तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 26 मई 2017

Traditional water resourese only can save humanity

गाद तालाबों में जमी या हमारी सोच में 
अब तो देश के 32 फीसदी हिस्से को पानी की किल्लत के लिए गरमी के मौसम का इंतजार भी नहीं करना पड़ता है। बारहों महीने, तीसों दिन यहां जेठ ही रहता है। सरकार संसद में बता चुकी है कि देश की 11 फीसदी आबादी साफ पीने के पानी से महरूम है। पानी के लिए तकदीर को कोसते समाज और संसाधनों का रोना रोती सरकार को शायद यह मालूम ही नहीं है कि पूरे देश के 7.2 लाख हेक्टेयर पर अभी भी पारंपरिक झीलें बची हुई हैं। दूसरी तरफ यदि कुछ दशक पहले पलट कर देखें तो आज पानी के लिए हाय-हाय कर रहे इलाके अपने स्थानीय स्त्रोतों की मदद से ही खेत और गले दोनों के लिए अफरात पानी जुटाते थे। एक दौर आया कि अंधाधुंध नलकूप रोपे जाने लगे, जब तक संभलते जब तक भूगर्भ का कोटा साफ हो चुका था। 

समाज को एक बार फिर बीती बात बन चुके जल-स्त्रोतों की ओर जाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है- तालाब, कुएं, बावड़ी। लेकिन एक बार फिर पीढि़यों का अंतर सामने खड़ा है, पारंपरिक तालाबों की देखभाल करने वाले लोग किसी ओर काम में लग गए और अब तालाब सहेजने की तकनीक नदारद हो गई है। तभी तो सन् 2001 से अभी तक तालाबों से गाद निकालने के नाम पर सरकार ने आठ सौ करोड़ से ज्यादा फूंक दिए और नतीजा रहा ढाक के तीन पात! तालाबों की जल-ग्रहण क्षमता भले ही न बढ़ी हो पर कुछ लोगों का बैंक बैलेंस जरूर बढ़ गया।देश की 58 पुरानी झीलों को पानीदार बनाने के लिए सन् 2001 में केंद्र सरकार के पर्यावरण और वन मंत्रालय ने राष्ट्रीय झील संरक्षण योजना शुरू की थी। इसके तहत कुल 883.3 करोड़ रुपए का प्रावधान था। इसके तहत मध्य प्रदेश की सागर झील, रीवा का रानी तालाब और शिवपुरी झील, कर्नाटक के 14 तालाबों, नैनीताल की दो झीलों सहित 58 तालाबों की गाद सफाई के लिए पैसा बांटा गया। इसमें राजस्थान के पुष्कर का कुंड और धरती पर जन्नत कही जाने वाली श्रीनगर की डल झील भी थी।

झील सफाई का पैसा पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों को भी गया। अब सरकार ने मापा तो पाया कि इन सभी तालाबों से गाद निकली कि नहीं, पता नहीं, लेकिन इसमें पानी पहले से भी कम आ रहा है। केंद्रीय जल आयोग ने जब खर्च पैसे की पड़ताल की तो ये तथ्य सामने आए। कई जगह तो गाद निकाली ही नहीं और उसकी ढुलाई का खर्चा दिखा दिया। कुछ जगह गाद निकाल कर किनारों पर ही छोड़ दी, जोकि अगली बारिश में ही फिर से तालाब में गिर गई। असल में तालाब की सफाई का काम आज के अंग्रेजीदां इंजीनियरों के बस की बात नहीं है। छतरपुर जिले के अंधियारा तालाब की कहानी गौर करें, कोई 19 साल पहले वहां सूखा राहत के तहत तालाब गहराई का काम लगाया गया। इंजीनियर साहब ने तालाब के बीचों-बीच खूब गहरी खुदाई करवा दी। जब इंद्र देवता मेहरबान हुए तो तालाब एक रात में लबालब हो गया, लेकिन यह क्या? अगली सुबह ही उसकी तली दिख रही थी।

असल में हुआ यूंकि बगैर सोचे हुई-समझे की गई खुदाई में तालाब की वह झिर टूट गई, जिसका संबंध सीधे इलाके के ग्रेनाइट भू संरचना से था। पानी आया और झिर से बह गया। यहां जानना जरूरी है कि अभी एक सदी पहले तक बुंदेलखंड के इन तालाबों की देखभाल का काम पारंपरिक रूप से ढीमर समाज के लोग करते थे। वे तालाब को साफ रखते, उसकी नहर, बांध, जल आवक को सहेजते और एवज में तालाब की मछली, सिंघाड़े और समाज से मिलने वाली दक्षिणा पर उनका हक होता। इसी तरह प्रत्येक इलाके में तालाबों को सहेजने का जिम्मा समाज के एक वर्ग ने उठा रखा था और उसकी रोजी-रोटी की व्यवस्था वही समाज करता था, जो तालाब के जल का इस्तेमाल करता था। तालाब तो लोक की संस्कृति सभ्यता का अभिन्न अंग हैं और इन्हें सरकारी बाबुओं के लाल बस्ते के बदौलत नहीं छोड़ा जा सकता। हकीकत में तालाबों की सफाई और गहरीकरण अधिक खर्चीला काम नहीं है, न ही इसके लिए भारीभरकम मशीनों की जरूरत होती है। यह सर्वविदित है कि तालाबों में भरी गाद, सालों साल से सड़ रही पत्तियों और अन्य अपशिष्ट पदार्थों के कारण ही उपजी है, जो उम्दा दर्जे की खाद है। रासायनिक खादों ने किस कदर जमीन को चौपट किया है? यह किसान जान चुके हैं और उनका रुख अब कंपोस्ट व अन्य देसी खादों की ओर है। किसानों को यदि इस खादरूपी कीचड़ की खुदाई का जिम्मा सौंपा जाए तो वे वे सहर्ष राजी हो जाते हैं।

उल्लेखनीय है कि राजस्थान के झालावाड़ जिले में खेतों में पालिश करने के नाम से यह प्रयोग अत्यधिक सफल व लोकप्रिय रहा है। कर्नाटक में समाज के सहयोग से ऐसे कोई 50 तालाबों का कायाकल्प हुआ है, जिसमें गाद की ढुलाई मुफ्त हुई, यानी ढुलाई करने वाले ने इस बेशकीमती खाद को बेचकर पैसा कमाया। इससे एक तो उनके खेतों को उर्वरक मिलता है, साथ ही साथ तालाबों के रखरखाव से उनकी सिंचाई सुविधा भी बढ़ती है। सिर्फ आपसी तालमेल, समझदारी और अपनी पंरपरा तालाबों के संरक्षण की दिली भावना हो तो न तो तालाबों में गाद बचेगी, न ही सरकारी अमलों में घूसखोरी की कीच होगी। सन 1944 में गठित ‘फेमिन इनक्वायरी कमीशन’ ने साफ निर्देश दिए थे कि आने वाले सालों में संभावित पेयजल संकट से जूझने के लिए तालाब ही कारगर होंगे, कमीशन की रिपोर्ट तो लाल बस्ते में कहीं दब गई। आजादी के बाद इन पुश्तैनी तालाबों की देखरेख करना तो दूर, उनकी दुर्दशा करना शुरू कर दिया। चाहे कालाहांडी हो या फिर बुंदेलखंड या फिर तेलंगाना, देश के जलसंकट वाले सभी इलाकों की कहानी एक ही है। इन सभी इलाकों में एक सदी पहले तक कई-कई सौ बेहतरीन तालाब होते थे। यहां के तालाब केवल लोगों की प्यास ही नहीं बुझाते थे, यहां की अर्थव्यवस्था का मूल आधार भी होते थे। मछली, कमल गट्टा, सिंघाड़ा, कुम्हार के लिए चिकनी मिट्टी... यहां के हजारों-हजार घरों के लिए खाना उगाहते रहे हैं। तालाबों का पानी यहां के कुओं का जलस्तर बनाए रखने में सहायक होते थे। शहरीकरण की चपेट में लोग तालाबों को ही पी गए और अब उनके पास पीने के लिए कुछ नहीं बचा है। गांव या शहर के रुतबेदार लोग जमीन पर कब्जा करने के लिए बाकायदा तालाबों को सुखाते हैं, पहले इनके बांध फोड़े जाते हैं, फिर इनमें पानी की आवक के रास्तों को रोका जाता है- न भरेगा पानी, न रह जाएगा तालाब।

गांवों में तालाब से खाली हुई उपजाऊ जमीन लालच का कारण होती है तो शहरों में कालोनियां बनाने वाले भूमाफिया इसे सस्ता सौदा मानते हैं। यह राजस्थान में उदयपुर से लेकर जैसलमेर तक, हैदराबाद में हुसैनसागर, हरियाणा में दिल्ली से सटे सुल्तानपुर लेक या फिर उत्तर प्रदेश के चरखारी व झांसी हों या फिर तमिलनाडु की पुलिकट झील सभी जगह एक ही कहानी है। हां, पात्र अलग-अलग हो सकते हैं। सभी जगह पारंपरिक जल-प्रबंधन के नष्ट होने का खामियाजा भुगतने और अपने किए या फिर अपनी निष्क्रियता पर पछतावा करने वाले लोग एकसमान ही हैं। कनार्टक के बीजापुर जिले की कोई बीस लाख आबादी को पानी की त्राहि-त्राहि के लिए गरमी का इंतजार नहीं करना पड़ता है। कहने को इलाके चप्पे-चप्पे पर जल भंडारण के अनगिनत संसाधन मौजूद हैं, लेकिन हकीकत में बारिश का पानी यहां टिकता ही नहीं हैं। लोग रीते नलों को कोसते हैं, जबकि उनकी किस्मत को आदिलशाही जल प्रबंधन के बेमिसाल उपकरणों की उपेक्षा का दंश लगा हुआ है। समाज और सरकार पारंपरिक जल-स्रोतों कुओं, बावड़ियों और तालाबों में गाद होने की बात करता है, जबकि हकीकत में गाद तो उन्हीं की सोच में है। सदा नीरा रहने वाली बावड़ी-कुओं को बोरवेल और कचरे ने पाट दिया तो तालाबों को कंक्रीट का जंगल निगल गया। एक तरफ प्यास से बेहाल होकर अपने घर-गांव छोड़ते लोगों की हकीकत है तो दूसरी ओर पानी का अकूत भंडार! यदि जलसंकट ग्रस्त इलाकों के सभी तालाबों को मौजूदा हालात में भी बचा लिया जाए तो वहां के हर इंच खेत को तर सिंचाई, हर कंठ को पानी और हजारों हाथों को रोजगार मिल सकता है। एक बार मरम्मत होने के बाद तालाबों के रखरखाव का काम समाज को सौंपा जाए, इसमें महिलाओं के स्वयं सहायता समूह, मछली पालन सहकारी समितियां, पंचायत, गांवों की जल बिरादरी को शामिल किया जाए। जरूरत इस बात की है कि आधुनिकता की आंधी के विपरीत दिशा में अपनी जड़ों को लौटने की इच्छा शक्ति विकसित करनी होगी।

बुधवार, 24 मई 2017

Temples can be lesson for envoirment

इन मंदिरों से सीखें पर्यावरण संरक्षण का पाठ

यह परंपरा भी है और संस्कार भी। जयपुर के ताड़केश्वर मंदिर की खासियत है कि यहां शिव लिंग पर चढ़ने वाला पानी नाली में बहाने की बजाय चूने से बने कुंड परवंडी के जरिये धरती के अंदर इकट्ठा किया जाता है। यह प्रक्रिया उस इलाके में भूजल-संतुलन का बड़ा जरिया है। संभव है कि प्राचीन परंपरा में शिव लिंग पर जल चढ़ाने का असली मकसद इसी तरह भविष्य के प्रकृति-प्रकोप के हालात में जल को सहेजकर रखना हुआ करता हो। उस काल में मंदिरों में नाली तो होती नहीं थी। यह एक सहज प्रयोग है और बहुत कम खर्च में शुरू किया जा सकता है। यदि दस हजार मंदिर इसे अपना लें और हर मंदिर में औसतन 1,000 लीटर पानी रोजाना चढ़ाया जाता हो, तो कल्पना कीजिए, कितना पानी संरक्षित किया जा सकेगा।
जयपुर के इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि यहां शिव जी की प्रतिमा भूमि के भीतर से अवतरित हुई है। चौड़ा रास्ता स्थित इस मंदिर का निर्माण 1784 ईस्वी में हुआ था। शायद इसी मंदिर से प्रेरणा लेकर जयपुर के ही एक ज्योतिषी और सामाजिक-कार्यकर्ता पंडित पुरुषोत्तम गौड़ ने पिछले 13 वर्षों में राजस्थान के करीब 300 मंदिरों में जल संरक्षण का ढांचा विकसित किया है। समाज सेवा और ज्योतिष के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए गौड़ को कई सम्मान मिल चुके हैं। गौड़ ने वर्ष 2000 में अपना जलाभिषेक अभियान शुरू किया था। वह मंदिरों में 30 फीट गहरा गड्ढा बनवाते हैं और शिवलिंग से आने वाले पानी को रेत के फिल्टरों से गुजारकर जमीन में उतारते हैं। इसके अलावा प्रतिमाओं पर चढ़ाए जाने वाले दूध को भी जमा करने के लिए पांच फीट के गड्ढे की अलग से व्यवस्था है। हिसाब लगाया गया था कि शहर में 300 से ज्यादा मंदिर हैं, जहां श्रावण महीने में रोजाना कम से कम 4.5 करोड़ लीटर जल भगवान शिव और अन्य देवी-देवताओं पर अर्पित किया जाता है। इस प्रक्रिया से जल-संरक्षण तो हुआ ही, मंदिरों के आसपास रहने वाली कीचड़ और गंदगी से भी छुटकारा मिला।
ऐसा ही प्रयोग लखनऊ  के सदर स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंग मंदिर में भी हुआ है। यहां भगवान शंकर के जलाभिषेक का जल नालियों की बजाय सीधे जमीन के अंदर जाता है। कोई 160 साल पुराने इस मंदिर का वर्ष 2014 में जीर्णोद्धार किया गया।12 ज्योतिर्लिंग की स्थापना उनके मूल स्वरूप के अनुसार की गई है। यहां करीब 40 फीट गहरे सोख्ते में सिर्फ अभिषेक का जल जाता है, जबकि दूध और पूजन सामग्री का अलग इस्तेमाल किया जाता है। बेल-पत्र और फूलों को एकत्रित करके खाद बनाई जाती है। चढ़ाए गए दूध से बनी खीर का वितरण प्रसाद के रूप में होता है। यहीं मनकामेश्वर मंदिर में भी सोख्ता बनाया गया है और चढ़ावा के फूलों से अगरबत्ती बनाई जाती है, बेल-पत्र और अन्य पूजन सामग्री से खाद। बड़ा शिवाला और छोटा शिवाला में  चढ़ावा के दूध की खीर भक्तों में वितरित होती है और जल को भूमिगत किया जाता है।
मध्य प्रदेश के शाजापुर जिला मुख्यालय पर प्रसिद्ध मां राजराजेश्वरी मंदिर में चढ़ने वाले फूल अब व्यर्थ नहीं जाते। इनसे जैविक खाद बनाई जा रही है। इसके लिए केंचुए लाए गए हैं। आसपास के किसान इस खाद का खूब इस्तेमाल कर रहे हैं। ये फूल अब न तो गंदगी फैलाते हैं, न नदी प्रदूषित करते हैं। मंदिर प्रांगण में वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने के लिए चार टैंक बनाए गए हैं, जिनका वैज्ञानिक इस्तेमाल खाद बनाने में होता है। यहां तैयार होने वाली जैविक खाद में पोषक तत्वों और कार्बनिक पदार्थों के अलावा मिट्टी को उर्वरित करने वाले सूक्ष्म जीवाणु भी बहुतायत में होते हैं, जो मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में खासे कारगर साबित हुए हैं। मंदिर में चढ़ाए गए फूलों को खाद में बदलने का काम दिल्ली के मशहूर झंडेवालान मंदिर में भी हो रहा है। इसके अलावा वाराणसी, देवास, ग्वालियर, रांची के पहाड़ी मंदिर सहित कई स्थानों पर चढ़ावे के फूल-पत्ती को कम्पोस्ट में बदला जा रहा है। अब जरूरत है कि मंदिरों में पॉलिथीन थैलियों के इस्तेमाल और प्रसाद की बर्बादी पर रोक लगे। इसके साथ ही शिवलिंग पर दूध चढ़ाने की बजाय उसे अलग से एकत्र करके जरूरतमंद बच्चों तक पहुंचाने की व्यवस्था भी की जाए। इसके व्यापक सामाजिक परिणाम मिलेंगे।

गुरुवार, 18 मई 2017

The Drought is knocking door of Bunelkhan

फिर सूखे की ओर बढ़ रहा है बुंदेलखंड
बीते कई दशकों की ही तरह इस बार भी गरमी शुरू होते ही बुंदेलखंड में जल संकट, पलायन और बेबसी की खबरें हवा में तैरने लगी हैं। कोई अलग राज्य को ही इसका एकमात्र हल मान रहा है तो कोई सरकारी उपेक्षा का उलाहना दे रहा है। यह तो अब तय हो गया है कि हजारों करोड़ के स्पेशल पैकेज से बुंदेलखंड की तकदीर बदलने से रही। कई बार तो भारत-भाग्य-विधाता की मंशा पर ही शक होता है कि वे इस इलाके के विकास या सूखा-संकट के निराकरण के लिए कटिबद्ध हैं या नहीं। यदि समस्या नहीं रही तो विशेष पैकेज या ज्यादा बजट की मांग कैसे हो सकेगी? यदि पलायन नहीं होगा तो दिल्ली, पंजाब आदि में निर्माण कार्य में सस्ते मजदूर कैसे मिलेंगे। अब यहां के वाशिंदों को ही तय करना होगा कि वे कैसा बुंदेलखंड चाहते हैं। यह जान लें कि यहां पानी तो इतना ही बरसेगा, यह भी जान लें कि आधुनिक इंजीनियरिंग व तकनीक यहां कारगर नहीं है। असल में यहां सूखा पानी का नहीं है, पूरा पर्यावरणीय तंत्र ही सूख गया है। बुंदेलखंड में अभी से जल संकट चरम पर है, जबकि अगली बारिश में अभी कम से कम पचास दिन बकाया हैं। हालांकि पिछले मौसम में यहां इंद्रदेव ने अच्छी कृपा बरसाई थी, खेतों में भी अच्छी पैदावार हुई है, लेकिन इस साल मार्च के अंत तक मवेशियों को छुट्टा छोड़ना पडा़, क्योंकि गांव-मजरे के जलस्रोत चुक गए। जंगल से बंदर से लेकर तेंदुए तक बस्ती की ओर आ रहे हैं, क्योंकि उनके प्राकृतिक पर्यावास में पानी खत्म हो रहा है। शहरी नल-जल योजनाएं चित्त हो गईं व हैंडपंप रीते। जनता या तो पलायन कर रही है या हल्ला और अफसरान इसके लिए अधिक बजट के कागज बना रहे हैं। असल में हमारे नीतिकार यह समझ नहीं पा रहे हैं कि बुंदेलख्ंाड का संकट अकेले पानी की कमी का नहीं है, वहां का संपूर्ण पर्यावरणीय चक्र लगातार अल्पवर्षा के कारण नष्ट हो गया है। इस चक्र में जल संसाधन, जमीन, जंगल, पेड़, जानवर व मवेशी, पहाड़ और वहां के वाशिंदे शामिल हैं। इन सभी पक्षों के क्षरण को थामने के एकीकृत प्रयास के बगैर यहां के हालत सुधरेंगे नहीं, चाहे यहां के सभी नदी-तालाब पानी से लबालब भी हो जाएं।
बुंदेलखंड के सभी गांव, कस्बे, शहर की बसाहट का एक ही पैटर्न रहा है- चारों ओर ऊंचे-ऊंचे पहाड़, पहाड़ की तलहटी में दर्जनों छोटे-बड़े ताल-तलैया और उनके किनारों पर बस्ती। पहाड़ के पार घने जंगल व उसके बीच से बहती बरसाती या छोटी नदियां। टीकमगढ़ जैसे जिले में अभी तीन दशक पहले तक हजार से ज्यादा तालाब थे। पक्के घाटों वाले हरियाली से घिरे व विशाल तालाब बुंदेलखंड के हर गांव-कस्बे की सांस्कृतिक पहचान हुआ करते थे। ये तालाब भी इस तरह थे कि एक तालाब के पूरा भरने पर उससे निकला पानी अगले तालाब में अपने आप चला जाता था, यानी बारिश की एक-एक बूंद संरक्षित हो जाती थी। चाहे चरखारी को लें या छतरपुर को सौ साल पहले वे वेनिस की तरह तालाबों के बीच बसे दिखते थे। अब उपेक्षा के शिकार शहरी तालाबों को कंक्रीट के जंगल निगल गए। रहे-बचे तालाब शहरों की गंदगी को ढोने वाले नाबदान बन गए। बुंदेलखंड का कोई गांव-कस्बा ले लें, हर जगह चार दशक पहले पहाड़ों पर जमकर अतिक्रमण हुआ। छतरपुर में तो पहाड़ों पर दो लाख से ज्यादा आबादी बस गई। पहाड़ उजड़े तो उसकी हरियाली भी गई। और इसके साथ ही पहाड़ पर गिरने वाले पानी की बूंदों को संरक्षित करने का गणित भी गड़बड़ा गया। जो बड़े पहाड़ जंगलों में थे, उनको खनन माफिया चाट गया। आज जहां पहाड़ होना था, वहां गहरी खाइयां हैं। पहाड़ उजड़े तो उसकी तली में सजे तालाबों में पानी कहां से आता व उनको रीत रहना ही था।

इस तरह गांवों की अर्थव्यवस्था का आधार कहलाने वाले चंदेलकालीन तालाब सामंती मानसिकता के शिकार हो गए। सनद रहे, बंुदेलखंड देश के सर्वाधिक विपन्न इलाकों में से है। यहां न तो कल-कारखाने हैं और न ही उद्योग-व्यापार। महज खेती पर यहां का जीवनयापन टिका हुआ है। सूखे से बेहाल बुंदेलखंड का एक जिला है छतरपुर। यहां सरकारी रिकार्ड में 10 लाख 32 हजार चौपाए दर्ज है,ं जिनमें से सात लाख से ज्यादा तो गाय-भैंस ही हैं। तीन लाख के लगभग बकरियां हैं। चूंकि बारिश न होने के कारण कहीं घास तो बची नहीं है, सो अनुमान है कि इन मवेशियों के लिए हर महीने 67 लाख टन भूसे की जरूरत है। इनके लिए पीने के पानी की व्यवस्था का गणित अलग ही है। यह केवल एक जिले का हाल नहीं है, दो राज्यों में विस्तारित समूचे बुंदेलखंड के 12 जिलों में दूध देने वाले चौपायों के हालात भूख-प्यास व कोताही के हैं। आए रोज गांव-गांव में कई-कई दिन से चारा न मिलने या पानी न मिलने या फिर इसके कारण भड़क कर हाईवे पर आने से होने वाली दुर्घटनाओं के चलते मवेशी मर रहे हैं। आने वाले गर्मी के दिन और भी बदतर होंगे, क्योंकि तापमान भी बढ़ेगा। मवेशी न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार होते हैं, बल्कि उनके खुरों से जमीन का बंजरपन भी समाप्त होता है। सूखे के कारण पत्थर हो गई भूमि पर जब गाय के पग पड़ते हैं तो वह जल सोखने लायक भुरभुरी होती है। विडंबना है कि समूचे बुंदेलखंड में सार्वजनिक गौचर भूमियों पर जमकर कब्जे हुए और आज गौपालकों के सामने उनका पेट भरने का संकट है, तभी इन दिनों लाखोंलाख गाएं सड़कों पर आवारा घूम रही हैं। जब तक गौचर, गाय और पशु पालक को संरक्षण नहीं मिलेगा, बुंदेलखंड की तकदीर बदलने से रही।

कभी बुंदेलखंड के 45 फीसदी हिस्से पर घने जंगल हुआ करते थे। आज यह हरियाली सिमट कर 10 से 13 प्रतिशत रह गई है। छतरपुर सहित कई जिलों में अंतिम संस्कार के लिए लकड़ी भी दो सौ किलोमीटर दूर से मंगवानी पड़ रही है। यहां के जंगलों में रहने वाले आदिवासियों सौर, कौंदर, कौल और गोंड़ो की यह जिम्मेदारी होती थी कि वे जंगल की हरियाली बरकरार रखें। ये आदिवासी वनोपज से जीविकोपार्जन चलाते थे, सूखे गिरे पेड़ों को ईंधन के लिए बेचते थे। लेकिन आजादी के बाद जंगलों के स्वामी आदिवासी वनपुत्रों की हालत बंधुआ मजदूर से बदतर हो गई। ठेकेदारों ने जमकर जंगल उजाड़े और सरकारी महकमों ने कागजों पर पेड़ लगाए। बुंदेलखंड में हर पांच साल में दो बार अल्पवर्षा होना कोई आज की विपदा नहीं है। फिर भी जल, जंगल, जमीन पर समाज की साझी भागीदारी के चलते बुंदेलखंडी इस त्रासदी को सदियों से सहजता से झेलते आ रहे थे। संयुक्त बुदेलखंड कोई 1.60 लाख वर्गकिमी क्षेत्रफल में फैला है, जिसकी आबादी तीन करोड़ से अधिक हैं। यहां हीरा, ग्रेनाइट की बेहतरीन खदाने हैं, जंगल तेंदू पत्ता, आंवला से पटे पड़े हैं, लेकिन इसका लाभ स्थानीय लोगों को नहीं मिलता है। दिल्ली, लखनऊ और उससे भी आगे पंजाब तक जितने भी बड़े निर्माण कार्य चल रहे हैं, उसमें अधिकांश में गारा-गुम्मा यानी मिट्टी और ईंट का काम बुंदेलखंडी मजदूर ही करते हैं। शोषण, पलायन और भुखमरी को वे अपनी नियति समझते हैं। जबकि खदानों व अन्य करों के माध्यम से बुंदेलखंड सरकारों को अपेक्षा से अधिक कर उगाह कर देता है, लेकिन इलाके के विकास के लिए इस कर का 20 फीसदी भी यहां खर्च नहीं होता है। बुंदेलखंड के पन्ना में हीरे की खदानें हैं, यहां का ग्रेनाइट दुनियाभर में धूम मचाए है। यहां की खदानों में गोरा पत्थर, सीमेंट का पत्थर, रेत-बजरी के भंडार हैं। इलाके के गांव-गांव में तालाब हैं, जहां कि मछलियां कोलकाता के बाजार में आवाज लगा कर बिकती हैं। इस क्षेत्र के जंगलों में मिलने वाले अफरात तेंदू पत्ता को ग्रीन-गोल्ड कहा जाता है। आंवला, हर्र जैसे उत्पादों से जंगल लदे हुए हैं।

लुटियन की दिल्ली की विशाल इमारतें यहां के आदमी की मेहनत की साक्षी हैं। खजुराहो, झांसी, ओरछा जैसे पर्यटन स्थल सालभर विदेशी घुमक्कड़ों को आकर्षित करते हैं। अनुमान है कि दोनों राज्यों के बुंदेलखंड मिलाकर कोई एक हजार करोड़ की आय सरकार के खाते में जमा करवाते हैं, लेकिन इलाके के विकास पर इसका दस फीसदी भी खर्च नहीं होता है।बुंदेलखंड की असली समस्या अल्पवर्षा नहीं है, वह तो यहां सदियों, पीढि़यों से होता रहा है। पहले यहां के वाशिंदे कम पानी में जीवन जीना जानते थे। आधुनिकता की अंधी आंधी में पारंपरिक जल-प्रबंधन तंत्र नष्ट हो गए और उनकी जगह सूखा और सरकारी राहत जैसे शब्दों ने ले ली। अब सूखा भले ही जनता पर भारी पड़ता हो, लेकिन राहत का इंतजार सभी को होता है- अफसरों, नेताओं... सभी को। यही विडंबना है कि राजनेता प्रकृति की इस नियति को नजरअंदाज करते हैं कि बुंदेलखंड सदियों से प्रत्येक पांच साल में दो बार सूखे का शिकार होता रहा है और इस क्षेत्र के उद्धार के लिए किसी तदर्थ पैकेज की नहीं, बल्कि वहां के संसाधनों के बेहतर प्रबंधन की दरकार है। इलाके में पहाड़ कटने से रोकना, पारंपरिक बिरादरी के पेड़ों ंवाले जंगलों को सहेजना, पानी की बर्बादी को रोकना, लोगों को पलायन के लिए मजबूर होने से बचाना और कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना...महज ये पांच उपचार बुंदेलखंड की तकदीर बदल सकते हैं।पलायन, यहां के सामाजिक विग्रह का चरम रूप है। मनरेगा भी यहां कारगर नहीं रहा है। स्थानीय स्तर पर रोजगार की संभावनाएं बढ़ाने के साथ-साथ गरीबों का शोषण रोककर इस पलायन को रोकना बेहद जरूरी है। यह क्षेत्र जलसंकट से निबटने के लिए तो स्वयं समर्थ है, जरूरत इस बात की है कि यहां की भौगोलिक परिस्थितियों के मद्देनजर परियोजनाएं तैयार की जाएं। विशेषकर यहां के पारंपरिक जलस्रोतों का भव्य अतीत स्वरूप फिर से लौटाया जाए। यदि पानी को सहेजने व उपभोग की पुश्तैनी प्रणालियों को स्थानीय लोगों की भागीदारी से संचालित किया जाए तो बुंदेलखंड का गला कभी रीता नहीं रहेगा।यदि बंुदेलखंड के बारे में ईमानदारी से काम करना है तो सबसे पहले यहां के तालाबों, जंगलों और गौचर का संरक्षण, उनसे अतिक्रमण हटाना, तालाब को सरकार के बनिस्पत समाज की संपत्ति घोषित करना सबसे जरूरी है। नारों और वादों से हटकर इसके लिए ग्रामीण स्तर पर तकनीकी समझ वाले लोगों के साथ स्थाई संगठन बनाने होंगे। दूसरा इलाके पहाड़ों को अवैध खनन से बचाना, पहाड़ों से बह कर आने वाले पानी को तालाब तक निर्बाध पहंुचाने के लिए उसके रास्ते में आए अवरोधों, अतिक्रमणों को हटाना जरूरी है। बुंदेलखंड में बेतवा, केन, केल, धसान जैसी गहरी नदियां हैं, जो एक तो उथली हो गई हैं, दूसरा उनका पानी सीधे यमुना जैसी नदियों में जा रहा है। इन नदियों पर छोटे-छोटे बांध बांधकर या नदियों को पारंपरिक तालाबों से जोड़कर पानी रोका जा सकता है। हां, केन-धसान नदियों को जोड़ने की अरबों रुपए की योजना पर फिर से विचार भी करना होगा, क्योंकि इस जोड़ से बंुदेलखंड घाटे में रहेगा। सबसे बड़ी बात, स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय लोगों की निर्भरता बढ़ानी होगी। अब चाहे राज्य अलग बने या नहीं, यदि बुंदेलखंड के विकास का मॉडल नए सिरे से नहीं बनया गया तो न तो सूरत बदलेगी और न ही सीरत।

शुक्रवार, 12 मई 2017

Bundelkhand drought due to destroyed eco-cycle


बुन्देलखंड   : सिर्फ पानी ही समाधान नहीं


कई दशकों की ही तरह इस बार भी गरमी शुरू होते ही बुंदेलखंड में जल संकट, पलायन और बेबसी की खबरें हवा में तैरने लगी है। कोई अलग राज्य को ही इसका एकमात्र हल मान रहा है तो कोई सरकारी उपेक्षा का उलाहना दे रहा है। यह तो अब तय हो गया है कि हजारों करोड़ के स्पेशल पैकेज से बुंदेलखंड की तकदीर बदलने से रही। यदि समस्या नहीं रही तो विशेष पैकेज या ज्यादा बजट की मांग कैसे हो सकेगी? यदि पलायन नहीं होगा तो दिल्ली, पंजाब आदि में निर्माण कार्य में सस्ते मजदूर कैसे मिलेंगे? अब यहां के बाशिंदों को ही तय करना होगा कि वे कैसा बुंदेलखंड चाहते हैं? असल में यहां का पूरा पर्यावरणीय तंत्र ही सूख गया है। बुंदेलखंड में अभी से जल संकट चरम पर है, जबकि अगली बारिश अभी बहुत दूर है। हालांकि, पिछले मौसम में यहां इंद्रदेव ने अच्छी कृपा बरसाई थी, खेतों में भी अच्छी पैदावार हुई है, लेकिन मार्च के अंत तक मवेशियों को छुट्टा छोड़ना पड़ा, क्योंकि गांव-मजरे के जल-स्रेत चुक गए। जंगल से बंदर से लेकर तेंदुए तक बस्ती की ओर आ रहे हैं क्योंकि उनके प्राकृतिक पर्यावास में पानी खतम हो रहा है। शहरी नल-जल योजनाएं चित्त हो गई व हैंडपंप रीते। असल में हमारे नीतिकार यह समझ नहीं पा रहे हैं कि बुंदेलख्ांड का संकट अकेले पानी की कमी का नहीं है, वहां का संपूर्ण पर्यावरणीय चक्र लगातार अल्प वष्ा के कारण नष्ट हो गया है। इस चक्र में जल संसाधन, जमीन, जंगल, पेड़, जानवर व मवेशी, पहाड़ और वहां के बाशिंदे शामिल हैं। इन सभी पक्षों के क्षरण को थामने के एकीकृत प्रयास के बगैर यहां के हालत सुधरेंगे नहीं, चाहे यहां के सभी नदी-तालाब पानी से लबालब भी हो जाएं। बुंदेलखंड के सभी गांव, कस्बे, शहर की बसाहट का एक ही पैटर्न रहा है-चारों ओर ऊंचे-ऊंचे पहाड़, पहाड़ की तलहटी में दर्जनों छोटे-बड़े ताल-तलैया और उनके किनारों पर बस्ती। पहाड़ के पार घने जंगल व उसके बीच से बहती बरसाती या छोटी नदियां। टीकमगढ़ जैसे जिले में अभी तीन दशक पहले तक हजार से ज्यादा तालाब थे। पक्के घाटों वाले हरियाली से घिरे व विशाल तालाब बुंदेलखड के हर गांव-कस्बे की सांस्कृतिक पहचान हुआ करते थे। ये तालाब भी इस तरह थे कि एक तालाब के पूरा भरने पर उससे निकला पानी अगले तालाब में अपने आप चला जाता था। चाहे चरखारी को लें या छतरपुर को सौ साल पहले वे वेनिस की तरह तालाबों के बीच बसे दिखते थे। अब उपेक्षा के शिकार शहरी तालाबों को कंक्रीट के जंगल निगल गए। रहे-बचे तालाब शहरों की गंदगी को ढोने वाले नाबदान बन गए हैं। बुंदेलखंड का कोई गांव-कस्बा ले लें, हर जगह चार दशक पहले की सीमा तय हरने वालें पहाड़ों पर जमकर अतिक्रमण हुआ। छतरपुर में तो पहाड़ों पर दो लाख से ज्यादा आबादी बस गई। पहाड़ उजड़े तो उसकी हरियाली भी गई। और इसके साथ ही पहाड़ पर गिरने वाले पानी की बूंदों को संरक्षित करने का गणित भी गड़बड़ा गया। जो बड़े पहाड़ जंगलों में थे, उनको खनन माफिया चाट गया। पहाड़ उजड़े तो उसकी तली में सजे तालाबों में पानी कहां से अता व उनको रीत रहना ही था। इस तरह गांवों की अर्थ व्यवस्था का आधार कहलाने वाले चंदेलकालीन तालाब सामंती मानसिकता के शिकार हो गए। सनद रहे बुंदेलखंड देश के सर्वाधिक विपन्न इलाकों में से है। यहां न तो कल-कारखाने हैं और न ही उद्योग-व्यापार। महज खेती पर यहां का जीवनयापन टिका हुआ है। चूंकि बारिश न होने के कारण कहीं घास तो बची नहीं है सो अनुमान है कि इन मवेशियों के लिए हर महीने 67 लाख टन भूसे की जरूरत है। इनके लिए पीने के पानी की व्यवस्था का गणित अलग ही है। यह केवल एक जिले का हाल नहीं है, दो राज्यों में विस्तारित समूचे बुंदेलखंड के 12 जिलों में दूध देने वाले चौपायों के हालात भूख-प्यास व कोताही के हैं। कभी बुंदेलखंड के 45 फीसद हिस्से पर घने जंगल हुआ करते थे। आज यह हरियाली सिमट कर 10 से 13 प्रतिशत रह गई है। पलायन, यहां के सामाजिक विग्रह का चरम रूप है। मनरेगा भी यहां कारगर नहीं रहा है। स्थानीय स्तर पर रोजगार की संभावनाएं बढ़ाने के साथ-साथ गरीबों का पोषण रोक कर इस पलायन को रोकना बेहद जरूरी है। यदि बुंदेलखंड के बारे में ईमानदारी से काम करना है तो सबसे पहले यहां के तालाबों, जंगलों और गौचर का संरक्षण, उनसे अतिक्रमण हटाना, तालाब को सरकार के बनिस्पत समाज की संपत्ति घोषित करना सबसे जरूरी है। यदि बुंदेलखंड के विकास का मॉडल नये सिरे से नहीं बनाया गया तो ना तो सूरत बदलेगी और ना ही सीरत।

बुधवार, 10 मई 2017

Reality check of Swachchhta abhiyaan at Railway tracks

इन पटरियों से दूर है स्वच्छता अभियान का सफर

कहते हैं कि भारतीय रेल में इंसान नहीं, बल्कि देश के सुख-दुख, समृद्धि-गरीबी, मानसिकता- मूल व्यवहार जैसी कई मनोवृत्तियां सफर करती हैं। भारतीय रेल 66 हजार किलोमीटर से भी अधिक के रास्तों के साथ दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा नेटवर्क है, जिसमें हर रोज 12,000 से अधिक यात्री रेल और कोई 7,000 मालगाड़ियां शामिल हैं। अनुमान है कि इस नेटवर्क में हर रोज कोई दो करोड़, 30 लाख यात्री सफर करते हैं तथा 26.5 लाख टन सामान की ढुलाई होती है। यह पूरी प्रणाली एक बानगी है कि हमारे देश में स्वच्छता अभियान नारों-संकल्पों से आगे बढ़कर वास्तविकता के धरातल पर कहां खड़ा है? दुखद है कि यह नेटवर्क पूरे देश की रेल पटरियों के किनारे गंदगी, कूड़े और सिस्टम की उपेक्षा की तस्वीर प्रस्तुत करता है। कई जगह तो प्लेटफॉर्म भी अतिक्रमण, अवांछित गतिविधियों व कूड़े का ढेर बने हुए हैं।
देश की राजधानी दिल्ली से आगरा के रास्ते दक्षिणी राज्यों, सोनीपत-पानीपत के रास्ते पंजाब, गाजियाबाद की तरफ से पूर्वी भारत, गुड़गांव के रास्ते जयपुर की ओर जाने वाले किसी भी रेलवे ट्रैक को दिल्ली शहर के भीतर ही देख लें, तो जाहिर हो जाएगा कि देश का असली कचराघर तो रेल पटरियों के किनारे ही है। सनद रहे कि ये सभी रास्ते विदेशी पर्यटकों के लोकप्रिय रूट हैं और जब दिल्ली में प्रवेश से 50 किलोमीटर पहले से ही पटरियों की दोनों तरफ कूड़े, गंदे पानी, बदबू का अंबार दिखता है, तो उनकी निगाह में देश की कैसी छवि बनती होगी? इन रास्तों पर रेलवे ट्रैक से सटी हुई झुग्गियां, दूर-दूर तक खुले में शौच जाते लोग उन विज्ञापनों को मुंह चिढ़ाते हैं, जिनमें स्वच्छता अभियान की उपलब्धियों के गुणगान होते हैं।
रेल पटरियों के किनारे की कई-कई हजार एकड़ भूमि अवैध अतिक्रमण की चपेट में है। इन पर राजनीतिक संरक्षण प्राप्त भू-माफिआयों का कब्जा है, जो वहां रहने वाले गरीब, मेहनतकश लोगों से वसूली करते हैं। इनमें से बड़ी संख्या में लोगों के जीविकोपार्जन का जरिया कूड़े बीनना या कबाड़ी का काम करना ही है। ये पूरे शहर का कूड़ा जमा करते हैं, उसमें से अपने काम का सामान छांटकर बेच देते हैं और बाकी को रेल पटरियों के किनारे ही फेंक देते हैं, जहां धीरे-धीरे गंदगी के टीले बन जाते हैं।
पटरियों के किनारे जमा कचरे में खुद रेलवे का भी बड़ा योगदान है। खासकर शताब्दी, राजधानी जैसी उन गाड़ियों में, जिसमें ग्राहक को अनिवार्य रूप से तीन से आठ तक भोजन परोसने होते हैं। इनका पूरा भोजन पैक्ड और एक बार इस्तेमाल होने वाले बर्तनों में ही होता है। लेकिन अपना मुकाम आने से पहले खान-पान की व्यवस्था संभालने वाले कर्मचारी बचा भोजन, बोतल, पैकिंग सामग्री के बड़े-बड़े थप्पे चलती ट्रेन से पटरियों के किनारे ही फेंक देते हैं। यदि हर दिन एक रास्ते पर दस डिब्बों से ऐसा कचरा फेंका जाए, तो जाहिर है कि एक साल में उस वीराने में प्लास्टिक जैसी नष्ट न होने वाली चीजों का अंबार लग जाएगा। कागज, प्लास्टिक, धातु जैसे बहुत से कूड़े को तो कचरा बीनने वाले जमा करके रीसाइक्लिंग वालों को बेच देते हैं। सब्जी के छिलके व खाने-पीने की चीजें कुछ समय में सड़-गल जाती हैं। इसके बावजूद ऐसा बहुत कुछ बच जाता है, जो हमारे लिए विकराल संकट का रूप लेता जा रहा है। यह समस्या सिर्फ महानगरों के आस-पास ही नहीं, पूरे ट्रैक पर लगभग हर जगह होती है। यहां तक कि गांवों और जंगलों में भी।
राजधानी दिल्ली हो या फिर दूरस्थ कस्बे के रेलवे प्लेटफॉर्म, निहायत गंदे, भीड़भाड़ भरे, अव्यवस्थित और अवांछित लोगों से भरे होते हैं, जिनमें भिखारी से लेकर अवैध वेंडर और यात्रियों को विदा करने आए रिश्तेदारों से लेकर भांति-भांति के लोग होते हैं। जितने की सफाई क्षमता है, उससे ज्यादा भीड़ यहां जुटती है। इतनी भीड़ रेलवे की सफाई के सीमित संसाधनों को तहस-नहस कर देती है। कुछ साल पहले बजट में ‘रेलवे स्टेशन विकास निगम’ के गठन की घोषणा की गई थी, जिसने रेलवे स्टेशन को हवाई अड्डे की तरह चमकाने के सपने दिखाए थे। कुछ स्टेशनों पर काम हुआ भी, मगर जिन पटरियों पर रेल दौड़ती है, जिन रास्तों से यात्री रेलवे व देश की सुंदर छवि देखने की कल्पना करता है, उसके उद्धार के लिए रेलवे के पास न तो कोई रोड-मैप है और न ही कोई परिकल्पना।

मंगलवार, 9 मई 2017

Government schools needs improvement, not offfice orders

चेहरा बदलें सरकारी स्कूलों का
पंकज चतुर्वेदी
उत्तर प्रदेष के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के कई फैसलों में से एक ‘ सरकारी कर्मचारियों के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ें’ को बेहद क्रांतिकारी कहा जा रहा है। हालांकि अगस्त-15 में इलाहबाद हााईकोर्ट ने ऐसा ही एक आदेष दिया था। कहा जा रहा है कि यह शिक्षा-जगत में बदलाव का बड़ा फैसला है। इस बात से कोई इंकार नहीं किया जा सकता कि  मनमानी फीस वसूल और, अभिभावकों के शोषण  की असहनीय बुराईयों के बावजूद भी निजी या पलिक स्कूल आम लोगों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व बेहतर माहौल के प्रति विश्वास जगाने में सफल रहे हैं। यह भी सच है कि जब सरकारी स्कूल स्तरीय व गुणवत्ता वाली षिक्षा देने में असफल रहे, तभी ये निजी स्कूलों की दुकानों को मनमानी का अवसर मिला। यह भी मानना होगा कि देश को निरक्षरता के अंधकार से निकालकर  साक्षरता की रोशनी दिखाने में भी ऐसे स्कूलों की महत्वपूर्ण भागीदारी रही है। हालांकि सरकारी स्कूल के शिक्षक की शैक्षिक योग्यता व प्रशिक्षण , और वेतन किसी भी नामी-गिरामी स्कूल के शिक्षक के बीस ही होते हैं, इसके बावजूद सरकारी स्कूल के शिक्षक का प्रभामंडल निजी स्कूलों की तुलना में  फीका होता है। इसके मुख्य दो कारण हैं- सरकार स्कूलों में मूलभूत सुविधाआंे का अभाव व दूसरा सरकरी शिक्षक की ड्यूटी में शिक्षण के अलावा बहुत कुछ होना।
यह कटु सत्य है कि देषभर के सरकारी स्कूलो में बैठक व्यवस्था, ब्लेक बोर्ड, षौचालय , साफ पानी बिजली जैसी सुविध्आों का ही नहीं, बैठने लायक कमरों, छात्रों की तुलना में षिक्षकों की संख्या का भी अभाव है। जरा गौर करंे कि अभी जो बच्चे निजी स्कूल में जा रहे हैं वे मजबूरी में सरकारी स्कूल में चले गए तो वहां प्रत्येक कक्षा में निर्धरित छात्र संख्या के बंधन के चलते सीधा असर उन गरीब या समाज के उस वर्ग के बच्चों पर पड़ेगा जिनकी पहली पीढ़ी स्कूल आ रही है। अच्छा वेतन लेने वाले सरकारी कर्मचारी यदि निजी स्कूल के खर्च उठा सकते हैं, जबकि सरकारी स्कूल में आज पढ़ रहे बच्चे निजी स्कूल में नहीं जा सकते, ऐसे में तो यह आदेष गरीब षिक्षा आकांक्षियों पर भारी ही पड़ेगा। मध्यप्रदेष के छतरपुर जिले के कर्री कस्बे के हाई स्कूल  में बीते तीन सालों से गणित का केवल एक ही षिक्षक है और उसके जिम्म्ेंा है कक्षा नौं व 10 के कुल 428 छात्र। क्लास रूम इतने छोटे हैं कि 50 से ज्यादा बच्चे आ नहीं सकते और षिक्षक हर दिन पांच से ज्यादा पीरियेड पढ़ा नहीं सकता। जाहिर है कि बड़ी संख्या में बच्चे गणित षिक्षण से अछूते रह जाते हैं। जिला मुख्यालय में बैठे लोग भी जानते हैं कि उस षाला का अच्छा रिजल्ट महज नकल के भरोसे आता है। ऐसे ‘‘कर्री’’ देष के हर जिले, राज्य में सैंकड़ों-हजारों में हैं।
वहीं समाज के एक वर्ग द्वारा गरियाए जा रहे निजी स्कूलों में कम से कम यह हालात तो नहीं हैं। यह बेहद आदर्श स्थिति है कि देश में समूची स्कूली शिक्षा का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाए व यूरोप जैसे विकसित देशों की तरह आवास के निर्धारित दायरे में रहने वाले बच्चे का निर्धारित स्कूल में जाना अनिवार्य हो। कोई भी स्कूल  निजी नहीं होगा व सभी जगह एकसमान टेबल-कुर्सी, भवन, पेयजल, शौचालय, पुस्तकें आदि होंगी। सभी जगह दिन का भोजन भी स्कूल में ही होगा । डेढ साल पहले शायद माननीय अदालत इस तथ्य से वाकिफ होगी ही कि सुदूर ग्रामीण अंचलों की बात दूर की है, देश की राजधानी दिल्ली में ही कई ऐसे सरकारी स्कूल हैं जहां ब्लेक बोर्ड व पहुंच-मार्ग या भवन जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं। मुख्यंमत्री जी  को यह भी पता होगा कि उप्र में ही पैतंीस प्रतिशत से ज्यादा शिक्षकों के पद रिक्त हैं और यदि सभी स्वीकृत पद पर शिक्षक रख भी दिए जाएं तो सरकारी स्कूल में शिक्षक-छात्र अनुपात औसतन एक शिक्षक पर 110 बच्चों का होगा।  यह विडंबना है कि हमारी व्यवस्था इस बात को नहीं समझ पा रही है कि पढ़ाई या स्कूल इस्तेमाल लायक सूचना देने का जरिया नहीं हैं, वहां जो कुछ भी होता है , सीखा जाता है उसे समझना व व्याहवारिक बनाना अनिवार्य है। हम स्कूलों में भर्ती के बड़े अभियान चला रहे हैं और फिर भी कई करोड़ बच्चों से स्कूल दूर है। जो स्कूल में भर्ती हैं, उनमें से भी कई लाख बच्चे भले ही कुछ प्रमाण पत्र पा कर कुछ कक्षाओं में उर्तीण दर्ज हों लेकिन हकीकत में ज्ञान से दूर हैं। ऐसे में जो अभिभावक व्यय वहन कर सकते हैं , उन्हें उन स्कूलों में अपने बच्चें को भेजने केे लिए बाध्य करना जोकि  सरकारी सहायता के कारण उन लोगों की ज्ञान-स्थली हैं जो समाज के कमजोर सामाजिक-आर्थिक वर्ग से आते हैं, असल में जरूरतमंदों का हक मारना होगा।
यहां यह भी याद रखना जरूरी है कि केंद्रीय विद्यालय, नवोदय, सैनिक स्कूल ,सर्वोदय या दिल्ली के प्रतिभा विकास विद्यालय सहित कई हजार ऐसे सरकारी स्कूल हैं जहां बच्चों के प्रवेश के लिए पब्लिक स्कूल से ज्यादा मारामारी होती है। जाहिर है कि मध्य वर्ग को परहेज सरकारी स्कूल से नहीं , बल्कि वहां की अव्यवस्था और गैर-शैशिक परिवेश से हैं। विडंबना है कि सरकार के लिए भी सरकारी स्कूल का शिक्षक बच्चों का मार्गदर्शक नहीं होता, उसके बनिस्पत वह विभिन्न सरकारी येाजनाओं का वाहक या प्रचारक होता है। उसमें चुनाव से ले कर जनगणना तक के कार्य, राशन कार्ड से ले कर पोलिया की दवा पिलाने व कई अन्य कार्य भी शािमल हैं।  फिर आंकड़ों में एक शिक्षान्मुखी-कल्याणकारी राज्य की तस्वीर बताने के लिए नए खुले स्कूल, वहां पढने वाले बच्चों की संख्या, मिड डे मील का ब्यौरा बताने का माध्यम भी स्कूल या शिक्षक ही है। काश स्कूल को केवल स्कूल रहने दिया जाता व एक नियोजित येाजना के तहत स्कूलों की मूलभूत सुविधाएं विकसित करने का कार्य होता। गौरतलब है कि देश में हर साल कोई एक करोड़ चालीस लाख बच्चे हायर सेकेंडरी पास करते हैं लेकिन कालेज तक जाने वाले महज 20 लाख होते है। यदि प्राथमिक शिक्षा से कालेज तक की संस्थाओं का पिरामिड देखें तो साफ होता है कि उत्तरोतर उनकी संख्या कम होती जाती है।  केवल संख्या में ही नहीं गुणवत्ता, उपलब्धता और व्यय में भी।  गांव-कस्बों में ऐसे लेाग बड़ी संख्या में मिलते हैं जो सरकारी स्कूलों की अव्यवस्था और तंगहाली से निराश हो कर अपने बच्चों को निजी स्कूलो ंमें भेजते हैं, हालांकि उनकी जेब इसके लिए साथ नहीं देती है। दुखद यह भी है कि षिक्षा का असल उद्देष्य महज नौकरी पाना, वह भी सरकारी नौकरी पाना बन कर रह गया हे। जबकि असल में षिक्षा का इरादा एक बेहतर नागरिक बनाना हेाता है जो अपने कर्तवय व अधिकारों के बारे में जागरूक हो, जो अपने जीवन-स्तर को स्वच्छता-स्वास्थ्य-संप्रेश्ण की दृश्टि से बेहतर बनाने के प्रयास स्वयं करे। यही नहीं वह अपने पारंपरिक रोजगार या जीवकोपार्जन के तरीके को विभिन्न षसकीय योजनओं व वैज्ञानिक दृश्टिकोण से संपन्न व समृद्ध करे। विउंबना हे कि गांव के सरकारी सक्ल से हायर सेकेडरी पास बच्चा बैंक में पैसा जमा करने की पर्ची भरने में झिझकता है। इसका असल कारण उसके स्कूल के परिवेष में ही उन तत्तवों की कमी होना है, जिस उद्देष्य की पूर्ति के लिए उसे षिक्षित किया जा रहा है।
यह देश के लिए गर्व की बात है कि समाज का बड़ा वर्ग अब पढ़ाई का महत्व समझ रहा है, लेाग अपनी बच्चियों को भी स्कूल भेज रहे हैं, गांवंो में विकास की परिभाषा में स्कूल का होना प्राथमिकता पर है। ऐसे में स्कूलों में  जरूरतों व शैक्षिक गुणवत्ता पर काम कर के सरकारी स्कूलों का श्री या सम्मान वापिस पाया जा सकता है।  यह बात जान लें कि किसी को जबरिया उन स्कूलों में  भेजने के आदेश एक तो उन लोगों के हक पर संपन्न लोगों का अनाधिकार प्रवेश होंगे जिनकी पहली पीढ़ी स्कूल की तरफ जा रही है। साथ ही शिक्षा के विस्तार की योजना पर भी इसका विपरीत असर होगा। निजी स्कूलों की मनमानी पर रोक हो, सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर बढ़े, स्कूल के शिक्षक की प्राथमिकता केवल पठन-पाठन हो, इसके लिए एक सशक्त तंत्र आवश्यक है ना कि  अफसर, नेताओं के बच्चों का सरकरी स्कूल में प्रवेश की अनिवार्यता। लेकिन यह भी अनिवार्य है कि धीरे-धीरे समाज के ही संपन्न लोग किसी निजी स्कूल में लाखों का डोनेषन दे कर अपने बच्चे को भर्ती करवाने के बनिस्पत अपने करीब के सरकारी स्कूल में उस लाखों के दान से मूलभूत सुविधाएं विकसित करने की पहल करें और फिर अपने बच्चों को वहां भर्ती करवाएं।


शुक्रवार, 5 मई 2017

Education policy should show the right way to youth

हमारी शिक्षा  और युवाओं में आतंकवाद
                                     ...पंकज चतुर्वेदी

इस साल मार्च महीने तक देश  में अंतरराष्ट्रीय  आतंकी संगठन आईएसआईएस से ताल्लुक रखने के आरोप में कुल 75लोग गिरफ्तार किए गए हैं।इनमें से 20 के पास इंजीनयरिंग की स्नातक डिगरी है। 12 डिप्लोमाधारी, तीन कंप्यूटर या अन्य संकाय में मास्टर डिगरीधारी हैं। चार बारहवीं पास हैं तो 13 ने दसवीं तक शिक्षा ली है। इससे पहले भोपाल पुलिस ने कुछ युवकों को पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए काम करने के आरोप में पकड़ा। वे सभी युवा भी उच्च षिक्ष प्राप्त थे। पिछले साल ही पहले जवाहरलाल यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली और उसके बाद जाधवपुर यूनिवर्सिटी, कुछ सिरफिरों ने देश  को तोड़ने के नापाक नारे लगाए थे । आतंकियों के साथ सख्ती से पेश  आने और कानून से इतर उन्हें सबक सिखाने की वकालत करने वाले तो बहुत हैं , लेकिन असल सवाल कहीं गौण है कि आखिर हमारी युवा नीति (वैसे तो ऐसी कोई नीति है ही नहीं ) में  क्या ऐसी कमी है कि हमारा युवा अपने ही लोगों के खिलाफ हथियार उठा रहा है। बीते कुछ सालों में यह देखा गया है कि हमारे देश  में घटित अधिकांश  आतंकवादी घटनाओं में हमारे देश  के ही युवा शा मिल रहे हैं। यही नहीं इनमें से कई खासे पढ़े-लिखे भी हैं। यह और तकलीफदेह है कि ऐसे युवा या तो आंचलिक ग्रामीण इलाके के हैं या फिर छोटे कस्बों के। हां, इस हकीकत को स्वीकारने के लिए कशमीर -खालिस्तान के अलगाववाद के साथ-साथ छत्तीसगढ़-झारखंड की नक्सली हिंसा, उत्तर-पूर्व के संघर्शों को भी एक साथ आंकना-परखना होगा।
ये लोग मध्यम या निम्न मध्यम परिवारों से, सुदूर स्थानों से, सरकारी स्कूलों से पढ़कर जिला मुख्यालय स्तर पर आते हैं। वहां आखिर उनको कैसी सीख मिलती है कि वे अभिव्यक्ति की आजादी षब्द के गलत मायने लगा कर अलगाववादी नारे और हरकतों में षामिल हो जाते है।। ऐसे परिसरों में जहां षिक्षक-छात्र का अनुपात बहुत कम है, षिक्षक व छात्र एक ही परिसर में रहते हैं, जहां की दुनिया उसी परिसर तक सीमित होती है, यदि ऐसे में छात्र  रास्ता भटक रहे हैं तो जाहिर है कि हमारी षिक्षा प्रणाली, हमारी युवा नीति, हमारी पुस्तकों में कुछ कमी रह गई है।
यह षक के दायरे में है कि हमारा राजनीतिक नेतृत्व देष के युवा का असली मर्म समझ पा रहा है। महंगाई की मार के बीच उच्च षिक्षा प्राप्त युवाओं का रोजगार, घाटे का सौदा होती खेती और विकास के नाम पर हस्तांतरित होते खेत, पेट भरने व सुविधाओं के लिए षहरों की ओर पलायन। ग्रामीण युवाओं की ये दिक्कतें क्या हमारे नीति निर्धारकों की समझ में है? क्या भारत के युवा को केवल रोजगार चाहिए ? उसके सपने का भारत कैसा है ? वह सरकार और समाज में कैसी भागीदारी चाहता है? ऐसे ही कई सवाल तरूणाई के ईर्दगिर्द टहल रहे हैं, लगभग अनुत्तरित से। तीन दषक पहले तक कालेज  सियासत के ट्रेनिंग सेंटर होते थे, फिर छात्र राजनीति में बाहरी दखल इतना बढा कि एक औसत परिवार के युवा के लिए छात्र संघ का चुनाव लड़ना असंभव ही हो गया। युवा मन की वैचारिक प्रतिबद्धता जाति,धर्म, क्षेत्र जैसे खांचों में बंट गई है और इसका असर देष की राजनीति पर भी दिख रहा है। कल तक एक पार्टी को कोसने वाला अगले ही दिन दल बदल लेता है, बगैर किसी संकोच-षर्म के।
सरकारी मीडिया हो या स्वयंसेवी संस्थाएं, जिस ने भी युवा वर्ग का जिक्र किया तो, अक्सर इसका ताल्लुक शहर में पलने वाले कुछ सुविधा-संपन्न लड़के-लड़कियों से ही रहा । जींस और रंग बिंरगी टोपियां लगाए, लबों पर फर्राटेदार हिंगरेजी और पश्चिमी सभ्यता का अधकचरा मुलम्मा चढ़े युवा । यह बात भूला ही दी जाती है कि इनसे कहीं पांच गुनी बड़ी और इनसे बिलकुल भिन्न युवा वर्ग की ऐसी भी दुनिया है, जो देश पांच लाख गांवों में हैं । तंगी, सुविधाहीनता व तमाम उपेक्षाओं की गिरफ्त में फंसी एक पूरी कुंठित पीढ़ी । गांव की माटी से उदासीन और शहर की चकाचौंध छू लेने की ललक साधे युवा शक्ति । भारतीय संस्कार, संस्कृति और सभ्यता की महक अभी कहीं शेष है तो वह है ग्रामीण युवा पीढ़ी । यथार्थता, जिंदादिली और अनुशासन सरीखे गुणों को शहरी सभ्यता लील चुकी है । एक तरफ ग्रामीण युवक तत्पर, मेहनती, संलग्नशील व विश्वसनीय है तो दूसरी ओर नारों, हड़तालों और कृत्रिम सपनों में पले-पघे शहरी युवा । वस्तुतया कुशल जन-बल के निर्माण के लिए ग्रामीण युवक वास्तव में ‘कच्चे माल’ की तरह है , जिसका मूल्यांकन कभी ठीक से किया ही नहीं जाता और लाजिमी है कि उनके विद्रोह हो कोई सा भी रंग दे दिया जाता है।
गांवों में आज ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजुएट डिग्रीधारी युवकों के बजाए मध्यम स्तर तक पढ़े-लिखे और कृषि-तकनीक में पारंगत श्रमशील युवाओं की भारी जरूरत है । अतः आंचलिक क्षेत्रों में डिग्री कालेज खोलने के बनिस्पत वहां खेती-पशुपालन-ग्रामीण प्रबंधन के प्रायोगिक प्रशिक्षण संस्थान खोलना ही उपयोगी होगा । ऐसे संस्थानों में माध्यमिक स्तर की शिक्षा के बाद एक साल के कोर्स रखे जा सकते हैं, साथ ही वहां आए  युवकों को रोजगार की गारंटी देना होगा । इस तरह प्रशिक्षित युवकों का गांव में रहने व ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ओर रुझान खुद-ब-खुद आएगा । इससे एक तो गांवों में आधुनिकता की परिभाषा खुद की तय होगी साथ ही ग्रामीण युवाओं को शहर भागने या अज्ञात भविष्य के लिए शून्य में भटकने की नौबत नहीं आएगी ।
सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश को ओलंपिक या अन्य अंतरराष्ट्ररीय खेलों में कम पदक मिलने पर सड़क से संसद तक चर्चा होती रहीं है । लेकिन क्या कभी किसी ने खयाल किया कि खेलनीति के सरकारी बजट का कितना हिस्सा जन्मजात खिलाड़ी यानि ग्रामीण युवकों पर खर्च होता है । ग्रामीण खेलों की सरकारी उपेक्षा का दर्दनाक पहलू हरियाणा, झारखंड या उत्तर-पूर्वी राज्यों में देखा जा सकता है वहां गांव-गांव में खेल की परंपरा रही है । इनमें बेहतरीन खिलाड़ी छोटी उम्र में तैयार किए जाते थे । उन्हें कभी सरकारी प्रश्रय मिला नहीं । सो धीरे-धीरे से अखाड़े अपराधियों के अड्डे बन गए। अब ठेका हथियाने, जमीन कब्जाने या चुनावों में वोट लूटने सरीखे कार्यों में इन अखाड़ों व खिलाड़ियों का उपयोग आम बात है । जरूरत है तो बस उन्हें थोड़े से प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं के कानून-कायदें सिखाने की । काष गांवों में खेल-कूद प्रषिक्षण का सही जरिया बन पाए।
एक बात और, इस समय देष का लेकतंत्र गांवों की ओर जा रहा है, लाखों पंच, सरपंच, पार्शद नेतृत्व की नई कतार तैयार कर रहे हैं। इन लोगों को सही प्रषिक्षण मिले- योजना बनाने, क्रियान्वयन और वित्तीय प्रबंधन का, इन लोगों को अवसर मिलें, नए भारत के निर्माण में, इन लोगों को प्रसिद्धी मिले दूरस्थ गांवों, मजरों में पसीना बहाने पर ; क्या कोई ऐसी योजना सरकार तैयार कर पाएगी ?
गांवों में बसने वाले तीन चौथाई नवयुवकों की उपेक्षा से कई राष्ट्रीय स्तर पर कई समस्याएं भी खड़ी हो रही हैं । कश्मीर हो या उत्तर-पूर्व, जहां भी सशस्त्र अलगाववाद की हवा बह रही है, वहां हथियार थामने वाले हाथों में ग्रामीण युवाओं की संख्या ही अधिक हैं । हमारी षिक्षा में कुछ बात तो ऐसी है कि वह ऐसे युवाओं को देष, राश्ट्रवाद, जैसी भावनाओं से परिपूर्ण नहीं कर पाया। क्रिकेट के मैदान पर तिरंगे ले कर उधम मचाने वाले युवाओं का भी देष-प्रेम के प्रति दृश्टिकोण महज नेताओं को गाली देने या पाकिस्तान को मिटा देने तक ही सीमित है। यह हमारी पाठ्य पुस्तकों  और उससे उपज रही षिक्षा का खोखला दर्षन नहीं तो और क्या है ? बातें युवाओं की लेकिन नीति में दिषाहीन, अनकहे सवालों से जूझते युवा ।

पंकज चतुर्वेदी

 संपर्क- 9891928376


गुरुवार, 4 मई 2017

Pakistan needs multidimension therepy for brutal acts

आखिर क्या है पाकिस्तान का इलाज


पिछले दिनों कश्मीर से सटी सीमा के पुंछ जिले के कृष्णा घाटी सेक्टर में पाकिस्तानी आतंकियों ने (भले ही वे चाहे बैट के हों, सेना के या आतंकी संगठनों के) हमारी सीमा में ढाई सौ मीटर भीतर घुसकर 22वीं सिख रेजीमेंट के नायब सूबेदार परमजीत सिंह और सीमा सुरक्षा बल की 200वीं बटालियन के प्रधान आरक्षक पर छुपकर हमला किया और उनका सिर काट कर अपने साथ ले गए। पिछले तीन साल में ऐसी बर्बर तीसरी घटना से जनमानस हिल गया है। जैसी कि स्वाभाविक प्रतिक्रिया होनी थी, जनमानस पाकिस्तान को नेस्तनाबूद करने, बदला लेने, ईंट से ईंट बजा देने की मांग कर सड़कों पर है। शहीदों के परिवार भी गुस्से में हैं।
भारत जैसी सशक्त सेना, अत्याधुनिक हथियार, अनुशासन और शौर्य में अव्वल बल के सामने पाकिस्तान जैसे असफल देश की हरकतें असहनीय होती जा रही हैं। जनता तत्काल परिणाम चाहती है, लेकिन सरकार में बैठे लोग दूरगामी नजरिए से जवाब देना चाहते हैं। हालांकि यह बात भी कटु सत्य है कि आम लोगों को इस सरकार से उम्मीदें ज्यादा हैं। असल में सीमा पर जो हुआ, उसे केवल उस घटना के परिपे्रक्ष्य से आगे बढ़कर देखना होगा। पाकिस्तान में पनामा लीक मामले में नवाज शरीफ फंस गए हैं। पनामा पेपर लीक मामले में घिरे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की मुश्किलें बढ़ गई हैं। पाक सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ ज्वाइंट इन्वेस्टीगेशन टीम यानी जेआईटी के गठन का आदेश दिया है। बताया जा रहा है कि जेआईटी हर 15 दिन में कोर्ट में रिपोर्ट पेश करेगी। ऐसी भी चर्चा है कि इस फैसले से शरीफ को पद भी छोड़ना पड़ सकता है और अपनी पार्टी से अंतरिम प्रधानमंत्री का रास्ता चुनना होगा।

पाकिस्तानी वेबसाइट डॉन के मुताबिक, ये स्पेशल बेंच धारा 184/3 के तहत मामले की जांच करेगी। जांच में ये पता लगाया जाएगा कि आखिर पैसा कैसे कतर पहुंच पाया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस बड़े मामले की सुनवाई पांच जजों की पीठ कर रही है। जिसमें नवाज के तीनों बच्चे मरियम, हसन और हुसैन नवाज को लेकर जजों का मत 3-2 में रहा। अगले साल होने वाले चुनावों को लेकर नवाज के परिजन कथित तौर पर इसे एक राजनीतिक मोड़ दे रहे हैं। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को उनके विश्वस्त सहायक की बर्खास्तगी को लेकर सेना ने उन्हें नीचा दिखाते हुए उनके इस कदम को नकार दिया है। इसके बाद सत्ता के गलियारे में नवाज की खूब किरकिरी हो रही है।
पनामा पेपर लीक मामले में सुप्रीम कोर्ट के जांच के आदेश से शरीफ पहले से ही दबाव महसूस कर रहे हैं। अब सेना के रुख से उनकी मुश्किलें और बढ़ गई हैं। यह जानकारी मीडिया रिपोर्ट से मिली।इसके तत्काल बाद भारत से छद्म युद्ध को लेकर सेना और सरकार के बीच हुई उच्चस्तरीय बैठक की सूचना नवाज के विश्वसनीय सहायक सैयद तारिक फातमी ने लीक कर दी थी। इस वजह से शरीफ ने शनिवार को फातमी को बर्खास्त कर दिया था। लेकिन सेना ने सरकार के फैसले को खारिज कर दिया और कहा कि सरकार को इस मामले की जांच करने वाली समिति की सिफारिशों को पूरी तरह से लागू करना चाहिए। सेना की ओर से इस आशय की प्रतिक्रिया आते ही नवाज सरकार ‘डैमेज कंट्रोल’ में जुट गई है। यह किसी से छिपा नहीं है कि पाकिस्तान में असल सरकार सेना और आईएसआई चलाती है। हम चाहें खूब लोकतांत्रिक तरीके से चुनी सरकार से बातचीत करें, लेकिन असल सत्ता उन शैतानी ताकतों के हाथ में है, जो हर समय युद्ध, उन्माद के नाम पर हथियार खरीदी में दलाली करते हैं। ठीक इसी समय भारत के बड़े उद्योगपति सज्जन जिंदल नवाज शरीफ से मिलने गए। सनद रहे ये वही जिंदल हैं, जिन्होंने पूर्व में भी नवाज शरीफ व नरेंद्र मोदी के बीच निजी मुलाकात का खाका खींचा था। हालांकि भारत में इस मुलाकात की चर्चा मीडिया में हुई नहीं, लेकिन पाकिस्तानी मीडिया में यह मसला खूब उछला और फिर नवाज शरीफ की बेटी मरियम ने ट्वीट कर सफाई दी कि यह निजी मुलाकात थी। पाकिस्तान के बड़े अखबार ‘डान’ के संपादकीय पेज पर बड़ा सा लेख छपा, जिसमें भारत-पाकिस्तान शांति वार्ता फिर शुरू होने की सुगबुगाहट इस मुलाकात का असली मकसद बताया गया। ठीक उसके बाद कश्मीर में ताबड़तोड़ घटनाएं हुईं। तीन दिन में 10 से ज्यादा पुलिस वालों को मार कर हथियार लूटे गए।
सेना के कैंप पर हमला हुआ और दो जवानों के शवों के साथ पाशविक व्यवहार किया गया। जाहिर है कि ऐसा सबकुछ कर लिया गया, जिससे भारत कड़ी सैन्य कार्यवाही करे और कहीं पिघलती बर्फ फिर कड़ी हो जाए। हमें यह भी जान लेना चाहिए कि भारत में एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो दोनो देशों के संबंध अच्छे नहीं होने देना चाहता। टीवी बहसों पर बैठे बड़ी-बड़ी मूछोंं वाले रिटायर्ड फौजी अफसरों में से कई विदेशी हथियार कंपनियों के भारत में बाकायदा एजेंट हैं और वे सीमा पर उड़ने वाले हर बारूद में अपना फायदा तलाशते हैं, तभी जनता को सही तस्वीर दिखाने के बनिस्पत भड़काऊ, बेसिरपैर की बातें करते हैं।सवाल फिर भी खड़ा होता है कि क्या पाकिस्तान की इस अंदरूनी राजनीति की मजबूरी समझते हुए हम अपने देश में आतंकियों, पाकिस्तानी सेना को ऐसी नृशंस हरकतें करने दें? एक सशक्त राष्ट्र तो कभी भी ऐसा नहीं चाहेगा। पंजाब के तरनतारन जिले के शहीद हुए नायब सूबेदार परमजीत सिंह का एक वीडियो यूट्यूब पर बहुत चर्चित हुआ है, जिसमें वे अपने साथियों के साथ पंजाबी में एक गीत गा रहे हंै, जिसमें वह कह रहे हैं कि पाकिस्तान ने अभी हमारा प्यार देखा है। यदि सरकार अनुमति दे दे तो दुश्मन देश को धुआं-धुआं कर देंगे। वह दिन आया नहीं, लेकिन शहादत के बाद उनके भाई रंजीत सिंह ने जो कहा कि वह बड़े से बड़ा नेता, सुरक्षा विशेषज्ञ नहीं कह सकता। उन्होंने कहा कि जब फौज में एक सेंटीमीटर लंबाई कम हो तो उसकी भर्ती नहीं होती, तो मेरे भाई का बगैर सिर का एक फुट छोटा शरीर मैं कैसे ले लूं? उनका कहना था कि हर सांसद और मंत्री के बेटे को फौज में भर्ती अनिवार्य कर दो। जब नेताओं के बच्चे सीमा पर खड़े होंगे तो फिर कभी पाकिस्तान से गोली नहीं चलेगी, तोहफे आएंगे। रंजीत सिंह का कहना था कि आरपार की लड़ाई की बात करने वाले धोती बांध कर एसी में बैठते हंै, वे क्या जाने सेना का काम। जिन्हें सेना की कार्य प्रणाली पता नहीं, वे उसे आदेश देते हैं। अभी तो पाकिस्तान आर ही कर रहा है- संसद, उरी, पठानकोट, सैनिकों की गर्दन काटना, सभी उसने आर आकर किया है, पार जा कर तो हमने ऐसा कुछ किया नहीं।इस भरोसे चुप बैठना अब ठीक नहीं है कि पाकिस्तान की कुछ ताकतें युद्ध ही चाहती हैं और हम यदि पाकिस्तान पर हमला करते हैं तो उनके उद्देश्य की पूर्ति होगी। इसे बहाना ही कहा जाएगा कि नवाज शरीफ अपनी कुर्सी बचाने के लिए यह तनाव उपजा रहे हैं। आखिर हम उनकी अंदरूनी राजनीति की कीमत क्यों चुकाएं? पाकिस्तान को ठीक करने के लिए संसद का विशेष सत्र बुला कर उसका ‘मोस्ट फेवरेट नेशन’ का दर्जा समाप्त हो। संसद में एकमत हो कर पाकिस्तान को आतंकी राष्ट्र घोषित कर, सभी मित्र देशों के पास सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजकर इसका दवाब बनाया जाए। हम अभी भी अमेरिका से उम्मीद करते हैं कि वह पाकिस्तान को आतंकी देश घोषित करे। आखिर इसकी पहल हम ही क्यों न करें। भारत सरकार को चाहिए कि पाकिस्तान की आतंकी हरकतों के तथ्यों के साथ एक घंटे का मल्टी मीडिया प्रजेंटेशन बनाऐ, उसका दुनिया की भाषाओं में अनुवाद हो और सभी देशों के दूतावासों में इसका प्रदर्शन हो। इसके लिए सभी दलों के लोगों को भेजा जाए जो वहां की मीडिया, आम लोगों, भारतीय डायस्पोरा और वहां की सरकार को पाकिस्तान का आतंकी चेहरा दिखाएं।यह दुखद है कि जब कभी पाकिस्तान को मजा चखाने की बात होती है, गुलाम अली या फवाद खान का मुर्दाबाद करने या पाबंदी लगाने पर आवाजें उठने लगती हैं। निश्चित ही उन पर भी पाबंदी लगे, लेकिन उससे पहले पाकिस्तान को हर दिन आ-जा रहे 300 ट्रक की तिजारत बंद हो। आज भी सीमा पर टमाटर, खजूर, प्याज, जिप्सम, कॉटन के ट्रक आ-जा रहे हैं। यही नहीं हमारे कई उद्योगपतियों के कारखाने, निर्माण प्रोजेक्ट वहां चल रहे हैं। ऐसे में बिड़ला, अडानी, जिंदल के पाकिस्तान में चल रहे सभी प्रोजेक्ट बंद हों। देश में हजारों ऐसी कंपनियां हैं, जो दुबई या अन्य गल्फ देशों के माध्यम से पाकिस्तान से व्यापार कर रही हैं। ऐसी कंपनियों के कारोबार पर पूरी तरह रोक लगे। इसके साथ ही सैन्य कार्यवाही छोटे-छोटे अंतराल में होती रहना चाहिए। यदि हमारा खुफिया तंत्र मजबूत हो और हमारे पास सीमा पार के आतंकी कैंपों की पुख्ता जानकारी हो तो घुसकर उन्हें फोड़ने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए। दुनिया उसे ही सलाम करती है, जो विनय के साथ उपद्रवियों को माकूल जवाब दे।

मेरे बारे में