तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

मंगलवार, 31 मई 2016

Fishermen In the net of boarder dispute



              विवादों के जाल में मछुआरे

दो महीने पहले रिहा हुए पाकिस्तान के मछुआरों के एक समूह में एक आठ साल का बच्चा अपने बाप के साथ रिहा नहीं हो पाया, क्योंकि उसके कागज पूरे नहीं थे।
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 दो महीने पहले रिहा हुए पाकिस्तान के मछुआरों के एक समूह में एक आठ साल का बच्चा अपने बाप के साथ रिहा नहीं हो पाया, क्योंकि उसके कागज पूरे नहीं थे। वह बच्चा आज भी जामनगर की बच्चा जेल में है। ऐसे ही हाल ही में पाकिस्तान द्वारा रिहा किए गए एक सौ तिरसठ भारतीय मछुआरों के दल में एक दस साल का बच्चा भी है जिसने सौंगध खा ली कि वह भूखा मर जाएगा, लेकिन मछली पकड़ने को अपना व्यवसाय नहीं बनाएगा।
भारत और पाकिस्तान के बीच जब सद्भावना दिखाने की कूटनीतिक जरूरत महसूस की जाती है, तो एक तरफ से कुछ मछुआरे रिहा किए जाते हैं। फिर, वैसा ही कदम दूसरी तरफ से यानी पड़ोसी देश की सरकार की तरफ से भी उठाया जाता है। मानो ये कैदी इंसान नहीं, कूटनीति के मोहरे भर हैं। जब कूटनीतिक गरज हो तब इनमें से कुछ को छोड़ दो, बाकी समय इनकी त्रासदी की तरफ से आंख मूंदे रहो। जब सरबजीत जैसा कोई मामला तूल पकड़ लेता है, तो भावनात्मक उबाल आ जाता है। पर परदेस के कैदियों की बाबत कोई ठोस नीति और आचार संहिता बनाने की पहल क्यों नहीं होती?
वैसे भारत ने अपने सीमावर्ती इलाके के मछुआरों को सुरक्षा पहचान पत्र देने, उनकी नावों को चिह्नित करने और नावों पर ट्रैकिंग डिवाइस लगाने का काम शुरू किया है। श्रीलंका और पाकिस्तान में भी ऐसे प्रयास हो रहे हैं। लेकिन जब तक भारत और पाकिस्तान अपने डाटाबेस को एक दूसरे से साझा नहीं करते, तब तक बात बनने वाली नहीं है। बीते दो दशक के आंकड़े देखें तो पाएंगे कि दोनों तरफ पकड़े गए अधिकतर मछुआरे अशिक्षित हैं, चालीस फीसद कम उम्र के हैं, कुछ तो दस से सोलह साल के। ऐसे में तकनीक से ज्यादा मानवीय दृष्टिकोण इस समस्या के निदान में सार्थक होगा। मानवाधिकारों के मद््देनजर इस बारे में एक साझा नीति बननी चाहिए।
यहां जानना जरूरी है कि भारत और पाकिस्तान के बीच सर क्रीक वाला सीमा विवाद भले न सुलझे, लेकिन मछुआरों को इस जिल्लत से छुटकारा दिलाना कठिन नहीं है। एमआरडीसी यानी मेरीटाइम रिस्क रिडक्शन सेंटर की स्थापना कर इस प्रक्रिया को सरल किया जा सकता है। यदि दूसरे देश का कोई व्यक्ति किसी आपत्तिजनक वस्तु जैसे हथियार, संचार उपकरण या अन्य खुफिया यंत्रों के बगैर मिलता है तो उसे तत्काल रिहा किया जाए। पकड़े गए लोगों की सूचना चौबीस घंटे में ही दूसरे देश को देना जरूरी हो। दोनों तरफ माकूल कानूनी सहायता मुहैया करवा कर इस तनाव को दूर किया जा सकता है। वैसे समुद्री सीमा विवाद के निपटारे के लिए बनाए गए संयुक्तराष्ट्र के कानूनों (यूएन सीएलओ) में वे सभी प्रावधान मौजूद हैं जिनसे मछुआरों के जीवन को नारकीय होने से बचाया जा सकता है। जरूरत तो बस उन प्रावधानों पर ईमानदारी से अमल करने की है।

शुक्रवार, 27 मई 2016

Society needs to change attitude towards women, which can not be done by any law

निर्भया के बाद भी नहीं गई निराशा

                                                                                                                     पंकज चतुर्वेदी

निर्भया की मौत के बाद हुए देशव्यापी आंदोलन व नाबालिग बच्चों से दुष्कर्म के लिए बनाए गए विशेष सख्त कानून में कई मुकदमे दर्ज हो चुके हैं। पूरे देश में यह बात पहुंच चुकी है कि निर्भया कांड के एक नाबालिग आरोपी को छोड़कर बाकी सभी आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है। निर्भया कांड से उपजे जनाक्रोश को कुछ लोग भले ही सत्ता की सीढ़ी में बदलने मंे सफल रहे हों, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि न तो औरतों के प्रति समाज का नजरिया बदला है और न ही कानून की धार...



दिल्ली के ओखला से गत 17 मार्च को एक 15 साल की किशोरी का कुछ बदमाशों ने अपरहण किया, अप्रैल में पुलिस ने उसे बरामद भी किया। पुलिस ने इसे अपरहण के बजाय जबरन शादी का मामला बता दिया। जांच के नाम पर उससे ऐसी पूछताछ हुई कि उसने खुदकुशी करना ही बेहतर समझा। केरल के पेरूक्वाबूर में बीते 28 अप्रैल को जीशा की लाश मिली तो चार साल पहले का दिल्ली के निर्भया कांड की नृशंसता की टीस ताजा हो गई। हालांकि केरल दिल्ली से बहुत दूर है, लेकिन वहां विधानसभा चुनाव हो रहे थे, सो जीशा को लेकर खूब सियासत हुई। 27 साल की बेहद गरीब, दलित जीशा कानून की पढा़ई कर रही थी और बलात्कार के बाद उसे 38 बार चाकू से गोदा गया था, उसकी आंतें सड़क पर पड़ी थीं। उससे एक महीने पहले राजस्थान के बीकानेर जिले के नोखा फरीदाबाद में एक टीवी पत्रकार ने पांचवीं मंजिल से कूद कर आत्महत्या कर ली और इस मामले में एक दरोगा को आत्महत्या के लिए उकसाने के लिए गिरफ्तार किया गया है। दिल्ली के पॉश इलाके वसंत कुंज में ब्यूटी पार्लर चलाने वाली एक लड़की ने आएरोज होने वाली छेड़छाड़ से तंग आ कर बीती 10 मई को अपने किशनगढ़ स्थित मकान में पंखे से लटक कर आत्महत्या कर ली।
 दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालवाल बीते दिनों दिल्ली के रैनबसेरों का हाल जानने पहुंचीं तो उन्हें पता चला कि वहां तैनात अधेड़ उम्र के मर्द आठ से बारह साल की बच्चियों के शरीर को गलत तरीके से छूते हैं। ये तो कुछ महज वे घटनाएं हैं, जिनकी चर्चा मीडिया में खूब हुई। पूरे देश में ऐसी घटनाओं से अखबार पटे होते हैं, अब तो हमें याद रखना भी बंद कर दिया है कि बलात्कार या छेड़खानी से हताश किन लड़कियों ने कब और कहां मौत को गले लगा लिया। यह तब हो रहा है जब निर्भया की मौत के बाद हुए देशव्यापी आंदोलन व नाबालिक बच्चों से दुष्कर्म के लिए बनाए गए विशेष सख्त कानून में कई मुकदमे दर्ज हो चुके हैं। पूरे देश में यह बात पहुंच चुकी है कि निर्भया कांड के एक नाबालिग आरोपी को छोड़ कर बाकी सभी आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी है। निर्भया कांड से उपजे जनाक्रोश को कुछ लोग भले ही सत्ता की सीढ़ी में बदलने मंे सफल रहे हों, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि न तो औरतों के प्रति समाज का नजरिया बदला है और न ही कानून की धार। हालांकि, निर्भया वाले कांड में न्याय तो हो चुका है, अपराधियों को फांसी पर चढ़ाने की विधिसम्मत प्रक्रिया यानी अपील आदि भी चल रही है। कथित नाबालिक आरोपी कानून के मुताबिक, सजा काट कर कहीं गुमनामी में है। सन् 2012 यानी जिस साल निर्भया कांड हुआ, उस साल पूरे देश में दुष्कर्म के 24,923 मामले दर्ज किए गए थे। 2015 में ये अपराध 28.7 प्रतिशत ज्यादा यानी 32,077 दर्ज किए गए। यही नहीं, 2011 में ऐसे मामलों में अपराधियों की दोषसिद्धी की दर 26.4 प्रतिशत थी, जो 2013 में 27.1 और वर्तमान में 28 प्रतिशत ही हो पाई है।
 ये आंकड़े बानगी हैं कि भले ही कानून बदला, खूब बहस हुई, परंतु अभी भी समाज के जिम्मेदार हिस्से का ‘माईंड सेट’ औरतों के प्रति बदला नहीं है व मांग, मोमबत्ती और नारे उछालने वाले असल में इस आड़ में अपनी रोटी सेंक रहे हैं। ये वही लेाग हैं, जो छत्तीसगढ़ में सोनी सोरी या मीना खल्को या ऐसे ही सैकड़ों मामलों में पुलिस द्वारा औरतों के साथ किए गए पाशविक व्यवहार पर केवल इसलिए चुप रहते हैं, क्योंकि वहां उनकी विचारधारा का राज है। कोई साढ़े तीन साल पहले दिल्ली व देश के कई हिस्सों में उस अनाम अंजान ‘दामिनी’ के लिए खड़ा हुआ आंदोलन, आक्रोश, नफरत सभी कुछ विस्मृत हो चुका है। अभी दिल्ली के ईद-गिर्द एक महीने में ही जो कुछ हो गया, उस पर महज कुछ सियासी तीरबाजी या स्थानीय गरीब लोगों द्वारा गुस्से का इजहार, कहीं न कहीं इस बात पर तो सवाल खड़े करता ही है कि कहीं विरोध एक नियोजित एकांकी होता है, जिसके मंचन के पात्र, संवाद, मीडिया आदि सभी कुछ कहीं बुनी जाती है और उसके निर्देशक महज सत्ता तक पहंुचने के लिए बच्चियों के साथ वहशियाना व्यवहार को मौके की तरह इस्तेमाल करते हैं। या फिर जंतर-मंतर पर प्रज्ज्वलित होने वाली मोमबत्तियां केवल उन्हीं लोेगों का झकझोर पा रही हैं, जो पहले से काफी कुछ संवदेनशील हैं। समाज का वह वर्ग, जिसे इस समस्या को समझना चाहिए, अपने पुराने रंग में ही है, इसमें आम लोग हैं, पुलिस भी है और समूचा तंत्र भी। दिल्ली में दामिनी की घटना के बाद हुए देशभर के धरना-प्रदर्शनों में शायद करोड़ों मोमबत्तियां जलकर धुआं हो गई हों, संसद ने नाबालिग बच्चियों के साथ छेड़छाड़ पर कड़ा कानून भी पास कर दिया हो, निर्भया के नाम पर योजनाएं भी हैं, लेकिन समाज के बड़े वर्ग पर दिलोदिमाग पर औरत के साथ हुए दुर्व्यवहार को ले कर जमी भ्रांतियों की कालिख दूर नहीं हो पा रही है। ग्रामीण समाज में आज भी औरत पर काबू रखना, उसे अपने इशारे पर नचाना, बदला लेने, अपना आतंक बरकरार रखने के तरीके आदि में औरत के शरीर को रौंदना एक अपराध नहीं, बल्कि मर्दानगी से जोड़ कर ही देखा जाता है। केवल कुंठा दूर करने या दिमागी परेशानियों से ग्रस्त पुरुष का औरत के शरीर पर बलात हमला महज महिला की अस्मत या इज्जत से जोड़कर देखा जाता है। फांसी की मांग, नपुंसक बनाने का शोर, सरकार को झुकाने का जोर, सबकुछ अपनी जगह लाजिमी हैं, लेकिन जब तक बलात्कार को केवल औरतों की समस्या समझ कर उसपर विचार किया जाएगा, जब तक औरत को समाज की समूची इकाई न मान कर उसके विमर्श पर नीतियां बनाई जाएंगी, परिणाम अधूरे ही रहेंगे। आज भी हमारे देश में किसी को प्रताड़ित करने या किसी के प्रति अपना गुस्सा जताने का सबसे भदेस, लोकप्रिय, सर्वव्यापी, सहज, बेरोकटोक, बगैर किसी कानूनी अड़चन वाला तरीका है- विरोधी की मां और बहन के साथ अपने शारीरिक संबंध स्थापित करने वाली गाली देना। अब तो यह युवाओं का तकियाकलाम सा बनता जा रहा है। आज भी टीवी पर खबरिया चैनलों से ले कर सास-बहू वाले सीरियलों वाले चैनल तक ऐसे विज्ञापन चल रहे हैं जिसमें औरत के शरीर को जितनी गहराई तक देखा जा सके, दिखा कर माल बेचा जा रहा है। आज भी देश में हर रोज करोड़ों चुटकुले, एमएएस क्लीप और वीडियो फुटेज बेचे, खरीदे, शेयर किए जा रहे हैं, जो औरत के कामुक शरीर से संबंधित होते हैं। अकेले फेसबुक पर ही ‘भाभी’ और ‘आंटी’ जैसे पवित्र रिश्ते के नाम पर कोई एक दर्जन पेज हैं, जो केवल नंगापन और अश्लीलता परोस रहे हैं। अखबारों के क्लासीफाइड मसाज, एस्कार्ट के विज्ञापनों से भरे पड़े हैं, जिनके बारे में सभी को पता है कि वे क्या हैं। मामला दिल्ली का हो या फिर बस्तर का, सभी जगह पुलिस का रवैया वैसा ही है, मामले को दबाने, हल्का करने, कुछ छिपाने का प्रयास करने का। जब तक सार्वजनिक रूप से मां-बहन की गाली बकना, धूम्रपान की ही तरह प्रतिबंधित करने जैसे आधारभूत कदम नहीं उठाए जाते, अपने अहम की तुष्टि के लिए औरत के शरीर का विमर्श सहज मानने की मानवीय वृत्ति पर अंकुश नहीं लगाया जा सकेगा। भले ही जस्टिस वर्मा कमेटी सुझाव दे दे, महिला हेल्पलाइन शुरू हो जाए, एक तरफ से कानून और दूसरी ओर से समाज के नजरिए में बदलाव की कोशिश एकसाथ किए बगैर असामनता, कुंठा, असंतुष्टि वाले समाज से ‘रंगा-बिल्ला’ या ‘राम सिंह-मुकेश’ की पैदाइश को रोका नहीं जा सकेगा।

रविवार, 22 मई 2016

Global temparature can be advantage for Inda

raj express 23.5.16
भारत के लिए लाभकारी भी हो सकता है धरती का बढ़ता तापमान
पंकज चतुर्वेदी
संयुक्त राश्ट्र की वैष्विक र्प्यावरण पूर्वानुमान कमेटी ने एक बार फिर चेतावनी दी है कि जिस तरह से धरती का तापमान बढ़ रहा है उससे सन 2050 तक समु्रद के किनारे बसे दुनिया के दस षहरों में तबाही आ सकती है। इसमें भारत के मुंबई, कोलकाता जैसे षहरों पर भी गंभीर खतरा बताया गया है। अनियोजित विकास,बढ़ती आबादी और जलवायु परिवर्तन के चलते समुद्र में पानी की मात्रा बढ़ेगी और इस विस्तार से तटों पर बसे षहर तबाह हो सकते हैं। हालांकि यह कोई नई या पहली बार दीग ई चेतावनी नहीं है। फरवरी 1981 में रायल स्विस सोसायटी के तत्वावधान में स्टोकहोम में संपन्न एक गोश्ठी में कार्बन डाय आक्साईड की बढ़ती मात्रा पर चिंता व्यक्त की गई थी। हां बस उस गोश्ठी में यह तथ्य सामने आया था कि कार्बन की मात्रा बढ़ने का फायदा भारत सहित एषिया के कई देषें व अफ्रीकी दुनिया को होगा। विडंबना है कि अत्याधुनिक मषीनों, कार्बन उर्जा के अंधाधुंध इस्तेमाल से दुनिया का मिजाज बिगाड़ने वाले पष्चिमी देष अब भारत व तीसरी दुनिया के देषें पर दवाब बना रहे हैं कि धरती को बचाने के लिए कार्बन उत्सर्जन कम करकें। हालांकि आज भी भारत जैसे देषें में इसकी मात्रा कम ही है।
Rashtriy sahara 26-5-16
कोई पदो दषक पहले प्रिंस्टन विष्वविद्यायल के एक षोध में बताया गया था कि जिस तरह से धरती पर कार्बन की मात्रा बढ़ रही है उससे अनुमान है कि धरातल पर तापमान में 20 डिगरी तक की बढ़ौतरी हो सकती है। इससे भारत सहीत उत्तरी व पूर्वी अफ्रीका, पष्चिम एषिया आदि इलाकों में बारिष की मात्रा बढेगी, जबकि अमेरिका, रूस सहीत पष्चिमी देषों में बारिष कम होगी। अनुमान है कि इस बदलाव से आने वाले 50 सालों में भारत सहित वर्शा संभावित देषें में खेती संपन्न होगी। इन इलाकों में खेत इतना सोना उगलेंगे कि वे खाद्य मामले में आत्मनिर्भर हो जाएंगे तथा आयात पूरी तरह बंद कर देंगे। यह भी सही है कि कार्बन डाय आक्साईड के कारण तापमान में बढ़ौतरी के चलते एंटार्कटिका, ग्रीन लैंड और आर्कटिक प्रदेषों में बर्फ पिघलेगी। समझा जाता है कि वहां से इतनी बर्फ पिघलेगी कि विष्व में सागर का जल स्तर तीन से 18 मीटर तक ऊपर उठेगा और इससे 10 प्रतिषत तटीय भूमि जल-मग्न हो सकती है।
धरती में कार्बन का बड़ा भंडार जंगलों में हरियाली के बीच है। पेड़ , प्रकाष संष्लेशण के माध्यम से हर साल कोई सौ अरब टन यानि पांच फीसदी कार्बन वातावरण में पुनर्चक्रित करते है। आज विष्व में अमेरिका सबसे ज्यादा 1,03,30,000 किलो टन कार्बन डाय आक्साईड उत्सर्जित करता है जो कि वहां की आबादी के अनुसार प्रति व्यक्ति 7.4 टन है।  उसके बाद कनाड़ा प्रति व्यक्ति 15.7 टन, फिर रूस 12.6 टन हैं । जापान, जर्मनी, द.कोरिया आदि औद्योगिक देषो में भी कार्बन उत्सर्जन 10 टन प्रति व्यक्ति से ज्यादा ही है। इसकी तुलना में भारत महज 20 लाख सत्तर हजार किलो टन या प्रति व्यक्ति महज 1.7 टन कार्बन डाय आक्साईड ही उत्सर्जित करता है। अनुमान है कि यह 203 तक तीन गुणा यानि अधिकतम पांच तक जा सकता है। इसमें कोई षक नहीं कि प्राकृतिक आपदाएं देषों की भौगोलिक सीमाएं देख कर तो हमला करती नहीं हैं। चूंकि भारत नदियों का देष है,  वह भी अधिकांष ऐसी नदियां जो पहाड़ों पर बरफ पिघलने से बनती हैं, सो हमें हरसंभव प्रयास करने ही चाहिए। प्रकृति में कार्बन की मात्रा बढने का प्रमुख कारण है बिजली की बढती खपता। सनद रहे हम द्वारा प्रयोग में लाई गई बिजली ज्यादातर जीवाश्म ईंधन (जैसे कोयला, प्राकृतिक गैस और तेल जैसी प्राकृतिक चीजों) से बनती है। इंधनों के जलने से कार्बन डाइऑक्साइड निकलता है। हम जितनी ज्यादा बिजली का इस्तेमाल करेंगे, बिजली के उत्पादन के लिए उतने ही ज्यादा ईंधन की खपत होगी और उससे उतना ही ज्यादा कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित होगा। फिर धरती पर बढती आबादी और उसके द्वारा पेट भरने के लिए उपभेग किया गया अन्न भी कार्बन बढौतरी का बड़ा कारण है। खासकर तब जब हम तैयार खाद्य पदार्थ खाते हैं, या फिर हम ऐसे पदार्थ खाते हैं जिनका उत्पादन स्थानीय तौर पर नहीं हुआ हो।
यहां एक बात और गौर करने वाली है कि भले ही पष्चिमी देष इस बात से हमें डरा रहे हों कि जलवायु परिवर्तन से हमारे ग्लेषियर पिघल रहे हैं व इससे हमारी नदियांं के अस्तित्व पर संकट है, लेकिन वास्तविकता में हिमालय के ग्लेषियरों का आकार बढ़ रहा है।  हमारे पांच से 10 वर्ग किलोमीटर आकार के किछकुंदन, अख्ताष और च्योंकुंदन के अलावा अन्य सात बगैर नाम वाले ग्लेषियरों का आकार साल दर साल बढ़ रहा है। कोई चार साल पहले तत्कालीन र्प्यावरण मंत्री जयराम रमेष को भी दाल में कुछ काला लगा था और उन्होंने विदेषी धन पर चल रहे षोध के बजाए वीके रैना के नेतृत्व में वैज्ञानिकों के एक दल को हिमनदों की हकीकत की पड़ताल का काम सौंपा था। इस दल ने 25 बड़े ग्लेषियरों को लेकर गत 150 साल के आंकड़ों को खंगाला और पाया कि हिमालय में ग्लेषियरों के पीछे खिसकने का सिलसिला काफी पुराना है और बीते कुछ सालों के दौरान इसमें कोई बड़ा बदलाव नहीं देखने को मिला है। पष्चिमी हिमालय की हिंदुकुष और कराकोरम पर्वत श्रंखलाओं के 230 ग्लेषियरों के समूह समस विकसित हो रहे है। पाकिस्तान के के-2 और नंदा पर्वत के हिमनद 1980 से लगातार आगे बढ़ रहे है। जम्मू-कष्मीर के केंग्रिज व डुरंग ग्लेषिर बीते 100 सालों के दौरान अपने स्थान से एक ईंच भी नहीं हिले है।।  सन 200 के बाद गंगोत्री के सिकुड़ने की गति भी कम हो गई है।  इस दल ने इस आषंका को भी निर्मूल माना था कि जल्द ही ग्लेषियर लुप्त हो जाएगे व भारत में कयामत आ जाएगी। यही नहीं ग्लेषियरों के पिघलने के कारण सनसनी व वाहवाही लूटने वाले आईपीसीसी के दल ने इन निश्कर्शों पर ना तो कोई सफाई दी और ना ही इस का विरोध किया। जम्मू कष्मीर विष्वविद्यालय के प्रो. आरके गंजू ने भी अपने षोध में कहा है कि ग्लेषियरों के पिघलने का कारण धरती का गरम हो ना नहीं हैं। यदि ऐसा होता तो पष्मित्तर पहाड़ों पर कम और पूर्वोत्तर में ज्यदा ग्लेषियर पिघलते, लेकिन हो इसका उलटा रहा है।
इसमें कोई षक नहीं  कि ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन और ग्लेषियर हमारे लिए उतने ही जरूरी है जितना साफा हवा या पानी, लेकिन यह भी सच है कि अभी तक हम इन तीनों मसलों के अनंत सत्यों को पहचान ही नहीं पाए है आसैर पूरी तरह पष्चिमी देषों के षोध व चेतावनियों पर आधारित अपनी योजनांए बनाते रहते हैं। ग्लेषियर हमारे देष के अस्तित्व की पहचान हैं और इनका अस्तित्व मौसम के चक्र में आ रहे बदलाव पर काफी कुछ निर्भर है। हमें यह समझना होगा कि कुछ पष्चिमी देष इस अभेद संरचना के रहस्यों को जानने में रूचि केवल इस लिए रखते हैं ताकि भारत की किसी कमजोर कड़ी को तैयार किया  जा सके। इसी फिराक में ग्लोबल वार्मिंग व ग्लेषियर पिघलने के षोर होते हैं और ऐसे में षोध के नाम पर अन्य हित साधने का भी अंदेषा बना हुआ है। ऐस अंतरविरोधें व आषंकाओं के निर्मूलन का एक ही तरीका है कि राज्य में ग्लैषियर अध्ययन के लिए  सर्वसुविधा व अधिकार संपन्न प्राधिकारण का गठन किया जाए जसिका संचालन केंद्र के हाथों में हो।

When society work together for conservation of traditional water knowledge

समाज पेश कर रहा पानी सहेजने की मिसाल


                                                                पंकज चतुर्वेदी
जब बात हाथ से निकल गई, जब सूखे के दुष्प्रभाव अपने चरम पर आ गए, तब दिल्ली के मीडिया को खयाल आया कि उनसे महज पांच सौ किलोमीटर दूर बुंदेलखंड की आधी आबादी पानी की कमी के कारण पलायन कर चुकी है।
सूखे कुएं, बंद घरों और तड़क चुकी जमीन के फोटो के साथ आए-दिन खबरें तैर रही हैं। यह भी एक नपा-तुला गणित हो चुका है। दिल्ली से पत्रकार जाता है, वहां वह किसी एनजीओ के सदस्य से मिलता है और वह अपने नजरिये से हालात दिखा देता है। इसी तरह रपट फाइल हो जाती है। ऐसे में वे लोग तो गुमनाम ही रहते हैं, जिनके कार्य असल में पूरे समाज व सरकार के लिए अनुकरणीय बन सकते हैं।
लगातार तीसरे साल अल्प वर्षा की मार से कराहते, बेहाल बुंदेलखंड में गांव और अपने जीवन तक से पलायन, प्यास से परेशानी और पेट पालने की जटिलताओं की कहानियां बढ़ती गरमी के साथ तेजी से फैल रही हैं। जब हालात पूरी तरह हाथ से निकल गए, तब मीडिया, प्रशासन और समाज की तंद्रा टूटी और सरकारी शेर कागजों पर दहाड़ने लगे।
इस दौड़-भाग से उपजी मृग-मरीचिका प्यासे बुंदेलखंडियों में भ्रम ही फैला रही है। ऐसी निराशा के बीच समाज के वे लोग चर्चा में हैं ही नहीं, जिन्होंने इस सूखे व जल-संकट के समक्ष अपने हथियार नहीं डाले, विकट हालात में भी स्थानीयता के पारंपरिक ज्ञान को याद किया और 45 डिग्री से अधिक गर्मी वाले इलाकों में भी सूखा उन पर बेअसर है।
कुएं में बोरिंग, तालाब की सफाई
एक दशक के दौरान कम से कम तीन बार उम्मीद से कम मेघ बरसना बुंदेलखंड की सदियों की परंपरा रही है। यहां के पारंपरिक कुएं, तालाब और पहाड़ कभी भी समाज को इंद्र की बेरुखी के सामने झुकने नहीं देते थे। जिन लोगों ने तालाब बचाए, वे प्यास व पलायन से निरापद रहे। ब्रितानी हुकूमत के दौर में 'पॉलिटिकल एजेंट' का मुख्यालय रहे नौगांव जनपद के करारा गांव की जल-कुंडली आज शेष बुंदेलखंड से बिल्कुल विपरीत हो गई है।
पहले यहां के लोग भी पानी के लिए दो से तीन किलोमीटर दूर जाया करते थे। इस साल जनवरी में जब ग्रामीणों को समझ आ गया कि सावन बहुत संकट के बाद आएगा, तो उन लोगों ने गांव के ही एक कुएं के भीतर बोरिंग करवा दी, जिसमें खूब पानी मिला। फरवरी आते-आते पूरे गांव ने जुटकर अपने पुराने 'बड़े तालाब' की सफाई, मरम्मत व गहरीकरण कर दिया। लगभग सौ फुट लंबा एक पाईप कुएं से तालाब तक डाला गया। फिर दो महीने तक, जब भी बिजली आती, मोटर चलाकर तालाब भरा जाता। आज यहां भरे पानी से घर के काम व मवेशियों के लिए तो पर्याप्त पानी मिल ही रहा है, पूरे गांव के अन्य कुओं व हैंडपंपों का जलस्तर भी शानदार हो गया है। सब एकमत हैं कि इस बार बारिश से तालाब को भरेंगे।
पहाड़ बचाए, पानी भी बच गया
पानी बचाने के लिए पहाड़ों की महत्वपूर्ण भूमिका को महसूस किया घुवारा ब्लॉक के बमनौराकलां गांव के समाज ने। दस हजार से अधिक आबादी और ढाई हजार मवेशियों वाला यह गांव बुंदेलखंड की अन्य बसाहटों की ही तरह चारों तरफ पहाड़ों से घिरा है। पिछली बारिश शुरू होने से पहले समाज ने पहाड़ों पर ऊपर से नीचे की तरफ लगभग डेढ़ किलोमीटर लंबाई की एक फुट तक गहरी नालियां बना दीं।
जब पानी बरसा, तो इन नालियों के दस सिरों के माध्यम से बरसात की हर बूंद गांव के विशाल 'चंदिया तालाब' में जमा हो गई। आज पूरे गांव में कोई बोरवेल सूखा नहीं है, घरों में 210 नलों के जरिए पर्याप्त जल पहुंच रहा है। अब ग्रामीणों ने नालियों को और गहरा करने व पहाड़ पर हरियाली का संकल्प लिया है।
ध्यान रहे, बुंदेलखंड के सभी गांव, कस्बे, शहर की बसाहट का यही पैटर्न है: चारों ओर ऊंचे-ऊंचे पहाड़, पहाड़ की तलहटी में दर्जनों छोटे-बड़े ताल-तलैया और उनके किनारों पर बस्ती। पहाड़ के पार घने जंगल व उसके बीच से बहती बरसाती या छोटी नदियां। आजादी के बाद यहां के पहाड़ बेहिसाब काटे गए, जंगलों का सफाया हुआ व पारंपरिक तालाबों को पाटने में किसी ने संकोच नहीं किया। विशाल तालाब बुंदेलखड के हर गांव-कस्बे की सांस्कृतिक पहचान हुआ करते थे। जिन्होंने पहाड़ बचाए, वे प्यास से नहीं हारे।
तालाब गहरा हुआ, मुफ्त खाद मिली
छतरपुर नगरपालिका क्षेत्र में घरों तक नल से पानी पहुंचाने की परियोजना में कोई चार दशक से खौंप तालाब की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। खौंप, महोबा रोड पर शहर से लगभग आठ किलोमीटर दूर एक गांव है। यहां का 101 एकड़ का विशाल चंदेलकालीन तालाब इस बार गरमी शुरू होने से पहले ही तलहटी दिखा गया। शहर के कुछ उत्साही युवकों ने अपनी हिम्मत व संसाधन से इसके गहरीकरण का काम शुरू किया, तो 18 दिन में दस हजार ट्रॉली गाद निकाल दी गई। इस गाद को अपने खेतों में गिरवाने के लिए दूर-दूर के किसान अपना नंबर लगा रहेे थे। जिनके घर अपना ट्रैक्टर था, वे तालाब की सफाई भी करते और प्रतिफल में 'गाद रूपी सोना" अपने साथ ले जाते। अनुमान है कि यदि इस साल औसत भी बारिश होती है, तो खौंप ताल की जलग्रहण क्षमता इतनी हो गई है कि पूरे साल आठ घंटे नल से पानी मिलेगा!
पानी के बचत खाते का 'ब्याज'
दमोह शहर की जनता भले ही एक-एक बूंद पानी के लिए त्राहि-त्राहि कर रही हो, लेकिन जिला मुख्यालय के करीबी गांव इमलाई में पानी का किसी तरह का संकट नहीं है। यहां की 'तेंदू तलैया' का गहरीकरण व सफाई खुद गांव वालों ने कर ली थी। जब थोड़ी-सी बारिश की हर बूंद इस कुदरती बचत खाते में जमा हुई, तो उसके ब्याज से ही गांव वालों का कंठ तर हो गया। इसी जिले के तेंदूखेड़ा के पाठादो व उससे सटे तीन गांवों को पानीदार बनाने के लिए ग्रामीणों ने एक उपेक्षित पड़ी झिरिया का सहारा लिया। झिरिया यानी छोटा-सा झरना, जहां से पानी का सोता फूटता है।
यह झिरिया बरसात में खूब पानी देती है, गरमी में इसकी रफ्तार कम हो जाती है। गांव वालों ने इस झिरिया से निकलकर बहने वाले पानी के रास्ते में एक तलैया बना दी। एक कुआं भी खोद दिया। नतीजा, बगैर किसी बड़े व्यय के पूरे इलाके की नमी बरकरार है। गांव के बुजुर्ग पूरे दिन यहीं रहते हैं व लोगों को किफायत से पानी खर्चने की सीख देते हैं।
यह जान लें कि पानी तो उतना ही बरसेगा जितना बरसना है। इसे सहेजना हमारे हाथ में है। आधुनिक इंजीनियरिंग व तकनीक यहां कारगर नहीं है। हमें अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा। समाज जानता है कि तालाब महज पानी जमा नहीं करते, वे बेकार हो जाने वाले बारिश के पानी को साधते भी हैं।
तालाबों की आधुनिकता से नदी-दरिया में बहकर जाने वाला बरसात का पानी गंदला नहीं होता, क्योंकि तालाब पानी की मिट्टी को अपने में जज्ब कर लेते हैं। यहां से उछलकर गया पानी ही नदी में जाता है। यानी पहाड़ या जमीन से जो मिट्टी तालाब की तलहटी में आई, उससे खेत को भी संपन्नाता मिलती है। ऐसे लोक ज्ञान को महज याद करने, उसमें समय के साथ मामूली सुध्ाार करने और उनका क्रियान्वयन स्थानीय स्तर पर ही करने से हर इंसान को जरूरत मुताबिक पानी मिल सकता है। जरूरत है ऐसे ही सफल प्रयोगों को सहेजने, सराहने और संवारने की।
फैल रही है चेतना
कुछ लोग ऐसे उदाहरणों से सीख लेकर आने वाले दिनों में पानी को सहेजने के लिए कमर कस चुके हैं। पन्नाा के ध्ार्मसागर को अपने पारंपरिक रूप में लौटाने के लिए वहां का समाज भरी गरमी में सारे दिन कीचड़ में उतर रहा है। बस्तर के दलपतसागर तालाब को कांक्रीट का जंगल बनने से बचाने को पूरा समाज लामबंद हो गया है। झारखंड के गुमला जिले के खरतंगा पहाड़ टोला के लोगों का संकल्प तारीफ के काबिल है। उन लोगों ने आपस में मिलकर 250 फीट लंबा, 200 फीट चौड़ा और 10 फीट गहरा तालाब खोद लिया।
यदि यह ताल भर जाता है, तो पूरे इलाके में कभी जल-संकट नहीं होगा। नौगांव शहर के जब सारे नलकूप सूख गए व पानी मिलने की हर राह बंद हो गई, तो वहां के समाज ने एक छोटी-सी स्थानीय नदी को सहेजने का जिम्मा उठा लिया। कुम्हेडी नदी बीते कई दशकों से गंदगी, रेत व गाद के चलते चुक गई थी। लोगों ने चंदा जोड़ा और उसकी सफाई व उस पर एक स्टॉप डैम बनाना शुरू कर दिया।
जल संरक्षण की पाठशाला बना चुलुवनाहल्ली गांव
पानी सहेजने के कई उदाहरण बस्तर से लेकर झारखंड तक में हैं, जहां समाज ने ही अपनी समस्या का समाध्ाान पारंपरिक ज्ञान के सहारे खोज लिया। कर्नाटक में तो समाज ने अपने व्यय व श्रम से खूब तालाब बना डाले और सूखे को ठेंगा दिखा दिया। कभी सोना उगलने वाली ध्ारती कहलाने वाले कोलार (देश की सबसे पुरानी स्वर्ण खदानों की धरती, जो अब बंद हो गई हैं) के पास के छोटे-से गांव चुलुवनाहल्ली में न तो कोई प्रयोगशाला है और न ही कोई प्रशिक्षण संस्थान, फिर भी यहां देश के कई राज्यों के अफसर, जल विशेषज्ञ व स्वयंसेवी संस्थाओं के लोग कुछ सीखने आ रहे हैं।
ऊंचे पहाड़ों व चट्टानों के बीच बसा यह गांव, कर्नाटक के दूसरे पिछड़े गांवों की ही तरह हुआ करता था। बीते दस साल तो इसके लिए बेहद त्रासदीपूर्ण रहे। गांव के एकमात्र तालाब की तलहटी में दरारें पड़ गई थीं, जिससे उसमें बारिश का पानी टिकता ही नहीं था। तालाब सूखा तो गांव के सभी कुएं-हैंडपंप व ट्यूबवेल भी सूख गए। साल के सात-आठ महीने तो सारा गांव महज पानी जुटाने में खर्च करता था। खेती-किसानी चौपट थी।
गांव के एक स्वयं-सहायता समूह 'गर्जन' ने इस त्रासदी से लोगों को उबारने का जिम्मा उठाया। लोगों को यह समझाने में आठ महीने लग गए कि बगैर सरकारी ठेके व इंजीनियर के, गांव वाले भी कुछ कर सकते हैं। जब अनपढ़ ग्रामीणों को उनके पारंपरिक ज्ञान का वास्ता दिया गया, तो वे माने कि भूजल को रिचार्ज कर गांव को जल समस्या से मुक्त किया जा सकता है। फिर समाज के हर वर्ग के प्रतिनिधित्व के साथ 'श्री गंगाम्बिका तालाब विकास समिति' का गठन हुआ।
झील की सफाई, गहरीकरण व मरम्मत की पूरी योजना गांव वालों ने ही बनाई व इस पर 9 लाख 58 हजार के संभावित व्यय का प्रस्ताव बनाकर राज्य सरकार को भेज दिया गया। बजट को मंजूरी भी मिल गई और गांव वालेे तालाब को नया रूप देने के लिए एकजुट हो गए। दिन-रात काम हुआ। प्रस्ताव में बताए गए सभी काम तो हुए ही, दो चेक-डैम और तीन बोल्डर-डैम भी बना दिए गए। साथ ही नहर की खुदाई, पानी के बहाव पर नियंत्रण के लिए एक रेगुलेटर भी लगा दिया गया। यही नहीं, गांव के स्कूल और मंदिर के आसपास के गहरे गड्ढों को भी भर दिया गया। तिस पर भी सरकार से मिले पैसों में से साठ हजार रुपए बच गए! यहां मेहनत-मजदूरी का सारा काम गांव वालों ने मिलकर किया।
खुदाई व ढुलाई के लिए दो जेसीबी मशीनें और तीन ट्रैक्टर किराए पर लिए गए। खर्च का विवरण नियमित रूप से एक कागज पर लिखकर सार्वजनिक कर दिया जाता। नहर के पास बगीचा भी बन गया है। यह समिति अब हरियाली बढ़ाने पर काम कर रही है। अब सारे गांव के भूजल स्रोतों में पर्याप्त पानी है, वहीं खेतों को बेहतरीन तरावट मिल रही है।
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शनिवार, 21 मई 2016

Conservation of traditional water resources are only solution to water equation

जल संकट से मुक्ति का यज्ञ

परंपरागत जल स्रोतों को सहेजने-संवारने को अनिवार्य आवश्यकता बता रहे हैं 

पंकज चतुर्वेदी

बढती आबादी, जल की जरुरत में इजाफा और जलवायु परिवर्तन के अबूझ खेल के सामने लोक विज्ञान की जल संरक्षण नीतियों की शरण में जाना ही एकमात्र निदान है 13


देश में इस समय गरमी तो चरम पर है ही, सूखे की त्रसदी भी विकट रूप से सामने आ रही है। ऐसी विपरीत परिस्थिति में भी कुछ गांव-मजरे ऐसे भी हैं जो रेगिस्तान में ‘नखलिस्तान’ की तरह जल संकट से निरापद हैं। असल में यहां के लोग पानी जैसी बुनियादी जरुरत के लिए सरकार पर निर्भरता और प्रकृति को कोसने की आदत से मुक्त हैं। इन लोगों ने आज की इंजीनियरिंग और डिग्रीधारी ज्ञान के बजाय पूर्वजों के देशज ज्ञान पर ज्यादा भरोसा किया। हमें यह जानना चाहिए कि वैदिक काल से लेकर वर्तमान तक विभिन्न कालखंडों में समाज के द्वारा अपनी जरूरत के मुताबिक बनाई गई जल संरचनाओं और जल प्रणालियों के अस्तित्व के अनेक प्रमाण मिलते हैं, जिनमें तालाब सभी जगह मौजूद रहे हैं। रेगिस्तान में तो तालाबों को सागर की उपमा दे दी गई। ऋग्वेद में सिंचित खेती, कुओं और गहराई से पानी खींचने वाली प्रणालियों का उल्लेख मिलता है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी जल संरचनाओं के बारे में अनेक विवरण उपलब्ध हैं। इन विवरणों से पता चलता है कि तालाबों का निर्माण राज्य की जमीन पर होता था। स्थानीय लोग तालाब निर्माण की सामग्री जुटाते थे। असहयोग और तालाब को नुकसान पहुंचाने वालों पर राजा द्वारा जुर्माना लगाया जाता था। 1जो लेाग इस समय ताल-तलैयों, नदी-नालों को संवारने में लग गए हैं वे पानी की कमी से उत्पन्न होने वाली समस्याओं से मुक्ति का यज्ञ कर रहे हैं। आमतौर पर हमारी सरकारें बजट का रोना रोती हैं कि पारंपरिक जल संसाधनों की सफाई के लिए बजट का टोटा है। हकीकत में तालाबों की सफाई और गहरीकरण अधिक खर्चीला काम नही है। इसके लिए भारी-भरकम मशीनों की जरुरत भी नहीं होती। तालाबों की गादे सड़ रही पत्तियों और अन्य अपशिष्ट पदार्थो की देन होती है। यह उम्दा दर्जे की खाद है। रासायनिक खादों ने किस कदर जमीन को चौपट किया है, यह किसान जान चुके हैं और अब उनका रुख कंपोस्ट एवं अन्य देशी खादों की ओर है। किसानों को यदि इस खादरूपी कीचड़ की खुदाई का जिम्मा सौंपा जाए तो वे सहर्ष राजी हो जाते हैं। राजस्थान के झालावाड़ जिले में ‘खेतों मे पालिश करने’ के नाम से यह प्रयोग अत्यधिक सफल और लोकप्रिय है। कर्नाटक में समाज के सहयोग से करीब 50 तालाबों का कायाकल्प हुआ है, जिसमें गाद की ढुलाई मुफ्त हुई यानी ढुलाई करने वाले ने इस कीमती खाद को बेचकर पैसा कमाया। सिर्फ आपसी तालमेल, समझदारी और तालाबों के संरक्षण की दिली भावना हो तो न तो तालाबों में गाद बचेगी और न ही सरकारी अमलों में घूसखोरी की कीच होगी। जल संकट से जूझ रहे समाज ने नदी को तालाब से जोड़ने, गहरे कुओं से तालाब भरने, पहाड़ पर नालियां बना कर उसका पानी तालाब में जुटाने जैसे अनगिनत प्रयाग किए हैं और प्रकृति के कोप पर विजय पाई है। यह जरूरी है कि लोग पारंपरिक जल संसाधनों-तालाब, बावड़ी, कुओं की सुधि लें। उनकी सफाई, मरम्मत का काम करें। ऐसा करते समय बस एक बात ख्याल करना होगा कि पारंपरिक जलस्रोतों को गहरा करने में भारी मशीनों के इस्तेमाल से परहेज ही करें। मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले के अंधियारा तालाब की कहानी गौर करें। एक अर्सा पहले यहां सूखा राहत के तहत तालाब गहराई का काम हुआ। इंजीनियर साहब ने तालाब के बीचों-बीच खूब गहरी खुदाई करवा दी। जब पानी बरसा तो तालाब एक रात में ही लबालब हो गया, लेकिन अगली सुबह ही उसकी तली दिखने लगी। असल में बगैर सोचे-समङो की गई खुदाई में तालाब की वह ङिार टूट गई, जिसका संबंध सीधे इलाके की ग्रेनाईट भू संरचना से था। पानी आया और ङिार से बह गया। 1तालाब महज एक गड्ढा नहीं है, जिसमें बारिश का पानी जमा हो जाए और लोग इस्तेमाल करने लगें। तालाब कहां खुदेगा, इसको परखने के लिए वहां की मिट्टी, जमीन पर जल आगमन एवं निगमन की व्यवस्था, स्थानीय पर्यावरण का खयाल रखना भी जरूरी होता है। वरना यह भी देखा गया है ग्रेनाईट संरचना वाले इलाकों में कुएं या तालाब खुदे, रात में पानी भी आया और कुछ ही घंटों में कहीं बह गया। इसी तरह यदि बगैर सोचे-समङो पीली या दुरमट मिट्टी में तालाब खोदा तो धीरे-धीरे पानी जमीन में बैठेगा, फिर दल-दल बनाएगा। क्या हम जानते हैं कि बुंदेलखंड में तालाबों की देखभाल का काम पारंपरिक रूप से ढीमर समाज के लोग करते थे। बदले में तालाब की मछली, सिंघाड़े आदि पर उनका हक होता। इसी तरह प्रत्येक इलाके में तालाबों को सहेज ने का जिम्मा समाज के एक वर्ग ने उठा रखा था। उसकी रोजी-रोटी की व्यवस्था वही करते थे जो तालाब के जल का इस्तेमाल करते थे। तालाब लोक की संस्कृति-सभ्यता का अभिन्न अंग हैं। इन्हें सरकारी बाबुओं पर नहीं छोड़ा जा सकता।1यह जान लें कि रेल से पानी पहुंचाने जैसे प्रयोग तात्कालिक उपाय भर हैं। बढती आबादी, जल की जरुरत में इजाफा और जलवायु परिवर्तन के अबूझ खेल के सामने लोक विज्ञान की जल संरक्षण नीतियों की शरण में जाना ही एकमात्र निदान है। अगर किसी बड़े बांध पर हो रहे समूचे व्यय के बराबर राशि एक बार एक साल विशेष अभियान चला कर पूरे देश के तालाबों की संवारने, उन्हें अतिक्रमण से मुक्त करने, उनकी गाद हटाने, पानी की आवक-जावक के रास्ते को निरापद बनाने में खर्च कर दिया जाए तो भले ही कितनी भी कम बारिश हो, न तो देश का कोई कंठ सूखा रहेगा और न ही जमीन की नमी खत्म होगी।1(पर्यावरण मामलों के जानकार लेखक ने बुंदेलखंड के तालाबों पर गहन शोध किया है)

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