तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

when question answered by mother-sister slang

क्या सवाल खडा करना देशद्रोह होता है ?

जब कभी देश-दुनिया में कुछ ऐसी हलचल होती है जिसमें विचारों और मान्यताओं में विविधता होती है, फेसबुक पर बहुत से लेागों को मुझे अलविदा कहना होता है, कुछ मेरे मित्र सूची में होते हैं , कुछ ऐसे ही आगंतुक। जाहिर है कि यह एक आभासी दुनिया है व कहा जाता है कि इसमें रि्श्‍ते ना तो भावनात्मक है और ना चिरस्थाई और ना ही यहां बने रिश्‍तों का कोई महत्व है। यह सभी मानते हैं कि फेसबुक जैसे सोशल यानि सामाजिक (?) मंच विचारों के निर्वाध प्रवाह के माध्यम हैं लेकिन जब असहमति के विचार असामाजिकता की चरम सीमा तक चले जाएं तो अपने यहां होने की जरूरत पर एक दोराहे पर खड़ा पाता हूं।
हाल का मसला है पाकिस्तान में घुस कर भारतीय सेना की कार्यवाही को ले कर। शुरूआत में जो खबर आई, उससे अच्छा लगा कि भारतीय सेना ने आतंकवादियों पर सीधे कार्यवाही कर एक दृढ संदेश दिया। कहने की जरूरत नहीं है कि देश पर सभी का हक है और देशहित पर सभी एक हैंं। भारतीय सेना किसी दल की नहीं हैं और सरकारे बदलने के साथ सेना का चरित्र नहीं बदलता।
कल शाम पाकिस्तान के अखबारों ने अपना पक्ष रखा और एक खबर लगाई कि भारत का एक जवान उनके कब्जे में है। उसका नाम, पहचान सभी कुछ पाकिस्तान की साईट पर था। यहां से सवाल उठा कि भारतीय फौज दावा कर रही थी कि उसको कोई नुकसान नहीं हुआ, क्या यह संदेहास्पद तो नहीं है? क्योंकि सुबह होते-होते भारतीय सेना का बयान आ गया कि वह जवान मय हथियार के रास्ता भटक कर पाकिस्तान पहुंच गया था।अब तनाव के दिनों में सीमा पर कभ्‍ज्ञी कोई भी फौजी अकेले तो घूमता नहीं है, वह एक चार या ऐसी ही बटालियन में होता हैा उसके बाद जंग के भय के बीच खाली करवाए जा रहे सीमावर्ती गांवों में सामान ढोने, इलाके में पेट्रोल-डीजल की लंबी-लंबी लाईने लगने, कालाबाजारी होने की खबरें भी आईं। मैंने लिखा कि असल में जंग की मांग करने वालें ऐसे कालाबाजारी और मनमाने दाम वसूलने वाले सबसे ज्यादा होते हैं, लेकिन यदि जंग के हालात हों तो पूरा देश एक होता है।
मेरे सवाल थे:-
1. क्या कथित सर्जिकल स्ट्राईक ठीक वैसी ही थी जैसा दावा किया जा रहा है या फिर पाकिस्तान का दावा, जिसमें हमारे कुछ जवानों के शहीद होने की बात है, वह सच है ।
2. सीमावर्ती इलाकों में गांव खाली करवाने में सरकारी गाड़िया क्यों नहीं पुहंच रही कि लोगों को पांच गुना पैसा दे कर लोडर बुक करने पड रहे हैं।
इस पोस्ट के बाद कई एक लेाग मुझे वामपंथी कह रहे थे व गालियां दे रहे थे तो कुछ लोग जिनकी दीवार जयश्रीराम के नारों व संघ के सेवकों के चित्रों से सजी थीं, मां-बहन की गालियां दे रहे थे।
क्या वामपंथी सरकारों का देश के विकास में कोई योगदान नहीं है? क्‍या कथित देशभक्‍तों ने कभी वामपंथियों के सहयोग से सरकारे नहीं चलाईं ,क्या यह कामना करना कि युद्ध को टालना चाहिए, देशद्रोह है? जो युद्धोन्माद फैला रहे हैं उनके घर आाजादी की लड़ाई से ले कर अभी तक कभी तिरंगे में लिपटी लाश आई नहीं। उन्हे पता नहीं कि किसी घर का एक कमाने वाला सदस्य जब शहीद होता है तो उसके बाद उनका जीवन कैेस चलता है। नारेबाजों ने कभी मथुरा जिले में जा कर हेमराज के परिवार को पूछा नहीं कि उस समय किए गए कितने वायदे पूरे हुए। वे तो सम्मान में झुके शस्त्र, हवा में गोली, नारे और मत विरोधियों को मां-बहन की गालियां बक कर अपने देशप्रेम का वजीफा हासिल कर लेते हैं। ये वहीं --नानस्टेट एक्टर’ हें जिनसे पाकिस्तान अपने कुकर्मों का पल्ला झाड़ता रहा है।
जो लेाग सवाल करने से डरते हैं, जो लोकतंत्र के अभिन्न अंग, प्रतिरोध से भयभीत रहते हैं, तो तर्क, तथ्य और तंत्र से बच कर नारों में भरोसा करते हैं, वे सवालों पर मां-बहन की गालियों क्यों देने लगते हैं ?
यदि आप युद्ध समर्थक हैं तो जान लें कि आप देश के विकास के समर्थक तो नहीं हैं। एक बात और यदि युद्ध थोपा जाए तो उसका ताकत से जवाब देना देश का सबसे बड़ा कर्तव्य होता है। इससे पहले हमें अपने प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करना जरूरी है कि कोई ऐरा-गैरा पठानकोट या उड़ी के सेन्य इलाके में घुस न सके।
सवाल फिर वहीं खड़ा है कि क्या सवाल करना, इतना तकलीफदेह होता है कि प्रश्‍नकर्ता की मां-बहन को गालियां दी जाएं? सवाल इतने गैरजरूरी है कि उसको उठाने वाले को वामपंथी कह कर सवाल को मोथरा कर दो। अभी रिहाई मंच वाली पोस्ट पर मंच के मिश्राजी कह गए कि आप तो छुपे संघी थे, अब खुल कर आ गए, अपने स्वार्थ के कारण और नेकरधारी मेरे सवालों का जवाब मां-बहन की गालियों में तलाश रहे हैं।
क्या हर सवाल को गाली दे कर , किसी दल का लेबल लगा कर, धौंस व धमकी दे कर दबा देने से उसमें निहित देशहित के मसले गौण हो जाते हैं ? क्या यह एक ऐसा अघेाषित आापातकाल है जिसमें लंपटों को जिम्मा दे दिया गया है कि असहमति के स्वरों को गालियों की बौछार, देशप्रेम के नारों से कुचल कर रख दो? याद रखें यह भारत की संस्थाओं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लोकतंत्रात्मक मूल्यों को दफन करने का एक कदम है, जब सेकुलर होने को गाली करार दिया जा रहा है, जब सवालों को देशद्रोह कहा जा रहा है। जब मीडिया हिस्‍टीरिया की तरह वह सबकुछ दखिा रहा है जो समाज के मूल सवालों को मोथरा बना कर एक आभ्‍ीसी देशप्रेम के उम्‍नाद को उकसाता है ा

गुरुवार, 29 सितंबर 2016

Urban planning must have be according climate change

शहरों को खुद संभलना होगा


अब तो बरसात वाले बादल धीरे-धीरे विदा हो रहे हैं, लेकिन सावन-भादो के बीते दो महीने प्रत्येक महानगर की चकाचौंध और विकास की पोल जम कर खोल गए। यह पहली बार नहीं हो रहा है, लगभग हर साल बरसात होती है, या बगैर बरसात के भी साल रह जाता है। शहर के वाहन थम जाते हैं। यह भी सच है कि जिस तरह जाम में फंसे आम लोग केवल अपने वाहन के निकलने का रास्ता बना कर इस समस्या से मुंह मोड़ लेते हैं, उसी तरह शहरों के लोग ऐसी कोई भी दिक्कत आने पर हल्ला करना भी मुनासिब नहीं समझते, मीडिया जरूर सक्रिय रहता है और उसके बाद फिर समाज ‘‘नोन-तेल-लकड़ी’ में जीवन व्यस्त कर लेता है। शहरीकरण आधुनिकता की हकीकत है और पलायन इसका मूल, लेकिन नियोजित शहरीकरण ही विकास का पैमाना है। गौर करें कि चमकते-दमकते दिल्ली शहर की डेढ़ करोड़ हो रही आबादी में से कोई चालीस फीसदी झोपड़-झुग्गियों में रहती है, यहां की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पूरी तरह जर्जर है। मुंबई या कोलकाता के हालात भी इससे कहीं बेहतर नहीं हैं। आर्थिक उदारीकरण के दौर में जिस तरह खेती-किसानी से लेगों का मोह भ्ांग हुआ और जमीन को बेच कर शहरों में मजदूरी करने का प्रचलन बढ़ा है, उससे गांवों का कस्बा बनना, कस्बों का शहर और शहर का महानगर बनने की प्रक्रिया तेज हुई है। विडंबना है कि हर स्तर पर शहरीकरण की एक ही गति-मति रही, पहले आबादी बढ़ी, फिर खेत में अनाधिकृत कालोनी काट कर या किसी सार्वजनिक पार्क या पहाड़ पर कब्जा कर अधकच्चे, उजड़े से मकान खड़े हुए। कई दशकों तक ना तो नालियां बनीं या सड़क और धीरे-धीरे इलाका ‘‘अरबन-स्लम’ में बदल गया। लोग रहें कहीं भी लेकिन उनके रोजगार, यातायात, शिक्षा व स्वास्य का दबाव तो उसी ‘‘चार दशक पुराने’ नियोजित शहर पर पड़ा, जिस पर अनुमान से दस गुना ज्यादा बोझ हो गया है। परिणाम सामने हैं कि दिल्ली, मुंबई, चैन्नई, कोलकाता जैसे महानगर ही नहीं देश के आधे से ज्यादा शहरी क्षेत्र अब बाढ़ की चपेट में हैं। गौर करने लायक बात यह भी है कि साल में ज्यादा से ज्यादा 25 दिन बरसात के कारण बेहाल हो जाने वाले ये शहरी क्षेत्र पूरे साल में आठ से दस महीने पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसते हैं। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, पटना के एक शोध में सामने आया है कि नदियों के किनारे बसे लगभग सभी शहर अब थोड़ी-सी बरसात में ही दम तोड़ देते हैं। दिक्कत अकेले बाढ़ की ही नहीं है, इन शहरों की दुरमट मिट्टी में पानी सोखने की क्षमता अच्छी नहीं होती है। चूंकि शहरों में अब गलियों में भी सीमेंट पोत कर आरसीसी सड़कें बनाने का चलन बढ़ गया है, और औसतन बीस फीसदी जगह ही कच्ची बची है, सो पानी सोखने की प्रक्रिया नदी-तट के करीब की जमीन में तेजी से होती है। जाहिर है कि ऐसी बस्तियों की उम्र ज्यादा नहीं है, और लगातार कमजोर हो रही जमीन पर खड़े कंक्रीट के जंगल किसी छोटे से भूकंप से भी ढह सकते हैं। याद करें दिल्ली में यमुना किनारे वाली कई कालोनियां के बेसमेंट में अप्रत्याशित पानी आने और ऐसी कुछ इमारतों के गिर जाने की घटनाएं भी हुई हैं।शहरों में बाढ़ का सबसे बड़ा कारण तो यहां के प्राकृतिक नालों पर अवैध कब्जे, भूमिगत सीवरों की ठीक से सफाई ना होना है। लेकिन इससे बड़ा कारण है हर शहर में हर दिन बढ़ते कूड़े के भंडार व उनके निबटान की माकूल व्यवस्था ना होना। अकेले दिल्ली में नौ लाख टन कचरा हर दिन बगैर उठाए या निबटान के सड़कों पर पड़ा रह जाता है। जाहिर है कि बरसात होने पर यही कूड़ा पानी को नाली तक जाने या फिर सीवर के मुंह को बंद करता है। महानगरों में भूमिगत सीवर जल भराव का सबसे बड़ा कारण हैं। जब हम भूमिगत सीवर के लायक संस्कार नहीं सीख पा रहे हैं, तो फिर खुले नालों से अपना काम क्यों नहीं चला पा रहे हैं? पॉलीथिन, घर से निकलने वाले रसायन और नष्ट न होने वाले कचरे की बढ़ती मात्रा, कुछ ऐसे कारण हैं, जोगहरे सीवरों के दुश्मन हैं। यदि शहरों में कूड़ा कम करने और उसके निबटारे के सही उपाय नहीं हुए तो नालों या सीवर की सफाई के दावे या फिर आरोप बेमानी ही रहेंगे। अब यह तय है कि आने वाले दिन शहरों के लिए सहज नहीं हैं, यह भी तय है कि आने वाले दिन शहरीकरण के विस्तार के हैं, तो फिर किया क्या जाए? आम लोग व सरकार कम से कम कचरा फैलाने पर काम करें। पॉलीथिन पर तो पूरी तरह पाबंदी लगे। शहरों में अधिक से अधिक खाली जगह यानि कच्ची जमीन हो, ढेर सारे पेड़ हों। शहरों में जिन स्थानों पर पानी भरता है, वहां उसे भूमिगत करने के प्रयास हों। तीसरा प्राकृतिक जलाशयों, नदियों को उनके मूल स्वरूप में रखने तथा उनके जलग्रहण क्षेत्र को किसी भी किस्म के निर्माण सेेमुक्त रखने के प्रयास हों। पेड़ तो वातावरण की गर्मी को नियंत्रित करने और बरसात के पानी को जमीन पर गिर कर मिट्टी काटने से बचाते ही हैं।

बुधवार, 28 सितंबर 2016

Deadly pollution in our houses

हमारे घर में भी रहता है जानलेवा प्रदूषण

पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार 
हिंदुस्तान २९सितम्बर१६
वह अभी बमुश्किल एक महीने का था। घर से बाहर जाने का सवाल नहीं उठता। फिर भी उसे निमोनिया हो गया। पढ़े-लिखे माता-पिता यही सोचते रहे कि हम तो अच्छी तरह देखभाल करते हैं, फिर निमोनिया कैसे हो गया? घर में कोई बीड़ी-सिगरेट पीता नहीं है, उन्होंने तो मच्छरमार धूपबत्ती लगाना कभी का बंद कर रखा था। पता चला कि उनके घर के पिछले हिस्से में निर्माण-कार्य चल रहा था। जिस तरफ रेत-सीमेंट का काम हो रहा था, वहीं उस कमरे का एयरकंडीशनर लगा था, जिसका एयर फिल्टर साफ नहीं था। यह तस्वीर तो महज बानगी है कि हम घर से बाहर जिस तरह प्रदूषण से जूझ रहे हैं,घर के भीतर भी जाने-अनजाने उसको ले आए हैं।
प्रदूषण का नाम लेते ही हम वाहनों या कारखानों से निकलने वाले काले धुएं की बात करने लगते हैं, लेकिन घर के भीतर का प्रदूषण यानी ‘इनडोर पॉल्यूशन’ उससे ज्यादा घातक हो सकता है। दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता और बेंगलुरु जैसे शहरों में तो स्थिति और खराब है। यहां जनसंख्या घनत्व ज्यादा है, आवास बेहद सटे हुए हैं और हरियाली कम है। बच्चों के मामले में तो यह और खतरनाक होता जा रहा है। पिछले साल पटेल चेस्ट इंस्टिट्यूट ने पाया कि बढ़ते प्रदूषण के कारण अस्थमा के मरीज लगातार बढ़ रहे हैं। कुछ जगह तो घर के अंदर का प्रदूषण इस खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है कि वहां के 14 प्रतिशत से भी अधिक बच्चे अस्थमा के रोगी बन चुके हैं। राजधानी दिल्ली के इस अध्ययन में सबसे खतरनाक स्थिति शाहदरा की पाई गई। यहां 394 बच्चों में से 14.2 प्रतिशत अस्थमा के शिकार पाए गए।
एक सच यह भी है कि हमने भौतिक सुखों के लिए जो कुछ भी सामान जोड़ा है, उसमें से बहुत-सा समूचे परिवेश के लिए खतरा बन गया है। नए किस्म के कारपेट, फर्नीचर, परदे सभी कुछ बारीक धूल-कणों का संग्रह स्थल बन रहे हैं और यही कण इंसान की सांस की गति में व्यवधान पैदा करते हैं। सफाई और सुगंध के रसायनों व कीटनाशकों के इस्तेमाल भले ही हमें तात्कालिक आनंद या थोड़ी सी सुविधा देते हों, लेकिन इनका फेफड़ों पर बहुत गंभीर असर होता है। इनमें से कुछ एलर्जी पैदा करते हैं, तो कुछ के नन्हे कण हमारे श्वसन तंत्र में जम जाते हैं। इसी तरह हम अपने बर्तनों को साफ करने के लिए आजकल रासायनिक सोप और लिक्विड इस्तेमाल करने लगे हैं, जो बर्तनों से गंदगी तो हटा देते हैं, लेकिन इन रसायनों के अंश उनमें जरूर छूट जाते हैं। फिर यही रसायन भोजन के साथ हमारे पेट में जा पहुंचते हैं। पिछले कुछ साल में हमारे घर से निकलने वाला कूड़ा दस गुना तक बढ़ गया है। खासकर पैकिंग की वह सामग्री, जिसे हम घर से तो निकाल देते हैं, लेकिन वह सदियों तक नष्ट नहीं होती और हमारे घर के आसपास के वातावरण में हमेशा मौजूद रहती है। घर के प्रदूषण को इन सबसे मुक्ति पाकर ही खत्म किया जा सकता है।

शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

Every victim of terrorism is equally like arm forces

आतंकवाद: फिर क्यों ना हो स्थाई निदान !


उड़ी में सेना के मुख्यालय पर आतंकी हमले के बाद देश में प्रतिहिंसा, बदले के उन्माद के बादल छाए हैं। कई सच्ची-झूठी खबरें उड़ रही हैं लेकिन इस पर कोई गौर नहीं कर रहा कि दुनिया की सबसे ताकतवर सेना के हथिायारों का गोदाम, वह भी पाकिस्तान की सीमा पर , वह भी कश्मीर में कितना लापरवाही से रक्षित किया जा रहा था। यह बानगी है कि हमारे देश में सुरक्षा बल अभी भी मोर्चा लेने में तो अव्वल हैं लेकिन मोर्चें के हालात ही ना बनें इसके लिए तैयार नहीं हैं। इस हमले में तो केवल फौजी मारे गए, लेकिन इसमें 20 से ज्यादा जवान बुरी तरह घायल भी हुए हैं। बीते कई-कई सालों से यह परंपरा रही है कि जब कभी देश में कहीं कोई धमाका, हमला होता है, लोग गिनने लगते हैं कि कितने मरे, सरकार में बैठे लोग आंकड़ों में बताने लगते हैं कि उनके कार्यकाल में यह बहुत कम है, वहीं विपक्ष हमलावर हो जाता है। कुल मिला कर जनता के प्रति जिम्मेदार लोग देश की आतंकवाद से लड़ने की नीति पर एक दूसरे की थुक्का-फजीती में लग जाते हैं।
भले ही आतंकवाद से निबटने की नीति का रास्ता लंबा और जटिल है, लेकिन आतंकवाद के शिकार हुए लोगों के लिए तो एक सशक्त नीति बनाई जा सकती है। हाल के हमले में मारे गए अलग-अलग राज्यों के जवानों को सरकारें द्वारा अलग-अलग मुआवजा देना, पिछले साल मथुरा जिले के शहीद हेमराज के गांव में गए नेताओं के वायदों का अभी तक तक क्रियान्वयन ना होना , बानगी है कि हम अभी तक आतंकवाद से बचाव और उससे पीड़ित लोगों को राहत के मामले में दिशाहिन, नीतिहीन और तथ्दर्थवाद के शिकार हैं। बीते एक दशक के दौरान देश में हुए आतंकवादी हमलों में घायल और मारे गए कई सौ लोगों के परिवारजन मुआवजा पाने के लिए दफ्तर-दर-दफ्तर भटक रहे हैं। एक जगह से मृत्यु प्रमाण पत्र मिलना है तो दूसरी जगह से वारिस का, तीसरी जगह से एफआईआर की कापी तो चौथी जगह से मुआवजे का परवाना। कई लोग स्थाई रूप से विकलांग हो गए और कुछ एक का इलाज कई-कई साल तक चल रहा है। एक बार कहीं कोई घटना घटती है तो सरकार व सियासी नेता तत्काल कुछ मुआवजे और इमदाद की घोषणा कर देते है। फिर राष्ट्रवाद धीरे-धीरे हवा हो जाता है और अपनों को खोए लोगों के सामने समाज-समय की हकीकत उजागर हो जाती है।
आतंकवाद अब अंतरराष्ट्रीय त्रासदी है। देश-दुनिया का कोई भी हिस्सा इससे अछूता नहीं है। भारत में यह अब महानगर ही नहीं छोटे शहर वाले भी महसूस करने लगे हैं कि ना जाने कौन से दिन कोई अनहोनी घट जाए। लेकिन इसके लिए तैयारी के नाम पर हम कागजों से ऊपर नहीं उठ पा रहे हैं। ट्रॉमा सेंटर अभी दिल्ली में भी भली-भांति काम नहीं कर रहे हैं, तो अन्य राज्यों की राजधानी की परवाह कौन करे। क्या यह जरूरी नहीं है कि संवेदनशील इलाकों में सचल अस्पताल, बड़े अस्पतालों में सदैव मुस्तैद विशेषज्ञ हों। आम सर्जन बीमारियों के लिए आपरेशन करने में तो योग्य होते हैं, लेकिन गोली या बम के छर्रे निकालने में उनके हाथ कांपते हैं। बारूद के धुंए या धमाकों की दहशत से बेहोश हो गए लोगों को ठीक करना, डरे-सहमें बच्चों या अपने परिवार के किसी करीबी को खो देने के आतंक से घबराए लोगों को सामान्य बनाना जैसे विषयों को यदि चिकित्सा की पढ़ाई में इस किस्म के मरीजों के त्वरित इलाज के विशेष पाठ्यक्रम को शामिल किया जाए तो बेहतर होगा।
आतंकवादी घटनाओं के शिकार हुए आम लोगों और सुरक्षा बलों के जवानों को आर्थिक मदद और उनके जीवनयापन की स्थाई व्यवस्था या पुनर्वास का काम अभी भी तदर्थवाद का शिकार है। कोई घटना होने के बाद तत्काल स्थानीय या कतिपय संस्थाएं अभियान चलाती हैं, कुछ लोग भाव विभोर हो कर दान देते हैं ओर असमान किस्म की इमदाद लोगों तक पहुंचती है। दिल्ली या मुंबई में हुए धमाके देश पर हमला मान लिए जाते हैं तो उन पर ज्यादा आंसू, ज्यादा बयान और ज्यादा मदद की गुहार होती है। उत्तर-पूर्वी राज्यों या छत्तीसगढ़, उड़ीसा या झारखंड की घटनाएं अखबारों की सुर्खिया ही नहीं बन पाती हैं। ऐसे में वहां के पीड़ितों को आर्थिक मदद की संभावनाएं भी बेहद क्षीण होती हैं। सशस्त्र बलों या अन्य सरकारी कर्मचारियों को सरकारी कायदे-कानून के मुताबिक कुछ मिल जाता है, लेकिन आम लोग इलाज के लिए भी अपने बर्तन-जमीन बेचते दिखते हैं। कुछ साल पहले हैदराबाद के धमाके में घायल हुए 25 साल के अब्दुल वासिफ मिर्जा का मामला गौरतलब है, वह 2007 के मक्का मस्जिद धमाके में घायल हुआ और उसका एक पैस काटना पड़ा,उसके परिवार वालों का सबकुछ बिक गया उसके इलाज में । अब वह एक बार बम धमाके में घायल हो गया।
वैसे तो केंद्र में प्रधानमंत्री और राज्यों में मुख्यमंत्री राहत कोष हैं, जिनसे ऐसी ही आकस्मिक घटनाओं के शिकार हुए लोगों की मदद का कार्य किया जाता है, लेकिन यह तभी संभव होता है जब ऐसी घटनाओं की जानकारी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री तक जाए और साथ ही पदासीन व्यक्ति संवेदनशील हो। ऐसा हर समय संभव नहीं है, लेकिन आतंकवादी घटनाएं कभी भी कहीं भी संभव हैं। अब यह जरूरी लगता है कि आतंकवादी घटनाओं के शिकार लोगों के मुआवजे, राहत, इलाज, रोजगार के लिए ‘‘सिंगल विंडो’’ की तर्ज पर एक महकमा हो। ऐसी दुर्भाग्यपूुर्ण घटनाएं होने पर जिस तरह पुलिस, सुरक्षा एजंसिया, एंबूलेंस आदि त्वरित काम पर लग जाते हैं, उसी तरह इस महकमे के लोग भी चिकित्सा व अन्य तात्कालिक मदद का आकलन व उसे मुहैया करवाने, मृत लोगों के पोस्टमार्टम, लाशों को ससम्मान संबंधित लोगों के घर तक पहुंचाने, तत्काल दवा या अन्य चिकित्सीय जरूरतों का पता लगाने, गुम हो गए लोगों की सूचना, कौन किस अस्पताल में है इसकी खबर जैसे काम इस विभाग द्वारा किए जाएं। वरना होता यह है कि किसी हादसे की हालत में अस्पतलों और सड़कों पर बदहवास सी बड़ी भीड़ उन लोगों की होती है जो किसी अपने की तलाश कर रहे होते हैं। अस्पताल के लोग तिमारदारी में लगे होते हैं और पुलिसवाले अपराधी की तलाश में। ऐसे में पूछताछ करने वाले असंतुष्ट हो कर नारेबाजी या अन्य व्यवधान खड़ा कर देते हैं। क्या ऐसी घटनाओं के तुरंत बाद जांच करने वाले, सतर्कता बरतने वाले, घायलों के इलाज की व्यवस्था करने और धरपकड़ की जिम्मेदारियां अलग-अलग एजेंसी पर डालने जैसा साधारण काम नहीं किया जा सकता? ऐसे में ना तो पुलिस को घायल की चिंता करना होगा और ना ही एनआईए को सुरक्षा की।
सबसे बड़ी बात कि ऐसे महकमे के लिए दान के दरवाजे सालभर खुले हों, जिस तरह कुछ टीवी चैनल अपने-अपने विशेष फंड बना कर दानदाताओं के नाम अपनी स्क्रीन पर दिखाने की बात क कर राहत सामग्री जोड़ रहे हैं, सरकारी महकमों को भी दानदाताओं को धन्यवाद के लिए विज्ञापनों का सहारा ले कर लोगों को आकर्षित करना होगा। अपने किसी प्रिय के जन्मदिन या स्मृति में ‘‘आतंकवाद प्रकोष्ठ’’ के लिए दान देने के लिए आकर्षित करना कोई बड़ी बात नहीं है। इससे एक तो धन राशि या राहत, जरूरतमंद तक पहुंचाने का केवल एक ही माध्यम तय होगा, जिससे लोगों को भटकना नहीं पड़ेगा, साथ ही यह संस्था आतंकवाद से पीड़ित के आश्रितों को स्थाई रोजगार दिलवाने का कम भी कर सकती है। हो सकता है कि कुछ कंपनियां या विभाग ऐसे लोगों को रोजगार के लिए कुछ आरक्षित सीटें रख दें।
आतंकवाद की अराजक स्थिति में टीवी के चैनल बदल-बदल कर आंसू बहाने वालों के असली राष्ट्रप्रेम की परीक्षा यह विभाग हो सकता है। ऐसी संस्था की निशुल्क सेवा या संकट के समय कुछ समय देने वालों को एकत्र किया जा सकता है, यह नए महकमे के खर्चों को कम करने में सहायक कदम होगा। सबसे बड़ी बात सरकारी सेवा करने वाले सभी लोगों को फौज व राहत अभियान का प्राथमिक प्रशिक्षण देना और समय-समय पर उनके लिए ओरिएंटेशन कैंप आयोजित करना समय की मांग है। लोगों को प्राथमिक उपचार, सामान्य लिखा-पढ़ी के काम भी दिए जा सकते हैं।
क्रिकेट के मैदान पर तिरंगे ले कर उधम मचाने वाले युवाओं का भी देश-प्रेम के प्रति दृष्टिकोण महज नेताओं को गाली देने या पाकिस्तान को मिटा देने तक ही सीमित है। यह हमारी पाठ्य पुस्तकों और उससे उपज रही शिक्षा का खोखला दर्शन नहीं तो और क्या है? बातें युवाओं की लेकिन नीति में दिशाहीन, अनकहे सवालों से जझते युवा ।
यदि सरकार इस विषय में सोचती हैं तो इससे आम आदमी की देश व समाज के प्रति संवेदनशीलता तो बढ़ेगी ही, आतंकवाद के नाम पर राजनीति करने वालों की दुकानें भी बंद हो जाएंगी। मानवता के दुश्मनों के हाथों मारा गया प्रत्येक निर्दोष उसी सम्मान, राहत और सहानुभूति का हकदार है, जितना की वर्दीधारी।

गुरुवार, 22 सितंबर 2016

Merging railway budget with annual : One step ahead for privatisation of railway

रेलवे के निजीकरण की ओर एक और कदम: अलग बजट की
समाप्ति

                                                                   पंकज चतुर्वेदी

यह अचानक नहीं हो गया, इस साल के षुरूआत में ही योजना आयोग को समाप्त कर बने नीति आयोग के  सदस्य विवेक देबरॉय की अध्यक्षता वाली एक कमेटी ने अलग रेल बजट पेश करने की आवश्यकता को समाप्त करने और इसे आम बजट में मिलाने की सिफारिश की थी। पिछले महीने सरकार ने इस मुद्दे पर सुझाव देने के लिए वित्त और रेलवे मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारियों की पांच सदस्यों कर समिति बनाई थी। जब मंत्री से ले कर सब की राय थी तो जाहिर है कि समिति को महज इसकी प्रक्रिया तय करने का तरीका बतना था।
  अफसरों की समिति ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के इस बड़े उपक्रम को 7वें वेतन आयोग की सिफारिशों को अमल में लाने के लिए 40,000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ उठाना होगा। इसके अलावा उसे सबसिडी के रूप में 32,000 करोड़ रुपए सालाना खर्च करना होगा। दोनों बजटों को मिलाने से रेलवे को सालाना लाभांश से छुटकारा मिल जाएगा। रेलवे को हर साल सकल बजट समर्थन के एवज में यह लाभांश सरकार को देना होता है। दोनों बजटों के विलय से किसी तरह का कोई मुद्दा खड़ा होने की आशंका नहीं है। यह मूल रूप से प्रक्रियात्मक ही होगा। इससे सरकार की बजट गणना पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।  21 सितंबर की षाम केंद्रीय मंत्रिमंडल ने आम बजट को रेल बजट में विलय संबंधी प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। हो सकता है कि बजट भी एक फरवरी को ही पेश हो जाए।
सनद रहे कि सन 1924 से अभी तक यानि 92 साल पहले रेल को आम बजट से अलग प्रस्तुत करने की षुरूआत हुई थी। साल 1921 में ईस्ट इंडिया रेलवे कमेटी के अध्यक्ष सर विलियम एक्वर्थ ने यह देखा कि पूरे रेलवे सिस्टम को एक बेहतर प्रबंधन की दिशा में ले जाने की ज़रूरत है। साल 1924 में उन्होंने आम बजट से रेल बजट को अलग करने का प्रस्ताव रखा, जिसके बाद से अलग बजट व्यवस्था की नींव रखी गई। उस दौर में पूरे देश के बजट में रेल बजट की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत थी। इसी लिए रेल बजट को अलगग बनाने की बात आई। गौर तलब है कि उस समय रेलवे का सार्वजनिक परिवहन में रेलवे की भागीदारी 75 प्रतिशत और माल ढुलाई में 90 प्रतिशत थी। आज माल ढुलाई में ट्रकों की संख्या बढ गई है और इस तरह रेल बजट का वह स्वरूप् नहीं रह गया जो कि आजादी के पहले था। देश के बजट में रेल बजट की इतनी अधिक हिस्सेदारी देखकर रेल बजट को आम बजट से अलग करने का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया। उस दौर से लेकर अब तक रेल बजट को आम बजट से अलग पेश किया जाता है। जब रेल बजट को आम बजट से अलग किया गया था, उस समय रेलवे का प्रयोग पब्लिक ट्रांसपोर्ट में 75 फीसदी और माल ढुलाई में 90 फीसदी तक होता था।
तब से आमतौर पर 25 फरवरी को रेल बजट आता है ं। उसके एक या दो दिन बाद वित्त मंत्री आम बजट पेश करते हैं। लेकिन अब एक ही बजट में रेलवे का भ्ी उल्लेख होगा। आम आदमी के लिए ये बदलाव इस लिहाज से खास होगा क्योंकि अब तक रेल किराये बढ़ेंगे या नहीं बढ़ेंगे ये फैसला रेलमंत्री लिया करते थे लेकिन अब इसपर अंतिम मुहर वित्त मंत्री की होगी। हालांकि जनता की अब बजट में कोई रूचि रह नहीं गई है क्योंकि रेल किराये से ले कर आम सामान तक के दाम सारे साल कभी भी बढ़ते रहते हें और बजट तो महज कारपोरेट के लाभ-हानि का आईना मात्र होता है।

भारतीय रेल  एशिया का सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है तथा एकल प्रबंधनाधीन यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है। सबसे अधिक रेाजगार , लगभग 16 लाख लेागों को नौकरी देने वाला रेलवे भारत के परिवहन, अर्थ, सांस्कृतिक एकता, पर्यटन आदि की रीढ़ है। समय  के साथ रेल, रेलवे की ुसविधाएं, यात्री सभी कुछ बढ़ रहे हैं व लेागांे की अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए रेलवे में रेल इंडिया टेक्नीकल एवं इकोनॉमिक सर्विसेज़ लिमिटेड (आर आई टी ई एस) इंडियन रेलवे कन्स्ट्रक्शन (आई आर सी ओ एन) अंतरराष्ट्रीय लिमिटेड इंडियन रेलवे फाइनेंस कॉर्पाेरेशन लिमिटेड (आई आर एफ सी) कंटनेर कॉर्पाेरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (सी ओ एन सी ओ आर) कोंकण रेलवे कॉर्पाेरेशन लिमिटेड (के आर सी एल) इंडियन रेलवे कैटरिंग एंड टूरिज्म कॉर्पाेरेशन लिमिटेड (आई आर सी टी आर) रेलटेल कॉर्पाेरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (रेलटेल) मुंबई रेलवे विकास कॉर्पाेरेशन लिमिटेड (एम आर वी सी लिमिटेड.) रेल विकास निगम लिमिटेड (आर वी एन आई) जैसे कई उपक्रम स्थापित किए गए हैं। रेलवे के आधुनिकीकरण, गति, सुविधाओं में  निजी कंपनियों की नजर लंबे समय से रही है। लेकिन रेलवे की यूनियनें बहुत मजबूत हैं  और वे निजीकरण का विरोध करती रही है। हालांकि रेलवे में आ रही नई पीढ़ी तकनीकी  और व्यावसायिक शिक्षा ले कर आ रही है और इससे यूनियन साल दर साल कमजोर हो रही हैं। निजीकरण  का यही अनुकूल माहौल होता है।
चूंिक अब रेलवे बजट आम बजट का ही हिस्सा होगा, जाहिर है कि आम बजट में व्यावसायिक घरानों के लिए स्थापित नीतियों, सुविधाओं का लाभ अब रेलवे के लिए भी खुल जाएगा। नीतिगत निर्णय आम बजट के होंगे व आय-व्यय का हिसाब रेलवे का। ऐसे में रखरखाव, केटरिंग जैसे क्षेत्रों में निजी कंपनियों की संभावनाएं आम बजट की किसी नीति के तहत ही खुल जाएंगी और पूरे बजट के हल्ले में यह पता भी नहीं चलेगा। यही नहीं रलवे से होने वाली आय व व्यय अब आम बजअ में जुड़ जाएगी। इसका सबसे बड़ा नुकसान यह होगा कि रेलवे भीअ न्य सरकारी विभागों की तरह एक महकमा बन जाएगा, जबकि अभी तक रेलवे को एक व्यावसायिक प्रतिष्ठान माना जाता रहा है। जो कि अपने विस्तार, आधुनिकीकरण, शोध व प्रबंधन का कार्य एक कंपनी की तरह करता था।

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

Kavery River : every one wants water but no one care pollution

किसे परवाह है कावेरी की लहर में जहर की

                                                                   
पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने ओदश दिया और कर्नाटक सरकार को हर दिन कावेरी नदी का  12000 क्यूसेक पानी तमिलनाडु के लिए छोड़ना पड़ रहा है। इसके बाद कर्नाटक सुलग रहा है। हर रोज बंद, पथराव, तमिलनाउु के नेातओं के पुतले दहन व उने प्रतिश्ठानों पर हमले की खबरें आ रही हैं। कावेरी को चाहने का दावा करने वालों ने कई हजार करोड़ की संपत्ति फूंक दी है । हकीकत तो यह है कि कावेरी के पानी से ज्यादा उस पर सियासत में लेागों की ज्यादा रूचि है। तभी सन 1837 से चल रहा जल बंटवारे का विवाद आज तक नहीं निबट पाया हे। नदी का पानी कनार्टक , तमिलनाडु, केरल और पुदुचंेरी को कितना मिले, इसको तय करने के लिए सन 1990 में एक प्राधिकरण बना था, सुप्रीम केार्ट में चल रहे मामले अलग हैं, लेकिन जिस नदी को ‘मां’’ माना जाता है, उसके बंटवारे को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है। पानी और ज्यादा से ज्यादा पानी सभी को चाहिए, लेकिन कावेरी में किस तरह प्रदूशण की सडांध घर कर रही है, उस पर चिंता या जिम्मेदारी लेने को ना तो कोई संगठन तैयार है और ना ही सरकार ।
पौराणिक कथाआंे में कुर्गी-अन्नपूर्णा, कर्नाटक की भागरथी और तमिलनाडु में पौन्नई यानी स्वर्ण-सरिता कहलाने वाली कावेरी नदी के पानी के बंटवारे को लेकर विवाद से तो सभी परिचित हैं लेकिन इस बात की किसी को परवाह नहीं है कि यदि इसमेें घुलते जहर पर तत्काल ध्यान नहीं दिया गया तो जल्दी ही हालात काबू से बाहर हो जाएंगे। दक्षिण की जीवन रेखा कही जाने वाली इस नदी में कही कारखानें का रसायनयुक्त पानी मिल रहा है तो कहीं षहरी गंदगी का निस्तार सीधे ही इसमें हो रहा है, कहीं खेतों से बहते जहरीले रसायनयुक्त खाद व कीटनाशक इसमें घुल रहे हैं तो साथ ही नदी हर साल उथली होती जा रही है। बंगलूरू सहित कई विश्वविघालयों में हो रहे षोध समय-समय पर चेता रहे हैं कि यदि कावेरी को बचाना है तो उसमें बढ़ रहे प्रदूशण पर नियंत्रण जरूरी है, लेकिन बात कागजी घोड़ों की दौड़ से आगे बढ़ नहीं पा रही है।
कावेरी नदी कर्नाटक के कुर्ग जिले के पश्चिमी घाट के घने जंगलों में ब्रह्मगिरी पहड़ी पर स्थित तलकावेरी से निकलती है। कोई आठ सौ किलोमीटर की यात्रा के दौरान कई सहायक नदियां इसमें आकर मिलती हैं, लेकिन जब दो लाख घन मीटर से अधिक वार्शिक जल बहाव वाली कावेरी का समागम तमिलनाडु में थंजावरु जिले में बंगाल की खाड़ी में होता है तो यह एक शिथिल सी छोटी सी जल-धारा मात्र रह जाती है।   कावेरी के पानी को लकर दो राज्यों के बीच का विवाद संभवतया दुनिया के सबसे पुराने जल विवादों में से एक है। 17वीं सदी में टीपू सुल्तान के षासनकाल में जब तत्कालीन मैसूर राज्य ने इस पर बांध बनाया था तब मद्रास प्रेसीडंसी ने इस पर आपत्ति की थी। इस झगउ़े का एक पड़ाव सन 1916 में सर विश्वेसरैया की पहल पर बनाया गया कृश्णराज सागर यानी केआरएस बांध था।  पर जब दोनो राज्यों में पानी की मांग बढ़ी तो यह बांध भी विवादों की चपेट में आ गया।
कावेरी की लपटों मे ना जने क्या-क्या झुलसा, लेकिन पानी पर सियासत करने वालों ने इस बात की सुध कभी नहीं ली कि कावेरी का मैला होता पानी अब जहर बनता जा रहा है। कुछ साल पहले बंगलूरू विश्वविद्यालय ने वन और पर्यावरण मंत्रालय तथा राश्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय-एनआरडीसी की मदद से एक विस्तृत षोध किया था जिसमें बताया गया था कि केआरएस बांध से नीचे आने वाला पानी ऊपरी धारा की तुलना में बेहद दूशित हो गया है। गौरतलब है कि केआर नगर, कौल्लेगल और श्रीरंगपट्टनम नगरों की नालियों का गंदा पानी और नंजनगौडा षहर के कारखानों व सीवर की निकासी बगैर किसी षोधन के काबिनी नदी में मिला दी जाती है। काबिनी नदी आगे चल कर नरसीपुर के पास कावेरी में मिल जाती है। कहने को कोल्लेगल में एक ट्रीटमेंट प्लांट लगा है, लेकिन इसे चलते हुए कभी किसी ने नहीं देखा।
षहरी गंदगी के बाद कावेरी को सबसे बड़ा खतरा इसके डूब क्षेत्र में हो रही अंधाधुंध खेती से है। ज्यादा फसल लेने के लालच में जम कर रासायनिक खाद व कीटनााशकों के इस्तेमाल ने कावेरी का पानी जहर कर दिया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक बरसात के दिनों में कावेरी के पानी में हर रोज 1,051 टन सल्फेट, 21 टन फास्फेट और 34.88 टन नाईट्रेट की मात्रा मिलती है।  गर्मी के दिनों में जब पानी का बहाव कम हो जाता है तब सल्फर 79 टन, 2.41 टन फास्फेट और 3.28 टन नाईट्रेट का जहर हर रोज इस पावन कावेरी को दूशित कर रहा है।  याद रहे कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक नाईट्रेट के रूप में नाईट्रोजन की इतनी मात्रा वाला पानी बच्चों के लिए जानलेवा है।
कौललागेल क्षेत्र में षहरी सीवर के कारण कावेरी का पानी मवेशियों के लिए भी खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। यहां पर पानी में केडमियम, एल्यूमिनियम, जस्ता और सीसा की मात्रा निर्धारित स्तर को पार कर जाती हे।  ये नदी किनारे रहने वालों के लिए आए दिन नई-नई बीमारियों की सौगात ले कर आ रहे हैं।  वैसे तो अन्य नदियां की ही तरह कावेरी में भी खुद ब खुद षुद्धीकरण की विशेशता है, लेकिन आधुनिक जीवन षैली के लिए आवश्यक बन गए रासायनों की बढती मात्रा से नदी का यह गुण नाकाम हो गया है। कावेरी के किनारों पर रेत की बेतरतीब खुदाई, षौचकर्म और कपड़ों की ध्ुालाई ने भी नदी का मिजाज बिगाड़ दिया है।
कावेरी के दूशित होने की चेतावनियां 13 साल पहले 1995 में केद्रीय प्रदूशण नियंत्रण बोर्ड की एक रपट में दर्ज थीं। उसमें कहा गया था कि कावेरी का पानी अपने उद्गम  तालकावेरी से मैसूर षहर की सीमा तक सी ग्रेड का है, जबकि यह होना ए ग्रेड का चाहिए। विदित हो कि ए ग्रेड के पानी की 100 मिललीटर मात्रा में कॉलीफार्म बैक्टेरिया की मात्रा 50 होती है, जबकि सी ग्रेड में यह खतरनाक विशाणु छह हजार होता है। पानी की अम्लीयता का पैमाना कहे जाने वाले पीएच वैल्यू में काफी अंतर दर्ज किया गया था। प्रदूशण बोर्ड की उस रिपोर्ट यह भी बताया गया था कि केआर बांध से होगेनेग्गल तक और बंगलूर से ग्रेंड एनीकेट तक और उउसे आगे कुंभकोणम तक पानी की क्वालिटी ई ग्रेड की है। सनद रहे कि इस स्तर का पानी पीने के लिए कतई नहीं होता है।
सिंचाई, सफाई और सियासत के भ्ंावर में फंसी 770 किलामीटर लंबी कावेरी की सबसे ज्यादा दुर्गति कुर्ग  जिले में ही है। यह इलाका काफी उत्पादक हैं, और सरकारी रिकार्ड कहता है कि चार लाख पचहत्तर हजार टन कॉफी का कचरा सीधे नदी में जा रहा है। कुर्ग षहर की एक लाख आबादी का पूरा निस्तार बगैर सफाई के नदी में मिलता है। यह इलाका सुअर के गोश्त के व्यापार के लिए भी जाना जाता है और हजरों बूचड़ खाने का गंदा पानी इसमें सीधे मिलाने में कसिी को कोई संकोच नहीं होता।  पिछले साल प्रख्यात अंतरिक्ष वैज्ञानिक और राज्य ज्ञान आयोग के अध्यक्ष प्रो. के कस्तूरी रंगन ने राज्य षासन को एक रपट सोंपी थी जिसमें कावेरी को प्रदूशण मुक्त करनेे के लिए त्वरित विशेश प्रयास करने व उसके लिए अलग से बजट की बात की थी। रपट में बताया गया था कि कावेरी के किनारे उभर आए कई पर्यटन स्थल नदियों में सीवर की गंदगी बढ़ा रहे हैं, वहीं इससे रेत का अवैध खनन इसके अस्तित्व के लिए खतरा बन रहा है। दुखद है कि अपने पडोसी राजय को पानी देने पर आग लगाने वाले कीज्ञी इस तरह से नदी के क्षण पर सड़कों पर नहीं आते।
राज्य प्रदूशण बोर्ड की रपट को आए 15 साल बीत गए, कावेरी में ना जाने कितना पानी बह गया, उससे ढेर सारे विवाद और हंगामे उपज गए लेकिन उसका प्रदूशण दिन दुगना-रात चौगुना बढता रहा। उस पर राजनीति की बिसात बिछी है। कावेरी गवाह है कि आधुनिक विकास की कितनी बड़ी कीमत नदियां चुका रही हैं। कावेरी में जब तक पानी है , वह जीवनदायिनी है और उस दिन तक उसके पानी को ले कर दो राज्य लड़ते रहेंगे, लेकिन जिस दिन उसमें घुलता जहर खतरे की हद को पार कर जाएगा, उस दिन से यही लोग इस नदी को अपने राज्य की सीमा में घुसने से रोकने का झंडा उठा लेगें।
पंकज चतुर्वेदी
यूजी-1, 3/186 ए राजेन्द्र नगर
सेक्टर-2
साहिबाबाद
गाजियाबाद 201005
9891928376, 0120-4241060


पंकज चतुर्वेदी

बुधवार, 14 सितंबर 2016

Dengue due to paralysis of system

तंत्र की काहिली से बढ़ता मर्ज


                                                                डेंगू का डंक
                                                                                                                                                                                                 पंकज चतुर्वेदी

इस साल 31 अगस्त तक देश में डेंगू के कुल 27889 मामले सामने आए, जिनमें से 60 की मौत हो गई। इसका कुछ कमजोर स्वरूप चिकनगुनिया भी अपने शबाब पर है और वह अभी तक 1255 मरीजों को अपनी चपेट में ले चुका है। राजस्थान के कई जिलों से लेकर बंगाल के दूरस्थ इलाकों तक, राऊरकेला जैसे औद्योगिक शहर से लेकर महाराष्ट्र के कोकण क्षेत्र तक हर इलाके में औसतन हर रोज दस मरीज अस्पताल पहुंच रहे हैं। हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन पहले ही चेता चुका था कि इस साल दिल्ली में डेंगू महामारी बन सकता है। स्थानीय प्रशासन विभाग इंतजार कर रहा है कि कुछ ठंड पड़े तो समस्या अपने आप खत्म हो जाएगी।
गाजियाबाद जैसे जिलों के अस्पताल तो बुखार-पीड़ितों से पटे पड़े हैं। अब तो इतना खौफ है कि साधारण बुखार का मरीज भी बीस-पच्चीस हजार रुपए दिए बगैर अस्पताल से बाहर नहीं आता है। वहीं डेंगू के मच्छरों से निपटने के लिए दी जा रही दवाएं उलटे उन मच्छरों को ताकतवर बना रही हैं। डेंगू फैलाने वाले एडीज’ मच्छर सन‍् 1953 में अफ्रीका से भारत आए थे। उस समय कोई साढ़े सात करोड़ लोगों को मलेरिया वाला डेंगू हुआ था, जिससे हजारों मौतें हुई थीं। अफ्रीका में इस बुखार को डेंगी कहते हैं। यह तीन प्रकार को होता है। एक वह, जो कि चार-पांच दिनों में अपने आप ठीक हो जाता है, लेकिन मरीज को महीनों तक बेहद कमजोरी रहती है। दूसरे किस्म में मरीज को हेमरेज हो जाता है, जो उसकी मौत का कारण भी बनता है। तीसरे किस्म के डेंगू में हेमरेज के साथ-साथ रोगी का ब्लड प्रेशर बहुत कम हो जाता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक डेंगू के वायरस भी चार तरह के होते हैं- सीरो-1,2, 3 और 4। यदि किसी मरीज को इनमें से किन्हीं दो तरह के वायरस लग जाएं तो उसकी मौत लगभग तय होती है। ऐसे मरीजों के शरीर पर पहले लाल-लाल दाने पड़ जाते हैं। इसे बचाने के लिए शरीर के पूरे खून को बदलना पड़ता है। सनद रहे कि डेंगू से पीडि़त मरीज को 104 से 107 डिग्री बुखार आता है। डेंगू का पता लगाने के लिए मरीज के खून की जांच करवाई जाती है, जिसकी रिपोर्ट आने में दो-तीन दिन लग जाते हैं। तब तक मरीज की हालत लाइलाज हो जाती है। यदि इस बीच गलती से भी बुखार उतारने की कोई उलटी-सीधी दवा ले ली तो लेने के देने पड़ जाते हैं।
भारतीय उपमहाद्वीप में मच्छरों की मार बढ़ने का बड़ा कारण यहां बढ़ रहे दलदली क्षेत्र को कहा जा रहा है। यही एडीज’ मच्छर का आश्रय-स्थल बनते हैं। ठीक यही हालत देश के महानगरों की है जहां थोड़ी-सी बारिश के बाद सड़कें भर जाती हैं। ब्रिटिश गवर्नमेंट पब्लिक हेल्थ लेबोरेट्री सर्विस (पीएचएलसी) की एक अप्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के गर्म होने के कारण भी डेंगू रूपी मलेरिया प्रचंड रूप धारण कर सकता है। जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि गर्म और उमस भरा मौसम खतरनाक और बीमारियों को फैलाने वाले कीटाणुओं और विषाणुओं के लिए संवाहक जीवन-स्थिति का निर्माण कर रहे हैं।
सरकारी लाल बस्तों में दर्ज है कि हर साल करोड़ों रुपए के डीडीटी, बीएचसी, गेमैक्सिन, वीटेकस और वेटनोवेट पाउडर का छिड़काव हर मोहल्ले में हो रहा है। हालात इतने बुरे हैं कि पाइलेथाम’ और मेलाथियान’ दवाएं फिलहाल तो मच्छरों पर कारगर हैं, लेकिन दो-तीन साल में ही ये मच्छरों को और जहरीला बनाने वाली हो जाएंगी। डेंगू के इलाज में प्राइमाक्वीन कुछ हद तक सटीक है, लेकिन इसका इस्तेमाल तभी संभव है, जब रोगी के शरीर में जी-6 पी.डी.”  नामक एंजाइम की कमी ना हो। यह दवा रोगी के यकृत में मौजूद परजीवियों का सफाया कर देती है। इस दवा के इस्तेमाल से डाक्टर भी परहेज करते हैं। इसके अलावा क्वीनाइन ”  नामक एक महंगी दवा भी उपलब्ध है।
यह मान लेना चाहिए कि डेंगू से निपटने के लिए सारे साल तैयारी करनी होगी और प्रयास यह करना होगा कि यह बीमारी कम से कम लोगों को अपनी गिरफ्त में ले। जरूरत इस बात की है कि मच्छरों की पैदावार रोकने, उनकी प्रतिरोध क्षमता का आकलन कर नई दवाएं तैयार करने का काम त्वरित और प्राथमिकता से होना चाहिए।
इस बार बारिश भी ढंग से हुई नहीं। भादौ में गर्मी अपना पूरा रंग दिखा रही है। इतना ज्यादा जलभराव भी नहीं हुआ, लेकिन उमस, गंदगी और लापरवाही के चलते मच्छर और उससे उपजे डेंगू का असर दिनोंदिन गहरा होता जा रहा है। दिल्ली में एक बच्चे की मौत व उसके गम में उसके माता-पिता द्वारा आत्महत्या करने की घटना ने तो पूरे देश को हिला दिया है। अकेले दिल्ली-एनसीआर में बीते एक हफ्ते में कई सौ मरीज सरकारी अस्पताल पहुंचे हैं।

Only seminars can not promote Hindi

गोष्ठियों से नहीं होती है हिंदी साहित्य की सेवा !


पंकज चतुर्वेदी
बात कुछ साल पहले की है। एक छोटे से प्रकाशक ने नई दिल्ली के आईटीओ के करीब हिंदी भवन में पूरे दिन का साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित किया - कुछ पुस्तकों का लोकार्पण, कुछ चर्चाएं, कविता पाठ और कुछ राजनेताओं का अभिनंदन भी। नारायण दत्त तिवारी से ले कर डा. गिरजा व्यास तक अलग- अलग सत्रों में अतिथि थे। हर बार मालाएं पहनाई जातीं, नेताओं की ठकुर सुहाती और फिर चमकीले कागज में लिपटी किताबों को खोला जाता।  इतने बड़े हाल में श्रोता जुटाना प्रत्येक सत्र की समस्या था। कुछ नेताओं के चमचे- कलछी, लोकार्पित पुस्तकों के लेखकों के नाते-रिश्तेदार, प्रकाशक के दूर-करीब के सभी नातेदार(जिनका साहित्य या पठन से दूर-दूर तक वास्ता नहीं था); ऐसे कर कर 100 लोग बामुश्किल जुटते थे। चूंकि प्रत्येक सत्र के बाद स्वल्पाहार की व्यवस्था थी, अतः सत्र समाप्त होते-होते हाल भरने लगता। आखिरी सत्र था- हिंदी पर संकट। सत्र में बामुश्किल 20 लोग थे। दिसंबर की सर्दी थी और ढलती शाम में खुले आंगन में गरम-गरम मिक्स पकौड़ों का दौर चलने लगा। भीड़ इतनी कि एक-एक पकौड़े के लिए मारा-मार मची थी। तभी अपनी प्लेट और दूसरे की प्लेट से अपने कपड़े संभालते हुए हिंदी के वरिश्ठ आलोचक डा. विश्वनाथ त्रिपाठी के ठहाका लिया, ‘‘जब तक हमारे देश में पकौड़े हैं, हिंदी को कोई संकट नहीं है।’’ कई लोगो की हंसी हवा में गूंजी। लेकिन डा. त्रिपाठी की बात वैसे ही आई-गई हो गई, जैसे कि पूरे देश में हर साल होने वाली हजारों साहित्यिक गोष्ठियाें में लिए गए संकल्प और नारे कुछ ही घंटों में सुप्त हो जाते हैं।
आमतौर पर हिंदी के अधिकांश लेखक, प्रकाशक यहां तक कि पाठक भी हिंदी-जगत की दयनीयता का रोना रोते देखे जाते हैं। प्रकाशक कहता है कि हिंदी में किताबें बिकती नहीं हैं, लेकिन वह बड़े-बड़े लोकार्पण समारोहों में खूब पैसा बहाता है। लेखक अपनी गरीबी का रोना रोता दिखता है, लेकिन अपनी गांठ के पैसे से किताब छपवा कर यार-दोस्तों में वितरित करने के लोभ-संभरण से बच नहीं पाता है। पाठक अच्छी किताबों की कमी का रोना रोता है, लेकिन सौ रूपए से अधिक की कितबा खरीदने पर घर का बजट बिगड़ने की दुहाई देने लगता है। हां ! साहित्य से जुड़े तीनों वर्ग यह कहते नहीं अघाते हैं कि वे तो साहित्य-सेवा के लिए प्रतिबद्ध हैं, सो घर फूंक तमाशा देख रहे हैं। लेकिन इस ‘‘दरिद्रता’’ की हकीकत ये आंकड़े उजागर करते हैं- हमारे देश में हर साल लगभग 85 हजार पुस्तकें छप रही हैं, इनमें 25 प्रतिशत हिंदी, 20 प्रतिशत अंग्रेजी और शेष 55 प्रतिशत अन्य भारतीय भाशाओं में हैं। लगभग 16 हजार प्रकाशक सक्रिय रूप से इस कार्य में लगे हैं। प्रकाशक के साथ, टाईप सेटर , संपादक , प्रूफ रीडर, बाईंडिग, कटिंग, विपणन जैसे कई अन्य कार्य भी जुडे़ हैं। जाहिर है कि यह समाज के बड़े वर्ग के रोजगार का भी साधन है। विश्व बाजार में भारतीय पुस्तकों का बेहद अहम स्थान है। एक तो हमारी पुस्तकों की गुणवत्ता बेहतरीन है, दूसरा इसकी कीमतें कम हैं। भारतीय पुस्तकें विश्व के 130 से अधिक देशों को निर्यात की जाती हैं।
हाल ही में नई दिल्ली में संपन्न पुस्तक मेला में हिंदी के प्रकाशकों को एक साथ एक हॉल में रखा गया था। गिनती के 10 प्रकाशकों के यहां जम कर भीड़ होती थी। वहां नामचीन लेखक सारा-सारा दिन बिताते थे। हर षाम चमकीली पन्नी में लिपटी किताबों के लोकार्पण की औपचारिकता होती थी। ना किताब पर विमर्श, ना ही उसकी विशय-वस्तु पर चर्चा, और ना ही उसकी तुलना। बस लेखक की महानता पर कुछ जुमले और उसकेे बाद आसपास के सोशलाईट क्लब या होटलों की ओर जाता एक काफिला। षराब, खाना, निंदा-रस का पान और उसी के बीच किताबों की थोक सप्लाई की जुगत। कई बार किसी पाठ्य पुस्तक में अपनी किताब फंसाने की जोड़-तोड़ । ऐसे तो हो गया भाशा व साहित्य का विकास।
मेला हो या फिर गोश्ठियां, वातानुकूलित परिवेश में भी पसीने से तर-बतर लोकार्पण करते और पुस्तकें बिकने के लिए सरकार, समाज और टीवी को कोसते इन बुजुर्गवार से जब पूछो कि आप इतनी मेहनत क्यों कर रहे हैं ? तत्काल संत बन जाते हैं - ‘‘ हम तो हिंदी की, साहित्य की सेवा कर रहे हैं।’’ तो क्या साहित्य इतना दयनीय हो गया है कि उसे सेवा की जरूरत पड़ रही है ? साहित्य तो पहले समाज को दिशा और दशा देने का साधन था। अब क्या साहित्य ही दीन-हीन हो गया है ? बीते दो दशकों के दौरान सूचना और ज्ञान का विस्फोट हुआ। इंटरनेट पर करोडा़ें-अरबों पेज सूचनाएं भरी हुई हैं- इसमें कई करोड़ साहित्य से संबंधित हैं, विश्व साहित्य से संबंधित। युग आ गया तुलना का और उसमें श्रेश्ठ के आगे बढ़ने का। कुछ दशकों पहले तक शिक्षा समाज के एक सीमित वर्ग का हक हुआ करता था । ऐसे मनुवादियों के बोले-लिखे गए षब्द ब्रह्म वाक्य होते थे। वे क्या कह या लिख रहे हैं उसका आकलन करने वाले सामित थे, वैश्विक स्तर पर उसकी तुलना करने वाले तो विरले ही थे। विज्ञान और तकनीकी ने उस ‘ज्ञान के एकाधिकार’’ को समाप्त कर दिया है। ऐसे में खुद को बाजार में दिखाने, अपनी श्रेश्ठता सिद्ध करने और अपेन लेखन को विशिश्ठ बताने के लिए कुछ लेखकों ने गोश्ठियों का सहारा ले रखा है। यदि देशभर की सरकारी गोश्ठियों का आकलन करें तो पांएगे कि वही 100-50 चैहरे कभी मंचासीन होते हैं तो कहीं सामने कुर्सियों पर और उन्हीं में से कुछ षाल ओढ़ कर नारियल व चैक पकड़ते दिख जाएंगे।
कुछ बड़े प्रकाशक बड़े ही शातिर अंदाज में अपनी पुस्तकों के लोकार्पण समारोहों का आयोजन करते हैं। उसमें आमंत्रित एक-एक व्यक्ति उनकी पुस्तकों की थोक बिक्री के माध्यम होते हैं। हाल ही में दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में हिंदी की एक लेखिका के कैलाश मानसरोवर यात्रा के संस्मरणों की पुस्तक का लोकार्पण हुआ। आमंत्रण कार्ड पर बड़े ही सुगठित षब्दों में कार्यक्रम के पश्चात रसरंजन के लिए आमंत्रण का उल्लेख था। कितना निरीह है हिंदी का प्रकाशन जगत और कितनी साहित्य सेवा हो रही है ?
हिंदी प्रकाशन जगत के साथ सबसे बड़ी समस्या है, प्रकाशक बनने के लिए किसी प्रकार का कोई बंधन या कानून ना होना।  कोई भी व्यक्ति कभी भी अपने नाम से घर के पते से या गुमनाम पते से प्रकाशक बन सकता है। एक ही प्रकाशक कई-कई अलग-अलग नामों से पुस्तकें छाप सकता हैं। ना तो किसी पंजीयन की जरूरत है और ना ही किसी निरीक्षण या नियंत्रण का डर।  जिस किसी को भ्रम हो गया कि वह लेखक बन सकता है, अपने माता-पिता, गुरू या प्रेयसी को समर्पित कर एक पुस्तक छाप डालता है। इनमें कवियों की संख्या बहुत बड़ी है। और ऐसे लेखकों की आत्म-संतुश्टि साहित्यिक आयोजन के नाम पर कुछ लोगों को जुटाने व उन्हें खिलाने-पिलाने का जरिया होती है। गोश्ठी में लेखक की तारीफ होती है, रचना का उल्लेख तक नहीं होता। यदि रसरंजन की व्यवस्था हो तो लेखक की तुलना प्रेमचंद या निराला से करने की हिमाकत करने से भी नहीं चूकते हैं।
इस तरह के आयोजनों और पुस्तकों के प्रकाशन के कई दूरगामी खतरे हैं:
1 अच्छी पठन सामग्री ऐसी अधकचरा पुस्तकों के बीच कहीं छिप जाती हैं। लगातार स्तरहीन पुस्तकें देखने के बाद आम पाठक का ध्यान पठन से भटक जाता है।
2. गोश्ठियों में उठाए गए मुद्दों पर जब अमल होता नहीं देखते हैं तो नए लेखकों, पाठकों और आम लोगों के मन में पुस्तकें व लेखकों के प्रति अविश्वास का भाव उस ही तरह जाग जाता है, जैसा वे राजनेताओं के बारे में सोचते हैं।
3. फिजूलिया प्रकाशनों से कागज का अपव्यय होता है, जोकि सीधे-सीधे पर्यावरणीय संकट को बढ़ावा देता है। इसका विपरीत असर बाजार में कागज के मूल्यो ंमे वृद्धि के रूप में छात्रों व अन्य प्रकाशकों को भी झेलना पड़ता है।
4 स्तरहीन आयोजन समय, श्रम और संसाधन की फिजूलखर्ची होते हैं। कई बार अच्छे पाठक व लेखक ऐसे आयोजनों से केवल इस लिए दूर हो जाते हैं कि ऐसे आयोजनों की कुख्याति होती है।
5. सरकारी संस्थानों द्वारा आयोजित गोश्ठियां तो कतिपय लोगों को उपकृत करने या उपलब्ध बजट को फूंकने तक सीमित रहती हैं। बातें बड़ी-बड़ी होती है, सेमिनार रिपोर्ट भी छपती है, मीडिया कवरेज भरपूर होता है ; नहीं होता है तो बस वहां व्यक्त उदगारों पर अमल। सरकारी सेमिनारों के आयोजन पर लगभग रोक लगनी चाहिए।

रविवार, 11 सितंबर 2016

How to achive target of Malaria free India since 2030



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संयुक्त राश्ट्र ने हाल ही में हमारे पड़ोसी देश श्रीलंका को मलेरिया से मुक्त घेाशित कर दिया। इसमें कोई षक नहीं कि वहां की आबादी और क्षेत्रफल भारत से बहुत कम है, लेकिन यह भी मानना होगा कि हमारे पास संसाधन, मानव श्रम, शिक्षा, चिििकत्सा  की मूलभूत सुविधांए श्रीलंका से कहीं ज्यादा हैं। दोनो देशेां की मौसमी और भौगोलिक परिस्थितयों में काफी समानता है, लेकिन पिछले अनुभव बानगी हैं कि हमारे देश में योजनाएं तो बहुत बनती हैं लेकिन उनके क्रियान्वयन स्त्र पर लालफीताशाही के चलते अपेक्षित परिणाम नहीं मिले। मलेरिया डेंगू , जापानी बुखार और चिकनगुनिया जैसे नए-नए संहारक शस्त्रों से लैसे हो कर जनता पर टूट रहा है और सरकारी महकमे अपने पुराने नुस्खों को
अपना कर उनके असफल होने का रोना रोते रहते हैं । यही नहीं हाथी पांव यानी फाईलेरिया के मरीजों की संख्या भी बढ़ रही है । विशेषरूप से राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों(जहां हाल के वर्षों में अप्रत्याशित रूप से घनघोर पानी बरसा है), बिहार के सदानीरा बाढ़ग्रस्त जिलों मध्यप्रदेश ,पूर्वोंत्तर राज्यें व नगरीय-स्लम में बदल रहे दिल्ली कोलकाता जैसे महानगरों में जिस तरह मलेरिया का आतंक बढ़ा है, वह आधुनिक चिकित्या विज्ञान के लिए चुनौती है । सरकारी तंत्र पश्चिमी-प्रायांजित एड्स की काली छाया के पीछे भाग रहा है, जबकि मच्छरों की मार से फैले रोग को डाक्टर लाइलाज मानने लगे हैं । उनका कहना है कि आज के मचछर मलेरिया की प्रचलित दवाओं को आसानी से हजम कर जाते हैं । दूसरी ओर घर-घर में इस्तेमाल हो रही मच्छर -मार दवाओं के बढ़ते प्रभाव के कारण मच्छर अब और जहरीला हो गया है । देश के पहाड़ी इलाकों में अभी कुछ साल पहले तक मच्छर देखने को नहीं मिलता था, अब वहां रात में खुले में साने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है । बहरहाल यूएन ने दक्षिण-पूर्व एशिया के जिन 35 देशो में सन 2030 तक मलेरिया से पूरी तरह मुक्ति का लक्ष्य रखा है, उसमें भारत भी है। श्रीलंका ेक अलावा मालदीव भी मलेरिया-मुक्त हो चुका है। यह भी बानगी है कि सन 2014 में हमारे मलेरिया उन्मूलन के कुल बजट का 90 फीसदी प्रशासनीक व्यय में ही खप गया। मेडिकेटेड मच्छरदानी वितरित करने के लक्ष्य की पूर्ति एक फीसदी ही रही। यह आंकड़े हमारी मलेरिया से लड़ने की इच्छा-शक्ति की बानगी हैं।
श्रीलंका भाारी बारिश, ढेर सरी जल संरचनाओं, व नमी वले घने जंगलों वाला देश है जहां मच्छर और उससे जनित रोगों के उपजने का अनुकूल परिवेश हुआ करता था। वहां दो दशक से मलेरिया-मुक्त अभियान का असर था कि सन 2006 में वहां मलेरिया के मामले 1000 से कम दर्ज हुए।  अक्तूबर-2012 में इसके रोगी षून्य रहे और उसके बाद पिछले साढे तीन साल में एक भी मलेरिया का मरीज सामने नहीं आया। वहीं भारत में सन् 1958 में अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के अनुरूप शुरू हुए राष्ट्रीय मलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम को शुरूआती दौर में खासी सफलता मिली थी । 1965 में तो मलेरियाग्रस्त रोगियों की सालाना संख्या महज एक लाख थी । सरकारी रिकार्ड के मुताबिक उस साल देशभर में कोई भी मलेरिया के कारण मरा नहीं । सनद रहे कि आजादी के समय हर साल साढ़े सात करोड़ लोगों के मलेरिया की चपेट में आने व आठ लाख लोगों की इससे मौत होने के सरकारी आंकड़े दर्ज हुए थे । साठ के दशक में ‘‘ ना मच्छर रहेगा और ना ही मलेरिया’’ का नारा काफी हद तक सफल रहा । लेकिन सत्तर का दशक आते-आते इस नारे में कुछ बदलाव आ गया -‘‘ मच्छर तो रहेगा, लेकिन मलेरिया नहीं ’’ । देश के स्वास्थ्य विभाग के रजिस्टर बताते हैं कि 1976 में मलेरिया ने फिर बाढ़ तोड़ दी थी । इस साल 64 लाख से अधिक लोग मलेरिया की चपेट में आए । सरकार एक बार फिर चेती और 1983 में मलेरियाग्रस्त लोगों की संख्या 16 लाख 65 हजार हो गई । 1992 में मलेरिया के 21.26 लाख मामले प्रकाश में आए । 1997 में यह संख्या बढ़ कर 25.53 लाख हो गई । यही नहीं इस दौरान मलेरिया से मरने वालों की संख्या 422 से बढ़ कर 711 हो गई ।  1998 में मरने वालों की ंसख्या 1010 और उसके आगे के सालों में इसमें सतत बढ़ौतरी होती रही है । अनुमान है कि इस साल(31 मार्च को समाप्त हुए वित्तीय वर्ष में )यह संख्या दो हजार के पार है । हांलाकि पिछले दिनों इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च द्वारा श्री पदम सिंह प्रधान की अध्यक्षता में गठित 16 सदस्यांे की कमेटी ने बेहद गंभीर चेतावनी देते हुए बताया है कि भारात में मलेरिया से मरने वालों की असल संख्या , सरकारी आंकडात्रें के चालीस गुणा अधिक होती हे। इस समिति ने पाया कि भारत में हर साल औसतन चालीस हजार लोग मच्छर के कारण काल के गाल में समा जाते हैं।  इन दिनों पश्चिम बंगाल में मलेरिया का आतंक ज्यादा है । सन 2006 में वहां मलेरिया के 18 हजार से अधिक मामले और 55 मौतें दर्ज की गईं ।सन 2015 में हमारे यहां चिकनगुनया के 27,553 अैर डेंगू के 99,913 मामले दर्ज हुए थे। इस साल तो जुलाई तक ही मलेरिया के 4,71,083 मरीज आए जिनमें से 119 की मौत हो गई। 31 अगस्त तक चिकनगुनया के 12,555 और डेंगेू के 27,889 मामले प्रकाश में आए, जबकि डेंगू से मरने वालों की संख्या 60 रही। सनद रहे रोग का यह भयावह रूप् हमारे र्प्यटन उद्योग का सबसे बड़ा दुश्मन है।
शुरूआती दिनों में शहरों को मलेरिया के मामले में निरापद माना जाता था और तभी शहरों में मलेरिया उन्मूलन पर कोई खास ध्यान नहीं दिया गया । 90 के दशक में भारत में औद्योगिकीकरण का विकास हुआ । नए कारखाने लगाने के लिए ऐसे इलाकों के जंगल काटे गए, जिन्हें मलेरिया-प्रभावित वन कहा जाता था । ऐस जंगलों पर बसे शहरों में मच्छरों को बना-बनाया घर मिल गया । जर्जर जल निकास व्यवस्था, बारिश के पानी के जमा होने के आधिक्य और कम क्षेत्रफल में अधिक जनसंख्या के कारण नगरों में मलेरिया के जीवाणु तेजी से फल-फूल रहे हैं । भारत में मलेरिया से बचाव के लिए सन् 1953 में राष्ट्रीय मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम शुरू किया गया था । गांव-गांव में डी.डी.टी. का छिड़काव और क्लोरोक्वीन की गोलियां बांटने के ढर्रे में सरकारी महकमे भूल गए कि समय के साथ कार्यक्रम में भी बदलाव जरूरी है । धीरे-धीरे इन दवाओं की प्रतिरोधक क्षमता मच्छरों में आ गई । तभी यह छोटा सा जीव अब ताकतवर हो कर निरंकुश बन गया है । पिछले कुछ सालों से देश में कोहराम मचाने वाला मलेरिया सबटर्मियम या पर्निसियम मलेरिया कहलाता है । इसमें तेज बुखार के साथ-साथ लकवा, या बेहोशी छा जाती है । हैजानुमा दस्त, पैचिस की तरह शौच में खून आने लगता है । रक्त-प्रवाह रुक जाने से शरीर ठंडा पड़ जाता है । गांवों में फैले नीम-हकीम ही नहीं , बड़े-बड़े डिगरी से लैसे डाक्टर भी भ्रमित हो जाते हैं कि दवा किस मर्ज की दी जाए।  डाक्टर लेबोरेट्री- जांच व दवाएं बदलने में तल्लीन रहते हैं और मरीज की तड़प-तड़प कर मौत हो जाती है । इसे समझना बड़ा मुश्किल रहता है कि यह नए जमाने का मलेरिया है । मध्यप्रदेश में घर-घर में लोगों को चलने-फिरने से लाचार बनाने वाले चिकनगुनिया के इलाज में भी डाक्टरों के साथ ऐसे ही संशय की स्थिति रहती है ।
हालांकि ब्रिटिश गवर्नमेंट पब्लिक हेल्थ लेबोरेट्री सर्विस(पीएचएलसी) की एक अप्रकाशित रिपोर्ट में बीस साल पहले ही चेता दिया गया था कि दुनिया के गर्म होने के कारण मलेरिया प्रचंड रूप ले सकता है । गर्मी और उमस में हो रहा इजाफा खतरनाक बीमारियों को फैलाने वाले कीटाण्ुाओं व विषाणुओं के लिए संवाहक के माकूल हालात बना रहा है । रिपोर्ट में कहा गया था कि एशिया में तापमान की अधिकता और ठहरे हुए पानी के कारण मलेरिया के परजीवियों को फलने-फूलने का अनुकूल अवसर मिल रहा है । कहा तो यह भी जाता है कि घरों के भीतर अंधाधुंध शौचालयों के निर्माण व शैाचालयों के लिए घर के नीचे ही टेंक खोदने के कारण मच्छरों की आबादी उन इलाकों में भी ताबड़तोड़ हो गई है, जहां अभी एक दशक पहले तक मच्छर होते ही नहीं थे । सनद रहे कि हमारे यहां स्वच्छता अभियान के नाम पर गांवों में जम कर षौचालय बनाए जा रहे हैं, जिनमें ना तो पानी है, ना ही वहां से निकलने वाले गंदे पानी की निकासी की मुकम्मल व्यवस्था। राजधानी दिल्ली में ही जल-भराव, कूड़े के निबटान, मच्छरों के लार्वा विकसित होने से रोकने के मामले में फिसड्डी हैं। यहां मुख्य सडत्रकां पर थोड़ी सी बरसात का पानी ठहर जाता है। हर रोज नौ लाख टन कचरा बगैर ठिकाने लगाए पडा रहता है।
हरित क्रांति के लिए सिंचाई के साधन बढ़ाने और फसल को कीटों से निरापद रखने के लिए कीटनाशकों के बढ़ते इस्तेमाल ने भी मलेरिया को पाला-पोसा है । बड़ी संख्या में बने बांध और नहरों के करीब विकसित हुए दलदलों ने मच्छरों की संख्या बढ़ाई है । रही बची कसर फसलों में डीडीटी ऐसे ही कीटनाशकों के बेतहाशा दुरूपयोग ने पूरी कर दी । खाने के पदार्थों में डीडीटी का मात्रा जहर के स्तर तक बढ़ने लगी, वहीं दूसरी ओर मच्छर ने डीडीटी को डकार लेने की क्षमता विकसित कर ली । बढ़ती आबादी के लिए मकान, खेत और कारखाने मुहैया करवाने के नाम पर गत् पांच दशकों के दौरान देश के जंगलों की निर्ममता से कटाई की जाती रही है । कहीं अयस्कों की खुदाई तो जलावन या फर्नीचर के लिए भी पेड़ों को साफ किया गया ।  जहां 1950 में 40.48 मिलीयन हेक्टर में हरियाली का राज था, आज यह सिमट कर 22 मिलीयन के आसपास रह गया है । हालांकि घने जंगल मच्छर व मलेरिया के माकूल आवस होते हैं और जंगलों में रहने वचाले आदिवासी मलेरिया के बड़े शिकर होते रहे हैं । लेकिन यह भी तथ्य है कि वनवासियों में मलेरिया के कीटाणुओं से लड़ने की आंतरिक क्षमता विकसित हो चुकी थी । जंगलों के कटने से इंसान के पर्यावास में आए बदलाव और मच्छरों के बदलते ठिकाने ने शहरी क्षेत्रों में मलेरिया को आक्रामक बना दिया ।
मलेरिया उपचार की सर्वाधिक प्रचलित दवा ‘‘ क्लोरोक्वीन’’ है । आज यह पूरी तरह निष्प्रभावी है, उलटे इसके विषम असर हो रहे हैं, इसके बावजूद इसकी बिक्री व वितरण धड़ल्ले से हो रहा है । सन 2000में तो देश के 14 राज्यों के कई जिलों में बाकायदा इस पर रिसर्च हुआ था, जिसमें पाया गया था कि मच्छरों में पाया जाने वाला पी.फाल्सीपेरम परजीवी इस दवा का आदी हो चुका है । उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर, पश्चिम बांगाल के पुरूलिया, बोगमुंडी व जलपाईगुड़ी , उड़ीसा के क्योंझर, गुजरात के पंचमहल,कच्छी , कोलार, महाराष्ट्र के चंद्रपुर, असम के कार्बी, नोगांव दरांग , अरूणाचल प्रदेश के लोहित तथा तिराब, मिजोरम के आयजोल,लुंगलेई और नगालैंड के सभी जिलों में यह दवा मलेरिया के रोगियों पर बेअसर साबित हुई है । वैसे इन जिलों में अब क्लोक्वीन की सप्लाई बंद कर सल्फाडाक्सीन भेजी जा रही है ।
एक बात और ग्रामीण भारत में पूरा मलेरिया अभियान छह लाख ‘‘आशा’ कार्यकर्ताओं के बल पर खड़ा है । इन्हें ना तो समय पर वेतन मिल रहा है, ना ही पर्याप्त परीक्षण किट या दवाएं , कुल मिला कर वे स्वयं निराशा में रहती हैं। वहीं सरकारी अस्पतालों के हालात बहुत बुरे हैं, 80 प्रतिशत अस्पतलों में क्षमता से दोगुने मरीज भरती हैं। दिल्ली में ही एक बिस्तर पर पदो-तीन मरीज डाले जा रहे हैं।
जहां सारी दुनिया मलेरिया से निबटने के प्रयास कर रही है, वहीं भारत सरकार इसके प्रति लापरवाह ही है । जान कर आश्चर्य होगा कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में मलेरिया की चर्चा तक नहीं है । जब देश की आबादी, मच्छर, मलेरिया , महंगाई सभी कुछ में बढ़ौतरी हो रही है।, ऐसे में मलेरिया के बजट में पहले से भी कमी की जा रही है । सनद रहे कि मलेरिया से जूझने के कुल बजट से अधिक तो एड़स के नारे-पोस्टरों पर खर्च किया जा रहा है । वैसे भी मलेरिया बजट की कुल राशि का तीन-चौथाई तो गैर-योजना मद में जाता है । दिल्ली में इस बार पानी अच्छा बरसा तो नगर निगम की पोल खुल गई, ना नाले साफ ना मुहल्ले, तभी एनसीआर के अस्पताल मच्छर-जनित रेागों से पटे पड़े हैं।
महालेखा नियंत्रक व परीक्षक(सीएजी) की पिछली कई रिपोर्ट गवाह हैं कि उत्तर प्रदेश जैसे राजयों में मलेरिया से पीड़ित अस्पताल पहुंचने वाले आधे से अधिक मरीजों का कोई इलाज ही नहीं किया गया । मच्छर से निबटने के लिए मंजूर पैसे से कारें खरीीद कर आला -अफसरों को उपकृत करना, एबीईआर यानी रक्त परीक्षण, डीडीटी का छिड़काव आदि कार्य कागजों पर ही होते रहे हैं ।
विडंबना है कि हमारे देश में मलेरिया से निबटने की नीति ही गलत है - पहले मरीज बनो, फिर इलाज होगा । जबकि होना यह चाहिए कि मलेरिया फैल ना सके, इसकी कोशिश हों । मलेरिया प्रभावित राज्यों में पेयजल या सिंचाई की योजनाएं बनाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि ठहरा हुआ पानी कहीं ‘‘ मच्छर-प्रजनन केंद्र’’ तो नहीं बन रहा है । धरती का गरम होता मिजाज जहां मलेंरिया के माकूल है, पहीं एंटीबायोटिक दवाओं के मनमाने इस्तेमाल से लोगों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता घट रही है । नीम व ऐसी ही वनोषधियों से मलेरिया व मच्छर उन्मूलन की दवाओं को तैयार करना हमारी प्राथमिकता होना चाहिए ।


डेंगू का दंश
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के हर शहर-गांव , कालेानी में डेंगू के मरीजों की बाढ़ अस्पतालोे की ओर आ रही है । गाजियाबाद जैसे जिलों के अस्पताल तो बुखार-पीड़ितों से पटे पड़े हैं। अब तो इतना खौफ है कि साधारण बुखार का मरीज भी बीस-पच्चीस हजार रूपए दिए बगैर अस्पताल से बाहर नहीं आता है। डाक्टर जो दवाएं दे रहे हैं उनका असर भगवान-भरोसे है । वहीं डेंगू के मच्छरों से निबटने के लिए दी जा रही दवाएं उलटे उन मच्छरों को ताकतवर बना रही हैं ।
डेंगू फैलाने वाले ‘एडिस’ मच्छर सन 1953 में अफ्रीका से भारत आए थे । उस समय कोई साढ़े सात करोड़ लोगों को मलेरिया वाला डेंगू हुआ था , जिससे हजारों मौतें हुई थीं । अफ्रीका में इस बुखार को डेंगी कहते हैं । यह तीन प्रकार को होता है । एक वह, जोकि चार-पांच दिनों में अपने आप ठीक हो जाता है, लेकिन मरीज को महीनों तक बेहद कमजोरी  रहती है । दूसरे किस्म में मरीज को हेमरेज हो जाता है, जो उसकी मौत का कारण भी बनता है । तीसरे किस्म के डेंगू में हेमरेज के साथ-साथ रोगी का ब्लड प्रेशर बहुत कम हो जाता है, इतना कि उसके मल -द्वार से खून आने लगता है व उसे बचाना मुश्किल हो जाता है ।
विशेषज्ञों के मुताबिक डेंगू के वायरस भी चार तरह के होते हैं- सीरो-1,2, 3 और 4। यदि किसी मरीज को इनमें से किन्हीं दो तरह के वायरस लग जाएं तो उसकी मौत लगभग तय होती है । ऐसे मरीजों के शरीर पर पहले लाल-लाल दाने पड़ जाते हैं । इसे बचाने के लिए शरीर के पूरे खून को बदलना पड़ता है । सनद रहे कि डेंगू से पीड़ित मरीज को 104 से 107 डिग्री बुखार आता है । इतना तेज बुखार मरीज की मौत का पर्याप्त कारण हो सकता है । डेंगू का पता लगाने के लिए मरीज के खून की जांच करवाई जाती है, जिसकी रिपोर्ट आने में देा-तीन दिन लग जाते हैं । तब तक मरीज की हालत लाइलाज हो जाती है । यदि इस बीच गलती से भी बुखार उतारने की कोई उलटी-सीधी दवा ले ली तो लेने के देने पड़ जाते हैं ।
भारतीय उपमहाद्वीप में मच्छरों की मार बढ़ने का बड़ा कारण यहां बढ़ रहे दलदली क्षेत्र को कहा जा रहा है । थार के रेगिस्तान की इंदिरा गांधी नहर और ऐसी ही सिंचाई परियोजनाओं के कारण दलदली क्षेत्र तेजी से बढ़ा है । इन दलदलों में नहरों का साफ पानी भर जाता है और यही ‘एडीस’ मच्छर का आश्रय-स्थल बनते हैं । ठीक यही हालत देश के महानगरों की है जहां, थेाड़ी सी बारिश के बाद सड़कें भर जाती हैं । ब्रिटिश गवरमेंट पब्लिक हेल्थ लेबोरेट्री सर्विस(पीएचएलसी) की एक अप्रकाशित रिपेार्ट के मुताबिक दुनिया के गरम होने के कारण भी डेंगूरूपी मलेरिया प्रचंड रूप धारण कर सकता है । जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि गरम और उमस भरा मौसम, खतरनाक और बीमारियों को फैलाने  वाले कीटाणुओं और विषाणुओं के लिए संवाहक जीवन-स्थिति का निर्माण कर रहे हैं ।  रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि एशिया में तापमान की अधिकता और अप्रवाही पानी के कारण मलेरिया के परजीवियों को फलने-फूलने का अनुकूल माहौल मिल रहा है ।
बहरहाल डेंगू के मरीज बढ़ रहे हैं और  नगर निगम के कर्मचारी घर-घर जा कर मच्छर के लार्वा चैक करने की औपचारिकता निभा रहे हैं । सरकारी लाल बस्तों में दर्ज है कि हर साल करोड़ो रूपए के डीडीटी, बीएचसी, गेमैक्सिन, वीटेकस और वेटनोवेट पाउडर का छिड़काव हर मुहल्ले में हो रहा है, ताकि डंेगू फैलाने वाले मच्छर ना पनप सकें । हकीकत तो यह है कि मच्छर इन दवाओं को खा-खा कर और अधिक खतरनाक हो चुके हैं । यदि किसी कीट को एक ही दवा लगातार दी जाए तो वह कुछ ही दिनों में स्वयं को उसके अनुरूप ढ़ाल लेता है । हालात इतने बुरे हैं कि ‘पाईलेथाम’ और ‘मेलाथियान’ दवाएं फिलहाल तो मच्छरों पर कारगर हैं, लेकिन दो-तीन साल में ही ये मच्छरों को और जहरीला बनाने वाली हो जाएंगी ।
भले की देश के मच्छरों ने अपनी खुराक बदल दी हो, लेकिन अभी भी हमारा स्वास्थ्य -तंत्र ‘‘ क्लोरोक्वीन’’ पर ही निर्भर है । हालांकि यह नए किस्म के मलेरिया यानी डेंगू पर पूरी तरह अप्रभावी है । डेंगू के इलाज में ‘‘प्राइमाक्वीन कुछ हद तक सटीक है, लेकिन इसका इस्तेमाल तभी संभव है, जब रोगी के शरीर में ‘‘ जी-6 पी.डी.’’ नामक एंजाइम की कमी ना हो । यह दवा रोगी के यकृत में मौजूद परजीवियों का सफाया कर देती है ।  विदित हो कि एंजाइम परीक्षण की सुविधा देश के कई जिला मुख्यालयों पर भी उपलब्ध नहीं है, अतः इस दवा के इस्तेमाल से डाक्टर भी परहेज करते हैं ।  इसके अलावा ‘‘क्वीनाईन ’’ नामक एक महंगी दवा भी उपलब्ध है, लेकिन इसकी कीमत आम मरीज की पहुंच के बाहर है ।


पंकज चतुर्वेदी
यूजी-1, 3/186 ए राजेन्द्र नगर
सेक्टर-2
साहिबाबाद
गाजियाबाद 201005
9891928376, 0120-4241060









urban planning needs to be modified as global warming chalanges



राजनीति: नगर नियोजन के नए तकाजे


पिछले दो महीनों के दौरान प्रत्येक महानगर की चकाचौंध और विकास की जमकर पोल खुली।


शहरों में बाढ़ रोकने के लिए पहला काम तो वहां के पारंपरिक जलस्रोतों में पानी की आवक और निकासी के पुराने रास्तों में बन गए स्थायी निर्माणों को हटाने का करना होगा। अगर किसी पहाड़ी से पानी नीचे बह कर आ रहा है तो उसका संग्रहण किसी तालाब में ही होगा। विडंबना है कि ऐसे जोहड़-तालाब कंक्रीट के जंगल में खो गए हैं।
राजधानी दिल्ली हो या फिर भोपाल या बंगलुरुया फिर हैदराबाद, पिछले दो महीनों के दौरान प्रत्येक महानगर की चकाचौंध और विकास की जमकर पोल खुली। यह पहली बार नहीं हो रहा है, लगभग हर साल बरसात में होता है या बगैर बरसात के भी हो जाता है। शहर के वाहन थम जाते हैं। यह भी सच है कि जिस तरह जाम में फंसे आम लोग केवल अपने वाहन के निकलने का रास्ता बना कर इस समस्या से मुंह मोड़ लेते हैं, उसी तरह शहरों के लोग ऐसी कोई भी दिक्कत आने पर हल्ला करना भी मुनासिब नहीं समझते, मीडिया जरूर कुछ सक्रिय रहता है और उसके बाद फिर समाज नोन-तेल-लकड़ीमें व्यस्त हो जाता है। शहरीकरण आधुनिकता की हकीकत है और पलायन इसका मूल, लेकिन नियोजित शहरीकरण ही विकास का पैमाना है। गौर करें कि चमकते-दमकते दिल्ली शहर की डेढ़ करोड़ हो रही आबादी में से कोई चालीस फीसद झोपड़-झुग्गियों में रहती है, यहां की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था लचर और अपर्याप्त है। मुंबई या कोलकता के हालात भी इससे कहीं बेहतर नहीं हैं।
आर्थिक उदारीकरण के दौर में जिस तरह खेती-किसानी से लोगों को मोह भांग हुआ और जमीन बेच कर शहरों में मजदूरी करने का चलन बढ़ा है, उससे गांवों का कस्बा बनना, कस्बों का शहर और शहर का महानगर बनने की प्रक्रिया तेज हुई है। विडंबना है कि हर स्तर पर शहरीकरण की एक ही गति-मति रही। पहले आबादी बढ़ी, फिर खेत में अनधिकृत कॉलोनी काट कर या किसी सार्वजनिक पार्क या पहाड़ पर कब्जा कर अधकच्चे, उजड़े-से मकान खड़े हुए। कई दशकों तक न तो नालियां बनीं न सड़क, और धीरे-धीरे इलाका अर्बन-स्लममें बदल गया। लोग रहें कहीं भी, लेकिन उनके रोजगार, यातायात, शिक्षा व स्वास्थ्य-सुविधा का दबाव तो उसीचार दशक पुरानेनियोजित शहर पर पड़ा, जिस पर अनुमान से दस गुना ज्यादा बोझ हो गया है। परिणाम सामने है कि दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता जैसे महानगर ही नहीं, देश के आधे से ज्यादा शहरी क्षेत्र अब बाढ़ की चपेट में हैं।
गौर करने लायक बात यह भी है कि साल में ज्यादा से ज्यादा पच्चीस दिन बरसात के कारण बेहाल हो जाने वाले ये शहरी क्षेत्र पूरे साल में आठ से दस महीने पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसते हैं। राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, पटना के एक शोध में सामने आया है कि नदियों के किनारे बसे लगभग सभी शहर अब थोड़ी-सी बरसात में ही दम तोड़ देते हैं। दिक्कत अकेले बाढ़ की नहीं है, इन शहरों की दुरमट मिट्टी में पानी सोखने की क्षमता अच्छी नहीं होती है। चूंकि शहरों में अब गलियों में भी सीमेंट पोत कर आरसीसी सड़कें बनाने का चलन बढ़ गया है और औसतन बीस फीसद जगह ही कच्ची बची है, सो पानी सोखने की प्रक्रिया नदी-तट के करीब की जमीन में तेजी से होती है।
जाहिर है कि ऐसी बस्तियों की उम्र ज्यादा नहीं है और लगातार कमजोर हो रही जमीन पर खड़े कंक्रीट के जंगल किसी छोटे-से भूकम्प से भी ढह सकते हैं। याद करें दिल्ली में यमुना किनारे वाली कई कॉलोनियों के बेसमेंट में अप्रत्याशित पानी आने और ऐसी कुछ इमारतों के गिर जाने की घटनाएं भी हुई हैं। देश की राजधानी दिल्ली के दरवाजे पर खड़े गाजियाबाद में गगनचुंबी इमारतों के नए ठिकाने राजनगर एक्सटेंशन को दूर से देखो तो एक समृद्ध, अत्याधुनिक उपनगरीय विकास का नमूना दिखता है, लेकिन जैसे-जैसे मोहन नगर से उस ओर बढ़ते हैं तो अहसास होने लगता है कि समूचा सुंदर स्थापत्यत एक बदबूदार गंदे नाबदान के किनारे है। जरा और ध्यान से देखें तो साफ हो जाता है कि यह एक भरपूर जीवित नदी का बलात गला घोंट कर कब्जाई जमीन पर किया गया विकास है, जिसकी कीमत फिलहाल तो नदी चुका रही है, लेकिन वह दिन दूर नहीं जब नदी के असामयिक काल कवलित होने का खमियाजा समाज को भी भुगतना होगा। यह दुखद है कि आंध्र प्रदेश जैसे राज्य की नई बन रही राजधानी नदी के जलग्रहण क्षेत्र में बनाई जा रही है और उसका अति बरसात में डूबना तय है।
शहरों में बाढ़ का सबसे बड़ा कारण तो यहां के प्राकृतिक नालों पर अवैध कब्जे, भूमिगत सीवरों की ठीक से सफाई न होना है। लेकिन इससे बड़ा कारण है हर शहर में हर दिन बढ़ते कूड़े का भंडार व उसके निबटान की माकूल व्यवस्था न होना। अकेले दिल्ली में नौ लाख टन कचरा हर दिन बगैर उठाए या बगैर निबटान के सड़कों पर पड़ा रह जाता है। जाहिर है कि बरसात होने पर यही कूड़ा पानी के नाली तक जाने के रास्ते या फिर सीवर के मुंह को बंद करता है। महानगरों में भूमिगत सीवर जल भराव का सबसे बड़ा कारण हैं। जब हम भूमिगत सीवर के लायक संस्कार नहीं सीख पा रहे हैं तो फिर खुले नालों से अपना काम क्यों नहीं चला पा रहे हैं? पोलीथीन, घर से निकलने वाले रसायन और नष्ट न होने वाले कचरे की बढ़ती मात्रा, कुछ ऐसे कारण हैं जो कि गहरे सीवरों के दुश्मन हैं। यदि शहरों में कूड़ा कम करने और उसके निबटारे के कारगर उपाय नहीं हुए तो नालों या सीवर की सफाई के दावे या फिर आरोप बेमानी ही रहेंगे।
एक बात और। बंगलुरुया हैदराबाद या दिल्ली में जिन इलाकों में पानी भरता है अगर वहां की कुछ दशक पुरानी जमीनी संरचना का रिकार्ड उठा कर देखें तो पाएंगे कि वहां पर कभी कोई तालाब, जोहड़ या प्राकृतिक नाला था। अब पानी के प्राकृतिक बहाव के स्थान पर सड़क या कॉलोनी रोपी गई है तो पानी भी तो धरती पर अपने हक की जमीन चाहता है? न मिलने पर वह अपने पुराने स्थानों की ओर रुख करता है। मुंबई में मीठी नदी के उथले होने और सीवर की पचास साल पुरानी व्यवस्था के जर्जर होने के कारण बाढ़ के हालात बनने की हकीकत को सरकारें स्वीकार करती रही हैं। बंगलुरु में पारंपरिक तालाबों के मूल स्वरूप में अवांछित छेड़छाड़ को बाढ़ का कारक माना जाता है।
शहरों में बाढ़ रोकने के लिए सबसे पहला काम तो वहां के पारंपरिक जल स्रोतों में पानी की आवक और निकासी के पुराने रास्तों में बन गए स्थायी निर्माणों को हटाने का करना होगा। अगर किसी पहाड़ी से पानी नीचे बह कर आ रहा है तो उसका संग्रहण किसी तालाब में ही होगा। विडंबना है कि ऐसे जोहड़-तालाब कंक्रीट के जंगल में खो गए हैं। परिणामत: थोड़ी ही बारिश में पानी कहीं बहने की जगह बहकने लगता है। यदि अब भी समाज संभल जाए और नदियों, नालों, पहाड़ों पर अतिक्रमण की प्रवृत्ति से बचे तो कम से कम उनकी बसी-बसाई गृहस्थी जलप्लावित होने से बच सकती है।
शहरीकरण व वहां बाढ़ की दिक्कतों पर विचार करते समय एक वैश्विक त्रासदी को ध्यान में रखना जरूरी है- जलवायु परिवर्तन। इस बात के लिए हमें तैयार रहना होगा कि वातावरण में बढ़ रहे कार्बन और ग्रीनहाउस गैस प्रभावों के कारण ऋतुओं का चक्र गड़बड़ा रहा है और इसकी दुखद परिणति है- मौसम का चरम उतार-चढ़ाव। गरमी में भयंकर गरमी तो ठंड के दिनों में कभी बेतहाशा जाड़ा तो कभी गरमी का अहसास। बरसात में कभी सुखाड़ तो कभी अचानक आठ से दस सेमी पानी बरस जाना। पिछले साल चेन्नई, उससे पहले कश्मीर और इस साल दिल्ली व हैदराबाद में ऐसे चरम मौसम सड़कों को दरिया बना चुके हैं। संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट तो ग्लोबल वार्मिंग के चलते भारत की चार करोड़ आबादी पर खतरा बता रही है। इसमें कहा गया है कि यदि धरती का तापमान ऐसे ही बढ़ा तो समुद्र का जल-स्तर बढ़ेगा और उसके चलते कई शहरों पर डूब का खतरा होगा। यह खतरा महज समुद्र तटों के शहरों पर नहीं होगा, बल्कि उन शहरों को भी डुबा सकता है जो ऐसी नदियों के किनारे हैं जिनका पानी सीधे समुद्र में गिरता है।
अब यह तय है कि आने वाले दिन शहरों के लिए सहज नहीं होंगे, यह भी तय है कि आने वाले दिन शहरीकरण के विस्तार के हैं, तो फिर किया क्या जाए? आम लोग व सरकार कम से कम कचरा फैलाने का संकल्प लें। पॉलीथिन पर तो पूरी तरह पाबंदी लगे। शहरों में अधिक से अधिक खाली जगह यानी कच्ची जमीन हो, ढेर सारे पेड़ हों। शहरों में जिन स्थानों पर पानी भरता है, वहां उसे भूमिगत करने के प्रयास हों। तीसरा प्राकृतिक जलाशयों व नदियों को उनके मूल स्वरूप में रखने तथा उनके जलग्रहण क्षेत्र को किसी भी रूप में निर्माण-मुक्त रखने के प्रयास हों। पेड़ तो वातावरण की गर्मी को नियंत्रित करने और बरसात के पानी को जमीन पर गिर कर मिट्टी काटने से बचाते ही हैं।
इन सब अनुभवों के मद््देनजर नगर नियोजन की नीति और नियम नए सिरे तय करना जरूरी है। शहरी व्यवस्थाएं, रास्ते, यातायात, बसाहटें इस ढंग से हों कि वे बरसाती पानी के निकास में बाधा न बनें। यही नहीं, वर्षाजल को किस तरह जमीन के नीचे पहुंचाया जाए, यह भी सोचना होगा। अभी इसका तनिक खयाल नहीं रखा जाता, चप्पा-चप्पा कंक्रीट से पटा होता है। फिर, भूमिगत जल का भंडार खाली क्यों नहीं होगा। हमारे शहर पानी की मांग तो अधिकाधिक बढ़ाते जा रहे हैं, पर पानी के संरक्षण और संचयन की योजना नहीं बना रहे हैं। अगर वे अब भी नहीं संभले तो बहुत देर हो जाएगी।


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