ट्रानिक उपकरण खरीदते समय इस बात को ध्यान दें कि कौन सी कंपनियां पुराने उपकरणों को लेती हैं तथा किन के पास ऐसे कचरे के निस्तारण की व्यवस्था है। जब उपभोक्ता ऐसी कंपनियों की ओर जाएगा तो सभी उत्पादकों को कचरे के निस्तारण के वैज्ञानिक तरीके वाले कारखाने स्थापित करने होंगे।

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

restoration of old water body is more important than new digging

तालाब बनाना ही नहीं सहेजना  भी जरूरी है

लगातार दूसरे महीने प्रधानमंत्री ने अपने ‘‘मन की बात’’ कार्यक्रम में तालाब बचाने, नए तालाब बनाने व पुराने तालाबों की मरम्म्त व संरक्षण पर जोर दिया है। इसके विपरीत हाल ही मंे उत्तर प्रदेष के इटावा की नगर पालिका ने वहां के एक पुराने तालाब को सुंदर बनाने के नाम पर उसके संकरा कर रंगीन नीली टाईल्स लगाने की योजना पर काम षुरू किया है। हो सकता है कि उससे कुछ दिनों शहर में रौनक आ जाए, लेकिन ना तो उसमें पानी एकत्र होगा और ना ही वहां एकत्र पानी से जमीन की प्यास बुझेगी। यह भी तय है कि ऐसे तालाब में बाहर से पानी भरना होगा। ऐसा ही पूरे देश के सरोवरों के साथ लगातार हो रहा है - तालाब के जलग्रहण व निकासी क्षेत्र में पक्के निर्माण कर उसका आमाप समेट दिया जाता है, सौंदर्यीकरण के नाम पर पानी के बीच में कोई मंदिर किस्म की स्थाई आकृति बना दी गई व इसकी आड़ में आसपास की जमीन का व्यावसायिक इस्तेमाल कर दिया गया। कभी एक हजार तालबों की धरती कहलाने वाले बुंदेलखंड के टीकमगढ जिले की साठ फीसदी जनता पानी की कमी के चलते पलायन कर चुकी है, लेकिन वहां का समाज अभी भी नहीं सुधरा। हाल ही में टीकमगढ षहर के बीस एकड़ वाले ब्रदावन तालाब का बंधान महज मिट्टी के लालच में फोड़ दिया गया।
बलिया का सुरहा ताल तो बहुत मषहूर है, लेकिन इसी जिले का एक कस्बे का नाम रत्सड़ इसमें मौजूद सैंकड़ों निजी तालाबों के कारण पड़ा था, सर यानि सरोवर से ‘सड़’ हुआ।  कहते हैं कि कुछ दषक पहले तक वहां हर घर का एक तालाब था, लेकिन जैसे ही कस्बे को आधुनिकता की हवा लगी व घरों में नल लगे, फिर गुसलखाने आए, नालियां आई, इन तालाबों को गंदगी डालने का नाबदान बना दिया गया। फिर तालाबों से बदबू आई तो उन्हें ढंक कर नई कालेानियां या दुकानंे बनाने का बहाना तलाष लिया गया। सालभर प्यास से कराहने वाले बंुदेलखंड के छतरपुर षहर के किषोर सागर का मसला बानगी है कि तालाबों के प्रति सरकार का रूख कितना कोताहीभरा है। कोई डेढ साल पहले एनजीटी की भोपाल बेंच ने सख्त आदेष दिया कि इस तालाब पर कब्जा कर बनाए गए सभी निर्माण हटाए जाएं। अभी तक प्रषासन मापजोख नहीं कर पाया है कि कहां से कहां तक व कितने अतिक्रमण को तोड़ा जाए। गाजियाबाद में पारंपरिक तालाबों को बचाने के लिए एनजीटी के कई आदेष लाल बस्तों में धूल खा रहे हैं।  छतरपुर में तालाब से अतिक्रमण हटाने का मामला लोगों को घर से उजाड़ने और निजी दुष्मनी में तब्दील हो चुका है। गाजियाबाद में तालाब के फर्ष को सीमेंट से पोत कर उसमें टैंकर से पानी भरने के असफल प्रयास हो चुके हैं।
समग्र भारत के विभिन्न भौगोलिक हिस्सों में वैदिक काल से लेकर वर्तमान तक विभिन्न कालखंडों में समाज के द्वारा अपनी जरूरतों के मुताबिक बनाई गई जल संरचनाओं और जल प्रणालियों के अस्तित्व के अनेक प्रमाण मिलते हैं, जिनमें तालाब सभी जगह मौजूद रहे हैं। रेगिस्तान में तो उन तालाबों को सागर की उपमा दे दी गई।  ऋग्वेद में सिंचित खेती, कुओं और गहराई से पानी खींचने वाली प्रणालियों का उल्लेख मिलता है। हडप्पा एवं मोहनजोदडो (ईसा से 3000 से 1500 साल पूर्व) में जलापूर्ति और मल निकासी की बेहतरीन प्रणालियों के अवषेष मिले हैं। कौटिल्य के अर्थषास्त्र में भी जल संरचनाओं के बारे में अनेक विवरण उपलब्ध हैं। इन विवरणों से पता चलता है कि तालाबों का निर्माण राज्य की जमीन पर होता था। स्थानीय लोग तालाब निर्माण की सामग्री जुटाते थे। असहयोग और तालाब की पाल को नुकसान पहुँचाने वालों पर राजा द्वारा जुर्माना लगाया जाता था। तत्कालीन नरेष चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा यह व्यवस्था ईसा से 321-297 साल पहले लागू की गई थी। बरसात के पानी को संचित करने के लिये तटबन्ध, जलाषय और तालाबों का निर्माण आम था। सूखे इलाकों में कुये और बावडि़यों के बनाने का रिवाज था। मेगस्थनीज ने भी अपने यात्रा विवरणों में उत्तर भारत में पानी का वितरण करने वाली जलसुरंगों का जिक्र किया है।   
अनेक विद्वानों ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बनी जल संचय प्रणालियों का गहन अध्ययन कर उनका विवरण प्रस्तुत किया है। इस विवरण में जल संरचनाओं की विविधता के साथ साथ उस क्षेत्र की जलवायु से उनका सह-सम्बन्ध प्रतिपादित होता है। यह सह-सम्बन्ध, संरचनाओं के स्थल चयन की सटीकता, निर्माण सामग्री की उपयुक्तता तथा उनकी डिजायन के उजले पक्ष को प्रस्तुत कर सोचने को मजबूर करता है कि पुराने समय में हमारे पूर्वजों की समझ कितनी सूझबूझभरी एवं वैज्ञानिक थी। पुरानी संरचनाएं बानगी हैं कि उस काल में भी उन्नत जल-विज्ञान और कुषल जलविज्ञानी मौजूद थे। कई बार लगता है कि जल संरचनाओं के निर्माणकर्ताओं के हाथों में अविष्वसनीय कौषल तथा प्राचीन वास्तुविदों की प्रस्तुति में देष की मिट्टी और जलवायु की बेहतरीन समझ की सोंधी गंध मौजूद थी। यह सिलसिला आगे बढा। दसवीं सदी में परमार राजा भोज ने समरांगण सूत्रधार की रचना कर भारतीय वास्तु को नई पहचान दी। मुगल काल में विकसित वास्तु में गंगा जमुनी संस्कृति की महक दिखी और देष के अनेक स्थानों में उनके प्रमाण  आसानी से देखे जा सकते हैं। 
केंद्र सरकार के पिछले महीने आए  बजट में यह बात सुखद है कि सरकार ने स्वीकार कर लिया कि देष की तरक्की के लिए गांव व खेत जरूरी हैं, दूसरा खेत के लिए पानी चाहिए व पानी के लिए बारिष की हर बूंद को सहेजने के पारंपरिक उपाय ज्यादा कारगर हैं। तभी खेतों में पांच लाख तालाब खोदने व उसे मनरेगा के कार्य में षामिल करने का उल्लेख बजट में किया गया है। खेत में तालाब यानि किसान के अपने खेत के बीच उसके द्वारा बनाया गया तालाब, जिससे वह सिंचाई करे, अपने इलाके का भूजल स्तर को समृद्ध करे और तालाब में मछली, सिंघाड़ाा आदि उगा कर कमाई बढ़ाए। ऐसा भी नहीं है कि यह कोई नया या अनूठी योजना है।। इससे पहले मध्य प्रदेष में बलराम तालाब, और ऐसी ही कई योजनाएं व हाल ही में उ.प्र. के बुंदेलखंड के सूखाग्रस्त इलाके में कुछ लोग ऐसे प्रयोग कर रहे हैं। सरकारी सोच की तारीफ इस लिए जरूरी है कि यह तो माना कि बड़े बांध के व्यय, समय और नुकसान की तुलना में छोटी व स्थानीय सिंचाई इकाई ज्यादा कारगर है।
यानि यह तय है कि तालाब महज एक गड्ढा नहीं है, जिसमें बारिष का पानी जमा हो जाए और लोग इस्तेमाल करने लगें। तालाब कहां खुदेगा, इसको परखने के लिए वहां की मिट्टी, जमीन पर जल आगमन व निगमन की व्यवस्था, स्थानीय पर्यावरण का खयाल रखना भी जरूरी होता है। वरना यह भी देखा गया है ग्रेनाईट संरचना वाले इलाकों में कुएं या तालाब खुदे, रात में पानी भी आया और कुछ ही घंटों में किसी भूगर्भ की झिर से कहीं बह गया। दूसरा , यदि बगैर सोचे -समझे पीली या दुरमट मिट्टी में तालाब खोद तो  धीरे-धीरे पानी जमीन में बैठेगा, फिर दल-दल बनाएगा और फिर उससे ना केवल जमीन नश्ट होगी, बल्कि आसपास की जमीन के प्राकृतिक लवण भी पानी के साथ बह जाएंगे। जरा कल्पना करें- पांच लाख तालाब, यदि एक तालाब एक एकड़ का तो, देष के हर साल घट रही खेती की बेषकीमती जमीन में पांच लाख एकड़ की कम से कम सीधी कमी। षुरूआत में भले ही अच्छे परिणाम आएं, लेकिन यदि नमी, दलदल, लवण बहने का सिलसिला महज पंद्रह सल भी जारी रहा तो उस तालाब के आसपास लाइलाज बंजर बनना वैज्ञानिक तथ्य है।
नए तालाब जरूर बनें, लेकिन आखिर पुराने तालाबों का जिंदा करने से क्यांे बचा जा रहा है? सरकारी रिकार्ड कहता है कि मुल्क में आजादी के समय लगभग 24 लाख तालाब थे। सन 2000-01 में जब देष के तालाब, पोखरों की गणना हुई तो पाया गया कि हम आजादी के बाद कोई 19 लाख तालाब-जोहड़ पी गए। देश में इस तरह के जलाशयों की संख्या साढे पांच लाख से ज्यादा है, इसमें से करीब 4 लाख 70 हजार जलाशय किसी न किसी रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं, जबकि करीब 15 प्रतिशत बेकार पड़े हैं। दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 2005 में केंद्र सरकार ने जलाशयों  की मरम्मत , नवीकरण और जीर्णोध्दार ( आर आर आर ) के लिए योजना बनाई। ग्यारहवीं योजना में काम शुरू भी हो गया, योजना के अनुसार राज्य सरकारों को योजना को अमली जामा पहनाना था। इसके लिए कुछ धन केंद्र सरकार की तरफ से और कुछ विश्व बैंक जैसी संस्थाओं से मिलना था। इस योजना के तहत इन जलाशयों की क्षमता बढ़ाना, सामुदायिक  स्तर पर  बुनियादी ढाँचे का विकास करना था। कोई तीन साल पहले गाजियाबाद के संजय कष्यप के नेतत्व में एक अभियान प्रारंभ किया गया था- तालाब संवर्धन प्राधिकरण के गठन की मांग। ऐसी संस्था, जिसके पास देष के सभी छोटे-बड़े तालाबों का मालिकाना हक हो, उसके पास न्यायिक षक्ति हो और इतना बजट व स्टाफ हो कि पूरे देष के जलाषयों की चैखी कुंडली तैयार की जा सके। श्री कष्यप् ने संसदीय समिति के सामने भी अपने सुझाव रखे थे और षायद इसी का प्रभाव है कि सरकार के बजट में तालाब का उल्लेख तो है।
आजादी के बाद सरकार और समाज दोनों ने तालाबों को लगभग बिसरा दिया, जब आंख खुली तब बहुत देर हो चुकी थी। सन 2001 में देष की 58 पुरानी झाीलों को पानीदार बनाने के लिए केंद्र सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय ने राश्ट्रीय झील संरक्षण योजना षुरू की थी। इसके तहत कुल 883.3 करोड़ रूपए का प्रावधान था। इसके तहत मध्यप्रदष की सागर झील, रीवा का रानी तालाब और षिवपुरी झाील, कर्नाटक के 14 तालाबों, नैनीताल की दो झीलों सहित 58 तालाबों की गाद सफाई के लिए  पैसा बांटा गया। इसमें राजस्थान के पुश्कर का कंुड और धरती पर जन्नत कही जाने वाली श्रीनगर की डल झील भी थी। झील सफाई का पैसा पष्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों को भी गया। अब सरकार ने मापा तो पाया कि इन सभी तालाबों से गाद निकली कि नहीं, पता नहीं ; लेकिन इसमें पानी पहले से भी कम आ रहा है। केंद्रीय जल आयोग ने जब खर्च पैसे की पड़ताल की तो ये तथ्य सामने आए। कई जगह तो गाद निकाली ही नहीं और उसकी ढुलाई का खर्चा दिखा दिया। कुछ जगह गाद निेकाल कर किनारों पर ही छोड़ दी, जोकि अगली बारिष में ही फिर से तालाब में गिर गई।
दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमने नए तालाबों का निर्माण तो नहीं ही किया, पुराने तालाबों को भी पाटकर उन पर इमारतें खड़ी कर दीं। भू-मफियाओं ने तालाबों को पाटकर बनाई गई इमारतों का अरबों-खरबों रुपये में सौदा किया और खूब मुनाफा कमाया। इस मुनाफे में उनके साझेदार बने राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी। माफिया-प्रशासनिक अधिकारियों और राजनेताओं की इस जुगलबंदी ने देश को तालाब विहीन बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। यह तो सरकारी आंकड़ों की जुबानी है, इसमें कितनी सचाई है, यह किसी को नहीं पता। सरकार ने मनरेगा के तहत फिर से तालाब बनाने की योजना का सूत्रपात किया है। अरबों रुपये खर्च हो गए, लेकिन वास्तविक धरातल पर न तो तालाब बने और न ही पुराने तालाबों का संरक्षण ही होता दिखा।
सन 1944 में गठित ‘फेमिन इनक्वायरी कमीशन’ ने साफ निर्देश दिए थे कि आने वाले सालों में संभावित पेयजल संकट से जूझने के लिए तालाब ही कारगर होंगे । कमीशन की रिपोर्ट तो लाल बस्ते में कहीं दब गई  और देष की आजादी के बाद इन पुश्तैनी तालाबों की देखरेख करना तो दूर, उनकी दुर्दशा करना शुरू कर दिया । चाहे कालाहांडी हो या फिर बुंदेलखंड या फिर तेलंगाना ; देष के जल-संकट वाले सभी इलाकों की कहानी एक ही है। इन सभी इलाकों में एक सदी पहले तक कई-कई सौ बेहतरीन तालाब होते थे। यहां के तालाब केवल लोगों की प्यास ही नहीं बुझाते थे, यहां की अर्थ व्यवस्था का मूल आधार भी होते थे । मछली, कमल गट्टा , सिंघाड़ा , कुम्हार के लिए चिकनी मिट्टी ; यहां के हजारों-हजार घरों के लिए खाना उगाहते रहे हैं । तालाबों का पानी यहां के कुओं का जल स्तर बनाए रखने में सहायक होते थे  । शहरीकरण की चपेट में लोग तालाबों को ही पी गए और अब उनके पास पीने के लिए कुछ नहीं बचा है ।
काष किसी बड़े बांध पर हो रहे समूचे व्यय के बराबर राषि एक बार एक साल विषेश अभियान चला कर पूरे देष के पारंपरिक तालबों की गाद हटाने, अतिक्रमण मुक्त बनाने और उसके पानी की आवक-जावक  के रास्ते को निरापद बनाने में खर्च कर दिया जाए तो भले ही कितनी भी कम बारिष हो, ना तो देष का कोई कंठ सूखा रहेगा और ना ही जमीन की नमी मारी जाएगी।

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2016

Farmers need actual cost of there labour, not rlief fund



उपज की कीमत बनाम मुआवजा
क्या अजीब विरोधाभास है कि एक तरफ किसान फसल नष्ट होने पर मर रहा है तो दूसरी ओर अच्छी फसल होने पर भी उसे मौत को गले लगाना पड़ रहा है।


देश का बड़ा हिस्सा सूखे की चपेट में है। बुंदेलखंड, मराठवाड़ा जैसे इलाकों में न जाने कितने किसान इस सदमे से खुदकुशी कर चुके हैं कि उनकी महीनों की दिन-रात की मेहनत के बाद भी अब वे कर्ज उतार नहीं पाएंगे, उन्हें कहीं से कोई भरोसा नहीं मिला कि इस विपदा की घड़ी में समाज या सरकार उनके साथ है। अलग-अलग राज्यों व सरकारों ने कई हजार करोड़ की राहत की घोषणाएं, नेताओं के वायदे, अखबारों में छप रहे बड़े-बड़े इश्तहार किसान को आश्वस्त नहीं कर पा रहे हैं कि वह अगली फसल उगाने को अपने पैरों पर खड़ा हो पाएगा।
मध्यप्रदेश के धार जिले के अमझेरा के किसानों को जब टमाटर के सही दाम नहीं मिले तो उन्होंने इस बार टमाटर से ही रंगपंचमी मना ली। सनद रहे, मालवा अंचल में होली पर रंग नहीं खेला जाता, रंगपंचमी पर ही अबीर-गुलाल उड़ता है। मंडी में टमाटर की एक क्रैट यानी लगभग पच्चीस किलो के महज पचास रुपए मिल रहे थे, जबकि फसल को मंडी तक लाने का किराया प्रति क्रैट पच्चीस रुपए, तुड़ाई दस रुपए, हम्माली पांच रुपए व दीगर खर्च मिला कर कुल अड़तालीस रुपए का खर्च आ रहा था। अब दो रुपए के लिए वे क्या दिन भर मंडी में खपाते। यही हाल गुजरात के साबरकांठा जिले के टमाटर उत्पादक गांवों ईडर, वडाली, हिम्मतनगर आदि का है। जब किसानों ने टमाटर बोए थे तब उसके दाम तीन सौ रुपए प्रति बीस किलो थे। लेकिन पिछले पखवाड़े जब उनकी फसल आई तो मंडी में इसके तीस रुपए देने वाले भी नहीं थे। थक-हार कर किसानों ने फसल मवेशियों को खिला दी।
गुजरात में गांवों तक अच्छी सड़क है, मंडी में भी पारदर्शिता है, लेकिन किसान को उसकी लागत का दाम भी नहीं। जिन इलाकों में टमाटर का यह हाल हुआ, वे भीषण गर्मी की चपेट में आए हैं और वहां कोल्ड स्टोरेज की सुविधा है नहीं, सो फसल सड़े इससे बेहतर उसको मुफ्त में ही लोगों के बीच डाल दिया गया। सनद रहे, इस समय दिल्ली एनसीआर में टमाटर के दाम चालीस रुपए किलो से कम नहीं हैं। यदि ये दाम और बढ़े तो सारा मीडिया व प्रशासन इसकी चिंता करने लगेगा, लेकिन किसान की चार महीने की मेहनत व लागत मिट्टी में मिल गई तो कहीं चर्चा तक नहीं हुई।
बुंदेलखंड व मराठवाड़ा-विदर्भ में किसान इसलिए आत्म हत्या कर रहा है कि पानी की कमी के कारण उसके खेत में कुछ उगा नहीं, लेकिन इन स्थानों से कुछ सौ किलोमीटर दूर ही मध्यप्रदेश के मालवा-निमाड़ के किसान की दिक्कत उसकी बंपर फसल है। भोपाल की करोद मंडी में इस समय प्याज का दाम महज दो सौ से छह सौ रुपए क्विंटल है। आढ़तिये मात्र दो-तीन रुपए किलो के लाभ पर माल दिल्ली बेच रहे हैं। यहां हर दिन कोई पंद्रह सौ क्विंटल प्याज आ रहा है। गोदाम वाले प्याज गीला होने के कारण उसे रखने को तैयार नहीं हैं, जबकि जबर्दस्त फसल होने के कारण मंडी में इतना माल है कि किसान को उसकी लागत भी नहीं निकल रही है। याद करें यह वही प्याज है जो पिछले साल सौ रुपए किलो तक बिका था। आज के हालात ये हैं कि किसान का प्याज उसके घर-खेत पर ही सड़ रहा है।
कैसी विडंबना है कि किसान अपनी खून-पसीने से कमाई-उगाई फसल लेकर मंडी पहुंचता है तो उसके ढेर सारे सपने और उम्मीदें अचानक ढह जाते हैं। कहां तो सपने देखे थे समृद्धि के, यहां तो खेत से मंडी तक की ढुलाई निकालना भी मुश्किल दिख रहा था। असल में यह किसान के शोषण, सरकारी कुप्रबंधन और दूरस्थ अंचलों में गोदाम की सुविधा या सूचना न होने का मिला-जुला कुचक्र है, जिसे जान-बूझ कर नजरअंदाज किया जाता है। अभी छह महीने पहले पश्चिम बंगाल में यही हाल आलू के किसानों का हुआ था व हालात से हार कर बारह आलू किसानों ने आत्महत्या का मार्ग चुना था।
क्या अजीब विरोधाभास है कि एक तरफ किसान फसल नष्ट होने पर मर रहा है तो दूसरी ओर अच्छी फसल होने पर भी उसे मौत को गले लगाना पड़ रहा है। दोनों ही मसलों में मांग केवल मुआवजे की, राहत की है। जबकि यह देश के हर किसान की शिकायत है कि गिरदावरी यानी नुकसान के जायजे का गणित ही गलत है। और यही कारण है कि किसान जब कहता है कि उसकी पूरी फसल चौपट हो गई तो सरकारी रिकार्ड में उसकी हानि सोलह से बीस फीसद दर्ज होती है और कुछ दिनों बाद उसे बीस रुपए से लेकर दौ सौ रुपए तक के चैक बतौर मुआवजे मिलते हैं। सरकार प्रति हेक्टेयर दस हजार मुआवजा देने के विज्ञापन छपवा रही है, जबकि यह तभी मिलता है जब नुकसान सौ टका हो और गांव के पटवारी को ऐसा नुकसान दिखता नहीं है। यही नहीं, मुआवजा मिलने की गति इतनी सुस्त होती है कि राशि आते-आते वह खुदकुशी के लिए मजबूर हो जाता है। काश, कोई किसान को फसल की वाजिब कीमत का भरोसा दिला पाता तो उसे जान न देनी पड़ती।
नुकसान का आकलन होगा, फिर मुआवजा राशि आएगी, फिर बंटेगी, जूते में दाल की तरह। तब तक अगली फसल बोने का वक्त निकल जाएगा, किसान या तो खेती बंद कर देगा या फिर साहूकार के जाल में फंसेगा। हर गांव का पटवारी इस सूचना से लैस होता है कि किस किसान ने इस बार कितने एकड़ में क्या फसल बोई थी। होना तो यह चाहिए कि जमीनी सर्वे के बनिस्बत किसान की खड़ी-अधखड़ी-बर्बाद फसल पर सरकार को कब्जा लेना चाहिए तथा उसके रिकार्ड में दर्ज बुवाई के आंकड़ों के मुताबिक तत्काल न्यूनतम खरीदी मूल्य यानी एमएसपी के अनुसार पैसा किसान के खाते में डाल देना चाहिए। इसके बाद गांवों में मनरेगा में दर्ज मजदूरों की मदद से फसल कटाई करवा कर जो भी मिले उसे सरकारी खजाने में डालना चाहिए। जब तक प्राकृतिक विपदा की हालत में किसान आश्वस्त नहीं होगा कि उसकी मेहनत, लागत का पूरा दाम उसे मिलेगा ही, खेती को फायदे का व्यवसाय बनाना संभव नहीं होगा।
एक तरफ जहां किसान प्राकृतिक आपदा में अपनी मेहनत व पूंजी गंवाता है तो दूसरी तरफ यह भी डरावना सच है कि हमारे देश में हर साल कोई पचहत्तर हजार करोड़ के फल-सब्जी, माकूल भंडारण के अभाव में नष्ट हो जाते हैं। आज हमारे देश में कोई तिरसठ सौ कोल्ड स्टोरज हैं जिनकी क्षमता 3011 लाख मीट्रिक टन की है। जबकि हमारी जरूरत 6100 मीट्रिक टन क्षमता के कोल्ड स्टोरेज की है। मोटा अनुमान है कि इसके लिए लगभग पचपन हजार करोड़ रुपए की जरूरत है। जबकि इससे एक करोड़ बीस लाख किसानों को अपने उत्पाद के ठीक दाम मिलने की गारंटी मिलेगी। वैसे जरूरत के मुताबिक कोल्ड स्टोरेज बनाने का व्यय सालाना हो रहे नुकसान से भी कम है।
चाहे आलू हो या मिर्च या ऐसी ही फसल, इनकी खासियत है कि इन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। टमाटर, अंगूर आदि का प्रसंस्करण कर वे पर्याप्त लाभ देते हैं। सरकार मंडियों से कर वूसलने में तो आगे रहती है, लेकिन गोदाम या कोल्ड स्टोरेज स्थापित करने की उनकी जिम्मेदारियों पर चुप रहती हे। यही तो उनके द्वारा किसान के शोषण का हथियार भी बनता है। भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 31.8 प्रतिशत खेती-बाड़ी में लगे कोई चौंसठ फीसद लोगों के पसीने से पैदा होता है। पर देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहलाने वाली खेती के विकास के नाम पर बुनियादी सामाजिक सुधारों को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है।
पूरी तरह प्रकृति की कृपा पर निर्भर किसान के श्रम की कीमत पर कभी गंभीरता से सोचा ही नहीं गया। फसल बीमा की कई योजनाएं बनीं, उनका प्रचार हुआ, पर हकीकत में किसान यथावत ठगा जाता रहा- कभी नकली दवा या खाद के फेर में तो कभी मौसम के हाथों। किसान जब कैश क्रॉपयानी फल-सब्जी आदि की ओर जाता है तो आढ़तियों और बिचौलियों के हाथों उसे लुटना पड़ता है। पिछले साल उत्तर प्रदेश में 88 लाख मीट्रिक टन आलू हुआ था तो आधे साल में ही मध्य भारत में आलू के दाम बढ़ गए थे। इस बार किसानों ने उत्पादन बढ़ा दिया। अनुमान है कि इस बार 125 मीट्रिक टन आलू पैदा हो रहा है। कोल्ड स्टोरेज की क्षमता बमुश्किल 97 लाख मीट्रिक टन की है। जाहिर है कि आलू या तो सस्ते-मंदे दामों में बिकेगा या फिर किसान उसे खेत में ही सड़ा देगा। आखिर आलू उखाड़ने, मंडी तक ले जाने के दाम भी तो निकलने चाहिए।
देश में कृषि उत्पाद के न्यूनतम मूल्य, उत्पाद खरीदी, बिचौलियों की भूमिका, किसान को भंडारण का हक, फसल-प्रबंधन जैसे मुद्दे गौण दिखते हैं। सब्जी, फल और दूसरी नकदी फसलों को बगैर सोचे-समझे प्रोत्साहित करने के दुष्परिणाम दलहन, तिलहन और अन्य खाद्य पदार्थों के उत्पादन में संकट की हद तक सामने आ रहे हैं। आज जरूरत इस बात की है कि कौन-सी फसल और कितनी उगाई जाए, पैदा फसल का एक-एक कतरा श्रम का सही मूल्यांकन करे, इसकी नीतियां तालुका या जनपद स्तर पर ही बनें। कोल्ड स्टोरेज या गोदाम पर किसान का कब्जा हो, साथ ही प्रसंस्करण के कारखाने छोटी-छोटी जगहों पर लगें। किसान को न तो कर्ज चाहिए और न ही बगैर मेहनत के कोई छूट या सबसिडी। इससे बेहतर है कि उसके उत्पाद को उसके गांव में ही विपणन करने की व्यवस्था और सुरक्षित भंडारण की स्थानीय व्यवस्था की जाए।

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