तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

रविवार, 26 फ़रवरी 2017

Kashmir needs peace trcks not hape speeches

कश्मीर को बयान नहीं राहत की जरूरत है

                                                                 पंकज चतुर्वेदी
 

सुलगते कश्मीर पर जब मरहम की जरूरत है, तब पूर्व मुख्यमंत्री,पूर्व केंद्रीय मंत्री और नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला के एक बयान ने सियासी भूचाल ला दिया और जिन्हे कश्मीर का ‘क’ नहीं पता उनकी देशभक्ति उबाल मारने लगी। जो लेाग दस मिनट अपने मोबाईल फोन के बगैर रह नहीं सकते, जो रातभर पार्टियां किए बगैर अपने जीने पर श्क करते हैं, वे कल्पना भी नहीं कर सकते उन इलाकों की जहां महीनों से कफर्यू लगा है, जहां अंधेरा होने से पहले यदि कोई घर ना पुहंचे तो लेागों के घर मातम का माहौल हो जाता है। यह तो भारत सरकार भी मान रही है कि कश्मीर एक विवादास्पद क्षेत्र है व पाकिस्तान उसमें एक पक्ष है। फारूख अब्दुल्ला को देशद्रोही व गद्दार कह रहे लेाग इस बात पर आंखें झुका लेंगे कि सन 1953 में कश्मीर के मसले पर गिरफ्तार हुए डा. श्यामा प्रसा द मुखर्जी की संदिग्ध मौत उस शेख अब्दुल्ला की राज्य सरकार के शासन में हुई थी जिसके बेटे और पोते दोनों को डा. मुखर्जी के आदर्श पर चलने वाले दल की सरकार ने अपने मंत्रीमंडल में शामिल किया था।
बीते शुक्रवार को डा अब्दुल्ला कहा था कि कश्मीर में आतंकी बन रहे युवक विधायक या सांसद बनने के लिए नहीं बल्कि इस कौम और वतन की आजादी के लिए अपनी जान कुर्बान कर रहे हैं। वे आजादी और अपने हक के लिए लड़ रहे हैं। हालांकि, कुछ देर बाद ही वे अपने बयान से बदल गए और उन्होंने कहा कि हम हिंसा और आतंकवाद का समर्थन नहीं करते। हम चाहते हैं कि नई दिल्ली यहां रियासत के युवाओं के साथ बातचीत  बहाल करे। उनमें बहुत गुस्सा है। हम चाहते हैं कि हाईकोर्ट के किसी जज के नेतृत्व में एक आयोग बने जो युवाओं के बंदूक उठाने के कारणों की जांच करे। उससे पहले नवाए सुब परिसर में स्थित नेशनल कांफ्रेंस के कार्यालय में पार्टी कार्यकर्ताओं के सम्मेलन को संबोधित करते हुए डॉ. फारूक ने बिल्कुल दूसरा बयान दिया था। उन्होंने कश्मीरी में अपने कार्यकर्ताओं को कहा था कि वे कश्मीर की आजादी के लिए अपनी जान दे रहे लड़कों की कुर्बानियों को हमेशा याद रखें। उन्होंने कहा कि सब जानते हैं कि ये लड़के बंदूक क्यों उठा रहे हैं। यह हमारी जमीन है और हम ही इसके असली वारिस हैं। यह लड़ाई सन 1931 से ही जारी है। डॉ. अब्दुल्ला ने कश्मीर समस्या के लिए भारत और पाकिस्तानद दोनों को कोसा। दोनों 1948 में किए गए वादों को भूल गए हैं। उन्होंने कहा कि नई दिल्ली अपनी दमनकारी नीतियों से कश्मीरियों की सियासी उमंगों को नहीं दबा सकती। नई दिल्ली ने हमारी पीढ़ी को धोखा दिया है, लेकिन युवा वर्ग उसके झांसे में नहीं आने वाला। गोली की नीति से अमन नहीं होगा रू कश्मीर समस्या पर फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि गोली के बदले गोली की नीति से अमन नहीं होगा, सिर्फ रियासत के हालात और यादा बिगड़ेंगे। गोली के बजाय बोली की जरूरत है।
इससे पहले 25 नवंबर 2016 को डा अब्दुल्ला बोल चुके थे कि पीओके पर भारत अपना कब्जा कैसे बता सकता है। वह क्या उनकी बपौती है। कश्मीर केवल कश्मीरियों का है। इसके एक साल पहले 27 नवंबर 2015 को उन्होंने दावा किया था कि उन्हें प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि वे कश्मीर मसला सुलझाने के लिए एलओसी से अंतरराश्ट्रीय सीमा मानने को तैयार हो गए थे।
कश्मीर मसला बेहद दिलचस्प है, जो विपक्ष में रहता है, उसे सशस्त्रा आंदोलन या आतंकवाद के प्रति सहानुभति रहती है। यदि पीडीपी के पुराने बयान देखें तो वे फारूख अब्दुल्ला के बयानों से कतई अलग नहीं रहे हैं।  कश्मीर से आए किसी भी बयान पर देश प्रेम के बयान व कश्मीरियों को गाली देने वालों को पहले तो कश्मीर के हालात , उसके अतीत और वहां के लोगों की मानसिक स्थिति को समझना जरूरी होगा। देश को आजादी के साथ ही विरासत में मिली समस्याओं में कश्मीर सबसे दुखी रग है। समय के साथ मर्ज बढ़ता जा रहा है, कई लोग ‘अतीत-विलाप’ कर समस्या के लिए नेहरू या कांग्रेस को दोषी बताते हैं, तो देश में ‘एक ही धर्म, एक ही भाषा या एक ही संस्कृति’ के समर्थक कश्मीर को मुसलमानों द्वारा उपजाई समस्या व इसका मूल कारण धारा 370 को निरूपित करते हैं। जनसंघ के जमाने से कश्मीर में धारा 370 को समाप्त करने का एजेंडा संघ परिवार का ब्रह्मास्त्र रहा है। हालांकि यह बात दीगर है कि जब आडवाणीजी जैसे लोग उप प्रधानमंत्री बने तब कश्मीर और विशेश राज्य के दर्जे जैसे मसले ठंडे बस्ते में डाल दिए गए। ऐसा नहीं है कि सन नब्बे के बाद पाकिस्तान-परस्त संगठनों ने कश्मीर के बाहर देश की राजधानी दिल्ली, मुंबई व कई अन्य स्थानों पर निर्दोश लोगों की हत्या नहीं की हों, लेकिन पांच-सात साल पहले तक इस देशद्रोही काम में केवल पाकिस्तानी ही षांमिल होते थे। जब दुनिया में अलकायदा नेटवर्क तैयार हो रहा था तभी कर्नाटक, महाराश्ट्र, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश में ‘‘इंडियन मुजाहिदीन’ और उससे पहले सिमी के नाम पर स्थानीय मुसलमानों को गुमराह किया जा रहा था।  जब सरकार चेती तब तक कश्मीर के नाम पर बनारस, जयपुर, हैदराबाद  तक में बम फट चुके थे।
    हिमालय के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रा में कोई दो लाख बाईस हजार किलोमीटर में फैले जम्मू-कश्मीर राज्य की कश्मीर घाटी में चिनार जंगलों से अलगाववाद के सुर्ख फूल पनपते रहे हैं। चौदहवीं शताब्दी तक यहां बौद्ध और हिंदू शासक रहे। सन 632 में पैगंबर मुहम्मद के देहावसान के बाद मध्य एशिया में इस्लाम फैला, तभी से मुस्लिम व्यापारी कश्मीर में आने लगे थे। तेरहवीं सदी में लोहार वंश के अंतिम शासक सुहदेव ने मुस्लिम सूफी-संतों को अपने राज्य कश्मीर में प्रश्रय दिया। बुलबुलशाह ने पहली मस्जिद बनवाई। फकीरों, सूफीवाद से प्रभावित होकर कश्मीर में बड़ी आबादी ने इस्लाम अपनाया, लेकिन वह कट्टरपंथी कतई नहीं थे। इलाके के सभी प्रमुख मंदिरों (अमरनाथ सहित) में पुजारी व संरक्षक मुसलमान ही रहे हैं। चौदहवीं शताब्दी में हिंदू राजाओं के पतन के बाद मुस्लिम शासकों ने सत्ता संभाली, परंतु आपसी झगड़ों के कारण वे ज्यादा नहीं चल पाए। उन्नीसवीं सदी के प्रारंभ में यहां सिखों का शासन रहा और फिर आजादी तक डोगरा शासक मुस्लिम बाहुल्य वाले कश्मीर में लोकप्रिय शासक रहे। कश्मीर में कट्टरपंथी तत्व सन् 1942 में उभरे, जब पीर सईउद्दीन ने जम्मू-कश्मीर में जमात-ए-इस्लाम का गठन किया। इस पार्टी की धारा 3 में स्पष्ट था कि वह पारंपरिक मिश्रित संस्कृति को नष्ट कर शुद्ध (?) इस्लामी संस्कृति की नींव डालना चाहता था)
सन 1947 में अनमने मन से द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत को स्वीकारते हुए भारत आजाद हुआ। उस समय देश की 562 देशी रियासतें थीं। हैदराबाद और कश्मीर को छोड़कर अधिकांश रियासतों का भारत में विलय सहजता से हो गया। यह प्रामाणिक तथ्य है कि लार्ड माउंटबैटन ने कश्मीर के राजा हरीसिंह को पाकिस्तान में मिलने के लिए दवाब दिया था। राजा हरिसिंह इसके लिए तैयार नहीं थे और वे कश्मीर को स्विट्जरलैंड की तरह एक छोटा सा स्वतंत्र राज्य बनाए रखना चाहते थे। उधर शेख अब्दुल्ला जनता के नुमांइदे थे और राजशाही के विरोध में आंदोलन करने के कारण जेल में थे। 22 अक्टूबर, 1949 को अफगान और बलूच कबाइलियों ने (पाकिस्तान के सहयोग से) कश्मीर पर हमला कर दिया। भारत ने विलय की शर्त पर कश्मीर के राजा को सहयोग दिया। भारतीय फौजों ने कबाइलियों को बाहर खदेड़ दिया। इस प्रकार 1948 में कश्मीर का भारत में विलय हुआ। इससे पहले कबाइली कश्मीर केे बड़े हिस्से पर कब्जा कर चुके थे। जो आज भी है। भारत और पाकिस्तान का निर्माण ही एक दूसरे के प्रति नफरत से हुआ है। अतः तभी से दोनों देशों की अंतरराष्ट्रीय सीमा के निर्धारण के नाम पर कश्मीर को सुलगाया जाता रहा है। इसमें अंतरराष्ट्रीय हथियार व्यापारी भारत की प्रगति से जलने वाले कुछ देश और हमारे कुछ कम-अक्ल नेता समय-समय पर समस्या की खाई को चौड़ा करते रहे हैं।
उसी समय कश्मीर को बाहरी पूंजीपतियों से बचाने के लिए कश्मीर को विशेष दर्जा धारा 370 के अंतर्गत दिया गया। तब से धारा 370 (केवल कश्मीर में) का विरोध एक सियासती पार्टी के लिए ईंधन का काम करता रहा है। सन 1987 तक यह एक कमाऊ पर्यटन स्थल रहा। आतंकवाद एक अंतरराष्ट्रीय त्रासदी है। कश्मीर में सक्रिय कतिपय अलगाववादी ऐसी ही अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सदस्य हैं। उनका कश्मीर में इस्लाम से उतना ही सरोकार है, जितना धारा 370 की सियासत करने वालों का हिंदुत्व से। संघ परिवार समझता है कि कश्मीर में गोली और लाठी के भय से राष्ट्रद्रोही तत्वों को कुचलना ही मौजूदा समस्या का निदान है। उसका ध्यान उन हालात और तत्व की ओर कतई नहीं हैं जो कश्मीर में आज के संकट की रचना के लिए कारणीभूत हैं। वह यह कुप्रचार करता है कि केवल धार्मिक कट्टरता ही वहां भारत विरोधी जन-उन्मेष का मुख्य कारण है। याद करें, केंद्र की भाजपा समर्पित एक सरकार ने जब कश्मीर की निर्वाचित फारूख सरकार को बर्खास्त कर दूसरी बार जगमोहन को बतौर राज्यपाल भेज दिया था, और उसी के बाद वहां के हालात बद से बदतर होते चले गए है।
हालात चाहे जितने भी बदतर रहे हों  लेकिन कश्मीर समस्या को भारत के लोग एक राजनीतिक या पाकिस्तान-प्रोत्साहित समस्या ही समझते रहे हैं। संसद पर हमले के दोशी अफजल गुरू की फंासी पर जब सुप्रीम कोर्ट ने अपनी मुहर लगाई थी तभी से एक बड़ा वर्ग, जिसमें कुछ कानून के जानकार भी षामिल हैं, दो बात के लिए माहौल बना रहे थे - एक  अफजल को फंासी जरूर हो, दूसरा उसके बाद कभी कानून  का पालन ना करने तो कभी कश्मीर की अशंाति की दुहाई दे कर मामले को देश-व्यापी बनाया जाए। याद करें कुछ साल पहले ही अमेरिका की अदालत ने एक ऐसे पाकिस्तान मूल के अमेरिकी नागरिक को सजा सुनाई थी जो अमेरिका में कश्मीर के नाम पर लॉबिग करने के लिए फंडिंग करता था और उसके नेटवर्क में कई भारतीय भी षामिल थे। जान कर आश्चर्य होगा कि उनमें कई एक हिंदू हैं। प्रशांत भूशण का बयान लोग भूले नहीं है जिसमें उन्हें कश्मीर में रायशुमारी के आधार पर भारत से अलग होने का समर्थन किया था। जब अफजल गुरू को कानूनी मदद की जरूरत थी, तब उसके लिए सहानुभूति दिखाने वाले किताब खि रहे थे, अखबारों में प्रचार कर रहे थे और जिन एनजीओं से संबद्ध हैं , उसके लिए फंड जमा कर रहे थे। जबकि उन्हें मालूम था कि अफजल की कानूनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक लड़ी जा सकती थी।
यह जान लें कि केवल इस लिए फारूख अब्दुल्ला के बयान को देश द्रोह बता दिया जाए कि वह एक मुसलमान हैं या उसे सहजता से लिया जाए क्योंकि वे कश्मीर के इतिहास से जुड़े हैं, दोनों ही हालात ना तो कश्मीर के साथ अैार ना ही वहां संभावित षांति प्रक्रिया के लिए हितकर हैं। कश्मीर में षंाति के लिए आतंकियों के साथ कड़ाई के साथ-साथ आम नागरिकों में विश्वास बहाली भी अनिवार्य है। ऐसे में चाहे डा अब्दुल्ला हों या महबबूबा मुफ्ती या प्रो भीम सिंह या हुरियत के लोग; सभी के बयान व मंशाओं को तत्काल नकार देना उचित नहीं होगा।
 

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

strcit law is requered for wastage of food in marrige and other function

शादियों में भोजन की बर्बादी पर पाबंदी 


हाल ही में एक उम्मीद बंधी है कि भारत में भी विवाह समारोह में होने वाले भव्य दिखावे और खाने की बर्बादी को रोकने के लिए कानून बन जाएगा। ऐसा कानून पाकिस्तान में कई साल से है व उसकी पहल वहां की सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर की थी। यही नहीं पाकिस्तान में इस पर कड़ाई से अमल भी हो रहा है। एक सर्वे के अनुसार, अकेले बंगलुरु शहर में हर साल शादियों में 943 टन पका हुआ खाना बर्बाद होता है। इस खाने से लगभग 2.6 करोड़ लोगों को एक समय का सामान्य भारतीय खाना खिलाया जा सकता है। दिल्ली में ऐसा कोई सर्वे हुआ नहीं, लेकिन यहां की शादियों में अन्न की बर्बादी बंगलूरु से कहीं बहुत ज्यादा ही होगी...


हाल ही में जम्मू-कश्मीर की सरकार ने अपने एक अभूतपूर्व फैसले में शादी समारोह में मेहमानों से लेकर व्यंजनों की संख्या तक सीमित कर दी। राय के खाद्य, जन-वितरण एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्री जुल्फिकार अली के अनुसार शादियों एवं अन्य सामाजिक समारोहों में खाद्य पदार्थो की बर्बादी और दिखावा रोकने की गरज से किया गया यह फैसला एक अप्रैल से लागू होगा। राय में अब ऐसे समारोहों में डीजे और आतिशबाजी का इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा। इसके अलावा निमंत्रण कार्ड के साथ मिठाई-मेवे देने पर भी पाबंदी रहेगी। सरकार ने साफ कहा है कि लड़के की शादी में चार सौ और लड़की की शादी में पांच सौ से अधिक मेहमान शिरकत नहीं करेंगे। जन्मदिन अथवा अन्य छोटे कार्यक्रमों के लिए यह संख्या सौ रहेगी। मेहमानों को सिर्फ सात स}िजयां परोसी जा सकेंगी वे चाहे शाकाहारी हों अथवा मांसाहारी। मीठे व्यंजनों की गिनती भी दो ही रहेगी। यही नहीं, यदि प्लास्टिक की सामग्री का इस्तेमाल होगा तो समारोह के बाद उसका निबटान भी करना होगा। इस फैसले की अवहेलना करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान किया गया है। आगामी विधानसभा सत्र में राय सरकार इस बाबत एक विधेयक भी लाएगी ताकि कानून बनाया जा सके।
हाल ही में एक उम्मीद बंधी है कि भारत में भी विवाह समारोह में होने वाले भव्य दिखावे और खाने की बर्बादी को रोकने के लिए कानून बन जाएगा। ऐसा कानून पाकिस्तान में कई साल से है व उसकी पहल वहां की सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका पर की थी। यही नहीं पाकिस्तान में इस पर कड़ाई से अमल भी हो रहा है। एक सर्वे के अनुसार, अकेले बंगलुरु शहर में हर साल शादियों में 943 टन पका हुआ खाना बर्बाद होता है। इस खाने से लगभग 2.6 करोड़ लोगों को एक समय का सामान्य भारतीय खाना खिलाया जा सकता है। दिल्ली में ऐसा कोई सर्वे हुआ नहीं, लेकिन यहां की शादियों में अन्न की बर्बादी बंगलूरु से कहीं बहुत ज्यादा ही होगी। अब यदि इस आंकड़े को देश के 29 राज्यों के 650 से अधिक जिलों के परिप्रेक्ष्य में देखें तो अंदाज लगाया जा सकता है कि अकेले विवाह समारोह में खाने की बर्बादी को रेाक कर पूरे देश के हर एक भूखे को सालभर भरपेट पौष्टिक भोजन मुहैया करवाया जा सकता है। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में हर साल 23 करोड़ दाल, 12 करोड़ टन फल और 21 करोड़ टन सब्जियां वितरण प्रणाली में खामियों के चलते खराब हो जाती हैं। विश्व भूख सूचकांक में भारत का स्थान 67वां है और यह बेहद शर्मनाक बात है कि यहां हर चौथा व्यक्ति भूख से सोने को मजबूर है।
 जहां सामाजिक जलसों में परोसा जाने वाला आधे से ज्यादा भोजन कूड़ाघर का पेट भरता है, वहां ऐसे भी लोग हैं, जो अन्न के एक दाने के अभाव में दम तोड़ देते हैं। बंगाल के बंद हो गए चाय बागानों में आए रोज मजूदरों के भूख के कारण दम तोड़ने की बात हो या फिर महाराष्ट्र में अरबपति शिरडी मंदिर के पास ही मेलघाट में हर साल हजारों बच्चों की कुपोषण से मौत की खबर या फिर राजस्थान के बारां जिला हो या मध्य प्रदेश का शिवपुरी जिला, सहरिया आदिवासियों की बस्ती में पैदा होने वाले कुल बच्चे के अस्सी फीसदी के उचित खुराक न मिल पाने के कारण छोटे में ही मर जाने के वाकिये इस देश में हर रोज हो रहे हैं, लेकिन विज्ञापन में मुस्कुराते चेहरों, दमकती सुविधाओं के फेर में वास्तविकता से परे उन्मादित भारतवासी तक ऐसी खबरें या तो पहुंच नहीं रही हैं या उनकी संवेदनाओं को झकझोर नहीं रही हैं। देशभर के कस्बे-शहरों से आएरोज गरीबी, कर्ज व भुखमरी के कारण आत्महत्या की खबरें आती हंै, लेकिन वे किसी अखबार की छोटी सी खबर बन कर समाप्त हो जाती है।

इन दिनों बुंदेलखंड की आधी ग्रामीण आबादी सूखे से हताश हो कर पेट पालने के लिए अपने घर-गांव से पलायन कर चुकी है।भूख से मौत या पलायन, वह भी उस देश में जहां खाद्य और पोषण सुरक्षा की कई योजनाएं अरबों रूपए की सब्सिडी पर चल रही हैं, जहां मध्यान्ह भोजन योजना के तहत हर दिन 12 करोड़ बच्चों को दिन का भरपेट भोजन देने का दावा हो, जहां हर हाथ को काम व हर पेट को भोजन के नाम पर हर दिन करोड़ों का सरकारी फंड खर्च होता हो, दर्शाता है कि योजनाओं व हितग्राहियों के बीच अभी भी पर्याप्त दूरी है। वैसे भारत में हर साल पांच साल से कम उम्र के 10 लाख बच्चों के भूख या कुपोषण से मरने के आंकड़े संयुक्त राष्ट्र संगठन ने जारी किए हैं। ऐसे में नवरात्र पर गुजरात के गांधीनगर जिले के एक गांव में माता की पूजा के नाम पर 16 करोड़ रुपए दाम के साढ़े पांच लाख किलो शुद्ध घी को सड़क पर बहाने, मध्य प्रदेश में एक राजनीतिक दल के महासम्मेलन के बाद नगर निगम के सात ट्रकों में भर कर पूड़ी व सब्जी कूड़ेदान में फेंकने की घटनाएं बेहद दुभाग्यपूर्ण व शर्मनाक प्रतीत होती हैं।शादियों में फिजूलखर्ची व धन की बर्बादी के खिलाफ कानून बनाने का विचार यूपीए शासन में राष्ट्रीय सलाहकार समिति के सामने भी आया था। यूपीए के तत्कालीन खाद्य मंत्री केवी थामस ने 2011 में ऐसे समारोहों में हजारों टन पका हुआ भोजन नष्ट होने को देखते हुए कानून बनाने के लिए पहल करने तक की घोषणा कर डाली थी। इस पर लगाम कसने के लिए शादियों में मेहमानों की संख्या को नियंत्रित करने से लेकर कई तरह की बातें भी उस कानून में शामिल थीं। मगर मेहमानों की संख्या को कानूनी रूप से नियंत्रित करने के संभावित विरोध को देखते उस पर आगे बढ़ने से सरकार डर गई थी। एक बार फिर शादियों में भोजन की बर्बादी और दिखावा रोकने के लिए कानून बनाने की पहल करने संबंधी निजी बिल को कानून मंत्रालय ने राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की मंजूरी के लिए उनके पास भेज दिया है। राष्ट्रपति की हरी झंडी मिलने के बाद लोकसभा में यह निजी विधेयक चर्चा के लिए आ सकेगा। बिहार से कांग्रेस की सांसद रंजीत रंजन ने शादियों में खाने की बर्बादी रोकने के साथ विवाह का पंजीकरण कानूनी रूप से अनिवार्य बनाने के लिए बीते साल इस निजी विधेयक को लोकसभा में पेश करने का प्रस्ताव रखा है। इस बिल के प्रारूप को वैधानिक मानकों पर परखने के बाद इसे मंजूरी के लिए राष्ट्रपति के पास बीते हफ्ते भेज दिया है। यदि राष्ट्रपति से इसकी मंजूरी मिल जाती है और निजी विधेयक के तौर पर यह सदन में पारित भी हो जाता है तो यह कानून का रूप नहीं ले सकेगा। सरकार जब तक ऐसा कोई बिल नहीं लाती, तब तक इस दिशा में कोई कानून नहीं बन सकता। इस दिशा में कैसे आगे बढ़ें, इसके लिए हम पाकिस्तान से काफी सीख सकते हैं। असल में जनवरी-2015 में एक जनहित याचिका पर फैसला सुनाते हुए पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने शादी-विवाह में दिखावे को रोकने के आदेश दिए थे। इसके आधार पर पहले पांजा और उसके बाद सिंध राज्य की विधान सभाओं ने बाकायदा विधेयक पारित किए। पाकिस्तान में कानून है कि शादी या अन्य समारोह में एक से ज्यादा मुख्य व्यंजन नहीं परोसे जा सकते। यह सुप्रीम कोर्ट ने बता दिया है कि एक करी, चावल, नान या रोटी, एक किस्म की सलाद और दही या रायता से ज्यादा परोसना गैरकानूनी है। विभिन्न राज्यों में पारित कानून में रात में दस बजे के बाद विवाह समारोह पर पाबंदी, घर के बाहर, पार्क या गली में बिजली के बल्बों की सजावट और हर तरह की आतिशबाजी के साथ-साथ दहेज के सामान की जाहिरा नुमाइश पर भी पाबंदी है। कानून का उल्लंघन करने पर एक महीने की सजा और पचास हजार से दो लाख रुपए तक के जुर्माने का प्रावधान है। हालांकि पाकिस्तान में शुरुआत में जमींदार वर्ग के लोगों ने इसका विरोध किया, कुछ लोग अदालत भी गए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व के आदेश में किसी भी तरह की तब्दीली से इनकार कर दिया। दूसरी तरफ , आम लोगों ने इस कानून का खुलकर स्वागत किया। वहां प्रशासन ने इस कानून को लागू करवाने का जिम्मा बारात घरों, बैंक्वेट, फार्म हाउस आदि पर डाल रखा है। और यदि कहीं कानून टूटता पाया गया तो इस संस्थान के मालियों पर सबसे पहले कार्यवाही होती है। पिछले साल पाकिस्तान की केंद्रीय सरकार के एक मंत्री भी इस कानून की चपेट में आ चुके हैं। सनद रहे, पाकिस्तान में भले ही यह कानून सख्ती से लागू है, लेकिन वहां इसकी काट भी ढूंढ ली गई है। अब रुतबेदार लोग शादी के कार्ड के साथ आलीशान रेस्त्रां के कूपन बांटते हैं, रिश्तेदार शादी में आते हैं और फिर उन्हें रेस्त्रां में भेज दिया जाता है, जहां वे आलीशान भोजन करते हैं। हालांकि, इतना होने पर भी खाने की बर्बादी काफी कुछ रुकी है। यह भी जानना जरूरी है कि सन् 1966 में असम की विधानसभा ने कुछ ऐसा ही एक विधेयक पारित किया था, जिसमें छोटे समारोह में 25 और विवाह में अधिकतम 100 लोगों को ही भोजन के लिए बुलाने का प्रावधान था। दुर्भाग्य से वह कानून कहीं लाल बस्ते में गुम हो गया। याद रहे हम जितना अन्न बर्बाद करते हैं, उतना ही जल भी बर्बाद होता है, उतनी ही जमीन की उर्वरा क्षमता भी प्रभावित होती है।

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

Conservation of traditional water bodies are more important than new digging


पुराने तालाबों की किसे है चिंता

अनुमान के तौर पर मुल्क में आजादी के समय लगभग 24 लाख तालाब थे। बरसात का पानी इन तालाबों में इकट्ठा हो जाता था और वह भूजल स्तर को बनाए रखने के लिए बहुत जरूरी होता था। अकेले मद्रास प्रेसीडेंसी में ही पचास हजार तालाब और मैसूर राय में 39 हजार तालाब होने की बात अंग्रेजों का राजस्व रिकॉर्ड दर्शाता है, लेकिन इनमें यादातर का अस्तित्व अब खत्म हो चुका है। अहम सवाल यह है कि शेष जलाशयों को कैसे बचाया जाए

देश के वित्त मंत्री ने संसद में सालाना बजट पेश करते हुए बताया कि बीते एक साल के दौरान मनरेगा के तहत पांच लाख तालाब खोद दिए गए। आगे फरवरी-2018 तक ऐसे ही पांच लाख तालाब यानी कुल दस लाख तालाब, मनरेगा के तहत खोद दिए जाएंगे। जब इतने जिम्मेदार मंत्री संसद में यह बात बोल रहे हैं तो जाहिर है इस ‘जल-क्रांति’ पर शक का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता है। मान लिया जए कि ये वे कुंड हैं जिन्हें खेत में खोदा जा रहा है और उन्हें ‘खेत तालाब’ कह दिया जा रहा है; तो भी यह बरसात के पानी को बचाने के साथ जमीन की नमी बरकरार रखने का शानदार काम है। यदि आने वाले वर्षो में पानी कम भी बरसे तो अब किसान को सूखे की चिंता कम ही होगी। अछी बात है कि किसी सरकार ने लगभग 73 साल पुरानी एक ऐसी रिपोर्ट पर अमल करने की सोची जोकि 1943 के भयंकर बंगाल अकाल में तीन लाख से यादा मौत होने के बाद ब्रिटिश सरकार की ओर से गठित एक आयोग की सिफारिशों में थी। 1944 में आई अकाल जांच आयोग की रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत जैसे देश में नहरों से सिंचाई के बनिस्पत तालाब खोदने व उनके रखरखाव की यादा जरूरत है। 1943 में ‘ग्रो मोर कैंपेन’ चलाया गया था जोकि बाद में देश की पहली पंचवर्षीय योजना का हिस्सा बना, उसमें भी लघु सिंचाई परियोजनाओं यानी तालाबों की बात कही गई थी। उसके बाद भी कई-कई योजनाएं बनीं। मध्य प्रदेश जैसे राय में ‘सरोवर हमारी धरोहर’ जैसे अभियान चले। लेकिन दिल्ली हो या बेंगलुरु या फिर छतरपुर या लखनऊ सभी जगह विकास के लिए रोपी गई कॉलोनियां, सड़कों, कारखानों, फ्लाई ओवरों को तालाब को समाप्त कर ही बनाया गया। अनुमान के तौर पर मुल्क में आजादी के समय लगभग 24 लाख तालाब थे। बरसात का पानी इन तालाबों में इकट्ठा हो जाता था और वह भूजल स्तर को बनाए रखने के लिए बहुत जरूरी होता था। अकेले मद्रास प्रेसीडेंसी में ही पचास हजार तालाब और मैसूर राय में 39 हजार होने की बात अंग्रेजों का राजस्व रिकॉर्ड दर्शाता है।
बुंदेलखंड के सूखे के लिए सबसे यादा पलायन के लिए बदनाम टीकमगढ़ जैसे छोटे से जिले में हजार से यादा तालाब होने और इनमें से 400 से यादा गुम हो जाने का रिकॉर्ड तो अब भी मौजूद है। उत्तर प्रदेश के पीलीभीत, लखीमपुर और बरेली जिलों में आजादी के समय लगभग 182 तालाब हुआ करते थे। उनमें से अब महज 20 से 30 तालाब ही बचे हैं, इनमें भी पानी की मात्र न के बराबर है। दिल्ली में अंग्रेजों के जमाने में लगभग 500 तालाबों के होने का जिक्र मिलता है, लेकिन कथित विकास ने इन तालाबों को लगभग समाप्त ही कर दिया। देशभर में फैले तालाबों, बावड़ियों और पोखरों की वर्ष 2000-01 में गिनती की गई थी। देश में इस तरह के जलाशयों की संख्या साढ़े पांच लाख से यादा है, आजादी के बाद के 53 सालों में हमारा समाज कोई 20 लाख तालाब चट कर गया। इतने तालाब बनवाने का खर्च आज कई लाख करोड़ बैठेगा। सनद रहे ये तालाब मनरेगा वाले छोटे से गड्ढे नहीं हैं, इनमें से अधिकांश कई-कई वर्ग किलोमीटर तक फैले हुए हैं।
वर्ष 2001 में देश की 58 पुरानी झीलों को पानीदार बनाने के लिए केंद्र सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रलय ने राष्ट्रीय झील संरक्षण योजना शुरू की थी। इस योजना में कुल 883.3 करोड़ रुपये का प्रावधान था। इसके तहत मध्य प्रदेश की सागर झील, रीवा का रानी तालाब और शिवपुरी झील, कर्नाटक के 14 तालाबों, नैनीताल की दो झीलों सहित 58 तालाबों की गाद सफाई के लिए पैसा बांटा गया। इसमें राजस्थान के पुष्कर का कुंड और धरती पर जन्नत कही जाने वाली श्रीनगर की डल झील भी थी। झील सफाई का पैसा पश्चिम बंगाल और पूवरेत्तर रायों को भी गया। अब सरकार ने मापा तो पाया कि इन सभी तालाबों से गाद निकली गई या नहीं, किसी को इसकी जानकारी नहीं। लेकिन इसमें पानी पहले से भी कम हो गया। केंद्रीय जल आयोग ने जब पड़ताल की तो कई तथ्य सामने आए। कई जगह तो गाद निकाली ही नहीं गई जबकि उसकी ढुलाई पर पैसा खर्च हो गया। कुछ जगह गाद निकाल कर किनारों पर ही छोड़ दी, जोकि अगली बारिश में फिर तालाब में गिर गई। दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान 2005 में केंद्र सरकार ने जलाशयों की मरम्मत, नवीकरण और मरम्मत के लिए योजना बनाई। ग्यारहवीं योजना में काम शुरू भी हो गया। राय सरकारों को योजना को अमली जामा पहनाना था। इसके तहत इन जलाशयों की क्षमता बढ़ाना, सामुदायिक स्तर पर बुनियादी ढांचे का विकास करना था। बस खटका वही है कि तालाब का काम करने वाले दीगर महकमे तालाब तो तैयार कर रहे हैं, लेकिन तालाब को तालाब के लिए नहीं। मछली वाले को मछली चाहिए तो सिंचाई वाले को खेत तक पानी जबकि तालाब पर्यावरण, जल, मिट्टी, जीवकोपार्जन की एक एकीकृत व्यवस्था है और इसे अलग-अलग आंकना ही बड़ी भूल है। सबसे बड़े सवाल खड़े हुए खेत-तालाब योजना पर। इस योजना में उत्तर प्रदेश सरकार ने पिछली गर्मी में कुल एक लाख पांच हजार का व्यय माना और इसका आधा सरकार ने जमा किया। कहा गया कि आधा किसान वहन करता है। रिवई पंचायत, महोबा से कानपुर जाने वाले मुख्य मार्ग पर है और इसमें तीन गांव आते हैं। यहां खेतों में अभी तक 25 तालाब बने। इनमें से अधिकांश तालाब गांव के रसूखदार लोगों के खेत में हैं।
तालाब महज एक गड्ढा नहीं है, जिसमें बारिश का पानी जमा हो जाए और लोग इस्तेमाल करने लगें। तालाब कहां खुदेगा, इसको परखने के लिए वहां की मिट्टी, जमीन पर जल आने और जाने की व्यवस्था, स्थानीय पर्यावरण का ख्याल रखना जरूरी होता है। राजस्थान के लापोरिया में कई तालाब बनाने वाले लक्ष्मण सिंह का कहना है कि इस संरचना को तालाब नहीं कहते हैं। इस तरह की आकृति भले ही तात्कालिक रूप से जमीन की नमी बनाए रखने या सिंचाई में काम आए, लेकिन इसकी आयु यादा नहीं होती। दूसरा, यदि पीली या दुरमट मिट्टी में तालाब खोदें तो धीरे-धीरे पानी जमीन में बैठेगा, दल-दल बनाएगा और फिर उससे न केवल जमीन की उर्वरकता नष्ट होगी, बल्कि उसमें पाए जाने वाले प्राकृतिक लवण भी पानी के साथ बह जाएंगे। कल्पना करें, पांच लाख तालाब। यदि एक तालाब एक एकड़ का है तो, घट रही खेती की जमीन में पांच लाख एकड़ की सीधे कमी हो जाएगी। शुरुआत में भले ही अछे परिणाम आएं, लेकिन यदि नमी, दलदल, लवण बहने का सिलसिला अगर पंद्रह साल भी जारी रहा तो उस तालाब के आसपास लाइलाज बंजर बनना वैज्ञानिक तथ्य है। दीर्घकालीन जल-प्रबंधन के लिए पारंपरकि जल संरचनओं को सहेजना होगा।

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

Will muslim become in majority in India ?

क्या वास्तव में मुसलमान भारत में बहुसंख्यक हो जायेंगे ?

मुसलमानों की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है और जल्दी ही वे हिंदुओं से अधिक हो जाएगी।’ यह एक ऐसा मिथक है, जिसका भय कई-पढ़े लिखे शहरियों को भी है। हाल ही में एक जिम्मेदार राजनेता ने भी ऐसा ही कुछ बयान दिया, हालांकि उनका इरादा पूर्वोत्तर राज्यों में, खासतौर पर अरुणाचल प्रदेश व मिजोरम में ईसाइयों की बढ़ती आबादी पर चिंता जताना था, लेकिन यदि उत्तर प्रदेश में चुनाव हों तो ऐसे बयान कहीं और मार करते दिखते हैं। यह एक बेहद प्रचारित जुमला है कि मुसलमान जानबूझ कर कई-कई शादी करते हैं और साजिशन देश की आबादी बढ़ाते हैं। यदि पिछली कुछ जनगणनाओं के अंाकड़ों पर नजर डालें तो हकीकत सामने आ जाती है। यही नहीं यदि इसके के मूल सिद्धांतों को ठीक से समझा-पढ़ा जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि बच्चों की अनियंत्रित संख्या इसकी मूल भावना के विपरीत है। यह विडंबना है कि समाज को तोड़ने वाले लोग, जो दोनों फिरकों में हैं, ऐसे मिथकों को हवा देते हैं, जबकि कतिपय लोग इस्लाम के नाम पर ऐसी भ्रांतियों को हवा देते हैं।
आंकड़े बोलते हैं कि गत 50 वषोंर् के दौरान भारत में हिंदुओं की आबादी कुछ कम हुई है, जबकि मुसलमानों की कुछ बढ़ी है। यह भी तथ्य है कि बीते दस सालों के दौरान मुस्लिम और हिंदू आबादी का प्रतिशत स्थिर है। अगर जनसंख्या वृद्धि की यही रफ्तार रही तो मुसलमानों की आबादी को हिंदुओं के बराबर होने में 3626 साल लग जाएंगे। वैसे भी समाजविज्ञानी यह बता चुके हैं कि सन् 2050 तक भारत की आबादी स्थिर हो जाएगी और उसमें मुसलमानों का प्रतिशत 13-14 से अधिक नहीं बनेगा।भारत सरकार की जनगणना के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो पाएंगे कि 1971 से 81 के बीच हिंदुओं की जन्मदर में वृद्धि का प्रतिशत 0.45 था, लेकिन मुसलमानों की जन्मदर में 0.64 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। गत् 20 वषोंर् के दौरान मुसलमानों में परिवार नियोजन के लिए नसबंदी का प्रचलन लगभग 11.5 प्रतिशत बढ़ा है, जबकि हिंदुओं में यह 10 प्रतिशत के आसपास रहा है। यहां यह भी जानना जरूरी है कि जनसंख्या वृद्धि की दर को सामाजिक-आर्थिक परिस्थितयां सीधे-सीधे प्रभावित करती हैं। शिक्षित व संपन्न समाज में नियोजित परिवार की बानगी हमारे देश में ईसाई जनसंख्या के आंकड़े हैं।
सन् 1950 से 60 के बीच भारत में ईसाइयों की जनसंख्या अपेक्षाकृत तेज रफ्तार से बढ़ी थी। भले ही कतिपय लोग इसे धर्मांतरण के कारण कहें, लेकिन हकीकत यह है कि उस दशक में स्वास्थ्य और शिक्षाओं में सुधार होने के कारण ईसाइयों की मृत्यु दर कम हो गई थी। परंतु जन्म दर उतनी ही थी। 70 के दशक में ईसाइयों की जनसंख्या में बढ़ोतरी का आंकड़ा लगभग स्थिर हो गया, क्योंकि उस समाज को परिवार नियोजन का महत्व समझ में आ गया था। यह प्रक्रिया हिंदुओं में, ईसाइयों की तुलना में थोड़ी देर से शुरू हुई। मुसलमानों में इसे और भी देर से शुरू होना ही था, क्योंकि आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से मुसलमान समाज बेहद पिछड़ा हुआ है। एक बात और गौर करने लायक है कि बांग्लादेश की सीमा से लगे पश्चिम बंगाल के छह, बिहार के चार और असम के 10 जिलों की आबादी के आंकड़ों पर निगाह डालें तो पाएंगे कि गत 30 वषोंर् में यहां मुसलमानों की आबादी बहुत तेजी से बढ़ी। और, इतनी तेजी से कि वहां के बहुसंख्यक हिंदू, अब अल्पसंख्यक हो गए। असम और बंगाल के कुछ जिलों में तो मुस्लिम आबादी का उफान 100 फीसदी से अधिक है। असल में ये अवैध विदेशी घुसपैठिए हैं। जाहिर है कि ये आबादी भी देश की जनगणना में जुड़ी है और यह बात सरकार में बैठे सभी लोग जानते हैं कि इस बढ़ोतरी का कारण गैरकानूनी रूप से हमारे यहां घुस आए बांग्लादेशी हैं। महज वोट की राजनीति और सस्ते श्रम के लिए इस घुसपैठ पर रोक नहीं लग पा रही है, और इस बढ़ती आबादी के लिए इस देश के मुसलमानों को कोसा जा रहा है।
एक यह भी खूब हल्ला होता है कि मुसलमान परिवार नियोजन का विरोध करता है। बच्चे तो अल्लाह की नियामत हैं, उन्हें पैदा होने से रोकना अल्लाह की हुक्म उदूली होता है, यह बात इस्लाम कहता है और तभी मुसलमान खूब-खूब बच्चे पैदा करते हैं, इस तरह की धारणा या यकीन देश में बहुत से लोगों को है और वे तथ्यों के बनिस्पत भावनात्मक नारों पर ज्यादा यकीन करने लगते हैं। वैसे तो जनगणना के आंकड़ों का विश्लेषण साक्षी है कि मुसलमानों की आबादी में अप्रत्याशित वृद्धि या उनकी जन्म दर अधिक होने की बात तथ्यों से परे है। साथ ही मुसलमान केवल भारत में तो रहते नहीं है या भारत के मुसलमानों की ‘शरीयत’ या ‘हदीस’ अलग से नहीं है। इंडोनेशिया, इराक, टर्की, पूर्वी यूरोप आदि के मुसलमान नसबंदी और परिवार नियोजन के सभी तरीके अपनाते हैं। भारत में अगर कुछ लोग इसके खिलाफ है तो इसका कारण धार्मिक नहीं, बल्कि अज्ञानता और अशिक्षा है। गांवों में ऐसे हिंदुओं की बड़ी संख्या है, जो परिवार नियोजन के पक्ष में नहीं हैं।यह बात सही है कि इस्लाम में गर्भपात यानी एबॉर्शन पर सख्त मनाही है। कुरआन में कहा गया है कि मुफलिसी के डर से अपने बच्चे का कत्ल न करो। इस्लाम के अनुसार, शादी अपने से बेहतर औलाद छोड़कर जाने के लिए है, न कि अपने से ज्यादा संतान छोड़ कर जाने के लिए। ईरान ने परिवार नियोजन के जरिए ही अपनी आबादी में वृद्धि को एकदम नियंत्रित कर दिया है, अगर इस्लाम में परिवार नियोजन की अनुमति न होती तो ईरान जैसे देश में ये कैसे हो पाता? पाकिस्तान सरकार अपने यहां पूरा परिवार नियोजन विभाग चलाती है। स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत कार्यक्रम बराए बहबूदे परिवार नामक एक विभाग का गठन किया गया है, जिसके लिए सरकार हर वर्ष करोड़ों रुपए का बजट स्वीकार करती है। पाकिस्तान के महिला संगठनों का कहना है कि पाकिस्तान का मध्यम वर्ग इस कार्यक्रम में गहरी आस्था रखता है। सिंध में जमींदार इसके विरोधी हैं, क्योंकि उन्हें अपने खेतों में मजदूरी के लिए अधिक बच्चे चाहिए। पाकिस्तान में कृषि अधिकतर बच्चों की मजदूरी पर अवलंबित है, इसलिए वे परिवार नियोजन को इस्लाम विरोधी प्रचारित करते हैं। पाकिस्तान सरकार के मंत्री भी अब इस अभियान के पक्ष में बोलने लगे हैं। गर्भ निरोधक सामग्री बड़े पैमाने पर जनता में वितरित की जाती है। पिछले दिनों एक चीनी कंपनी के साथ प्रतिमाह गर्भ निरोधक आयात करने का समझौता भी किया गया है। पाकिस्तान सरकार के परिवार नियोजन के सलाहकारों में चीनी चिकित्सकों व सहायकों का अधिक समावेश किया गया है। पाकिस्तान का एक अध्ययन दल इस संबंध में और अधिक जानकारी के लिए चीन गया था, ताकि चीनी सरकार द्वारा किए गए जनसंख्या नियंत्रण उपायों का अध्ययन किया जा सके। इस संबंध में अनेक चीनी पद्धतियों को पाकिस्तान के अस्पतालों और परिवार नियोजन केंद्रों पर प्रचारित भी किया गया है।इस्लाम के धार्मिक ग्रंथ आजाल में जनसंख्या नियंत्रण के तौर तरीकों का उल्लेख है। इसमें कहा गया है कि मां का दूध पर केवल बच्चे का हक है और जब तक बच्चा 30 से 36 महीने का नहीं हो जाता, उससे यह हक नहीं छीना जाना चाहिए। स्पष्ट है कि जब तक बच्चा तीन वर्ष का नहीं हो जाता दूसरे बच्चे के जन्म के बारे नहीं सोचना चाहिए।यदि धार्मिक आधार पर देखें तो इस्लाम का परिवार नियोजन विरोधी होने की बात महज तथ्यों के साथ हेराफेरी है। फातिमा इमाम गजाली की मशहूर पुस्तक ‘इहया अल उलूम’ में पैगंबर के उस कथन की व्याख्या की है, जिसमें वे छोटे परिवार का संदेश देते हैं। हजरत मुहम्मद की नसीहत है -छोटा परिवार सुगमता है। उसके बड़े हो जाने का नतीजा है गरीबी। दसवीं सदी में रजी की किताब ‘हवी’ में गर्भ रोकने के 176 तरीकों का जिक्र है। ये सभी तरीके कोई जादू-टोना नहीं, बल्कि वैज्ञानिक हैं। भारत में सूफियों के चारों इमाम-हनफी, शाफी, मालिकी और हमबाली समय-समय पर छोटे परिवार की हिमायत पर तकरीर करते रहे हैं। विडंबना है कि हर फिजूल बातों में फतवे जारी करने वाले मुल्ले-मौलवी धर्म की सही व्याख्या कर आम मुसलमान को छोटे परिवार की सही जानकारी देते नहीं हैं। वैसे तो आज मुसलमानों का बड़ा तबका इस हकीकत को समझने लगा है, लेकिन दुनियाभर में इस्लामिक आतंकवाद के नाम पर खड़े किए गए हौए ने अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना और उसके कारण संगठत होने को मजबूर किया है। इसका फायदा कट्टरपंथी जमातें उठा रही हैं और इस्लाम की गलत तरीके से व्याख्या कर सीमित परिवार की सामाजिक व धार्मिक व्याख्या विपरीत तरीके से कर रही हैं। यह तय है कि सीमित परिवार, स्वस्थ्य परिवार और शिक्षित परिवार की नीति को अपनाए बगैर भारत में मुसलमानों की व्यापक हालत में सुधार होने से रहा। लेकिन यह भी तय है कि न तो मुसलमान कभी बहुसंख्यक हो पाएगा और न ही इस्लाम सीमित परिवार का विरोध करता है।

our inteligence system needs to be tight in Kashmir

कश्मीर में अपने खुफिया तंत्र को मजबूत करना होगा
पंकज चतुर्वेदी

बीते कुछ घंटे कश्मीर में भारत के सुरक्षा बलों के लिए बेहद दुखदायक रहे हैं। कुछ आतंकियों को मारने के लिए हमारे सात जाबांज जवान श् हीद हुए, वह भी इस लिए कि आतंकियों से मुठभेड़ में आम लोगों को कोई नुकसान ना हो। बुरहान वाणी के मारे जाने के बाद से ही कश्मीर शांत नहीं हो पाया है। वहीं आतंकी सुरक्षा बलों का कसता षिकंजा देख कर अपनी पुरानी कायराना हरकत कर रहे हैं- आम लोगों की भीड़ एकत्र करना, उनसे पथराव करवाना और उसकी आड़ में सुरक्षा बलों पर हमला करना। लगे। यह किसी से छिपा नहीं है कि भारत-पाकिस्तान के बीच विश्वास शब्द की कोई जगह नहीं है और कश्मीर में अस्थिरता, आतंकियों को घुसाने और एक कमजोर सेना द्वारा अपना छद्म मनोबल बढ़ाने के प्रयासों के तहत पाकिस्तान ऐसी हरकतें करता रहता है। अपने सैनिकों की मौत पर दुख होना, गुस्सा होना लाजिमी है, लेकिन अब समय आ गया है इस बात पर विचार करने का कि आखिर क्यों हमारे सैनिक इतनी बड़ी संख्या में सीमा पर इस तरह धोखे से बार-बार मारे जा रहे हैं। याद करें कि तीन साल पहले तत्कालीन सेना प्रमुख विक्रम सिंह ने यह पता लगाने के आदेश दिए थे कि हमारी रणनीति में कहां कमजोरी है कि घुसपैठियें हमारी सीमा में भीतर घुस कर हमला कर सुरक्षित वापिस जा रहे हैं। पता नहीं उस जांच के क्या नतीजे निकले, लेकिन यह कटु सत्य है कि पिछले कई दिनों से आतंकियों की तुलना में हमारे सैनिक ज्यादा मारे जा रहे हैं।इस मसले पर मेरा आलेख आज "राज एक्सप्रेस" मध्य प्रदेश में . इसे मेरे ब्लॉग पर भी पढ़ सकते हैं pankajbooks.blogspot.in 
 11 फरवरी की रात कुलगाम जिले के यारीपुर में एक घर में आतंकियों के छुपें होने की खबर पर फौज ने दबिष दी। कुछ लेग जुड़कर सेना के खिलाफ नारे लगाने लगे, पत्थर चलाने लगे। उन लोगों को बचाते हुए जब सेना ने आतंकियों पर धावा बोला तो हमारे तीन जवान षहीद हुए। हालांकि इस मुठभेड़ में सभी चर आतंकी भी मारे गए। 14 फरवरी के तड़के बांदीपुरा जिले मुहल्ला हाजन में तलाषी अभियान के दौरान आतंकियों ने सीआरपीएफ की टुकड़ी पर पहले हथगोले फैंके और फिर एसाल्ट रईफलों से गोलियां चलाईं। इससे सीआरपीएफ के कमांडेंट चेतन थापा व अन्य तीन जवान षहीद हो गए। यहां केवल एक आतंकी मारा गया,षेश आतंकी आम लोगों की भीड़ की ढाल बना कर भाग गए। जान लें कि कष्मीर में बांदीपुरा और कुपवाड़ा जिले आतंकियों की  घुसपैठ के लिहाज से सबसे ज्यादा संवेदनषील हैं। यहां सीमा पर ऊचें पहाड़ हें व पाकिस्तान के आतंकियों के सबसे ज्यादा लांचिंग पेड यहीं होने की पुख्ता सूचना हमारे सुरक्षा बलों के पास हैं। ठीक उसी तरह कुलगाम पीरपंजाल पर्वतमाला से घिरा है और यहां से आतंकियों के घुसने की संभावना ज्यादा रहती हे। कष्मीर में पीओके यानि पाकिस्तान के कब्जे वाले कष्मीर की सीमा कोई तीन सौ किलोमीटर है।
इस साल के अभी दो महीने पूरे नहीं हुए है और अकेले कष्मीर में सेना व अन्य सुरक्षा बलों के 12 जवान षहीद हो चुके हैं और लगभग सभी हमारी सीमा में, और कुछ मुठभेड़ों को छोड़ दें तो घात लगा कर किए गए हमलों में। सनद रहे आमतौर पर पाकिस्तान से जुड़ी हमारी लगभग 3300 किलोमीटर की सीमा पर कंटीले तार लगाने का काम हो चुका है। वैसे नियम यह है कि सीमा पर सीमा सुरक्षा बल की टुकड़ियां गष्त करती है, टकराव होने पर अर्ध सैनिक बल पीछे आते हैं और सेना सीधे मुकाबले पर आती है, ऐसा हम छह देषों की सीमाओं पर करते हैं, लेकिन पंजाब व कष्मीर के बड़े हिस्से में हमारी सेना ही फ्रंट पर रहती है यानी सीमा की रखवाली और दुष्मन से मुकाबला दोनो फौज के हाथों में ही है। सीमा पर फौज का अपना खुफिया तंत्र है जिसे एमआई युनिट यानी मिलेट्री इंटेलीजेंस कहा जाता है। इसके अलावा आईबी व रॉ का भारीभरकम महकमा वहां बहाल है। इन सभी संस्थाओं का काम दुष्मन की हर हरकत पर नजर रखना तथा किसी हमले के लिए पहले से तैयारी करना होता है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि अफगानिस्तान को आधा-अधूरा तोड़-फोड़ कर अमेरिका व मित्र देषों की फौजें धीरे-धीरे लौट रही हैं और इससे तालिबान व अन्य आतंकी संगठन एक बार फिर फैल रहे हैं। इसके अलावा सत्ता में लौटे नवाज षरीफ को कुर्सी पर बने रहने के लिए आईएसआई व पाक सेना का समर्थन जरूरी है और इसकी एक बड़ी षर्त होती है कि कष्मीर को सुलगाए रखो। यह बात अमेरिका सहित कई अंतरराश्ट्रीय एजेंसियां समय -समय पर भी कहती रही हैं कि कष्मीर में आतंकवाद बढ़  सकता है।
इतना सबकुछ होने के बावजूद सीमा पर अंदर घुस कर कोई हमारे जवानों की गरदनें उड़ा जाता है और हम छोटे बच्चे जैसे रोते रह जाते हैं कि देखो पड़ोसी ऐसा कर रहा है; षर्मनाक है। हम सर्जिकल स्ट्राईक की गौरव गाथा तो गाते हें लेकिन यह नहीं बता पाते कि सेना के उस अदभ्य साहस के प्रदर्षन के बाद हमें हासिल क्या हुआ, यदि घुसपैठ व षहदत यथावत जारी है। जवानों के पास हथियार हैं, हमारा सुरक्षा तंत्र है, हमारा खुफिया तंत्र है इसके बावजूद हम पाकिस्तान को गाली बकते हें कि वह षैतानी हरकतें कर रहा है। असल में तो हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि किस लापरवाही के चलते ऐसा होता है कि हम कारगिल में महीनों से बंकर बना रहे घुसपैठियों की खबर नहीं रख पाते हैं, हम हमारी सीमा में चौकसी के बावजूद कई-कई किलोमीटर घुस कर हत्या करने वाले आतंकियों पकड़ नहीं पाते हैं।
यह जान लें कि हमारी सेना व उसके तंत्र पर हमारा मुल्क जो पैसा खर्च करता है , वह कई लाख लोगों की षिक्षा, स्वास्थ्य व अन्य मूलभूत जरूरतों की कीमत के बराबर होता है। सुरक्षा का अर्थ ‘हमला’ कतई नहीं होता है। कहीं ना कहीं हमारे सुरक्षा तंत्र में खामी तो है ही कि सीमा पर चौकसी की कमी के चलते देष युद्ध के मुहाने पर पहुंच जाने को बेताब हो जाता हे। याद रहे एक युद्ध की कीमत इतनी बड़ी होगी कि हमारी आने वाली कई पीढ़ियां उसके नीचे दबी होंगी। इसके कतई यह अर्थ नहीं है कि हमें युद्ध के डर से किसी की बदतमीजियों को सहना चाहिए, लेकिन यह जरूर है कि सीमा पर तैनात बटालियनों की कौन सी कमियां हैं, हमारी खुफिया एजेंसियां कहां मात खा रही हैं ; जिसके चलते वे मारे जा रहे हैं, उन कारणों को तलाषना, जिम्मेदार लोगों को कसना और तंत्र को और मजबूत बनाना जरूरी है। वरना हम ऐसे ही तिरंगे में लिपटे जवानों के षवों के सामने हवा में गोली चलाने के दृष्य, नेताओं की बयानबाजी झेलते रहेंगे और किसी दिन जंग छिड़ गई तो अपने विकास-पथ पर खुद ही कंटक बिछा लेंगे।



गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

every one loves black spots in politiacl system

राजनीति के दामन पर अपराध के दाग

मध्य प्रदेश के छतरपुर, टीकमगढ़ आदि जिलों में बीते एक सप्ताह के दौरान अचानक ही अपराधों का ग्राफ नीचे आ गया है। ठीक यही हालत उत्तर प्रदेश को छूते बिहार के जिलों की है। असल में यह कड़कड़ाती ठंड नहीं, बल्कि विधानसभा चुनावों की घोषणा का असर है। जाहिर है कुछ जात-बिरादरी के वोट के बाद सबसे ज्यादा सहारा रहता है तो अपने वोटों को रिझाने के लिए साम-दाम-दंड-भेद की जुगतों का।
अभी पिछले साल ही उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव हुए थे। नोएडा, गाजियाबाद और बागपत जिलों में अधिकांश सीटों पर स्थानीय बाहुबलियों की तूती बोली थी। बीते दो सालों में पूरे प्रदेश में अभी तक 40 ऐसे हत्याकांड हो चुके हैं, जिसे पंचायत चुनाव की रंजिश का परिणाम माना जाता है। दिल्ली से सटे बागपत जिले में तो एक उम्मीदवार ने सहानुभूति पाने के लिए अपने ही सगे भाई व उसके दोस्त की हत्या करवा दी। उत्तर प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में रुतबेदारी की क्या भूमिका है, इसकी बानगी यही है कि बीते साढ़े चार सालों में 21 मंत्री दागी छवि के कारण हटाए गए, एक दर्जन से ज्यादा सताधारी विधायक गंभीर अपराधों में जेल गए। प्रदेश की पुलिस का विभाजन ‘मुलायम पुलिस’ और ‘बहुजन पुलिस’ में हो गया है।
उ.प्र के मौजूदा 403 विधायकों में से 189 पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इस बार भी हर दल द्वारा दिए जा रहे टिकटों में किसी को भी दाग की परवाह नहीं है। लखनऊ सेंट्रल से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार व मौजूदा विधायक रविदास मल्होत्रा पर 17 मुकदमे दर्ज हैं। हालांकि मशीनों द्वारा मतदान के कारण बूथ लूटने की घटनाओं में तो कमी आई है, लेकिन वोट लूटने के हथकंडों में ताकत का सहारा लेना पहले से भी अधिक हो गया है। सनद रहे पिछले दिनों आम चुनावों में उम्मीदवारों का आपराधिक रिकार्ड सार्वजनिक करने की मुहिम चलाई गई थी। खेद है कि उम्मीदवार का आपराधिक रिकार्ड आम मतदाता द्वारा उम्मीदवार के चुनाव में मापदंड नहीं बन पाया है और कई दागदार जनप्रतिनिधि विभिन्न सदनों में पहुंचते रहे हैं। देश की राजधानी से सटे उत्तर प्रदेश की कोई बारह सीटों में संपन्नता है। गांव संचार व सड़कों से ठीकठाक जुड़े हैं, इसके बावजूद यहां के चुनाव धनबल के माध्यम से बाहुबल की त्रासदी से जूझ रहे हैं। आलम यह है कि दिल्ली व हरियाणा के लगभग 3000 अखाड़े वीरान पड़े हैं।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि अपराध और नेता के गठजोड़ में सरकारी अफसर महत्वपूर्ण कड़ी हैं। यहां ताकतवर उम्मीदवारों को जबरिया बैठाना या फिर हत्या कर देना आम बात है। सन‍् 2004 में गोंडा से भाजपा प्रत्याशी घनश्याम शुक्ला की हत्या हो या फिर इंडियन जस्टिस पार्टी के बहादुर सोनकर की पेड़ से लटकी लाश- किसी का खुलासा नहीं हो पाया। प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के सात जिलों में कुख्यात डकैत ददुआ, सुंदर पटेल, ठोकिया बीते कई चुनावों में कभी हाथी तो कभी साइकिल पर सवार होते रहे हैं। भले ही जंगल में रहने वाले ये डकैत अब मार दिए गए हों, लेकिन उनका आसरा देने वाले सभी गिरोह सक्रिय हैं। मोदहा से बादशाह सिंह और उनके ही पड़ोसी नसीमुद्दीन सिद्धीकी की असली ताकत हाथ में असलाह ही है। राठ के रज्जू बुधांलिया और उन्हीं के पड़ोसी गंगाचरण राजपूत भी बाहुबल के कारण मशहूर हैं। बांदा और चित्रकूट जिले में तो बंदूक का ही बोलबाला रहता है।
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राजाभैया तो आतंकवादी कानून पोटा तक में भीतर जा चुके हैं। वैसे तो वे साइकिल पर सवार हैं लेकिन इलाके में भाजपा पूरी तरह उनका समर्थन करती रही है। कांग्रेसी प्रमोद तिवारी भी कमजोर नहीं आंके जाते। मऊनाथ भंजन या पूर्वांचल में मुख्तार अंसारी एक निर्णायक बाहुबली हैं। बहुजन समाज पार्टी से निष्कासित सांसद धनंजय सिंह बाहुबल के दम पर ही माननीय बनते रहे हैं। पूर्वांचल के आठ जिलों की 22 सीटों पर इस गिरोह का आतंक है।
पुलिस रिपोर्ट कहती है कि मेरठ मंडल में 28 ऐसे गिरोह हैं जो उ.प्र. की सीमा के पार जाकर दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान में भी अपराध करते हैं। इस इलाके में कुछ सीटों पर मुस्लिम माफिया भी बेहद ताकतवर है। प्रत्येक राजनैतिक दल सत्ता संघर्ष में ताकत की दखल से वाकिफ है। सभी को राज्य सरकार या स्थानीय पुलिस पर भरोसा नहीं है। तभी हर तरफ से केंद्रीय बल की मांग आ रही है। विडंबना है कि हर दल के अपने बाहुबली हैं और उन्हें उसमें कोई खोट नजर नहीं आती। यही कारण है कि कभी राजनीति के अपराधीकरण को लेकर चिंतित रहने वाली सियासत अब अपराधों का राजनीतिकरण होने पर भी चुप्पी साधे रहती है।
वैसे चुनाव आयोग की आचार संहिता और इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों के इस्तेमाल से हालात सुधरने की उम्मीद है लेकिन दुर्भाग्य है कि हमारे नेता प्रत्येक पाबंदी की काट भी तलाश लेते हैं। यदि मतदाता ही अपराधी-नेता के खिलाफ कड़ा रुख कर लें तो अगली विधानसभा का लेाकतंत्रात्मक रूप स्वच्छ और उज्ज्वल हो सकेगा।

 

शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

Book review of "Jal Maangta Jivan" by Rohit Kaoushik

पुस्तक : जल मांगता जीवन, लेखक : पंकज चतुर्वेदी, आधार प्रकाशन, पंचकूला, हरियाणा, मूल्य : 300 रुपए
जल मांग रहा है जीवन
पुस्तक चर्चा - प्रख्यात पत्रकार रोहित कौशिक द्वारा 

अ नेक बुद्धिजीवियों द्वारा यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि तीसरा विश्वयुद्ध पानी को लेकर होगा। यह चिंता बाजिब भी है, क्योंकि इस समय संपूर्ण देश जल संकट से जूझ रहा है। दुर्भाग्य यह है कि आज जल संकट को लेकर चिंता तो व्यक्त की जा रही है, लेकिन इस संकट से निपटने हेतु गंभीरता से प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। हालांकि इस जल संकट से देश का आम आदमी ही अधिक जूझ रहा है, लेकिन उसमें इस संकट से उबरने को लेकर कोई प्रतिबद्धता नहीं दिखाई देती है। इस निराशाजनक माहौल में वरिष्ठ पत्रकार और लेखक पंकज चतुर्वेदी की हाल ही में प्रकाशित पुस्तक ‘जल मांगता जीवन’ इस मुद्दे पर हमारी आंखें खोलती है। इस दौर में जल और पर्यावरण पर लिखना और भाषण देना एक फैशन हो गया है। इस फैशन से अलग पंकज चतुर्वेदी ने जल संकट के मुद्दे पर गंभीरतापूर्वक कार्य किया है। पुस्तक को चार खंडों में विभाजित किया गया है- तालाब, नदी, समुद्र और भूजल।पुस्तक प्रसिद्ध लेखक और कार्टूनिस्ट आबिद सुरती की भूमिका से शुरू होती है। आबिद सुरती का मानना है कि पानी को हमने केवल प्राणहीन तरल पदार्थ के रूप में ही देखा है, जबकि पानी प्राणदायी भी है और प्राणयुक्त भी। आबिद जी ने पानी को आदर देने की सीख देते हुए पंकज चतुर्वेदी के कार्य को सटीक शब्दों में रेखांकित किया है। पंकज जी ने ‘पानी एक- रूप अनेक’ शीर्षक से लिखी प्रस्तावना में संक्षिप्त जल-शास्त्र लिख दिया है। पुस्तक के प्रथम खंड ‘तालाब’ में लेखक का मानना है कि समाज ने तालाब को नहीं, बल्कि अपनी तकदीर को मिटाया है। आजादी के समय हमारे देश में लगभग 24 लाख तालाब थे, लेकिन 2000-2001 के आंकड़ों के अनुसार आजादी के बाद करीब 19 लाख तालाब और जोहड़ समाप्त हो गए। लेखक ने बंुदेलखंड के छतरपुर, टीकमगढ़, उत्तर पूर्वी राज्य मणिपुर, हैदराबाद, कश्मीर, बंगलुरू, धारवाड़, हुबली, मैसूर, बीजापुर, दिल्ली और बस्तर के तालाबों पर विस्तार से प्रकाश डाला है। लेखक की सबसे बड़ी चिंता तालाबों को पाटकर उनपर हो रहे अवैध निर्माण को लेकर है। दरअसल, तालाबों की दुर्दशा के मामले में पूरे देश की ही हालत चिंताजनक है। पहले हर इलाके में बेहतरीन तालाब होते थे। ये तालाब जहां एक ओर जल उपलब्ध कराते थे, वहीं दूसरी ओर हमारी अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान करते थे। मछली, कमल गट्टा, सिंघाडा और चिकनी मिट्टी के माध्यम से तालाब हमारी अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते थे। लेकिन भौतिकता की आंधी ने हमारी जिंदगी से तालाबों का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया। पुस्तक के द्वितीय खंड ‘नदी’ में लेखक ने नदियों के सामने तीन तरह के संकट बताए हैं- पानी की कमी, मिट्टी का आधिक्य और प्रदूषण। लेखक का मानना है कि आधुनिक युग में नदियों को सबसे बड़ा खतरा प्रदूषण से है। इस खंड में पंकज जी ने यमुना, हिंडन, सोन नदी, नर्मदा, गोमती, कावेरी, अडयार और कूवम जैसी नदियों के संकट पर बात की है। दरअसल गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी सहित देश की 14 प्रमुख नदियों में देश का 85 प्रतिशत पानी प्रवाहित होता है। ये नदियां इतनी बुरी तरह प्रदूषित हो चुकी हैं कि देश की 66 फीसद बीमारियों का कारण इनका जहरीला जल है। यही कारण है कि देश की कुल 445 नदियों में आधी नदियों का पानी पीने योग्य नहीं है। प्रदूषित नदियों की सूची में पहले स्थान पर महाराष्ट्र है, जहां 28 नदियां प्रदूषित हैं। दूसरे स्थान पर गुजरात है, जहां 19 नदियां प्रदूषित हैं। तीसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश है जहां 12 प्रदूषित नदियां हैं। पुस्तक के तृतीय खंड ‘समुद्र’ में लेखक का मानना है कि भारत ही नहीं, अपितु दुनिया के समुद्री तटों पर पेट्रोलियम पदार्थों और औद्योगिक कचरे से भयावह पर्यावरणीय संकट पैदा हो रहा है। यही कारण है कि समुद्र का गुस्सा बढ़ता जा रहा है। लेखक ने विभिन्न समुद्री तटों पर पसरे संकट की चर्चा की है। दरअसल, लगातार प्रदूषण और लापरवाही के चलते हमारे सागर बेहद दूषित हो रहे हैं, जिसका व्यापक असर भारत ही नहीं बल्कि पूरे उपमहाद्वीप के पर्यावरण पर पड़ रहा है। तेल के रिसाव, तेल टैंकों के टूटने व धोने से समुद्र का पारिस्थितिक तंत्र बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। लगभग 15 दिन में एक बार समुद्री तल पर दो हजार मीट्रिक टन से भी ज्यादा तेल फैलने व आग लगने की घटनाएं औसतन होती हैं। वहीं भूजल के अत्यधिक दोहन के कारण उत्तर प्रदेश के अनेक जिले भूकंप संवेदनशील हो गए हैं। इन स्थानों पर कभी भी बड़ा भूकंप तबाही मचा सकता है।पुस्तक के चतुर्थ खंड ‘भूजल’ में लेखक ने बताया है कि प्रदूषित भूजल और भूजल के दोहन से हमें अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। यह दुर्भाग्य ही है कि प्रदूषित भूजल के कारण गांव-गांव में कैंसर जैसी बीमारियों में वृद्धि हो रही है। उन्होंने देश के विभिन्न राज्यों में प्रदूषित भूजल की चर्चा की है। लेखक ने पुस्तक में जल संकट और जल के विभिन्न स्रोतों पर आंकड़ों सहित विस्तार से प्रकाश डाला है। इसलिए जल से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर संदर्भ ग्रंथ के रूप में भी इस पुस्तक का उपयोग किया जा सकेगा। सहज, सरल और रोचक भाषा में लिखी गई यह पुस्तक जल संकट की गहनता से पड़ताल करती है।

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017

such-development-would-bring-destruction in bundelkhand


यह वह इलाका है, जहां गांव के गांव वीरान हैं, पानी की कमी के चलते। यहां मनरेगा या अन्य सरकारी योजना में काम करने वाले मजदूर नहीं मिलते, क्योंकि लोग बगैर पानी के पैसा लेकर क्या करेंगे? इस पठारी इलाके का सूखे या अल्प वर्षा से पुराना साथ है। जाहिर है, यहां ऐसी गतिविधियों को प्राथमिकता दी जानी थी, जिनमें पानी का कम इस्तेमाल हो। मगर यहां खजुराहो के पास बरेठी में एनटीपीसी की 18 हजार करोड़ की बिजली परियोजना पर काम चल रहा है। कोयला आधारित ऐसी परियोजना में अंधाधुंध पानी की जरूरत होती है। यही नहीं, इस्तेमाल के बाद निकले उच्च तापमान वाले पानी का निपटान भी एक बड़ा संकट होता है। इसके लिए मझगांव बांध व श्यामरी नदी से पानी लेने की योजना है।
विडंबना है कि उच्च स्तर पर बैठे लोगों ने महाराष्ट्र की एनटीपीसी परियोजनाओं से कुछ नहीं सीखा। महाराष्ट्र में 16,500 मेगावाट के करीब 14 संयंत्र ऐसे हैं, जो कोयले पर आधारित हैं। इनमें से 13,000 मेगावाट के प्लांट जल-संकट वाले इलाकों में हैं और उनमें से अधिकांश पर बंद होने का खतरा मंडरा रहा है। महागेंसो परली प्लांट तो पानी की कमी के कारण सन 2015 में ही बंद हो गया था, जबकि रायचूर का केपीसीएच प्लांट अप्रैल से ठप्प पड़ा है। कोयला से बिजली बनाने के प्लांट किसान की सिंचाई के हिस्से का पानी निचोड़ते हैं, साथ ही प्लांट से निकला बेकार पानी जल के संसाधनों को दूषित भी करता है। जिस बुंदेलखंड में जल संकट के चलते 40 फीसदी आबादी घर छोड़कर पलायन कर चुकी हो, वहां बरेठी के प्लांट का आखिर क्या भविष्य है?
केन और बेतवा को जोड़कर इलाके की बरसाती या पहाड़ी नदियों का पानी यमुना के जरिये समुद्र में मिलने से रोकने की महत्वाकांक्षी योजना केन-बेतवा नदी का जोड़ किसी के गले नहीं उतर रहा है। तमाम जानकार दो अलग-अलग स्वभाव की नदियों को जोड़ने का विरोध कर रहे हैं। इसका मुख्य बांध पन्ना टाइगर रिजर्व के डोंदन गांव में बनना है। इस बांध और उससे निकली नहरों के कारण सवा पांच हजार हेक्टेयर जंगल समाप्त हो जाएंगे। कई गांव पूरी तरह डूबेंगे और फसल देने वाली जमीन के जलमग्न होने का तो हिसाब ही नहीं है। केन-बेतवा लिंक परियोजना में चार बांध का प्रस्ताव हैं। केन नदी पर प्रस्तावित ढोढन बांध की ऊंचाई 77 मीटर होगी, जिसकी जलग्रहण क्षमता 19,633 वर्ग किलोमीटर होगी। इससे यहां बसे सुकुवाहा, भावरखुवा, घुगारी, वसोदा, कुपी, शाहपुरा, डोंदन, पल्कोहा, खरयानी, मेनारी जैसे गांवों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। बांध से 221 किलोमीटर लंबी मुख्य नहर उत्तर प्रदेश के बरुआ सागर में जाकर मिलेगी। इस नहर से 1074 एमसीएम पानी प्रतिवर्ष भेजा जाएगा, जिसमें से 659 एमसीएम पानी बेतवा नदी में पहुंचेगा। देश भर की बड़ी सिंचाई परियोजनाएं बताती हैं कि बड़े बजट वाली बड़ी योजनाएं साल-दर-साल अपनी लागत बढ़ाती हैं। जब वे काम करने लायक होती हैं, तब तक जलवायु, जनसंख्या, भौगोलिक परिस्थितियां, सब कुछ बदल जाती हैं और अरबों रुपये पानी में जाते दिखते हैं।
हमारा तंत्र यह तय नहीं कर पा रहा है कि जल संकट से जूझ रहे इलाकों में किस तरह के काम-धंधे, रोजगार या खेती हो। मराठवाड़ा में अब ज्यादा पानी मांगने वाली गन्ने की खेती से लोग तौबा कर चुके हैं, तो बुंदेलखंड में लोग सोयाबीन बोने से बच रहे हैैं। अब बारी है सरकारी समझदारी की कि बेहिसाब पानी पीकर चुटकी भर परिणाम देने वाली परियोजनाओं पर फिर से विचार हो। 

बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

examination is killing joy of learning

सीखने के आनंद को खत्म करता परीक्षा का दबाव


प्रधानमंत्री मोदी को भी अपने मासिक कार्यक्रम ‘मन की बात’ में बोर्ड इम्तिहान दे रहे बच्चों को संदेश देना पड़ा। जाहिर है कि परीक्षा, उसके परिणाम और ज्यादा नंबर लाने की होड़ बच्चों का बचपन और सीखने की स्वाभाविक गति, दोनों को प्रभावित कर रही है।
पिछले साल मध्य प्रदेश में कक्षा दस के बोर्ड के इम्तिहान के नतीजे आने के 12 घंटों में आठ बच्चों ने आत्महत्या कर ली और उनमें से भी आधी बच्चियां थीं। वहां बिताया समय और बांची गई पुस्तकें उनको इतनी-सी असफलता को स्वीकार करने और उसका सामना करने का साहस नहीं सिखा पायीं। परीक्षा देने जा रहे बच्चे खुद के याद करने से ज्यादा इस बात से ज्यादा चिंतित दिखते हैं कि उनसे बेहतर करने की संभावना वाले बच्चे ने ऐसा क्या रट लिया है जो उसे नहीं आता। असल में प्रतिस्पर्धा के असली मायने सिखाने में पूरी शिक्षा प्रणाली असफल ही रही है।
यह तो साफ जाहिर है कि बच्चे न तो कुछ सीख रहे हैं और न ही जो पढ़ रहे हैं, उसका आनंद ले पा रहे हैं। बस एक ही धुन है या दबाव है कि परीक्षा में जैसे-तैसे अव्वल या बढ़िया नंबर आ जाएं। कई बच्चों का खाना-पीना छूट गया है। याद करें चार साल पहले के अखबारों में छपे समाचारों को, जिनमें एनसीईआरटी और सीबीएसई के हवाले से कई समाचार छपे थे कि अब बच्चों को परीक्षा के भूत से मुक्ति मिल जाएगी। अब ऐसी नीतियां व पुस्तकें बन गई हैं जिन्हें बच्चे मजे-मजे पढ़ेंगे। 10वीं के बच्चों को अंक नहीं, ग्रेड दिया जाएगा लेकिन इस व्यवस्था से बच्चों पर दबाव में कोई कमी नहीं आई है। यह विचारणीय है कि जो शिक्षा बारह साल में बच्चों को अपनी भावनाओं पर नियंत्रण करना न सिखा सके, जो विषम परिस्थिति में अपना संतुलन बनाना न सिखा सके, वह कितनी प्रासंगिक व व्यावहारिक है ?
बोर्ड के परीक्षार्थी बेहतर स्थानों पर प्रवेश के लिए चिंतित हैं तो दूसरे बच्चे पसंदीदा विषय पाने के दबाव में। एक तरफ स्कूलों को अपने नाम की प्रतिष्ठा की चिंता है तो दूसरी ओर हैं मां-बाप के सपने। बचपन, शिक्षा, सीखना सब कुछ इम्तिहान के सामने कहीं गौण हो गया है। रह गई हैं तो केवल नंबरों की दौड़। सीबीएसई की कक्षा 10 में पिछले साल दिल्ली में हिंदी में बहुत से बच्चों के कम अंक रहे। जबकि हिंदी के मूल्यांकन की प्रणाली को गंभीरता से देखंे तो वह बच्चों के साथ अन्याय ही है। कोई बच्चा ‘‘हैं’’ जैसे शब्दों में बिंदी लगाने की गलती करता है, किसी को छोटी व बड़ी मात्रा की दिक्कत है। कोई बच्चा ‘स’, ‘ष’ और ‘श’ में भेद नहीं कर पाता है। स्पष्ट है कि यह बच्चे की महज एक गलती है, लेकिन मूल्यांकन के समय बच्चे ने जितनी बार एक ही गलती को किया है, उतनी ही बार उसके नंबर काट लिए गए। यह सरासर नकारात्मक सोच है।
छोटी कक्षाओं में सीखने की प्रक्रिया के लगातार नीरस होते जाने व बच्चों पर पढ़ाई के बढ़ते बोझ को कम करने के इरादे से मार्च 1992 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने देश के आठ शिक्षाविदों की एक समिति बनाई थी। समिति ने देशभर की कई संस्थाओं व लोगों से संपर्क किया व जुलाई 1993 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। उसमें साफ लिखा गया था कि बच्चों के लिए स्कूली बस्ते के बोझ से अधिक बुरा है न समझ पाने का बोझ। सरकार ने सिफारिशों को स्वीकार भी कर लिया। फिर देश की राजनीति विवादों में ऐसी फंसी कि उस रिपोर्ट की सुध ही नहीं रही। वास्तव में परीक्षाएं आनंददायक शिक्षा के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा हैं। इसके स्थान पर सामूहिक गतिविधियों को प्रोत्साहित व पुरस्कृत किया जाना चाहिए। इसके बावजूद बीते एक दशक में कक्षा में अव्वल आने की गला काट स्पर्धा में न जाने कितने बच्चे कुंठा का शिकार हो मौत को गले लगा चुके हैं।
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कुल मिलाकर परीक्षा व उसके परिणामों ने एक भयावह सपने, अनिश्चितता की जननी व बच्चों के नैसर्गिक विकास में बाधा का रूप ले लिया है। सवाल यह है कि शिक्षा का उद्देश्य क्या है-परीक्षा में स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करना, विषयों की व्यावहारिक जानकारी देना या फिर एक अदद नौकरी पाने की कवायद? निचली कक्षाओं में नामांकन बढ़ाने के लिए सर्व शिक्षा अभियान और ऐसी ही कई योजनाएं संचालित हैं। सरकार हर साल अपनी रिपोर्ट में ‘‘ड्राप आउट’’ की बढ़ती संख्या पर चिंता जताती है। लेकिन कभी किसी ने यह जानने का प्रयास नहीं किया कि अपने पसंद के विषय या संस्था में प्रवेश न मिलने से कितनी प्रतिभाएं कुचल दी गई हैं।
आजादी के बाद हमारी सरकार ने शिक्षा विभाग को कभी गंभीरता से नहीं लिया। कुल मिलाकर देखें तो शिक्षा प्रणाली का उद्देश्य और पाठ्यक्रम के लक्ष्य एक-दूसरे में उलझ गए व एक गफलत की स्थिति बन गई। क्या हम कारगर कदम उठाते हुए नंबरों की अंधी दौड़ पर विराम लगाने की सुध लेंगे?
– पंकज चतुर्वेदी

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