तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

corruption free Inda can not be made without Election reforms

भ्रष्टाचार की दीमक और चुनाव 

इन दिनों हवा में भ्रष्टाचार की गंध है, लगता है कि पूरा मूल्क ही घूसखोर, पतित और अनैतिक हो गया है। पांच सौ और हजार के नोट की बंदी को लकर सरकार का दावा है कि इससे काला धन रुकेगा तो विपक्ष इसमें और कुछ सूंघ रहा है। लेकिन यदि काले धन की असली वजह जानने का प्रयास करें तो यह तय है कि राजनीतिक व्यवस्था में वोट पर भारी हो रहे नोट का मूल कारण हमारी त्रुटिपूर्ण निर्वाचन व्यवस्था है। आए रोज उभर रहे विवादों से परे यदि असल में देश को भ्रष्टाचार से मुक्त होना है तो निर्वाचन, निर्वाचित प्रतिनिधियों और निर्वाचनकर्ताओं में कई आमूल-चूल परिवर्तन करने होंगे।

 असल में समस्या हमारे यहां कानूनों की कमी या उनके क्रियान्वयन की नहीं है, कानूनों की भरमार, मतदाता की अल्प जागरूकता और निर्वाचित संस्थाओं में अपने हितों को साधने की लालसा पाले बैठे लोगों की बढ़ती ललक की है। निर्वाचित नेताओं में भ्रष्टाचार की बढ़ती प्रवृत्ति का मूल हमारी विधायी संस्थाओं का अपने उद्देश्य से भटकना और आम लोगों की अपने प्रतिनिधियों के अधिकारों के प्रति अल्प जानकारी होना है। जहां एक तरफ निर्वाचन प्रक्रिया को आम लोगों की पहुंच तक लाने के प्रयास करना होगा, वहीं मतदाताओं को भी अपने मत के मूल्य की जानकारी देना जरूरी है।यह जगजाहिर है कि आज चुनाव कितने महंगे हो चुके हैं। पंचायत चुनाव में दस-पंद्रह लाख खर्च आम बात है। असर भी सामने दिखता है कि मध्य प्रदेश या उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में सरपंच के पास एसयूवी किस्म का वाहन होना अनिवार्य सा हो गया है।

हमारी संसद और विधानसभाएं गवाह हैं कि एक बार पांच साल पूरा करने के बाद विधायक या सांसद की माली हालत किस तरह बदलती है। कुछ दबा-छिपा नहीं है कि यह सब चुनावों में किए गए खर्च की वसूली से आए धन की बदौलत ही होता है। चुनाव एक तरह का व्यापार हो गया है, जितना लगाओगे, उससे सौ गुना मिलेगा। चुनाव आयोग द्वरा निर्धारित खर्च-सीमा में चुनाव लड़ना असंभव माना जाता है। 16वीं लोकसभा के चुनावों के दौरान हजारों करोड़ के काले धन के इस्तेमाल का अंदेशा खुद सरकारी एजेंसियों को था। कोई भी चुनाव हो खुलेआम सभी पार्टियां उम्मीदवार तय करते समय उसकी जेब, दबंगई, जाति या संप्रदाय के गणित को ही आधार बनाती हैं। आखिर इतना पैसा क्यों खर्च करता है एक उम्मीदवार? जाहिर है कि उसे उम्मीद ही नहीं भरोसा होता है कि वह पांच साल में इसका कई गुना बना लेगा। इससे बदतर हालत तो अब पंचायत स्तर के चुनावों में हो गई है। क्या विधानसभा या लोकसभा का काम विकास के काम करना है? संविधान की मूल भावना कहती है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों का काम केवल जन कल्याणकारी योजनाओं, कानूनों को बनाना मात्र है। उसका क्रियान्वयन करना कार्यपालिका की जिम्मेदारी है। अब सांसद, विधायक, पार्षद सभी के पास अपनी-अपनी विकास निधि है, जोकि आमतौर पर भ्रष्टाचार की पहली सीढ़ी बनती है। हमारे यहां पंचवर्षीय योजनाएं बेहद सशक्त हुआ करती थीं, सालाना बजट पर आम लोगों की उम्मीदें होती थीं, आज ऐसी सभी संस्थाएं कॉरपोरेट की गोद में खेल रही हैं।
जनवाणी मेरठ २८-११-१६
सांसदों का काम केवल वार्षिक या पंचवर्षीय योजनाओं में सुझाव देने तक सीमित करना चाहिए। इसी तरह विधायक की जिम्मेदारी राज्य स्तर की व्यापक योजनाओं व कानूनों तक सीमित कर दें, देखें कि सांसद, विधायक बनने के लिए लोग मिलेंगे नहीं। कैसी विडंबना है कि 66 साल के गणतंत्र में अभी तक जनता तो दूर चुने हुए प्रतिनिधि को नहीं मालूम है कि वे आखिर किस काम के लिए चुने गए हैं। पंचायत या नगर पालिका के चुनावों में पाकिस्तान को कोसना, महंगाई पर लानत देना और अपने इलाके में सांसद के दौरे पर गली में गंदगी को ले कर उसका कॉलर पकड़ लेना, आम बात है। असल में जनता को ही नहीं मालूम है कि हमने किसे, किस काम के लिए चुना है। ठीक यही नेता भी करते हैं, जब वोट मांगने जनता के बीच जाते हैं तो वे सभी वादे कर देते हैं जो उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आते। अब सड़क बनवाने का काम सांसद-निधि से भी हो रहा है और पार्षद के पैसे से भी। न तो कर्तव्यों का भान है और न ही अधिकारों की परवाह, गांव में बिजली नहीं आने पर सांसद प्रदर्शन करने पहुंच गए, किसी को छुड़ाने के लिए विधायक थाने पहुंच गए...लगता है कि असीमित अधिकार हों। यहीं से पक्षपात और फिर घूसखोरी की शुरुआत होती है। कहने को तो पाठ्य पुस्तकों में यह सब दर्ज है कि किस जन-प्रतिनिधि के क्या कर्तव्य हैं, लेकिन उनकी भाषा व प्रस्तुति इम्तेहान में नंबर लाने के लिए रटंत से अधिक नहीं होती।

भ्रष्टाचार पर यदि कोई असली चोट करना चाहता है तो उसे सबसे पहले आम लोगों को यह समझाना होगा कि उनका कौन सा प्रतिनिधि किस काम का है। किसी भी जन प्रतिनिधि के भ्रष्टाचार की शुरुआत सरकारी कर्मचारियों की कमी, तबादले, हिस्सेदारी से ही होती है। तबादलों व विकास योजनाओं में पारदर्शिता व स्पष्ट नीति नेताओं व अफसरों की जोड़-तोड़ को फोड़ सकती है। इसके लिए किसी लोकपाल की नहीं महज सुदृढ़ इच्छा-शक्ति की ही जरूरत है। बहुत से लोगों का वोट न डालना, चुनावों में उम्मीदवारों की बढ़ती संख्या, और बढ़ता व्यय भ्रष्टाचार का दूसरा महत्वपूर्ण कारण है। कुछ साल पहले गुजरात विधानसभा ने अनिवार्य मतदान पर विधेयक पर चर्चा भी की थी। इससे कहीं जरूरी है कि मतदान प्रक्रिया सहज और व्यापक बनाना, जैसे- सभी चुनाव एकसाथ करवाना, मतदान केंद्रों को मतदाता के और करीब या मोबाइल बनाना जैसे कदम कारगर हो सकते हैं। कुछ साल पहले निर्वाचन आयोग ने उम्मीदवारी की जमानत राशि बढ़ा कर अगंभीर उम्मीदवारों पर शिकंजा कसने का प्रयास किया था, लेकिन अब वह बेमानी हो चुका है। समस्या अब बेइंतिहां दलों के गठन की हो गई है। यदि इस पर काबू पा लिया जाए तो लोकतंत्र को बंधक या गिरवी बनाने के नए प्रचलन से छुटकारा मिल सकता है। लोकतंत्र की नई परिभाषा में सभी को ‘मजबूत’ नहीं ‘मजबूर’ सरकार चाहिए। यदि उम्मीदवारी को शैक्षिक योग्यता, आपराधिक रिकार्ड जैसी शतोंर् से सीमित किया जाए तो पूरे तंत्र से भ्रष्टाचार के ‘सुपर बग’ से मुक्ति मिल सकती है। ऐसा नहीं कि चुनाव सुधार के कोई प्रयास किए गए नहीं, लेकिन विडंबना है कि सभी सियासी पार्टियों ने उनमें रुचि नहीं दिखाई। वीपी सिंह वाली राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार में कानून मंत्री दिनेश गोस्वामी की अगुवाई में गठित चुनाव सुधारों की कमेटी का सुझाव था कि राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त दलों को सरकार की ओर से वाहन, ईंधन, मतदाता सूचियां, लाउडस्पीकर आदि मुहैया करवाए जाने चाहिए। ये सिफारिशें कहीं ठंडे बस्ते में पड़ी हुई हैं। वैसे भी आज के भ्रष्ट राजनीतिक माहौल में समिति की आदर्श सिफारिशें कतई प्रासंगिक नहीं हैं। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि नेता महज सरकारी खर्चे पर ही चुनाव लड़ लेंगे या फिर सरकारी पैसे को ईमानदारी से खर्च करेंगे। 1984 में भी चुनाव खर्च संशोधन के लिए एक गैर सरकारी विधेयक लोकसभा में रखा गया था, पर नतीजा वही ‘ढाक के तीन पात’ रहा। चुनाव में काले धन के बढ़ते उपयोग पर चिंता जताने के घड़ियाली आंसू हर चुनाव के पहले बहाए जाते हैं। 1964 में संथानम कमेटी ने कहा था कि राजनीतिक दलों का चंदा एकत्र करने का तरीका चुनाव के दौरान और बाद में भ्रष्टाचार को बेहिसाब बढ़ावा देता है। 1971 में वांचू कमेटी अपनी रपट में कहा था कि चुनावों में अंधाधुंध खर्चा काले धन को प्रोत्साहित करता है। इस रपट में हर एक दल को चुनाव लड़ने के लिए सरकारी अनुदान देने और प्रत्येक पार्टी के एकाउंट का नियमित ऑडिट करवाने के सुझाव थे। 1980 में राजाचलैया समिति ने भी लगभग यही सिफारिशें की थीं। ये सभी दस्तावेज अब भूली हुई कहानी बन चुके हैं।अगस्त-98 में एक जनहित याचिका पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिए थे कि उम्मीदवारों के खर्च में उसकी पार्टी के खर्च को भी शामिल किया जाए। आदेश में इस बात पर खेद जताया गया था कि सियासी पार्टियां अपने लेन-देन खातों का नियमित ऑडिट नहीं कराती हैं। अदालत ने ऐसे दलों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही के भी निर्देश दिए थे। लेकिन हुआ कुछ भी नहीं। असल बात तो यह है कि अब चुनाव आम आदमी की पहुंच से दूर होता जा रहा है, उसी का परिणाम है कि उससे उपजा प्रतिनिधि भी जनता से बहुत दूर है। तभी उसके समाज से सरोकार नहीं है और जनता भी वोट देने के बावजूद उसे अपना ‘प्रतिनिधि’ नहीं मानती। दिनोंदिन बढ़ती यही दूरी लोकतंत्र को नए किस्म की राजशाही में परिवर्तित कर रही है और जन-असंतोष यदाकदा अलग-अलग रूपों में उभरता रहता है। आज देश में जितने सरकारी कर्मचारी हैं, उनसे बामुश्किल चालीस फीसदी कम निर्वाचित प्रतिनिधि हैं, पंचायत से ले कर संसद तक, सहकारी समितियों से लेकर अन्य संगठनों तक। इसकी गंभीरता को भांपते हुए सबसे पहले व्यापक चुनाव सुधार पर अमल होना जरूरी है, वरन यदि लोकपाल बन भी गया तो उसका परलोकपाल बनना तय है। करेंसी की जगह दूसरे रूप में काला धन जमा होता था और हो रहा है, क्योंकि हम जिनको चुनकर भेज रहे हैं, वे स्वयं दलदल की करेंसी की नाव में बैठ कर यहां तक पहुंचते हैं।

Why police treated as enemy

क्यों खलनायक बन जाते हैं खाकी वाले

Raj Express MP 26-1-16
                                                                                                                 पंकज चतुर्वेदी

पिछले कुछ दिनों से आए रोज किसी ना किसी बैंक के बाहर पुलिस द्वारा नोट बदलवाने के लिए पंक्ति में खड़े लेगें पर हाठी चलाने या ऐसी ही घटनां सामने आ रही हैं। पुलिस वाले निलंबित भी हो रहे हैं। लेकिन कभी केई पूरा अध्ययन नहीं कर रहा कि आखि रवह पुलिस वाला हिंसक क्सों हो जाता है। यदि कभी आंकड़ों में डूब कर देखें तो हर साल अपराधियों से लड़ते हुए देषभर में कई सौ पुलिस वाले मारे जाते हैं। यह विडंबना है कि पुलिसवाले को उन सभी कर्मों की गाली खानी पड़ती है, उन सभी मसलों से जूझना पड़ता है, जिससे उसका कोई वास्ता नहीं नहीं होता। जैसे कि गली में नाली भर गई, बिजली गोल है, अस्पताल में डाक्टर-तिमारदार भिड गए, दो राजनीतिक दल के लोगों में टकराव..... ऐसे ही कई मसले हैं जिनका पुलिस से सीधा वास्ता नहीं होता, लेकिन उसे ही सामने हो कर आक्रोशित लोगों को समझना पड़ता है। कभी-कभी या अधिकांष मूल मसला पीछे रह जाता है और सारा झगड़ा पुलिस-जनता के टकराव में बदल जाता है। उ.प्र. के एक दरोगा जिनका बीते 20 सालें में प्रामेषन नहीं हुआ का दर्द गौरतलब है - ‘‘ जिन लोगों को हम लाठी मार कर हवालात में बंद कर देते थे, वे अब माननीय बन जाते हैं। फिर डर रहता है कि ये कहीं ना कहीं खुन्नस निकालेंगे। इसी लिए आज उभरते नेता, जो लफंगई व दबंगई के बल पर आगे आ रहे हैं उन पर कार्यवाही करने से पहले सोचना पड़ता है कि कल इन्हीं को सेल्यूट ठोकना होगा।’’
टीवी पर ढ़ेर सारे खबरिया चैनल हैं, हर दिन कोई ना कोई चैनल एक  ना एक रिपोर्ट ऐसी जरूर दिखाता है, जिसमें खाकी वर्दी वाले वहशियाना तरीके से आम लोगों को लाठियों से पीटते , दौड़ाते दिखते हैं । पिटने वाले लोग आमतौर पर बिजली-पानी मांगने वाले, पेट भरने या किसी अन्याय का विरोध करने वाले होते हैं । पुलिस का काम तो अपराध रोकना है, अपराधी को पकड़ कर पीड़ित को न्याय दिलवाना है- यह कब से उनका काम हो गया कि जनता की आवाज को लाठियों से दबा दो ? एक बुजुर्ग स्वतंत्रता सेनानी को व्यथित मन से कहते सुना कि जब हमारी पुलिए डंडे ले कर जनता पर टूटती दिखती है तो यह भ्रम टूट जाता है कि हम आजाद हैं । बिल्कुल वही दृश्य होता है, आजादी का अधिकार मांगने वालों को बूटों के तले कुचल दो !
ऐसा लगता है कि देश में गणतंत्र की स्थापना के 66 साल बीत जाने के बाद भी हमारे नीति-निर्धारक यह तय नहीं कर पाए हैं कि हमें पुलिस क्यों चाहिए ? जब कभी सुरक्षा में चुक या भयंकर अपराध होते हैं तो आंकड़ों का खेल शुरू हो जाता है - हमारे यहां आबादी के लिहाज से पुलिस वालों की संख्या बेहद कम हैं । दूसरी तरफ देखें तो एक-एक व्यक्ति की सुरक्षा में सौ-सौ कर्मचारी तो कहीं एक लाख की बस्ती पर एक सिपाही, वह भी शारीरिक रूप  से अक्षमता की हद तक बेडौल ! अपराध घटित हो जाने के बाद पुलिस का पहुंचना, फिर मुजरिम से अधिक मुद्दई की प्रताड़ना । देश की अदालतें मुकदमों के बोझ से हलाकांत हैं और पुलिस आए रोज हजारों-हजार मुकदमें दर्ज कर अदालत भेज रही हैं । सजा होने का आंकड़ा तो बेहद शर्मनाक हैं - शायद 20 फीसदी से भी कम। विचाराधीन कैदियों को जेल में रखने की व्यवस्था(या अव्यवस्था) की चर्चा के लिए पूरा अलग अध्याय लिखना होगा । फिर एक एक वर्दीधारी का हर रोज 18 घंटे तक ड्यूटी करना। गष्त, मुकदमें की लिखा पढभ्, मुजरिम को अदालत ले जाना, पुराने मुकदमों की पेषी के लिए कोर्ट में खड़े होना, इसके बाद आकस्मिक तनाव होने पर ड्यूटी के लिए भागना। इतना करने पर भी ना तो जनता संतुश्ट, ना ही अफसर। ना कोई ओवर टाईम, ना ही सोने, खाने, मनोरंजन की कोई माकूल व्यवस्था। ना प्रमोषन की संभावनाएं, ना ही परिवार को समय दे पाना, ेऐस ही कई दर्द ले कर एक सिपाही से ले कर उप निरीक्षक तक नौकरी करता है।
कई दशक पहले एक सम्मानीय न्यायाधीश आनंद नारायण मुल्ला  अपने एक आदेश में लिख चुके हैं कि पुलिस वर्दी पहने हुए संगठित अपराधिक गिरोह की तरह काम करती हैं । इसका अनुभव किसी भी शहर, गांव में किया जा सकता हैं । पटरी पर दुकान लगाने वाले, ढ़ाबे चलाने वाले, बस, डग्गामार जीपों के संचालक, शराब के ठेकेदार , दीगर कामों के ठेकेदार, जुंए की फड़ व सट्टा के नंबर लिखने वाले- ये वर्ग कश्मीर से कन्याकुमारी तक पुलिस के लिए दुधारू-गाय रहा हैं । धारा 107,116,151 में गिरफ्तारी का भय देशभर के थानों की नियमित कमाई का जरिया और ‘‘ पुलिस की सक्रियता ’’ का प्रमाण-पत्र है । ये धाराएं शांति-भंग की आश्ांका की हैं और आमतौर पर जब दे पक्षों के बीच मामूली झगड़ा भी होता है तो पुलिस दोनों पक्षों को इसमें बंद कर खुश हो जाती है। । सवाल फिर वही कि क्या पुलिस का काम यही हैं ?
भारत में घटित होने वाले अपराध, खासतौर पर पिछले दो दशकों की आतंकवादी घटनाएं, अन्य किसी विकासशील देश की तुलना में कई गुना अधिक हैं । कहा जा सकता है कि देया का एक तिहाई भाग तो सषस्त्र विद्रोहियों की निजी मल्कीयत बना हुआ है। विपन्नता, भौगोलिक और सामाजिक स्तर पर गहरी होती खाईयां इन अपराधों या अलगाववाद का कारण कहे जाते हैं । सरकार ऐसे उग्रवादियों और अपराधों के मूल कारकों को जाने बगैर उनसे जूझने के लिए डंडे का जोर बढ़ाती जा रही है । जाहिर है कि खाकी वर्दी पर बढ़ता यह खर्चा उसी जनता की खून-पीने की कमाई से उगाहे गए करों से आता है, जिसे इनकी ताकत का शिकार होना पड़ता है । यह भी मखौल ही है कि देश में एक दर्जन से अधिक विशेष सुरक्षा बल हैं और अधिकांश वह काम नहीं कर रहे हैं, जिसके लिए उनका गठन किया गया है । ऐसे में जब यह बात आती है कि पड़ताल, सुरक्षा व्यवस्था और अदालती कार्यों के लिए पुलिस की अलग-अलग शाखाएं बनाई जाएं तो यह कारगर कदम तो कतई नहीं दिखता हैं । मध्यप्रदेष में प्रत्येक थाने में दो इंस्पेक्टर की बहाली षुरू हुई है- एक कानून-व्यवस्था देखेगा और दूसरा मामलों का अन्वेषशण। देखने में तो यह व्यवस्था अच्छी प्रतीत होती है, लेकिन जब तक दसवीं पास को सिपाही तथा सिपाही को केवल डंडा समझने की प्रवृति से मुक्ति नहीं मिलती, ऐसे सभी सुधार बेमानी होंगे।
यह विडंबना है कि अभी भी पुलिस, विषेशरूप से सिपाही स्तर पर केवल दमन और डंडे का प्रषिक्षण दिया जा रहा है। सुधारों के कई-कई आयोग बने, सिफारिषें आईं; लेकिन नेतागण व सरकारें  पुलिस की ताकत का खुद के स्वार्थों के लिए इस्तेमाल करने के लोभ से उबर नहीं पा रहे हैं।  पुलिस इंतजार करती रहती है कि पहले कोई अपराध हो, उसके बाद उसके कागजी पंचनामें भरे जाएं। सुरक्षा, अपराध या व्यवस्था में चूक होने पर किसी भी स्तर पर काई जिम्मेदारी तय ना किया जाना भी पुलिस की निरंकुषता का कारक है।
पुलिस सुधार की कई सिफारिषें और यहां तक कि उन्हे लागू  करने के लिएए सुप्रीम कोर्ट की हिदायतें कहीं लाल बस्ते में बंधी पड़ी हैं। असल में अब पुलिस का अपराध उन्मूलन के बनिस्पत सियासती इस्तेमाल बढ़ गया है, सो कोई भी नहीं चाहता कि खाकी वर्दी का खौफ कम हो। जब तक खौफ रहेगा, तब तक उसका दुरूपयोग होगा। असल में यह समझना जरूरी है कि हमें पुलिस चाहिए किस काम के लिए-सुरक्षा के लिए, अपराध रोकने के लिए, अपराधियां को सजा दिलवाने के लिए, यातायात व्यवस्था बनाए रखने के लिए या आम लोगों के आक्रोष और गुस्से को डंडे के बल दबाने के लिए या फिर झूठी-सच्ची कहानियां गढ़ कर आम लोगों पर रौब गालिब करने के लिए।
आज प्रत्येक प्रदेष का पुलिस का बजट सालाना कई अरब रूपए का है, इसके बावजूद आम आदमी पीड़ित होने के बाद भी थाने जाने से घबराता है। प्रत्येक राज्य अत्याधुनिक हथियार, वाहन और संचार के नाम पर ज्यादा से ज्यादा पैसा मांग रहा है। लेकिन पुलिस के आम लोगों से सरोकार गौण ही हैं। समय साक्षी है कि भले ही लाल किले पर फहराने वाले झंडे का रंग बदला हो, लेकिन हमारी पुलिस की मानसिकता और प्रषिक्षण वही अधिनायकवादी है।


पंकज चतुर्वेदी



शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

Rumars an antinational tandency

अफवाहें, संकट और बदहवासी


                                                                                                                                             पंकज चतुर्वेदी
देशहित में लिए गए एक बड़े निर्णय के चलते आम इंसान इन दिनों बदवहास सा है। किसी के यहां विवाह है तो कही बीमारी तो कही हर दिन के खर्चें, लोगों के पास पैसा होते हुए भी उनके हाथ खाली हैं। कोई सारी रात एटीएम के बाहर सो रहा है तो कहीं मारापीटी हो रही है। इस बीच पहले अफवाह उड़ गई कि देश में नमक का टोटा है। पहले से ही परेशान लोग नमक की ओर दौड़ गए। कहीं चार सौ रूपए किलो तक बिक गया नमक। दिल्ली के सीलमपुर में तो मुख्य सड़क पर स्थित एक थोक सामान वाले मॉल में भीड़ ने नमक की बोरियों की लूटपाट कर दी। मप्र के छतरपुर में कही कोई किसी व्यक्ति की मौत की खबर व्हाट्सएप या फेसबुक पर फैला रहा है तो कहीं दस का सिक्का ना चलने की सुरसुरी छोड़ दी जाती है। राजस्थान के बाडमेर में किसी ने हल्ला कर दिया कि आयकर वाले सभी लॉकर को सील कर रहे हैं, देखते ही देखते सारा बाजार बंद हो गया व लोग बैंक की ओर दौड़ गए, कुछ ही घंटों में कोई तीन हजार लॉकर खाली थे। असल में ऐसी अफवाहें महज मजे के लिए नहीं होती, उनके पीछे कुछ लोगों के निहित स्वार्थ हाते हैं, साजिश होती है और धूर्ततता होती है। विडंबना है कि संचार के आधुनिक व निरंकुश साधनों ने इन अफवाहों को पंख दे दिए है व पहले से ही गंभीर अपराधों में व्यस्त पुलिस अफवाहों को कभी गंभीरता से लेती नहीं। जब लेती है तब तक बात हाथ से निकल चुकी होती है।

नोट बंदी के पहले से ही 10 के सिक्के को ले कर खबरें हवा में थीं, और उसके बाद तो लोगों ने सिक्के लेने से ही इंकार कर दिया। चाहे मध्यप्रेदश का गुना हो या उप्र का मुजफ्फरनगर, कहीं से हल्ला हो जाता है कि आयकर की टीम पुलिस के साथ आ रही है और धड़ाधड़ शहर की दुुकानों के शटर गिर जाते हैं। बीच में शक्कर का स्टाक खतम होने की अफवाह भी उड़ी। उत्तरांचल के बागेश्वर जिले में आधिकारिक रूप से भांग की खेती होती है। किसी ने अफवाह उड़ा दी कि पूरी खेती को अवैध घोषित किया गया है व जल्द ही किसानों की गिरफ्तारी होगी। रातों-रात रैखोली, पाना, उसो, नायल, कठानी आदि गांवों में भांग की खड़ी फसल को आग लगा दी गई।
जब कभी देश दहशत में होता है कहीं फिर से भूकंप आने तो कभी चांद का मुंह टेढ़ा होने, नासा के हवाले से अगले भूकंप का समय बताने जैसे अफवाहें एसएमएस या व्हाट्सएप से उड़ने लगती हैं। कई लोग ऐसे भी होते हैं जो अंजाने में इस तरह के संदेशों को अपने परिचितों को भेज कर अपराध कर रहे हैं। जो लोग अभी कुछ महीने पहले तक नए आईटी एक्ट की धारा 66 ए को समाप्त करने के लिए प्रणप्रााण से जुटे थे, उन्हें अब लगा कि काश कोई ऐसा कानून होता तो इन अफवाहबाजों पर कुछ रोक लगा सकता।
यह गैरसंवेदनशीलता और गैरजिम्मेदारी की पराकाष्ठा है कि कुछ लोग आम लोगों की परेशानियों को नजरअंदाज कर उन्हें और तनावों में ढकेल रहे होते हैं। असल में यह बदवहासी जनता को उत्तेजित कर देती है और वे हर सूचना में अपने निहितार्थ कुछ बुरे की आशंका तलाशते हैं। ऐसे में कई बार भीड़तंत्र का उन्माद सक्रिय हो जाता है और पहले से ही संकट में खड़े देश, बाजार व समाज का ध्यान मूल समस्या से हट कर कहीं गलत दिशा में चला जाता है।
याद करें पिछले साल दीवाली के दौरान दिल्ली के त्रिलोकपुरी, समयपुर बादली और उसके बाद बवाना में लोग आपस में लड़े, जब झगड़े के आखिरी सूत्र तक जाने का प्रयास हुआ तो पता चला कि यह सब किया धरा उसी फितरत का है जो बीते कई दशकों से लोगों को उकसाती-भड़काती रही है और कानून में उस पर कोई खास सख्ती है नहीं। सोशल मीडिया व व्हाट्सएप जैसे औजारों ने उसकी धार को बेहद तीखा व त्वरित कर दिया है। अफवाहें अब बेहद खतरनाक होती जा रही हैं- कभी बिहार में नमक की कमी का हल्ला तो कभी किसी बाबा की भविष्यवाणी पर खजाने की उत्तेजना, असल में इसके छुपे हुए मकसद कुछ और ही होते हैं। गुजरात में पटेल आंदेालन के दौरान संचार तंत्र की तीव्रता पर सवार अफवाहों ने बड़ा नुकसान किया था।
तीन साल पहले के दुर्भाग्यपूर्ण मुजफ्फरनगर दंगे में सोशल मीडिया के जरिये फैली अफवाहों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है और इस पर एक विधायक पर मुकदमा भी दर्ज हुआ है। इससे पहले इंदौर के चंदन नगर में भी झूठी बेसिर-पैर की खबरों ने दंगा करवा दिया था। जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, उनके गली-कस्बे तक ऐसी-ऐसी अफवाहें हर रोज हवा में तैरती हैं कि मारा-मार की नौबत आ जाती है। अफवाहें कितनी विध्वंसकारी होती है, उसकी बानगी लगभग तीन साल पहले दक्षिण के राज्यों में भी देखने को मिली थी, जब बंगलूरू का रेलवे प्लेटफार्म उन लोगों से पट गया जो सुदूर उत्तर-पूर्वी राज्यों से वहां रोजगार या शिक्षा के लिए आए हुए थे। चौबीस घंटे में ही ऐसी अफवाहें हैदराबाद और पुणे में भी फैल गईं और पूर्वोत्तर के लोगों का वहां से पलायन शुरू हो गया था। यह बात सभी स्वीकार रहे हैं कि फेसबुक-ट्वीटर जैसे व्यापक असर वाले सोशल मीडिया अफवाह फैलाने वालों के पसंदीदा अस्त्र बनते जा रहे हैं, एक तो इसमें फर्जी पहचान के साथ पंजीकृत लोगों को खोजना मुश्किल होता है, फिर खोज भी लिया तो सर्वर अमेरिका में होने के कारण मुकदमें को अंजाम तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त सबूत जुटाना लगभग नामुमकिन होता है। अब आईटी एक्ट की धारा 66 ए का भय भी समाप्त हो गया है जिसमें इलेक्ट्रानिक संचार माध्यमों के माध्यम से अफवाह, गलत सूचना, मार्फ फोटो, फर्जी एकांड बना कर गलत सूचना देने पर कड़ी सजा का प्रावधान था। उस धारा को सुप्रीम कोर्ट ने समाप्त क्या किया, अफवाही, उपद्रवी लोगों की उड़की लग गई हैं।
अफवाहें फैला कर फिजा बिगाड़ने के लिए आधुनिक संचार का दुरूपयोग करने का चलन बीते छह सालों से पंजाब में बखूबी हुआ है। बेहतर आर्थिक स्थिति के मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ने वाले राज्य में अफवाहों का बाजार भी उतना ही तेजी से विकसित हो रहा है, जितनी वहां की समृद्धता। ये अफवाहें लोगों के बीच भ्रम पैदा कर रही हैं, आम जन-जीवन को प्रभावित कर रही हैं और कई बार भगदड़ के हालात निर्मित कर रही हैं। विडंबना है कि बेसिर पैर की इन लफ्फाजियों के पीछे असली मकसद को पता करने में सरकार व समाज दोनों ही असफल रहे हैं। यह जीवट, लगन और कर्मठता पंजाब की ही हो सकती है, जहां के लोगों ने खून-खराबे के दौर से बाहर निकल कर राज्य के विकास के मार्ग को चुना व उसे ताकतवर बनाया। बीते एक दशक के दौरान पंजाब के गांवों-गांवों तक विकास की धारा बही है। संचार तकनीक के सभी अत्याधुनिक साधन वहां जन-जन तक पहुंचे हैं, लेकिन गत डेढ़-दो सालों में यही माध्यम वहां के अफवाहों का वाहक बना है।
कुछ साल पहले पंजाब में अफवाह ‘‘हत्यारे मोबाईल कॉल’’ की थी । 9888888888 नंबर से फोन आता है, सेल फोन की स्क्रीन लाल हो जाती है और इंसान मर जाता है। ये अफवाह एक महीने तक पंजाब के गांव-गांव में आतंक फैलाती रहीं। लोगों ने अपने मोबाईल बंद कर दिए, कुछ लोग केवल एसएमएस के जरिए लोगों को ऐसे कॉल के बारे में सतर्क करते रहें, कई लोगों ने तो मारे डर के लैंड लाईन फोन उठाना भी बंद कर दिया।
उसके बाद एक और अफवाह ने पंजाब की नींद उड़ा दी थी कि भूचाल आने वाला है। यह खबर किसी के मोबाईल पर एसएमएस के माध्यम से ही आई थी। फिर कुछ गांवों में गुरूद्वारों से घोषणा कर दी गई कि लोग रात में अपने घरों में ना सोएं क्योंकि रात में भूकंप आने वाला है। कई गांवों में बाकायदा लंगर लगा दिए गए। उधर कथित जन सेवक अपने मोबाईल की पूरी फोन बुक को यह सूचित करने में लग गए कि भूचाल आने वाला है। कुछ ही घंटों में यह चर्चा पंजाब से पार हरियाणा, हिमाचल और दिल्ली तक आ गई। लाखों-लाख लोग रातभर खुले में सतनाम वाहे गुरू जपते हुए रात बिताने पर मजबूर हुए। पहला एसएमएस किसका था ?, उसकी सूचना का स्त्रोत क्या था ? गुरूद्वारे के लाउड स्पीकर से इस बतकही का एलान करने के पीछे कौन लोग थे ? जवाब एक बार फिर चुप्पी साधे हुए हैं। ऐसी अफवाहें कहां से शुरू होती हैं, किसने इसे फैलाया और कौन इस झूठ को सच बनाने के कुतर्क देता है, यह सब खोजने की परवाह किसी को नहीं होती। रही-बची कसर चौबीसों घंटे कुछ तीखा परोसने को लालायित टीवी चैनल पूरी कर देते हैं। हां जब से विधानसभा चुनाव हुए हैं, अफवाहें फैलना बंद हो गई हैं।
अभी पिछले साल भी देश के गणेश भगवानों को एक बार फिर दूध पिलाने पर कतिपय लोग उतारू हो गए थे। इस बार भी पिछली बार की तरह अफवाह की शुरूआत पंजाब से ही हुई थी। सुबह होते-होते मंदिरों की भीड़ की खबर का सीधा प्रसारण भी होने लगा। इसी साल के शुरूआत में रोटी-प्याज मांगने वाली औरत, दरवाजे पर हल्दी के छापे लगाने की बात और ऐसी ही कई अफवाहें मध्यप्रदेश व उत्तरप्रदेश के आंचलिक इलाकों में फैली थीं। मुंह नोचवा बंदर की अफवाहें कभी मथुरा तो कभी कानपुर तो कभी रांची, हर तीन-चार साल में देश के अलग-अलग हिस्सों में फैलती रहती हैं।
एक बात गौर करने की है कि मोबाईल या इंटरनेट से अफवाहें फैलाने में पंजाब या ऐसे इलाके ज्यादा अव्वल हैं जिनकी आर्थिक स्थिति विकास के पथ पर तेज दौड़ रही है। वैसे इन अफवाहों को फैलाने की मंशा तो अभी तक साफ नहीं हो पाई है, लेकिन एक बड़े वर्ग का मानना है कि संचार क्रांति की तिजारत में लगे लोग इसके पीछे हो सकते हैं । ऐसे सनसनीखेज मैसेज प्राईवेट मोबाईल कंपनियों के दिमाग की उपज होते हैं और इनके जरिये वे रातों-रात लाखों-करोड़ों का धंधा कर लेती हैं। सनद रहे कि पंजाब, कर्नाटक, पुणे जैसे इलाकों के दूरस्थ ग्रामीण अंचलों तक मोबाईल ग्राहकों की संख्या देश के शीर्ष आंकड़ों में हैं। इसी तरह इन राज्यों में गांव-गांव तक केबल टीवी का संजाल है; ऐसी खबरें आंचलिक दर्शकों की संख्या और इसके बल पर टीवी कंपनियों की रेटिंग बढ़ाने का माध्यम बन गई हैं।
अफवाहों की बयार के पीछे कुछ ऐसे संगठनों का दिनों-दिन मजबूत होना भी कहा जा रहा है जोकि झूठ को बार-बार बोल कर सच बनाने के सिद्धांत का हिमायती हैं। कहा जाता है कि किसी खबर के फैलने व उसके समाज पर असर को आंकने के सर्वें के तहत ऐसी लप्पेबाजियों को उड़ाया जा रहा है। आज तकनीक इतनी एडवांस है कि किसी एसएमएस का शुरूआत या सोशल साईट पर भड़काऊ संदेश देने वाले का पता लगाना बेहद सरल है, इसके बावजूद इतने संवेदनशील मसले पर पुलिस व प्रशासन का टालू रवैया अलग तरह की आशंका खड़ी करता है।
बहरहाल अफवाहों की परिणति संकटकाल में चल रहे राहत कार्यों में व्यवधान के तौर पर भी होती है। अफवाहें अनैतिक व गैरकानूनी भी हैं। फिर ऐसे में संवेदनशील रहे इलाकों की सरकारों में बैठे लोगों का इस मामले में आंखें मूंदे रखना कहीं कोई गंभीर परिणाम भी दे सकता है।

शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

Control Pollution : do not wait for next Diwali

इंतजार ना करें अगली दीवाली का, दिल्ली के सिखों से लें सीख

पंकज चतुर्वेदी,
दीपावली के बाद दिल्ली ही नहीं देश के बड़े हिस्से में ‘स्मॉग’ ने जो हाल किया उसे याद कर ही सिरहन आ जाती है। स्मॉग यानि फॉग यानि कोहरा और स्मोक यानि धुआं का मिश्रण। इसमें जहरीले कण शामिल होते हैं जो कि भारी होने के कारण उपर उठ नहीं पाते व इंसान की पहुंच वले वायुमंडल में ही रह जाते हैं। जब इंसान सांस लेता है तो ये फेफड़े में पहुंच जाते हैं। किस तरह दमा और सांस की बीमारी के मरीज बेहाल रहे, किस तरह आठ दिन सड़कों पर यातायात प्रभावित हुआ, कई दुर्घटनाएं हुई व लोग मारे गए, कई हजार लोग ब्लड प्रेशर व हार्ट अटैक की चपेट में आए- इसके किस्से हर कस्बे, शहर में हैं।

 पिछले साल 28 अक्तूबर को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह कहते हुए आतिशबाजी पर पूरी तरह पाबंदी से इंकार कर दिया था कि इसके लिए पहले से ही दिशा-निर्देश उपलब्ध हैं व सरकार को इस पर अमल करना चाहिए। तीन मासूम बच्चों ने संविधान में प्रदत्त जीने के अधिकार का उल्लेख कर आतिशबाजी के कारण सांस लेने में होने वाली दिक्कत को लेकर सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई थी कि आतिशबाजी पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी जाए। सरकार ने अदालत को बताया था कि पटाखे चलाना, प्रदूषण का अकेला कारण नहीं है। अदालत ने भी पर्व की जन भावनाओं का खयाल कर पाबंदी से इंकार कर दिया, लेकिन बीती दीपावली की रात दिल्ली व देश में जो कुछ हुआ, उससे साफ है कि आम लोग कानून को तब तक नहीं मानते है,जब तक उसका कड़ाई से पालन ना करवाया जाए। पूरे देश में हवा इतनी जहर हो गई कि 68 करोड़ लोगों की जिंदगी तीन साल कम हो गई।
अकेले दिल्ली में 300 से ज्यादा जगह आग लगी व पूरे देश में आतिशबाजी के कारण लगी आग की घटनाओं की संख्या हजारों में हैं। इसका आंकड़ा रखने की कोई व्यवस्था ही नहीं है कि कितने लेाग आतिशबाजी के धुंए से हुई घुटन के कारण अस्पताल गए। दीपावली की रात प्रधानमंत्री के महत्वाकांक्षी व देश के लिए अनिवार्य ‘‘स्वच्छता अभियान’’ की दुर्गति देशभर की सड़कों पर देखी गई। हालांकि इस बीच एक उम्मीद की किरण दिल्ली में सिख समाज की ओर से आई है। आगामी 14 नवंबर को श्री गुरूनानक देव के प्रकाशोत्सव पर होने वाले आयोजन व जुलूस में किसी भी प्रकार की आतिशबाजी ना चलाने की अपील दिल्ली सिख गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी ने की है।

दीपावली की अतिशबाजी ने राजधानी दिल्ली की आबोहवा को इतना जहरीला कर दिया गया कि बाकायदा एक सरकारी सलाह जारी की गई थी कि यदि जरूरी ना हो तो घर से ना निकलें। कई स्कूल बंद किए गए। इस बार दीपावली पर लक्ष्मी पूजा का मुहर्त कुछ जल्दी था, यानि पटाखे चलाने का समय ज्यादा हो गया। फेफड़ों को जहर से भर कर अस्थमा व कैंसर जैसी बीमारी देने वाले पीएम यानि पार्टिक्यूलर मैटर अर्थात हवा में मौजूद छोटे कणों की निर्धारित सीमा 60 से 100 माईक्रो ग्राम प्रति क्यूबिक मीटर है, जबकि दीपावली की शाम से यही यह सीमा 900 के पार तक हो गई। ठीक यही हाल ना केवल देश के अन्य महानगरों के बल्कि प्रदेशों की राजधानी व मंझोले शहरों के भी थे। सनद रहे कि पटाखे जलाने से निकले धुंए में सल्फर डाय आक्साईड, नाईट्रोजन डाय आक्साईड, कार्बन मोनो आक्साईड, शीशा, आर्सेनिक, बेंजीन, अमोनिया जैसे कई जहर सांसों के जरिये शरीर में घुलते हैं। इनका कुप्रभाव परिवेश में मैाजूद पशु-पक्षियों पर भी होता है। यही नहीं इससे उपजा करोड़ों टन कचरे का निबटान भी बड़ी समस्या है। यदि इसे जलाया जाए तो भयानक वायु प्रदूषण होता है। यदि इसके कागज वले हिस्से को रिसाईकल किया जाए तो भी जहर घर, प्रकृति में आता है।

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और यदि इसे डंपिंग में यूं ही पड़ा रहने दिया जाए तो इसके विषैले कण जमीन में जज्ब हो कर भूजल व जमीन को स्थाई व लाईलाज स्तर पर जहरीला कर देते हैं। आतिशबाजी से उपजे शोर के घातक परिणाम तो हर साल बच्चे, बूढ़े व बीमार लोग भुगतते ही हैं। दिल्ली के दिलशाद गार्डन में मानसिक रोगों का बड़ा चिकित्सालय है। यहां अधिसूचित किया गया है कि दिन में 50 व रात में 40 डेसीबल से ज्यादा का शोर ना हो। लेकिन यह आंकड़ा सरकारी मॉनिटरिंग एजेंसी का है कि दीपावली के पहले से यहां शोर का स्तर 83 से 105 डेसीबल के बीच है। दिल्ली के अन्य इलाकों में यह 175 तक पार गया है।

हालांकि यह सरकार व समाज दोनों को भलीभांति जानकारी थी कि रात 10 बजे के बाद पटाखे चलाना अपराध है। कार्रवाई होने पर छह माह की सजा भी हो सकती है। यह आदेश सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2005 में दिया था जो अब अब कानून की शक्ल ले चुका है। 1998 में दायर की गई एक जनहित याचिका और 2005 में लगाई गई सिविल अपील का फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिए थे। 18 जुलाई 2005 को सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायमूर्ति आरसी लाहोटी और न्यायमूर्ति अशोक शर्मा ने बढ़ते शोर की रोकथाम के लिए कहा था। सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारों की आड़ में दूसरों को तकलीफ पहुंचाने, पर्यावरण को नुकसान करने की अनुमति नहीं देते हुए पुराने नियमों को और अधिक स्पष्ट किया, ताकि कानूनी कार्रवाई में कोई भ्रम न हो। अगर कोई ध्वनि प्रदूषण या सुप्रीम कोर्ट के उपरोक्त निर्देशों का उल्लंघन करता है तो उसके खिलाफ भादंवि की धारा 268, 290, 291 के तहत कार्रवाई होगी। इसमें छह माह का कारावास और जुर्माने का प्रावधान है। पुलिस विभाग में हेड कांस्टेबल से लेकर वरिष्ठतम अधिकारी को ध्वनि प्रदूषण फैलाने वालों पर कार्रवाई का अधिकार है। इसके साथ ही प्रशासन के मजिस्ट्रियल अधिकारी भी कार्रवाई कर सकते हैं। विडंबना है कि इस बार रात एक बजे तक जम कर पटाखे बजे, ध्वनि के डेसीमल को नापने की तो किसी को परवाह थी ही नहीं, इसकी भी चिंता नहीं थी कि ये धमाके व धुआं अस्पताल, रिहाईशी इलााकों या अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में बेरोकटोक किए जाते रहे।
असल में आतिशबाजी को नियंत्रित करने की शुरूआत ही लापरवाही से है। विस्फोटक नियमावली 1983 और विस्फोटक अधिनियम के परिपालन में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिए थे कि 145 डेसीबल से अधिक ध्वनि तीव्रता के पटाखों का निर्माण, उपयोग और विक्रय गैरकानूनी है। प्रत्येक पटाखे पर केमिकल एक्सपायरी और एमआरपी के साथ-साथ उसकी तीव्रता भी अंकित होना चाहिए, लेकिन बाजार में बिकने वाले एक भी पटाखे पर उसकी ध्वनि तीव्रता अंकित नहीं है। सूत्रों के मुताबिक बाजार में 500 डेसीबल की तीव्रता के पटाखे भी उपलब्ध हैं। यही नहीं चीन से आए पटाखों में जहर की मात्रा असीम है व इस पर कहीं कोई रोक टोक नहीं है। कानून कहता है कि पटाखा छूटने के स्थल से चार मीटर के भीतर 145 डेसीबल से अधिक आवाज नहीं हो। शांति क्षेत्र जैसे अस्पताल, शैक्षणिक स्थल, न्यायालय परिसर व सक्षम अधिकारी द्वारा घोषित स्थल से 100 मीटर की परिधि में किसी भी तरह का शोर 24 घंटे में कभी नहीं किया जा सकता।
पिछले साल अदालत ने तो सरकार को समझाईश दे दी थी कि केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारें पटाखों के दुष्प्रभावों के बारे में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में व्यापक प्रचार करें और जनता को इस बारे में सलाह दे। लेकिन छट पूजा के अवसर पर दिल्ली में मुख्यमंत्री की मौजूदगी में लेाग आतिशबाजी चलाते रहे व उन्होंने एक नागरिक की तरह लोगों को ऐसा करने से रोका नहीं। इस साल तो सरकार ने विज्ञापन भी जारी नहीं किए, देशभर के स्कूलों में बच्चों को आतिशबाजी ना चलाने की शपथ, रैली जैसे प्रयोग भी बहुत कम हुए। टीवी व अन्य प्रचार माध्यमों ने भी इस पर कोई अभियान चलाया नहीं था, लेकिन 30 अक्तूबर की रात बानगी है कि सभी कुछ महज औपचारिकता, रस्म अदायगी या ढकोसला ही रहा। यह जान लें कि दीपावली पर परंपराओं के नाम पर कुछ घंटे जलाई गई बारूद कई-कई साल तक आपकी ही जेब में छेद करेगी, जिसमें दवाईयों व डाक्टर पर होने वाला व्यय प्रमुख है। हालांकि इस बात के कोई प्रमाण नहीं है कि आतिशबाजी चलाना सनातन धर्म की किसी परंपरा का हिस्सा है, यह तो कुछ दशक पहले विस्तारित हुई सामाजिक त्रासदी है। आतिशबाजी पर नियंत्रित करने के लिए अगले साल दीपावली का इंतजार करने से बेहतर होगा कि अभी से ही आतिशबाजियों में प्रयुक्त सामग्री व आवाज पर नियंत्रण, दीपावली के दौरान हुए अग्निकांड, बीमार लोग, बेहाल जानवरों की सच्ची कहानियां सतत प्रचार माध्यमों व पाठ्य पुस्तकों के माध्यम से आम लोगों तक पहुंचाने का कार्य शुरू किया जाए। यह जानना जरूरी है कि दीपावली असल में प्रकृति पूजा का पर्व है, यह समृद्धि के आगमन और पशु धन के सम्मान का प्रतीक है। इसका राष्ट्रवाद और धार्मिकता से भी कोई ताल्लुक नहीं है। यह गैरकानूनी व मानव-द्रोही कदम है। हो सकता है कि अभी आप 500 और 1000 के नोट के विमर्श में डूबे हों लेकिन आतिशबाजी के खिलाफ आने वाले एक साल तक व्यापक अभियान चलाने की जरूरत है, वरना हम दो हजार के नए नोट की पूजा करने लायक समाज का हिस्सा नहीं रह पाएंगे। काश हम दिल्ली के सिख समाज से कुछ सीख ले पाएं।

Biodiversity on target of smuggelers

तस्करों के निशाने पर औषधियां

जैव विविधता संरक्षण के लिए भारत को होना होगा सचेत

विदेशी वैज्ञानिकों की नजर अब भारत के जंगलों में मिलने वाले कोई एक दर्जन पौधों पर है। अमेरिका और यूरोप के वैज्ञानिक तथा दवा कंपनियों के लोग पर्यटक बन कर भारत आते हैं और स्थानीय लोगों की मदद से जड़ी-बूटियों के पारंपरिक इस्तेमाल की जानकारियां हासिल करते हैं। 1998 में मध्य प्रदेश के जंगलों में जर्मनी की एक दवा कंपनी के प्रतिनिधियों को कुछ पौधों की पहचान करते हुए पकड़ा गया था

 

भारत में तस्करों की पसंद वह नैसर्गिक संपदा है, जिसके प्रति भारतीय समाज लापरवाह हो चुका है, लेकिन पश्चिमी देश उसका महत्व समझ रहे हैं। यह महज नैतिक और कानून सम्मत अपराध ही नहीं है, बल्कि देश की जैव विविधता के लिए ऐसा संकट है, जिसका भविष्य में कोई समाधान नहीं होगा। भारत में लगभग 45 हजार पौधों के प्रजातियों की जानकारी है, जिनमें से कई भोजन या दवाईयों के रूप में बेहद महत्वपूर्ण हैं। दुर्लभ कछुओं, केकड़ों और तितलियों को अवैध तरीके से देश से बाहर भेजने के कई मामले अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पकड़े जा चुकेहैं। देश के दूरस्थ अंचलों में स्थानीय पेड़-पौधों, पशु-पक्षी, तितली-कीट की प्रजातियां या तो कीटनाशक दवाओं के अंधाधुध इस्तेमाल या फिर तस्करों के हाथों विलुप्त होती जा रही हैं। हमारा जल, मिट्टी, फसल और जीवन इन्हीं विविध जीवों और फसलों के आपसी सामंजस्य से चलता है। खेतों में चूहे भी जरूरी हैं और चूहों का बढ़ना रोकने के लिए सांप भी। सांप पर काबू पाने के लिए मोर व नेवले भी हैं। लेकिन कहीं खूबसूरत चमड़ी या पंख के लिए तो कहीं जैव विविधता की अनबुझ पहेली के गर्भ तक जाने को व्याकुल वैज्ञानिकों के प्रयोगों के लिए भारत के जैव संसार पर तस्करों की निगाहें लगी हुई हैं। वक्त साक्षी है कि पिछले कुछ वर्षो में चावल और गेहूं की कई किस्मों, जंगल के कई जानवरों व पंक्षियों को हम दुर्लभ बना चुके हैं। इसका खामियाजा भी समाज भुगत रहा है।
भारत सरकार ने 41 जड़ी बूटियों के दोहन पर रोक लगा रखी है। इसके बावजूद अतीश, दंदासा, तालीस, कुटकी, डोलू, गंद्रायण, सालम मिस्नी, जटामोसी, महामेदा, सोम आदि स्थानीय बाजार में सस्ते दामों में बिकती मिल जाती हैं। हालात इतने गंभीर हैं कि गढ़वाल की भिलंगना घाटी में गत एक दशक के दौरान 22 पादप प्रजातियां विलुप्त हो गईं। 60 प्रजातियों का जीवन-चक्र सिर्फ तीन चार साल का रह गया है। कुमाऊं और पिथौरागढ़ की शारदा नदी के किनारे के वनों से कोई 40 प्रजाति के पौधे आगामी पांच सालों में नदारद हो जाएंगे। नेपाल की सीमा पर धनगढ़ी, रक्सौल, वीरगंज, हेटोडा, नेपालगंज के महंगे होटलों में तस्कर सूचना उपकरणों से लैस पूरे साल डटे रहते हैं। ये लोग उन जड़ी-बूटियों और उनके खरीदारों के सतत संपर्क में रहते हैं, जिनकी मांग अमेरिका और यूरोप में है। लेकिन भारत में उन पर पाबंदी है। भारत के हर्बल सौंदर्य प्रसाधनों व दवाईयों की बाहर जबरदस्त मांग है। नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट ऑफ अमेरिका(एनसीआई) के एक शोध के मुताबिक भारत के पहाड़ों पर मिलने वाली आयुर्वेदिक वनौषधि ‘टेक्सोल’ में गर्भाशय का कैंसर रोकने की जबरदस्त क्षमता है। फिर क्या था, देखते ही देखते नेपाल की सीमा से सटे हिमालयी इलाकों में पाए जाने वाले ‘तालीस पत्र’ नामक पेड़ पर जैसे कहर आ गया हो। यही तालीस पत्र टेक्सोल है और कभी चप्पे-चप्पे पर मिलने वाले इसके पेड़ अब दुर्लभ हो गए हैं। डॉबर, नेपाल ने तो बाकायदा इसकी खेती और उसे अमेरिका एवं इटली को बेचने के लिए अनुबंध कर रखे हैं। अरुणाचल प्रदेश की दिबांग और लोहित घाटियों में ‘मिशामी टोटा’ का टोटा होना अभी की ही बात है। डिब्रुगढ़ के बाजार में अचानक इसकी मांग बढ़ी और देखते ही देखते इसकी नस्ल ही उजाड़ दी गई। स्थानीय लोग इसका इस्तेमाल पेट दुखने व बुखार के इलाज के लिए सदियों से करते आ रहे थे। डिब्रुगढ़ में इसके दाम दो हजार रुपये किलो हुए तो कोलकाता के बिचौलियों ने इसे पांच हजार में खरीदा। वहां से इसे तस्करी के पंख लगे और जापान व स्विट्जरलैंड में इसके जानकारों ने पचास हजार रुपये किलो की दर से भुगतान कर दिया। ठीक यही हाल ‘अगर’ नाम सुगंधित औषधि का हुआ। इसके तेल की मांग अरब देशों में बहुत है। यहां तक कि सौ ग्राम तेल के एक लाख रुपये तक मिलते हैं।
एड्स और कैंसर जैसी खतरनाक बीमारियों का इलाज खोज रहे विदेशी वैज्ञानिकों की नजर अब भारत के जंगलों में मिलने वाले कोई एक दर्जन पौधों पर है। अमेरिका और यूरोप के वनस्पति वैज्ञानिक तथा दवा कंपनियों के लोग कुछ वर्षो से पर्यटक बन कर भारत आते हैं और स्थानीय लोगों की मदद से जड़ी-बूटियों के पारंपरिक इस्तेमाल की जानकारियां प्राप्त करते हैं। बता दें कि 1998 में मध्य प्रदेश के जंगलों में जर्मनी की एक दवा कंपनी के प्रतिनिधियों को उस समय रंगे हाथों पकड़ा गया था, जब वे स्थानीय आदिवासियों की मदद से कुछ पौधों की पहचान कर रहे थे। देश के रेगिस्तानी इलाकों में मिलने वाली गूगल (कांपीफोरा वाईट्री) की एक विशेष प्रजाति में हृदय रोग के कारक कोलेस्ट्रोल को कम करने की क्षमता है। अश्वगंधा यानी विथानिया सोम्नीफेर तो याददाश्त, मानसिक रोगों, शारीरिक दुर्बलता जैसे विकारों में राम बाणा माना जाता है। इसमें कैंसर रोधी गुण भी हैं। इसी कारण इसकी बड़ी मात्र में तस्करी हो रही है। सांस संबंधी बीमारियों के इलाज के लिए पुश्तैनी रूप से इस्तेमाल होने वाले एक पौधे की भी खासी मांग है, इसे वैज्ञानिक भाषा में ‘इफेड्रा फोलियाटा’ कहा जाता है। अमेरिका में इस पौघे से दिल की ओर जाने वाली धमनियों को खेालने की दवा बनाने के प्रयोग चल रहे हैं। यदि ये सभी प्रयोग सफल हुए तो विदेशी कंपनियां हमारी इन जड़ी-बूटियों को अपने तरीके से पेटेंट करवा कर सारी दुनिया में व्यापार करेंगी। अरावली पर्वतमाला में मिलने वाले पौधे ‘बैलानाईट्स एजीप्टीनिया’ से ऐसा गर्भनिरोधक तैयार किया गया है, जिसके कोई साइड-इफेक्ट नहीं हैं। हिमालय क्षेत्र में मिलने वाले गुलाबी फूलों ‘बरबेरिस एरिस्टाका’ से आंख की बेहतरीन दवा तैयार की गई है।
लोक जीवन का अभिन्न हिस्सा नीम का कई बीमारियों व खेती-किसानी में उपयोग होता है। नीम भारतीय पेड़ है। इसके बावजूद 1995 में यूरोपीय पेटेंट प्राधिकरण ने अमेरिका के कृषि विभाग और रसायन कंपनी डब्ल्यू.जी. ग्रेस एंड कंपनी के नाम नीम के तेल से कीटनाशक बनाने का पेटेंट जारी कर दिया। समय रहते इस फैसले को चुनौती दी गई, तब डब्ल्यू.जी. ग्रेस कंपनी ने कई प्रमाण प्रस्तुत किए कि वे लंबे समय से इस दिशा में शोध कर रहे हैं। हालांकि कंपनी का दवा खारिज हुआ, लेकिन इससे पता चला कि किस तरह अमेरिकी कंपनियां लंबे समय से भारत से नीम के तेल की तस्करी कर ही थीं। ठीक ऐसा ही हल्दी के साथ भी हो चुका है। देश में इसके लिए सशक्त कानून ना होना हैरत करने वाला है। संसद ने 2002 में जैव विविधता कानून को मंजूरी दी थी। राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण के गठन की भी योजना बनाई गई थी पर नतीजा सिफर रहा। हमारे पारंपरिक ज्ञान व जैव विविधता का सौदा करने वाले लोग देश की अर्थ व्यवस्था पर प्रहार कर रहे हैं। इस बाबत सरकार भले ही देर से चेते पर समाज को गंभीरता से ध्यान देना होगा।

सोमवार, 7 नवंबर 2016

some long term solution for pure air in delhi

चाहिए दूरगामी योजना 

 दीपावली का पर्व और ठंड का आगाज दिल्ली के लिए कयामत बन कर आया है। आने वाले कुछ दिन जब आकाश से ओस व कुहासा गिरेगा और धरती से वाहनों व कारखानों का धुआं तो हवा में भारी कणों की मात्रा अनियंत्रित हो जाएगी। इसका सीधा असर लेगों के सांस लेने पर पड़ेगा। बीते 17 वर्षो में सबसे बुरे हालात हुए हैं हवा के। गत पांच सालों के दौरान बड़े सरकारी अस्पताल एम्स में सांस के रोगियों की संख्या 300 गुना बढ़ गई है। एक अंतरराष्ट्रीय शोध रिपोर्ट में बताया गया है कि अगर प्रदूषण स्तर को काबू में नहीं किया गया तो साल 2025 तक दिल्ली में हर साल करीब 32,000 लोग जहरीली हवा के शिकार हो कर असामयिक मौत के मुंह में जाएंगे। सनद रहे कि आंकड़ोें के मुताबिक वायु प्रदूषण के कारण दिल्ली में हर घंटे एक मौत होती है। कुछ ही दिनों पहले ही विश्व स्वास्य संगठन ने दिल्ली को दुनिया का सबसे ज्यादा प्रदूषित शहर के तौर पर चिह्नित किया है। दीपावली के बाद तो खेतों में डंठल जलाने, ईट भट्टों में कचरा फूंकने, उत्सवों की बाढ़ और सड़कों पर सारे दिन वाहनों का जाम होने के चलते हालात भयावह हो चुके हैं। दिल्ली की हवा में कितना जहर घुल गया है, इसका अंदाजा खौफ पैदा करने वालो आंकड़ों को बांचने से ज्यादा डॉक्टरों के एक संगठन के उस बयान से लगाया जा सकता है, जिसमें बताया गया है कि देश की राजधानी में 12 साल से कम उम्र के 15 लाख बच्चे ऐसे हैं, जो अपने खेलने-दौड़ने की उम्र में पैदल चलने पर ही हांफ रहे हैं। इनमें से कई सौ को तो डॉक्टर चेता चुके हैं कि जिंदगी चाहते हो तो दिल्ली से दूर चले जाएं। दरअसल, इस खतरे के मुख्य कारण 2.5 माइक्रोमीटर व्यास वाला धुएं में मौजूद एक पार्टिकल और वाहनों से निकलने वाली गैस नाइट्रोजन ऑक्साइड है, जिसके कारण वायु प्रदूषण से हुई मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। इस खतरे का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वायु प्रदूषण करीब 25 फीसद फेफड़े के कैंसर की वजह है। याद करें कुछ साल पहले अदालत ने दिल्ली में आवासीय इलाकों में दुकानें बंद करने, अवैध कालोनियों में निर्माण रोकने जैसे फैसले दिए थे, लेकिन वोट के लालच में सभी सियासती दल अदालत को जन विरोधी बताते रहे। परिणाम सामने हैं कि सड़कों पर व्यक्ति व वाहन चलने की क्षमता से कई सौ गुना भीड़ है। कहने को तो पार्टिकुलेट मैटर या पीएम के मानक तय हैं कि पीएम 2.5 की मात्रा हवा में 50 पीपीएम और पीएम-10 की मात्रा 100 पीपीएम से ज्यादा नहीं होना चाहिए। लेकिन दिल्ली का कोई भी इलाका ऐसा नहीं है जहां यह मानक से कम से कम चार गुना ज्यादा न हो। पीएम ज्यादा होने का अर्थ है कि आंखों में जलन, फेफड़े खराब होना, अस्थमा, कैंसर व दिल के रोग। जाहिर है कि यदि दिल्ली की सांस थमने से बचाना है तो यहां न केवल सड़कों पर वाहन कम करने होंगे, इसे आसपास के कम से कम सौ किलोमीटर के सभी शहर-कस्बों में भी वही मानक लागू करने होंने जो दिल्ली शहर के लिए हों। दिल्ली को अर्बन स्लम बनने से बचाना है तो इसमें कथित लोकप्रिय फैसलों से बचना होगा, जिसमें सबसे महत्त्वपूर्ण है यहां बढ़ रही आबादी को कम करना। दिल्ली में बढ़ते जहरीले धुएं के लिए आम तौर पर इससे सटे इलाकों में खेतों में पुआल जलाने से उपजे धुएं को दोषी ठहराया जाता है जबकि इससे कई हजार गुना ज्यादा धुआं राजधानी की सीमा से सटे सैंकड़ों ईट-भट्टों से चौबीसों घंटे उपजता है। एनसीआर में तेजी से बढ़ रही आवास की मांग या रियल एस्टेट के व्यापार ने ईटों की मांग बेलगाम कर दी है। दिल्ली की गली-गली में घूम कर हर तरह का कूड़ा, कबाड़ा जुटाने वाले जानते हैं कि पानी की बेकार बेतल से लेकर फटे जूते तक को किस तरह ट्रकों में भरकर इन भट्टों में फूंका जाता है। उल्लेखनीय है कि इन दिनों भट्टे में जलाने के लिए कोयला या लकड़ी बेहद महंगी है जबकि प्लास्टिक का यह कबाड़ा अवांछित-सा दर-दर पड़ा होता है। केंद्र सरकार का कर्मचारियों को दफ्तरों में आने-जाने के समय पर कड़ाई से निगाह रखना भी दिल्ली एनसीआर में सड़कों पर जाम व उसके कारण जहरीले धुएं के अधिक उत्सर्जन का कारण बन गया है। सभी जानते हैं कि नए मापदंड वाले वाहन यदि चालीस या उससे अधिक की स्पीड में चलते हैं तो उनसे बेहद कम प्रदूषण होता है। लेकिन यदि ये पहले गियर में रैंगते हैं तो इनसे सॉलिड पार्टिकल, सल्फर डाय ऑक्साइड व कार्बन मोनो ऑक्साइड बेहिसाब उत्सर्जित होता है। कार्यालयों में उपस्थिति के नए कानून के चलते अब शहर में निजी व सरकारी, सभी कार्यालयों का आने-जाने का समय लगभग एक हो गया है और इसीलिए एक साथ बड़ी संख्या में वाहन चालक सड़क पर होते हैं। कार्यालयों में समय को ले कर अनुशासन बहेद अनिवार्य और महत्त्वपूर्ण कदम हैं, लेकिन जहां कार्यालय आने-जाने के लिए लोग औसत चालीस से अस्सी किलोमीटर हर रोज सफर करते हों, वहां कार्यालयों के खुलने व बंद होने के समय में बदलाव करना बेहद जरूरी है। सबसे बड़ी बात दिल्ली में जो कार्यालय जरूरी न हों, या जिनका मंत्रालयों से सीधा संबंध न हों, उन्हें दिल्ली से बाहर भेजना भी अच्छा कदम हो सकता है। एक साल पहले दिल्ली सरकार ने एक बड़ा-सा एक्शन प्लान बनाया था। उसमें कार फ्री डे के अलावा कुछ काम नहीं हुआ। फिलहाल, एनजीटी डपट रहा है, दिल्ली व पड़ेासी राज्य के अफसर मीटिंग-मीटिंग खेल कर फाइलों का पेट भर रहे हैं। भले ही तात्कालिक उपाय कर लिए जाएं, लेकिन दिल्ली को जिंदा रखने के लिए दूरगामी व स्थायी योजना चाहिए वरना दिल्ली एनसीआर वासियों पर जो मौत मंडरा रही है, उससे एयर प्यूरीफायर, मास्क व ऐसे ही उपकरण बेचने वालों के व्यवसाय में इजाफे के अलावा किसी के जीवन के स्तर में सुधार आने से रहा।

रविवार, 6 नवंबर 2016

Why our security personals are suffering rom tension ?

समस्याओं से घिरे सुरक्षा बल 

 

अपने साथियों और अफसरों को मारने के मामले बढ़े हैं। इन दिक्कतों को जानबूझ कर अनसुना किया जाता रहा है। सेना और अर्ध सैनिक बल के आला अफसरों पर लगातार विवाद होना, उन पर घूसखोरी के आरोप, सीमा या उपद्रव ग्रस्त इलाकों में जवानों को उचित सुविधाएं नहीं मिलने, उनके साथियों की मौत, सिपाही भर्ती में घूसखोरी की खबरों आदि के चलते सुरक्षा बल का मनोबल गिरा है

 

 

जब देश में सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर सेना की वाहवाही हो रही थी, ठीक उन्हीं दिनों दिल्ली की एक अदालत ने दक्षिण-पश्चिम कमांड के प्रभारी रहे मेजर जनरल आनंद कुमार कपूर को आय से अधिक संपत्ति के मामले में एक साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। अभी तीन महीने पहले देहरादून में लेफ्टीनेंट कर्नल भारत जोशी को सीबीआई ने दस हजार की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया था। मई में पूवरेत्तर के आईजोल में 39 असम राइफल्स के कर्नल जसजीत सिंह अपने नौ साथियों के साथ लगभग 15 करोड़ के सोने की तस्करी में गिरफ्तार हुए। ऐसी घटनाएं याद दिलवाने का कारण महज यही है कि सेना के जवान भी हमारे उसी समाज से आ रहे हैं जहां अनैतिकता, अराजकता, अधीरता तेजी से घर कर रही है। जिस तरह गैर-सैन्य समाज पर पाबंदी रखने, सतर्क करने के कई चैनल काम कर रहे हैं, सेना पर सवाल करने को किसी धार्मिक आस्था को चोट पहुंचाने जैसा कार्य नहीं मान लेना चाहिए। आंकड़े गवाह हैं कि बीते एक दशक में अपने ही लोगों के हाथों या आत्महत्या में मरने वाले सुरक्षाकर्मियों की संख्या देश विरोधी तत्वों से मोर्चा लेने में शहीदों से यादा रही है। वहीं सुरक्षा बलों में काबिल अफसरों की कमी, नौकरी छोड़ने की दर और क्वार्टर गार्ड या फौजी जेलों में आरोपी कर्मियों की संख्या में इजाफा, अदालतों में मुकदमेबाजी बढ़ी हैं। लोग भूल गए होंगे कि मई 2001 में एक फौजी सिपाही सुबाराम को फांसी की सजा सुनाई गई थी, क्योंकि उसने अपने अफसर को गोली मार दी थी। असल में, सुबाराम अपने साथियों की हत्या करने वाले आतंकवादियों को पनाह देने वालों को हाथों-हाथ सजा देना चाहता था, जबकि राजनीतिक आदेशों में बंधे अफसरों ने ऐसा करने से रोका था। उसके सब्र का बांध टूटा व उसने अपने अफसर को ही मार डाला।
पिछले कुछ सालों के दौरान सीमावर्ती और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में ऐसी घटनाएं होना आम बात हो गई है जिसमें कोई उन्मादी सिपाही अपने साथियों को मार देता है या फिर खुद की जीवनलीला समाप्त कर लेता है। इन घटनाओं से आ रही दूरगामी चेतावनी की घंटी को फौजी आलाकमान ने कभी सुनने की कोशिश नहीं की जबकि फौजी के शौर्य और बलिदान से छितरे खून को अपना वोट बैंक में बदलने को तत्पर नेता इसे जानबूझ कर अनसुना करते हैं। सेना और अर्ध सैनिक बल के आला अफसरों पर लगातार विवाद होना, उन पर घूसखोरी के आरोप, सीमा या उपद्रव ग्रस्त इलाकों में जवानों को उचित सुविधाएं ना मिलने के कारण उनके साथियों की मौत, सिपाही स्तर पर भर्ती में घूसखोरी की खबरों आदि के चलते सुरक्षा बल का मनोबल गिरा है। सभी बलों में अपने साथी को ही मार देने के औसतन बीस मामले हर साल सामने आ रहे हैं। ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ने कोई दस साल पहले एक जांच दल बनाया था, जिसकी रिपोर्ट जून 2004 में आई थी। इसमें घटिया सामाजिक परिवेश, प्रमोशन की कम संभावनाएं, अधिक काम, तनावग्रस्त कार्य, पर्यावरणीय बदलाव, वेतन-सुविधाएं जैसे मसलों पर कई सिफारिशें की गई थीं। इनमें संगठन स्तर पर 37 सिफारिशें, निजी स्तर पर आठ और सरकारी स्तर पर तीन सिफारिशें थीं। इनमें छुट्टी देने की नीति में सुधार, जवानों से नियमित वार्तालाप, शिकायत निवारण को मजबूत बनाना, मनोरंजन व खेल के अवसर उपलब्ध करवाने जैसे सुझाव थे। लेकिन इन पर सिर्फ कागजी अमल ही हो पाया।
आंकड़े बताते हैं कि जनवरी 2009 से दिसंबर 2014 के बीच नक्सलियों से जूझते हुए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के कुल 323 जवान देश के काम आए। वहीं इस अवधि में 642 सीआरपीएफ कर्मी दिल का दौरा पड़ने से मर गए। आत्महत्या करने वालों की संख्या 228 रही। मलेरिया से मरने वालों का आंकड़ा भी 100 के पार है। कुल मिलाकर सीआरपीएफ दुश्मन से नहीं खुद से ही जूझ रही है। केंद्रीय बलों के जवान तैनाती वाले क्षेत्र में ना तो स्थानीय भूगोल से परिचित हैं और ना ही उन्हें स्थानीय बोली-भाषा संस्कार की जानकारी है। वे तो मूल रूप से स्थानीय पुलिस की सूचना या दिशानिर्देश पर ही काम करते हैं। पुलिस की फर्जी व शोषण की कार्रवाइयों के चलते दूरस्थ अंचलों के ग्रामीण खाकी वर्दी पर भरोसा नहीं करते हैं। अधिकांश मामलों में स्थानीय पुलिस की गलत हरकतों का खामियाजा केंद्रीय बलों को ङोलना पड़ता है। बेहद घने जंगलों में लगातार गश्त बेहद तनावभरा है। इस तरह का दवाब कई बार जवानों के लिए जानलेवा हो रहा है। सनद रहे सेना कभी आक्रमण के लिए और अर्ध सैनिक बल निगरानी व सुरक्षा के लिए तैनात हुआ करते थे। लेकिन आज फौज की तैनाती और ऑपरेशन में राजनीतिक हितों के हावी होने का परिणाम है कि कश्मीर में फौज व अर्ध सैनिक बल चौबीसों घंटे तनावग्रस्त रहते हैं। साथ ही यदि कियी जवान से कुछ गलती या अपराध हो जाए तो उसके साथ न्याय यानी कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया भी गौरतलब है। पहले से तय हो जाता है कि फलां ने अपराध किया है और उसे कितनी सजा देनी है। नियमानुसार अरोपी के परिजनों को ‘चार्जशीट’ के बारे में सूचित किया जाना चाहिए, ताकि वे उसके बचाव की व्यवस्था कर सकें। लेकिन अधिकांश मामलों में सजा पूरी होने तक घर वालों को सूचना ही नहीं दी जाती है। आम फौजी समाज से यादा घुल-मिल नहीं पाता है और ना ही अपना दर्द बयां कर पाता है। वहां की अंदरूनी कहानी कुछ और है। किसी भी बल की आत्मा कहे जाने वाला सिपाही-वर्ग अपने ही अफसर के हाथों शोषण और उत्पीड़न का शिकार होता है। देहरादून, महु, पुणो, चंडीगढ़ जैसी फौजी बस्तियों में सेना के आला रिटायर्ड अफसरों की कोठियों के निर्माण में रंगरूट यानी नई भर्ती वाला जवान ईंट-सीमेंट की तगाड़ियों ढोते मिल जाएगा। जिस सिपाही को देश की चौकसी के लिए तैयार किया जाता है वह मजदूरों की जगह काम करने पर मजबूर होता है। कुछ हजार रुपये का वेतन पाने वाले जवान हर अफसर के घर सब्जी ढोते मिल जाता है। ऐसे ही हालता अर्ध सैनिक बलों में हैं।
गैर अधिकारी वर्ग के अस्सी फीसदी सुरक्षाकर्मी छावनी इलाकों में घुटनभरे कमरे में ही अपना जीवन काटते हैं। उसके ठीक सामने अफसरों की ‘पांच सितारा मेस’ होती है। सेना व अर्ध सैनिक मामलों को राष्ट्रहित का बता कर उसे अतिगोपनीय कह दिया जाता है और ऐसी दिक्कतों पर अफसर व नेता सार्वजनिक बयान देने से बचते हैं। जबकि वहां मानवाधिकारों और सेवा नियमों का जमकर उल्लंघन होता रहता है। आज विभिन्न उच न्यायालयों में सैन्य बलों से जुड़े आठ हजार से यादा मामले लंबित हैं। अकेले 2009 में सुरक्षा बलों के 44 हजार लोगों ने इस्तीफा दिया था। इनमें 36 हजार मामले सीआरपीएफ व बीएसएफ के हैं। इस तथ्य को संसद में स्वीकार किया गया है। जवानों के हालात सुधारे बगैर मुल्क के सामने आने वाली चुनौतियों से निपटना कठिन होगा। अब जवान पहले से यादा पढ़ा-लिखा है। वह संवेदनशील और सूचनाओं से लैस है। उसके साथ काम करने में अधिक सतर्कता की जरूरत है।

शुक्रवार, 4 नवंबर 2016

unsocial behaviour of social media

सोशल मीडिया और राष्ट्रवाद का गाली-काल


सोशल मीडिया खासकर फेसबुक पर गालियां देना, किसी की दया के प्रति निष्ठा पर शक करना, किसी की जाति-समाज को एक बार में ही नकार देना, एक ऐसी समस्या बनती जा रही है जो इसे ‘‘सोशल’ नहीं रहने देगी। जान लें कि असहमति, प्रतिरोध और प्रश्न लोकतंत्रात्मक व्यवस्था के अभिन्न अंग हैं और इसके बगैर लोकतंत्र का स्वरूप, सद्दाम हुसैन के इराक या मौजूदा चीन से ज्यादा नहीं होता। भारत में सत्ता परिवर्तन महज वोट के माध्यम से, इतनी शांति व सहजता से इसीलिए होते रहे हैं कि यहां सवाल करने का हक सभी को है, लेकिन जब यही सवाल मां-बहन के लिए अपमानजनक बनने लगे, देश के प्रति निष्ठा को ही संदिग्ध करार देने का जरिया बन जाएं तो एकबारगी सोचना पड़ता है कि भारत में गालियां व असहमति पर इतने कटु स्वर पहले से ही थे या फिर सोशल मीडिया की आमदरफ्त ने नए वर्ग को तैयार किया है। सनद रहे कि विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक व व्यापारिक घरानों के अपने सोशल मीडिया एकांश व वहां बैठे वेतनभेागी लोग अब एक हकीकत हैं, लेकिन कई ऐसे लोग जिन्हें हम जान-परख कर इस आभासी दुनिया में अपना मित्र बनाते हैं वे, भोपाल के हादसे या फिर सर्जिकल स्ट्राईक या ऐसे ही किसी मसले पर तर्क, बुद्धि और विवेक से परहेज रख कर ऐसी भाषा व अप्रामाणिक बाते करते हैं कि लोकतंत्र का मूल मंत्र ‘सवाल करने का हक’’ खतरे में दिखने लगता है। यह भी सही है कि दूसरी तरफ भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अपने विचारों का तालिबानीकरण कर चुके हैं व संवाद या मध्य-मार्ग की उनके शब्दों में कोई जगह होती नहीं है।
पिछले दिनों दीपावली की रात भोपाल में हुई मुठभेड़ के बाद कई ऐसे स्वर सुनने को मिले कि यदि पुलिस ने उन्हें फर्जी मुठभेड़ में मारा तो भी बधाई, उन्होंने कचरा साफ किया है। पूरा इलेक्ट्रानिक मीडिया, गैरकानूनी तरीके से फरार युवकों को आतंकवादी कहता रहा, जबकि नियमानुसार उनके आगे कथित या मुजरिम शब्द होना था। इसका कई सौ गुणा असर सोशल मीडिया पर था, यहां स्वयं न्यायाधीश, स्वयं वकील और स्वयं जल्लाद की पूरी राजनीतिक विचारधारा कब्जा जमाए थी और जिस किसी ने मुठभेड़ पर सवाल उठाए, उन्हें मुसलमान की औलाद, पाकिस्तानी या ऐसे ही लफ्जों से नवाजा जाने लगा। इसमें कोई शक नहीं कि जेल-प्रहरी रमाशंकर यादव की हत्या बेहद दुखद है व उसके हत्यारे मौत के पात्र हैं, लेकिन यह भी जान लें कि शहीद यादव की मौत का असली जिम्मेदार था कौन? असल में उसकी मौत का असली कारण जेल-तंत्र का भ्रष्टाचार था।
56 वर्षीय रमाशंकर यादव की बायपास सर्जरी हो चुकी थी और वे कई महीनों से जेल प्रशासन को अपनी रात की ड्यूटी बदलने को कह रहे थे। चूंकि दिन की ड्यूटी कमाई वाली होती है सो उस पर बड़ी चढ़ावा चढ़ाने वाले को ही उसमें दर्ज किया जाता रहा। इतने खूंखरर बंदी जिस जेल में हो, जिसके बारे में पता था कि इनमें से तीन पहले भी जेल से भाग चुके हैं, बगैर शस्त्र के रक्षक को ड्यूटी पर लगाया गया। फिर मारे गए मुजरिमों की बैरक से जिस तरह से मेवा, मटन बनाने का सामान, मिला है जिस तरह वे 40 चादरें जोड़ कर एकत्र करते रहे, इससे साफ है कि जेल के लेागों को उन पर दया-दृष्टि थी। यह भी जान लें कि इन बंदियों को अदालत नहीं ले जाया जाता था, उनकी पेशी वीडियो कैमरे पर होती थी और उनसे मुलाकात का अधिकार केवल उनके परिवार वालों का, वह भी पहचान पत्र की प्रति जमा करने के बाद ही था। यह भी जान लें कि मारे गए सभी बंदी अलग-अलग सेल में थे और ये तीन अलग-अलग ब्लाक में थी। 
हालांकि पुलिस का दावा है कि फरार होने वालों ने टूथ ब्रश के हैंडल से चाबियां बनाईं, लेकिन जेल के ताले ‘‘तीन चाल’’ वाले होते हैं ना कि चटकनी वाले, सो यदि यह सच है तो दुनिया का नया आविष्कार ही होगा। वे जेल में चादर जोड़ कर सीढी बनाते रहे, चाबियां गढ़ते रहे और आईएसओ प्रमाणित जेल में किसी बंदी-रक्षक या नंबरदार (ऐसे सजायाफ्ता कैदी जो कि जेल प्रशासन की मदद करते हैं) को खबर नहीं लगी। जिस जेल में सिमी जैसे उपद्रवी संगठन और नक्सली जैसे दुहसाहसी केडर के सौ से ज्यादा लोग हों, वहां के सीसीटीवी कैमरे ठीक उस समय ही खराब हो गए? यह भी कहना जरूरी है कि मध्यप्रदेश के मालवा व निमाड़ अंचल में सिमी का नेटवर्क जबरदस्त है, वे अपना खर्च चलाने के लिए अफीम की तस्करी, बैंक डकैती व फिरौती तक का सहारा लेते हैं।
ऐसे में यदि सशस्त्र गार्ड सो रहे थे, अलग-अलग सेल में बंदी ताले तोड़ कर भाग जाते हैं तो असल में शहीद यादव की हत्या का जिम्मेदार जेल-प्रशासन ही है। यदि ऐसे सवाल कोई उठाता है तो उसे गाली देने वाले लोग तर्क के बनिस्बत पूरी तरह राजनीतिक, वह भी कुत्सित के मोहरे बन जाते हैं। यह वही जमात है जो 28 अक्तूबर तक देश की सेना को सलाम, शहीदों को नमन के नारों से सोशल मीडिया व अपने मुहल्ले के खंभों पर बैनर पाटे हुए थे, लेकिन 29 अक्तूबर से इन लोगों ने सबसे ज्यादा आतिशबाजी चलाई, इस बात की परवाह किए बगैर कि भारत माता की बलिवेदी पर प्राणौत्सर्ग करने वाले दो जवानों का अंतिम संस्कार ठीक दीपावली के दिन ही हुआ। यही नहीं इस जमात से जब आतिशबाजी के कारण होने वाले प्रदूषण की बात करो तो मां-बहन की गालियों के साथ इदउलजुहा पर बकरों की कुर्बानी रूकवाने की चर्चा करते हुए आतिशाबाजी को भारतीय परंपरा बताने की बात करने लगते हैं। यह जाने बगैर कि दीपावली पर पटाखें चलाने का इतिहास 80 साल पुराना भी नहीं है। रोशनी करना, लक्ष्मी की पूजा करना, अपने ईष्ट-मित्रों के साथ मिष्ठान, खील-बताशे साझा करना ही इस पर्व का अतीत रहा है। लेकिन गालियों के सामने किसे परवाह है तर्क की।
विडंबना यह है कि तार्किक बात करने की जगह खुद के अलावा सभी को देशद्रोही करार देने वाले सोशल मीडिया पर एक गिरोह के रूप में होते हैं व मौका पाते ही असहमति के स्वर को निर्मता से दबाते हैं। यह भी सही है कि उनको भी सवालों से असहमति का हक है, जैसे कि सवाल उठाने वाले को, लेकिन परिचर्चा में किसी की नस्ल या मां-बाप पर संदेह करना, उसकी बहन के साथ अपने रिश्ते बलात जोड़ना, इसका तरीका तो नहीं है। यह समझना जरूरी है कि सेना हो या पुलिस, भारत में वह लेाकतंत्रातमक सत्ता के अधीन है और सत्ता जनता के प्रति जवाबदेह। यदि देश की बड़ी आबादी को भोपाल में मुठभेड़ पर संशय है तो तथ्य व प्रमाण के साथ खुलासा करने में क्या बुराई है, बनिस्बत इसके कि सवाल खड़े करने वाले को ही कोसा जाए। हमने देखा है कि आपातकाल या उसके बाद पंजाब में या फिर कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में जब कभी पुलिस या बलों को निरंकुश अधिकार दिए गए तो कई ज्यादती की खबरें भी सामने आईं। आज सवाल उठाने पर पुलिस का मनोबल नीचा गिरने की बात करने वाले, रेड लाईट जंप करने पर पुलिस द्वारा पकड़े जाने पर जुर्माना देने के बनिस्बत सिफारिशें करवाते दिखते हैं। वे सड़क पर थूकते हैं, घर का कचरा लापरवाही से फेंकते हैं, कर चेारी करते हैं, वे सार्वजनिक स्थान पर तंबाकू का इस्तेमाल करते हैं, वे सुविधा शुल्क लेते व देते हें, लेकिन राष्ट्रवाद को अपनी गालियों में लपेट कर किसी को भी चोटिल करने में शर्म महसूस नहीं करते।
इस तरह की प्रवृति असल में अभिव्यक्ति की आजादी के मूलभूत अधिकार ही नहीं, लोकतंत्र की आतमा ‘प्रतिरोध’ की भी बेइज्जती है। सवाल उठाना एक स्वस्थ समाज की पहचान है और जवाब देना एक समर्थ सरकार की काबिलियत। असहमति पर सहमत होना एक अच्छे नागरिक का गुण है व असहमति को तर्क के साथ स्वीकार करना प्रजातंत्र का गहना। सावधान सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आजादी का जो खेल चल रहा है वह कहीं बहुत कुछ छिन्न-भिन्न ना कर दे। अभी तो आपने कुछ दोस्त ही खोए है अपने उजड्ड व्यवहार से कहीं, खुद को भी ना खो देना।

गुरुवार, 3 नवंबर 2016

Disagree can not be forced to keep quit with slangs

समय के सवालों पर अप्रिय तल्खी

Posted On November - 3 - 2016
पंकज चतुर्वेदी
सोशल मीडिया खासकर फेसबुक पर अपशब्द कहना, किसी की निष्ठा पर शक करना, किसी की जाति-समाज को एक बार में ही नकार देना, एक ऐसी समस्या बनती जा रही है जो इसे ‘सोशल’ नहीं रहने देगी। जान लें कि असहमति, प्रतिरोध और प्रश्न लोकतंत्रात्मक व्यवस्था के अभिन्न अंग हैं और इसके बगैर लोकतंत्र का स्वरूप, सद्दाम हुसैन के इराक या मौजूदा चीन से ज्यादा नहीं होता। भारत में सत्ता परिवर्तन महज वोट के माध्यम से, इतनी शांति व सहजता से इसीलिए होते रहे हैं कि यहां सवाल करने का हक सभी को है, लेकिन जब यही सवाल मां-बहन के लिए अपमानजनक बनने लगे, देश के प्रति निष्ठा को ही संदिग्ध करार देने का जरिया बन जाएं तो एकबारगी सोचना पड़ता है कि भारत में गालियां व असहमति पर इतने कटु स्वर पहले से ही थे या फिर सोशल मीडिया की आमदरफ्त ने नए वर्ग को तैयार किया है।
सनद रहे कि विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक व व्यापारिक घरानों के अपने सोशल मीडिया एकांश व वहां बैठे वेतनभोगी लोग अब एक हकीकत हैं, लेकिन कई ऐसे लोग जिन्हें हम जान-परख कर इस आभासी दुनिया में अपना मित्र बनाते हैं। वे भोपाल के हादसे या फिर सर्जिकल स्ट्राइक या ऐसे ही किसी मसले पर तर्क, बुद्धि और विवेक से परहेज रखकर ऐसी भाषा व अप्रामाणिक बाते करते हैं कि लोकतंत्र का मूल मंत्र ‘सवाल करने का हक’ खतरे में दिखने लगता है। ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अपने विचारों का तालिबानीकरण कर चुके हैं व संवाद या मध्य-मार्ग की उनके शब्दों में कोई जगह होती नहीं है।
भोपाल में हुई मुठभेड़ के बाद कई ऐसे स्वर सुनने को मिले कि यदि पुलिस ने उन्हें फर्जी मुठभेड़ में मारा तो भी बधाई, उन्होंने सफाई की। पूरा इलेक्ट्रानिक मीडिया, गैरकानूनी तरीके से फरार युवकों को आतंकवादी कहता रहा, जबकि नियमानुसार उनके आगे कथित या मुजरिम शब्द होना था। इसका कई सौ गुणा असर सोशल मीडिया पर था, यहां स्वयं न्यायाधीश, स्वयं वकील और स्वयं जल्लाद की पूरी राजनीतिक विचारधारा कब्जा जमाए थी और जिस किसी ने मुठभेड़ पर सवाल उठाए उन्हें पाकिस्तानी या ऐसे ही लफ्जों से नवाजा जाने लगा। नि:संदेह जेल-प्रहरी रमाशंकर यादव की हत्या बेहद दुखद है व उसके हत्यारे मौत के पात्र हैं, लेकिन यह भी जान लें कि शहीद यादव की मौत का असली जिम्मेदार था कौन? असल में उसकी मौत का असली कारण जेल-तंत्र का भ्रष्टाचार था। 56 वर्षीय रमाशंकर यादव की बायपास सर्जरी हो चुकी थी और वे कई महीनों से जेल प्रशासन को अपनी रात की ड्यूटी बदलने को कह रहे थे। चूंकि दिन की ड्यूटी कमाई वाली होती है सो उस पर बड़ी चढ़त चढ़ाने वाले को ही उसमें दर्ज किया जाता रहा। इतने खूंखार बंदी जिस जेल में हों, जिसके बारे में पता था कि इनमें से तीन पहले भी जेल से भाग चुके हैं, बगैर शस्त्र के रक्षक को ड्यूटी पर लगाया गया। ऐसे सवाल कोई उठाता है तो उसे गाली देने वाले लोग तर्क के बनिस्बत पूरी तरह राजनीतिक, वह भी कुत्सित के, मोहरे बन जाते हैं।
विडंबना यह है कि तार्किक बात करने की जगह खुद के अलावा सभी को देशद्रोही करार देने वाले सोशल मीडिया पर एक गिरोह के रूप में होते हैं व मौका पाते है असहमति के स्वर को निर्ममता से दबाते हैं। यह भी सही है कि उनको भी सवालों से असहमति का हक है, जैसे कि सवाल उठाने वाले को, लेकिन परिचर्चा में किसी की नस्ल या मां-बाप पर संदेह करना, उसकी बहन के साथ अपने रिश्ते बलात जोड़ना, इसका तरीका तो नहीं है। यह समझना जरूरी है कि सेना हो या पुलिस, भारत में वह लोकतंत्रात्मक सत्ता के अधीन है और सत्ता जनता के प्रति जवाबदेह। यदि देश की बड़ी आबादी को भोपाल में मुठभेड़ पर संशय है तो तथ्य व प्रमाण के साथ खुलासा करने में क्या बुराई है, बनिस्बत इसके कि सवाल खड़े करने वाले को ही कोसा जाए। हमने देखा है कि आपातकाल या उसके बाद पंजाब में या फिर कुछ पूर्वोत्तर राज्यों में जब कभी पुलिस या बलों को निरंकुश अधिकार दिए गए तो कई ज्यादती की खबरें भी सामने आईं। आज सवाल उठाने पर पुलिस का मनेाबल नीचा गिरने की बात करने वाले, रेड लाइट जंप करने पर पुलिस द्वारा पकड़ंे जाने पर जुर्माना देने के बनिस्बत सिफारिशें करवाते दिखते हैं। वे सड़क पर थूकते हैं, घर का कचरा लापरवाही से फेंकते हैं, कर चेारी करते हैं, वे सार्वजनिक स्थान पर तंबाकू का इस्तेमाल करते हैं, वे सुविधा शुल्क लेते व देते हें, लेकिन राष्ट्रवाद को अपनी गालियों में लपेट कर किसी को भी चोटिल करने में शर्म महसूस नहीं करते।
इस तरह की प्रवृत्ति असल में अभिव्यक्ति की आजादी के मूलभूत अधिकार ही नहीं, लोकतंत्र की आत्मा ‘प्रतिरोध’ की भी बेइज्जती है। सवाल उठाना एक स्वस्थ समाज की पहचान है और जवाब देने एक समर्थ सरकार की काबिलियत। असहमति पर सहमत होना एक अच्छे नागरिक का गुण है व असहमति को तर्क के साथ स्वीकार करना प्रजातंत्र का गहना।

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सल्फास : कीटनाशक या मनुष्यनाशक

 

पंकज चतुर्वेदी,
एक सेवानिवृत फौजी ने भावनाओं में बह कर या फिर जल्दबाजी में एक निराशाजनक फैसला किया और दिल्ली में इंडिया गेट के पास आत्महत्या कर ली। उसने अपने बेटे को फोन पर बताया उन्होंने सल्फास की तीन गोलियां खाई हैं। पूरे देश में आए रोज किसानों द्वारा आत्महत्या करने की घटनाओं में अधिकांश का माध्यम यही सल्फास होता है। वैसे ‘एल्यूमिनीयम फास्फाइड पेस्टीसाइड एक्ट 1968’ के तहत ‘सल्फास’ की बिक्री का अधिकार केवल सरकारी या अर्ध सरकारी संस्थाओं को ही है। यह बात दीगर है कि यह कीटनाशक प्रदेश के किसी भी कस्बे में सहजता से सस्ते में खरीदा जा सकता है।
एल्यूमिनीयम फास्फाइड एक ऐसा कीटनाशक है, जो गोदामों में रखे अनाज को चूहों, कीड़े-मकोड़ों से बचाने का एकमात्र उपाय माना जाता है। आम बोलचाल की भाषा में उस जहर का नाम ‘सल्फास’ पड़ गया है। लोकप्रिय सल्फास एक्सेल इंडस्ट्रीज लिमिटेड, जोगेश्वरी, मुंबई का उत्पादन है। यूनाइटेड फास्फोरस लिमिटेड, वापी (गुजरात) का ‘क्यूकफास’ भी इसी तरह का है। ऐसा ही एक अन्य उत्पाद सल्फ्यूम है। इन सभी कीटनाशकों में 56 फीसदी एल्यूमिनीयम फास्फाइड और 44 फीसदी एल्यूमिनीयम कार्बोनेट होता है। ये सभी दवाइयां (?) बाजार में सल्फास के नाम से ही बिकती हैं। इनके 10, 30 और 100 गोलियों के पैक मिलते हैं। एक गोली का वजन तीन ग्राम होता है। स्वस्थ व्यक्ति की सुनिश्चित मौत के लिए इसकी एक गोली ही काफी होती है।
एल्यूमिनीयम फास्फाइड हवा में मौजूद आक्सीजन के संपर्क में आ कर जानलेवा ‘फास्जीन’ गैस उत्पन्न करता है। यह गैस यदि किसी भी जीवधारी के रक्त में मिल जाए तो शरीर का लीवर, गुर्दा और दिल बुरी तरह प्रभावित हो जाता है। इंसान की भारी उलटियों, दस्त के कारण मौत हो जाती है। इस कीटनाशक के व्यापक दुरूपयोग के मद्देनज़र सरकार ने इसकी बिक्री पर कई वर्षों पहले पाबंदी लगा दी थी। 1977 से इसकी बिक्री के लाइसेंस ही जारी नहीं हुए है। इसके बावजूद भारत में होने वाली कुल आत्महत्याओं में से एक-तिहाई का साधन यही ‘सल्फास’ है।
सल्फास को बाजार में बेचना गैर कानूनी है। सिर्फ रसद विभाग, वेयर हाउस जैसे महकमों में इसकी सरकारी खरीद की ही अनुमति है। परंतु कृषि उत्पाद बेचने वाली हर दुकान पर इसे आसानी से खरीदा जा सकता है। आम आदमी की पहुंच में सस्ते में उपलब्ध आत्महत्या के साधनों में ‘सल्फास’ सबसे शर्तिया नुस्खा है। बाजार में बिकने वाले सल्फास के पैकेट पर लिखा होता है कि इसका सेवन कर चुके व्यक्ति को पोटेशियम परमेगनेट से गरारे और नसों के जरिए हाइड्रोजन ग्लुकोज देना चाहिए। यह इलाज 10 मिनट के भीतर होना जरूरी है। चूंकि सल्फास खाने वाले व्यक्ति को पहचानना, उसे डॉक्टर तक ले जाना आदि 10 मिनट में संभव नहीं है, सो, बिरले ही ऐसे मामले होते हैं जिनमें किसी की जान बची हो।
इस जानलेवा सल्फास की बिक्री पर कागजी रोक से आम किसान भी खुश नहीं है। किसान का कहना है कि जब बंदूक से हत्याएं होती हैं तो सरकार उसके उत्पादन पर तो रोक नहीं लगाती है। तब उनके कृषि उत्पादों को नष्ट होने से बचाने वाली दवा को ‘आत्महत्या’ का साधन करार दे कर रोक लगाना कहीं तक उचित है। खेतों में बिल बना कर चूहे लाखों टन अनाज चट कर जाते हैं, इसका एकमात्र इलाज सल्फास ही है।
भारत में ‘सल्फास’ पर पाबंदी ‘इनसेक्टीसाइड एक्ट’ के तहत लगी है। यह असंज्ञेय व अहस्तक्षेपणीय अपराध है। यानि पुलिस को सल्फास विक्रेताओं के खिलाफ मामला दर्ज करने या तफ्तीश करने का कतई अधिकार नहीं है। इस तरह के प्रकरण सिर्फ ‘ कीटनाशक इंस्पेक्टर’ ही दर्ज कर सकते हैं। मगर मध्यप्रदेश में कृषि विभाग के पास ऐसे अधिकारी की नियुक्ति का प्रावधान ही नहीं है। वैसे किसी भी प्रतिबंधित वस्तु की बिक्री करना ‘आवश्यक वस्तु अधिनियम’ के तहत दंडनीय अपराध है। रसद या मापतौल विभाग इस पर कार्यवाही करे तो विक्रेता को छह महीने की कैद या दो हजार रूपए जुर्माना हो सकता है। चूंकि ये दवाएं खुले बाजार में बिक्री के लिए होती नहीं हैं, सो इन पर ईसी एक्ट 1977 के तहत पैकेटों पर कर सहित कीमत आदि कई जरूरी सूचनाएं होती ही नहीं हैं। इसे 15 से 20 रूपए प्रति 10 गोली पैकेट की दर से बेचा जाता है । इसका कोई बिल-वाउचर नहीं दिया जाता है। यानि पूरी तरह अवैध रूप से बिक रही ये दवा शासन के कई कायदे-कानूनों को तोड़ रही है।
पूरे देश में आज तक इस गैर कानूनी तिजारत पर एक भी वैधानिक कार्यवाही नहीं हुई है। हमारे नीति निर्धासक यह जानते हैं कि किसानों के पास सल्फास का कोई विकल्प नहीं है। तब इसकी बिक्री की प्रक्रिया में सुधार करना अधिक जरूरी है। सल्फास की बिक्री का कोटा जारी करना, इसके साथ इसकी ‘एंटी डोज’ को बेचना, इसके दुरूपयोग से बचाव कर सकते हैं। यदि इन गोलियों को जालीदार ऐसी कठोर डिब्बियों में बेचा जाए, जिनसे गोली का निकलना संभव ना हो तो खुदकुशी करने वालो से इसे बचाया जा सकता है। चूंकि गोली की गैस ही कारगर कीटनाशक होती है, जालीदार डिब्बी से गैस तो निकलेगी गोली नहीं।
कुछ साल पहले भारत सरकार के कृषि मंत्रालय ने एल्यूमिनीयम फास्फाइड के गलत इस्तेमाल को रोकने और उस पर नियंत्रण के लिए एक समिति का गठन किया था। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट 1993 में ही मंत्रालय को सौंप दी थी। इतने साल बीत गए हैं, लेकिन सरकार ने उस रिपोर्ट पर चढ़ गई धूल को झाड़ने की भी सुध नहीं ली है।
पाबंदी के बावजूद सल्फास खा कर मरने वालों की संख्या में बढ़ोतरी होना और इस दवा के अभाव में खेती का भारी नुकसान होना, दोनों ही परस्पर विरोधी व विचारणीय सवाल हैं। जाहिर है कि इस पर पाबंदी महज एक रद्दी टुकड़ा मात्र हैं। अतः जरूरी है कि किसानों के हित में इसकी बिक्री पर कोई नई नीति तैयार की जाए।

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सुसाइड, सेना और सियासत

 
पूर्व सैनिक रामकिशन ने रक्षा मंत्री से मिलने का प्रयास किया लेकिन उनकी कोठी पर तैनात दरबानों ने पहले से अप्वाइंटमेंट ना होने की बात कर उन्हें टरका दिया। उसके बाद वे इतने भावुक हुए कि सल्फास की तीन गोलियां खा लीं। उन्हें अस्पताल ले जाया गया और उनका देहावसान हो गया। उसके बाद जो सियासत हुई, सामने है।
67 साल के रामकिशन सिंह ग्रेवाल ने कोई 28 साल फौज में नौकरी की। सन 2004 में जब वे सुबेदार के पद से रिटायर हो कर गांव पहुंचे तो उनका उत्साह व हिम्मत कम नहीं थी। वे हरियाणा में भिवानी जिले के अपने गांव बामना के सरपंच बने और स्वच्छता के लिए इतना काम किया कि सन 2008 में तत्कालीन राष्ट्रपति के हाथों उन्हें ‘निर्मल ग्राम पुरस्कार’ भी मिला। शहीद ग्रेवाल सरपंच के काम को दिल से करते थे और गांव की सफाई को पावनकाम समझते थे। जब एक रैंक -एक पेंशन का संघर्ष शुरू हुआ तो व उसमें भी आगे बढ़ कर लड़े। वे इस मसामले में सरकारों के वायदों और आदेशों से इतने व्यथित थे कि दीपावली के अगले दिन नहीं अपने कुछ साथियों के साथ धरना देने पहुंच गए। कहा जाता है कि उन्होंने रक्षा मंत्री से मिलने का प्रयास किया लेकिन उनकी कोठी पर तैनात दरबानों ने पहले से अप्वाइंटमेंट ना होने की बात कर उन्हें टरका दिया। उसके बाद वे इतने भावुक हुए कि सल्फास की तीन गोलियां खा लीं। अपनी अंतिम सांस तक अपने बेटे को फोन पर बात करते रहे। जब तक उनके साथ आए लोगों को सुबेदार ग्रेवाल के इस भावुक निर्णय की जानकारी मिली, देर हो चुकी थी, उन्हें अस्पताल ले जाया गया और उनका देहावसान हो गया। उसके बाद जो सियासत हुई, सामने है। पूर्व सेना प्रमुख वीके सिंह ने सही ही कहा कि शहीद ग्रेवाल की मानसिक स्थिति की जांच होना चाहिए। सही है इस देश में किसान, जवान, बेरोजगार, आदिवासी या जो कोई भी अन्याय के खिलाफ आवाज उठाए, पागल ही होता है। शहीद ग्रेवाल का पागलपन ही था कि 28 साल सीमा पर तैनात रहने के बाद भी अपने गांव को संवारने में लग गए थे।
ओआरओपी पर पिछले दिनों राहुल गांधी ने एक पत्र प्रधानमंत्री को भी लिखा था, लेकिन श्री ग्रेवाल के दिवंगत होने के बाद दिल्ली की सड़कों पर जो तमाशे हुए, वे उनकी जायज मांगों के समर्थन में हो गए होते तो शायद आज यह दिन देखना नहीं पड़ता। ओआरओपी की मांग कोई चार दशक की है। पेंशन में असमानता कम करने के लिए यूपीए के दोनों चरणों में पेंशन में बढोत्तरी भी की गई थी। यह भी सही है कि यूपीए ने अपने अंतिम बजट में पांच सौ करोड़ का प्रावधान ओआरओपी के लिए रखा था, हालांकि यह राशि मांग की तुलना में बहुत कम थी। फिर केंद्र की नई सरकार ने अपने प्रमुख चुनावी वायदे के मुताबिक ओआरओपी की घोषणा भी कर दी। विडंबना थी कि सैनिकों का बड़ा वर्ग चार बिंदुओं को ले कर घोषणा से नाखुश था। एक तो भाजपा सांसद भगत सिंह कोश्यारी कमेटी की सिफारिशों को ही लागू नहीं किया गया है। इनका मानना है सरकार जिस ओआरओपी की बात कर रही है वह अधूरी है, जिसे वे नहीं मानेंगे। उन्होंने सरकार को लगातार पत्र लिखे हैं, लेकिन अभी तक किसी का जवाब नहीं आया। इससे निराश होकर चंडीगढ़ आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल में याचिकाएं दायर कर दी गई हैं। हाल में विदेश राज्य मंत्री वीके सिंह ने बताया था कि ओआरओपी का करीब 95 प्रतिशत भुगतान किया जा चुका है। प्रश्न उठता है कि फिर कहां कमी रह गई है कि इन सैनिकों को आंदोलन जारी रखने और याचिकाएं दायर करने के लिए मजबूर होना पड़ा। दोनों पक्षों में समन्वय की कहां कमी रह गई है ?
यह मांग कुछ महीनों की नहीं, बल्कि चार दशकों से की जा रही है। पिछले साल मोदी सरकार ने इसे लागू करने के न्यायिक समिति गठित की थी। पटना हाईकोर्ट के रिटायर्ड चीफ जस्टिस एल नरसिम्हा रेड्डी को इसका अध्यक्ष बनाया था।
गौर करना होगा कि यह व्यवस्था अंग्रेजों के समय से चली आ रही है। पूर्व सैनिकों की पेंशन वेतन की करीब 80 प्रतिशत होती थी जबकि सामान्य सरकारी कर्मचारी की 33 प्रतिशत हुआ करती थी। भारत सरकार ने इसे सही नहीं माना। वर्ष 1957 के बाद से पूर्व सैनिकों की पेंशन कम कर दी गई और अन्य क्षेत्रों की पेंशन बढ़ती रही। देखा जाए तो पूर्व सैनिकों की पेंशन की तुलना सामान्य सरकारी कर्मचारियों से नहीं की जा सकती। सामान्य सरकारी कर्मचारी को 60 साल तक वेतन लेने की सुविधा मिलती है, वहीं सैनिकों को 33 साल में ही रिटायर होना पड़ता है। उनकी सर्विस के हालात भी अधिक कठिन होते हैं। पूर्व सैनिक चाहते हैं कि 1 अप्रैल 2014 से ये योजना छठे वेतन आयोग की सिफरिशों के साथ लागू हो। यदि असली संतुलन लाना है तो उन्हें भी 60 साल की आयु में रिटायर किया जाए। वे 33 साल में ही रिटायर होने के बाद सारा जीवन केवल पेंशन से ही गुजारते हैं। ऐसे में उनकी पेंशन के प्रतिशत को कम नहीं करना चाहिए।
इन सैनिकों की परेशानी यह है कि 1 जनवरी 1973 से पहले जवानों और जेसीओ को वेतन का 70 फीसदी पेंशन के रूप में मिलता था। उस समय सिविल अधिकारियों के वेतन की 30 फीसदी पेंशन मिलती थी। इसे बाद में 50 फीसदी कर दिया गया, जबकि फौज के जवानों की पेंशन वेतन के 70 फीसदी से घटाकर 50 फीसदी कर दी गई। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि उसने यह कदम क्यों उठाया? इन सैनिकों का कहना है कि 1973 के बाद सशस्त्र सेनाओं पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया। सरकार को बताना चाहिए कि वह क्या कर रही है।
रक्षा मंत्रालय की वन रैंक वन पेंशन योजना को चंडीगढ़ आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल (एएफटी) में चुनौती दी गई है। एक ही दिन में ओआरओपी के खिलाफ कुल आठ याचिकाएं दायर हुईं। मामले की सुनवाई कर रही बेंच ने रक्षा मंत्रालय को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। केंद्र सरकार की ओर से नोटिफिकेशन जारी होने के बाद यह पहली बार हुआ है जब किसी ट्रिब्यूनल में वन रैंक वन पेंशन को चुनौती दी गई हो। इससे जाहिर होता है कि कहीं न कहीं कमी छूट गई थी जिससे पूर्व सैनिक असंतुष्ट हैं। इनमें से कई पेंशनरों की उम्र करीब 80 से 90 की साल है। उम्र के इस पड़ाव में ये परेशानी के जिस दौर से गुजर रहे हैं उसे समझा जाना चाहिए।
ध्यान देना होगा कि यूपीए सरकार ने फरवरी 2014 में वन रैंक-वन पेंशन योजना की घोषणा की थी। अंतरिम बजट में इसके लिए 500 करोड़ रुपए का प्रावधान भी किया था। इसके बाद लोकसभा चुनाव में वह सत्ता से बाहर हो गई। नरेंद्र मोदी ने भी सितंबर 2013 में अपनी एक रैली में वादा किया था कि अगर उनकी पार्टी की सरकार बनी तो इस योजना पर तुरंत अमल होगा। एनडीए सरकार का जुलाई 2014 में पहला बजट आया। इसमें 1000 करोड़ रुपए इस योजना के लिए रखे गए।
उधर दिवंगत सुबेदार ग्रेवाल के मसले में यह भी बात सामने आ रही है कि उनका मामला बैंक द्वारा गलत गणना करने से कोई छह हजार रूपए कम पेंशन का था, लेकिन यह भी सच है कि उनका अंतिम संदेश उनकी अपनी पेंशन को ले कर नहीं, बल्कि पूरे सैनिक वर्ग के साथ हो रही असमानता को ले कर था।
आज जो भी राजनीतिक दल इस पर राजनीति कर रहे हैं उन्हें सोचना होगा कि क्या किसी की मौत के बाद ही चेतना क्या सही सियासत है ? काश ग्रेवाल के जिंदा रहते उनकी आवाज को व्यापक राजनीतिक समर्थन ही मिला होता तो एक जीवट वाला इंसान हताश हो कर ऐसा कदम नहीं उठाता । यह जान लें कि हमारी सेना को लगातार राजनीति में घसीटा जा रहा है और यह स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए अच्छे लक्षण नहीं हैं।

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