तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2016

learn road manners before demanding good roads

कौन सिखाएगा सड़क-संस्कार ?


देश की राजधानी दिल्ली हो या राज्य की जयपुर या भोपाल या फिर दूरस्थ गांवों तक, आम आदमी इस बात से सदैव रूष्ट मिलता है कि उसके यहां की सड़क टूटी है, संकरी है, या काम की ही नहीं है। लेकिन समाज कभी नहीं समझता कि सड़कों की दुर्गति करने में उसकी भी भूमिका कम नहीं है। अब देशभर में बाईस लाख करोड़ खर्च कर सड़कों का जाल बिछाया जा रहा है। श्वेत क्रांति व हरित क्रांति के बाद अब देश सड़क-क्रांति की ओर अग्रसर है। यह तो जान लेना चाहिए कि सड़क निर्माण पर खर्च होने वाली राशि कहीं आसमान से नहीं टपकेगी। यह हमारी-तुम्हारी जेब से ही निकाली जाएगी, टैक्स के नाम पर या और किसी माध्यम से। इतनी बड़ी राशि खर्च कर तैयार सड़कों का रखरखाव भी महंगा होगा। अभी तक देश में बिछी सड़कों के जाल के रखरखाव पर सालाना खर्च इससे भी अधिक होता है।
लेकिन यह नसीहत कौन दे कि लोगों को अब सड़क-इस्तेमाल करने के संस्कार सीखने होंगे। अभिप्राय तो सही तरीके से ड्राइविंग या पैदल चलने वालों को रास्ता देने के शिष्टाचार से होगा। यह एक चिंता का विषय है कि जिस देश में हर साल लगभग एक लाख लोग सड़क हादसों में मारे जा रहे हों, वहां तेज गति के वाहन चलने वाले सुपरफास्ट एक्सप्रेस वे बनाना कहां तक न्यायोचित व प्रासंगिक है ? एक्सप्रेस वे पर चलने के सामान्य शिष्टाचार की धज्जियां उड़ती देखना हो तो राजधानी दिल्ली से 30-40 किमी दूरी पर मथुरा या करनाल हाईवे पर देख सकते हैं। यहां विपरीत दिश में चलते वाहन, बैलगाड़ी या ट्रैक्टर का मनमाने तरीके से संचालन, ‘‘जुगाड़’’ जैसे गैरकानूनी वाहनों में भरी भीड़ व ओवरलोड टैंपो या बसों की भागमभाग, ओवरटक करते वाहन देखे जा सकते हैं। सड़क के व्यस्ततम समय में टोल नाकों पर वाहनों की लंबी लाईन, और वहां पहले निकलने की होड़ में एक दूसरे को धकियाते वाहन और उनको नियंत्रित करने वाली किसी व्यवस्था का न होना दर्शाता है कि हिंदुस्तान के लेाग अभी ऐसी सड़कों पर चलने के लायक नहीं हैं। साथ ही हमारी व्यवस्थाएं भी इतनी चाक चौबंद नहीं हैं कि 100 या 120 किमी प्रतिघंटे की गति से वाहन दौड़ाने वाली सड़कों पर खूनी खेल होने से रोक सके। सुपरफास्ट ट्रैफिक के लिए बनी सड़कों के फ्लाई ओवरों पर साईकल रिक्शा, या रेहड़ी का बीच में ही अटक जाना व उसके पीछे ओटोमोबाईल वाहनों का रेंगना सड़क के साथ-साथ इंधन की भी बर्बादी करता है, लेकिन इस की देखभाल के लिए कोई नहीं है।
कुल मिला कर हमारी सोच बेहद थोथी है। दिल्ली से ग्रेटर नोएडा के बीच सरपट रोड के दोनों ओर अब मकान और दुकान ही देखने लगे हैं। ग्रेटर नोएडा से आगरा के बीच ताज एक्सप्रेस वे पर पांच नए शहर बसाने के लिए बड़े-बड़े प्राईवेट बिल्डरों को ठेका दिया जा रहा है। जाहिर है कि यहां की संभावित लाखों-लाख आबादी अपने दैनिक उपयोग के लिए इसी एक्सप्रेस -वे का इस्तेमाल करेगी। इस पर इक्का-तांगा भी चलेंगे और साईकिल और रिक्शा भी। जाहिर है कि इस सड़क की हालत बहुत-कुछ राजधानी दिल्ली की आउटर रिंग रोड की तरह हो जाएगी। भले ही पाकिस्तान की वित्तीय व प्रशासनिक स्थिति हमसे दोयम हो, लेकिन वहां यूरोप-अमेरिका की तर्ज पर हाईवे पर चप्पे-चप्पे पर कैमरे लगे हैं। हाईवे पर कम स्पीड के वाहन चलने पर पाबंदी है और बेतरतीब गाड़ी पार्क करने का मतलब तत्काल भारी जुर्माना है। यही नहीं निर्धारित स्पीड से अधिक पर गाड़ी चलाने पर कैमरे में कैद हो कर भारी जुर्माना लगाया जाता है। लेकिन हमारे देश में एक भी सड़क ऐसी नहीं है, जिस पर कानून का राज हो। गोपीनाथ मुंडे, राजेश पायलेट, साहिब सिंह वर्मा जैसे कद्दावर नेताओं को हम सड़क की साधारण लापरवाहियों के कारण गंवा चुके हैं। लेकिन सरकार में बैठे लोग माकूल कानूनों के प्रति बेपरवाह हैं।
सड़कों पर इतना खर्च हो रहा है, उसके रखरखाव करने वाले महकमों के वेतन व सुविधाओं पर हर रोज लगभग दो करोड़ रूपए खर्च हो रहे हैं इसके बावजूद सड़कों पर चलना यानी अपने को, सरकार को व उस पर चल रहे वाहनों को कोसने का नाम हो गया है। पहले तो देखें कि सड़क की दुर्गति कैसे होती है। सड़कों के निर्माण में नौसिखियों व ताकतवर नेताओें की मौजूदगी कमजोर सड़क की नींव खोेद देती है। यह विडंबना है कि देशभर में सड़क बनाते समय उसके सुपरवीजन का काम कभी कोई तकनीकी विषेशज्ञ नहीं करता है। सड़क ढ़ालने की मशीन के चालक व एक मुंशी, जो बामुश्किल आठ दर्जा पास होता है, सड़क बना डालता है। यदि कुछ विरले मामलों को छोड़ दिया जाए तो सड़क बनाते समय डाले जाने वाले बोल्डर, रोड़ी, मुरम की सही मात्रा कभी नहीं डाली जाती है। शहरों में तो सड़क किनारे वाली मिट्टी उठा कर ही पत्थरों को दबा दिया जाता है। कच्ची सड़क पर वेक्यूम सकर से पूरी मिट्टी साफ कर ही तारकोल डाला जाना चाहिए, क्योंकि मिट्टी पर गरम तारकोल वैसे तो चिपक जाता है, लेकिन वजनी वाहन चलने पर वहीं से उधड़ जाता है। इस तरह के वेक्यूम-सकर से कच्ची सड़क की सफाई कहीं भी नहीं होती है। हालांकि इसके बिल जरूर फाईलों में होते है। इसी तरह सड़क बनाने से पहले पक्की सड़क के दोनों ओर कच्चे में खरंजा लगाना जरूरी होता है। यह तारकोल को फैलने से रोकता है व इस में रोड़ी मिल कर खरंजे के दबाव में एक सांचे सी ढ़ल जाती है। आमतौर पर ऐसे खरंजे कागजों में ही सिमटे होते हैं। कहीं ईंटें बिछाई भी जाती है तो उन्हें मुरम या सीमेंट से जोड़ने की जगह महज वहां से खोदी मिट्टी पर टिका दिया जाता है। इससे थोड़ा पानी पड़ने पर ही ईंटें ढ़ीली हो कर उखड़ आती हैं। यहां से तारकोल व रोड़ी के फैलाव व फटाव की शुरूआत होती है ।
सही सुपरवीजन नहीं होने के कारण सड़क का ढलाव ठीक न होना भी सड़क कटने का बड़ा कारण है। सड़क बीच में से उठी हुई व सिरों पर दबी होना चाहिए, ताकि उस पर पानी पड़ते ही किनारों की ओर बह जाए। लेकिन शहरी सड़कों का तो कोई लेबल ही नहीं होता है। बारिश का पानी यहां-वहां बेतरतीब जमा होता है और यह जान लेना जरूरी है कि पानी सड़क का सबसे बड़ा दुश्मन है। सड़क किनारे नालियों की ठीक व्यवस्था न होना भी सड़क की दुश्मन है। नालियों का पानी सड़क के किनारों को काटता रहता है। एक बार तारकोल कटा तो वहां से गिट्टी, बोल्डर का निकलना रुकता नहीं है।
सड़कों की दुर्गति में हमारे देश का उत्सव-धर्मी चरित्र भी कम दोषी नहीं है। महानगरों से लेकर सुदूर गांवों तक घर में शादी हो या भगवान की पूजा, किसी राजनैतिक दल का जलसा हो या मुफ्त लगा लंगर; सड़क के बीचों-बीच टेंट लगाने में कोई संकोच नहीं होता है। टेंट लगाने के लिए सड़कों पर चार-छह इंच गोलाई व एक फीट गहराई के कई छेद करे जाते हैं। उत्सव समाप्त होने पर इन्हें बंद करना अपनी शान में गुस्ताखी माना जाता है। इन छेदों में पानी भरता है और सड़क गहरे तक कटती चली जाती है। कुछ दिनों बाद कटी-फटी सड़क के लिए सरकार को कोसने वालों में वे भी शामिल होते हैं, जिनके कुकर्मों का खामियाजा जनता के पैसे से बनी सड़क को उठाना पड़ रहा होता है।
नल, टेलीफोन, सीवर, पाईप गैस जैसे कामों के लिए सरकारी मकहमे भी सड़क को चीरने में कतई दया नहीं दिखाते हैं । सरकारी कानून के मुताबिक इस तरह सड़क को नुकसान पहुंचाने से पहले संबंधित महकमा स्थानीय प्रशासन के पास सड़क की मरम्मत के लिए पैसा जमा करवाता है। लेकिन सड़कों की दुर्गति यथावत रहती है। नया मकान बनाने या मरम्मत करवाने के लिए सड़क पर ईंटें, रेत व लोहे का भंडार करना भी सड़क की आयु घटाता है। हमारे देश की नई कालेानियों में भी पानी की मुख्य लाईन का पाईप एक तरफ ही होता है, यानी जब दूसरी ओर के बाशिंदे को अपने घर तक पाईप लाना है तो उसे सड़क खोदना ही होगा। एक बार खुदी सड़क की मरम्मत लगभग नामुमकिन होती है। सड़क पर घटिया वाहनोें का संचालन भी उसका बड़ा दुश्मन है। यह दुनिया में शायद भारत में ही देखने को मिलेगा कि सरकारी बसें हों या फिर डग्गामारी करती जीपें, निर्धारित से दुगनी तक सवारी भरने पर रोक के कानून महज पैसा कमाने का जरिया मात्र हाते हैं। ओवरलोड वाहन, खराब टायर, दोयम दर्जे का ईंधन ये सभी बातें भी सरकार के चिकनी रोड के सपने को साकार होने में बाधाएं हैं।
सवाल यह खड़ा होता है कि सड़क-संस्कार सिखाएगा कौन ? ये संस्कार सड़क निर्माण में लगे महकमों को भी सीखने होंगे और उसकी योजना बनाने वाले इंजीनियरों को भी। संस्कार से सज्जित होने की जरूरत सड़क पर चलने वालों को भी है और यातायात व्यवस्था को ठीक तरह से चलाने के जिम्मेदार लोगों को भी। सड़क के संस्कार अक्षुण्ण रहें, यह सुनिश्चित करने का जिम्मा उन एजंसियों का भी है जो सड़क से टोल टैक्स उगाह रहे हैं तो उन लोगों पर भी जो अपने रूतबे या भदेसपन का नाजायज फायदा उठा कर सड़क के कानूनों को तोड़ते हैं। सड़क घेर कर उत्सव मनाने वालों या उस पर बिल्डिंग मटैरियल फैलाने वालों पर कड़ी कानूनी कार्यवाही करना महति है, क्योंकि सुंदर सड़कें किसी राष्ट्र की प्रगति की प्रतीक हैं और सड़क पर अनाधिकृत कब्जा करने वाले देश की प्रगति के बाधक हैं।
वैसे तो यह समाज व सरकार दोनों की साझा जिम्मेदारी है कि सड़क को साफ, सुंदर और सपाट रखा जाए। लेकिन हालात देख कर लगता है कि कड़े कानूनों के बगैर यह संस्कार आने से रहे।

गुरुवार, 27 अक्तूबर 2016

Why not to disclose truth of illness of politician ?

बीमारी से पर्दादारी क्यों ?


                                                                                                                                      पंकज चतुर्वेदी;
अभी तक 44 मुकदमें कायम हो चुके हैं। आठ गिरफ्तार हो चुके हैं। सात लोग खुदकुशी कर चुके हैं। लाखों लोगों की जिंदगी की उम्मीद कहे जाने वाले चैन्नई के अपोलो अस्पताल में रहस्यमयी सन्नाटा, तनाव व शंका का माहौल है। दीगर मरीजों को वहां से दूर रखा जा रहा है। अस्पताल के डॉक्टर व अन्य स्टाफ को भीतर मोबाईल ले जाने की इजाजत नहीं हैं। राज्य पुलिस का बड़ा हिस्सा या तो अस्पताल में सुरक्षा ड्यूटी पर है या फिर अस्पताल के कर्मचारियों व रिश्तेदारों के मोबाईल व अन्य इलेक्ट्रॉनिक डिवाईस की निगरानी की ड्यूटी पर मुस्तैद है। अगले साल चैन्नई सहित कई जिलों को तबाह करने वाले उत्तर-पूर्वी मानसून के भी जल्दी आने की संभावना है और इसको लेकर आम नागरिक भयभीत हैं, लेकिन देश की संवेदनशील समुद्री सीमा पर स्थित बड़े व व्यावसायिक तौर पर प्रतिष्ठित राज्य का पूरा प्रशासन बीते लगभग एक महीने से केवल इस काम पर लगा है कि ‘अम्मा’ की बीमारी के बारे में सही खबर किसी को ना लगे। यहां तक कि पिछले महीने कावेरी जलविवाद बाबत एक प्रेसनोट बाकायदा जे. जयललिता, मुख्यमंत्री के नाम से जारी कर दिया गया, जबकि वे अस्पताल के आईसीयू में बेसुध थी। सियासत भी शुरू हुई व शंकाएं भी।
बीते 22 सितंबर से तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता बीमार हैं। उनकी गैरमौजूदगी में शासन चलाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 166 के खंड तीन के तहत, पहले भी उनकी जगह मुख्यमंत्री रहे राज्ये के वित्त मंत्री ओ. पनेरसेल्वम को मुख्यमंत्री के पास मौजूद विभागों का अतिरिक्त चार्ज दे दिया गया है। पिछले दिनों उन्होंने अपने सामने मुख्यमंत्री का बड़ा सा चित्र रख कर कैबिनेट की बैठक की अध्यक्षता भी की, लेकिन फिलहाल राज्य मुख्यमंत्री-विहीन है। जयललिता की बीमारी को लेकर अफवाहें ही राज्य की सबसे बड़ी सूचना का जरिया हैं। मुख्यमंत्री को जल्दी से ठीक करने के लिए दिल्ली में एम्स से लेकर अमेरिका व सिंगापुर तक के डॉक्टर आ चुके हैं। हालांकि आम लेागों, खासकर अन्नाद्रमुक कार्यकर्ताओं को सबसे बड़ा भरोसा भगवान, अनुष्ठान व अंधविश्वास पर है। तभी पिछले कई दिनों से राज्य में तरह-तरह के हवन, पूजा चल रही हैं। मदुरई में तो सिर पर दूध के घड़े ले कर बड़ी यात्रा निकाली गई जोकि तिरूचेंडा मंदिर तक गई व हजरों लीटर दूध भगवान के नाम पर बहा दिया गया। कोई अपने मुंह में गालों से आरपार त्रिशूल किए है तो कोई भूख रह रहा है। कई एक तो खुदकुशी भी कर चुके हैं, लेकिन निष्ठुर शासन सत्ता हाथ से फिसलने के भय से ना तो कुछ कह रहा है ना ही सत्ता के वैकल्पिक केंद के बारे में विचार कर रहा है। अस्पताल का तो कहना है कि उन्हें थोड़ा सा निर्जलीकरण हुआ व बुखार है लेकिन अपुष्ट सूत्र उनके मल्टीपल आर्गन फेल होने की बातें कर रहे हैं। तमिलनाडु में जब लगा कि जनता को समझाना मुश्किल है तो एक बड़ा राजनीतिक ड्रामा रचा गया, सभी राजनीतिक दलों के लोगों को पीछे के दरवाजे से ‘अम्मा ’ को देखने के लिए अस्पतााल बुलाया गया। पड़ेासी राज्य पुदुचेरी के मुख्यमंत्री व कभी पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के करीबी रहे नारायणसमी पहुंचे व उसके तत्काल बाद उप्र की खाट यात्रा समाप्त करने के अगले दिन ही राहुल गांधी पहुंच गए। अमित शाह व वित्त मंत्री भी चैन्नई गए व सभी ने बाहर आ कर कहा कि उनकी तबीयत ठीक है व जल्द ही वे घर आ जाएंगी। इस बीच किसी ने हाई कोर्ट में मुख्यमंत्री की बीमारी का खुलासा करने के लिए जनहित याचिका भी लगा दी। मामले में सियासत भी हो रही है है और राज्य के एक रिटायर्ड आईएएस मुख्यमंत्री की गैरमौजूदगी में ताकत से शासन चला रहे हैं।
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की बीमारी भी इसका एक उदाहरण है। हालांकि जयललिता लंबे समय से बीमार हैं यह बात किसी से छुपी नहीं है। इस साल 23 मई को जयललिता छठी बार मुख्यमंत्री बनी थीं। उन्होंने तमिलनाड़ु में 32 साल से चली आ रही हर बार सरकार बदलने की परंपरा का राजनीतिक अतीत को धता बताते हुए लगातार दूसरे कार्यकाल के लिए इसी साल 23 मई 2016 को छठी बार मुख्यमंत्री बनीं थीं। कर्नाटक के मंड्या जिले के पांडवपुरा तालुका के मेलुरकोट गांव में 24 फरवरी 1948 को एक ‘अय्यर’ परिवार में जन्मी जयललिता पिछले एक साल में कई बार बीमार रहने के बाद मई 2015 में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले भी सात महीने तक सार्वजनिक जीवन से दूर रही थीं। यह कैसी विडंबना है कि राहुल गांधी से लेकर अमित शाह तक को अस्पताल बुलाया गया लेकिन किसी की भी बीमार मुख्यमंत्री से मुलाकात नहीं हुई। उन्हें दूर से आईसीयू में बस उन्हें दिखा दिया गया व बयान दिलवा दिया गया कि वे ठीक हैं।
हालांकि तमिलनाडु में इतिहास स्वंय को दोहरता दिख रहा है। जयललिता को फिल्मों की दुनिया से राजनीति में लाने वाले एमजीआर भी खुद सेलुलाईड की दुनिया से आए थे। उनके मुख्यमंत्री के तौर पर तीसरे कार्यकाल से ठीक पहले वे गंभीर बीमार हुए थे और इस डर से कही उनकी बीमारी की चर्चा से लोकप्रियता पर असर ना पड़े, सबकुछ छुपा कर रखा गया। 1985 में बतौर मुख्यमंत्री तीसरा कार्यकाल ग्रहण करने के बाद उनका स्वास्थ्य लगातार गिरता रहा और इलाज के लिए एमजीआर को बार -बार विदेश जाना पड़ा। तब भी ना तो ठोस जानकारी दी गई ना ही विकल्प। पूरा राज्य अफवाहों व आशंकाओं में झूलता रहा। ऐसे ही बीमार रहते हुए वे तीन साल तक मुख्यमंत्री का पद संभाले रहे और 24 दिसम्बर 1987 को गुर्दे खराब होने, डायबीटिज और हार्ट अटैक के चलते उनका निधन हो गया। उम्मीद व दुआ यही की जाती है कि जयललिता जल्द ही स्वस्थ्य हो जाएंगी।
देश के अधिकांश राजनीतिक दल व्यक्ति केंद्रित होते जा रहे हैं, वहां नेतृत्व की दूसरी पंक्ति को इतना मजबूत नहीं किया जा रहा कि किसी गंभीर हालात में वह तत्काल अपने दल व सरकार का जिम्मा संभाल सके, तभी बीमारी जैसी स्वाभाविक परिस्थिति को भी गोपनीय रखने या उसके बारे में सही जानकारी ना देने की अजीब रवायत शुरू हो गई है। जिन नेताओं पर हजारों -हजार लोग देश या राज्य के संचालन का भरोसा करते हैं, जिनसे लोग उम्मीदें करते हें जिनके लिए लोग जान तक देने की हद तक भावुक होते हैं, उनकी बीमारी की वास्तविकता जानने का लोकतांत्रिक हक उन्हें क्यों नहीं हैं। क्या किसी राज्य को या किसी मंत्रीमंडल को लंबे समय तक बगैर किसी कुशल राजनीतिक नेतृत्व के अदृश्य या प्रशासनिक हाथों में सौंप देना क्या लोकतंत्रात्मक प्रणाली की हत्या नहीं है ? क्या राजनीतिक दलों की नीतियां, उनके करिश्माई चेहरों से कमतर होती है कि उन्हें एक व्यक्ति के सहारे ही सरकार व दल चलाने पर मजबूर होना पड़ता है ? यदि हमारे नेता का इलाज जनता के धन से हो रहा है, यदि उनकी बीमारी से प्रशासन व सरकार अस्त-व्यस्त होती है तो बीमारी की जानकारी देना और पूर्ण स्वस्थ होने तक सुदृढ वैकल्पिक व्यवस्था ना करने के पीछेे क्या सरोकार या स्वार्थ होते हैं ?

शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2016

communal riots put country economic down step

विकास का मार्ग अवरूद्ध करते हैं दंगे



                                                                                                                                            पंकज चतुर्वेदी


पिछले एक दशक के दौरान देश में कई जगह सांप्रदायिकता की आग झुलसी। जब आग शांत होती है तो भरोसा, संबंध और शांति तो नष्‍ट हो ही चुकी होती है, देश का विकास भी बेपटरी हो जाता है। लोग ढर से पलायन करते हैं, उनके रेाजगार धंघें चैपट होते हैं और इसका असर देश की अर्थ व्यवस्था तथा गरीबी से लड़ने की सरकारी योजनाओं पर भयंकर रूप् से विपरीत होता है। कई जगह सालों बाद भी अविश्‍वास  की खाई इतनी गहरी है कि वे लोग जो सन 47 में विभाजन के समय ताकत से यह कहते हुए खड़े थे कि हमारा मादरे-वतन यही है और हम वहां क्यों जाएं, वे भी घरों से दूर कहीं चले गए हैं। दंगाईयों का डर और पुलिस का खौफ, देानेां ही टूटे भरोसे की सभी सीमाएं पार कर चुका है। दंगे भड़कने में कौन सियासती रोटी सैंक रहा है और किसकी लापरवाही है, यह सभी जानते हैं लेकिन इस सच को ना तो कोई आयोग और ना ही कोई जांच एजेंसी न्याय की चौौखट तक ले जा पाएगी, क्योंकि हर बार की तरह इन दंगों का भी अपना अर्थशास्त्र है।


पश्चिमी उ.प्र के दंगे हाेंें या बरेली- सहारनपुर , बिसाहडा के या दिल्ली के दंगे के आरोपी जल्दी ही जेल से बाहर होते  हैं और पीड़ित अपने पुश्‍तैनी घर-गांव लौटना नहीं चाहते और शायद दंगाई भी यही चाहते थे। हर दंगाग्रस्त इलाके में बस निराशा, हताशा के बीज पलते हैं उसके मूल में उनका बेराजगार होना ही है। किसी की दुकान जल गई तो किसी के कारखाने या वर्कशाप, कई अपने खेत तक नहीं जा पा रहे हैं तो बहुत से लोग जातिय नफरत के चलते मजदूरी से भी मरहूम हैं। वैसे अतीत का हर जख्म गवाह है कि जब कभी दंगे हुए है हिंदुओं में मेहनतकश वर्ग और मुसलमान बेराजगार हुआ और उसने पलायन किया है ‘‘अपनो’’ के बीच किसी मलिन बस्ती में ।
यह भी तथ्य है कि भारत में हिंदू और मुसलमान गत् 1200 वर्षों से साथ-साथ रह रहे हैं। डेढ़ सदी से अधिक समय तक तो पूरे देश पर मुगल यानी मुसलमान शासक रहे। पूरे देश के हर गांव-कस्बे में 500वीं पूर्व ईस्वी से ले कर आज तक के हजारों-हजार मंदिर हैं। यदि आम मुसलमान इतना की कट्टर मूर्ति भंजक होता तो डेढ़ सौ क्या डेढ़ साल काफी होता पूरे मंदिर ढहाने के लिए। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि सबसे कट्टर कहे जाने वाले मुगल बादशाह औरंगजेब ने देशभर में कई मंदिरों को सरकारी इमदाद व जायदाद के पट्टे/सनद बांटे थे।
इस बात को समझना जरूरी है कि 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेजों को यह पता चल गया था कि इस मुल्क में हिंदू और मुसलमानों के आपसी ताल्लुक बहुत गहरे हैं और इन दोनों के साथ रहते उनका सत्ता में बना रहना मुश्किल है। एक साजिश के तहत 1857 के विद्रोह के बाद मुसलमानों को सताया गया, अकेले दिल्ली में ही 27 हजार मुसलमानों का कत्लेआम हुआ। अंग्रेज हुक्मरान ने दिखाया कि हिंदू उनके करीब है।। लेकिन जब 1870 के बद हिंदुओं ने विद्रोह के स्वर मुखर किए तो अंग्रेज मुसलमानों को गले लगाने लगे। यही फूट डालो और राज करो की नीति इतिहास लेखन, अफवाह फैलाने में काम आती रही
यह तथ्य भी गौरतलब है कि 1200 साल की सहयात्रा में दंगों का अतीत तो पुराना है नहीं। कहा जाता है कि अहमदाबाद में सन् 1714, 1715, 1716 और 1750 में हिंदू मुसलमानों के बीच झगड़े हुए थे। उसके बाद 1923-26 के बीच कुछ जगहों पर मामूली तनाव हुए । सन् 1931 में कानपुर का दंगा भयानक था, जिसमें गणेश शंकर विद्यार्थी की जान चली गई थी। खूनी दंगों की शुरुआत 16 अगस्त 1946 से कही जा सकती है। दंगें क्यों होते हैं? इस विषय पर प्रो. विपिन चंद्रा, असगर अली इंजीनियर से ले कर सरकार द्वारा बैठाए गए जांच आयोगों की रिपोर्ट तक साक्षी है कि झगड़े ना तो हिंदुत्व के थे ना ही सुन्नत के। कहीं जमीनों पर कब्जे की गाथा है तो कहीं वोट बैंक तो कहीं नाजायज संबंध तो कहीं गैरकानूनी धंधे।
सन् 1931 में कानपुर में हुए दंगों के बाद कांग्रेस ने छह सदस्यों का एक जांच दल गठित किया था। सन् 1933 में जब इस जांच दल की रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी थी तो तत्कालीन ब्रितानी सरकार ने उस पर पाबंदी लगा दी थी। उस रिपोर्ट में बताया गया था कि सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक विविधताओं के बावजूद सदियों से ये दोनों समाज दुर्लभ सांस्कृतिक संयोग प्रस्तुत करते आए हैं। उस रिपोर्ट में दोनों संप्रदायों के बीच तनाव को जड़ से समाप्त करने के उपायों को तीन वर्गों में विभाजित किया गया था -धार्मिक-शैक्षिक, राजनीतिक-आर्थिक और सामाजिक। उस समय तो अंग्रेजी सरकार ने अपनी कुर्सी हिलती देख इस रिपोर्ट पर पाबंदी लगाई थी। आज कतिपय राजनेता अपनी सियासती दांवपेंच को साधने के लिए उस प्रासंगिक रिपोर्ट को भुला चुके हैं।
यह जानना जरूरी है कि वैचारिक या सांप्रदायिक हिंसा केवल भारत की ही समस्या नहीं है, मिश्रित समाज के देशों, विशेषकर तीसरी दुनिया के देशों का यह चरित्र बन गई है।2 पूरा दक्षिण एशिया इस त्रासदी का शिकार है। पाकिस्तान में मुहाजिर, शिया-सुन्नी टकराव है तो श्रीलंका में तमिलों के। मालदीव जैसा देश भी हिंसक टकरावों को झेल रहा है। विकास का पहिया जब तेज घूमता है तो अल्पसंख्यक, गरीब इसकी चपेट में सबसे पहले आते हैं, परिणाम स्वरूप वे कुछ आक्रामक हो जाते हैं। ऐसे में संसाधनों पर कब्जा किए बैठे सभ्रांत वर्ग को इन शोषितों के गुस्से का यदा-कदा सामना करना पड़ता है और यही दंगे या टकरावों का गणित है।
यह भी समझ लेना चाहिए कि दंगों की जड़ धर्म या संप्रदाय नहीं, बल्कि आर्थिक-सामाजिक कारण हैं। उड़ीसा की कुल आबादी (2001 जनगणना) 36,804,660 है, इसमें ईसाई महज 897861 हैं, यानी कुल आबादी का ढ़ाई फीसदी भी नहीं। ज़ाहिर है कि ईसाई इतने कम हैं कि उनसे किसी तरह के खतरे का डर हिंदुओं में नहीं होना चाहिए। लेकिन अगस्त-सितंबर-2008 के दौरान उड़ीसा के कंधमाल जिले में केंद्रीय बलों की मौजूदगी के बावजूद ईसाईयों के घरों, पूजा स्थलों, संपत्तियों को आग के हवाले किया जाता रहा। इस हिंसा में कई लोग मारे गए और हमलों से भयाक्रांत ईसाई लोग जंगलों में छिप कर जीवन काटते दिखे। अखबारी बयानबाजी से तो यही मालूम होता है कि ईसाई मिशनियरियों द्वारा जबरन धर्मांतरण से आक्रोशित कतिपय हिंदुवादी संगठन ये हमले कर रहे हैं। हिंदुवादी संगठनों का दावा है कि यह स्थानीय जनता का ईसाईयों के धार्मिक-दुष्प्रचार के विरोध में गुस्सा है। लेकिन हकीकत और कहीं दबी हुई थी-कंधमाल में ‘पाना’ नामक एक दलित जाति का बाहुल्य है। बेहद गरीब, अशिक्षित और शोषित रहे हैं पाना लोग। कुछ दशकों पहले ‘पाना’ लोगों के ईसाईयत को स्वीकार करना शुरू किया तो उनकी शैक्षिक और आर्थिक हालत सुधरने लगी। इसका सीधा असर उन साहूकारों और सामंतों पर पड़ा, जिनकी तिजोरियां ‘पानाओं’ की अशिक्षा व नादानी से भरती थीं।यह घटना गवाह है कि दंगे के निहितार्थ और कहीं होते हैं। गुजरात के दंगों में योजनाबद्ध तरीके से व्यवसायिक प्रतिद्वंदियों ने मुसलमानों की दुकानें बरबाद की। जरा याद करें 27 फरवरी 2002 को साबरमती एक्सप्रेस में 50 कार सेवकों (25 महिलाएं व 15 बच्चे) को जिंदा जला देने के बाद गुजरात के 25 में से 16 जिलों के 151 शहर और 993 गांवों में मुसलमानों पर योजनाबद्ध हमले हुए। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इन दंगों  में कुल 1044 लोग मारे गए, जिनमें 790 मुसलमान और 254 हिंदू थे। यहां व्यापारी वर्ग के डरपोक कहे जाने वाले ‘बोहरों’ के व्यवसाय-दुकानों का निशाना बना कर फूंका गया। मुसलमानों की होटलांे, वाहनों को बाकायदा नक्षा बना कर नश्ट किया गया, बाद में पता चला कि असल खुन्नस तो व्यापारिक प्रतिद्वंदिता की थी, जिसे  सांप्रदायिक रंग दे दिया गया। यह बात ब और पुख्ता हो गई जब दंगों के बाद गुजरात के गांवों में मुसलमानेां की दुकानों से सामान ना खरीदन जैसे पर्चें बांटे गए। उत्तर प्रदेश में कई बार दंगों की वजह सरकारी संपत्ति पर कब्जा कर रही है। कष्मीर में पंडितो को जबरिया भगाने के पीछे भी अलगावादियों की ऐसी ही व्यापारिक मंषाएं रही हैं।
मुसलमान ना तो नौकरियों में है ना ही औद्योगिक घरानों में, हां हस्तकला में उनका दबदबा जरूर है। लेकिन विडंबना है कि यह हुनरमंद अधिकांश जगह मजदूर ही हैं। यदि देश में दंगों को देखें तो पाएंगे कि प्रत्येक फसाद मुसलमानों के मुंह का निवाला छीनने वाला रहा है। भागलपुर में बुनकर, भिवंडी में पावरलूम, जबलपुर में बीडी, मुरादाबाद में पीतल, अलीगढ़ में ताले, मेरठ में हथकरघा..., जहां कहीं दंगे हुए मजदूरों के घर जलें, उनमे कुटीर उद्योग चैपट हुए। एस. गोपाल की पुस्तक ‘‘द एनोटोमी आॅफ द कन्फ्रंटेशन’’ में अमिया बागछी का लेखन इस कटु सत्य को उजागर करता है कि सांप्रदायिक दंगे मुसलमानों की एक बड़ी तादाद को उन मामूली धंधों से भी उजाड़ रहे हैं जो उनके जीवनयापन का एकमात्रा सहारा है। (प्रिडेटरी कर्मशलाईजेशन एंड कम्यूनिज्म इन इंडिया)। गुजरात में दंगों के दौरान मुसलमानों की दुकानों को आग लगाना, उनका आर्थिक बहिष्कार आदि गवाह है कि दंगे मुसलमानों की आर्थिक गिरावट का सबसे कारण है। पश्चिमी उप्र के दंगां के बाद इलाके में गन्ने की खेती, गुड़ बनाने का काम और तो और किसान आंदंोलनों में नारों की बुलंदी भी गायब हो गई, इसका असर यहां की अर्थ व्यवस्था और सामाजिक ताने-बाने पर गंहरे तक पड़ा है।
दंगे मानवता के नाम पर कलंक हैं। धर्म, भाषा, मान्यताओं, रंग जैसी विषमताओं के साथ मत-विभाजन होना स्वाभाविक है। लेकिन जब सरकार व पुलिस में बैठा एक वर्ग खुद सांप्रदायिक हो जाता है तो उसकी सीधी मार निरपराध, गरीब और अशिक्षित वर्ग पर पड़ती है।

बुधवार, 19 अक्तूबर 2016

Neglected River confluence of Yamuna and Hindon

हिंडन-यमुना: एक उपेक्षित, नीरस संगम

  
हाल ही में एनजीटी ने आदेश दिया है कि 21 अक्‍तूबर तक पश्चिमी उप्र के 5 जिलों से कई हजार हैंडपंप उखाड़े जाएं क्‍योंकि हिंडन नदी में प्रदूषण के कारण वहां का पूर भूजल जहर हो गया हैा यह दुखद, चिंतनीय और विकास के प्रतिफल की वीभत्स दृश्य राजधानी दिल्ली की चौखट पर है। इसके आसपास देश की सबसे शानदार सड़क, शहरी स्थापत्य , शैक्षिक संस्थान और बाग-बगीचे हैं। दो महान नदियों का संगम, इतना नीरस, उदास करने वाला और उपेक्षित।हाल ही में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण यानि एनजीटी के आदेश पर हिंडन नदी के किनारे बसे गाजियाबाद, मेरठ, बागपत, शामली, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर जनपद के करीब 154 गांवों के 31 हजार हैंडपंपों को 21 अक्तूबर तक उखाड़ने के निर्देश दिए गए हैं। एनजीटी ने अपने एक अध्ययन से पुख्ता किया कि अधिकांश हैंडपंपों का पानी भारी धातुओं से दूषित है और संदेह है कि सहारनपुर, शामली और मेरठ जिले के लगभग 45 तरह के उद्योग नदी के जल में आर्सेनिक, पारा जैसे जानलेवा रसायन डाल रहे हैं।
दूर-दूर तक कोई पेड़ नहीं, कोई पक्षी नहीं, बस बदबू ही बदबू। आसमान को छूती अट्टालिकाओं को अपनी गोद में समाए नोएडा के सेक्टर-150, ग्रेटर नोएडा से सटा हुआ है। यहीं है एक गांव मोमनथाल। उससे आगे कच्ची, रेतीली पगडंडी पर कोई तीन किलोमीटर चलने के बाद, दूर एक धारा दिखाई देती है। कुछ दूर के बाद दुपहिया वाहन भी नहीं जा सकते। अब पगडंडी भी नहीं है, जाहिर है कि सालों से कभी कोई उस तरफ आया ही नहीं होगा। एक महीने पहले आई बरसात के कारण बना दल-दल और फिर बामुश्किल एक फुट की रिपटन से नीचे जाने पर सफेद पड़ चुकी, कटी-फटी धरती। सीधे हाथ से शांत यमुना का प्रवाह और बाईं तरफ से आता गंदा, काला पानी, जिसमें भंवर उठ रही हैं, गति भी तेज है। यह है हिंडन। जहां तक आंखें देख सकती हैं, गाढ़ी हिंडन को खुद में समाने से रोकती दिखती है यमुना। यह दुखद, चिंतनीय और विकास के प्रतिफल की वीभत्स दृश्य राजधानी दिल्ली की चौखट पर है। इसके आसपास देश की सबसे शानदार सड़क, शहरी स्थापत्य , शैक्षिक संस्थान और बाग-बगीचे हैं। दो महान नदियों का संगम, इतना नीरस, उदास करने वाला और उपेक्षित।
कहते हैं कि शहर और उसमें भी ऊंची-ऊंची इमारतों में आमतौर पर शिक्षित, जागरूक लोग रहते हैं। लेकिन गाजियाबाद और नोएडा में पाठ्यपुस्तकों में दशकों से छपे उन शब्दों की प्रामाणिकता पर शक होने लगता है, जिसमें कहा जाता रहा है कि मानव सभ्यता का विकास नदियों के किनारे हुआ और नदियों के संगम स्थल को बेहद पवित्र माना जाता है। धार्मिक आख्यान कहते हैं कि हरनंदी या हिंडन नदी पांच हजार साल पुरानी है। मान्यता है कि इस नदी का अस्तित्व द्वापर युग में भी था और इसी नदी के पानी से पांडवों ने खांडवप्रस्थ को इंद्रप्रस्थ बना दिया था। जिस नदी का पानी कभी लोगों की जिंदगी को खुशहाल करता था, आज उसी नदी का पानी लोगों की जिंदगी के लिए खतरा बन गया है। बीते 20 साल में हिंडन इस कदर प्रदूषित हुई कि उसका वजूद लगभग समाप्त हो गया है। गाजियाबाद जिले के करहेडा गांव से आगे बढ़ते हुए इसमें केवल औद्योगिक उत्सर्जन और विशाल आबादी की गंदगी ही बहती दिखती है। छिजपरसी से आगे पर्थला खंजरपुर के पुल के नीचे ही नदी महज नाला दिखती है। कुलेसरा व लखरावनी गांव पूरी तरह हिंडन के तट पर हैं। इन दो गांवों की आबादी दो लाख पहुंच गई है। अधिकांश सुदूर इलाकों से आए मेहनत-मजदूरी करने वाले। उनको हिंडन घाट की याद केवल दीपाचली के बाद छट पूजा के समय आती है। तब घाट की सफाई होती है, इसमें गंगा का पानी नहर से डाला जाता है। कुछ दिनों बाद फिर यह नाला बन जाती है, पूरा गांव यहीं शौच जाता है, जिनके घर नाली या शौचालय है, उसका निस्तारण भी इसी में है। अपने अंतिम 55 किलोमीटर में सघन आबादी के बीच से गुजरती इस नदी में कोई भी जीव , मछली नहीं है। इसकी आक्सीजन की मात्रा शून्य है और अब इसका प्रवाह इसके किनारों के लिए भी संकट बन गया है।
हिंडन सहारनपुर, बागपत, शामली मेरठ, मुजफ्फरनगर से होते हुए गाजियाबाद के रास्ते नोएडा तक जाती है। कई गांव ऐसे हैं जो हिंडन के प्रदूषित पानी का प्रकोप झेल रहे हैं। कुछ गांव की पहचान तो कैंसर गांव के तौर पर होने लगी है। कोई डेढ सौ गांवों के हर घर में कैंसर और त्वचा के रोगी मौजूद हैं।
यह विडंबना भी है कि हिंडन के तट पर बसा समाज इसके प्रति बेहद उपेक्षित रवैया रखता है। ये अधिकंश लेाग बाहरी है व इस नदी के अस्तित्व से खुद के जीवन को जोड़ कर देख नहीं पा रहे हैं। मोमनाथल, जहां यह यमुना से मिलती है, और जहां इसे नदी कहा ही नहीं जा सकता, ग्रमीणों ने पंप से इसके जहर को अपने खेतों में छोड़ रखा है। अंदाज लगा लें कि इससे उपजने वाला धान और सब्जियों इसका सेवन करने वाले की सेहत के लिए कितना नुकसानदेह होगा।
अभी इसी साल मई में दिल्ली में यमुना नदी को निर्मल बनाने के लिए 1969 करोड़ के एक्शन प्लान को मंजूरी दी गई है, जिसमें यमुना में मिलने वाले सभी सीवरों व नालों पर एसटीपी प्लांट लगाने की बात है। मान भी लिया जाए कि दिल्ली में यह योजना कामयाब हो गई, लेकिन वहां से दो कदम दूर निकल कर ही इसका मिलन जैसे ही हिंडन से होगा, कई हजार करोड़ बर्बाद होते दिखेंगें।
आज जरूरत इस बात की है कि हिंडन के किनरों पर आ कर बस गए लेाग इस नदी को नदी के रूप में पहचानें, इसके जहर होने से उनकी जिंदगी पर होने वाले खतरों के प्रति गंभीर हों, इसके तटों की सफाई व सौंदर्यीकरण पर काम हो। सबसे बड़ी बात जिन दो महान नदियों का संगम बिल्कुल गुमनाम है, वहां कम से कम घाट, पहुंचने का मार्ग, संगम स्थल के दोनों ओर घने पेड़ जैसे तात्कालिक कार्य किए जाए। हिंडन की मौत एक नदी या जल-धारा की नहीं, बल्कि एक प्राचीन सभ्यता, संस्कृति और संस्कार का अवसान होगा।

रविवार, 16 अक्तूबर 2016

challenge of preventing food wastage

ज़रूरी है अन्न की बर्बादी रोकना


                                                                                                                                           पंकज चतुर्वेदी
Prayukti. 16-10-16
हम जितना खेतों में उगाते हैं उसका 40 फीसदी उचित रखरखाव के अभाव में नष्ट हो जाता है। यह आकलन स्वयं सरकार का है। यह व्यर्थ गया अनाज बिहार जैसे राज्य का पेट भरने के लिए काफी है। हर साल 92600 करोड़ कीमत का 6.7 करोड़ टन खाद्य उत्पाद की बर्बादी, वह भी उस देश में जहां बड़ी आबादी भूखे पेट सोती हो, बेहद गंभीर मामला है। विडंबना है कि विकसित कहे जाने वाले ब्रिटेन जैसे देश सालभर में जितना भोजन पैदा नहीं करते, उतना हमारी लापरवाही से बेकार हो जाता है।
कुछ महीने पहले, अस्सी साल बाद जारी किए गए सामाजिक, आर्थिक और जातीय जनगणना के आंकड़े भारत की चमचमाती तस्वीर के पीछे का विद्रूप चेहरा उजागर करने के लिए काफी हैं। देश के 51.14 प्रतिशत परिवार की आय का ज़रिया महज़ अस्थाई मजदूरी है। 4.08 लाख परिवार कूड़ा बीन कर तो 6.68 लाख परिवार भीख मांग कर अपना गुजारा करते हैं। गांव में रहने वाले 39.39 प्रतिशत परिवारों की औसत मासिक आय दस हजार रूपए से भी कम है।
आय और व्यय में असमानता की हर दिन गहरी होती खाई का ही परिणाम है कि कुछ दिनों पहले ही संयुक्त राष्ट्र के खाद्य व कृषि संगठन द्वारा जारी की गई रपट में बताया गया है कि भारत में 19.4 करोड़ लोग भूखे सोते हैं, हालांकि सरकार के प्रयासों से पहले से ऐसे लोगों की संख्या कम हुई है।
हमारे यहां बीपीएल (बिलो पावर्टी लाईन) यानि गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन करने वालों की संख्या को लेकर भी गफ़लत है, हालांकि यह आंकड़ा 29 फीसदी के आसपास सर्वमान्य है।
भूख, गरीबी, कुपोषण व उससे उपजने वाली स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधन प्रबंधन की दिक़्कतें देश के विकास में सबसे बड़ी बाधक हैं। हमारे यहां ना तो अन्न की कमी है और ना ही रोजगार के लिए श्रम की। कागजों पर योजनाएं भी हैं, नहीं हैं तो उन योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार स्थानीय स्तर की मशीनरी में जिम्मेदारी व संवेदना की।

भारत में सालाना 10 लाख टन प्याज और 22 लाख टन टमाटर खेत से बाजार पुहंचने से पहले ही सड़ जाते हैं। वहीं 50 लाख अंडे उचित भंडारण के अभाव में टूट जाते हैं।
हमारे कुल उत्पाद में चावल का 5.8 प्रतिशत, गेहूं का 4.6 प्रतिशत, केले का 2.1 प्रतिशत खराब हो जाता है। वहीं गन्ने का 26.5 प्रतिशत हर साल बेकार होता है। जिस देश में नए खरीदे गए अनाज को रखने के लिए गोदामों में जगह नहीं है, जहां सामाजिक जलसों में परोसा जाने वाला आधे से ज्यादा भोजन कूड़ा-घर का पेट भरता है, वहां ऐसे भी लोग हैं जो अन्न के एक दाने के अभाव में दम तोड़ देते है।
बंगाल के बंद हो गए चाय बागानों में आए रोज मजूदरों के भूख के कारण दम तोड़ने की बात हो या फिर महाराष्ट्र में अरबपति शिरडी मंदिर के पास ही मेलघाट में हर साल हजारों बच्चों की कुपोषण से मौत की खबर या फिर राजस्थान के बारां जिला हो या मध्यप्रदेश का शिवपुरी जिला, सहरिया आदिवासियों की बस्ती में पैदा होने वाले कुल बच्चें के अस्सी फीसदी के उचित खुराक ना मिल पाने के कारण छोटे में ही मर जाने के वाकिये इस देश में हर रोज हो रहे हैं, लेकिन विज्ञापन में मुस्कुराते चेहरों, दमकती सुविधाओं के फेर में वास्तविकता से परे उन्मादित भारतवासी तक ऐसी खबरें या तो पहुंच नहीं रही हैं या उनकी संवेदनाओं को झकझोर नहीं रही हैं।
देशभर के कस्बे-शहरों से आए रोज़ ग़रीबी, कर्ज व भुखमरी के कारण आत्महत्या की खबरें आती है, लेकिन वे किसी अखबार की छोटी सी खबर बन कर समाप्त हो जाती है। इन दिनों बुंदेलखंड की आधी ग्रामीण आबादी सूखे से हताश हो कर पेट पालने के लिए अपने घर-गांव से पलायन कर चुकी है।
भूख से मौत या पलायन, वह भी उस देश में जहां खाद्य और पोषण सुरक्षा की कई योजनाएं अरबों रूपए की सब्सिडी पर चल रही हैं, जहां मध्यान्य भोजन योजना के तहत हर दिन 12 करोड़ बच्चें को दिन का भरपेट भोजन देने का दावा हो, जहां हर हाथ को काम व हर पेट को भोजन के नाम पर हर दिन करोड़ों का सरकारी फंड खर्च होता हो; दर्शाता है कि योजनाओं व हितग्राहियों के बीच अभी भी पर्याप्त दूरी है। वैसे भारत में हर साल पांच साल से कम उम्र के 10 लाख बच्चों के भूख या कुपोषण से मरने के आंकड़े संयुक्त राष्ट्र संगठन ने जारी किए हैं। ऐसे में नवरात्रि पर गुजरात के गांधीनगर जिले के एक गांव में माता की पूजा के नाम पर 16 करोड़ रूपए दाम के साढ़े पांच लाख किलो शुद्ध घी को सड़क पर बहाने, मध्यप्रदेश में एक राजनीतिक दल के महासम्मेलन के बाद नगर निगम के सात ट्रकों में भर कर पूड़ी व सब्जी कूड़ेदान में फेंकने की घटनाएं बेहद दुभाग्यपूर्ण व शर्मनाक प्रतीत होती हैं।
हर दिन कई लाख लोगों के भूखे पेट सोने के गैर सरकारी आंकड़ों वाले भारत देश के ये आंकड़े भी विचारणीय हैं। देश में हर साल उतना गेहूं बर्बाद होता है, जितना आस्ट्रेलिया की कुल पैदावार है। नष्ट हुए गेहूं की कीमत लगभग 50 हजार करोड़ होती है और इससे 30 करोड़ लोगों को सालभर भरपेट खाना दिया जा सकता है। हमारा 2.1 करोड़ टन अनाज केवल इस लिए बेकाम हो जात है, क्योंकि उसे रखने के लिए हमारे पास माकूल भंडारण की सुविधा नहीं है। देश के कुल उत्पादित सब्जी, फल, का 40 फीसदी भाग समय पर मंडी तक नहीं पहुंच पाने के कारण सड़-गल जाता है। औसतन हर भारतीय एक साल में छह से 11 किलो अन्न बर्बाद करता है।
जितना अन्न हम एक साल में बर्बाद करते हैं उसकी कीमत से ही कई सौ कोल्ड स्टोरेज बनाए जा सकते हैं जो फल-सब्जी को सड़ने से बचा सके। एक साल में जितना सरकारी खरीदी का धान व गेहूं खुले में पड़े होने के कारण मिट्टी हो जाता है, उससे ग्रामीण अंचलों में पांच हजार वेयर हाउस बनाए जा सकते हैं। यह आंकड़ा किसी से दबा-छिपा नहीं है, बस जरूरत है तो एक प्रयास करने की।
यदि पंचायत स्तर पर ही एक कुंटल अनाज का आकस्मिक भंडारण व उसे जरूरतमंद को देने की नीति का पालन हो तो कम से कम कोई भूखा तो नहीं मरेगा। बुंदेलखंड के पिछड़े जिले महोबा के कुछ लेागों ने ‘‘रोटी बैंक’’ बनाया है। बैंक से जुड़े लेाग भोजन के समय घरों से ताजा बनी रोटिया एकत्र करते हैं और उन्हें अच्छे तरीके से पैक कर भूखों तक पहुंचाते हैं। बगैर किसी सरकारी सहायता के चल रहे इस अनुकरणीय प्रयास से हर दिन 400 लेागों को भोजन मिल रहा है। बैंक वाले बासी या ठंडी रोटी लेते नहीं है ताकि खाने वाले का आत्मसम्मान भी जिंदा रहे। यह बानगी है कि यदि इच्छा शक्ति हो तो छोटे से प्रयास भी भूख पर भारी पड़ सकते हैं।

विकास, विज्ञान, संचार व तकनीक में हर दिन कामयाबी के नए स्तर छूने वाले मुल्क में इस तरह बेरोजगारी व खाना ना मिलने से होने वाली मौतें मानवता व हमारे ज्ञान के लिए भी कलंक हैं। हर जरूरतमंद को अन्न पहुंचे इसके लिए सरकारी योजनाओं को तो थोडा़ा चुस्त-दुरूस्त होना होगा, समाज को भी थोड़ा संवेदनशील बनना होगा। हो सकता है कि हम इसके लिए पाकिस्तान से कुछ सीख लें जहां शादी व सार्वजनिक समारोह में पकवान की संख्या, मेहमानों की संख्या तथा खाने की बर्बादी पर सीधे गिरफ्तारी का कानून है। जबकि हमारे यहां होने वाले शादी समारोह में आमतौर पर 30 प्रतिशत खाना बेकार जाता है।
गांव स्तर पर अन्न बैंक, प्रत्येक गरीब, बेरोजगार के आंकड़े रखना जैसे कार्य में सरकार से ज्यादा समाज को अग्रणी भूमिका निभानी होगी। बहरहाल हमें एकमत से स्वीकार करना होगा कि अंबिकापुर जिले में एक आदिवासी बच्चे की ऐसी मौत हम सभी के लिए शर्म की बात है। यह विडंबना है कि मानवता पर इतना बड़ा धब्बा लगा और उस इलाके के एक कर्मचारी या अफसर को सरकार ने दोषी नहीं पाया, जबकि ये अफसरान इलाके की हर उपलब्धि को अपनी बताने से अघाते नहीं हैं। भूख व कुपोषण जैसे मसलों पर अफसरान की जिम्मेदारी तय करने में कड़ाई, मुफ्त बंटने वाले भोजन की गुणवत्ता से समर्झाता ना करने और ग्रामीण स्तर पर खाद्य सुरक्षा की येाजना व क्रियान्वयन हमें भूख से मौत जैसे सामाजिक कलंक से मुक्ति दिलवा सकता है।

शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2016

Questioning on army working is not an anti national activity

जरूरी है सेना पर सवाल उठाने

पंकज चतुर्वेदी 

श्रीनगर से कोई 15 किलोमीटर दूर झेलम नदी के ठीक तट पर स्थित पंपोर की ईडीआई बिल्डिंग को कश्मीर में  आधुनिक विकास का प्रतीक माना जाता था। वह अब लगभग खंडहर है, कई करोड़ की लागत से बना भवन कई करोड़ के सरकारी बारूद से ही उड़ाया गया। फरवरी में भी आतंकियो नें इसी भवन पर हमाला किया था और तब हमारे दो युवा  सैनिक अफसर, एक राज्य सरकार का कर्मचारी शहीद हुए थे और तीन आतंकी मारे गए थे। इस बार विडंबना है कि महज दो आतंकी इतनी बड़ी फौज, सुविधा को साठ घंटे तक अटकाए रहे। अब इस पर सवाल उठने तो लाजिमी है, जब हमारी फौज सीमा पार जा कर दुश्मन के घर में घुस कर 40 को मारने में कुछ घंटे लेती है जो हमारे इलाके का भवन, जिसके चप्पे-चप्पे का नक्शा हमारे पास है, जहां अभी कुछ महीने पहले ही एनकांटर किया था, वहां कश्मीर के इतिहास का सबसे लंबा एनकाउंटर चले। उस हालत में जब सभी को पता था कि भवन में कोई नागरिक नहीं है। फिर हम उस भवन को भी बचा पाए जो कि इलाके की शान व युवाओं की उम्मीद का प्रतीक था ।

देश  में सर्जिकल स्ट्राईक को ले कर सेना से ज्यादा उसका श्रेय ले रहे लोगों पर सवाल उठाने वालों को गरियाने का दौर चल रहा था , ठीक उन्हीं दिनों दिल्ली की एक अदालत ने दक्षिण-पश्चिम  कमांड के प्रभारी रहे मेजर जनरल आनंद कुमार कपूर को आय से अधिक संपत्ति के एक मामले में एक साल की सश्रम कारावास की सजा सुना दी थी।  अभी तीन महीने पहले देहरादून में लेफ्टीनेंट कर्नल भारत जोषी सीबीआई द्वारा दस हजार की रिष्वत लेते रंगे हाथों केड़े गए थे। उससे पहले मई में पूर्वोत्तर के आईजोल में 39 असल राईफल्स के कर्नल जसजीत सिंह अपने नौ साथियों के साथ लगभग 15 करोड़ के सोने की तस्करी में गिरफ्तार हुए। ऐसी घटनाएं याद दिलवाने का कारण महज यही है कि सेना के जवान भी हमारे उसी समाज से आ रहे हंे जहां अनैतिकता, अराजकता, अधीरता तेजी से घर कर रही है और जिस तरह गैर-सैन्य समाज पर पाबंदी रखने, सतर्क करने के कई चैनल काम कर रहे हैं, सेना पर सवल करने को किसी धार्मिक आस्था को चोट पहुंचाने जैसा कार्य नहीं मान लेना चाहिए। गौर करें कि बीते दस सालों में फौज के 1018 जवान व अफसर खुदकुषी कर चुके हैं। थल सेना के 119 जवानों ने सन 119 में खुदकुषी कर ली थी , यह आंकड़ा सन 2010 में 101 था।
यह निर्विवाद है कि भारत की सेना दुनिय के श्रेष्ठतम  सबसे अनुशासित सेना है। पूरी दुनिया में जहां भी हमारे जवान शान्ति सेना के तौर पर गए हैं , शानदार काम का तमगा ले कर आए है। हमारी सेना धार्मिक, क्षेत्रीय, भाषई विविधता व साम्य का अनूठा उदाहरण है और आपदा के समय में भी सेना जो काम करती है , वैसा अन्य किसी महकमे से कल्पना भी नहीं की जा सकती। आज जब पूरे देश  में निर्वावित प्रतिनिधि, सरकारी कर्मचारी और यहां तक कि अब जो अदालतें भी लोगों को निराष कर रही है, हर जगह पक्षपात, भ्रश्टाचार और लेटलतीफी के चलते आम लेागों का भरोसा फौज पर ही बचा है, फौज की कार्यवाही पर सवाल करने या उसके कार्य को अपनी सियासत का जरिया बनाने को निर्विवाद कैसे कहा जा सकता है ? एक बात जान लें कि लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि होती है - ना सेना, ना ुपलिस और ना ही विधयिका। जब सेना या सरुक्षा बलों को सबकुछ बताने का दौर चलता है तो पाकिस्तान से सबक लेने की जरूरत को यादा दिलाना भी जरूरी है। हमारी अनुशासित सेना कभ ताकत अपने हाथ में नहीं रखना चाहती वह तो निर्वाचित सरकार के निर्देशों पर चलना चाहती हे। यानि यदि कोई सवाल उठते हैं तो हुक्मरानों के लिए ना कि सेना या उसकी काबिलियत पर।
बात सन 2007 की है, पाकिस्तान के एक बड़े समाचार चैनल के एक मालिक ने बातचीत में बताया था भारत और पाकिस्तान में बुनियादी फरक वहां की संस्थाओं को ले कर है। भारत में संस्थाएं बेहद मजबूत हैं और वे एक दूसरे पर चैक-बैलेंस का काम करती हैं, जबकि पाकिस्तान में फौज ही पहला व अंतिम संस्थान है। भारत में फौज सियासत से दूर रहती है और वह बेहद अनुषासित तरीके से चुनी हुई सरकार के निर्देष पर काम करती है, जबकि पाकिस्तान में फौज पर किसी को जोर नहीं है। फौजी , दीगर समाज के कृत्यों, भावनाओं और दुर्गुणो ंसे दूर रहे, इसीके लिए पहले फौज्ी छावनियां षहर से दूर होती थीं। प्रयास होता था कि कोई भी फौजी केंटूनमेंट एरिया से बाहर न रहे। यानि उसका हर पल अनुषासन व घड़ी के साथ रहे। लेकिन आज भारत में हालात बदल रहे हैं, फौजी असफसर समय से पहले रिटायरमेंट ले कर विदेषी हथियार कंपनी के दलालों के तौर पर काम कर रहे हैं। कुछ राजनीति में हैं तो कुछ सुरक्ष व खुफिया एजेंसियां चला रहे हैं। यह रिर्काउ में दर्ज है कि भारतीय फौज में अफसर स्तर पर बेहद कमी है और आज विभिन्न हाई कोर्ट में सैन्य बलों  से जुड़े आठ हजार से ज्यादा मामले लंबित हैं। वहीं सिपाही स्तर पर भर्ती में कैसे लेाग आ रहे हें उसकी बानगी प्रत्येक जिले में भर्ती के दौरान एकत्र युवाओं की हजारों की भीड़ व उनके द्वारा हर जगह परिवहन साधनों में तोड़फोड़, षहर में लूट, मारापीटी की नियमित घटनाओं से लगाया जा सकता है।
लोग भूल गए होंगे कि सर्जिकल स्ट्राईक के दौरान महाराश्ट्र के निवसी एक सिपाही चंदू बाबूलसल चैहान के गलती से पाकिस्तान में चले जाने के पीछे फौज ने कारण बताया कि सिपाही का अपने अफसर से झगउ़ा हुआ था व वह नाराज हो कर मय हथियार के कैंप से चला गया था।  सेना में औसतन हर साल पदो ऐसी घटनाएं हो रही है जिसमें जवान अपने ही साथियों को गोली मार रहा है । मई 2001 में एक फौजी सिपाही सुबाराम को फांसी की सजा सुनाई गई थी क्योंकि उसने अपने अफसर को गोली मार दी थी।  असल में सुबाराम  अपने साथियों की हत्या करने वाले आतंकवादियों को पनाह देने वालों को हाथों-हाथ सजा देना चाहता था, जबकि राजनीतिक आदेषों से बंधे अफसरों ने ऐसा करने से रोका था। उसके सब्र का बांध टूटा व उसने खुद के अफसर को ही मार डाला। पिछले कुछ सालों के दौरान ऐसी घटनांए होना आम बात हो गई है जिसमें कोई उन्मादी सिपाही अपने साथियों को मार देता है या फिर खुद की जीवनलीला समाप्त कर लेता है।  इन घटनाओं से आ रही दूरगामी चेतावनी की घंटी को अंग्रेजी कायदेां मे ंरचे-पगे फौजी आलाकमान ने कभी सलीके से सुनने की कोषिष ही नहीं की, जबकि फौजी के षौर्य और बलिदान से छितरे खून को अपना वोट बैंक में बदलने को तत्पर नेता इसे जानबूझ कर अनसुना करते हैं।  सेना  व अर्ध सैनिक बल के आला अफसरों पर लगातार विवाद होना, उन पर घूसखोरी के आरोप,सीमा या उपद्रवग्रस्त इलाकों में जवानों को माकूल सुविधाएं या स्थानीय मदद ना मिलने के कारण उनके साथियों की मौतों, सिपाही स्तर पर भर्ती में घूसखोरी की खबरों आदि के चलते अनुषासन की मिसाल कहे जाने वाले हमारे सुरक्षा बल(जिनमें फौज व अर्ध सैनिक बल षामिल हैं) का मनोबल गिरा है।
ना तो समाज ऐसा रहा है और ना ही सियासत, जाहिर है कि सेना भी बदल रही है। अब फौज में बल से ज्यादा बुद्धि का काम है, अत्याधुनिक मषीनें, षस्त्र और त्वरित फैसला लेने की काबिलियत। सेना समाज के करीब भी आ रही है। ऐसे में बेहद सतर्कता जरूरी है- एक तो सेना को स्थानीय राजनीति में ना घसीटा जाए, दूसरा सेना की कार्यवाही पर यदि कोई सवाल उठे तो उसे षालीनता और तर्क के साथ निबटा जाए, वरना सेना में भी एकाधिकार व सर्वषक्तिमान का भाव आना बड़ी बात नहीं है। यदि फौज को समालोचना के दायरे में नहीं रखा गया तो ट्रेन में फौजी डिब्बे(जोकि होते नहीं है, जवान कब्जा कर लेते हैं व आम लेाग आस्था से उन्हें छूट देते हैं)में गलती से चढ गए लोगों की होने वाली पिटाई या  तीन महीने पहले सुप्रीम कोर्ट द्वारा मणिपुर में सेना के हाथों मारे गए 1500 लेागों के संदिग्ध एनकाउंटर की जांच या उससे पहले टमाटर केचअप लगा कर कष्मीर में फर्जी मुठभेड़ करने वालें छह अफसरों को अदालत द्वारा सजा सुनाने जैसे कभी-कभार सुनाई देने वाले वाकिए  आए रोज की घटना बनने में देर नहीं लगेगी।

बुधवार, 12 अक्तूबर 2016

Bundelkhand : chhatarpur, muharram of composite culture

बुंदेलखंड: छतरपुर में मुहर्रम


इस बार सत्य की असत्यता पर जीत के दो पर्व - दशहरा और मुहर्रम एक साथ हैं। ऐसे में बुंदेलखंड केसरी महाराज छत्रसाल की नगरी छतरपुर का मुहर्रम शांति, सांप्रदायिक सौहार्द और आपसी सामंजस्य का अनुकरणीय उदारहरण है। हर जाति और समाज के लोग इस त्याग और इंसाफ की राह पर चलने के पर्व में शिरकत करते हैं। 

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पूरे देश में कुछ लोगों द्वारा फैलाई जा रही सांप्रदायिकता के दौर में एकबारगी लगने लगता है कि खुदा और भगवान कोई दो अलग-अलग शक्तियां हैं, और वे साथ नहीं रह सकते। इस बार सत्य की असत्यता पर जीत के दो पर्व – दशहरा और मुहर्रम एक साथ हैं। ऐसे में बुंदेलखंड केसरी महाराज छत्रसाल की नगरी छतरपुर का मुहर्रम शांति, सांप्रदायिक सौहार्द और आपसी सामंजस्य का अनुकरणीय उदारहरण है। हर जाति और समाज के लोग इस त्याग और इंसाफ की राह पर चलने के पर्व में शिरकत करते हैं। वक्त के साथ कुछ लोगों ने यहां की भी फिजां बिगाड़ने की कोशिश की, लेकिन समृद्ध परंपराओं में रचे-बसे छतरपुरवासियों ने ऐसी हर साजिश को दृ़ढ़ता से नाकाम कर दिया। यहां की बड़ी कुजरहटी के बाशिंदे हारून चचा अपने जीवन के 70 से अधिक मुहर्रम देख चुके हैं। ऊदल सिंह के ताजिये की याद कर आज भी उनकी आंखें तर हो जाती हैं। बात उन दिनों की है, जब यहां जितने ताजिये मुसलमानों के होते थे, उतने ही हिंदुओं के। महाराज छतरपुर और नगर सेठ के ताजिये आलीशान होते थे, लेकिन गरीब होने के बावजूद ऊदल सिंह के ताजिये की शान निराली होती थी। बकौल हारून चचा, एक बार ऊदल ने तंगी की हालत में अपनी पत्नी की दुर यानि नथनी गिरवी रखकर ताजिया बनाया। लेकिन कहते हैं कि रहस्यमय तरीके से वह नथनी उसके घर वापस पहुंच गई। आज विज्ञान के युग में ऐसे चमत्कारों पर भरोसा भले न किया जा सके, लेकिन इस किंवदंती से यह तो प्रमाणित होता ही है कि हमारे देश में हिंदू और मुसलमान दोनों कौमें हाल तक मिलजुलकर रहती आई हैं।
ऊदल सिंह के बारे में ऐसा ही एक और किस्सा बड़ा चर्चित है। छतरपुर के सभी ताजिये चौक बाजार में रखे जाते हैं। एक बार नगर सेठ ने अपना ताजिया ऊंचा दिखाने के लिए उस पर लंबे-लंबे झंडे लगा दिए। ऊदल को अपना ताजिया छोटा दिखा। उसे यह नागवार गुजरा और उसने नगर सेठ के ताजिये से झंडे काटने के लिए हाथ बढ़ाया। तभी चमत्कार हुआ और नगर सेठ के ताजिये पर से झंडे अपने आप नीचे आ गए। इस तरह के लोक विश्वासों के जरिए इलाके में ऊदल सिंह की याद आज भी जीवित है। सरानी दरवाजे के पास भट्ट की बेहंर पर हर साल ऊदल कर ताजिया बनता है और इसके लिए पैसा शहर के हिंदू सर्राफ ही देते हैं।
छतरपुर महाराज विश्वनाथ सिंह तो ताजियों के साथ नंगे पांव चलते थे। महाराज का ताजिया महल के पिछवाड़े तोपखाने इमामबाड़े से उठता था। बताते हैं कि महाराज ने अपने राज्य की रक्षा और समृद्धि के लिए बनारस से पांच सूफियों को बुलाकर छतरपुर में बसाया था। वे थे-सैयद वली बाबा, जलाल शाह, कमानी वाले बाबा, सैयद अली और मस्तान शाह बाबा। इन पांचों की मजारें आज भी शहर के सभी धर्मावलंबियों की श्रद्धा का केंद्र हैं। इन्हीं सूफियों की प्रेरणा से महाराज मुहर्रम के सभी कार्यक्रमों में भागीदारी करते थें ।
पिरुआ छीपी और हल्के बेलदार के नाम आज भी यहां के नामी ताजियेदारों में गिने जाते हैं। छतरपुर के मुहर्रम की एक खासियत यहां बनने वाली बुर्राके हैं। यह परंपरा तीन सौ साल से भी अधिक पुरानी बताई जाती है। चूंकि बुर्राकों में चेहरा होता है, अतः कई मुसलमान इसे बुतपरस्ती बताकर इस्लाम की शरीयत के खिलाफ बताते हैं। लेकिन बुंदेलखंड में मुहर्रम किसी एक जाति या समाज का पर्व नहीं माना जाता है। पैगंबर मुहम्मद के नवासे हसन और हुसैन की शहादत के शोक में शामिल होना यहां की सामाजिक प्रतिबद्धता रही है। यहां का समाज मानता रहा है कि हसन-हुसैन की शहादत आतंकवादी घटना थी। सो, इंसानी चेहरे वाली बुर्राकों को लेकर यहां कभी विवाद या झंझट होना तो दूर किसी कि उठाए ऐसे एतराज पर आमतौर से कोई कान तक नहीं देता।
बड़ी कुंजरहटी में सबसे बड़ी बुर्राक बनती है। कहा जाता है कि कोई डेढ़ सौ साल पहले कड़ा की बरिया के निवासी अग्रवाल के कोई औलाद नहीं हो रही थी। उन्होंने मुहर्रम में बुर्राक के सामने फरियाद की और बेटे के रूप में उनकी मुराद पूरी हो गई। बेटे का नाम बैनी रखा गया। तब से बड़ी कुजरहटी की बुर्राक पर चढ़ने वाले सोने के गहने व जेवरात उनका ही परिवार देता है। हर साल कर्बला के बाद ये गहने बैनी के कुल के लोगों को लौटा दिए जाते हैं। यह हिंदू परिवार इन गहनों को एक तिजोरी में सुरक्षित रखता है और नियमित रूप से उन्हें धूप-बत्ती दिखाता है।
मुहर्रम की रात सुलगते अंगारों पर चलना और उछलना यहां की दीगर खासियत है। शहर में सात जगहों-मोती मस्जिद के करीब, इलाहाबाद बैंक के पास, मऊ दरवाजे के सामने, ग्वालमगरा डाकखाना चौराहा, महल और नए मुहल्ले में मुहर्रम की तीन रातों में अलाव होता है और लोग हसन-हुसैन की शहादत को याद करते हुए सुलगते शोलों से खेलते हैं। कोई सौ साल पहले यह परंपरा जबलपुर से यहां आई थी। तब तलैया मुहाल के एक हिंदू कस्सी खंगार अलाव खेलने में माहिर माने जाते थे। उनकी परंपरा को उनका भतीजा गट्ठी आज भी जीवंत रखे है।
ताजियों के पहले शहर की सड़कों पर अली के शेर, सत्यजित राय के ’गोपी गाइन-बाघा बाइन‘ की याद ताजा करा देते हैं। कुछ युवा अपने शरीर पर बाघ की मानिंद धारियां डाल और पूंछ लगाकर सारे शहर में हुंकार लगाते दिखते हैं। शुरू में शुक्लाना मुहल्ले के नारायणसेन, मजीद मास्टर आदि शेर बनते थे। आज भी दर्जनों पढ़े-लिखे हिंदू-मुसलमान नौजवान यह काम आपसी भाईचारे के चलते और उसे बरकरार रखने के लिए करते हैं।
गौरतलब और आश्चर्यजनक तथ्य है कि अली के शेर, अलाव और अमन के प्रतीक छतरपुर में ही कुछ सलों से मुट्ठीभर लोग दंगे भड़काने का प्रयास करते रहे और हर बार दोनों फिरकों के लोगों की समझदारी से ऐसा हो नहीं पाया। इस दीगर चर्चा में जाने का मौका यह नहीं है लेकिन यह रेखांकित करने योग्य है कि यहां के लोगों की आस्था और आपसी ताल्लुक की दृढ़ कड़ी किसी भी भड़काऊ कोशिश का मुंहतोड़ जवाब देती आई है। ताजियों में बढ़-चढ़कर तलवार नचाने वाले युवकों का कहना है कि मुहर्रम भले ही एक धार्मिक पर्व है पर उनके लिए यह बुंदेलखंड की गंगा-जमुनी संस्कृति की मिसाल है ।

Bastar needs immediately high class health services

बीमारी से बदहाल आदिवासी

 पंकज चतुर्वेदी

Jagran 12-10-16
पिछले एक महीने में छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में 39 बचों की मौत जापानी बुखार (इंस्फेलाइटिस) से होने की बात सरकार स्वीकार कर रही है। इससे असली आंकड़े का भी अंदाज लगाया जा सकता है। कहा जा रहा है कि इस बीमारी ने पहली बार इस इलाके में दस्तक दी है। लेकिन पड़ोसी राय ओडिशा के मलकानगिरी से इसकी शुरुआत हुई थी। लेकिन इसका कारण तो वही मछर हैं जिनकी चपेट में आने से हर साल सैंकड़ों नागरिक और सुरक्षा बल के जवान असामयिक काल के गाल में समा रहे हैं। इस बार हालात बिगड़ने पर छत्तीसगढ़ में बीएसएफ गांव-गांव में दवा छिड़क रही है, लेकिन हमलों की आशंका के चलते इस बल की भी अपनी सीमाएं हैं। बस्तर में पक्की सड़क से उतरते ही स्वास्थ्य सेवाएं नदारत दिखती हैं। जितनी कमी जागरूकता की है, उससे कहीं यादा चिकित्सा स्टाफ और दवाओं की कमी है। पिछले एक महीने से बस्तर में कहीं तेज गर्मी तो कहीं मूसलाधार बारिश का दौर जारी है। इससे वर्षा जनित बीमारियों का ग्राफ बढ़ गया है।
छत्तीसगढ़ का बीजापुर जिला बेहद दुर्गम इलाकों में गिना जाता है। यहां बीते एक महीने में मलेरिया के चार हजार से यादा केस दर्ज किए गए हैं। गत 11 से 23 जुलाई तक यहां डायरिया पखवाड़ा मनाया गया, लेकिन प्रशासन के पास इसका कोई आंकड़ा उपल}ध नहीं है कि उल्टी-दस्त के कितने मरीज आए। बस्तर में अभी मलेरिया का जोर कुछ कम हुआ है और उल्टी-दस्त का दौर चल रहा है। यहां के संभागीय मुख्यालय के करीबी मुख्य मार्ग के लोहडीगुंडा ब्लॉक में ही डेंगू के 22 मरीज मिले। यहां 60 फीसदी इलाका सड़कों से कटा हुआ है। सैकड़ों गांव प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से 25-30 किलोमीटर दूर हैं। कई बार मरीज को चारपाई पर डाल कर पैदल ही लाया जाता है। छत्तीसगढ़ में प्रसव के दौरान मौत आम बात है। सरकारी खजाने का मुंह बस्तर के जंगलों की तरफ इस तरह खुला हुआ है कि लगता है अब वहां की गरीबी, पिछड़ापन, अशिक्षा बस बीते दिनों की बात बनने ही वाली है, जबकि हकीकत यह है कि कभी प्रकृति के सहारे जीने-मरने वाले आदिवासी साफ पानी के अभाव में बीमारियों से त्रस्त रहते हैं। सरकारी दस्तावेज गवाह हैं कि जिन इलाकों में लोग जहरीले पानी से मर रहे हैं, वहां सरकारी मशीनरी पहुंच ही नहीं पा रही है। सरकार अपनी नाकामी पर नक्सलवाद का मुलम्मा चढ़ाकर समस्याओं से किनारा कर रही है। बहुत से बस्तर-विषेशज्ञ इसे हर साल की स्थाई त्रसदी करार दे कर मामले को हल्का बना रहे हैं तो कुछ ठीकरा नक्सलियों के सर फोड़ कर सत्ताधारी दल के गुण गा रहे हैं। जंगल में नक्सली हिंसा में कितने मरे, उसके आंकड़े तो मीडिया पहले पन्ने पर छापता है, लेकिन इस साल मार्च से लेकर अभी तक वहां पीलिया से पचास मौतें हो चुकी हैं, यह कहीं छपा नहीं दिखेगा।
असल में, बस्तर कभी इतना बड़ा जिला हुआ करता था कि केरल राय उसके क्षेत्रफल के सामने छोटा था। आज उस बस्तर को सात जिलों में बांट दिया गया है जिनमें कांकेर, कोंडागांव, जगदलपुर, नारायणपुर, दंतेवाड़ा, सुकमा और कोंटा जिले शामिल हैं। इन जिलों में ग्रामीणों के पास हैंडपंप ही पेयजल का एक मात्र माध्यम है। अधिकतर हैंडपंप के पानी में लोहा व फ्लोराइड निकलता है, जो जहर के माफिक है। इलाके में हैंडपंपों पर फ्लोराइड या आयरन के आधिक्य के बोर्ड लगे हैं, लेकिन यादातर आदिवासी तो पढ़ना ही नहीं जानते हैं और जो पानी मिलता है, पी लेते हैं। माढ़ के आदिवासी शौच के बाद जल का इस्तेमाल नहीं करते हैं। ऐसे में उनके शरीर पर बाहरी रसायन तत्काल असर करते हैं। सरकारी अमले हेपेटाइटिस-ए और बी के टीके लगाने के आंकड़े तो पेश करते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि इन टीकों को पांच डिग्री सेंटीग्रेट तापमान पर रखना होता है, वरना यह खराब हो जाते हैं। हकीकत यह है कि प्रशासन के पास अभी तक ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि आंचलिक क्षेत्रों तक इतने कम तापमान में टीके पहुंचाएं जाएं।
यह पहली बार नहीं हुआ कि यहां गर्मी शुरू होते ही जल-जनित रोगों से लोग मरने लगे हैं और जैसे ही बारिश हुई, उससे सटे-सटे ही मलेरिया आ जाता है। ऐसा पिछले दस वर्षो से चल रहा है। बस्तर में पिछले तीन सालों के दौरान मलेरिया से 200 से यादा लोग मारे गए हैं। बीमार होना, मर जाना यहां की नियति हो गई है और हल्बी भाषा में इस पर कई लोक गीत भी हैं। हल्बी गोंड आदिवासियों की भाषा है। आदिवासी अपने किसी के जाने की पीड़ा गीत गा कर कम करते हैं तो सरकार सभी के लिए स्वास्थ्य के गीत कागजों पर लिख कर अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाती है। बस्तर संभाग में बारह सौ प्राथमिक अस्पताल हैं, लेकिन इनमें से आधे से यादा के पास अपने भवन नहीं हैं। बस्तर यानी जगदलपुर के छह विकास खंडों के सरकारी अस्पतालों में ना तो कोई स्त्री रोग विशेषज्ञ है और ना ही बाल रोग विशेषज्ञ। सर्जरी या बेहोश करने वाले या फिर एम.डी. डॉक्टरों की संख्या भी शून्य है। जिले के बस्तर, बकावंड, लोहडीगुडा, दरभा, किलेपाल, तोकापाल व नानगुर विकासखंड में डॉक्टरों के कुल 106 पदों में से 73 खाली हैं। 2012-13 के दौरान जिले में दर्ज औरतों व लड़कियों की मौत में 60 फीसदी कम खून यानी एनीमिया से हुई है। बड़े किलेपाल इलाके में 25 प्रतिशत से यादा किशोरियां और महिलाएं कम खून की बीमारी से ग्रस्त हैं। टीकाकरण, गोलियों का वितरण, मलेरिया या हीमोग्लोबीन की जांच जैसी बाते यहां सपने की तरह हैं। जब अस्पताल में ही स्टाफ नहीं है तो किसी माहामरी के समय गांवों में जा कर कैंप लगाना संभव ही नहीं होता। अभी बीजापुर जिले के भैरमपुर ब्लॉक में इंद्रावती नदी के उस पार बेथधरमा, ताकीलांड, उतला, गोरमेटा जैसे कई गांवों में हर रोज तीन से पांच लोगों की चिताएं जलने की खबर आ रही हैं। स्वास्थ्य विभाग नक्सलियों के डर से वहां जाता ही नहीं है। ऐसे कोई 450 गांव पूरे संभाग में हैं, जहां आज तक कोई स्वास्थ्य कर्मी गया ही नहीं, क्योंकि वहां तक रास्ता नहीं है और वहां उल्टी-दस्त व अब मलेरिया मौत का तांडव कर रहा है।
बस्तर बीमार है। इसका असर वहां जंगलों में संघर्ष कर रहे पुलिस और अर्ध सैन्य बलों के जवानों पर भी पड़ता है। यहां तक कि जवानों को ना तो शुद्ध पेय जल मिल रहा है और ना ही मछर से निबटने के साधन। उन्हें दोहरी मार ङोलनी पड़ रही है। बस्तर के आदिवासियों का निश्चल जीवन और लोकरंग, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में बेरंग हो रहा है। जल-जंगल-जमीन को बाहरी दखल ने जहरीला बना दिया है, वरना वहां हर मर्ज की दवा जड़ी-बूटी थी। लोगों को बस्तर की याद तभी आती है जब वहां नक्सल या पुलिस के बैरल से निकली गोली के साथ किसी निदरेष का खून बहता है या फिर कहीं मुल्क की समृद्ध संस्कृति के नाम पर वहां के लोकनृत्य का प्रदर्शन करना होता है। काश सरकार में बैठे लोगों पर भी कोई टोना-टोटका कर दे ताकि वे पीलिया, डायरिया जैसे सामान्य रोग से मरते अपने ही बस्तर के प्रति गंभीर हो सकें।

शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2016

Public Transport system way to death

परलोक वाहन बनता सार्वजनिक परिवहन

                                                                                                                                          पंकज चतुर्वेदी

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अभी दो अक्तूबर को मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में नदी में बस गिरने से दस लोगों की मौत हो गई और बीस घायल हो गए। जांच में सामने आया कि बस के परमिट की वैधता शमशाबाद से लटेरी मार्ग के लिए नहीं थी, ये जानते हुए भी संचालक बस को इस रूट पर संचालित कर रहा था। रविवार की दोपहर शमशाबाद से लटेरी की ओर जा रही यात्री बस सापन नदी की सीताराम पुलिया को पार करते वक्त पानी में जा गिरी. नदी में संजय सागर बांध का आया हुआ बैक वाटर है। यह भी समाने आया कि बस नंबर एमपी 40 पी-0218 की खराबी के बाद बस नंबर एमपी 40 पी-0318 को भोपाल से लटेरी भेजा। जबकि यह रूट इकलेरा भोपाल रूट की गाड़ी का है। बस ड्राइवर ने सवारी बैठाने के लिए बस को शमशाबाद की तरफ घूमा दिया। रास्ते में सापन नदी पर पुल के बराबर पानी और 100 मीटर के हिस्से में सड़क खराब होने के बाद भी चालक ने बस को बिना सोचे समझे पुल पर उतार दिया। नतीजा बस अनियंत्रित हो गई। मौका पाकर बस चालक ने दूसरी तरफ छलांग लगा दी। बस को नदी में जाता देखने के बाद भी चालक और कंडक्टर फरार हो गया। सवारियों ने ड्राइवर की स्पीड कम करने के लिए कहा। लेकिन ड्राइवर ने सवारियों की एक बात नहीं मानी। नतीजा बस पुल पर पहुंचते ही अनियंत्रित होकर नदी में जा गिरी।
मध्यप्रदेष में यह सिलसिला अकेले एक जिले तक ही सीमित नहीं है, आंकड़े देखें तो पूरे प्रदेष का यही हाल है। यह भी सच है कि राज्य में ऐसे सड़क हादसे आज से नहीं, गत एक दषक से आए रोज घटित हो रहे हैं और उन्हें महज एक घटना मान कर बिसरा दिया जाता है। असलियत तो यह है कि प्रदेष की परिवहन नीति की असफलता के कारण क्षेत्रफल के मामले में देष का दूसरे और आबादी के लिहाज से छठवें सबसे बड़े राज्य मध्यप्रदेष की सड़कें हर दिन सड़क दुर्घटनाओं की घटनाओं से लाल होती हैं। शायद ही कोई ऐसा दिन जाता हो जब प्रदेष में बसों की टक्कर के कम से कम तीन मामले नहीं आते हों। देष के मध्य में स्थित एक ऐसा राज्य जिसके आर्थिक , सामाजिक विकास पर सभी की निगाहें टिकी हों, वहां की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पूरी तरह अनियोजित और अनियंत्रित होना विकास के मूल मानकों के विपरीत है। बीते एक दषक के दौरान पूरे देष की ही तरह मध्यप्रदेष में भी ऐसी सड़कों का जाल फैला जो द्रुतगामी परिवहन के लिए मददगार होती हैं, लेकिन इसके ठीक विपरीत राज्य की सरकारी बस संचालन करने वाली संस्था म.प्र. राज्य परिवहन निगम को ही बंद कर दिया गया। इस विभाग के पास केवल बसें ही नहीं, पूरे प्रदेष में कोई 100 जगहों पर अपनी जमीनें भी थीं और था लोगों का भरोसा। परिवहन निगम को बंद होने के बाद राज्य में प्रतिदिन 500 दुर्घटनांए हो रही हैं और केवल बसों की चपेट में मरने वालों की संख्या हर साल सात सौ के करीब पहुंच चुकी है।
किसी भी शासन के विकास को उसके सुरक्षित परिवहन और सुदृढ संचार से आंका जाता है। कोई 308,252 वर्ग किलोमीटर में फैले म.्रप. की आबादी सवा सात करोड़ से अधिक है। यहां की 72.37 फीसदी जनसंख्या ग्रामीण अंचलों में रहती है। कभी म.प्र. राज्य परिवहन निगम यहां के बाषिंदों की जीवन-रेखा हुआ करती थी। सन् 2003-04 के आसपास जब राज्य में सड़क निर्माण का काम तेजी पकड़ रहा था, तभी यह सुगबुगाहट होने लगी थी कि राज्य परिवहन निगम के दिन गिने-चुने हैं। उस साल परिवहन निगम ने 23 सामान्य और 06 डीलक्स नई बसों को अपने बेड़े में शामिल किया। उस साल प्रदेष के निजी बस आपरेटरों ने नौ साधारण और 11 डीलक्स बसें खरीदीं। अगले साल परिवहन निगम ने बसें खरीदना बंद कर दिया निजी बस संचालकेां द्वारा नई बस खरीदने के आंकडा़ उछल कर 255(साधारण बसें) और 26 डीलक्स बसों पर पहुंच गया। सन 2005 में राज्य में 803 साधारण बसें, 31 डीलक्स और 4738 मिनी बसें प्राईवेट आपरेटरों ने खरीद लीं। यह वह दौर था, जब राज्य में परिवहन निगम को बीमार दिखाने के लिए अधिकांष रूटों पर बसों का संचालन रोक कर उसके परमिट निजी आपरेटरों को बेचने का खेल शुरू हो चुका था।
सन 2008 में म.प्र.राज्य परिवहन निगम को पूरी तरह बंद कर दिया गया। उस समय निगम कोई 1700 रूटों पर अपने परमिटों को किराए पर उठा कर कोई 12 करोड़ रूपए महीने की आमदनी कर रहा था। निगम के बंद होते ही बसों पर पूरी तरह निजी कंपनियों का कब्जा हो गया। प्रदेषभर के कई कर्मचारी अभी भी अपने बकाये के लिए अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं, जबकि निगम की बेषकीमती जमीनों पर असरदार लोग कब्जा पा चुके हैं। निगम का समाप्त होना जैसे राज्य के लोगों के लिए ‘ जान हथेली पर रख कर’ सफर करने का फरमान ले कर आया है। अब हर कस्बे-गांव-जिलों की समूची परिवहन व्यवस्था डगगामार जीपों, व अन्य ऐसे परिवहन वाहनों पर टिकी है, जो सड़कों पर मौत बन कर घनघनाते घूमते हैं। अकेले छतरपुर जिला मुख्यालय पर ऐसे वाहनों की संख्या पांच सौ के आसपास है, जिनके पास ना तो प्रषिक्षित चालक हैं और ना ही सवारी ढोने के वैध परमिट , ना ही सवारियों की कोई निर्धारित संख्या, ना ही वसूले जाना वाला पैसा, ना ही टाईम टेबल या आने-जाने का समय। सब कुछ अनियोजित, अनियंत्रित, असामयिक। चूंकि इस तरह की बेतरतीब (अ)व्यवस्था सभी महकमों के लिए कुछ ना कुछ सौगात का जरिया होती है, सो आए रोज होने वाले एक्सीडेंटों, वाहन चालकों के झगड़ों और आम लोगेां की चीख-पुकार को सुनना किसी को भी गवारा नहीं है। अवैध वाहनों का संचालन अब हर जिले में पुलिस, नेता व गुंडों की स्थाई कमाई का जरिया बन गया है, सो कोई इसेबंद नहीं करवाना चाहता। इंदौर, भोपाल, जबलपुर, सतना जैसे बड़े षहरों में तो अब बाकायदा परिवहन-माफिया सक्रिय है जिनके आए रोज खूनी टकराव होते रहते हैं।
इन दिनों पूरे प्रदेष में दो मंजिला बसों का प्रचलन हो गया है। बुंदेलखंड के जिले, जहां से सालभर मजदूरों का पलायन होता है, ये बसें सोने का अंडा देने वाली मुर्गी साबित हुई हैं। ऊपरी बर्थ, जहां पर दो लोग बैठ सकते हैं, पांच से छह मजदूरों को उकडूं बैठा दिए जाते हैं। बस का अस्थाई टूरिस्ट परमिट कुछ मजूदरों को नाम लिख कर बनवाया जाता है, फिर पुलिस-प्रषासन की मिलीभगत से ऐसी बसों को दिल्ली, गुड़गांव, इंदौर जैसे बोर्ड लगा कर बस स्टैंड से बेतरतीब भरा जाता है। कई बार बीच सड़क पर एक बस से दूसरे में सवारी भरी जाती हैं, फिर ये गाडिय़ंा सड़कों पर कई-कई फेरे लगाती हैं। चूंकि बसों के संचालक रूतबेदार होते हैं सो, सरकार को लगने वाले टैक्स की चोट, सवारियों के जीवन से खिलवाड़ और बहुत कुछ कहीं दब-कुचल जाता है। आए रोज सड़को ंपर लोग मारे जाते हैं, चूंकि मरने वाले मजदूर या गरीब तबके के होते हैं, सो अधिकांष मामलों में बीमा के दावे तक नहीं होते। किरायों की वूसली बेतरतीब मनमानी हे। इंदौर से उज्जैन की दूरी 52 किलोमीटर है और किराया 53 रूपए, लेकिन 55 ना वसूले तो नेताजी की बस का रूतबा ही क्या रहा ? अक्सर बसों व अवैध छोटे वाहनों में सवारी लूटने की होड़, झगड़े होते ही रहते हैं।
असल में यह उत्तर प्रदेष, राजस्थान, हरियाणा जैेसे राज्यों के लिए बानगी और चेतावनी भी है, जहां प्रदेष की सरकारें भीतर ही भीतर परिवहन निगम का निजीकरण करने की जुगत लगा रही हैं। निजीकरण ना तो सवारियों के लिए फायद का सौदा है ना ही सरकार व कर्मचारियों के लिए। देष में कई सड़कों को राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित कर दिया गया है- जगह-जगह बेहतरीन सड़कें बन रही हैं और उतनी ही गति से लोगों का आवागमन बढ़ रहा है, ऐसे में उन्मुक्त परिवहन व्यवस्था किसी बड़ी त्रासदी की ओर इषारा कर रही है। बड़ी आबादी को सुरक्षित, भरोसेमंद और वाजिब दाम में परिवहन उपलब्ध करवाना सरकार की प्राथमिकता होना चाहिए। यदि यह काम ठेके पर ही करना है तो किसी बड़ी कंपनी को पूरे राज्य का ठेका देकर उस पर सतत निगरानी का काम राज्य सरकार को करना चाहिए, वरना हर रोज इसी तरह सड़क पर खून और घर से बाहर निकले लोगों के परिजनों के मन में अनहोनी का अंदेसा ऐसे ही पसरा रहेगा।
पंकज चतुर्वेदी
संपर्क- 9891928376


गुरुवार, 6 अक्तूबर 2016

River interlinking an global warming


शुरुआत से पहले कई बार सोचिए


नदी जोड़ योजना
                                                                    पंकज चतुर्वेदी
भारत ने पेरिस जलवायु परिवर्तन प्रस्ताव पर अमल करने व अपने यहां कार्बन उत्सर्जन घटाने की घोषणा की है। ठीक उसी समय हुक्मरान तय कर चुके हैं कि देश में नदियों को जोड़ने की परियोजना लागू करनी ही है और उसकी शुरुआत बुंदेलखंड से होगी जहां केन व बेतवा को जोड़ा जाएगा।
यह जानना जरूरी है कि नदी जोड़ने का मतलब है एक विशाल बांध और जलाशय बनाना और उसमें जमा दोनों नदियों के पानी को नहरों के माध्यम से लोगों तक पहुंचाना। केन-बेतवा जोड़ योजना कोई 12 साल पहले जब तैयार की गई थी तो उसकी लागत 500 करोड़ के करीब थी। सन‍् 2015 में इसकी अनुमानित लागत 1800 करोड़ पहुंच गई। जब नदियों को जोड़ने की योजना बनाई गई थी तब ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन क्षरण, ग्रीन हाऊस इफेक्ट, जैसी चुनौतियां नहीं थीं।
जलवायु परिवर्तन के कारण चेन्नई में पिछले साल और उससे पहले कश्मीर में आई तबाही की बानगी शायद बुंदेलखंडवासी भूल गए हों, लेकिन उन्होंने इस बार उसी प्राकृतिक आपदा का सामना किया है। तीन साल के भयंकर सूखे के बाद इस बार जो बरख बरसे हैं, उससे कई जगह हफ्तों तक जनजीवन ठप रहा। सैकड़ों जगह ऐसी थीं जहां तालाबों की जल-निकासी के पारंपरिक ‘‘ओने’’ को खोलना पड़ा। बरसात की त्रासदी इतनी गहरी कि भले ही जल स्रोत लबालब हो गए लेकिन खेतों में बुवाई नहीं हो पाई।
नदियों का पानी समुद्र में ना जाए, बारिश में लबालब होती नदियां गांवों-खेतों में घुसने के बनिस्पत ऐसे स्थानों की ओर मोड़ दी जाएं जहां इन्हें बहाव मिले तथा जरूरत पड़ने पर इसके पानी को इस्तेमाल किया जा सके, इस मूल भावना को लेकर नदियों को जोड़ने के पक्ष में तर्क दिए जाते रहे हैं। लेकिन विडंबना है कि केन-बेतवा के मामले में तो ‘क्या नंगा नहाए, क्या निचोड़े’ की लोकोक्ति सटीक बैठती है। केन और बेतवा दोनों का उद‍्गम स्थल मध्य प्रदेश में है। दोनों नदियां उत्तर प्रदेश में जाकर यमुना में मिल जाती हैं। जाहिर है कि जब केन के जल ग्रहण क्षेत्र में अल्प वर्षा या सूखे का प्रकोप होगा तो बेतवा की हालत भी ऐसी ही होगी। तिस पर 1800 करोड़ (भरोसा है कि जब इस पर काम शुरू होगा तो यह लागत 2200 करोड़ पहुंच जाएगी) की योजना संरक्षित वन का नाश, हजारों लोगों के पलायन का कारक बनेगी।
नेशनल इंस्टीट्यूट फार स्पेस रिसर्च (आईएनपीसी) ब्राजील का एक गहन शोध है कि दुनिया के बड़े बांध हर साल 104 मिलियन मीट्रिक टन मीथेन गैस का उत्सर्जन करते हैं और यह वैश्विक तापमान में वृद्धि की कुल मानवीय योगदान का चार फीसदी है। सनद रहे कि बड़े जलाशय, दलदल बड़ी मात्रा में मीथेन का उत्सर्जन करती है। ग्लोबल वार्मिंग के लिए ज़िम्मेवार माने जाने वाली गैसों को ग्रीन हाऊस या हरित गृह गैस कहते हैं। इनमें मुख्य रूप से चार गैसें-कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड और सल्फ़र हेक्साफ्लोराइड तथा दो गैस समूह-हाइड्रोफ्लोरोकार्बन और परफ्लोरोकार्बन शामिल हैं। ग्रीन हाऊस गैसों के अत्यधिक उत्सर्जन से वायुमंडल में उनकी मात्रा निरंतर बढ़ती ही जा रही है। पिछले 20 से 50 वर्षों में वैश्विक तापमान में करीब एक डिग्री सेंटीग्रेड की वृद्धि हो चुकी है। केन-बेतवा को जोड़ने के लिए छतरपुर जिले के ढोढन में 77 मीटर ऊंचा और 2031 मीटर लंबा बंध बनाया जाएगा। इसके अलावा 221 किलोमीटर लंबी नहरें भी बनेंगी। इससे होने वाले वनों के नाश और पलायन को अलग भी रख दें तो भी निर्माण, पुनर्वास आदि के लिए जमीन तैयार करने व इतने बड़े बांध व नहरों से इतनी दलदल बनेगी कि यह मीथेन गैस उत्सर्जन का बड़ा कारक बनेगी।
इस परियोजना का सबसे बड़ा असर विकसित बाघ क्षेत्र के नुकसान के रूप में भी होगा। पन्ना नेशनल पार्क का 41.41 वर्ग किलोमीटर वह क्षेत्र पूरी तरह जलमग्न हो जाएगा, जहां आज 30 बाघ हैं। जंगल के 33 हजार पेड़ भी काटे जाएंगे। यदि इस योजना पर काम शुरू भी हुआ तो कम से कम एक दशक इसे पूरा होने में लगेगा। इस दौरान अनियमित जलवायु, नदियों के अपने रास्ता बदलने की त्रासदियां और गहरी होंगी। ऐसे में जरूरी है कि सरकार नई वैश्विक परिस्थितियों में नदियों को जोड़ने की योजना का मूल्यांकन करे। सबसे बड़ी बात इतने बड़े पर्यावरणीय नुकसान, विस्थापन, पलायन और धन व्यय करने के बाद भी बुंदेलखंड के महज तीन से चार जिलों को मिलेगा क्या? इससे एक-चौथाई से भी कम धन खर्च कर समूचे बुंदेलखंड के पारंपरिक तालाब, बावड़ी, कुओं और जोहड़ों की मरम्मत की जा सकती है।
गौर करें कि अंग्रेजों के बनाए पांच बांध 100 साल में दम तोड़ गए। आजादी के बाद बने तटबंध व स्टाप डैम पांच साल भी नहीं चले, लेकिन समूचे बुंदेलखंड में एक हजार साल पुराने चंदेलकालीन तालाब रखरखाव के अभाव के बावजूद आज भी लोगों के गले व खेत तर कर रहे हैं।

शनिवार, 1 अक्तूबर 2016

Only slogans can not change face of SAWCHCHHTA

नारों से आगे नहीं बढ़ा ‘स्वच्छता अभियान’


                                                                                                                        पंकज चतुर्वेदी

अगस्त महीना समाप्त हुआ था और सितंबर लगा ही था कि दिल्ली व उससे सटे जिलों में डेंगू की खबरें आने लगीं, फिर डेंगू का डंक पूरे देश में फैलने लगा। हालात जब बिगड़ने लगे तो कई राज्यों के मुख्यमंत्री, नेता, नगर निगम प्रधान रेडियो व अन्य संचार माध्यमों से ज्ञान बांटने लगे कि किस तरह यदि डेंगू हो जाए तो सरकार उनके साथ है। गौरतलब है कि इस साल देश के बड़े हिस्से में बारिश जम कर हुई है, और पानी तेजी से बहा भी, इसके बावजूद डेंगू फैला। यह भी सब जानते हैं कि डेंगू मच्छरों के कारण फैलता है और मच्छरों की उत्पादन स्थली गंदगी व रूका हुआ पानी है। दो साल पहले महात्मा गांधी के जन्म दिवस दो अक्तूबर पर प्रधानमंत्री ने एक पहल की थी, उन्होंने आम लोगों से अपील की थी- निहायत एक सामाजिक पहल, अनिवार्य पहल और देश की छवि दुनिया में सुधारने की ऐसी पहल जिसमें एक आम आदमी भी भारत-निर्माण में अपनी सहभागिता बगैर किसी जमा-पूंजी खर्च किए दे सकता था- स्वच्छ भारत अभियान। पूरे देश में झाड़ू लेकर सड़कों पर आने की मुहीम सी छिड़ गई – नेता, अफसर, गैरसरकारी संगठन, स्कूल, हर जगह सफाई अभियान की ऐसी धूम रही कि बाजार में झाड़ूओं के दाम आसमान पर पहुंच गए। यह बात प्रधानमंत्री जानते हैं कि हमारा देश केवल साफ सफाई ना होने के कारण उत्पन्न संकटों के कारण हर साल 54 अरब डालर का नुकसान सहता है। इसमें बीमारियां, व्यापारिक व अन्य किस्म के घाटे शमिल है। यदि भारत में लेाग कूड़े का प्रबंधन व सफाई सीख लें तो औसतन हर साल रू.1321 का लाभ होना तय है। लेकिन जैसे-जैसे दिन आगे बढ़े, आम लोगों से ले कर शीर्ष नेता तक वे वादे, शपथ और उत्साह हवा हो गए।
इतने विज्ञापन, अपील के बाद भी तब से अकेले दिल्ली में तीन बार सफाई कर्मचारी बड़ी हड़ताल कर चुके हैं और महीनों महानगर के मुख्य मार्ग कूड़े से बजबजाते रहे। वैसे भी दिल्ली में आज भी हर दिन नौ टन कूड़ा बगैर उठान के सड़क पर ही पड़ा रहता है। यहां से थोड़ा दूर निकलें- मथुरा, या मेरठ, पटना या सतना, लखनऊ या रायपुर, गंदगी के हालात यथावत या पहले से भी बदतर हैं। आंकड़ें जरूर शौचालय की संख्या की चीख मचाते हैं, लेकिन जिन गांवों में पानी का भीषण संकट है, जहां नालियों का गंदा पानी निस्तार व निबटान की कोई व्यवस्था ही नहीं है, वहां सरकारी फाईलों के शौचालय उपले या कबाड़ा रखने के ही काम आ रहे है।
दिल्ली सहित पूरे देश में जल भराव, गंदगी के कारण मचे मच्छरों के आतंक ने हर स्थानीय निकाय के ‘स्वच्छता अभियान’ को ले कर उकेरे गए कागजी शेरों की हकीकत बयान कर दी है। विडंबना है कि इतनी लापरवाही के लिए आज तक कोई भी जिम्मेदार अधिकारी दंडित नहीं किया गया। कहीं सवाल नहीं उठे कि नालों की सफाई, गाद उठाई, यदि कायदे से हुई थी तो पानी क्यों भरा व मच्छर क्यों पनपे।
‘‘मैं गंदगी को दूर करके भारत माता की सेवा करूंगा। मैं शपथ लेता हूं कि मैं स्वयं स्वच्छता के प्रति सजग रहूंगा और उसके लिए समय दूंगा। हर वर्ष सौ घंटे यानी हर सप्ताह दो घंटे श्रम दान करके स्वच्छता के इस संकल्प को चरितार्थ करूंगा। मैं न गंदगी करूंगा, न किसी और को करने दूंगा। सबसे पहले मैं स्वयं से, मेरे परिवार से, मेरे मोहल्ले से, मेरे गांव से और मेरे कार्यस्थल से शुरुआत करूंगा। मैं यह मानता हूं कि दुनिया के जो भी देश स्वच्छ दिखते हैं उसका कारण यह है कि वहां के नागरिक गंदगी नहीं करते और न ही होने देते हैं। इस विचार के साथ मैं गांव-गांव और गली-गली स्वच्छ भारत मिशन का प्रचार करूंगा। मैं आज जो शपथ ले रहा हूं वह अन्य सौ व्यक्तियों से भी करवाऊंगा, ताकि वे भी मेरी तरह सफाई के लिए सौ घंटे प्रयास करें। मुझे मालूम है कि सफाई की तरफ बढ़ाया गया एक कदम पूरे भारत को स्वच्छ बनाने में मदद करेगा। जय हिंद।’’ यह शपथ दो अक्तूबर को पूरे देश में सभी कार्यालयों, स्कूलों, जलसों में गूंजी थी। उस समय लगा था कि आने वाले एक-दो साल में देश इतना स्वच्छ होगा कि हमारे स्वास्थ्य जैसे बजट का इस्तेमाल अन्य महत्वपूर्ण समस्याओं के निदान पर होगा। दुर्भाग्य से इस नारे को उछालने में जितना धन व्ययव हुआ, उसका पासंग भी सफाई की दिशा में सकारात्मक काम नहीं दिखा। लेकिन अब साफ दिख रहा है कि हम भारतीय केवल उत्साह, उन्माद और अतिरेक में नारे तो लगाते है। लेकिन जब व्याहवारिकता की बात आती है तो हमारे सामने दिल्ली के कूड़े के ढेर जैसे हालात होते हैं जहां गंदगी से ज्यादा सियासत प्रबल होती है।
भारत में स्वच्छता का नारा काफी पुराना है। सन 1999 में भी संपूर्ण स्वच्छता अभियान चलाया गया था लेकिन अभी भी देश की एक बड़ी आबादी का जीवन गंदगी के बीच ही गुजर रहा है। 2011 की जनगणना के अनुसार राष्ट्रीय स्वच्छता कवरेज 46.9 प्रतिशत है जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह औसत केवल 30.7 प्रतिशत है। अभी भी देश की 62 करोड़ 20 लाख की आबादी (राष्ट्रीय औसत 53.1 प्रतिशत) खुले में शौच करने को मजबूर हैं। राज्यों की बात करें तो मध्य प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय के उपयोग की दर 13.6 प्रतिशत, राजस्थान में 20 प्रतिशत, बिहार में 18.6 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में 22 प्रतिशत है। भारत के केवल ग्रामीण ही नहीं बल्कि शहरी क्षेत्र में शौचालयों का अभाव है। यहां सार्वजनिक शौचालय भी पर्याप्त संख्या में नही हैं, जिसकी वजह से हमारे शहरों में भी एक बड़ी आबादी खुले में शौच करने को मजबूर है। इसी तरह से देश में करीब 40 प्रतिशत लोगों को स्वच्छ पीने योग्य पानी उपलब्ध नहीं है। यही नहीं दिल्ली सहित लगभग सभी नगरों से साल दर साल कूड़े का ढ़ेर बढ़ता जा रहा है जबकि उसके निष्पादन के प्रयास बेहद कम हैं। हर नगर कूड़े के ढलाव से पट रहा है और उससे बदूबू, भेजल प्रदूशण, जमीन का नुकसान जैसे कभी ठीक ना होने वाले विकार भी उत्पन्न हो रहे हैं।
पिछले एक साल के दौरान दिल्ली हो या कहीं दूरस्थ नगर पालिका, कई जगह सफाईकर्मी हड़ताल पर गए और उन्होंने विरोध स्वरूप कूड़ा, सड़कों पर उड़ेला। जिन जगहों पर राजनेताओं ने अपने फोटों खिंचवाए थे, उनमें से अधिकांश पूर्ववत गंदगी से बजबजा रहे हैं। लगता है कि कूड़ा हमारी राजनीति व सोच का स्थाई हिस्सा हो गया है। दिल्ली से चिपके गाजियााबद में एक निगम पार्षद व एक महिला दरोगा का आपसी झगड़ा हुआ व पार्षद  के समर्थन में सफाई कर्मचारियों ने दरोगा के घर के बारह रेहड़ी भर कर बदबूदार कूड़ा डाल दिया। प्रधानमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र बनारस, जहां मिनी सचिवालय, क्योटो हर का सपना और सत्ता के सभी तंत्र सक्रिय हैं, शहर में कूड़े व गंदगी का आलम यथावत है। अभी एक प्रख्यात अंतरराष्ट्रीय समाचार संस्था ने अपनी वेबसाईट पर शहर के दस प्रमुख स्थानों पर कूड़े के अंबार के फोटो दिए है।, जिनमें बबुआ पांडे घाट, बीएचईएल, पांडे हवेली, रवीन्द्रपुरी एक्सटेंशन जैसे प्रमुख स्थान कई टन कूड़े से बजबजाते दिख रहे है।
शायद यह भारत की रीति ही है कि हम नारों के साथ आवाज तो जोर से लगाते हैं लेकिन उनके जमीनी धरातल पर लाने में ‘किंतु-परंतु’ उगलने लगते हैं। कहा गया कि भातर को आजादी अहिंसा से मिली, लेकिन जैसे ही आजादी मिली, दुनिया के सबसे बड़े नरसंहारों में से एक विभाजन के दौरान घटित हो गया और बाद में अहिंसा का पुजारी हिंसा के द्वारा ही गौलोक गया। ‘‘यहां शराब नहीं बेची जाती है’’ या ‘‘देखो गधा मूत रहा है’’ से लेकर ‘दूरदृश्टि- पक्का इरादा’, ‘‘अनुशासन ही देश को महान बनाता है’’ या फिर छुआछूत, आतंकवाद, सांप्रदायिक सौहार्द या पर्यावरण या फिर ‘बेटी बचाओ’- सभी पर अच्छे सेमिनार होते हैं, नारे व पोस्ट गढ़े जाते हैं, रैली व जलसे होते हैं, लेकिन उनकी असलियत दीवाली पर हुई हरकतों पर उजागर होती है। हर इंसान चाहता है कि देश में बहुत से शहीद भगत सिंह पैदा हों, लेकिन उनके घर तो अंबानी या धोनी ही आए, पड़ोस में ही भगत सिंह जन्मे, जिसके घर हम कुछ आंसु बहाने, नारे लगाने या स्मारक बनाने जा सकें। जब तक खुद दीप बन कर जलने की क्षमता विकसित नहीं होगी, तब तक दीया-बाती के बल पर अंधेरा जाने से रहा। प्रधानमंत्री का एक विचार आम लेागों को देना व उसके क्रियान्वयन के लिए शुरूआत करना है, उसे आगे बढ़ाना आम लोगों व तंत्र की जिम्मेदारी है। विडंबना है कि पूरे दो साल बीतने के बाद भी आम लोग दिल व दिमाग से इस महत्वपूर्ण अभियान से जुड़ नहीं पाए और यह नारे या रस्म अदायगी से ज्यादा आगे बढ़ नहीं पाया। अब तो लगता है कि सामुदायिक व स्कूली स्तर पर इस बात के लिए नारे गढ़ने होंगे कि नारों को नारे ना रहने दो, उन्हें ‘नर-नारी’ का धर्म बना दो।

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