तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

रविवार, 29 जनवरी 2017

how to get rid of corruption

हमारा पीछा क्यों नहीं छोड़ता भ्रष्टाचार  ?
                                                                                                                  पंकज चतुर्वेदी
जब लोकपाल के लिए आंदोलन होता है तो लाखों लोग सड़क पर होते हैं , हमारे यहां सूचना का अधिकार जैसा ताकतवर कानून है, सौ दिन से ज्यादा दिक्कत में रह कर भी मुल्क का आम आदमी नोटबंदी को समर्थन देता है, हमारी अदालतों में बड़े से बड़े नेता व अफसर आचरण में शक  होने के कारण कटघरे में खड़े हैं, इसके बावजूद आम आदमी ही नहीं अंतरराष्ट्रीय  भी चेतावनी दे रही हैं कि भ्रष्टाचार और पारदर्षिता के मामले में भारत के हालात चिंताजनक हैं। वैसे पिछले बार की तमुलना में हालात दो  पाइंट सुधरे हें लेकिन अभी भी हमारी गिनती ‘लाल रेखा’ में होती है। जर्मनी के बर्लिन स्थित भ्रष्टाचार आकलन एवं निगरानी संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल (टीआई) द्वारा जारी सूची में भ्रष्टाचार के मामले में दुनिया के कुल 176 देशों में भारत का स्थान 79वां है। हालांकि अपने देष की व्यवस्थ को गरियाने से पहले कुछ आंकड़ों पर गौर करना होगा। रिपोर्ट के अनुसार न्यूजीलैंड और डेनमार्क को सबसे कम भ्रष्टाचार वाला देश बताया गया है। सर्वेक्षण में इन देशों को 90 अंक मिले हैं, जबकि सोमालिया को सबसे भ्रष्ट देश बताया गया है और उसे केवल 10 अंक मिले हैं।‘करप्शन परसेप्शन इंडेक्स-2016’ में भारत और चीन को भ्रष्टाचार के मामले में एक साथ 79वें स्थान पर रखा गया है। टीआई के सर्वेक्षण में दोनों देशों ने 40-40 अंक हासिल किये हैं।
टीआई का मानना है कि भारत के स्वच्छता एवं पारदर्शिता अनुमान में दो अंकों की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन भ्रष्टाचार रैंकिंग में यह तीन स्थान नीचे चला गया है। पिछले साल ‘करप्शन परसेप्शन इंडेक्स-2015’ में भारत 38 अंकों के साथ 76वें स्थान पर था जबकि इस साल यह 40 अंकों के साथ 79वें स्थान पर है। यहां यह भी ध्यान देना होगा कि ‘लाल रेखा’ वाले सभी देष हमारे अंतरराश्ट्रीय ताकतवर सहयोगी संगठन ‘ब्रिक्स’ से ही हैं - चीन, ब्राजील भारत। यह भी ध्यान दें कि इस सूची में हमारे सभी पड़ेसी देष - बांग्लादेष(27),नेपाल(29), पाकिस्तान(32) और अफगानिस्तान (15) अंकों के साथ भ्रश्टतम देषों में दर्ज हैं। सबसे ज्यादा भ्रश्अ देष आतंकवाद व भुखमरी से ग्रस्त देष सोमालिया को कहा गया है जिसके अंक हैं - 10। यदि इन आंकड़ों का आकलन करें तो पाएंगे कि पिछड़ापन, विकासषीलता और लोकतंत्र के सूराख वाले देषों में पारदर्षिता की कमी है व वहां भ्रश्टाचार स्वाभाविक रूप से विकसित हो रहा है।
भारत के परिपेक्ष्य में इन आंकड़ों को देखें तो हाल ही के निर्वाचन आयोग के उस खुलासे से तस्वीर साफ हो जाती है जिसमें राजनीतिक दलों की चंदा प्रणाली व व्यय में पारदर्षिता ना होने की बात कही गई है। बकौल मुख्य चुनाव आयुक्त इस समय भारतीय निर्वाचन आयोग में 1900 से ज्यादा राजनीतिक दल नामांकित हैं लेकिन इनमें से 400 से अधिक दल आज तक कोई चुनाव नहीं लड़ा।  आयोग ने आशंका जताई है कि ऐसे दलों को बनाने का असली मकसद  कालेधन को सफेद करना होता है। उल्लेखनीय है कि पंजीकृत राजनीतिक दलों को चंदा लेने, आयकर से छूट जैसी कई सुविधांए मिली हुई हैं। यह भी जान लें कि केवल चुनाव ना लड़ने वाले 400 दल ही इस खेल में खलनायक नहीं हैं, कई ऐसे भी दल हैं जो नाम के लिए चुनाव लड़ते हैं व गंभीरता से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए तय सीमा से अधिक खर्च में भागीदार होते हैं। यही नहीं बहुत से वोट कटवा दल लोकतंत्र को इतना कमजोर कर रहे हैं कि अब कुल मतदाता के 14-15 फीसदी वोट ले कर भी लेाग मानननीय बन रहे हैं नतजतन उन्हें जनता का व्यापक समर्थन मिलता नहीं है। और ना ही वे जनभावनाओं की कदर करते हैं। हालांकि चुनाव आयोग ने ऐसे दलों को छांट कर उन पर कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी है। जैदी ने कहा, “इन दलों का नाम रद्द  किए जाने के बाद उन्हें राजनीतिक दल के तौर पर मिलने वाले दान या आर्थिक मदद पर आयकर से मिलने वाली छूट बंद हो जाएगी। ”
हालांकि चुनाव आयोग अब कुछ दलों से उनकी आय-व्यय का ब्यौरा मांग रहा है ताकि उनकी मान्यता रद्द करने की प्रक्रिया ष्ुारू की जा सके, लेकिन जान लें  कि यह सबकुछ इतना आसान नहीं होगा। चुनाव आयोग ने राज्य चुनाव आयोग से कभी चुनाव न लड़ने वाली पार्टियों को मिले चंदे का भी ब्योरा मांगा है। जैदी के अनुसार चुनाव आयोग अब हर साल सभी पंजीकृत राजनीतिक दलों की जांच की जाएगी और किसी तरह की अनियमितता पाए जाने पर उन पर कार्रवाई की जाएगी। भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम जैदी ने देष के राजनीतिक दलों के  काला धन में लबालब होने की जो बात कही, यह पहली बार नहीं है। इससे पहले सन 2011 में भी एस.वाय. कुरेषी के काल में इस पर गंभीर कदम उठाने के सुझाव दिए गए थे, लेकिन किसी की भी इच्छा षक्ति  चुनाव प्रक्रिया में षुचिता की नहीं रही है।
लोकतंत्र में पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिए राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत लाने और उन्हें मिलने वाले चंदे पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं लेकिन इस मसले पर ज्यादातर राजनीतिक पार्टियां एकमत हैं। इस मसले पर एक आरटीआई पर सुनवाई करते हुए जब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की वर्तमान सरकार की राय जाननी चाही थी तो सरकार ने राजनीतिक पार्टियों को आरटीआई के तहत लाने का विरोध किया था। सरकार ने कहा था कि “अगर राजनीतिक पार्टियों को आरटीआई के तहत लाया गया तो इससे उनके सुचारू कामकाज में अड़चन आएगी।” एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक (एडीआर) रिफॉर्म्स के साल 2013-14 के आंकड़ों के अनुसार देश की छह राष्ट्रीय पार्टियों की कुल आय का 69.3 प्रतिशत “अज्ञात स्रोत” से आया था। एडीआर के आंकड़ों के अनुसार साल 2013-14 में छह राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के पास कुल 1518.50 करोड़ रुपये थे। राजनीतिक दलों में सबसे अधिक पैसा बीजेपी (44ः) के पास था। वहीं कांग्रेस (39.4ः), सीपीआई(एम) (8ः), बीएसपी (4.4ः) और सीपीआई (0.2ः  ) का स्थान था। सभी राजनीतिक दलों की कुल आय का 69.30 प्रतिशत अज्ञात स्रोतों से आया था। राजनीतिक पार्टियों को अपने आयकर रिटर्न में 20 हजार रुपये से कम चंदे का स्रोत नहीं बताना होता। पार्टी की बैठकों-मोर्चों से हुई आय भी इसी श्रेणी में आती है। साल 2013-14 तक सभी छह राष्ट्रीय पार्टियों की कुल आय में 813.6 करोड़ रुपये अज्ञात लोगों से मिले दान था। वहीं इन पार्टियों को पार्टी के कूपन बेचकर 485.8 करोड़ रुपये की आय हुई थी।  साल 2013-14 में कांग्रेस की कुल आय का 80.6 प्रतिशत और बीजेपी की कुल आय का 67.5 प्रतिशत अज्ञात स्रोतों से आया था।
चुनाव आयोग में इस समय पंजीकृत राजनीतिक दलों की संख्या 1866 है जिसमें 56 मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय दल हैं जबकि शेष गैर मान्यता प्राप्त पंजीकृत दल थे।  पिछले लोकसभा चुनाव 2014 के दौरान464 राजनीतिक दलों ने उम्मीदवार खड़े किये थे। चुनाव आयोग द्वारा एकत्र आंकड़ों को संसद में उपयोग के लिए विधि मंत्रालय के साथ साझा किया गया था। मंत्रालय का विधायी विभाग आयोग की प्रशासनिक इकाई है।  चुनाव आयोग के अनुसार 10 मार्च 2014 तक देश में ऐसे राजनीतिक दलों की संख्या 1593 थी। 11 मार्च से 21 मार्च के बीच 24 और दल पंजीकृत हुए और 26 मार्च तक 10 और दल पंजीकतृ हुए। पिछले वर्ष मार्च के अंत तक चुनाव आयोग में पंजीकृत राजनीतिक दलों की संख्या 1627 दर्ज की गई।  आज यह 1800 से पार हो गई। यह चौंकाने वाली बात आयोग की  छानबीन में उजागर हुई कि कुछ दल चंदे से उगाहे पैेसे को शेयर बाजार में लगा देते हैं व  एवं कुछ गहने खरीद लेते हैं। राजनीतिक दल कों के गठन पर कड़ाई करने या उनको मिलने वाले चंदे पर छूट हटाने जैसे मसलों के विरोध में भी कई बातें  कही जाती हैं। हालांकि सन 2011 में भी आयोग ने कुछ और सिफारिशें की थीं-. मसलन, राजनीतिक दलों को अपने खातों की नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक या आयोग की ओर से अधिकृत लेखाकार से अपने एकाउंट का अंकेक्षण करवाएं ,खातों का सालाना लेखा-जोखा प्रकाशित करें आदि। सिफारिष यह भी थी के इन बातों को ना मानने वाले दल की मान्यता रद्द कर दी जाए।
यह बानगी है कि जब लोकतंत्र का आधार कहलाने वाले राजनीतिक दल औद्योगिक घरानों, संदिग्ध चरित्र के लोगों और अवैध कार्य में लगे लोगों का सहयोग ले कर चुनाव लड़ते हैं तो सत्ता आने के बाद ऐसे लोगों के हितों का ख्याल रखने का दवाब भी उन पर होता है। कहने की जरूरत नहीं कि ऐसी अवैध कमाई का बड़ा हिस्सा रियल इस्टेट, ठेकों, भाई-भतीजावाद, सोना व हीरा जैसे कीमती पदार्थों के रूप में समाज में रच-बस जाता है। भले ही दावे कुछ भी होते रहें, लेकिन देष को भ्रश्टाचार से समूल नश्ट करना है तो आगाज राजनीतिक दलों से हीक रना होगा।

शुक्रवार, 27 जनवरी 2017

control on candidature is must for anti corruption drive

बढती उम्मीदवारी से घटता लोकतंत्र

                                                                                                                                           पंकज चतुर्वेदी
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नोट बंदी के बाद काले धन पर मुकम्मल चोट की उम्मीद पाले आम लोगों के लिए भारत के निर्वाचन आयोग ने यह जानकारी भी दे दी कि असल में अवैध धन का मूल राजनीतिक दल हैं नाकि गांव- टोलों का वह आम आदमी जो अपने ही पैसे लेने के लिए एक महीने से लाईनों में लगा है। बकौल मुख्य चुनाव आयुक्त इस समय भारतीय निर्वाचन आयोग में 1900 से ज्यादा राजनीतिक दल नामांकित हैं लेकिन इनमें से 400 से अधिक दल आज तक कोई चुनाव नहीं लड़ा।  आयोग ने आशंका जताई है कि ऐसे दलों को बनाने का असली मकसद  कालेधन को सफेद करना होता है।

उल्लेखनीय है कि पंजीकृत राजनीतिक दलों को चंदा लेने, आयकर से छूट जैसी कई सुविधांए मिली हुई हैं। यह भी जान लें कि केवल चुनाव ना लड़ने वाले 400 दल ही इस खेल में खलनायक नहीं हैं, कई ऐसे भी दल हैं जो नाम के लिए चुनाव लड़ते हैं व गंभीरता से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए तय सीमा से अधिक खर्च में भागीदार होते हैं। यही नहीं बहुत से वोट कटवा दल लोकतंत्र को इतना कमजोर कर रहे हैं कि अब कुल मतदाता के 14-15 फीसदी वोट ले कर भी लेाग मानननीय बन रहे हैं नतजतन उन्हें जनता का व्यापक समर्थन मिलता नहीं है। और ना ही वे जनभवानओं की कदर करते हैं। हालांकि चुनाव आयोग ने ऐसे दलों को छांट कर उन पर कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू कर दी है। जैदी ने कहा, “इन दलों का नाम रद्द  किए जाने के बाद उन्हें राजनीतिक दल के तौर पर मिलने वाले दान या आर्थिक मदद पर आयकर से मिलने वाली छूट बंद हो जाएगी। ”
हालांकि चुनाव आयोग अब कुछ दलों से उनकी आय-व्यय का ब्यौरा मांग रहा है ताकि उनकी मान्यता रद्द करने की प्रक्रिया ष्ुारू की जा सके, लेकिन जान लें  कि यह सबकुछ इतना आसान नहीं होगा। चुनाव आयोग ने राज्य चुनाव आयोग से कभी चुनाव न लड़ने वाली पार्टियों को मिले चंदे का भी ब्योरा मांगा है। जैदी के अनुसार चुनाव आयोग अब हर साल सभी पंजीकृत राजनीतिक दलों की जांच की जाएगी और किसी तरह की अनियमितता पाए जाने पर उन पर कार्रवाई की जाएगी। भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम जैदी ने देष के राजनीतिक दलों के  काला धन में लबालब होने की जो बात कही, यह पहली बार नहीं है। इससे पहले सन 2011 में भी एस.वाय. कुरेषी के काल में इस पर गंभीर कदम उठाने के सुझाव दिए गए थे, लेकिन किसी की भी इच्छा षक्ति  चुनाव प्रक्रिया में षुचिता की नहीं रही है।
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लोकतंत्र में पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिए राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत लाने और उन्हें मिलने वाले चंदे पर पहले भी सवाल उठते रहे हैं लेकिन इस मसले पर ज्यादातर राजनीतिक पार्टियां एकमत हैं। इस मसले पर एक आरटीआई पर सुनवाई करते हुए जब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की वर्तमान सरकार की राय जाननी चाही थी तो सरकार ने राजनीतिक पार्टियों को आरटीआई के तहत लाने का विरोध किया था। सरकार ने कहा था कि “अगर राजनीतिक पार्टियों को आरटीआई के तहत लाया गया तो इससे उनके सुचारू कामकाज में अड़चन आएगी।” एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक (एडीआर) रिफॉम्र्स के साल 2013-14 के आंकड़ों के अनुसार देश की छह राष्ट्रीय पार्टियों की कुल आय का 69.3 प्रतिशत “अज्ञात स्रोत” से आया था। एडीआर के आंकड़ों के अनुसार साल 2013-14 में छह राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के पास कुल 1518.50 करोड़ रुपये थे। राजनीतिक दलों में सबसे अधिक पैसा बीजेपी (44ः) के पास था। वहीं कांग्रेस (39.4ः), सीपीआई(एम) (8ः), बीएसपी (4.4ः) और सीपीआई (0.2ः  ) का स्थान था। सभी राजनीतिक दलों की कुल आय का 69.30 प्रतिशत अज्ञात स्रोतों से आया था। राजनीतिक पार्टियों को अपने आयकर रिटर्न में 20 हजार रुपये से कम चंदे का स्रोत नहीं बताना होता। पार्टी की बैठकों-मोर्चों से हुई आय भी इसी श्रेणी में आती है। साल 2013-14 तक सभी छह राष्ट्रीय पार्टियों की कुल आय में 813.6 करोड़ रुपये अज्ञात लोगों से मिले दान था। वहीं इन पार्टियों को पार्टी के कूपन बेचकर 485.8 करोड़ रुपये की आय हुई थी।  साल 2013-14 में कांग्रेस की कुल आय का 80.6 प्रतिशत और बीजेपी की कुल आय का 67.5 प्रतिशत अज्ञात स्रोतों से आया था।
चुनाव आयोग में इस समय पंजीकृत राजनीतिक दलों की संख्या 1866 है जिसमें 56 मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय दल हैं जबकि शेष गैर मान्यता प्राप्त पंजीकृत दल थे।  पिछले लोकसभा चुनाव 2014 के दौरान464 राजनीतिक दलों ने उम्मीदवार खड़े किये थे। चुनाव आयोग द्वारा एकत्र आंकड़ों को संसद में उपयोग के लिए विधि मंत्रालय के साथ साझा किया गया था। मंत्रालय का विधायी विभाग आयोग की प्रशासनिक इकाई है।  चुनाव आयोग के अनुसार 10 मार्च 2014 तक देश में ऐसे राजनीतिक दलों की संख्या 1593 थी। 11 मार्च से 21 मार्च के बीच 24 और दल पंजीकृत हुए और 26 मार्च तक 10 और दल पंजीकतृ हुए। पिछले वर्ष मार्च के अंत तक चुनाव आयोग में पंजीकृत राजनीतिक दलों की संख्या 1627 दर्ज की गई।  आज यह 1800 से पार हो गई। यह चैंकाने वाली बात आयोग की  छानबीन में उजागर हुई कि कुछ दल चंदे से उगाहे पैेसे को शेयर बाजार में लगा देते हैं व  एवं कुछ गहने खरीद लेते हैं। राजनीतिक दल कों के गठन पर कड़ाई करने या उनको मिलने वाले चंदे पर छूट हटाने जैसे मसलों के विरोध में भी कई बातें  कही जाती हैं। हालांकि सन 2011 में भी आयोग ने कुछ और सिफारिशें की थीं-. मसलन, राजनीतिक दलों को अपने खातों की नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक या आयोग की ओर से अधिकृत लेखाकार से अपने एकाउंट का अंकेक्षण करवाएं ,खातों का सालाना लेखा-जोखा प्रकाशित करें आदि। सिफारिष यह भी थी के इन बातों को ना मानने वाले दल की मान्यता रद्द कर दी जाए।
मामला अकेले काले धन का नहीं है, इसकी बानगी मध्यप्रदेष विधानसभा के पिछले चुनाव के ये आंकड़े हैं - मध्यप्रदेष में 230 सीटों के लिए कोई 57 पार्टियों के 3179 उम्मीदवार मैदान में थे। इनमें 1397 निर्दलीय थे। दलीय उम्मीदवारों की हालत कुछ ऐसी थी- समाजवादी पार्टी , कुल उम्मीदवार 187, जीता-1;बसपा 228 में जीते 7; लोजपा 119 में जीते 0, जनषक्ति 201 में जीते 05। सीट- चंदला, कुल मतदान 56.98, उम्मीदवार 24 और विजेता भाजपा उम्मीदवार को मिले इसके भी महज 20.65 प्रतिषतं । यह है कुल मतदाता का 11.76 प्रतिषत। महाराजपुर- कुल मतदान 65.15 प्रतिषत, उम्मीदवारों की संख्या 20 और विजेता को मिले महज 18.78 प्रतिषत वोट।ये आंकड़े गवाह हैं कि जिसे हम बहुमत की पसंद कह रहे हैं उसे तो कुल मतदाओं के चैथाई तो क्या आठवें हिस्से का भी समर्थन प्राप्त नहीं है। गंभीरता से देखें तो यह कुछ लोगों के लिए यह सत्ता हथियाने का पर्व था, तो कुछ लोगों के लिए किसी को नीचे गिराने का साधन । ऐेसे लोगों की संख्या भी कम नहीं थी जोकि इसे मखौल मान रहे थें, या फिर कतिपय नेताओं के लिए ऐसे औजार बन रहे थे, जो लोकतंत्र की जड़ों पर प्रहार कर उसे कमजोर करने में लगे हैं । कुछ सौ वोट पाने वाले निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या, जमानत राषि बढ़ाने से भले ही कम हो गई हो, लेकिन लोकतंत्र का नया खतरा वे पार्टियां बन रही हैं, जो कि महज राश्ट्रीय दल का दर्जा पाने के लिए तयषुदा वोट पाने के लिए अपने उम्मीदवार हर जगह खड़ा कर रही हैं । ऐसे उम्मीदवारों की संख्या में लगातार बढ़ौतरी से मतदाताओं को अपने पसंद का प्र्रत्याषी चुनने  में बाधा तो महसूस होती ही है, प्रषासनिक  दिक्कतें व व्यय भी बढ़ता है । ऐसे प्रत्याषी चुनावों के दौरान कई गड़बड़ियां और अराजकता फैलाने में भी आगे रहते हैं ।
सैद्धांतिक रूप से यह सभी स्वीकार करते हैं कि ‘‘बेवजह- उम्मीदवारों’’ की बढ़ती संख्या स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बाधक है, इसके बावजूद इन पर पाबंदी के लिए चुनाव सुधारेंा की बात कोई भी राजनैतिक दल नहीं करता है । करे भी क्यों ? आखिर ऐसे अगंभीर उम्मीदवार उनकी ही तो देन होते हैं । जब से चुनाव आयोग ने चुनावी खर्च पर निगरानी के कुछ कड़े कदम उठाए हैं, तब से लगभग सभी पार्टियां कुछ लोगों को निर्दलीय या किसी छोटे दल के नाम से ‘छद्म’ उम्मीदवार खड़ा करती हैं । ये प्राक्सी प्रत्याषी, गाडियों की संख्या, मतदान केंद्र में अपने प्क्ष के अधिक आदमी भीतर बैठाने जैसे कामों में सहायक होते हैं । किसी जाति-धर्म या क्षेत्रविषेश के मतों को किसी के पक्ष में एकजूट में गिरने से रोकने के लिए उसी जाति-संप्रदाय के किसी गुमनाम उम्मीदवार को खड़ा करना आम कूट नीति बन गया है । विरोधी उम्मीदवार के नाम या चुनाव चिन्ह से मिलते-जुलते चिन्ह पर किसी को खड़ा का मतदाता को भ्रमित करने की योजना के तहत भी मतदान- मषीन का आकार बढ़ जाता है । चुनाव में बड़े राजनैतिक दल भले ही मुद्धों पर आधारित चुनाव का दावा करते हों,, लेकिन जमीनी हकीकत तो यह है कि देष के 200 से अधिक चुनाव क्षेत्रों में जीत का फैसला वोट-काटू उम्मीदवारों के कद पर निर्भर है ।
लोकतंत्र में चुनाव लड़ने का हक सभी को है लेकिन जब यह उम्मीदवारी लोकतंत्र की मूल भावना की ही हत्या करने लगे तो उस पर नियंत्रण करना भी अनिवार्य है। अवैध धन, कर की चोरी, चुनाव प्रक्रिया में धन का बढ़ता महत्व जैसी बीमारियों का इलाज करना है तो कम से कम लोकसभा चुनाव में छोटे दलों पर पाबंदी या नियंत्रण पर विचार जरूर होना चाहिए। साथ ही राजनीतिक दलों के चंदे, उसके व्यय का सालाना जाहिरा किया जाना भी अनिवार्य करना चाहिए।

गुरुवार, 26 जनवरी 2017

election reforms for transparent democracy


कैसे निश्चित हो चुनावी शुचिता

पांच राज्यों में विधानसभा के चुनावों की प्रक्रिया शुरू होते ही राजनेताओं की जुबान फिसलने लगी है। चुनाव तो राय की सरकार चुनने के लिए है,लेकिन मसला कभी मंदिर तो कभी आरक्षण, कभी गाय और उससे आगे निजी आरोप। चुनाव के प्रचार अभियान ने साबित कर दिया है कि लाख पाबंदी के बावजूद चुनाव न केवल महंगे हो रहे हैं, बल्कि सियासी दल एक दूसरे के खिलाफ शुचिता के उलाहने देते हुए दिख रहे हैं। असल में, समूचे कुएं में ही भांग घुली हुई है। लोकतंत्र के मूल आधार निर्वाचन की समूची प्रणाली ही अर्थ-प्रधान हो गई है। विडंबना है कि सभी राजनीतिक दल चुनाव सुधार के किसी भी कदम से बचते रहे हैं।
वास्तव में, यह लोकतंत्र के समक्ष नई चुनौतियों की बानगी मात्र थी, यह चरम बिंदू है, जब चुनाव सुधार की बात आर्थिक सुधार के बनिस्पत अधिक प्राथमिकता से करना जरूरी है। जमीनी हकीकत यह है कि कोई भी दल ईमानदारी से चुनाव सुधारों की दिशा में काम नहीं करना चाहता है। देश का मतदाता अभी अपने वोट की कीमत और विभिन्न निर्वाचित संस्थआों के अधिकार व कर्तव्य जानता ही नहीं है। लोकसभा चुनाव में मुहल्ले की नाली और नगरपालिका चुनाव में पाकिस्तान के मुद्दे उठाए जाते हैं। चुनाव से बहुत पहले बड़े-बड़े रणनीतिकार मतदाता सूची का विश्लेषण कर तय कर लेते हैं कि उन्हें अमुक जाति या समाज के वोट चाहिए ही नहीं। यानी जीतने वाला क्षेत्र का नहीं, किसी जाति या धर्म का प्रतिनिधि होता है। यह चुनाव लूटने के हथकंडे इस लिए कारगर हैं, क्योंकि हमारे यहां चाहे एक वोट से जीतो या पांच लाख वोट से, दोनों के ही सदन में अधिकार बराबर होते हैं। यदि राष्ट्रपति चुनावों की तरह किसी संसदीय क्षेत्र के कुल वोट और उसमें से प्राप्त मतों के आधार पर सांसदों की हैसियत सुविधा आदि तय कर दी जाए तो नेता पूरे क्षेत्र के वोट पाने के लिए प्रतिबद्ध होंगे, न कि केवल जाति विशेष के। कैबिनेट मंत्री बनने के लिए या संसद में आवाज उठाने या फिर सुविधाओं को लेकर निर्वाचित प्रतिनिधियों का उनको मिले कुछ वोटों का वर्गीकरण माननीयों को ना केवल संजीदा बनाएगा, वरन उन्हें अधिक से अधिक वोट भी जुटाने को मजबूर करेगा। कुछ सौ वोट पाने वाले निर्दलीय उम्मीदवारों की संख्या, जमानत राशि बढ़ाने से भले ही कम हो गई हो, लेकिन लोकतंत्र के लिए नया खतरा वह पार्टियां बन रही हैं, जो कि राष्ट्रीय दल का दर्जा पाने के उद्देश्य से अपने उम्मीदवार हर जगह खड़ा कर रही हैं। ऐसे उम्मीदवारों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी से मतदाताओं को अपने पसंद का प्रत्याशी चुनने में बाधा तो महसूस होती ही है, प्रशासनिक दिक्कतें व खर्च भी बढ़ता है। ऐसे प्रत्याशी चुनावों के दौरान कई गड़बड़ियां और अराजकता फैलाने में भी आगे रहते हैं। सैद्धांतिक रूप से यह सभी स्वीकार करते हैं कि ‘बेवजह उम्मीदवारों’ की बढ़ती संख्या स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बाधक है। इसके बावजूद चुनाव सुधारों की बात कोई भी राजनीतिक दल नहीं करता है। करे भी क्यों? आखिर ऐसे अगंभीर उम्मीदवार उनकी ही तो देन होते हैं। जब से चुनाव आयोग ने चुनावी खर्च पर निगरानी के कुछ कड़े कदम उठाए हैं, तब से लगभग सभी पार्टियां कुछ लोगों को निर्दलीय या किसी छोटे दल के नाम से ‘छद्म’ उम्मीदवार खड़ा करती हैं। ऐसे उम्मीदवार गाड़ियों की संख्या, मतदान केंद्र में अपने आदमी भीतर बैठाने जैसे कामों में सहायक होते हैं। किसी जाति-धर्म या क्षेत्र विशेष के मतों को किसी के पक्ष में एकजुट होने से रोकने के लिए उसी जाति-संप्रदाय के किसी गुमनाम उम्मीदवार को खड़ा करना आम कूटनीति बन गई है।
चुनाव में बड़े राजनीतिक दल भले ही मुद्दा आधारित चुनाव का दावा करते हों, लेकिन हकीकत यह है कि देश के आधे से अधिक चुनाव क्षेत्रों में जीत का फैसला वोट-काटू उम्मीदवारों पर निर्भर करता है। ऐसे भी लोगों की संख्या कम नहीं है, जो कि स्थानीय प्रशासन या राजनीति में अपना रसूख दिखाने भर के लिए पर्चा भरते हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं जब मात्र नामांकन दाखिल कर कुछ लोग लाखों के वारे-न्यारे कर लेते हैं। बहुत से राजनीतिक दल राष्ट्रीय या राय स्तर की मान्यता पाने के लिए तय मत-प्रतिशत पाना चाहते हैं। इस फिराक में वह आंख बंद कर प्रत्याशी मैदान में उतार देते हैं। जेल में बंद अपराधियों का जमानत पाने या फिर कारावास की चारदीवारी से बाहर निकलने के बहाने या फिर मुकदमों के गवाहों और तथ्यों को प्रभावित करने के लिए चुनाव में पर्चा भरना भी एक आम हथकंडा है। विडंबना है कि राजनीतिक कार्यकर्ता जिंदगीभर मेहनत करते हैं और चुनाव के समय उनके इलाके में किसी अन्य दल से आयातित उम्मीदवार आकर चुनाव लड़ जाता है और ग्लैमर या पैसे या फिर जातीय समीकरणों की बदौलत जीत भी जाता है। ऐसे में, सियासत को दलाली या धंधा समझने वालों की संख्या बढ़ी है। संसद का चुनाव लड़ने के लिए निर्वाचन क्षेत्र में कम से कम पांच साल तक सामाजिक काम करने के प्रमाण प्रस्तुत करना, उस इलाके या राय में संगठन में निर्वाचित पदाधिकारी की अनिवार्यता ‘जमीन से जुड़े’ कार्यकर्ताओं को संसद तक पहुंचाने में कारगर कदम हो सकता है। इससे थैलीशाहों और नव-सामंतवर्ग की सियासत में बढ़ रही पैठ को कुछ हद तक सीमित किया जा सकेगा। इस कदम से सदन में कॉरपोरेट दुनिया के बनिस्पत आम आदमी के सवालों को अधिक जगह मिलेगी। लिहाजा आम आदमी संसद से अपने सरोकारों को समङोगा और ‘कोउ नृप हो हमें क्या हानि’ सोच कर वोट ना देने वाले मध्य वर्ग की मानसकिता भी बदलेगी।
इस समय चुनाव कराना बेहद खर्चीला होता जा रहा है, तिस पर यदि पूरे साल देश में कहीं जिला पंचायत के तो कहीं विधानसभा के चुनाव होते रहते हैं। इससे सरकारी खजाने का दम तो निकलता ही है, सरकार और सरकारी मशीनरी के काम भी प्रभावित होते हैं। विकास के कई आवश्यक काम भी आचार संहिता के कारण रुके रहते हैं। ऐसे में नए चुनाव सुधारों में तीनों चुनाव (कम से कम दो तो अवश्य) लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकाय एक साथ करवाने की व्यवस्था करना जरूरी है। रहा सवाल सदन की स्थिरता को तो उसके लिए एक मामूली कदम उठाया जा सकता है। प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का चुनाव खुले सदन में वोट की कीमत यानी जो जितने वोट से जीता है, उसके वोट की सदन में उतनी ही अधिक कीमत होगी; के आधार पर पांच साल के लिए हो। सांसद का चुनाव लड़ने के लिए क्षेत्रीय दलों पर अंकुश भी स्थाई और मजबूत सरकार के लिए जरूरी है। कम से कम पांच रायों में कम से कम दो प्रतिशत वोट पाने वाले दल को ही सांसद के चुनाव में उतरने की पात्रता जैसा कोई नियम ‘दिल्ली में घोड़ा मंडी’ की रोक का सशक्त जरिया बन सकता है।

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

para military personal needs stress free service conditions

अर्धसैनिक बलों को तनावमुक्त करना जरूरी है
पंकज चतुर्वेदी
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इन दिनों देश के कई अर्धसैनिक बलों व सेना के जवानों के ऐसे वीडियो सोशल मीडिया पर तैर रहे हैं जिनमें उनके भोजन, काम करने के हालात आदि पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं सबसे पहले तो यह जानना जरूरी है कि जवानों के साथ यह सब सतत कई दशकों से हो रहा है और इसका किसी सरकार विशेश से कोई वास्ता नहीं है। गौर करें कि बीते दस सालों में फौज के 1018 जवान व अफसर खुदकुशी कर चुके हैं। थल सेना के 119 जवानों ने सन 119 में खुदकुशी कर ली थी , यह आंकड़ा सन 2010 में 101 था। सन 2010 से 2012 के बीच बीएसएफ के 302 जवानों ने आत्महत्या कर ली। आईआईएम के एक षोध में बताया गया है कि हर रोज औसतन पचास जवान नौकरी छोड़ रहे हैं व इसका मूल कारण तनाव है। इसके सबसे ज्यादा जवान बीएसएफ के होते हैं ।
हाल ही में बिहार के नक्सल प्रभावित जिले औरंगाबाद में सीआईएसएफ के एक जवान ने अपने ही चार साथियों को गोली से उड़ा दिया। यदि बंदूक में कारतूस नहीं फंसता तो यह आंकड़ा और ज्यादा हो सकता था। यह नृशंस कांड करने वाले जवान ने छुट्टी के लिए अर्जी दी थी, जिसे नामंजमर कर दिया गया था व उस पर उसी के साथी कुछ तंज कस रहे थे। इससे उत्तेजित हो कर वह जवान अपना आपा खो बैठा। आंकड़े गवाह हैं कि बीते एक दशक में अपने ही लोगों के हाथों या आत्महत्या में मरने वाले सुरक्षाकर्मियों की संख्या देशद्रोहियों से मोर्चा लेने में षहीदों से ज्यादा दूसरी तरफ फौज व सुरक्षा बलों में काबिल अफसरों की कमी, लोगों को नौकरी छोड़ कर जाना और क्वाटर गार्ड या फौजी जेलों में आरोपी कर्मियों की संख्या में इजाफा, अदालतों में मुकदमेंबाजी दिनो-दिन बढ़ रही हैं।
लोग भूल गए होंगे कि मई 2001 में एक फौजी सिपाही सुबाराम को फांसी की सजा सुनाई गई थी क्योंकि उसने अपने अफसर को गोली मार दी थी।  असल में सुबाराम  अपने साथियों की हत्या करने वाले आतंकवादियों को पनाह देने वालों को हाथों-हाथ सजा देना चाहता था, जबकि राजनीतिक आदेशों से बंधे अफसरों ने ऐसा करने से रोका था। उसके सब्र का बांध टूटा व उसने खुद के अफसर को ही मार डाला। पिछले कुछ सालों के दौरान सीमावर्ती और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में  ऐसी घटनांए होना आम बात हो गई है जिसमें कोई उन्मादी सिपाही अपने साथियों को मार देता है या फिर खुद की जीवनलीला समाप्त कर लेता है।  इन घटनाओं से आ रही दूरगामी चेतावनी की घंटी को अंग्रेजी कायदेां मे ंरचे-पगे फौजी आलाकमान ने कभी सलीके से सुनने की कोशिश ही नहीं की, जबकि फौजी के षौर्य और बलिदान से छितरे खून को अपना वोट बैंक में बदलने को तत्पर नेता इसे जानबूझ कर अनसुना करते हैं।  सेना  व अर्ध सैनिक बल के आला अफसरों पर लगातार विवाद होना, उन पर घूसखोरी के आरोप,सीमा या उपद्रवग्रस्त इलाकों में जवानों को माकूल सुविधाएं या स्थानीय मदद ना मिलने के कारण उनके साथियों की मौतों, सिपाही स्तर पर भर्ती में घूसखोरी की खबरों आदि के चलते अनुशासन की मिसाल कहे जाने वाले हमारे सुरक्षा बल(जिनमें फौज व अर्ध सैनिक बल षामिल हैं) का मनोबल गिरा है।
 बीते दस सालों में फौज के 1018 जवान व अफसर खुदकुशी कर चुके हैं। थल सेना के 119 जवानों ने सन 119 में खुदकुशी कर ली थी , यह आंकड़ा सन 2010 में 101 था। केंद्रीय आरक्षित पुलिस बल यानी सीआरपीएफ के 42 जवानों ने 2011 में और 28 ने 2010 में आत्म हत्या की थी। बीएसएफ में यह आंकड़ा 39 और 29(क्रमशः 2011 व 2010) रही है। इंडो तिब्बत सीमा बल यानी आईटीबीपी में  3 और पांच लोगों ने क्रमशः सालों में आत्म हत्या की। वहीं अपने साथी को ही मार देने के औसतन बीस मामले हर साल सभी बलों में मिल कर सामने आ रहे हैं। ब्यूरो आफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ने कोई दस साल पहले एक जांच दल बनाया था जिसकी रिपोर्ट जून -2004 में आई थी। इसमें घटिया सामाजिक परिवेश, प्रमोशन की कम संभावनाएं, अधिक काम, तनावग्रस्त कार्य, पर्यावरणीय बदलाव, वेतन-सुविधाएं जैसे मसलों पर कई सिफारिशें की गई थीं । इनमें संगठन स्तर पर 37 सिफारिशें, निजी स्तर पर आठ और सरकारी स्तर पर तीन सिफारिशें थीं। इनमें छुट्टी देने की नीति में सुधार, जवानों से नियमित वार्तालाप , शिकायत निवारण को मजबूत बनाना, मनोरंजन व खेल के अवसर उपलब्ध करवाने जैसे सुझाव थे। इन पर कागजी अमल भी हुआ, लेकिन जैसे-जैसे देश में उपद्रव ग्रस्त इलाका बढ़ता जा रहा है अर्ध सैनिक बलों व फौज के काम का दायरे में विस्तार हो रहा है।
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि  जनवरी-2009 से दिसंबर-2014 के बीच नक्सलियों से जूझते हुए केंद्रीय रिजर्व पुलिस यानि सीआरपीएफ के कुल 323 जवान देश के काम आए। वहीं इस अवधि में 642 सीआरपीएफ कर्मी दिल का दौरा पड़ने से मर गए। आत्म हत्या करने वालों की संख्या 228 है। वहीं मलेरिया से मरने वालों का आंकड़ा भी 100 से पार है। अपने ही साथी या अफसर को गोली मार देने के मामले भी आए रोज सामने आ रहे हैं। कुल मिला कर सीआरपीएफ दुश्मन से नहीं खुद से ही जूझ रही है।  सुदूर बाहर से आए केंद्रीय बलों के जवान ना तो स्थानीय भूगोल से परिचित हैं , ना ही उन्हें स्थानीय बोली-भाशा- संस्कार की जानकारी होती है और ना ही उनका कोई अपना इंटेलिजेंस नेटवर्क बन पाया हे। वे तो मूल रूप से स्थानीय पुलिस की सूचना या दिशा-निर्देश पर ही काम करते हैं। यह किसी से छिपा नहीं है कि स्थानीय पुलिस की फर्जी व षोशण की कार्यवाहियों के चलते दूरस्थ अंचलों के ग्रामीण खाकी वर्दी पर भरोसा करते नहीं हैं। अधिकांश मामलों में स्थानीय पुलिस की गलत हरकतों का खामियाजा केंद्रीय बलों को झेलना पड़ता है।  बेहद घने जंगलों में लगतार सर्चिग्ंा व पेट्रोलिंग का कार्य बेहद तनावभरा है, यहा दुश्मन अद्श्य है, हर दूसरे इंसान पर षक होता है, चाहे वह छोटा बच्चा हो या फिर फटेहाल ग्रामीण। पूरी तरह बस अविश्वास, अनजान भय और अंधी गली में मंजिल की तलाश। इस पर भी हाथ बंधे हुए, जिसकी डोर सियासती आकाओं के हाथों मैं। लगातार इस तरह का दवाब कई बार जवानों के लिए जानलेवा हो रहा है।
सनद रहे सेना कभी आक्रमण के लिए और अर्धसैनिक बल निगरानी व सुरक्षा के लिए हुआ करते थे, लेकिन आज फौज की तैनाती और आपरेशन में राजनैतिक हितों के हावी होने का परिणाम है कि कश्मीर में फौज व अर्ध्य सैनिक बल चौबीसों घंटे तनावग्रस्त रहते हें। एक तरफ अफसरों के मौखिक आदेश हैं तो दूसरी ओर बेकाबू आतंकवादी, तीसरी तरफ सियासती दांवपेंच हैं तो चौथी ओर घर-परिवार से लगातार दूर रहने की चिंता। यही नहीं यदि कियी जवान से कुछ गलती या अपराध हो जाए तो उसके साथ न्याय यानी कोर्ट मार्शल की प्रक्रिया भी गौरतलब हैं।  पहले से तय हो जाता हे कि मूुजरिम ने अपराध किया है और उसे कितनी सजा देनी है। इधर फौजी  क्वाटर गार्ड में नारकीय जीवन बिताता है तो दूसरी ओर उसके परिवार वालों को खबर तक नहीं दी जाती। नियमानुसार अरोपी के परिवाजन को ‘चार्ज षीट’ के बारे में सूचित किया जाना चाहिए, ताकि वे उसके बचाव की व्यवस्था कर सकें। लेकिन अधिकांश मामलों में सजा पूरी होने तक घर वालों को सूचना ही नहीं दी जाती है। उल्लेखनीय है कि अधिकांश जवान दूरस्थ ग्रामीण अंचलों से बेहद कम आय वाले परिवारों से आते हैं।
सुदूर इलाकों में अपने अर्धसैनिक बलों के पदस्थापना वाले स्थानों पर मोबाईल नेटवर्क का कमजोर होना भी जवानों के तनाव व मौत का कारण बना हुआ है। सनद रहे कि बस्तर की क्षेत्रफल केरल राजय से ज्यादा है। यहां बेहद घने जंगल हैं और उसकी तुलना में मोबाईल के टावर बेहद कम हैं। आंचलिक क्षेत्रों में नक्सली टावर टिकने नहीं देते तो कस्बाई इलाकों में बिजली ठीक ना मिलने से टावर कमजोर रहते हैं। बेहद तनाव की जिंदगी जीने वाला जवान कभी चाहे कि अपने घर वालों का हालचाल जान ले तो भी वह बड़े तनाव का मसल होता है। कई बार यह भी देखने में आया कि सिग्नल कमजोर मिलने पर जवान फोन पर बात करने कैंप से कुछ बाहर निकला और नक्सलियों ने उनका शिकार कर दिया। कई कैंप में जवान ऊंचे एंटिना पर अपना फोन टांग देते हैं व उसमें लंबे तार के साथ ‘इयर फोन‘ लगा कर बात करने का प्रयास करते हैं। सीआरपीएफ की रपट मे ंयह माना गया है कि लंबे समय तक तनाव, असरुक्षा व एकांत के माहौल ने जवानों में दिल के रोग बढ़ाए हैं। वहीं घर वालों का सुख-दुख ना जान पाने की दर्द भी उनको ंभीतर ही भीतर तोड़ता रहता है। तिस पर वहां मनोरंजन के कोई साधन हैं नहीं और ना ही जवान के पास उसके लिए समय है।
देश में अभी भी फौजी व अर्ध सैनिक बलों की वर्दी के प्रति विश्वास बचा हुआ है , षायद इस लिए के आम फौजी समाज से ज्यादा घुल-मिल नहीं पाता है और ना ही अपना दर्द बयां कर पाता है। वहां की अंदरूनी कहानी कुछ और है। किसी भी बल की आत्मा कहे जाने वाला सिपाही-वर्ग अपने ही अफसर के हाथों षोशण व उत्पीडन का शिकार होता हे।  देहरादून, महु, पुणे, चंडीगढ़ जैसी  फौजी बस्तियों में  सेना के आला रिटायर्ड अफसरों की कोठियों के निर्माण में रंगरूट यानी नयी भर्ती वाला जवान ईंट-सीमेंट की तगारियों ढोते मिल जाएगा।  जिस सिपाही को देश की चौकसी के लिए तैयार किया जाता है वह डेढ सौ रूप्ए रोज के मजदूरों की जगह काम करने पर मजबूर होता है।  रक्षा मंत्रालय हर साल कई-कई निर्देश सभी यूनीटों में भेजता है कि फौजी अफसर अपने घरों में सिपाहियों को बतौर बटमेन( घरेलू नौकर) ना लगाएं, फिर भी बीस-पच्चीस हजार का वेतन पाने वाले दो-तीन जवान हर अफसर के घर सब्जी ढोते मिल जाते हैं। ऐसे ही हालता अर्ध सैनिक बलों के भी है।।
आमतौर पर जवानों को अपने घर-परिवार को साथ रखने की सुविधा नहीं होती हे। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि गैर अधिकारी वर्ग के अस्सी फीसदी सुरक्षाकर्मी छावनी इलाकों में घुटनभरे कमरे में मच्छरदानी लगी एक खटिया, उसके नीचे रखा बड़ा सा बक्सा में ही अपना जीवन काटते हैं उसके ठीक सामने अफसरों की ‘‘पांच सितारा मैस’’ होती है। सेना व अर्ध सैनिक मामलों को राश्ट्रहित का बता कर उसे अतिगोपनीय कह दिया जाता है और ऐसी दिक्कतों पर अफसर व नेता सार्वजनिक बयान देने से बचते हैं। जबकि वहां मानवाधिकारों और सेवा नियमों का जम कर उल्लंघन होता रहता है। आज विभिन्न हाई कोर्ट में सैन्य बलों  से जुड़े आठ हजार से ज्यादा मामले लंबित हैं। अकेले सन 2009 में  सुरक्षा बलों के 44 हजार लोगों द्वारा इस्तीफा देने, जिसमें 36 हजार सीआरपीएफ व बीएसएफ के हैं, संसद में एक सवाल में स्वीकारा गया है।
साफ दिख रहा है कि जवानों के काम करने के हालात सुधारे बगैर मुल्क के सामने आने वाली सुरक्षा चुनौतियों से सटीक लहजे में निबटना कठिन होता जा रहा है। अब जवान पहले से ज्यादा पढ़ा-लिखा आ रहा है, वह पहले से ज्यादा संवेदनशील और सूचनाओं से परिपूर्ण है; ऐसे में उसके साथ काम करने में अधिक जागरूकता व सतर्कता की जरूरत है। जवानों को नियमित अवकाश और अफसरों से संवाद का बेहतर अवसर मिले, घर से दूर अकेले रह रहे जवानों के परिवारों को यदि उनके गांव कस्बे में कोई दिक्कत हो तो स्थानीय प्रशासन संवेदनशीलता से उससे निबटे, जवानों को चौकसी, बचाव व हमले के अत्याधुनिक उपकरण व प्रशिक्षण मिले , उनके मनोरंजन, चिकित्सा की त्वरित व सटीक व्यवस्था हो तो हमारा जवान हर तरह की चुनौती से दुगने साहस के साथ जूझ लेगा।
पंकज चतुर्वेदी
9891928376

do not make leh-laddakh concrete jungle

बर्फ के मरू को नहीं चाहिए पक्के मकान

पंकज चतुर्वेदी
वहां के लोग प्रकृति के संग जीने के आदी हैं, उनका धर्म व दर्शन  भी उन्हें नैसर्गिकता के करीब जीवनयापन करने की सीख देता है, ना जरूरत से ज्यादा संचय और ना ही बेवजह शब्दों का इस्तेमाल। कायनात की खूबसूरत देन सदियों तक अक्षुण्ण रही,बाहरी प्रभावों से क्योंकि किसी आम आदमी के लिए वहां तक पहुंचना और फिर उस परिवेष में जीना दूभर होता था, हां संत -सन्यासी पहुंचते थे, वहीं वहां बसते थे क्योंकि वे ना तो सावन हरे ना वैशाख  सूखे। फिर पर्यटन व्यवसाय बन गया, देवों के निवास स्थान तक आरोहण के लिए हवाई जहाज जाने लगे, पांच-पांच दर्रे पार कर मनाली से सड़क निकाल दी गई जिस पर बसें चल सकें। ईंधन चालित वाहनों ने धरती के इस अनछुए हिस्से पर अपने पहियों के निशान  बना दिए। आधुनिकता आई, लेकिन आज वही आधुनिकता उनकी त्रासदी बन रही है, सिर मुंडाए, गहरे लाल रंग के कपड़े पहने लामा, संत कह रहे हैं हमें नहीं चाहिए पक्के-कंक्रीट के मकान लेकिन बड़ा दवाब है सीमेंट, लोहा बेचने वाली कंपनियों का। हालांकि स्थानीय लोगों का दो दषक में ही कंक्रीट से मोह भ्ंाग हो रहा है, कई आधुनधक आर्किटेक की मिसालें मिटाई जा रही हंे और लौट रहे हें स्थानीय मिट्टी व रेत से बने पारंपरिक मकान। यह हालात हैं जलवायु परिवर्तन, जल-मल की आधुनिक सुविधाओं की भयंकर त्रासदी झेल रहे लेह-लद्दाक की कहानी।
अभी कुछ दशक पहले तक लेह7लद्दाक के दूर-दूर बसे बड़े से घरों के छोटे-छोटे गांवों में करेंसी का महत्व गौण था। अपना दूध-मक्खन, अपनी भेड़ के ऊन के कपड़े, अपनी नदियों का पानी और अपनी फसल , ना चाय में चीनी की जरूरत थी और ना ही मकान में फ्लष की। फिर आए पर्यटक, उनके लिए कुछ होटल बने, सरकार ने बढ़ावा दिया तो उनके देखा-देखी कई लेागों ने अपने पुष्तैनी मकान अपने ही हाथों से तबाह कर सीमेंट, ईंटें दूर देष से मंगवा कर आधुनिक डिजाईन के सुदर मकान खड़े कर लिए, ताकि बाहरी लोग उनके मेहमान बन कर रहें, उनसे कमाई हो। स्थानीय प्रशासन  ने भी घर-घर नल पुहंचा दिए। पहले जिसे जितनी जरूरत होती थी, नदी के पास जाता था और पानी का इस्तेमाल कर लेता था, अब जो घर में टोंटी लगी तो एक गिलास के लिए एक बाल्टी फैलाने का लोभ लग गया। जाहिर है कि बेकार गए पानपी को बहने के लिए रासता भी चाहिए। अब पहाड़ों की ढलानों पर बसे मकानों के नीचे नालियों की जगह जमीन काट कर पानी तेजी से चीने आने लगा, इससे ना केवल आधुनिक कंक्रीट वाले, बल्कि पारंपरिक मकान भी ढहने लगे। यही नहीं ज्यादा पेसा बनाने के लोभ ने जमीनों पर कब्जे, दरिया के किनारे पर्यटकों के लिए अवास का लालच भी बढ़ाया। असल में लेह7लद्छाक में सैंकड़ों ऐसी धाराएं है जहां सालों पानी नहीं आता, लेकिन जब ऊपर ज्यादा बरफ पिघलती है तो वहां अचानक तेज जल-बहाव होता है। याद करें छह अगस्त 2010 को जब बादल फटने के बाद विनाषकारी बाढ़ आई थी और पक्के कंक्रीट के मकानों के कारण सबसे ज्यादा तबाही हुई थी। असल में ऐसे अधिकांष मकान ऐसी ही सूखी इजल धाराओं के रास्ते में रेप दिए गए थे। पानी को जब अपने पुष्तैनी रस्ते में ऐसे व्यवधान दिखे तो उसने उन्हें ढहा दिया।
जान लें कि लेह-लद्दाख हिमालय की छाया में बसे हैं और यहां बरसात कम ही होती थी, लेकिन जलवाुय परिवर्तन का असर यहां भी दिख रहा है व अब गर्मियों में कई-कई बार बरसात होती है। अंधाधुंध पर्यटन के कारण उनके साथ आया प्लास्टिक व अन्य पैकेजिंग का कचरा यहां के भूगोल को प्रभावित कर रहा है ।
इस अंचल के ऊपरी इलाकों में प्षुपालक व निचले हिस्से में कृशक समाज रहता हे। इनके पारंपरिक घर स्थानीय मिट्टी में रेत मिला कर धूप में पकाई गई र्इ्रंटों से बनते हैं। इन घरों की बाहरी दीवारों को स्थानीय ‘पुतनी मिट्टी’ व उसमें वनस्पतियों के अवषेश को मिला कर ऐसा कवच बनाया जाता है जो षून्य से नीचे तापनाम में भी उसमें रहने वालों को उश्मा देता है। यहां तेज सूरज चमकता है और तापमान षून्य तीस डिगरी से नीचे जाता है। भूकंप -संवेदनषील  इलाका तो है ही। ऐसे में पारंपरिक आवास सुरक्षित माने जाते रहे हैं। सनद रहे कंक्रीट  गरमी में और तपती व जाउ़े में अधिक ठंडा करती है।  सीमेंट की वैज्ञानिक आयु 50 साल है जबकि इस इलाके में पारंपरिक तरीके से बने कई मकान, मंदिर, मठ हजार साल से ऐसे ही षान से खड़े हैं।  यहां के पारंपरिक मकान तीन मंजिला होते हैं। -सबसे नीचे मवेषी, उसके उपर परिवार और सबसे उपर पूजा घर। इसके सामाजिक व वैज्ञानिक कारण भी हैं।
यह दुखद है कि बाहरी दुनिया के हजारों लेाग यहां प्रकृति की सुंदरता निहारने आ रहे हैं लेकिन वे अपने पीछे इतनी गंदगी, आधुनिकता की गर्द छोड़कर जा रहे हैं कि  यहां के स्थानीय समाज का अस्तित्व खतरे में हैं। उदहरण के लिए बाहरी दखल के चलते यहां अब चीनी यानि षक्कर का इस्तेमाल होने लगा और इसी का कुप्रभाव है कि स्थानीय समाज में अब डायबीटिज जैसे रेाग घर कर रहे हैं। असल में भोजन हर समय स्थानीय देष-काल-परिस्थिति के अनुरूप ही विकसित होता था। उसी तरह आवास भी। आज कई लोग यहां अपनी गलतियों को सुधार रहे हैं व सीमेंट के मकान खुद ही नश्ट करवा रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि निर्माण व आर्किटेक के आध्ुानिक षोधकर्ता स्थानीय सामग्री से ही ऐसे मकान बनाने में स्थानीय समाज को मदद करंे जो कि बाथरूम, फ्लष जैसी आधुनिक सुविधाओं के अनुरूप हो तथा कम व्यय में तुलनात्मक रूप से आकर्शक भी हो। साथ ही बाहरी कचरे को रोकने के कठोर कदम उठाए जाएं ताकि कायनात की इस सुंदर संरचना को सुरक्षित रखा जा सके।


सोमवार, 16 जनवरी 2017

Do some thing on ground to save dying Yamuna

यमुना का यह हाल क्यों है
संसदीय समिति ने भी कहा था कि यमुना सफाई के नाम पर व्यय 6500 करोड़ रुपए बेकार हो गए हैं क्योंकि नदी पहले से भी ज्यादा गंदी हो चुकी है।
पिछले एक सप्ताह से दिल्ली के अतिविशिष्ट इलाके लुटियन जोन के नल रीते थे, कारण हरियाणा से दिल्ली में प्रवेश कर रही यमुना इतनी जहरीली हो गई थी कि वजीराबाद व चंद्रावल के जल परिशोधन संयंत्र की ताकत उन्हें साफ कर पीने लायक बनाने के काबिल नहीं रह गई थी। वैसे तों दिल्ली भी यमुना को रिवरसे सीवरबनाने में कोई कसर नहीं छोड़ती, लेकिन इस बार हरियाणा के कारखानों का गंदा पानी इतनी अधिक मात्रा में यमुना में घुल गया कि पानी में अमोनिया की मात्रा 3.81 पीपीएम से अधिक हो गई। इसके चलते 120 एमजीडी वाला वजीराबाद और 90 एमजीडी वाला चंद्रावल जलशोधन संयंत्र ठप हो गया। हालांकि इन दोनों में यमुना का जल महज पंद्रह फीसद हो जाता है। अभी कुछ ही महीने पहले उत्तर प्रदेश सरकार दिल्ली को खत लिख कर धमका चुकी है कि यदि यमुना में गंदगी घोलना बंद नहीं किया तो राजधानी का गंगा-जल रोक देंगे। हालांकि दिल्ली सरकार ने इस अमोनिया बढ़ोतरी या उससे पहले के खत को कतई गंभीरता से नहीं लिया, न ही इस पर कोई प्रतिक्रिया दी है, लेकिन जब कभी यमुना का मसला उठता है, सरकार बड़े-बड़े वादे करती है। अलबत्ता क्रियान्वयन के स्तर पर कुछ होता नहीं है।
किसी को याद भी नहीं होगा कि फरवरी-2014 के अंतिम हफ्ते में शरद यादव की अगुआई वाली संसदीय समिति ने भी कहा था कि यमुना सफाई के नाम पर व्यय 6500 करोड़ रुपए बेकार हो गए हैं क्योंकि नदी पहले से भी ज्यादा गंदी हो चुकी है। समिति ने यह भी कहा कि दिल्ली के तीन नालों पर इंटरसेप्टर सीवर लगाने का काम अधूरा है। गंदा पानी नदी में सीधे गिर कर उसे जहर बना रहा है। विडंबना यह है कि इस तरह की चेतावनियां तथा रपटें न तो सरकार को और न ही समाज को जागरूक कर पा रही हैं। एक सपना राष्ट्रमंडल खेलों के पहले दिखाया गया था कि अक्तूबर-2010 तक लंदन की टेम्स नदी की ही तरह दिल्ली में वजीराबाद से लेकर ओखला तक शानदार लैंडस्केप, बगीचे होंगे, नीला जल कल-कल कर बहता होगा, पक्षियों और मछलियों की रिहाइश होगी। लेकिन राष्ट्रमंडल खेल तो बदबू मारती, कचरे व सीवर के पानी से लबरेज यमुना के तट पर ही हुए। याद करें, 10 अप्रैल 2001 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि 31 मार्च 2003 तक दिल्ली में यमुना की न्यूनतम जल गुणवत्ता प्राप्त कर ली जानी चाहिए, ताकि यमुना को मैलीन कहा जा सके। उस समय-सीमा को बीते ग्यारह सालों के बाद भी दिल्ली क्षेत्र में बहने वाली नदी में आॅॅक्सीजन का नामोनिशान नहीं रह गया है।
यमुना की देश के शक्ति-केंद्र दिल्ली में ही सबसे अधिक दूषित होती है। यमुना की पावन धारा दिल्ली में आकर एक नाला बन जाती है। आंकड़ों और कागजों पर तो इस नदी की हालत सुधारने को इतना पैसा खर्च हो चुका है कि यदि उसका ईमानदारी से इस्तेमाल किया जाता तो उससे एक समानांतर धारा की खुदाई हो सकती थी।यमुना दिल्ली में अड़तालीस किलोमीटर बहती है। यह नदी की कुल लंबाई का महज दो फीसद है। जबकि इसे प्रदूषित करने वाले कुल गंदे पानी का 71 प्रतिशत और बायोकेमिकल आक्सीजन डिमांड यानी बीओडी का पचपन प्रतिशत यहीं से इसमें घुलता है। अनुमान है कि दिल्ली में हर रोज 3297 एमएलडी गंदा पानी और 132 टन बीओडी यमुना में घुलता है। दिल्ली की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर कही जाने वाली यमुना का राजधानी में प्रवेश उत्तर में बसे पल्ला गांव से होता है। पल्ला में नदी का प्रदूषण का स्तर होता है। लेकिन यही उच्च गुणवत्ता का पानी जब दूसरे छोर जैतपुर पहुचता है तो श्रेणी का हो जाता है। सनद रहे कि इस स्तर का पानी मवेशियों के लिए भी अनुपयुक्त कहलाता है।  हिमालय के यमुनोत्री ग्लेशियर से निर्मल जल के साथ आने वाली यमुना की असली दुर्गति दिल्ली में वजीराबाद बांध को पार करते ही होने लगती है। इसका पहला सामना होता है नजफगढ़ नाले से, जो कि अड़तीस शहरी व चार देहाती नालों की गंदगी अपने में समेटे वजीराबाद पुल के पास यमुना में मिलता है। इसके अलावा दिल्ली महानगर की कोई डेढ़ करोड़ आबादी का मल-मूत्र व अन्य गंदगी लिये इक्कीस नाले यमुना में मिलते हैं।
दिल्ली में यमुना को साफ-सुथरा बनाने की कागजी कवायद कोई चालीस सालों से चल रही है। सन अस्सी में एक योजना नौ सौ करोड़ की बनाई गई थी। दिसंबर, 1990 में भारत सरकार ने यमुना को बचाने के लिए जापान सरकार के सामने हाथ फैलाये थे। जापानी संस्था ओवरसीज इकोनोमिक कारपोरेशन फंड आॅफ जापान का एक सर्वे-दल जनवरी, 1992 में भारत आया था। जापान ने 403 करोड़ की मदद देकर 1997 तक कार्य पूरा करने का लक्ष्य रखा था। लेकिन यमुना का मर्ज बढ़ता गया और कागजी लहरें उफनती रहीं। अभी तक कोई 1800 करोड़ रुपए यमुना की सफाई के नाम पर साफ हो चुके हैं। इतना धन खर्च होने के बावजूद केवल मानसून में यमुना में आॅॅक्सीजन का बुनियादी स्तर देखा जा सकता है।
यमुना की सफाई के दावों में उत्तर प्रदेश सरकार भी कभी पीछे नहीं रही। सन 1983 में उ.प्र. सरकार ने यमुना सफाई की एक कार्ययोजना बनाई। 26 अक्तूबर 1983 को मथुरा में उ.प्र. जल निगम के प्रमुख आरके भार्गव की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय बैठक हुई थी। इसमें मथुरा के सत्रह नालों का पानी परिशोधित कर यमुना में मिलाने की सत्ताईस लाख रुपए की योजना को इस विश्वास के साथ मंजूरी दी गई थी कि काम 1985 तक पूरा हो जाएगा। न तो उस योजना पर कोई काम हुआ, और न ही अब उसका कोई रिकार्ड मिलता है। उसके बाद तो कई-कई करोड़ के खेल हुए, लेकिन यमुना दिन-दुगुनी रात-चौगुनी मैली होती रही। आगरा में कहने को तीन सीवर शोधन संयंत्र काम कर रहे हैं, लेकिन इसके बाद भी 110 एमएलडी सीवरयुक्त पानी हर रोज नदी में मिल रहा है। संयंत्रों की कार्यक्षमता और गुणवत्ता अलग ही बात है। तभी आगरा में यमुना के पानी को पीने के लायक बनाने के लिए 80 पीपीएम क्लोरीन देनी होती है। सनद रहे दिल्ली में यह मात्रा आठ-दस पीपीएम है।
चार साल पहले एक बार फिर यमुना को अपने जीवन के लिए सरकार से उम्मीद बंधी थी, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के निर्देश पर यमुना नदी विकास प्राधिकरण(वाईआरडीए) का गठन किया गया था। दिल्ली के उपराज्यपाल की अध्यक्षता में दिल्ली जल बोर्ड, प्रदूषण बोर्ड सहित कई सरकारी व गैर-सरकारी संगठनों को साथ लेकर एक तकनीकी सलाहकार समूह का गठन हुआ था। उस समय सरकार की मंशा थी कि एक कानून बना कर यमुना में प्रदूषण को अपराध घोषित कर राज्यों व स्थानीय निकायों को इसका जिम्मेदार बना दिया जाए। लेकिन वह सबकुछ कागजों से आगे बढ़ा ही नहीं।आज यमुना का अस्तित्व ही खतरे में है। मथुरा और दिल्ली में हर साल कुछ संस्थाएं नदी के किनारे का कीचड़ व गंदगी साफ करने के आयोजन करती हैं। हो सकता है कि उनकी भावना पावन हो, लेकिन उनके इन प्रयासों से नदी की सफाई में कहीं कोई इजाफा नहीं होता है। यदि यमुना को बचाना है तो इसके उद्धार के लिए मिले सरकारी पैसों का ईमानदारी से इस्तेमाल जरूरी है। यह हमेशा याद रखना चाहिए कि मानव-सभ्यता का अस्तित्व नदियों का सहयात्री है और इसी पर निर्भर है।


रविवार, 15 जनवरी 2017

My new Book for children by Bhartiy jnanpeeth भारतीय ज्ञानपीठ

पिछले कई से "ज्ञानोदय " में भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित बाल साहित्य पुस्तकों की सूची में मेरी एक पुस्तिका " महामना मदन मोहन मालवीय" का विज्ञापन जा रहा था, लेकिन किताब देखने को नहीं मिली. मेले के आखिरी दिन तमाम पुस्तकें खरीदने के बाद भारतीय ज्ञानपीठ के स्टाल की और निकला तो रास्ते में ही मेरे अग्रज और ज्ञानपीठ के निदेशक लीलाधर मंडलोई जी मिल गए . उन्होंने अपने सहकर्मियों से कह कर तीन पुस्तकें दिलवायीं . आपसे साझा कर रहा हूँ.
असल में यह पुस्तक महामना की जीवनी नहीं हें , इसमें उनके जीवन के कुछ ऐसे रोचक प्रसंग हे जो उनके राष्ट्र प्रेम, समाज प्रेम, शिक्षा प्रेम के प्रमाण हें .

शनिवार, 7 जनवरी 2017

Printed books never die

संदर्भ विश्व  पुस्तक मेला(7 से 15 जनवरी 2017, नई दिल्ली )

किताबें छपती भी हैं और बिकती भी
पंकज चतुर्वेदी
कुछ दिनों पहले एनडीटीवी पर रवीश  कुमार ने राष्ट्र वाद  पर अपना प्राईमटाईम किया। उनके विमर्ष में कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर के आलेखों के संकलन की एक पुस्तक का उल्लेख हो गया। इस पुस्तक को राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने सौमित्रमोहन द्वारा हिंदी में अनूदित कर छापा था। देखते ही देखते इस पुस्तक की सारी प्रतियां बिक गईं। आनलाईन भी और स्टोर से भी। यह बानगी हैं कि किस तरह आधुनिक संचार माध्यम मुद्रित ुपस्तकों के प्रचार-प्रसार में सकारातमक भूमिका निभाते हैं। इससे पहले प्रेमचंद के उपन्यास ‘‘निर्मला’’,  भीष्म  के तमस, देवकीनंदन खत्री की रचनाओं, आरके नारायण के मालगुढी डजे जैसे सीरियल टीवी पर आने के बाद उन पुस्तकों की बिक्री बेतहाशा बढ़ना ज्यादा पुरानी बात नहीं है। आज लोग फेेसबुक जैसे सोश ल मीडिया पर निषुल्क प्रचार कर कई सौ पुस्तकें आराम से पाठकों तक पहुंचा देते हैं।
‘‘ बाजार बढ़ रहा है, इस सड़क पर किताबों की एक दुकान खुली है और दवाओं की दो। ज्ञान और बीमारी का यही अनुपात है। ज्ञान की चाह जितनी बढ़ी है, उससे दुगनी दवा की चाह बढ़ी है। ज्ञान खुद एक बीमारी है।’’ हरषिंकर परसाई ने यह षब्द कोई तीन दषक पहले लिखे थे और आज भी ठीक उसी तरह प्रासंगिक हैं जितनी मुद्रित पुस्तकें। बीते एक दषक से बड़ा हल्ला हुआ, विमर्ष हुए, चिंतांए जताई गई कि टेलीविजन या इंटरनेट पुस्तकों को चाट जाएगा। लेकिन रामायण के दोहे ‘‘ जो -जो सुरसा रूप दिखावा, ता दो गुनी कवि बदन बढ़ावा’’ की तर्ज पर ज्ञान की मांग बढ़ती गई। सनद रहे कि कागज पर मुदिगत पुस्ताकें का आविश्कार कोई इतना प्राचीन भी नहीं है कि उसके अतीत-विलाप में पुस्तकों के नए स्वरूप- ई बुकस या आनलाईन रीडिंग को पठनीयता पर ही संकट मान लिया जाए। नए साल की षुरूआत में सात जनवरी को जब उम्मीद है कि घना कोहरा होगा, कड़कड़ती ठंड होगी, राजधानी को आने वाली ट्रेन, बसें और हवाई जहाज अपने- आने-जाने के समय की परवाह नहीं करते होंगे , ऐसे में देष की राजधानी के बीचों-बीच प्रगति मैदान में पुस्तकों का एक भरा-पूरा संसार जीवंत हो उठेगा। यहां आ कर महसूस किया जा सकेगा कि पुस्तकें निर्जीव कागज का पुलिंदा नहीं, बल्कि बातें करती जीवंत ऐसी संरचना हैं जो अतीत, वर्तमान और भविश्य तीनों को बांचती हैं।
यदि समाज की आर्थिक दषा सुधर रही है, उसकी खरीद क्षमता बढ़ रही है, बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं से औसत उम्र बढ़ रही है और भारतीय समाज षिक्षा के प्रति गंभीर हो रहा है तो इस विकासमान समाज पर आधुनिकता और हाई-टेक का गहरा असर है ।  बेहतर जीवन की चाह ने हमारे जीवन के मौलिक सौंदर्य को भी प्रभावित किया है। ऐसे में पुस्तकें आर्थिक प्रगति और सांस्कृतिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाए रखने में अदभुत और निर्णायक भूमिका निभाती है । सूचनाएं और संचार बदलते हुए विष्व के सर्वाधिक षक्तिषाली अस्त्र-षस्त्र बनते जा रहे हैं । पिछले दो दषकों में सूचना तंत्र अत्यधिक सषक्त हुआ है, उसमें क्रांतिकारी परिवर्तन आए हैं ।
लेकिन पुस्तक का महत्व और रोमांच इस विस्तार के बावजूद अक्षुण्ण है । यही नहीं कई स्थानों पर तो पुस्तक व्यवसाय में अत्यधिक प्रगति हुई है । यूरोप और अमेरिका में लेाग मानने लगे हैं कि पुस्तकें उनकी संस्कृति की पोशक हैं, तभी वहां लेखकों को बड़े-बड़े सम्मान दिए जा रहे हैं । अरब देषों में जहां अकूत दौलत है, अब वे खुद को एक पठनषील समाज सिद्ध करने मे ंलगे हैं। अबुधाबी व षारजहां के पुस्तक मेले दुनिया में मषहूर हो रहे हैं। षारजहा की सरकार लेखकों, अनुवादकों और बच्चों की पुस्तकों के चित्रकारों को दुनिया का सबसे ज्यादा कीमत वाला पुरस्कार दे रही है। वहां के पुस्तक मेलों में भले ही कुछ जगह मल्ीमीडिया या ई-बुक्स के स्टाल दिखें, लेकिन अभी भी पूर मेला मुदित पुस्तकों का ही होता है।
बीते 25 सालो ंके दौरान जबसे सूचना प्रौद्योगिकी का प्रादुर्भाव हुआ है , मुद्रण तकनीक से से जुड़ी पूरी दुनिया एक ही भय में जीती रही है कि कहीं कंप्यूटर, टीवी सीडी की दुनिया छपे हुए काले अक्षरों को अपनी बहुरंगी चकाचैंध में उदरस्थ ना कर ले। जैसे-जैसे चिंताएं बढ़ीं,  पुस्तकों का बाजार भी बढ़ता गया। उसे बढ़ना ही था- आखिर साक्षरता दर बढ़ रही है, ज्ञान पर आधारित जीवकोपार्जन करने वालो की संख्या बढ़ रही है। जो प्रकाषक बदलते समय में पाठक के बदलते मूड को भांप गया , वह तो चल निकला, बांकी के पाठकों की घटती संख्या का स्यापा करते रहे।
संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन के बाद अंग्रेजी पुस्तकों के प्रकाषन में भारत का दुनिया में तीसरा स्थान है। भारत दुनिया के सबसे विषाल पुस्तक बाजारों में से एक हैं और इसी कारण हाल के वर्शों में विष्व के कई बड़े प्रकाषकों ने भारत की ओर अपना रुख किया है । विष्व पुस्तक बाजार में भारत के विकासमान महत्व को रेखांकित करने के उदाहरणस्वरूप ये तथ्य विचारणीय हैं-फ्रैंकफर्ट पुस्तक मेला, 2006 में भारत को दूसरी बार अतिथि देष सम्मान, सन 2009 के लंदन पुस्तक मेला का ‘मार्केट फोकस’ भारत होना, मास्को अंतरराश्ट्रीय पुस्तक मेला 2009 में भारत को अतिथि देष का दर्जा आदि। भारत में भी महंगाई, अवमूल्यन और प्रतिकूल सांस्कृतिक, सामाजिक-बौद्धिक परिस्थितियों के बावजूद पुस्तक प्रकाषन एक क्रांतिकारी दौर से गुजर रहा है । छपाई की गुणवत्ता में परिवर्तन के साथ-साथ विशय विविधता यहां की विषेशता है । समसामयिक भारतीय प्रकाषन एक रोमांचक और भाशाई दृश्टि से विविधतापूर्ण कार्य है। विष्व में संभवतः भारत ही एक मात्र ऐसा देष हैं जहां 37 से अधिक भाशाओं में पुस्तकें प्रकाषित की जाती हैं। संयुक्त राज्य अमरीका और ब्रिटेन के बाद अंग्रेजी पुस्तकों के प्रकाषन में भारत का तीसरा स्थान है । सन 2009 में नेषनल बुक ट्रस्ट ने देष के युवाओं के बीच पठनीयता को    ले कर एक सर्वे किया था। उस समय हमारे देष की युवा आबादी 45 करोड़ 90 लाख थी और उसमे ंसे 33 करोड़ 33 लाख साक्षर। इस सर्वे में पाया गया था कि महज 7.5 प्रतिषत युवा अपने खाली समय में पुस्तकें पढ़नो का षौक रखते हैं बाकी या तो टीवी या अन्य। हां, अखबार पढना पसंद करने वाले युवा जरूर 14.8 था। यह भी सही है कि अखबार जिस तरह कम कीमत में सर्वसुलभ हैं , पुस्तकों की उपलब्धता व कीमत उसका 10 फीसदी भी नहीं है।
यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत में भशा-संस्कृति अदि को ले कर विधिता बेहद व्यापक है। हमारा देष दुनिया का संभवतया विरला देष होगा जिसमें इतनी भाशा-बोली में प्रकाषन होता है। यहां इस्तेमाल होने वाले फांट दुनिया में सबसे ज्यादा है। हमारा भाशायी प्रकाषन बहुत-कुछ असंगठित है। छोटे गांव-कस्बों में उत्साही लेखक अपने खर्च पर अपी कृतियां प्रकाषित कर लेते हैं और ये किसी भी आंकड़ों में दर्ज नहीं होतीं। यह जान लें कि भारत में पुस्तक वितरण बेहद कठिन कार्य है।  प्रत्येक पुस्तक एक स्वतंत्र ईकाई होती है, उसके विशय, उसके पाठक वर्ग, उसकी उपलब्धता व प्रस्तुति सबकुछ दूसरी पस्तक से भिन्न होती है।  स्पश्ट है कि इंटरनेट ने  पुस्तकों के प्रसार मे ंयह सहयोग तो किया ही है कि पुस्तक की जानकारी अब देष-दुनिया तक होने लगी हे। कई आॅनलाईन स्टोर, यहां तक कि पुस्तक मेले भी हैं जहां से पुसतकें बिक रही है। जरूरत इस बात की है कि भाशायी लेखक व प्रकाषक व्यक्तिगत बिक्री के लिए संचार के नए माध्यमों का इस्तेमाल करे। यह भी जरूरी है कि पाठक की पठन रूचि परिश्कृत करनेे के लिए लेखक बगैर किसी सरकारी आयोजन की अपेक्षा करे, पाइकों तक जाए। नए पाइक तैयार करे। आज बिडंबना है कि वह मजदूर या किसान जानता ही नहीं है कि केाई लेखक उसके हालात पर कागज काले कर रहा है। लेखक भी मान बैठा है कि पेट के लिए मषक्कत करने वाले के लिए किताबें कोई अनिवार्य  खुराक नहीं है। सो वह अपना पाठक कालेज स्तर के लेागेों या सरकारी सप्लाई में ही तलाषता है।
बौद्धिक-विकास, ज्ञान- प्रस्फुटन और शिक्षा के प्रसार के इस युग में यह बात सभी स्वीकार करते हैं कि देश की बात क्या करें ,दिल्ली में भी पुस्तकें सहजता से उपलब्ध नहीं हैं। गली-मुहल्लों में जो दुकाने हैं, वे पाठ्य पुस्तकों की आपूर्ति कर ही इतना कमा लेते हैं कि दीगर पुस्तकों के बारे में सोच नहीं पाते।  कुछ जगह ‘‘बुक स्टोर’’ हैं तो वे एक खास सामाजिक-आर्थिक वर्ग की जरूरतों को भले ही पूरी करते हों, लेकिन आम मध्यवर्गीय लोगों को वहां मनमाफिक पुस्तकें मिलती नहीं हैं  लेाग उदाहरण देते हें कि इरान जैसे देश में स्थाई तौर पर पुस्तकों का माॅल है, लेकिन भारत में सरकार इस पर सोच नहीं रही है। गौरतलब है कि भारत में पुस्तक व्यवसाय की सालान प्रगति 20 फीसदी से ज्यादा है, वह भी तब जब कि कागज के कोटे, पुस्तकों को डाक से भेजने पर छूट ना मिलने, पुस्तकों के व्यवसाय में सरकारी सप्लाई की गिरोहबंदी से यह उद्योग  हर कदम पर लड़ता है। यह कहने वाले प्रकाशक  भी कम नहीं है जो इसे घाटे का सौदा कहते हैं, लेकिन जनवरी की ठंड में , प्रगति मैदान के पुस्तक मेला में छुट्टी के दिन किसी हाॅल में घुसो और वहां की गहमा-गहमी के बीच आधी बांह का स्वेटर भी उतार फैंकने की मन हो तो जाहिर हो जाता है कि लोग अभी भी पुस्तकों के पीछे दीवानगी रखते हैं। यह जान लें कि ना तो पुस्तकों पर कोई संकट है और ना ही लेखकों पर, हां बदलते समय के साथ लेखन बदलने का दवाब  जरूर है।

मंगलवार, 3 जनवरी 2017

Ban on polythene can not be done without strong alternative

विकल्प के अभाव का रोना


राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सटे गाजियाबाद में पिछले एक साल से प्रयास हो रहे हैं कि लोग पॉलिथीन का प्रयोग बंद कर दें। कभी रैली तो कभी बाजार जा कर समझाइश तो कभी अफसरों के साथ जब्ती। विडंबना है कि हर एक इंसान यह मानता है कि पॉलिथीन बहुत नुकसान कर रही है, लेकिन उसका मोह ऐसा है कि किसी ना किसी बहाने से उसे छोड़ नहीं पा रहा है। देशभर की नगर निगमों के बजट का बड़ा हिस्सा सीवर व नालों की सफाई में जाता है और परिणाम-शून्य ही रहते हैं और इसका बड़ा कारण पूरे मल-जल प्रणाली में पॉलिथीन का अंबार होना है। यह पहला मामला नहीं है जब स्थानीय प्रशासन ने पॉलीथीन पर पाबंदी की पहल की हो, रीवा, भुवनेश्वर, शिमला, देहरादून, बरेली, देवास बनारस.. देश के हर राय के कई सौ शहर यह प्रयास कर रहे हैं, लेकिन नतीजा अपेक्षित नहीं आने का सबसे बड़ा कारण विकल्प का अभाव है।
कचे तेल के परिशोधन से मिलने वाले डीजल, पेट्रोल आदि की तरह पॉलिथीन बनाने का मसाला भी पेट्रो उत्पाद ही है। यह इंसान और जानवर दोनों के लिए जानलेवा है। घटिया पॉलिथीन का प्रयोग सांस और त्वचा संबंधी रोगों तथा कैंसर का खतरा बढ़ाता है। पॉलिथीन की थैलियां नष्ट नहीं होती हैं और धरती की उपजाऊ क्षमता को नष्ट कर इसे जहरीला बना रही हैं। साथ ही मिट्टी में इनके दबे रहने के कारण मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता भी कम होती जा रही है, जिससे भूजल के स्तर पर असर पड़ता है। पॉलिथीन खाने से गायों व अन्य जानवरों के मरने की घटनाएं तो अब आम हो गई है। फिर भी बाजार से सब्जी लाना हो या पैक दूध या फिर किराना या कपड़े, पॉलिथीन के प्रति लोभ ना तो दुकानदार छोड़ पा रहे हैं ना ही खरीदार। मंदिरों, ऐतिहासिक धरोहरों, पार्क, अभ्यारण्य, रैलियों, जुलूसों, शोभा यात्रओं आदि में धड़ल्ले से इसका उपयोग हो रहा है। शहरों की सुंदरता पर इससे ग्रहण लग रहा है। पॉलिथीन न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य को भी नष्ट करने पर आमादा है। यह मानवोचित गुण है कि इंसान जब किसी सुविधा का आदी हो जाता है तो उसे तभी छोड़ पाता है जब उसका विकल्प हो। यह भी सच है कि पॉलिथीन बीते दो दशक के दौरान बीस लाख से यादा लोगों के जीवकोपार्जन का जरिया बन चुका है, जो कि इसके उत्पादन, व्यवसाय, पुरानी पन्नी एकत्र करने व उसे कबाड़ी को बेचने जैसे काम में लगे हैं। वहीं पॉलिथीन के विकल्प के रूप में जो सिंथेटिक थैले बाजार में डाले गए हैं, वे एक तो महंगे हैं, दूसरे कमजोर और तीसरे वे भी प्राकृतिक या घुलनशील सामग्री से नहीं बने हैं और उनके भी कई विषम प्रभाव हैं। कुछ स्थानों पर कागज के बैग और लिफाफे बनाकर मुफ्त में बांटे भी गए लेकिन मांग की तुलना में उनकी आपूर्ति कम थी।
यदि वास्तव में बाजार से पॉलिथीन का विकल्प तलाशना है तो पुराने कपड़े के थैले बनवाना एकमात्र विकल्प है। इससे कई लोगों को विकल्प मिलता है। पॉलिथीन निर्माण की छोटी-छोटी इकाई लगाए लोगों को कपड़े के थैले बनाने का, उसके व्यापार में लगे लोगों को उसे दुकानदार तक पहुंचाने का विकल्प मिलता है। आम लोगों को सामाना लाने-ले जाने का भी विकल्प मिलता है। यह सच है कि जिस तरह पॉलिथीन की मांग है उतनी कपड़े के थैले की नहीं होगी, क्योंकि थैला कई-कई बार इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन कपड़े के थैले की कीमत, उत्पादन की गति भी उसी तरह पॉलिथीन के मानिंद तेज नहीं होगी। सबसे बड़ी दिक्कत है दूध, जूस, बनी हुई करी वाली सब्जी आदि के व्यापार की। इसके लिए एल्यूमिनियम या अन्य मिश्रित धातु के खाद्य-पदार्थ के लिए माकूल कंटेनर बनाए जा सकते हैं। सबसे बड़ी बात घर से बर्तन ले जाने की आदत। फिर से लौट आए तो खाने का स्वाद, उसकी गुणवत्ता, दोनों ही बनी रहेगी। कहने की जरूरत नहीं है कि पॉलिथीन में पैक दूध या गरम करी उसके जहर को भी आपके पेट तक पहुंचाती है। आजकल बाजार माइक्रोवेव में गरम करने लायक एयरटाइट बर्तनों से पटा पड़ा है, ऐसे कई-कई साल तक इस्तेमाल होने वाले बर्तनों को भी विकल्प के तौर पर विचार किया जा सकता है। प्लास्टिक से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए बॉयो प्लास्टिक को बढ़ावा देना चाहिए। बायो प्लास्टिक चीनी, चुकंदर, भुट्टा जैसे जैविक रूप से अपघटित होने वाले पदार्थो के इस्तेमाल से बनाई जाती है। हो सकता है कि शुरुआत में कुछ साल पन्नी की जगह कपड़े के थैले व अन्य विकल्प के लिए कुछ सब्सिडी दी जाए तो लोग अपनी आदत बदलने को तैयार हो जाएंगे। लेकिन यह व्यय पॉलीथीन से हो रहे व्यापक नुकसान की तुलना में बहेद कम ही होगा।
सनद रहे कि 40 माइक्रान से कम पतली पन्नी सबसे यादा खतरनाक होती है। सरकारी अमलों को ऐसी पॉलिथीन उत्पादन करने वाले कारखानों को ही बंद करवाना पड़ेगा। वहीं प्लास्टिक कचरा बीन कर पेट पालने वालों के लिए विकल्प के तौर पर बेंगलुरु के प्रयोग पर विचार कर सकते हैं, जहां लावारिस फेंकी गई पन्नियों को अन्य कचरे के साथ ट्रीटमेंट करके खाद बनाई जा रही है। हिमाचल प्रदेश में ऐसी पन्नियों को डामर के साथ गला कर सड़क बनाने का काम चल रहा है। जर्मनी में प्लास्टिक के कचरे से बिजली का निर्माण भी किया जा रहा है। स्वीट्जरलैंड में भी कचरे से बिजली उत्पादित की जा रही है। विकल्प तो और भी बहुत कुछ हैं, बस जरूरत है तो एक नियोजित दूरगामी योजना और उसके क्रियान्वयन के लिए जबरदस्त इछाशक्ति की।

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