तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 30 जून 2017

flood" A men made disaster



देश को पीछे धकेल देती है बाढ़

अभी तो बरसात का पहले महीना ही चल रहा है और पूर्वोत्तर राज्यों से लेकर पूर्वी उत्तर प्रदेश तक कई स्थानों पर नदियां उफन कर खेत-बस्ती में घुस गई हैं। अभी तो मानसून के 60 दिन बकाया हैं और मौसम विभाग की उस भविष्यवााणी के सच होने की संभावना दिख रही है कि इस साल सदी का सबसे बेहतरीन मानसून होगा व बरसात औसत से ज्यादा होगी। तात्कालिक तौर पर तो यह सूचना सुखद लगती है लेकिन जल-प्लावन के चलते तबाही के बढ़ते दायरे के आंकड़े अलग तरह का खौफ पैदा करते हैं। पिछले कुछ सालों के आंकड़ें देखें तो पाएंगे कि बारिश की मात्रा भले ही कम हुई है, लेकिन बाढ़ से तबाह हुए इलाके में कई गुना बढ़ोतरी हुई है।
कुछ दशकों पहले जिन इलाकों को बाढ़ से मुक्त क्षेत्र माना जाता था, अब वहां की नदियां भी उफनने लगी हैं और मौसम बीतते ही उन इलाकों में एक बार फिर पानी का संकट छा जाता है। असल में बाढ़ महज एक प्राकृतिक आपदा ही नहीं है, बल्कि यह देश के गंभीर पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक संकट का कारक बन गया है। हमारे पास बाढ़ से निपटने को महज राहत कार्य या यदा-कदा कुछ बांध या जलाशय निर्माण का विकल्प है, जबकि बाढ़ के विकराल होने के पीछे नदियों का उथला होना, जलवायु परिवर्तन, बढ़ती गरमी, रेत की खुदाई व शहरी प्लास्टिक व खुदाई मलवे का नदी में बढ़ना, जमीन का कटाव जैसे कई कारण दिनों-दिन गंभीर होते जा रहे हैं। जिन हजारों करोड़ की सड़क, खेत या मकान बनाने में सरकार या समाज को दशकों लग जाते हैं, उसे बाढ़ का पानी पलक झपकते ही उजाड़ देता है। हम नए कायांर्े के लिए बजट की जुगत लगाते हैं और जीवनदायी जल उसका काल बन जाता है।
देश में सबसे ज्यादा सांसद व प्रधानमंत्री देने वाले राज्य उत्तर प्रदेश की उर्वरा धरती, कर्मठ लोग, अयस्क व अन्य सांसधन उपलब्ध होनेे के बावजूद विकास की सही तस्वीर न उभर पाने का सबसे बड़ा कारण हर साल आने वाली बाढ़ से होने वाले नुकसान हैं। बीते एक दशक के दौरान राज्य में बाढ़ के कारण 45 हजार करोड़ रुपए कीमत की तो महज खड़ी फसल नष्ट हुई है। सड़क, सार्वजनिक संपत्ति, इंसान, मवेशी आदि के नुकसान अलग हैं। राज्य सरकार की रपट को भरोसे लायक मानें तो सन 2013 में राज्य में नदियों के उफनने के कारण 3259.53 करोड़ का नुकसान हुआ था जो कि आजादी के बाद का सबसे बड़ा नुकसान था।
अब तो देश के शहरी क्षेत्र भी बाढ़ की चपेट में आ रहे हैं। इसके कारण भौतिक नुकसान के अलावा मानव संसाधन का जाया होना तो असीमित है। सनद रहे कि देश के 800 से ज्यादा शहर नदी किनारे बसे हैं, वहां तो जलभराव का संकट है ही, कई ऐसे कस्बे जो अनियोजित विकास की पैदाइश हैं, शहरी नालों के कारण बाढ़-ग्रस्त हो रहे हैं। सन-1953 से लेकर 2010 हम बाढ़ के उदर में 8,12,500 करोड़ फूंक चुके हैं जबकि बाढ़ उन्मूलन के नाम पर व्यय राशि 1,26,000 करोड़ रुपए है। यह धन राशि मनरेगा के एक साल के बजट का कोई चार गुणा है। आमतौर पर यह धन राशि नदी प्रबंधन, बाढ़ चेतावनी केंद्र बनाने और बैराज बनाने पर खर्च की गई लेकिन यह सभी उपाय बेअसर ही रहे हैं। आने वाले पांच साल के दौरान बाढ़ उन्मूलन पर होने वाले खर्च का अनुमान 57 हजार करोड़ आंका गया है।

मौजूदा हालात में बाढ़ महज एक प्राकृतिक प्रकोप नहीं, बल्कि मानवजन्य साधनों की त्रासदी है। बाढ़ एक तरफ विकास की राह में रोड़ा है तो दूसरी तरफ देश के जल संसाधनों के लिए भी नुकसानदेह है।
अतएव बाढ़ के बढ़ते सुरसा-मुख पर अंकुश लगाने के लिए शीघ्र कुछ करना होगा । कुछ लोग नदियों को जोड़ने में इसका निराकरण खोज रहे हैं। हकीकत में नदियों के प्राकृतिक बहाव, तरीकों, विभिन्न नदियों के उंचाई-स्तर में अंतर जैसे विषयों का हमारे यहां कभी निष्पक्ष अध्ययन ही नहीं किया गया और इसी का फायदा उठाकर कतिपय ठेकेदार, सीमेंट के कारोबारी और जमीन-लोलुप लोग इस तरह की सलाह देते हैं। पानी को स्थानीय स्तर पर रोकना, नदियों को उथला होने से बचाना, बड़े बांध पर पाबंदी, नदियों के करीबी पहाड़ों पर खुदाई पर रोक और नदियों के प्राकृतिक मार्ग से छेड़छाड़ को रोकना कुछ ऐसे सामान्य प्रयोग हैं, जोकि बाढ़ सरीखी भीषण विभीषिका का मुंह-तोड़ जवाब हो सकते हैं

सोमवार, 26 जून 2017

A neglected, polluted joint of yamuna-hindon

हिंडन-यमुना का एक उपेक्षित और नीरस संगम

दूर-दूर तक कोई पेड़ नहीं, कोई पक्षी नहीं, बस बदबू ही बदबू। यह नोएडा का सेक्टर-150 है, जो ग्रेटर नोएडा से सटा हुआ है। यहीं है एक गांव मोमनथाल। उससे आगे कच्ची, रेतीली पगडंडी पर कोई तीन किलोमीटर चलने के बाद एक धारा दिखाई देती है। कुछ दूर बाद दोपहिया वाहन भी नहीं जा सकते। अब पगडंडी भी नहीं है, जाहिर है कि वर्षों से कभी कोई उस तरफ आया ही नहीं होगा। सीधे हाथ पर शांत यमुना का प्रवाह और बायीं तरफ से आता गंदा, काला पानी, जिसमें भंवरें उठ रही हैं, गति भी तेज है। यह है हिंडन। जहां तक आंखेें देख सकती हैं, गाढ़ी हिंडन को खुद में समाने से रोकती दिखती है यमुना। विकास के प्रतिफल का यह दृश्य राजधानी दिल्ली की चौखट पर है। इसके आसपास देश की सबसे शानदार सड़क, शहरी स्थापत्य, शैक्षिक संस्थान और बाग-बगीचे हैं। दो महान नदियों का संगम आखिर  इतना नीरस, उदास और उपेक्षित क्यों है?
इसे देखकर पाठ्य-पुस्तकों में दशकों से छप रहे उन शब्दों की प्रामाणिकता पर शक होने लगता है, जिनमें कहा जाता रहा है कि मानव सभ्यता का विकास नदियों के किनारे हुआ और नदियों के संगम स्थल को बेहद पवित्र माना जाता है। धार्मिक आख्यान कहते हैं कि हिंडन नदी पांच हजार साल पुरानी है। मान्यता है कि इस नदी का अस्तित्व द्वापर युग में भी था और इसी नदी के पानी से पांडवों ने खांडवप्रस्थ को इंद्रप्रस्थ बना दिया था। जिस नदी का पानी कभी लोगों की जिंदगी को खुशहाल करता था, आज उसी नदी का पानी लोगों की जिंदगी के लिए खतरा बन गया है। बीते 20 साल में हिंडन इस कदर  प्रदूषित हुई कि उसका वजूद लगभग समाप्त हो गया है। गाजियाबाद जिले के करहेड़ा गांव से आगे बढ़ते हुए इसमें केवल औद्योगिक उत्सर्जन और विशाल आबादी की गंदगी ही बहती दिखती है। छिजारसी से आगे पर्थला खंजरपुर के पुल के नीचे ही नदी महज नाला दिखती है। कुलेसरा व लखरावनी गांव पूरी तरह हिंडन के तट पर हैं। इन दो गांवों की आबादी दो लाख पहुंच गई है। अधिकांश सुदूर इलाकों से आए मेहनत-मजदूरी करने वाले। उनको हिंडन घाट की याद सिर्फ दीपावली के बाद छठ पूजा के समय आती है। तब घाट की सफाई होती है, इसमें गंगा का पानी नहर से डाला जाता है। कुछ दिनों बाद फिर यह नाला बन जाती है। अपने अंतिम 55 किलोमीटर में सघन आबादी के बीच से गुजरती इस नदी में कोई जीव, मछली नहीं है। इसके पानी में ऑक्सीजन की मात्रा शून्य है।
हाल ही में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण यानी एनजीटी के आदेश पर हिंडन नदी के किनारे बसे गाजियाबाद, मेरठ, बागपत, शामली, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर जनपद के करीब 154 गांवों के 31 हजार हैंडपंपों को 21 अक्तूबर तक उखाड़ने के निर्देश दिए गए हैं। एनजीटी ने अपने एक अध्ययन से पुख्ता किया कि अधिकांश हैंडपंपों का पानी भारी धातुओं से दूषित है और संदेह है कि सहारनपुर, शामली और मेरठ जिले के लगभग 45 तरह के उद्योग नदी के जल में आर्सेनिक, पारा जैसे जानलेवा रसायन डाल रहे हैं। अभी इसी साल मई में दिल्ली में यमुना नदी को निर्मल बनाने के लिए 1,969 करोड़ रुपये के एक्शन प्लान को मंजूरी दी गई है, जिसमें यमुना में मिलने वाले सभी सीवरों व नालों पर प्लांट लगाने की बात है। मान भी लिया जाए कि दिल्ली में यह योजना कामयाब हो गई, पर वहां से दो कदम दूर निकलकर इसका मिलन जैसे ही हिंडन से होगा, ये सैकड़ों करोड़ रुपये बर्बाद होते दिखेंगे।
हिंडन के तट पर बसा समाज इसके प्रति बेहद उदासीन रवैया रखता है। ये अधिकांश लोग बाहरी हैं और इस नदी के अस्तित्व से खुद के जीवन को जोड़कर देख नहीं पा रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि हिंडन के तटों पर आकर बसे लोग इस नदी को नदी के रूप में पहचानें, इसके जहर होने से उनकी जिंदगी पर होने वाले खतरों के प्रति गंभीर हों, इसके तटों की सफाई व सौंदर्यीकरण पर काम हो। सबसे बड़ी बात यह कि जिन दो महान नदियों का संगम बिल्कुल गुमनाम है, वहां कम से कम घाट, पहुंचने का मार्ग, संगम स्थल के दोनों ओर वृक्षारोपण जैसे तात्कालिक कार्य किए जाएं। हिंडन की मौत एक नदी या जलधारा का अंत नहीं, बल्कि एक प्राचीन सभ्यता, संस्कृति और संस्कार का भी अवसान होगा।

शुक्रवार, 23 जून 2017

Who cares for victim of radiation ?

विकिरण का दंश झेल रहे लोगों से बेपरवाही 


रावतभाटा यानी राजस्थान में परमाणु शक्ति से बिजली बनाने का संयत्र लगा है, लेकिन एटमी ताकत को बम में बदलने के लिए जरूरी तत्व जुटाने का भी यह मुख्य जरिया है। इस बिजली घर से पांच किमी दूर स्थित तमलाव गांव में बोन ट्यूमर, थायराइड ग्लैंड, सिस्टिक ट्यूमर जैसी बीमारियां हर घर की कहानी है। केंद्र के कर्मचारियों और वहां रहने वालों के बच्चे टेढ़े-मेढ़े हाथ-पांव और अविकसित अंग पैदाइशी होना आम बात हो गई है। यहां तक कि पशुओं की संख्या भी कम होती जा रही है। बकरियों में विकलांगता और गर्भपात की घटनाएं बढ़ी हैं... 

 

कुछ साल पहले जापान फुकुशिमा परमाणु बिजली संयंत्र के रिसाव से पैदा हुए हालातों को भारत अब बिसरा चुका है। हमारे शहर जिस बिजली से जगमगा रहे हैं, जिन कल-कारखानों से हमारी अर्थव्यवसथा संचालित हो रही है, उसके लिए बिजली उत्पादन के लिए संचालित परमाणु शक्ति आधारित बिजलीघर देश की बड़ी आबादी को तिल-तिल मरने को मजबूर किए हुआ है। भारत में देश के भाग्यविधाता उन लाखों लोगों के प्रति बेखबर हैं, जोकि देश को परमाणु-संपन्न बनाने की कीमत पीढि़यों से विकिरण की त्रासदी सह कर चुका रहे हैं।

एटमी ताकत पाने के तीन प्रमुख पद हैं- यूरेनियम का खनन, उसका प्रसंस्करण और फिर विस्फोट या परीक्षण। लेकिन जिन लोगों की जान-माल की कीमत पर इस ताकत को हासिल किया जा रहा है, वे नारकीय जीवन काट रहे हैं! परमाणु ऊर्जा से बनने वाली बिजली का उपभोग करने वाले नेता व अफसर तो दिल्ली या किसी शहर में सुविधा संपन्न जीवन जी रहे हैं, परंतु हजारों लोग ऐसे भी हैं, जो इस जुनून की कीमत अपना जीवन देकर चुका रहे हैं। जिस जमीन पर परमाणु ताकत का परीक्षण किया जाता रहा है, वहां के लोग पेट के खातिर अपने ही बच्चों को अरब देशों में बेच रहे हैं। जिन इलाकों में एटमी ताकत के लिए रेडियो एक्टिव तत्व तैयार किए जा रहे हैं, वहां की अगली पीढ़ी तक का जीवन अंधकार में दिख रहा है। जिस जमीन से परमाणु बम का मुख्य मसाला खोदा जा रहा है, वहां के बाशिंदे तो जैसे मौत का हर पल इंतजार ही करते हैं।

झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के जादुगोड़ा में भारत की पहली और एकमात्र यूरेनियम की खान है। यहां से अयस्क का खनन किया जाता है और उसे परिशोधन के लिए हजार किमी दूर हैदराबाद भेजा जाता है। इस प्रक्रिया में शेष बचे जहरीले कचरे को एक बार फिर जादुगोड़ा लाकर आदिवासी गांवों के बीच दफनाया जाता है। यूरेनियम कारपोरेशन ऑफ इंडिया यानी युसिल लाख दावा करे कि खनन या कचरे का जनजीवन पर कोई असर नहीं पड़ रहा है। पर हकीकत यह है कि पिछले तीन-चार सालों में यहां एक सैकड़ा से अधिक असामयिक मौतें हुई हैं। खुद युसिल का रिकार्ड बताता है कि यूरेनियम खनन और उसके कचरे के निबटारे में लगे औसतन 15 लोग हर साल मारे जा रहे हैं। ये सभी मौतें टीबी, ल्यूकेमिया, कैंसर जैसी बीमारियों से होती हैं और इसके मूल में रेडियो विकिरण ही था। उसके बाद कंपनी ने रिकार्ड को उजागर करना ही बंद कर दिया है, लेकिन गैरसरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि साल का अंक बढ़ने के साथ-साथ मौत के आंकड़े भी बढ़ रहे हैं। सिंहभूम जिले के सिविल सर्जन ने विकिरण से प्रभावित कई लोगों की पहचान भी की है। इलाके के आदिवासी विकिरण-मुक्त जीवन के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं। पिछले कई सालों से आंदोलन, लाठीचार्ज, धरने, गिरफ्तारियां, उत्पीड़न यहां के बाशिंदों की नियति बन गया है। जब कोई मौत होती है तो गुस्सा भड़कता है।

प्रशासन के आश्वासन मिलते हैं। ‘राष्ट्र गौरव’ की बेदी पर बलि होने के लिए एक बार फिर भूखे-मजबूर आदिवासियों की नई जमात खड़ी हो जाती है।रावतभाटा यानी राजस्थान में परमाणु शक्ति से बिजली बनाने का संयत्र लगा है, लेकिन एटमी ताकत को बम में बदलने के लिए जरूरी तत्व जुटाने का भी यह मुख्य जरिया है। कुछ साल पहले गुजरात इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च ने रावतभाटा के आसपास 17 दिन तक विस्तृत अध्ययन किया था। संस्था के लोगों ने कोई छह हजार घरों पर पड़ताल की थी। इन्होंने पाया कि रावतभाटा के करीबी गांवों में अन्य गांवों की तुलना में जन्मजात विकलांगता की दर तीन गुना अधिक है। गर्भपात, मरे हुए बच्चे पैदा होना, स्त्रियों में बांझपन आदि का प्रतिशत भी बहुत ऊंचा है। इस बिजली घर से पांच किमी दूर स्थित तमलाव गांव में बोन ट्यूमर, थायराइड ग्लैंड, सिस्टिक ट्यूमर जैसी बीमारियां हर घर की कहानी है। केंद्र के कर्मचारियों और वहां रहने वालों के बच्चे टेढ़े-मेढ़े हाथ-पांव और अविकसित अंग पैदाइशी होना आम बात हो गई है। यहां तक कि पशुओं की संख्या भी कम होती जा रही है। बकरियों में विकलांगता और गर्भपात की घटनाएं बढ़ी हैं। इस सर्वेक्षण में कई डॉक्टर भी थे। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी है कि विकिरण की थोड़ी सी मात्रा भी शरीर में परिवर्तन के लिए काफी होती है।

विकिरण जीव कोशिकाओं को क्षति ग्रस्त करता है। इससे आनुवांशिकी कोशिकाओं में भी टूट-फूट होती है। आने वाली कई पीढि़यों तक अप्रत्याशित बीमारियों की संभावना बनी रहती है।शौर्य भूमि पोखरण में भव्य स्मृति स्थल बनाने के लिए करोड़ों का खर्चा करने के लिए आतुर लोगों ने कभी यह जानने की जुर्रत नहीं की कि तपती मरूभूमि में जनजीवन होता कैसा है। परीक्षण-विस्फोट से डेढ़ सौ मकान पूरी तरह बिखर गए थे। सालभर के लिए पानी इकट्ठा रखने वाले ‘टांकों’ के टांके टूट गए। उसके एवज में सरकार ने जो मुआवजा बांटा था, उससे एक कमरा भी खड़ा नहीं होना था। धमाके के बाद जब इलाके में नाक से खून बहने और अन्य बीमारियों की खबरें छपीं तो खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री ने किसी भी तरह के विकिरण कुप्रभाव न होने के बयान दिए थे। जबकि भूगर्भीय परीक्षण के बाद रेडियोधर्मी जहर के रिसाव की मात्रा और उसके असर पर कभी कोई जांच हुई ही नहीं है। राजस्थान विश्वविद्यालय के एक शोधकर्ता डॉ. अग्रवाल ने पाया था कि 1974 में विस्फोट के बाद पोखरण व करीबी गांवों में कैंसर के रोगियों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। पोखरण क्षेत्र सरकारी उपेक्षा का किस हद तक शिकार है, इसकी बानगी है कि यहां पेट पालने के लिए लोग अपने बच्चों को बेच रहे हैं। पोखरण और इसकी पड़ोसी पंचायत शिव के कोई एक दर्जन गांव-ढ़ाणियों से हर साल सैकड़ों बच्चे ऊंट दौड़ के लिए खाड़ी देशों को जाते हैं। ये बच्चे 12 से 14 साल उम्र और 30-35 किलो वजन के होते हैं। इनका वजन नहीं बढ़े, इसके लिए उन्हें खाना-पीना कम दिया जाता है। जैसलमेर जिले के भीखोडोई, फलसूंड, बंधेव, फूलोसर व राजमथाई और बाडमेर के उंडू , कानासर, आरंग, रतेउ, केसुआ आदि गांवों के लड़के अरब देशों को गए हैं। ये गरीब मुसलमान, सुतार, राजपूत और जाट बिरादरी के हैं। अपने घरों के लिए पेट का जुगाड़ बने ये बच्चे जब विदेश से लौटे तो पैसा तो खूब लाए पर असामान्य हो गए। वे तुतलाने और हकलाने लगे। कई बच्चे शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग हो गए। हर समस्या की तरह इस पर भी सरकार का तो यही कहना है कि इलाके से कोई बच्चा नहीं गया है। पर वास्तविकता को यी बात उजागर करती है कि अकेले पोखरण से हर साल 30 से 50 पासपोर्ट बन रहे हैं। जेसलमेर जिले में हर साल डेढ़ हजार पासपोर्ट बन रहे हैं।जय जवान-जय किसान के साथ जय विज्ञान के नारे की प्रासंगिकता पोखरण के इस पहलू से संदिग्ध हो जाती है। इस घोर रेगिस्तान में न तो उद्योग-धंधे खुल सकते हैं और न ही व्यापार की संभावनाएं हैं। ऊपर से एक तरफ प्रकृति की मार है तो दूसरी ओर जय विज्ञान का आतंक। आखिर किस बात का गौरव है?यह विडंबना ही है कि भारत में इन तीनों स्तर पर जनजीवन भगवान भरोसे हैं। षायद इस बात का आकलन किसी ने किया ही नहीं कि परमाणु ताकत से बिजली बनाकर हम जो कुछ पैसा बचाएंगे या कमाएंगे; उसका बड़ा हिस्सा जनस्वास्थ्य पर खर्च करना होगा या फिर इससे अधिक धन का हमारा मानव संसाधन बीमारियों की चपेट में होगा। आने वाली पीढ़ी के लिए ऊर्जा के साधन जोड़ने के नाम पर एटमी ताकत की तारीफ करने वाले लोगों को यह जान लेना चाहिए कि क्षणिक भावनात्मक उत्तेजना से जनता को लंबे समय तक बरगलाया नहीं जा सकता है। यदि हमारे देश के बाशिंदे बीमार, कुपोषित और कमजोर होंगे तो लाख एटमी बिजली घर या बम भी हमें सर्वशक्तिमान नहीं बना सकते हैं।

बुधवार, 21 जून 2017

pollution of develpopment

विकास से घुटता  दिल्ली का दम

                                                                    
पंकज चतुर्वेदी
यदि पश्चिमी विक्षोभ  के असर के चलते हुई दो-तीन दिन की बरसात के कारण तापमान में आई कमी को अलग रख दे ंतो गत 50 दिनों से दिल्ली जमकर तप रही है। अकेले आसमान से आग नहीं बरस रही, असल में पूरा षहर एक तो राजस्थान की तरफ से आ रही रेतीली आंधी के चलते बारीक कणों से हलकान है तो साथ ही विकास की गतिविधियां परिवेश में इतना जहर घोल दे रही है जितना कि दो साल में कुल मिला कर नहीं होता है। बीते 17 साल में सबसे बुरे हालात है हवा के। तेज तापमान, वाहनों के धुंए और निर्माण की धूल के चलते वायुमंडल में ओजोन की मात्रा बढ़ना सबसे ज्यादा जानलेवा हो रहा है। इस विश्व पर्यावरण दिवस पर सबसे बड़ी चेतावनी सामने आई कि दिल्ली महानगर में वाहनों की संख्या एक करोड़ हो चुकी है। इसमें हर दिन बाहर से आने वाले पांच लाख वाहन, अवैध तरीके से या एक ही लाईसेंस पर चल रहे कई-कई व्यावसायिक वाहन, स्कूटर को रिक्शे में जोड़ कर बने अवैध वाहन आदि शामिल नहीं है। कुल मिला कर वाहनों का धुआं, फिर निर्माण कार्या के कारण हो रहे जाम के कारण उपजने वाला धुआं और उपर से धूल-मिट्टी। राजधानी की विडंबना है कि तपती धूप हो तो भी प्रदूषण बढ़ता है, बरसात हो तो जाम होता है व उससे भी हवा जहरीली होती है। ठंड हो तो भी धुंध के साथ धुंआ के साथ मिल कर हवा जहरीली ।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़े बताते हैं कि मई महीने के 77 प्रतिशत दिनों के दौरान दिल्ली की हवा में ओजोन की मात्रा,  मानक स्तर 100 माईक्रो ग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से अधिक रही। अप्रैल महीने के 52 फीसदी और फरवरी के 12 फीसद दिनों में यह मानक को पार की। जब वातावरण की गर्मी 40 डिगरी के पार हो जाती है। तो वाहनों, कारखानों आदि से निकले धुएं और धूल के कणो में मौजूद हाईड्रो कार्बन, नाईट्रोजन डाय आक्साईड जैसी प्रदूषक गैसें आपस में रासायनिक क्रिया करती है और उससे ओजोन गैस उपजती है। ओजोन की अधिक मात्रा सांस  और दिल की सेहत बिगाड़ने का बड़ा कारक है।
कुछ ही दिनों पहले ही मे ंविश्व स्वास्थ संगठन ने दिल्ली को दुनिया का सबसे ज्यादा दूशित वायु वाले षहर के तौर पर चिन्हित किया है। इसके बावजूद यहां के निर्माण कार्य ना तो जन स्वास्थय की परवाह कर रहे हंे ना ही पर्यावरण कानूनों की। गत दो महीने से दिल्ली के लगभग बीच से निकलने वाले राश्ट्रीय राजमार्ग 24 के चौड़ीकरण का अनियोजित और बेतरतीब चौड़ीकरण दिल्ली के लिए जानलेवा बन रहा है। सनद रहे यह सड़क दिल्ली एनसीआर की एकतिहाई आबादी के दैनिक आवागमन के अलावा कई राज्यों को जोड़ने वाला ऐसा मार्ग है जो महानगर के लगभग बीच से गुजरता है। एक तो इसके कारण पहले से बनी सड़कें संकरी हो गई हैं, फिर बगैर वैकल्पिक व्यवस्था किए इस पर वाहन का बोझ डाल दिया गया। कालेखां से गाजीपुर तक का बामुश्किल नौ किलोमीटर का रास्ता पार करने में एक वाहन को एक घंटा लगा रहा है। उसके साथ ही खुदाई, मिक्सिंग प्लांट से उड़ रही धूल अलग है। ठीक इसी तरह के लगभग 35 निर्माण कार्य राजधानी में अलग-अलग स्थानों पर चल रहेें हैं जहां हर दिन कोई 65 करोड़ रूपए का ईंधन जल रहा है लेागों के घंटे बरबाद हो रहे हैं। इसके चलते दिल्ली की हवा में कितना जहर घुल गया है, इसका अंदाजा खौफ पैदा करने वालो आंकड़ों कों बांचने से ज्यादा डाक्टरों के एक ंसंगठन के उस बयान से लगाया जा सकता है जिसमें बताया गया है कि देश की राजधानी में 12 साल से कम उम्र के 15 लाख बच्चे ऐसे है, जो अपने खेलने-दौड़ने की उम्र में पैल चलने पर ही हांफ रहे हैं। इनमें से कई सौ का डाक्टर चेता चुके हैं कि यदि जिंदगी चाहते हो तो दिल्ली से दूर चले जाएं।  दरअसल इस खतरे के मुख्य कारण 2.5 माइक्रो मीटर व्यास वाला धुएं में मौजूद एक पार्टिकल और वाहनों से निकलने वाली गैस नाइट्रोजन ऑक्साइड है, जिसके कारण वायु प्रदूषण से हुई मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। इस खतरे का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वायु प्रदूषण करीब 25 फीसदी फेंफड़े के कैंसर की वजह है। इस खतरे पर काबू पा लेने से हर साल करीब 10 लाख लोगों की जिंदगियां बचाई जा सकेंगी ।
यह स्पश्ट हो चुका है कि दिल्ली में वायु प्रदूशण का बड़ा कारण यहां बढ़ रहे वाहन, ट्राफिक जाम और राजधानी से सटे जिलों में पर्यावरण के प्रति बरती जा रही कोताही है। हर दिन बाहर से आने वाले कोई अस्सी हजार ट्रक या बसें यहां के हालात को और गंभीर बना रहे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि समस्या बेहद गंभीर है । सीआरआरआई की एक रपट के मुताबिक राजधानी के पीरागढी चौक से हर रोज 315554 वाहन गुजरते हैं और यहां जाम में 8260 किग्रा ईंधन की बर्बादी होती है। इससे निकलने वाला कार्बन 24119किग्रा होता है। कनाट प्लेस के कस्तूरबागांधी मार्ग पर प्रत्येक दिन 81042 मोटर वाहन गुजरते हैं व रेंगते हुए चलने के कारण 2226 किग्रा इंधन जाया करते हैं।। इससे निकला 6442 किग्रा कार्बन वातावरण को काला करता है। और यह हाल दिल्ली के चप्पे-चप्पे का है। यानि यहां सडकों पर हर रोज कई चालीस हजार लीटर इंधन महज जाम में फंस कर बर्बाद होता है। कहने को तो पार्टिकुलेट मैटर या पीएम के मानक तय हैं कि पीएम 2.5 की मात्रा हवा में 50पीपीएम और पीएम-10 की मात्रा 100 पीपीएम से ज्यादा नहीं होना चाहिए। लेकिन दिल्ली का कोई भी इलाका ऐसा नहीं है जहां यह मानक से कम से कम चार गुणा ज्यादा ना हो।
पीएम ज्यादा होने का अर्थ है कि आंखों मंे जलन, फैंफडे खराब होना, अस्थमा, कैंसर व दिल के रोग। जाहिर है कि यदि दिल्ली की संास थमने से बचाना है तो यहां ना केवल सड़कों पर वाहन कम करने होंगे, इसे आसपास के कम से कम सौ किलोमीटर के सभी षहर कस्बों में भी वही मानक लागू करने होंने जो दिल्ली षहर के लिए हों। अब करीबी षहरों की बात कौन करे जब दिल्ली में ही जगह-जगह चल रही ग्रामीण सेवा के नाम पर ओवर लोडेड  वाहन, मेट्रो स्टेशनों तक लोगों को ढो ले जाने वाले दस-दस सवारी लादे तिपहिएं ,पुराने स्कूटरों को जुगाड के जरिये रिक्शे के तौर पर दौड़ाए जा रहे पूरी तरह गैरकानूनी वाहन हवा को जहरीला करने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। सनद रहे कि वाहन सीएजी से चले या फिर डीजल या पेट्रोल से, यदि उसमें क्षमता से ज्यादा वजन होगा तो उससे निकलने वाला धुआं जानलेवाा ही होगा। यदि दिल्ली को एक अरबन स्लम बनने से बचाना है तो इसमें कथित लोकप्रिय फैसलों से बचना होगा, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण है यहां बढ़ रही आबादी को कम करना। सनद रहे कि इतनी बड़ी आबादी के लिए चाहे मेट्रो चलाना हो या पानी की व्यवस्था करना, हर काम में लग रही उर्जा का उत्पादन  दिल्ली की हवा को विषैला बनाने की ओर एक कदम होता है। यही नहीं आज भी दिल्ली में जितने विकास कार्यों कारण जाम , ध्ूाल उड़ रही है वह यहां की सेहत ही खबरा कर रही है, भले ही इसे भविश्य के लिए कहा जा रहा हो। लेकिन उस अंजान भविश्य के लिए वर्तमान बड़ी भारी कीमत चुका रहा है।


शनिवार, 17 जून 2017

President election should be on mutual consent



सर्वसम्मति से हो राष्ट्रपति  का चुनाव

                                              
पंकज चतुर्वेदी
भारत गणतंत्र के 13वें राष्ट्रपति  चुनाव की अधिसूचना जारी होते ही राजनीतिक दल अपने-अपने खेमे को संभालने में लग गए हैं। याद रहे कि आजादी के बाद हुए 13 बार राष्ट्रपति  चुनाव में केवल एक बार सन 1977 में ही नीलम संजीव रेड्डी आम सहमति से निर्वाचित हुए थे, वरना हर बा मतदान होता ही है और केंद्र का सत्ताधारी दल अपनी पसंद का उम्मीदवार जिताने में सफल होता है। कहने को हमारा राष्ट्रपति  तीनों सेना का प्रमुख, भारतीय लोकतंत्र का सर्वषक्तिमान और देष का प्रथम नागरिक होता है, लेकिन कई स्थान पर उसकी भूमिका रबर-स्टैंप  की ही होती है। यह किसी से छिपा नहीं है कि पिछले कुछ सालों में राजनीतिक विद्वेष निजी हमलों के निचचले स्तर पर आ गया है। छोटे से छोटे चुनाव में भाजपा हर कीमत पर जीत सुनिष्चित करने के लिए हर तरीका अपनाती है। लेकिन भारत का राष्ट्रपति  किसी राजनीतिक दल का नहीं होता और यदि सन 2017 का राष्ट्रपति  सर्वसम्मति से चुना जाए तो यह देष की राजनीति के लिए एक सुखद पहल होगा। हालांकि इस साल एकमत हो कर जीएसटी बिल पास करने का प्रयोग काफी कुछ सफल रहा है।

भारतीय संविधान की के अनुच्छेद 54 में राष्ट्रपति  निर्वाचन की प्रक्रिया का विवरण है। इसी के अनुसार अगले राष्ट्रपति  के चुनाव की अधिसूचना जारी हो गई है। नामाकंन जमा करने की अंतिम तिथि 28 जून है। उम्मीदवार को 50 अनुमोदक और 50 प्रस्तावकों के हस्ताक्षर के साथ नामांकन प्रस्तुत करना होता है। ये प्रस्तावक और अनुमोदकों का मतदाता होना अनिवार्य है। और इस निर्वाचन में मतदाता होते हैं दोनो सदनों के सांसद और सभी विधानसभाओं के विधायक। 17 जुलाई मतदान और 20 जुलाई 2017 को चुनाव परिणाम आएंगे। इस बार निर्वाचन अधिकारी लोकसभा के महासचिव को बनाया गया है। यह भी जान लें ि कइस चुनाव में कोई चुनाव चिन्ह नहीं होता और सभी मतदाता सभी उम्मीदवारों को वोट देते हैं, बस फर्क होता है कि उन्हें अपनी प्राथमिकता बताना होता है। जिस उम्मीदवार को पहली प्राथमिकता से ज्यादा वोट मिलते हैं, वहीं विजयी होता है। प्रत्येक राज्य से विधायक औ सांसद के मतों की कीमत एक फार्मूले के अनुसार तय की जाती है जिसमें महत्वपूर्ण भेमिका उस राज्य की आबादी की होती है। इस बार कुल मत 10,98,882 है। यानि विजेता को 5,49,442 वोट पाना अनिवार्य है। वैसे फौरी तौर पर देखें तो केंद्र की सत्ता में बैठे लोगों को  अपना उम्मीदावार जितवाने में कोई दिक्कत नहीं होना चाहिए।, लेकिन इसमें कुछ पैंच भी हैं। सबसे बड़ा संट षिसेना को ले कर है। उसके पास 18 सांसद और 63 विधायाकों के मत हैं।  हालांकि वह एनडीए का पुराना भागीदार दल है, लेकिन सन 2007 के चुनाव में उसने मराठी मानुश के नाम पर प्रतिभादेवी सिंह पाटिल को वोट दे कर एनडीए को धता बता चुकी है। इस बार भी उसके संबंध भाजपा से बेहद कटु हैं। भाजपा में ही षत्रुघन सिन्हा जैसे कई सांसद और विधायक है जिनकी ‘‘आत्मा की आवाज’’ कभी भी जाग्रत हो सकती है।
इसमें कोई षक नहीं है कि इस दौर में लोकतंत्र कई चुनौतियों से जूझ रहा है, देष की आर्थिक स्थिति, सीमा पर तनाव , अंतरराश्ट्रीय स्तर पर मंदी और रोजगार की कमी जैसे  कई संकट हैं जिनका सामना करने के लिए केवल बहुमत की संख्या से काम नहीं चल सकता। जरूरी है कि देष की राजनीति टकराव का रास्ता छोड़ कर सहमति और सामंजस्य से विकास और आम नागरिक की भलाई का कोई रास्ता चुने। राष्ट्रपति  के चुनाव के लिए भी एनडीए को दक्षिण के कुछ दलों के समर्थन का भरोसा है, लेकिन लाख गधित उनके पक्ष में दिख रहा हो, लेकिन थोड़े में ही खेल बिगड़ भी सकता है। यह खतरा एनडीए के रण्णनीतिकार भी जानते है।। उधर कांग्रस की छतरी के तले एकत्र हुए विपक्ष ने फिलहाल तो सर्वसम्म्ति से उम्मीदवार तय करने की बात कही है। एनडीए ने वैंकेया नायडू, राजनाथ सिंह और अरूण जेटली की तीन सदस्यों की कमेटी सर्वसम्मत निर्विरोध  निर्वाचन के लिए गठित की है। विपक्ष के मन भी एक भय है, यदि उनका उम्मीदवार चुनाव हार गया तो? आम लोग इस चुनाव के तरीके या गणित से इतने वाकिफ नहीं हैं, लेकिन दूर तक संदेष तो यही जाएगा कि मोदी सरकार की बड़ी जीत । इस जीत के हंगामें का असर अगले साल होने वाले कई राज्यों के विधान सभा चुनावों मनोवैज्ञानिक तौर पर विपरीत ही जाएगा। कुल मिला कर देखें तो दोनों ही खेमे अपने-अपने डर और आषंका से घिरे हैं और दोनों ही खेमे टकराव के बनिस्पत निर्विरोध चुनाव को प्राथमिकता देंगे।
होना भी यही चाहिए कि देष के सर्वोच्च पद के लिए सियासती अखाड़े ना खुदें और सभी को स्वीकार्य कोई  इस पद को सुषोभित करे। यूपीए, बिहर केगठबंधन और ममता बनर्जी का हट होगा कि कोई संघ का कट्टर छबि वाला इस पर ना आए। उधर विपक्ष महिला, दलित या आदिवासी के नाम पर कहीं सहमत हो सकता है। विप्ख की ओर से महात्मा गांधी के पौत्र और बंगाल के पूर्व राज्यपाल राजमोहन गांधी और लोकसभा की पूर्व स्पीकर व बाबू जगजीवनराम की बेटी मीराकुमार के नाम पर काफी कुछ सहमति है। जबकि सत्ताधारी दल में अभी कई नाम हवा में हैं। द्रोपदी मूर्म से ले कर  लालकृश्ण आडवाणी तक के नाम उछाले जा रहे हैं, लेकिन खबर यह है कि एनडीए खेमा एपीजे अब्दुल कलाम जैसा कोई सर्वमान्य नाम को तलाष चुका है। हालांकि पार्टीका एक कट्टरवादी धड़ा आजादी के बाद पहली बार मिले सबसे बड़े बहुमत का लाभ उठा कर किसी कट्टर छबि वाले संघ कार्यकर्ता को यह पद देने की वकालत कर रहा है तो आज की भाजपा में गत 10 सालों के दौरान दल बदल कर आए लोग, जिनका अब बहुमत है, वे किसी गैरराजनीतिक व्यक्ति को इस पद के लिए चुनने के हिमायती हैं। अनुमान है कि 21 जून तक यह खेमा अपने नाम की घोशण कर देगा।
हालांकि एनडीए के वरिश्ठ नेता इस पूरे सप्ताह सोनिया गांधी से ले कर ममता बनर्जी, सतीषचंद्र मिश्र, सीताराम येचुरी आदि से मेल मुलाकात कर सम्मत नाम की संभावना तलाष रहे हैं। लेकिन यह सब पैतरेबाजी हैं। देष के स्वस्थ लोकतत्र और बिखराव की राजनित से बचने का यह सटीक अवसर है कि सभी दल मिल कर हमारे देष के प्रथम नागरिक को चुनें।

शुक्रवार, 16 जून 2017

Neither follow rules nore feel public difficulties

न अदालत की परवाह न जनता की चिंता 

पंकज चतुर्वेदी

रेल, राष्ट्रीय राजमार्ग पर चक्का जाम करने वालों पर सख्त सजा और आर्थिक दंड के प्रावधान वाला कानून बनना जरूरी है। जो लोग वीडियो रिकाडिंर्ग में सड़क जाम करते दिखें, उन्हें प्रथमदृष्टया दोषी मान कर चुनाव लड़ने, सरकारी अस्पताल में इलाज करवाने जैसे कुछ कायोंर् से रोका जाए। जिन जगहों पर जाम या अराजकता के हालात बने, वहां के अफसरों को इसका जिम्मेदार माना जाना चाहिए, आखिर वे इसी बात का वेतन लेते हैं... 


पिछले दिनों मध्य प्रदेश में किसानों को उनकी मेहनत का वाजिब दाम दिलवाने के लिए आंदोलन हुआ। कई दिनों तक सड़कें बंद रहीं, रेल भी रोकी गईं। सैकड़ों सरकारी व निजी वाहन फूंक दिए गए। जनजीवन को ठप्प करने के इस कार्य को नाम दे दिया आंदोलन का। किसानों की मांगे जायज हैं, उन पर ध्यान दिया जाना जरूरी है, लेकिन इसके लिए की गई हिंसा, तोड़फोड़ व व्यवधान को किसी भी स्तर पर जायज नहीं ठहराया जा सकता। विडंबना यह है कि कुछ जन प्रतिनिधि लोगों को सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के लिए उकसाते दिखे। रही-बची कसर राज्य सरकार ने पूरी कर दी, पुलिस की गोली से मारे गए लोगों के परिवारजनों को एक करोड़ का मुआवजा देने की घोषणा कर दी गई।

यह सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश के विपरीत भी है, जिसमें तोड़-फोड़ में लगे लोगों से उसका मुआवजा वसूलने का निर्देश दिया गया था।हमारा देश भी अजब-गजब है, कहीं विवाह समारोह के नाम पर सड़कें जाम हैं तो कोई धार्मिक या सियासती रैली-जलसे निकाल रहा है तो कोई नमाज-पूजा-आरती, तो कोई धरना-प्रदर्शन। सनद रहे पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायाधीशों की पीठ ने केंद्र सरकार को तीन हफ्ते का समय देते हुए आए रोज रास्ते रोकने वालों के खिलाफ ठोस कार्यवाही सुनिश्चित करने के लिए कहा था। अदालत ने यह भी कहा था कि रेल-रास्ता रोकने की अपील करने वालों के खिलाफ अनिवार्य अभियोजन हो और तीन महीने के भीतर ऐसे प्रकरणों का निबटारा भी हो। किसी को अस्पताल पहुंचने की अनिवार्यता तो किसी की नौकरी का इंटरव्यू- इन सबसे लापरवाह न जाने कब-कौन-किन मांगों को लेकर सड़क घेर कर खड़ा हो। ऐसा नहीं कि अदालतों ने ऐसे बंद-प्रदर्शनों पर पहली बार नाखुशी जताई हो और सरकार ने उसको गंभीरता से नहीं लिया हो। विडंबना है कि ऐसे कृत्य करने वालों को न तो नैतिकता की चिंता है और न ही वैधानिकता की।

कथित आंदोलनकारियों को भड़का कर यह अनैतिक काम करने के लिए उकसाने वाले लोग विधानसभा व अन्य सदनों के सदस्य हैं और उन्हें मालूम है कि इस तरह से जनता को परेशान करने के अलावा कुछ हाथ नहीं लगेगा। हो सकता है कि उनकी मांग जायज भी हों, लेकिन अपनी मांग के समर्थन में उठाए गए कदम न तो आम आदमी को जायज लग रहे हैं और न ही यह किसी देश के लोकतांत्रिक ढांचे के लिए स्वस्थ परंपरा है। क्या जनता का प्रतिनिधि होने का दावा करने वाले यह नहीं जानते हैं कि इस तरह का बंद न केवल गैरकानूनी है, बल्कि इसके दूरगामी परिणाम जनता के विरेाध में ही हैं। लोकतंत्र में निर्णय जनता के हाथों होता है, इसका यह मतलब कतई नहीं है कि लोकतंत्र जनता के हाथों में खेलता है। चुनाव वह समय होता है, जब जनता अपनी अपेक्षाओं पर खरा न उतरने वालों को कुर्सी से नीचे उतार फेंकती है। लेकिन आज हालात तो अराजकता की ओर इशारा कर रहे हैं, अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए सड़क पर आ जाओ, जाम कर दो, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाओ, प्रशासन तंत्र को बंधक बनाओ।

लगभग अपहरणकर्ताओं की तर्ज पर अपनी मांगें मनवाने के लिए दूसरों की असुविधा, कानून की सीमा या फिर विधि की प्रक्रिया को नजरअंदाज किया जाए। वे जन-प्रतिनिधि, जिन्हें जनता विभिन्न सदनों में इस उम्मीद से चुनकर भेजती है कि वे उनकी दिक्कतों को दूर करने के कानून बनाएंगे। सदन में तो वे चुप बैठे रहते हैं या जाते ही नहीं हैं और झूठी सहानुभूति दिखाने के लिए सड़कों पर उधम करते हैं। जबकि वे भी जानते हैं कि जिन नीतियों, कानूनों के कारण कीमतें बढ़ रही हैं, उन्हें सदन में पास करवाने में उनकी भी समान भागीदारी रही है। यही नहीं कई बार सत्ताधारी दल के लोग भी ऐसी हरकतों में शामिल होते हैं और ऐसे में पुलिस भी बच कर निकलती है। सन 1997 में ही केरल हाईकोर्ट एक मामले में आदेश दे चुकी थी कि इस तरह के बंद-हुड़दंग अवैध होते हैं। पिछले दिनों ही बंबई हाईकोर्ट सन् 2004 में भाजपा-शिवसेना द्वारा आयोजित बंद के मामले में सख्त आदेश दिए कि धरना-प्रदर्शन के दौरान यदि अधिकारी अदालत द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन करवाने में असफल रहते हैं तो उन्हें भी अदालत की अवमानना का दोषी करार दिया जा सकता है।

न्यायमूर्ति बिलाल नाजकी और वीके ताहिलरमानी की बेंच ने बंद-धरने के बारे में जारी दिशा-निर्देशों में स्पष्ट किया है कि किसी भी बंद का आह्वान करने पर उस नेता की पूरी जिम्मेदारी होगी। नेता को जनता के जीवन और संपत्ति की क्षति के लिए मुआवजा देना होगा। कोर्ट ने सड़क पर आम लोगों की आवाजाही निरापद रखने के भी निर्देश दिए। इससे पहले कोलकता, मद्रास और दिल्ली की अदालतें भी समय-समय पर ऐसे आदेश देती रही है। लेकिन नेता हैं कि मानते ही नहीं है। अधिकांश मामलों में पुलिस और प्रशासन भी हालात बिगड़ने का इंतजार करते रहते हैं।सरकारी आंकड़े गवाह हैं कि हमारे देश में हर साल सड़कों पर हंगामे की 56 हजार छोटी-बड़ी घटनाएं होती हैं। इनकी चपेट में आ कर कोई पचास हजार वाहन बर्बाद हो जाते हैं, जिनमें 10 हजार बस या ट्रक होते हैं। अकेले दिल्ली में सालभर में 100 से अधिक तोड़फोड़, उधम की घटनाएं दर्ज की जाती हैं। इस प्रकार के रोज-रोज के ंबंद, धरना-प्रदर्शन, जाम से आम आदमी आजिज आ चुका है। इन अराजकताओं के कारण समय पर इलाज न मिल पाने के कारण मौत होने, परीक्षा छूट जाने, नौकरी का इंटरव्यू न दे पाने जैसे किस्से अब आम हो चुके हैं और सरकार इतने गंभीर विषय पर संवेदनहीन बनी हुई है। सड़क रोकने, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, सार्वजनिक रूप से हंगामा करने को गैरकानूनी व अवैधानिक ठहराने वाली कई धाराएं व उन पर कड़ी सजा के प्रावधान हमारी दंड संहिता में हैं, लेकिन जब कानून बनाने वाले निर्वाचित प्रतिनिधि संसद व विधान सभाओं मे ही ऐसी सड़क-छाप हरकतें करते हैं तो सड़क वालों को यह करने से कौन रोकेगा?पुलिस का काम कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, पुलिस का काम सुचारू यातायात बनाए रखना है, इसके लिए वह वेतन लेती है, जनता की गाढ़ी कमाई से निकले करों से यह वेतन दिया जाता है।

लेकिन जब पच्चीस-पचास लोग नारे लगाते हुए चौराहों पर लेट जाते हैं तो पुलिस मूकदर्शक बनी रहती है, इंतजार करती है, लंबे ट्राफिक जाम का या फिर स्थिति बिगड़ने का और उसके बाद अपनी चरम-कार्यवाही यानी बल प्रयोग पर उतारू हो जाती है। साफ दिखता है कि पुलिस का प्रशिक्षण ऐसे हालातों से निबटने के नाम पर शून्य हैै। भीड़ को जमा होने से रोकना, आम लोगों के जनजीवन को नुकसान पहुंचाने वाले लोगों पर कड़ी कार्यवाही करना, गुप्तचर सूचनाओं के आधार पर उपद्रवियों के इरादे भांपना और उसके अनुसार ‘प्रिवेंटिव’ कार्यवाही करना जैसे पुलिस भूल ही चुकी है। यह भी विंडबना है कि पचास से अधिक सशस्त्र पुलिस वालों की मौजूदगी में सौ लोगों की भीड़ सड़क पर कोहराम काटती है और इसकी जिम्मेदारी तय कर किसी भी पुलिस अफसर पर कार्यवाही करने का कोई रिकार्ड देशभर की पुलिस के पास नहीं है। अब समय आ गया है कि देश के विकास में व्यवधान बनी ऐसी हरकतों को सख्ती से रोका जाए। रेल, राष्ट्रीय राजमार्ग पर चक्का जाम करने वालों पर सख्त सजा और आर्थिक दंड के प्रावधान वाला कानून बनना जरूरी है। जो लोग वीडियो रिकाडिंर्ग में सड़क जाम करते दिखें उन्हें प्रथमदृष्टया दोषी मान कर चुनाव लड़ने, सरकारी अस्पताल में इलाज करवाने जैसे कुछ कायोंर् से रोका जाए। जिन जगहों पर जाम या अराजकता के हालात बने, वहां के अफसरों को इसका जिम्मेदार माना जाना चाहिए, आखिर वे इसी बात का वेतन लेते हैं। दिल्ली और प्रत्येक शहर में धरना-प्रदर्शन आदि के लिए आबादी से दूर कोई स्थान तय करने, उस स्थान पर लोगों की आवाज सुनने वाले सक्षम अफसरान की बहाली करना जैसे कदम भी आज समय की मांग हैं। यह तभी संभव है, जब राजनेताओं की प्रबल इच्छाशक्ति उनके छोटे-छोटे स्वाथोंर् पर भारी पड़े। पुलिस को उस मजबूरी से ऊपर उठना होगा कि भीड़ पर कोई कार्यवाही करना संभव नहीं होता है। आज बेहतरीन इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस मौजूद हैं, जो हजारों की भीड़ में से उत्पातियों की पहचान कर सकती है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि सड़कों पर उधम, उत्पात, जाम, कोहराम देश की प्रगति के सबसे बड़े दुश्मन हैं और इनको समर्थन देने वाला देश के खिलाफ काम कर रहा है। और ऐसे लोगों को आंदोलनकारी या भीड़ का हिस्सा मान कर छोड़ देना अब नासूर बनता जा रहा है। बिजली, पानी या पुलिस या हर तरह की दिक्कत का हल सड़क रोककर तलाशने वालों को चुनाव लड़ने से रोकने जैसी पाबंदी लगाना समय की मांग है। ऐसे मामलों में वीडियो रिकार्डिंग को पर्याप्त सबूत मान कर मामले का संज्ञान लेना होगा।

बुधवार, 14 जून 2017

Primary school shoud be activity centre for better learing process

स्थूल पढ़ाई नहीं, गतिविधि का केंद्र बनें हमारे स्कूल

 

सरकारी स्कूल के शिक्षक से जब कभी शिक्षा में नवाचार की बात करो तो वह तीन "स्" कि अड़चन बताता है - समय नहीं है, साधन नहीं है और स्थान नहीं है, लेकिन यदि एक और "स्" यानि संकल्प हो तो बगैर खर्च के भी बच्चों कि सीखें कि गति को बेहतर किया जा सकता है .

आज के "हिंदुस्तान" में मेरा एक छोटा सा लेख इसी मसले पर है


सरकार में बैठे लोग यह समझ चुके हैं कि देश की साक्षरता-दर न बढ़ी, तो अरबों रुपये की कल्याणकारी योजनाएं साल-दर-साल पानी में डूबती रहेंगी। देश में प्राथमिक शिक्षा की पहुंच अधिकाधिक लोगों तक बनाने के नए-नए प्रयोग चल रहे हैं। यह भी स्वीकार किया जाने लगा है कि हमारी पाठ्य-पुस्तकों में कोई कमी है, तभी बच्चा वाक्यों को ‘डिकोड’ करना सीख लेता है, पर उसके व्यावहारिक इस्तेमाल से अनभिज्ञ रहता है। यह भी स्वीकार किया जाने लगा है कि सरकारी स्कूलों की हालत सुधारे बगैर प्राथमिक शिक्षा को पटरी पर लाना असंभव है। देश में लाखों लाख सरकारी स्कूल तो हैं, लेकिन इनमें से कितने लाख किस हालत में हैं, यह किसी से छिपा नहीं है।

इसके बावजूद जिला प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम, सर्वशिक्षा अभियान, जनशाला, साक्षर भारत और ऐसी ही कई योजनाओं से सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने के प्रयास हो रहे हैं। अब गांव-गांव के स्कूलों तक बच्चों की पुस्तकें पहुंच रही हैं। हर शिक्षक को प्रतिवर्ष 500 रुपये दिए जा रहे हैं कि वे अपनी पसंद की शिक्षण-सहायक सामग्री खरीद लें। सवाल है कि इतनी पुस्तकें तो हैं, लेकिन पाठक नहीं हैं। यह सत्य का दूसरा पहलू है। पढ़ने वाले तो हैं, पर पुस्तकों को पाठकों तक पहुंचाने में कई व्यवधान हैैं- समय नहीं हैं, साधन नहीं हैं और स्थान नहीं हैं। मगर इन तीन ‘स’ के बीच जिन शिक्षकों के पास चौथा ‘स’ है, वहां पुस्तकें पाठकों तक पहुंच रही हैं। बच्चे उनका मजा उठा रहे हैं, उनका शैक्षिक व बौद्धिक स्तर भी ऊंचा हो रहा है। यह चौथा ‘स’ है- संकल्प। कुछ नया करने व मिलने वाले वेतन को न्यायोचित ठहराने का संकल्प।

अनियोजित व आकस्मिक या मनमर्जी से समय का इस्तेमाल बच्चों की रचनात्मकता विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। इससे बच्चों को उनकी पढ़ाई की एक जैसी दिनचर्या से छूट मिलती है और उनकी आत्म-निर्भरता बढ़ती है। मिशिगन यूनिवर्सिटी के सामाजिक शोध विभाग ने हाल ही में इस बारे में एक शोध किया था। बच्चों का जीवन स्कूल व घर, दोनों जगह बड़ों द्वारा बनाए गए कानूनों व टाइम-टेबिल से बंधा होता है। यहां तक कि बड़ों के लिए बने खेल भी बच्चों को तनाव देते हैं, क्योंकि उनमें बड़ों के मानसिक स्तर के नियम, बंधन होते हैं, जीतने का तनाव होता है। जरा बच्चों को अपने खुद के खेल, उसके कायदे-कानून बनाने का मौका दें। या फिर स्कूल में बच्चों की दिनचर्या में अचानक बदलाव करें। जैसे किसी दिन पहले गणित पढ़ाई, तो अगले दिन की शुरुआत हिंदी से की जा सकती है। खेल के समय, बाल सभा, बाहर घूमने, प्रकृति विचरण जैसी गतिविधियों के लिए बगैर किसी पूर्व सूचना के समय निकालें।

आमतौर पर स्कूलों में खेल का समय बीच में या फिर आखिर में होता है, जबकि 10-12 साल के बच्चों के लिए भौतिक मेहनत उनके सीखने व याद करने की प्रक्रिया में ग्लूकोज जैसा काम करती है। अत: स्कूलों में खेल-कूद जैसी गतिविधियां शुरू में ही रखी जाएं, तो बेहतर होगा। इससे बच्चे का मन स्कूल में भी लगेगा, साथ ही वे शारीरिक रूप से बौद्धिक कार्य करने को तैयार भी होंगे। प्राथमिक स्कूल के शिक्षक की भूमिका बच्चे को ज्ञान देने वाले या फिर मनोरंजन करने वाले से अधिक उसके सहयोगी का होना चाहिए। वह केवल यह देखे कि बच्चा किस दिशा में जा रहा है? पहले-पहल चलना सीखते समय लड़खड़ाना वाजिब है। सीखने की शुरुआती प्रक्रिया में लड़खड़ाने पर शिक्षक को तत्काल सम्हालने की कोशिश से बचना चाहिए। बच्चे अपने अनुभव और प्रयोगों से जल्दी व ज्यादा सीखते हैं। बच्चों में सृृजनात्मकता विकसित करने के लिए उनको अपने परिवेश से ही उदाहरण चुनने के लिए प्रेरित करना चाहिए। खेत-खलिहान के काम, मवेशी चराने, गृहिणी के दैनिक कार्यों, मकान या सड़क बना रहे मजदूरों की गतिविधियों में भी सृजनात्मकता के लक्षण देखे जा सकते हैं।

शिक्षक, समाज और बच्चों के बीच दिनोंदिन बढ़ रहे अविश्वास को समाप्त करने के लिए कुछ छोटी-छोटी जिम्मेदारियां साझा करने के प्रयोग शुरू करने चाहिए। इस कार्य में बच्चे और समुदाय, दोनों का शामिल होना जरूरी है। गांव-मुहल्ले का छोटा सा पुस्तकालय इस दिशा में एक रचनात्मक पहल हो सकता है।

शुक्रवार, 9 जून 2017

How can agriculture become profit business

किसान को मेहनत का वाजिब दाम दो !


                                                                      पंकज चतुर्वेदी
बीते 15 दिनों से महाराष्ट्र  और मप्र में किसान आंदोलन मुखर होता जा रहा है। मंदसौर में छह लोगों के मारे जाने के अलावा दर्जनों स्थान पर आगजनी और लूट हुई। करोड़ों के कृषि  व दुग्ध उत्पाद सड़कों पर नष्ट  कर दिए गए।  कम आवक का असर बाजार पर भी दिखा। वहीं केंद्र सरकार के तीन साल के सरकारी प्रचार माध्यम जोर-जोर से चिल्ला रहे हैं कि किसान के जीवन में अब खुशहाली आ गई है क्योंकि उसे फसल-बीमा का सहारा मिल गया है। किसान अब बहुत खुश है कि उसे आसान कर्ज व क्रेडिट कार्ड मिल गया है। हालांकि हकीकत तो उन किसानों से पूछो जो हर रोज पंजाब से लेकर विदर्भ तक कर्ज व खराब फसल के कारण मौत को गले लगा रहे है। किसान की समस्या अकेले मौसमी मार के चलते फसल बेकार होना नहीं है, हर साल हजारों किसान बंपर फसल के कारण हताश हो कर खुदकुशी करते हैं। ऐसे किसानों को ना तो बीमा का कवर है ना ही कर्ज का।

अभी सोशल मीडिया पर एक ऐसे किसान की कहानी चल रही है सिमें डेढ कुंटल प्याज बेचने के बाद किसान को एक रूपया बचने का गणित समझाया गया है। बीते तीन महीने के दौरान मध्यभारत के कई राज्यों में टमाटर व प्याज की फसल के गुड़-गोर होने के किस्से सुनाई देते रहे, लेकिन कोई भी सरकारी एजेंसी माल का सही दमा देने के लिए आगे नहीं आई। कहीं टमाटर मवेशी को खिला दिए गए तो कहीं प्याज सड़क पर फैंक दिया गया। जिन इलाकों में टमाटर और प्याज का यह हाल हुआ, वे भीशण गर्मी की चपेट में आए हैं और वहां कोल्ड स्टोरेज की सुविधा है नहीं । है भी तो टमाटर तो रखते नहीं और प्याज रखने के सौ नखरे। मप्र में राज्य सरकार ने प्याज खरीदी की घोशणा की तो मंडी में पहले दिन महज एक ट्राली प्याज ही बिका, क्योंकि खरीदी के मापदंड में अधिकांश प्याज आया ही नहीं। हताश किसान अपना प्याज वहीं मडी में पटक कर चले गए। यदि देश में इनके दाम बाजार में बढते हैंे तो सारा मीडिया व प्रशासन इस की चिंता करने लगता है , लेकिन किसान की चार महीने की मेहनत व लागत मिट्टी में मिल गई तो कहीं चर्चा तक नहीं हुई।

खेती को लाभ का कार्य बनाने के लिए सन 2007 में प्रख्यात कृशि वैज्ञानिक एम.एस स्वामीनाथन की अध्यक्षता में गठित आयोग ने सरकार को रिपोर्ट सौंपी थी जिसमें किसान को उसके उत्पपाद पर न्यूनतम समर्थन मूल्य पर पचास फीसदी अतिरिक्त भुगतान की बात कही गई थी। चाहे केंद्र सरकार का चुनाव हो या फिर मप्र का पिछला विधान सभा चुनाव, सभी के घोशणा पत्र में इस रिपोर्ट को लागू करने के वायदे किए गए थे।। हालांकि इसमें भी खेती की लागत में जमीन की कीमत को षामिल नहीं किया गया था। लेकिन दुखद कि देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ कहलाने वाली खेती के विकास के नाम पर बुनियादी सामाजिक सुधारों को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है । पूरी तरह प्रकृति की कृपा पर निर्भर किसान के श्रम की सुरक्षा पर कभी गंभीरता से सोचा ही नहीं गया । फसल बीमा की कई योजनाएं बनीं, उनका प्रचार हुआ, पर हकीकत में किसान यथावत ठगा जाता रहा- कभी नकली दवा या खाद के फेर में तो कभी मौसम के हाथों । किसान जब ‘‘केश क्राप’’ यानी फल-सब्जी आदि की ओर जाता है तो आढ़तियों और बिचौलियों के हाथों उसे लुटना पड़ता है। पिछले साल उत्तर प्रदेश में 88 लाख मीट्रिक टन आलू हुआ था तो आधे साल में ही मध्यभारत में आलू के दाम बढ़ गए थे। इस बार किसानों ने उत्पादन बढ़ा दिया, अनुमान है कि इस बार 125 मीट्रिक टन आलू पैदा हो रहा है। कोल्ड स्टोरेज की क्षमता बामुश्किल 97 लाख मीट्रिक टन की है। जाहिर है कि आलू या तो सस्ते- मंदे दामों में बिकेगा या फिर फिर किसान उसे खेत में ही सड़ा देगा- आखिर आलू उखाड़ने, मंडी तक ले जाने के दाम भी तो निकलने चाहिए।
हर दूसरे-तीसरे साल कर्नाटक कंे कई जिलों के किसान अपने तीखे स्वाद के लिए मशहूर हरी मिर्चों को सड़क पर लावारिस फैंक कर अपनी हताशा का प्रदर्शन करते हैंे। तीन महीने तक दिन-रात खेत में खटने के बाद लहलहाती फसल को देख कर उपजी खुशी किसान के ओठों पर ज्यादा देर ना रह पाती है। बाजार में मिर्ची की इतनी अधिक आवक होती है कि खरीदार ही नहीं होते। उम्मीद से अधिक हुई फसल सुनहरे कल की उम्मीदों पर पानी फेर देती है- घर की नई छप्पर, बहन की षादी, माता-पिता की तीर्थ-यात्रा; ना जाने ऐसे कितने ही सपने वे किसान सड़क पर मिर्चियों के साथ फैंक आते हैं। साथ होती है तो केवल एक चिंता-- मिर्ची की खेती के लिए बीज,खाद के लिए लिए गए कर्जे को कैसे उतारा जाए? सियासतदां हजारेंा किसानों की इस बर्बादी से बेखबर हैं, दुख की बात यह नहीं है कि वे बेखबर हैं, विडंबना यह है कि कर्नाटक में ऐसा लगभग हर साल किसी ना किसी फसल के साथ होता है। सरकारी और निजी कंपनियां सपने दिखा कर ज्यादा फसल देने वाले बीजों को बेचती हैं, जब फसल बेहतरीन होती है तो दाम इतने कम मिलते हैं कि लागत भी ना निकले।
कृशि प्रधान अर्थव्यवस्था वाले देश में कृशि उत्पाद के न्यूनतम मूल्य, उत्पाद खरीदी, बिचौलियों की भूमिका, किसान को भंडारण का हक, फसल-प्रबंधन जैसे मुद्दे, गौण दिखते हैं और यह हमारे लोकतंत्र की आम आदमी के प्रति संवेदनहीनता की प्रमाण है। सब्जी, फल और दूसरी कैश-क्राप को बगैर सोचे-समझे प्रोत्साहित करने के दुश्परिणाम दाल, तेल-बीजों(तिलहनों) और अन्य खाद्य पदार्थों के उत्पादन में संकट की सीमा तक कमी के रूप में सामने आ रहे हैं। आज जरूरत है कि खेतों में कौन सी फॅसल और कितनी उगाई जाए, पैदा फसल का एक-एक कतरा श्रम का सही मूल्यांकन करे; इसकी नीतियां तालुका या जनपद स्तर पर ही बनें। कोल्ड स्टोरेज या वेअर हाउस पर किसान का कब्जा हो, साथ ही प्रसंस्करण के कारखाने छोटी-छोटी जगहों पर लगें।
अपने दिन-रात, जमा पूंजी लगा कर देश का पेट भरने के लिए खटने वाला किसान की त्रासदी है कि ना तो उसकी कोई आर्थिक सुरक्षा है और ना ही  सामाजिक प्रतिष्ठा , तो भी वह अपने श्रम-कणों से मुल्क को सींचने पर तत्पर रहता है। किसान के साथ तो यह होता ही रहता है - कभी बाढ़ तो कभी सुखाड़, कहीं खेत में हाथी-नील गाय या सुअर ही घुस गया, कभी बीज-खाद-दवा नकली, तो कभी फसल अच्छी आ गई तो मंडी में अंधाधुंध आवक के चलते माकूल दाम नहीं। प्राकृतिक आपदाओं पर किसी का बस नहीं है, लेकिन ऐसी आपदाएं तो किसान के लिए मौत से बदतर होती हैं। किसानी महंगी होती जा रही है तिस पर जमकर बंटते कर्ज से उस पर दवाब बढ़ रहा है। ऐसे में आपदा के समय महज कुछ सौ रूपए की राहत राशि उसके लिए ‘जले पर नमक’ की मांनिंद होती है। सरकार में बैठे लोग किसान को कर्ज बांट कर सोच रहे हैं कि इससे खेती-किसानी का दशा बदल जाएगी, जबकि किसान चाहता है कि उसे उसकी फसल की कीमत की गारंटी मिल जाए। भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 31.8 प्रतिशत खेती-बाड़ी में तल्लीन कोई 64 फीसदी लोगों के पसीने से पैदा होता है । यह विडंबना ही है कि देश की अर्थ व्यवस्था की रीढ़ कहलाने वाली खेती के विकास के नाम पर बुनियादी सामाजिक सुधारों को लगातार नजरअंदाज किया जाता रहा है । कहने को सरकारी स्तर पर फसल के बीमा की कई लुभावनी योजनाएं सरकारी दस्तावेजों में मिल जाएंगी, लेकिन अनपढ़, सुदूर इलाकों में रहने वाले किसान इनसे अनभिज्ञ होते हैं। सबसे बड़ी बात कि योजनाओं के लिए इतने कागज-पत्तर भरने होते हैं कि किसान उनसे मुंह मोड लेता हैै।
एक बात जान लेना जरूरी है कि किसान को ना तो कर्ज चाहिए और ना ही बगैर मेहनत के कोई छूट या सबसिडी। इससे बेहतर है कि उसके उत्पाद को उसके गांव में ही विपणन करने की व्यवस्था और सुरक्षित भंडारण की स्थानीय व्यवस्था की जाए। किसान को सबसिडी से ज्यादा जरूरी है कि उसके खाद-बीज- दवा के असली होने की गारंटी हो तथा किसानी के सामानों को नकली बचने वाले को फंासी जैसी सख्त सजा का प्रावधान हो। अफरात फसल के हालात में किसान को बिचौलियों से बचा कर सही दाम दिलवाने के लिए जरूरी है कि सरकारी एजंेसिया खुद गांव-गांव जाकर  खरीदारी करे। सब्जी-फल-फूल जैसे उत्पाद की खरीद-बिक्री स्वयं सहायता समूह या सहकारी के माध्यम से  करना कोई कठिन काम नहीं है। यदि प्रत्येक किसान की बुवाई का रिकार्ड सरकार के पास हो तो उसकी न्यूनतम आय की गणना की जा सकती है। फसल होने पर किसान स्वतंत्र है विपणन के लिए, लेकिन आपदा या अफरात फसल के हालात में उसे न्यूनतम दाम मिले व उसकी फसल पर सरकारी एजेंसी का कब्जा हो। इससे मुआवजा, गिरदावरी जैसी लंबी प्रकियाओ ंसे बचा जा सकता है। एक बात और इस पूरे काम में हाने वाला व्यय, किसी नुकसान के आकलन की सरकारी प्रक्रिया, मुआवजा वितरण, उसके हिसाब-किताब में होने वाले व्यय से कम ही होगा। कुल मिला कर किसान के उत्पाद के विपणन या कीमतों को बाजार नहीं, बल्कि सरकार तय करे।
साहिबाबाद, गाजियाबाद
201005
9891928376

Rethink of river link projects

राजनीतिः नदी जोड़ योजना पर पुनर्विचार जरूरी

जब नदियों को जोड़ने की योजना बनाई गई थी, तब देश व दुनिया के सामने ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन क्षरण, ग्रीनहाउस प्रभाव जैसी चुनौतियां नहीं थीं, जबकि गंभीरता से देखें तो नदी जोड़ जैसी परियोजनाएं इन वैश्विक संकटों को और बढ़ा देंगी। ऐसे में यह जरूरी है कि सरकार नई वैश्विक परिस्थितियों में नदियों को जोड़ने की योजना पर नए सिरे से विचार करे।



अभी केंद्र सरकार ने तय कर दिया है कि भारत पेरिस जलवायु समझौते पर अमल करेगा और अपने यहां कार्बन उत्सर्जन घटाने पर गंभीरता से काम करेगा।
अभी केंद्र सरकार ने तय कर दिया है कि भारत पेरिस जलवायु समझौते पर अमल करेगा और अपने यहां कार्बन उत्सर्जन घटाने पर गंभीरता से काम करेगा। ठीक उसी समय हुक्मरान तय कर चुके हैं कि देश में नदियों को जोड़ने की परियोजना लागू करना ही है और उसकी शुरुआत बुंदेलखंड से होगी जहां केन व बेतवा को जोड़ा जाएगा। असल में आम आदमी नदियों को जोड़ने का अर्थ समझता है कि किन्हीं पास बह रही दो नदियों को किसी नहर जैसी संरचना के माध्यम से जोड़ दिया जाए, जिससे जब एक में पानी कम हो तो दूसरे का उसमें मिल जाए। पहले यह जानना जरूरी है कि असल में नदी जोड़ने का मतलब है, एक विशाल बांध और जलाशय बनाना और उसमें जमा दोनों नदियों के पानी को नहरों के माध्यम से उपभोक्ता तक पहुंचाना। केन-बेतवा जोड़ योजना कोई बारह साल पहले जब तैयार की गई थी तो उसकी लागत पांच सौ करोड़ के करीब थी।
अभी वह कागज पर ही है और 2015 में इसकी अनुमानित लागत अठारह सौ करोड़ तक पहुंच गई। सबसे बड़ी बात यह कि जब नदियों को जोड़ने की योजना बनाई गई थी, तब देश व दुनिया के सामने ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन क्षरण, ग्रीनहाउस प्रभाव जैसी चुनौतियां नहीं थीं, जबकि गंभीरता से देखें तो नदी जोड़ जैसी परियोजनाएं इन वैश्विक संकटों को और बढ़ा देंगी।
जलवायु परिवर्तन के कारण चेन्नई में पिछले साल और उससे पहले कश्मीर में आई तबाही की बानगी शायद बुंदेलखंडवासी भूल गए हों, लेकिन वे इस बार उसी प्राकृतिक आपदा का स्वाद चख रहे हैं। तीन साल के भयंकर सूखे के बाद इस बार जो बरख बरस रहे हैं कि कई जगह पंद्रह दिनों से जनजीवन ठप है। सैकड़ों जगह ऐसी हैं जहां तालाबों की जल-निकासी के पारंपरिक ‘ओने’ खोलना पड़ा है। बरसात की त्रासदी इतनी गहरी है कि भले ही जल-स्रोत लबालब हो गए हैं लेकिन खेतों में बुआई नहीं हो पाई और जहां हुई वहां बीज सड़ गए। ग्लोबल वार्मिंग से उपज रही जलवायु अनियमितता और इसके दुष्प्रभाव के प्रति सरकार व समाज में बैठे लोग कम ही वाकिफ या जागरूक हैं। यह भी जान लें कि आने वाले दिनों में यह संकट और गहराना है, खासकर भारत में इसके कारण मौसम के चरम रूप यानी असीम गरमी, भयंकर ठंड, बेहिसाब सूखा या बरसात। प्राय: जिम्मेदार लोग यह कह कर पल्ला झाड़ते दिखते हैं कि यह तो वैश्विक संकट है, हम इसमें क्या कर सकते हैं!
केन और बेतवा दोनों का ही उद्गम स्थल मध्यप्रदेश में है। दोनों नदियां लगभग समांतर एक ही इलाके से गुजरती हुई उत्तर प्रदेश में जाकर यमुना में मिल जाती हैं। जाहिर है, जब केन के जलग्रहण क्षेत्र में अल्पवर्षा या सूखे का प्रकोप होगा तो बेतवा की हालत भी ऐसी ही होगी। तिस पर अठारह सौ करोड़ (भरोसा है कि जब इस पर काम शुरू होगा तो यह राशि बाईस सौ करोड़ तक पहुंच जाएगी) की योजना न केवल संरक्षित वन का नाश, हजारों लोगों के पलायन का कारक बन रही है, बल्कि इससे उपजी संरचना दुनिया का तापमान बढ़ाने में ही मददगार होगी।
नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्पेस रिसर्च (आइएनपीसी), ब्राजील का एक गहन शोध है कि दुनिया के बड़े बांध हर साल 104 मिलियन मीट्रिक टन मीथेन गैस का उत्सर्जन करते हैं और यह वैश्विक तापमान में वृद्धि के कुल मानवीय योगदान का चार फीसद है। सनद रहे कि बड़े जलाशय, दलदल बड़ी मात्रा में मीथेन का उत्सर्जन करते हैं। ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेवार मानी जाने वाली गैसों को ग्रीनहाउस गैस कहते हैं। इनमें मुख्य रूप से चार गैसें- कार्बन डाइआॅक्साइड, मीथेन, नाइट्रस आॅक्साइड और सल्फर हेक्साफ्लोराइड- तथा दो गैस-समूह- हाइड्रोफ्लोरोकार्बन और परफ्लोरोकार्बन शामिल हैं। ग्रीनहाउस गैसों के अत्यधिक उत्सर्जन से वायुमंडल में उनकी मात्रा निरंतर बढ़ती ही जा रही है। ये गैसें सूर्य की गर्मी के बड़े हिस्से को परावर्तित नहीं होने देतींं, जिससे गर्मी की जो मात्रा वायुमंडल में फंसी रहती है, उससे तापमान में वृद्धि हो जाती है।
पिछले बीस से पचास वर्षों में वैश्विक तापमान में करीब एक डिग्री सेंटीग्रेड की वृद्धि हो चुकी है। केन-बेतवा को जोड़ने के लिए छतरपुर जिले के ढोढन में 77 मीटर ऊंचा और 2031 मीटर लंबा बांध बनाया जाएगा। इसके अलावा 221 किलोमीटर लंबी नहरें भी बनेंगी। इससे होने वाले वनों के नाश और पलायन को अलग भी रख दें तो भी निर्माण, पुनर्वास आदि के लिए जमीन तैयार करने व इतने बड़े बांध व नहरों से इतना दलदल बनेगा और यह मीथेन गैस उत्सर्जन का बड़ा कारक साबित होगा। भारत आज कोई 3 करोड़ 35 लाख टन मीथेन उत्सर्जन करता है और हमारी सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे कम करने के लिए प्रतिबद्ध है।
इस परियोजना का सबसे बड़ा असर दुनिया भर में मशहूर तेजी से विकसित बाघ क्षेत्र के नुकसान के रूप में भी होगा। पन्ना नेशनल पार्क का 41.41 वर्ग किलोमीटर वह क्षेत्र पूरी तरह जलमग्न हो जएगा, जहां आज तीस बाघ हैं। सनद रहे कि 2006 में यहां बाघ बिल्कुल नहीं थे। सिर्फ बाघों की संरक्षित रिहाइश नष्ट नहीं होगी, जंगल के तैंतीस हजार पेड़ भी काटे जाएंगे। यह भी जान लें कि इतने पेड़ तैयार होने में कम से कम आधी सदी का समय लगेगा। जाहिर है, जंगल कटाई व वन का नष्ट होना, जलवायु परिवर्तन को प्रभावित करने वाले कारक हैं। यही नहीं, जब यह परियोजना बनाई गई थी, तब बाघ व जंगली जानवर कोई विचारणीय मसले थे ही नहीं, जबकि आज दुनिया के सामने जैव विविधता संरक्षण एक बड़ी चुनौती है।


राष्ट्रीय जल संवर्धन प्राधिकरण के दस्तावेज बताते हैं कि भारत में नदी जोड़ की मूलभूत योजना 1850 में पहली बार सर आर्थर कॉटन ने बनाई थी, फिर 1972 में डॉ केएल राव ने गंगा और कावेरी जोड़ने पर काम किया था। सन 1978 में केप्टन डास्टर्स का गार्लेड नहर योजना पर काम हुआ और सन 1980 में नदी जोड़ की राष्ट्रीय परियोजना तैयार हुई। आज देश में इस सिलसिले में जिन परियोजनाओं पर विचार हो रहा है उसका आधार वही 1980 के दस्तावेज हैं। सन 1980 में जलवायु परिवर्तन या ग्रीनहाउस गैसों की कल्पना भी नहीं हुई थी। कहने की जरूरत नहीं कि यदि इस योजना पर काम शुरू भी हुआ तो कम से कम एक दशक इसे पूरा होने में लगेगा व इस दौरान अनियमित जलवायु, नदियों के अपने रास्ता बदलने की त्रासदियां और गहरी होंगी।
ऐसे में जरूरी है कि सरकार नई वैश्विक परिस्थितियों में नदियों को जोड़ने की योजना पर नए सिरे से विचार करे। इतने बड़े पर्यावरणीय नुकसान, विस्थापन, पलायन और बहुत सारा धन व्यय करने के बाद भी बुंदेलखंड के महज तीन से चार जिलों को मिलेगा क्या, इसका आकलन भी जरूरी है। इससे एक चौथाई से भी कम धन खर्च कर समूचे बुंदेलखंड के पारंपरिक तालाबों, बावड़ी कुओं और जोहड़ों की मरम्मत की जा सकती है। सिकुड़ गई छोटी नदियों को उनके मूल स्वरूप में लाने के लिए काम हो सकता है। गौर करें कि अंग्रेजों के बनाए पांच बांध सौ साल में दम तोड़ गए हैं, आजादी के बाद बने तटबंध व स्टाप डैम पांच साल भी नहीं चले, लेकिन समूचे बुंदेलखंड में एक हजार साल पुराने चंदेलकालीन तालाब, लाख उपेक्षा व रखरखाव के अभाव के बावजूद आज भी लोगों के गले व खेत तर कर रहे हैं। उनके आसपास लगे पेड़ व वहां पल रहे जीव स्वयं ही उससे निकली मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसों का शमन भी करते हैं।

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