तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

रविवार, 23 जुलाई 2017

Flyover-unnder pass cause of jam in rainy season

शहरी विकास की पोल खोलती बारिश

महानगरों में बढ़ते यातायात को सहज बनाने के लिए बीते एक दशक के दौरान ढेर सारे फ्लाईओवर और अंडरपास बने। दावे किए गए कि अमुक सड़क अब ट्रैफिक सिग्नल से मुक्त हो गई है। इसके बावजूद वहां प्रति दिन जाम लगना आम बात है। यदि मानवजन्य कारणों को अलग कर दिया जाए तो दिल्ली जैसे शहरों में जाम लगने के अधिकांश स्थान या तो फ्लाईओवर हैं या फिर अंडरपास। यह मुसीबत बरसात के दिनों में और गंभीर हो जाती है

फजीहत करवाते फ्लाईओवर
पंकज चतुर्वेदी

 


अभी कुछ फुहारें क्या पड़ी ,दिल्ली और उसके आसपास के सभी महानगर- गाजियाबाद, नोएडा, गुडगांव पानी-पानी हो गए। कई सड़कों पर पांच किलोमीटर तक लंबा जाम लग गया। गरमी से निजात के आनंद की कल्पना करने वाले सड़कों पर जगह-जगह पानी भरने से ऐसे दो-चार हुए कि अब बारिश के नाम से ही डर रहे हैं। बारिश भले ही रिकार्ड में बेहद कम थी, लेकिन आधी दिल्ली ठिठक गई। जहां उड़ कर जाने को यह भी नहीं कि ऐसा केवल दिल्ली में ही हो रहा है। यह तो हर साल की कहानी है और देश के कोई दो दर्जन महानगरों की त्रासदी है। हर बार सारा दोष नालों की सफाई ना होने ,बढ़ती आबादी, घटते संसाधनों और पर्यावरण से छेड़छाड़ पर थोप दिया जाता हैं । विडंबना है कि शहर नियोजन के लिए गठित लंबे-चौडे़ सरकारी अमले पानी के बहाव में शहरों के ठहरने पर खुद को असहाय पाते हैं । दुखद है कि जाम का कारण बनने वाला पानी का भराव उन जगहों पर होता है जिन्हे सड़क निर्माण तकनीक की आधुनिक संरचना कहते हैं - अंडर पास व फ्लाई ओवर।
देश की राजधानी दिल्ली में सुरसामुख की तरह बढ़ते यातायात को सहज बहाव देने के लिए बीते एक दशक के दौरान ढेर सारे फ््लाई ओवर और अंडरपास बने। कई बार दावे किए गए कि अमुक सड़क अब ट्राफिक सिग्नल से मुक्त हो गई है, इसके बावजूद दिल्ली में हर साल कोई 185 जगहों पर 125 बड़े जाम और औसतन प्रति दिन चार से पांच छोटे जाम लगना आम बात है।  इनके प्रमुख कारण किसी वाहन का खराब होना, किसी धरने-प्रदर्शन की वजह से यातायात  का रास्ता बदलना, सड़कांे की जर्जर हालत ही होते हैं । लेकिन जान कर आश्चर्य होगा कि यदि मानवजन्य जाम के कारणों को अलग कर दिया जाए तो महानगर दिल्ली में जाम लगने के अधिकांश स्थान या तो फ्लाई ओवर हैं या फिर अंडर पास। और यह केवल बरसात के दिनों की ही त्रासदी नहीं है, यह मुसीबत बारहों महीने, किसी भी मौसम में आती है। कहीं इसे डिजाईन का देाश कहा जा रहा है तो कहीं लोगों में यातायात-संस्कार का अभाव। लेकिन यह तय है कि अरबों रूपए खर्च कर बने ये हवाई दावे हकीकत के धरातल पर त्रासदी ही हैं।
बारिश के दिनों में अंडर पास में पानी भरना ही था, इसका सबक हमारे नीति-निर्माताओं ने आईटीओ के पास के शिवाजी ब्रिज और कनाट प्लेस के करीब के मिंटो ब्रिज से नहीं लिया था। ये दोनों ही निर्माण बेहद पुराने हैं और कई दशकों से बारिश के दिनों में दिल्ली में जल भराव के कारक रहे हैं। इसके बावजूद दिल्ली को ट्राफिक सिग्नल मुक्त बनाने के नाम पर कोई चार अरब रूपए खर्च कर दर्जनभर अंडरपास बना दिए गए। लक्ष्मीनगर चुंगी, द्वारका मार्ग, मूलचंद,पंजाबी बाग आदि कुछ ऐसे अंडर पास हैं जहां थोड़ी सी बारिश में ही कई-कई फुट पानी भर जाता है। सबसे षर्मनाम तो है हमारे अंतरराश्ट्रीय हवाई अड्डे को जोड़ने वाले अंडर पास का नाले में तब्दील हो जाना। कहीं पर पानी निकालने वाले पंपों के खराब होने का बहाना है तो सड़क डिजाईन करने वाले नीचे के नालों की ठीक से सफाई ना होने का रोना रोते हैं तो दिल्ली नगर पालिका अपने यहां काम नहीं कर रहे कई हजार कर्मचारियों की पहचान ना कर पाने की मजबूरी बता देती है। इन अंडरपास की समस्या केवल बारिश के दिनों में ही नहीं है। आम दिनों में भी यदि यहां कोई वाहन खराब हो जाए या दुर्घटना हो जाए तो उसे खींच कर ले जाने का काम इतना जटिल है कि जाम लगना तय ही होता है। असल में इनकी डिजाईन में ही खामी है जिससे बारिश का पूरा जल-जमाव उसमें ही होता है। जमीन के गहराई में जा कर ड्रैनेज किस तरह बनाया जाए, ताकि पानी की हर बूंद बह जाए, यह तकनीक अभी हमारे इंजीनियरों को सीखनी होगी।
ठीक ऐसे ही हालात फ्लाईओवरों के भी हैं। जरा पानी बरसा कि उसके दोनो ओर यानी चढ़ाई व उतार पर पानी जमा हो जाता है। कारण एक बार फिर वहां बने सीवरों की ठीक से सफाई ना होना बता दिया जाता है। असल में तो इनकी डिजाईन में ही कमी है- यह आम समझ की बात है कि पहाड़ी जैसी किसी भी संरचना में पानी की आमद ज्यादा होने पर जल नीचे की ओर बहेगा। मौजूदा डिजाईन में नीचे आया पानी ठीक फ्लाईओवरों से जुड़ी सड़क पर आता है और फिर यह मान लिया जाता है कि वह वहां मौजूद स्लूस से सीवरों में चला जाएगा। असल में सड़कों से फ्लाईओवरों के जुड़ाव में मोड़ या अन्य कारण से एक तरफ गहराई है और यहीं पानी भर जाता है। कई स्थान पर इन पुलों का उठाव इतना अधिक है और महानगर की सड़कें हर तरह के वाहनों के लिए खुली भी हुई हैं, सो आए रोज इन पर भारी मालवाहक वाहनों का लोड ना ले पाने के कारण खराब होना आम बात है। एक वाहन खराब हुआ कि कुछ ही मिनटों में लंबा हो जाता है। ऐसे हालात सरिता विहार, लाजपत नगर, धौलाकुआं, नारायणा, रोहिणी आदि में आम बात हैं।
अंडर पास का हर बार तालाब बन जाना गाजियाबाद के गौशाला अंडरपास की स्थाई समस्या है तो जयपुर जाने वाले राश्ट्रीय राजमार्ग 8 पर गुडगांव के लिए जाने वाले प्रत्येक रपटे पर बारिश का पानी जमा होता ही है। दिल्ली के हवाई अड्डे स ेले कर दिलशाद गार्डन तक के अंडर पास जरा से बादल बरसने पर दरिया बन जाते हैं। फरीदाबाद में प्रत्येक पुल बरसात के बाद जाम हो जाता है। यह दिक्कत अकेले दिल्ली एनसीआर तक ही नहीं है, लखनउ, इंदौर, पटियाला, सूरत जैसे षहर भी पुल व भूमिगत पथों के बारिश में बेकार होने की शिकायतें करते रहते हैं। भले ही अब बरसात कुछ ही दिनों होती हो, लेकिन कुछ ही दिनों में कुछ ही घंटों में होने वाला जाम ईंधन की बर्बादी, उससे उपजे कार्बन के कारण धरती को स्थाई नुकसान तथा ईंधन की खरीद पर भारत के विदेशी पूंजी के व्यय में इजाफा करता है। जाहिर है कि फ्लाई ओवर और अंडरपास के डिजाईन बरसात को ध्यान में रख कर बनाए जाने आवश्यक हैं ताकि उससे पानी को बचाया भी जा सके।
अब षायद दिल्ली को वर्ल्ड क्लास सिटी बनाने के स्वप्नदृश्टाओं को सोचना होगा कि कई अरब-खरब खर्च कर यदि ऐसी ही मुसीबत को झेलना है तो फिर ट्राफिक सिग्नल सिस्टम ही क्या बुरा है ? जैसे हाल ही में सरकार को समझ में आया कि कई-कई करोड़ खर्च कर बनाए गए भूमिगत पैदल पारपथ आमतौर पर लोग इस्तेमाल करते ही नहीं हैं और नीतिगत रूप से इनका निर्माण बंद कर दिया गया है। 
यह विडंबना है कि हमारे नीति निर्धारक यूरोप या अमेरिका के किसी ऐसे देश की सड़क व्यवस्था का अध्ययन करते हैं जहां ना तो दिल्ली की तरह मौसम होता है और ना ही एक ही सड़क पर विभिन्न तरह के वाहनों का संचालन। उसके बाद सड़क, अंडरपास और फ्लाईओवरों की डिजाईन तैयार करने वालों की शिक्षा भी ऐसे ही देशों में लिखी गई किताबों से होती हैं। नतीजा सामने है कि ‘‘आधी छोड़ पूरी को जावे, आधी मिले ना पूरी पावे’’ का होता है। हम अंधाधंुध खर्चा करते हैं, उसके रखरखाव पर लगातार पैसा फूंकते रहते हैं- उसके बावजूद ना तो सड़कों पर वाहनों की औसत गति बढ़ती है और ना ही जाम जैसे संकटों से मुक्ति। काश! कोई स्थानीय मौसम, परिवेश और जरूरतों को ध्यान में रख कर जनता की कमाई से उपजे टैक्स को सही दिशा में व्यय करने की भी सोचे। सरकार में बैठे लोग भी इस संकट को एक खबर ेस कहीं आगे की सोच के साथ देखे।

पंकज चतुर्वेदी
यूजी-1, 3/186 ए राजेन्द्र नगर
सेक्टर-2
साहिबाबाद
गाजियाबाद 201005
9891928376, 0120-4241060
चब7001010/हउंपसण्बवउ

 1

शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

sewar death spot for cleaner

गंदगी के समंदर में गर्क होती जिंदगी

सीवर सफाई में लगे श्रमिकों के बीच किए गए सर्वे से मालूम चलता है कि उनमें से 49 फीसदी लोग सांस की बीमारियों, खांसी व सीने में दर्द के रोगी हैं। 11 प्रतिशत को डरमैटाइसिस, एक्जिमा और ऐसे ही चर्म रोग हैं।

अभी बीते शनिवार को दिल्ली के घिटोरनी में एक फार्म हाउस के सीवर की सफाई के दौरान चार लोग काल के गाल में समा गए। इसी साल अप्रैल महीने में दिल्ली एनसीआर के फरीदाबाद और गाजियाबाद में सीवर की जानलेवा गैस से दम घुटने के चलते छह लोग मरे हैं। एक अप्रैल को उदयपुर में एक ही स्थान पर पांच लोग मारे गए। ऐसी मौतें हर साल हजार से ज्यादा होती हैं। हर मौत का कारण सीवर की जहरीली गैस बताया जाता है।

हर बार कहा जाता है कि यह लापरवाही का मामला है। पुलिस ठेकेदार के खिलाफ मामला दर्ज कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेती है। यही नहीं अब नागरिक भी अपने घर के सैप्टिक टैंक की सफाई के लिए अनियोजित क्षेत्र से मजदूरों को बुला लेते हैं और यदि उनके साथ कोई दुर्घटना होती है तो न तो उनके आश्रितों को कोई मुआवजा मिलता है और न ही कोताही करने वालों को कोई समझाईश। शायद यह पुलिस को भी नहीं मालूम है कि सीवर सफाई का ठेका देना हाईकोर्ट के आदेश के विपरीत है। समाज के जिम्मेदार लोगों ने कभी महसूस ही नहीं किया कि नरक-कुंड की सफाई के लिए बगैर तकनीकी ज्ञान व उपकरणों के निरीह मजदूरों को सीवर में उतारना अमानवीय है।
विडंबना है कि सरकार व सफाई कर्मचारी आयोग सिर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा पर रोक लगाने के नारों से आगे इस तरह से हो रही मौतों पर ध्यान ही नहीं देते। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग और मुंबई हाईकोर्ट ने सात साल पहले सीवर की सफाई के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे, जिनकी परवाह और जानकारी किसी को नहीं है। सरकार ने भी सन 2008 में एक अध्यादेश लाकर गहरे में सफाई का काम करने वाले मजदूरों को सुरक्षा उपकरण प्रदान करने की अनिवार्यता की बात कही थी। नरक कुंड की सफाई का जोखिम उठाने वाले लेागों की सुरक्षा-व्यवस्था के कई कानून हैं और मानव अधिकार आयोग के निर्देश भी।

लंकिन इनके पालन की जिम्मेदारी किसी की नहीं। कोर्ट के निर्देशों के अनुसार सीवर की सफाई करने वाली एजंसी के पास सीवर लाईन के नक्शे, उसकी गहराई से संबंधित आंकड़े होना चाहिए। सीवर सफाई का दैनिक रिकॉर्ड, काम में लगे लोगों की नियमित स्वास्थ्य जांच, आवश्यक सुरक्षा उपकरण मुहैया करवाना, काम में लगे कर्मचारियों का नियमित प्रशिक्षण, सीवर में गिरने वाले कचरे की नियमित जांच कि कहीं इसमें कोई रसायन तो नहीं गिर रहे हैं, जैसे निर्देशों का पालन होता कहीं नहीं दिखता।

यह एक शर्मनाक पहलू है कि यह जानते हुए भी कि भीतर जानलेवा गैसें और रसायन हैं, एक इंसान दूसरे इंसान को बगैर किसी बचाव या सुरक्षा-साधनों के भीतर ढकेल देता है । सनद रहे कि महानगरों के सीवरों में महज घरेलू निस्तार ही नहीं होता, उसमें ढेर सारे कारखानों की गंदगी भी होती है। यही नहीं सीवर के काम में लगे लोगों को सामाजिक उपेक्षा का भी सामना करना होता है। दिल्ली में सीवर सफाई में लगे कुछ श्रमिकों के बीच किए गए सर्वे से मालूम चलता है कि उनमें से 49 फीसदी लोग सांस की बीमारियों, खांसी व सीने में दर्द के रोगी हैं। 11 प्रतिशत को डरमैटाइसिस, एक्जिमा और ऐसे ही चर्म रोग हैं। लगातार गंदे पानी में डुबकी लगाने के कारण कान बहने व कान में संक्रमण, आंखों में जलन व कम दिखने की शिकायत करने वालों का संख्या 32 फीसदी थी। भूख न लगना उनका एक आम रोग है।

इतना होने पर भी सीवरकर्मियों को उनके जीवन की जटिलताओं की जानकारी देने के लिए न तो सरकारी स्तर पर कोई प्रयास हुए हैं और न ही किसी स्वयंसेवी संस्था ने इसका बीड़ा उठाया है। आज के अर्थ-प्रधान और मशीनी युग में सफाईकर्मियों के राजनीतिक व सामाजिक मूल्यों के आकलन का नजरिया बदलना जरूरी है। सीवरकर्मियों को देखें तो महसूस होता है कि उनकी असली समस्याओं के बनिस्पत भावनात्मक मुद्दों को अधिक उछाला जाता रहा है। केवल छुआछूत या अत्याचार जैसे विषयों पर टिका चिंतन-मंथन उनकी व्यावहारिक दिक्कतों से बेहद दूर है। सीवर में काम करने वालों को काम के लिए आवश्यक सुरक्षा उपकरण, आर्थिक संबल और स्वास्थ्य की सुरक्षा मिल जाए जो उनके बीच नया विश्वास पैदा किया जा सकता है।

मंगलवार, 18 जुलाई 2017

children-should-have-a-lot-of-books


बच्चों को चाहिए ढेर सारी किताबें

                                                         
पंकज चतुर्वेदी

बाल मन और जिज्ञासा एक-दूसरे के पूरक शब्द ही हैं। वहीं जिज्ञासा का सीधा संबंध कौतुहल से है। उम्र बढ़ने के साथ ही अपने परिवेश की हर गुत्थी को सुलझाने की जुगत लगाना बाल्यावस्था की मूल-प्रवृत्ति है। भौतिक सुखों व बाजारवाद की बेतहाशा दौड़ के बीच दूषित हो रहे सामाजिक परिवेश और बच्चों की नैसर्गिक जिज्ञासु प्रवृत्ति पर बस्ते के बोझ के कारण एक बोझिल-सा माहौल पैदा हो गया है। ऐसे में बच्चों को दुनिया की रोचक जानकारी सही तरीके से देना राहत भरा कदम होता है। पुस्तकें इसका सहज, सर्वसुलभ और सटीक माध्यम हैं। भले ही शहरी बच्चों का एक वर्ग इंटरनेट व अन्य माध्यमों से ज्ञानवान बन रहा है, पर आज भी देश के आम बच्चे को ज्ञान, मनोरंजन, और भावी चुनौतियों का मुकाबला करने के काबिल बनाने के लिए जरूरी पुस्तकों की बेहद कमी है।
आज बच्चे बड़े अवश्य हो रहे हैं, पर अनुभव जगत के नाम पर एक बड़े शून्य के बीच। पूरे देश के बच्चों से जरा चित्र बनाने को कहें। तीन-चौथाई बच्चे पहाड़, नदी, झोपड़ी और उगता सूरज उकेर देंगे। बाकी बच्चे टीवी पर दिखने वाले डिज्नी चैनल के कुछ चरित्रों के चित्र बना देंगे। यह बात साक्षी है कि स्पर्श, ध्वनि, दृष्टि के बुनियादी अनुभवों की कमी, बच्चों की नैसर्गिक क्षमताओं को किस हद तक खोखला बना रही है।

1857 की क्रांति के वक्त अफगानिस्तान से लेकर कन्याकुमारी तक की साक्षरता दर महज एक फीसदी थी। आजादी के समय भी हमारी साक्षरता दर दयनीय ही थी। आज हमारे यहां शिक्षा भी एक क्रांति के रूप में आई है। यह हम सभी मानेंगे कि अब गांव में स्कूल खुलना उतना ही बड़ा विकास का काम माना जाता है, जितना सड़क बनना या अन्य कोई काम। पर बच्चों पर स्कूल में पढ़ाई का बोझ बढ़ता जा रहा है- ऐसी पढ़ाई का बोझ, जिसका बच्चों की जिंदगी, भाषा और संवेदना से कोई सरोकार नहीं है। ऐसी पढ़ाई समाज के क्षय को रोक नहीं सकती, उसे बढ़ावा ही दे सकती है।

भारत में बाल साहित्य की पुस्तकों का इतिहास दो सौ वर्षों का नहीं हुआ है। वैसे 14वीं सदी में अमीर खुसरो ने पहेलियां लिखी थीं, जिनका लक्षित वर्ग बच्चों को माना गया था। 1817 में कोलकाता में कुछ ईसाई मिशनरियों ने बच्चों के लिए पुस्तकों का प्रकाशन शुरू किया था। राजा शिव प्रसाद सिंह सितारे हिंद ने 1867 में बच्चों के लिए कहानियां लिखीं और 1876 में लड़कों के लिए कहानियां नाम से अपने संग्रह प्रकाशित करवाए थे। कहा जा सकता है कि आधुनिक मुद्रण में बच्चों की हिंदी में पहली किताबें वही थीं।

शुरुआती दिनों में हमारा बाल साहित्य पंचतंत्र, हितोपदेष, जातक, पौराणिक व दंतकथाओं तक ही सीमित रहा। कहा गया कि बाजार उभार में है, सो प्रकाशक ऐसा सुरक्षित रास्ता पकड़ना चाहते हैं जहां उन्हें घाटा न लगे। इक्कीसवीं सदी में वैश्वीकरण ने पूरी दुनिया के दरवाजे एक-दूसरे के लिए खोल दिए। टीवी, इंटरनेट क्रांति ने सूचना का प्रवाह इतना तीव्र कर दिया कि भारत जैसे देश की बाल पीढ़ी लड़खड़ा-सी गई, पर उसका एक फायदा बाल पुस्तकों को जरूर हुआ- उसकी विषयवस्तु और गुणवत्ता आदि में सुधार आया।

मगर यह विडंबना है कि हिंदी के बड़े लेखक बच्चों के लिए लिखने से बचते हैं, जबकि मराठी, बांग्ला में ऐसा नहीं है। आज जरूरी है कि बच्चों की पठन अभिरुचि में बदलाव, उनकी अपेक्षाओं, अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य आदि को ध्यान में रखकर आंचलिक क्षेत्रों तक शोध हों, लोगों को अंग्रेजी ही नहीं, भारत की अन्य भाषाओं में बाल साहित्य पर हो रहे काम की जानकारी मिले तथा हिंदी के बड़े लेखक बच्चों के लिए लिखें।

सोमवार, 17 जुलाई 2017

why rivers are flooding

छेड़छाड़ से बिफर रही हैं नदियां

                            पंकज चतुर्वेदी

जो देश अभी एक महीने पहले एक-एक बूंद पानी के लिए तरस रहा था, बादल क्या बरसे, आधे से ज्यादा इलाका बाढ़ की चपेट में आ गया। असम जैसे राज्य में साठ से ज्यादा मौत हो चुकी हैं व 25 जिले पूरीत रह जलमग्न है।। असम, बिहार, पूर्वी उ.्रप तो हर साल बारिश में हलकान रहता है,लेकिन इस बार तो गुजरात का सौराश्ट्र और राजस्थान के शेखावटी के रेतीले इलाके भी जलमग्न हैं। पिछले कुछ सालों के आंकड़ें देखें तो पायेंगे कि बारिश की मात्रा भले ही कम हुई है, लेकिन बाढ़ से तबाह हुए इलाके में कई गुना बढ़ौतरी हुई है । कुछ दशकों पहले जिन इलाकों को बाढ़ से मुक्त क्षेत्र माना जाता था, अब वहां की नदियां भी उफन रही हैं और मौसम बीतते ही, उन इलाकों में एक बार फिर पानी का संकट छा जाता है । गंभीरता से देखें तो यह छोटी नदियों के लुप्त होने, बड़ी नदियों पर बांध और मध्यम नदियों के उथले होने का दुष्परिणाम है। बाढ़ अकेले कुछ दिनों की तबाही ही नहीं लाती है, बल्कि वह उस इलाके के विकस को सालेां पीछे ले जाती है ।

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 1951 में बाढ़ ग्रस्त भूमि की माप एक करोड़ हेक्टेयर थी । 1960 में यह बढ़ कर ढ़ाई करोड़ हेक्टेयर हो गई । 1978 में बाढ़ से तबाह जमीन 3.4 करोड़ हेक्टेयर थी और 1980 में यह आंकड़ा चार करोड़ पर पहुंच गया । अभी यह तबाही कोई सात करोड़ हेक्टेयर होने की आशंका है । पिछले साल आई बाढ़ से साढ़े नौ सौ से अधिक लोगों के मरने, तीन लाख मकान ढ़हने और चार लाख हेक्टेयर में खड़ी फसल बह जाने की जानकारी सरकारी सूत्र देते हैं । यह जान कर आश्चर्य होगा कि सूखे और मरुस्थल के लिए कुख्यात राजस्थान भी नदियों के गुस्से से अछूता नहीं रह पाता है ।ं देश में बाढ़ की पहली दस्तक असम में होती है । असम का जीवन कहे जाने वाली ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां मई-जून के मध्य में ही विनाश फैलाने लगती हैं । हर साल लाखों बाढ़ पीड़ित शरणार्थी इधर-उधर भागते है । बाढ़ से उजड़े लोगों को पुनर्वास के नाम पर एक बार फिर वहीं बसा दिया जाता है, जहां छह महीने बाद जल प्लावन होना तय ही होता है । यहां के प्राकृतिक पहाडों की बेतरतीब खुदाई कर हुआ अनियोजित शहरीकरण और सड़कों का निर्माण भी इस राज्य में बाढ़ की बढ़ती तबाही के लिए काफी हद तक दोषी है । सनद रहे वृक्षहीन धरती पर बारिश का पानी सीधा गिरता है और भूमि पर मिट्टी की उपरी परत, गहराई तक छेदता है । यह मिट्टी बह कर नदी-नालों को उथला बना देती है, और थोड़ी ही बारिश में ये उफन जाते हैं । हाल ही में दिल्ली में एनजीटी ने मेट्रो कारपोरेशन को चताया है कि वह यमुना के किनारे  जमा किए गए हजारों ट्रक मलवे को हटवाए। यह पूरे देश में हो रहा है कि विकास कार्याें के दौरान निकली मिट्टी व मलवे को स्थानीय नदी-नालों में चुपके से डाल दिया जा रहा है। और तभी थोड़ी सी बारिश में ही  इन जल निधियों का प्रवाह कम हो जाता है व पानी बस्ती,खेत, ंजगलों में घुसने लगता है।

   देश के कुल बाढ़ प्रभवित क्षेत्र का 16 फीसदी बिहार में है । यहां कोशी, गंड़क, बूढ़ी गंड़क, बाधमती, कमला, महानंदा, गंगा आदि नदियां तबाही लाती हैं । इन नदियों पर तटबंध बनाने का काम केन्दª सरकार से पर्याप्त सहायता नहीं मिलने के कारण अधूरा हैं । यहां बाढ़ का मुख्य कारण नेपाल में हिमालय से निकलने वाली नदियां हैं । ‘‘बिहार का शोक’’ कहे जाने वाली कोशी के उपरी भाग पर कोई 70 किलोमीटर लंबाई का तटबंध नेपाल में है । लेकिन इसके रखरखाव और सुरक्षा पर सालाना खर्च होने वाला कोई 20 करोड़ रूपया बिहार सरकार को झेलना पड़ता है । हालांकि तटबंध भी बाढ़ से निबटने में सफल रहे नहीं हैं । कोशी के तटबंधों के कारण उसके तट पर बसे 400 गांव डूब में आ गए हैं । कोशी की सहयोगी कमला-बलान नदी के तटबंध का तल सील्ट (गाद) के भराव से उंचा हो जाने के कारण बाढ़ की तबाही अब पहले से भी अधिक होती हैं । फरक्का बराज की दोषपूर्ण संरचना के कारण भागलपुर, नौगछिया, कटिहार, मंुगेर, पूर्णिया, सहरसा आदि में बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र बढ़ता जा रहा है । विदित हो आजादी से पहले अंग्रेज सरकार व्दारा बाढ़ नियंत्रण में बड़े बांध या तटबंधों को तकनीकी दृष्टि से उचित नहीं माना था । तत्कालीन गवर्नर हेल्ट की अध्यक्षता में पटना में हुए एक सम्मेलन में डा. राजेन्दªप्रसाद सहित कई विद्वानों ने बाढ़ के विकल्प के रूप में तटबंधों की उपयोगिता को नकारा था । इसके बावजूद आजादी के बाद हर छोटी-बड़ी नदी को बांधने का काम अनवरत जारी है ।
    बगैर सोचे समझे नदी-नालों पर बंधान बनाने के कुप्रभावों के कई उदाहरण पूरे देश में देखने को मिल रहे हैं। वैसे शहरीकरण, वन विनाश और खनन तीन ऐसे प्रमुख कारण हैं, जो बाढ़ विभीषिका में उत्प्रेरक का कार्य कर रहे है । जब प्राकृतिक हरियाली उजाड़ कर कंक्रीट जंगल सजाया जाता है तो जमीन की जल सोखने की क्षमता तो कम होती ही है, साथ ही सतही जल की बहाव क्षमता भी कई गुना बढ़ जाती है । फिर शहरीकरण के कूड़े ने समस्या को बढ़ाया है । यह कूड़ा नालों से होते हुए नदियों में पहुंचता है । फलस्वरूप नदी की जल ग्रहण क्षमता कम होती है ।
   पंजाब और हरियाणा में बाढ़ का कारण जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश में हो रहा जमीन का अनियंत्रित शहरीकरण ही है । इससे वहां भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं और इसका मलवा भी नदियों में ही जाता है । पहाड़ों पर खनन से दोहरा नुकसान है । इससे वहां की हरियाली उजड़ती है और फिर खदानों से निकली धूल और मलवा नदी नालों में अवरोध पैदा करता है । हिमालय से निकलने वाली नदियों के मामले में तो मामला और भी गंभीर हो जाता है । सनद रहे हिमालय, पृथ्वी का सबसे कम उम्र का पहाड़ है । इसकी विकास प्रक्रिया सतत जारी है, तभी इसे ‘‘जीवित-पहाड़’’ भी कहा जाता है । इसकी नवोदित हालत के कारण यहां का बड़ा भाग कठोर-चट्टानें ना हो कर, कोमल मिट्टी है । बारिश या बरफ के पिघलने पर, जब पानी नीचे की ओर बहता है तो साथ में पर्वतीय मिट्टी भी बहा कर लाता है । पर्वतीय नदियों में आई बाढ़ के कारण यह मिट्टी नदी के तटों पर फैल जाती है । इन नदियों का पानी जिस तेजी से चढ़ता है, उसी तेजी से उतर जाता है । इस मिट्टी के कारण नदियों के तट बेहद उपजाऊ हुआ करते हैं । लेकिन अब इन नदियों को जगह-जगह बांधा जा रहा है, सो बेेशकीमती मिट्टी अब बांध्बांधंांेे में ही रुक जाती है और नदियों को उथला बनाती रहती है । साथ ही पहाड़ी नदियों में पानी चढ़ तो जल्दी जाता है, पर उतरता बड़े धीरे-धीरे है ।
  मौजूदा हालात में बाढ़ महज एक प्राकृतिक प्रकोप नहीं, बल्कि मानवजन्य साधनों का त्रासदी है । हकीकत में नदियों के प्राकृतिक बहाव, तरीकों, विभिन्न नदियों के उंचाई-स्तर में अंतर जैसे विशयों का हमारे यहां कभी निश्पक्ष अध्ययन ही नहीं किया गया और इसी का फायदा उठा कर कतिपय ठेकेदार, सीमेंट के कारोबारी और जमीन-लोलुप लोग इस तरह की सलाह देते हैं। पानी को स्थानीय स्तर पर रोकना, नदियों को उथला होने से बचाना, बड़े बांध पर पाबंदी , नदियों के करीबी पहाड़ों पर खुदाई पर रोक और नदियों के प्राकृतिक मार्ग से छेउ़छाड़ को रोकना कुछ ऐसे सामान्य प्रयोग हैं, जोकि बाढ़ सरीखी भीशण विभीशिका का मुंह-तोड़ जवाब हो सकते हैं।
पंकज चतुर्वेदी
फ्लेट यूजी-1, 3/186 राजेन्द्र नगर सेक्टर-2
साहिबाबाद, गाजियाबाद
201005
संपर्क: 9891928376, 011- 26707758(आफिस),



गुरुवार, 13 जुलाई 2017

Kawadiya shoud respect public too

आस्था के साथ सामाजिक सरोकार भी

कांवड़ यात्रा
पंकज चतुर्वेदी

 

 

देहरादून से लेकर दिल्ली और फरीदाबाद से करनाल तक के तीन राज्यों के कोई 70 जिले आगामी 21 जुलाई तक कांवड़ यात्रा को लेकर चिंतित हैं। इस बार अनुमान है कि कोई चार करोड़ कांवड़िये गंगा जल लेने हरिद्वार पहुंच रहे हैं। हाल ही में अमरनाथ यात्रियों पर हमले तथा कश्मीर में सक्रिय आतंकवादियों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के संदीप शर्मा के शामिल होने से सुरक्षा एजेंसियां भी चिंतित हैं।
श्रावण के महीने में हरिद्वार, देवघर (झारखंड), काशी जैसे प्रसिद्ध शिवालयों से पैदल कांवड़ में जल लेकर शिवालयों तक आने की परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है। अभी कुछ साल पहले तक ये कांवड़िये अनुशासन व श्रद्धा में इस तरह डूबे रहते थे कि राह चलते लोग स्वयं ही उनको रास्ता दे दिया करते थे। लेकिन राजनीति में धर्म के घालमेल का असर बीते एक दशक के दौरान कांवड़ यात्रा पर दिखने लगा। पहले संख्या में बढ़ोतरी हुई, फिर उनकी सेवा के नाम पर लगने वाले टेंटों-शिविरों की संख्या बढ़ी। गौरतलब है कि ‘भोलोंÓÓ की सेवा’ÓÓ के सर्वाधिक शिविर दिल्ली में लगते हैं, जबकि कांवड़ियों में दिल्ली वालों की संख्या बामुश्किल 10 फीसदी होती है।
पिछले साल अकेले गाजियाबाद जिले में कांवडि़यों द्वारा रास्ता बंद करने, मारपीट करने, वाहनों को तोड़ने की पचास से ज्यादा घटनाएं हुई थीं। हरिद्वार में तो कुछ विदेशी महिलाओं ने पुलिस में रपट की थी कि उनसे छेड़छाड़ हुई है। बीते एक दशक के दौरान देखा गया है कि कांवड़ यात्रा के दस दिनों में दिल्ली से लेकर हरियाणा-राजस्थान व उधर हरिद्वार को जाने वाली सड़कों पर अराजक कब्जा हो जाता है। इस बार मामला बेहद संवेदनशील है क्योंकि खुफिया एजेंसियां आतंकवादी हमले की आशंका जता रही हैं।
इस बार भी डाक कांवड़ पर पाबंदी, डीजे बजाने पर रोक जैसे जुमले उछाले जा रहे हैं, लेकिन यह तय है कि इनका पालन होना मुश्किल ही होता है। बड़े-बड़े वाहनों पर पूरी सड़क घेर कर, उद्दंडों की तरह डंडा-लाठी-बेसबाल के बल्ले लहराते हुए, श्रद्धा से ज्यादा बेलगाम युवा सड़कों पर आ जाते हैं। कांवड़ यात्रा शुरू होते ही हिंसक घटनाओं की खबरें आती हैं। अधिकांश मामलों में कारण किसी कांवड़िये का जल सड़क पर चल रहे अन्य वाहन से टकरा कर छलकने या सड़क दुर्घटना आदि होता है।

यह जानना जरूरी है कि इनके कारण राष्ट्रीय राजमार्ग पर एक सप्ताह तक पूरी तरह चक्का जाम रहना देश के लिए अरबों रुपए का नुकसान करता है। इस रास्ते में पड़ने वाले 74 कस्बों, शहरों का जनजीवन भी थम जाता है। स्कूलों की छुट्टी करनी पड़ती है और सरकारी दफ्तरों में कामकाज लगभग ना के बराबर होता है। गाजियाबाद में तो लोगों का घर से निकलना दुश्वार हो जाता है। शहर में फल, सब्जी, दूध की आपूर्ति बुरी तरह प्रभावित होती है। आम जनता आस्था के नाम पर यह सब भी सहर्ष सह लेती है लेकिन असल दिक्कत होती है अराजकता से।
राजधानी की विभिन्न संस्थाओं में काम करने वाले कोई सात लाख लोग जीटी रोड के दोनों तरफ बसी गाजियाबाद जिले की विभिन्न कॉलोनियों में रहते हैं। इन सभी लोगों के लिए इन दिनों में कार्यालय जाना त्रासदी से कम नहीं होता। गाजियाबाद-दिल्ली सीमा पर अप्सरा बार्डर पूरी तरह कांवड़ियों की मनमानी की गिरफ्त में रहता है, जबकि इस रास्ते से गुरु तेग बहादुर अस्पताल जाने वाले गंभीर रोगियों की संख्या प्रतिदिन हजारों में होती है।

धर्म, आस्था, पर्व, संकल्प, व्रत, ये सभी भारतीय संस्कृति व लोकजीवन के अभिन्न अंग हैं लेकिन जब यह लोकजीवन के लिए ही अहितकर और धर्म के लिए अरुचिकर हो जाए तो इसकी प्रक्रिया पर विचार करना अत्यावश्यक है। धर्म दूसरों के प्रति संवेदनशील हो, धर्म का पालन करने वाला स्वयं को तकलीफ देकर जन कल्याण की सोचे; यह हिंदू धर्म की मूल भावना है।
जिस तरह कांवड़ियों की संख्या बढ़ रही है, उसको देखते हुए कांवड़ियों का पंजीयन, उनके मार्ग पर पैदल चलने लायक पतली पगडंडी बनाना, महानगरों में कार्यालय व स्कूल के समय में कांवड़ियों के आवागमन पर रोक, कांवड़ लाने की मूल धार्मिक प्रक्रिया का प्रचार-प्रसार, सड़क घेर कर शिविर लगाने पर पाबंदी जैसे कदम लागू करना जरूरी है।
असल में कांवड़ यात्रा अब एक बड़ा व्यवसाय बन गई है। करोड़ों लोगों के लिए टीशर्ट, नेकर, कांवड़, लोटे, सजावटी सामान से लेकर कई वस्तुओं का अपना बाजार है। जरूरत इस बात की है कि प्रशासन खुद के निर्देशों का कड़ाई से पालन करे। साधु-संत भी कांवड़ यात्रा के सात्विक तरीकों के प्रति लोगों को प्रेरित करें।

Annual Flood put asam economy back

बर्बाद होती असम की आर्थिकी

                                 पंकज चतुर्वेदी



अभी तो मॉनसून की शुरु आत ही है और असम के कई जिलों में आई बाढ़ से 95 हजार से अधिक लोग प्रभावित हैं। बुरी तरह पीड़ित दारंग जिले में लगभग 37 हजार लोग बाढ़ की चपेट में हैं। कई इलाकों में कटान से समस्याएं बढ़ी हैं। पूर्वोत्तर के असम राज्य के 14 जिले आने वाले तीन महीने पूरी तरह बाढ़ की चपेट में रहेंगे और कमोबेश यही स्थिति वहां हर साल होती रहती है। हर साल नदियों में आने वाली बाढ़ की विभीषिका की वजह से राज्य का लगभग 40 फीसद हिस्सा पस्त-सा रहता है। एक अनुमान के अनुसार इससे हर साल जान-माल की लगभग 200 करोड़ रु पये की क्षति होती है। राज्य में एक साल के नुकसान के बाद सिर्फ मूलभूत सुविधाएं खड़ी करने में ही दस साल से ज्यादा का समय लग जाता है जबकि नुकसान का सिलसिला हर साल जारी रहता है। केंद्र और राज्य की सरकारें बाढ़ के बाद मुआवजा बांटने में तत्परता दिखाती है। यह दुखद ही है कि आजादी के लगभग 70 साल बाद भी हम राज्य के लिए बाढ़ नियंतण्रकी कोई मुकम्मल योजना नहीं दे पाए हैं। यदि इस अवधि में राज्य में बाढ़ से हुए नुकसान व बांटी गई राहत राशि को जोड़ें तो पाएंगे कि इतनी धनराशि में एक नया और सुरक्षित असम खड़ा किया जा सकता था। 

नीतियां ऐसी बनें कि बाढ़ और असम में हर साल तबाही मचाने वाली ब्रह्मपुत्र और बराक नदियां और उनकी लगभग 48 सहायक नदियां और उनसे जुड़ी असंख्य सरिताओं पर सिंचाई व बिजली उत्पादन परियोजनाओं के अलावा इनके जल प्रवाह को आबादी में घुसने से रोकने की योजनाएं बने। जिसकी मांग लंबे समय से उठती रही है। असम की अर्थव्यवस्था का मूलाधार खेती-किसानी ही है, और बाढ़ का पानी हर साल लाखों हेक्टेयर में खड़ी फसल को नष्ट कर देता है। ऐसे में यहां का किसान कभी भी कर्ज से उबर ही नहीं पाता है। एक बात और यह कि ब्रह्मपुत्र नदी के प्रवाह का अनुमान लगाना भी बेहद कठिन है। इसकी धारा लगातार और तेजी से बदलती रहती है। परिणामस्वरूप भूमि का कटाव, उपजाऊ जमीन के क्षरण से नुकसान बड़े पैमाने पर होता रहता है। यह क्षेत्र भूकंपग्रस्त है और यहां हल्के-फुल्के झटके अक्सर महसूस किए जाते हैं। भूकंप की वजह से जमीन खिसकने की घटनाएं भी यहां की खेती-किसानी को प्रभावित करती है। इस क्षेत्र की मुख्य फसलें धान, जूट, सरसो, दालें व गन्ना हैं। धान व जूट की खेती का समय ठीक बाढ़ के दिनों का ही होता है। यहां धान की खेती का 92 प्रतिशत आहू, साली बाओ और बोडो किस्म की धान का है और इनका बड़ा हिस्सा हर साल बाढ़ में धुल जाता है। असम में मई से लेकर सितम्बर तक बाढ़ रहती है और इसकी चपेट में तीन से पांच लाख हेक्टेयर खेत आते हैं। हालांकि, खेती के तरीकों में बदलाव और जंगलों का बेतरतीब दोहन जैसी मानव-निर्मिंत दुर्घटनाओं ने जमीन के नुकसान के खतरे का दोगुना कर दिया है। दुनिया में नदियों पर बने सबसे बड़े द्वीप माजुली पर नदी के बहाव के कारण जमीन कटान का सबसे अधिक असर पड़ा है। बाढ़ का असर यहां के वनों व वन्य जीवों पर भी पड़ता है। हर साल कांजीरंगा व अन्य संरक्षित वनों में गैंडा जैसे संरक्षित जानवर भी मारे जाते हैं। वहीं दूसरी ओर, इससे पेड़-पौधों को बड़े पैमाने पर नुकसान होता है। राज्य में नदी पर बनाए गए अधिकांश तटबंध व बांध 60 के दशक में बनाए गए थे। अब वे बढ़ते पानी को रोक पाने में असमर्थ हैं। उनमें गाद भी जमा हो गई है, जिसकी नियमित सफाई की कोई व्यवस्था नहीं है। पिछले साल पहली बारिश के दबाव में 50 से अधिक स्थानों पर ये बांध टूटे थे। इस साल पहले ही महीने में 27 जगहों पर मेड़ टूटने से जलनिधि के गांव में फैलने की खबर है। ब्रह्मपुत्र घाटी में तट-कटाव और बाढ़ प्रबंध के उपायों की योजना बनाने और उसे लागू करने के लिए दिसम्बर 1981 में ब्रह्मपुत्र बोर्ड की स्थापना की गई थी। बोर्ड ने ब्रह्मपुत्र व बराक की सहायक नदियों से संबंधित योजना कई साल पहले तैयार भी कर ली थी। केंद्र सरकार के अधीन एक बाढ़ नियंतण्रमहकमा कई सालों से काम कर रहा है और उसके रिकार्ड में ब्रह्मपुत्र घाटी देश के सर्वाधिक बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में से हैं। इन महकमों ने इस दिशा में अभी तक क्या कुछ किया? असम को सालाना बाढ़ के प्रकोप से बचाने के लिए ब्रह्मपुत्र व उसकी सहायक नदियों की गाद सफाई, पुराने बांध व तटबंधों की सफाई, नये बांधों का निर्माण जरूरी है। लेकिन सियासी खींचतान के चलते जहां जनता ब्रह्मपुत्र के कहर को अपनी नियति मान बैठी है, वहीं नेता एक-दूसरे पर आरोप मंढ़ रहे हैं।

floride making disable in MP

दूषित पानी पीने को अभिशप्त

मध्य प्रदेश के सवा दर्जन से ज्यादा जिलों में ग्रामीण वैसा पानी पीने को मजबूर हैं जिसमें फ्लोरोसिस का आधिक्य है और जिससे विकलांगता बढ़ रही है

दो दशक पहले मध्य प्रदेश में मंडला जिले के तिलक्ष्पानी के बाशिंदों का जीवन देश के अन्य हजारों आदिवासी गांवों की ही तरह था। वहां थोड़ी बहुत दिक्कत पानी की जरूर थी, लेकिन अचानक अफसरों को इन आदिवासियों की जल समस्या खटकने लगी। तुरत-फुरत हैंडपंप रोप दिए गए, लेकिन उन्हें क्या पता था कि यह जल जीवनदायी नहीं, जहर है। महज 542 की आबादी वाले इस गांव में 85 बच्चे विकलांग हो गए। सन दो हजार तक की रिपोर्ट बताती है कि यहां तीन से बारह साल के अधिकांश बच्चों के हाथ-पैर टेढ़े हैं। वे घिसट-घिसट कर चलते हैं और उनकी हड्डियों और जोड़ों में असहनीय दर्द रहता है। जब मीडिया में शोर मचा तो हैंडपंप बंद किए गए, लेकिन तब तक हालात बिगड़ चुके थे। अब भले ही आज वहां अंग टेढ़े होने की शिकायत न हो, लेकिन दांतों की खराबी गांव के हर वाशिंदे की त्रसदी है। यह हृदय विदारक कहानी अकेले तिलक्ष्पानी की ही नहीं है। मध्य प्रदेश के 15 जिलों के 80 विकास खंडों के कोई 14 हजार गांवों की सूरत लगभग ऐसे ही है। इनमें 2,286 गांव अत्यधिक प्रभावित और 5,402 संवेदनशील कहे गए हैं। यह बात हाल ही में राज्य के स्वास्थ्य विभाग की ओर से केंद्र सरकार को भेजी रिपोर्ट में स्वीकर की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रदेश में फ्लोरोसिस बेकाबू होता जा रहा है। हालांकि इस समस्या को उपजाने में समाज के उन्हीं लोगों का योगदान अधिक रहा है, जो इन दिनों इसके निदान का एकमात्र जरिया भूगर्भ जल दोहन बता रहे हैं। 1टेक्नोलॉजी मिशन नामक करामाती केंद्र सरकार पोषित प्रोजेक्ट के शुरुआती दिनों की बात है। नेता-इंजीनियर की साझा लॉबी गांव-गांव में ट्रक पर लदी बोरिंग मशीनें लिए घूमती थी। जहां जिसने कहा कि पानी की दिक्कत है, तत्काल जमीन की छाती छेद कर नलकूप रोप दिए गए। हां, जनता की वाह-वाही तो मिलती ही, जो वोट की फसल बन कर कटती भी थी यानी एक तीर से दो शिकार-नोट भी और वोट भी। मगर जनता तो जानती नहीं थी और हैंडपंप मंडली जानबूझ कर अनभिज्ञ बनी रही कि इस तीर से दो नहीं तीन शिकार हो रहे हैं। बगैर जांच परख के लगाए गए नलकूपों ने पानी के साथ-साथ वह बीमारियां भी उगलीं, जिनसे लोगों की अगली पीढ़ियां भी अछूती नहीं रहीं। ऐसा ही एक विकार पानी में फ्लोराइड के आधिक्य के कारण उपजा। फ्लोराइड पानी का एक स्वाभाविक-प्राकृतिक अंश है और इसकी 0.5 से 1.5 पीपीएम मात्र मान्य है लेकिन मध्य प्रदेश के हजारों हैंडपंपों से निकले पानी में यह मात्र 4.66 से 10 पीपीएम और उससे भी अधिक है। पाताल का पानी पी-पी कर राज्य के ये 14 जिले अब विकलांगों का जमावड़ा बन चुके हैं। इनमें रतलाम, बैतूल, रायसेन, राजगढ़, मंडला, सीहोर, धार, अलीराजपुर, झाबुआ, खरगौन, छिंदवाड़ा, डिंडोरी, सिवनी, शाजापुर और उज्जैन जैसे जिले शामिल हैं। इसके अलावा भी कई ऐसे जिले हैं जहां कुछ या बहुत से गांव फ्लोराइड के आधिक्य से तंग हैं। समस्या इतनी गंभीर है और राज्य सरकार अपने इस मद के बजट का बड़ा हिस्सा महज सर्वे में खर्च करती है। फिर कुछ गांवों में विटामिन या कैल्शियम बांट दिया जाता है। दुखद है कि समस्याग्रस्त गांवों में पेयजल की वैकल्पिक या सुरक्षित व्यवस्था करने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाए जाते।1फ्लोराइड की थोड़ी मात्र दांतों के उचित विकास के लिए आवश्यक हैं। परंतु इसकी मात्र निर्धारित सीमा से अधिक होने पर दांतों में गंदे धब्बे हो जाते हैं। लगातार अधिक फ्लोराइड पानी के साथ शरीर में जाते रहने से रीढ़, टांगों, पसलियों और खोपड़ी की हड्डियां प्रभावित होती हैं। ये हड्डियां बढ़ जाती हैं, जकड़ और झुक जाती हैं। जरा सा दवाब पड़ने पर ये टूट भी सकती हैं। ‘फ्लोरोसिस’ के नाम से पहचाने वाले इस रोग का कोई इलाज नहीं है।1मध्य प्रदेश के झाबुआ, सिवनी, शिवपुरी, छतरपुर, बैतूल, मंडला और उज्जैन व छत्तीसगढ़ के बस्तर जिलों के भूमिगत पानी में फ्लोराइड की मात्र निर्धारित सीमा से बहुत अधिक है। आदिवासी बाहुल्य झाबुआ जिले के 78 गांवों में 178 हैंडपंप फ्लोराइड आधिक्य के कारण बंद किया जाना सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज है, लेकिन उन सभी से पानी खींचा जाना यथावत जारी है। नानपुर कस्बे के सभी हैंडपंपों से निकलने वाले पानी को पीने के अयोग्य घोषित किया गया है। जब सरकारी अमले उन्हें बंद करवाने पहुंचे तो जनता ने उन्हें खदेड़ दिया। ठीक यही बड़ी, राजावट, लक्षमणी, ढोलखेड़ा, सेजगांव और तीती में भी हुआ। चूंकि यहां पेय जल के अन्य कोई स्नोत शेष नहीं बचे हैं। सो हैंडपंप बंद होने पर जनता को नदी-पोखरों का पानी पीना होगा, जिससे हैजा,आंत्रशोथ,पीलिया जैसी बीमारियां होंगी। इससे अच्छा वे फ्लोरोसिस से तिल-तिल मरना मानते हैं। बगैर वैकल्पिक व्यवस्था किए फ्लोराइड वाले हैंडपंपों को बंद करना जनता को रास नहीं आ रहा है। नतीजतन जिले के हर गांव में 20 से 25 फीसदी लोग पीले दांत, टेढ़ी-मेढ़ी हड्डियों वाले हैं। चूंिक कहीं भी पेय जल के लिए और कोई व्यवस्था है नहीं है, सो जनता जान कर भी जहर पी रही है। कई गांवों के हालात तो इतने बदतर हैं कि वहां मवेशी भी फ्लोराइड की चपेट में आ गए हैं। मेडिकल रिपोर्ट बताती है कि गाय-भैंसों के दूध में फ्लोराइड की मात्र बेतहाशा बढ़ी हुई्र है, जिसका सेवन साक्षात विकलांगता को आमंत्रण देना है। ऐसी कई और रिपोटेर्ं भी महज सरकारी लाल बस्तों में धूल खा रही हैं। जहां एक तरफ लाखों लोग फ्लोरोसिस के अभिशाप से घिसट रहे हैं, वहीं प्रदेश के लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग की रुचि अधिक से अधिक ‘फ्लोरोडीशन संयंत्र’ खरीदने में है। यह किसी से छिपा नहीं है कि सरकारी खरीद-फरोख्त में किनके और कैसे वारे-न्यारे होते हैं। इस बात को सभी स्वीकारते हैं कि जहां फ्लोरोसिस का आतंक इतना व्यापक हो, वहां ये इक्का-दुक्का संयंत्र फिजूल ही होते हैं। फ्लोराइड से निबटने में ‘नालगोंडा विधि’ खासी कारगर रही है। इससे दस लीटर प्रति व्यक्ति हर रोज के हिसाब छह सदस्यों के एक परिवार को साल भर तक पानी शुद्ध करने का खर्चा मात्र 15 से 20 रुपये आता है। इसका उपयोग आधे घंटे की ट्रेनिंग के बाद लोग अपने ही घर में कर सकते हैं। काश सरकार ने इस दिशा में कुछ सार्थक प्रयास किए होते।

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

The smell of rotten system in onion

आफत बन गई प्याज की बंपर फसल

पंकज चतुर्वेदी

बुंदेलखंड के छतरपुर जिले का एक छोटा सा कस्बा है हरपालपुर, जिसकी हर गली-मुहल्ला इन दिनों प्याज के सड़ने की बदबू से तंग है। असल में हुआ यह कि कोई 2700 कुंटल प्याज ले कर एक मालगाड़ी यहां के रेलवे स्टेशन पर आई और माल को खुले में उतार दिया गया। अगली ही रात जमकर पानी बरसा और दो दिन बाद तगड़ी धूप निकल आई। जिला प्रशासन के पास इस माल को लाद कर गंतव्य तक पहुंचाने के लिए ना तो समय था और ना ही ट्रक व मजदूर। अफसरों ने कुछ ट्रकों को जबरदस्ती जब्त भी किया लेकिन तब तक प्रकृति ने अपना खेल दिखा दिया। जब हालात नियंत्रण के बाहर हो गए तो एक बुलडोजर मंगवा कर सड़े प्याज को हटवा दिया गया। यही नहीं प्याज का दरबार आम लेागों के लिए खोल दिया गया कि जो जितना चाहे उठा कर ले जाए। हालांकि यह कोई धर्मार्थ काम नहीं था, प्याज सड़ने का ठीकरा कर्मचारियों पर ना फूटे, उससे बेहतर है कि अज्ञात आदमियों पर चोरी का आरोप लगा दिया जाए । ना तो यह मध्यप्रदेश का एक मात्र ऐसा ‘हरपालपुर’ है और ना ही धरती के आशीश व कियसान के श्रम-फल की ऐसी दुर्गति का पहला उदाहरण।

मध्यपदेश में ऐसे हालात लगभग सभी उपज मंडियो, रेलवे स्टेशन और गोदामों के हैं, जहां सड़कों पर प्याज मारा-मारा घूम रहा है और असली किसान अपना माल बेचने के लिए मंडी के बाहर मारा-मारा।  सरकार आठ रूपए किलो प्याज खरीद रही है और सरकारी राशन की दुकानों पर तीन रूपए किलो बिकवा रही है। उधर बारिश में खराब हो गए प्याज को ग्राहक खरीद नहीं रहे हैं, राशन की दुकान वाले रो रहे हैं कि उन्हें आधे सउ़े प्याज दिए जा रहे हैं जिसका घाटा उनके सिर-माथे होगा। वैसे भी संसाधन इतने सीमित हैं कि ना तो इतना प्याज राशन की दुकानों तक पहुंच पा रहा है और ना ही ग्राहक भी इतना माल खरीद पा रहा है। उधर बरसात की झड़ी षुरू हो गई है और राज्य की बड़ी मंडियों में पांच सौ तक ट्रैक्टर-ट्राली की लाईनें लगी हैं किसान का नंबर दो-तीन दिन में आता है और तब तक यदि बरसात हो गई तो उसका माल सड़ जाता है।  आए रोज मंडियों के बाहर किसान प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन मंडी की भी तो सीमा है ।
अभी छह महीने पहले ही बस्तर में मिर्च की केश क्राप बंपर हुई। जब किसान उसे  बाजार में ले कर गया तो रू. 15 से 20 प्रति किलो वाली हरी मिर्च के दाम पांच-छह रूप्ए भी नहीं मिले हालात यह है कि अब तुड़ाई व परिवहन की कीमत भी नहीं मिल रही है। याद करे कुछ महीनों पहले बाजार में प्याज की कमी इन दिनों समाज से ज्यादा सियासत, लेखन का मसला बन गया था। जब-तब ऐसी दिक्कतें खड़ी होती हैं निर्यात पर रोक, आयात पर जोर, सरकार और विरोधी दलों द्वारा कम कीमत पर स्टॉल लागने जैसे तदर्थ प्रयोग होते रहते हैं ।

इस बात को बेहद षातिर तरीके से छुपाया जाता है कि खेतों मेे पैदा होने वाली उपज की बाजार में कमी की असली वजह उचित भंडारण, बिचौलियों की अफरात और प्रसंस्करण उद्योगों की आंचलिक क्षेत्रों में गैर मौजूदगी है। उ.प्र के इटावा इलाके में कुछ दिनों पहले तक बीस हजार रूपए कुंटल बिकने वाला लहसुन हजार रूपए से नीचे आ गया है। ठीक यही हाल आलू का है। जिन किसानों ने बैंक से कर्ज ले कर उम्मीदों की फसल बोई थी, वह अब हताशा में बदल चुकी है। इसी साल जनवरी-फरवरी में मध्यप्रदेश के मालवा अंचल की पेटलावद इलाके में इस बार कोई पच्चीस सौ हैक्टेयर में टमाटर बोये गए थे, फसल भी बंपर हुई लेकिन जब किसान माल ले कर मंडी पहंुचा तो पया कि वहां मिल रहे दाम से तो उसकी लागत भी नहीं निकलेगी।  हालत यह रहे कि कई सौ एकड़ में पके टमाटरों को किसान तुड़वाया भी नहीं ।

उत्तर प्रदेश में हर दूसरे साल आलू की इतनी अधिक पैदावार हो जाती है कि बामुश्किल तीन सौ रूपए कुंटल का रेट किसान को मिलता है। राज्य के सभी कोल्ड स्टोरेज ठसा-ठस भरे होते हैं और किसान अपी फसल को खेत में सड़ते देखने को मजबूर होता है। उस समय भी आलू का चिप्स 200 रूप्ए किलो से कम नहीं
मध्यप्रदेश में किसानों ने खेत में प्याज के रूप में सोना बोया था, अपने सपनों को पूरा करने का सोना। लेकिन जब बंपर फसल आई तो सपने कांच की किर्च की तरह बिखर गए और सोना सपने के टूटने के मांनिंद बिखर गया। एक महीने पहले मप्र में अपनी फसल के वाजिब दाम की मांग को ले कर हुआ किसान आंदोलन हिंसक कहो गया था और सरकार ने प्याज को आठ रूपए किलो खरीदने की घोशणा कर दी थी। सरकार अब 15 जुलाई तक मंडीे में आने वाला पूरा प्याज खरीदने जा रही है। 30 जून तक प्रदेश की विभिन्न मंडियों में 60,47,764.96 कुंटल यानि लगभग सात लाख टन प्याज की खरीद हो चुकी है। सनद रहे कि राज्य में हर साल लगभ्र 32 लाख टन प्याज होता है और उसके भंडारण की क्षमता महज तीन लाख टन यानि दस फीसदी से भी कम है। एक बात और वैसे तो भारत चीन के बाद दुनिया का बसे बड़ा प्याज उत्पादक देश है और यहां से हर साल 13 हजार करोड़ टन  प्याज का निर्यात होता है, लेकिन मप्र में पैदा होने वाले प्याज की क्वालिटी निर्यात की गुणवत्ता के अनुरूप नहीं होती। सो यहां का उत्पाद केवल स्थानीय बाजार की मांग ही पूरी करता है। ना ही प्याज उत्पादन करने वाले जिलों में प्याज पर आधारित कोई खाद्य प्रसंस्करण कारखाने लगे हैं। अब प्याज को ज्यादा दिन खुले में रखा भी नहीं जा सकता, सो कई बार किसान को अपनी लागत तो दूर, प्याज खुदाई का पैसा भी नहीं मिलता। ऐसे में वह अपनी दिन-रात की मेहनत की फसल सड़क पर यूं ही फैंक देता है। पिछले साल भी राज्य सरकार ने किसान का प्याज छह रूपए किलो में खरीदा था और इसके चलते राजय षासन को कोई सौ करोड़ का घाटा हुआ था। इस बार एक तो आंदोलन का दवाब है, दूसरा प्रदेश की विधान सभा के चुनाव को एक ही साल बचा है, सो सरकार जमकर प्याज खरीद रही है, भले ही उसके पास उसके भंडारण या बिक्री की कोई व्यवस्था नहीं है और अंदाजा है कि इस साल प्याज खरीदी के कारण राज्य सरकार को दो सौ करोड़ की हानि हो सकती है।

सरकार घाटा उठाकर भी प्याज खरीद रही है, उसके बावजूद भी किसान संतुश्ट नहीं है। कहा गया था कि खरीदी गई प्याज के दाम का आधा तत्काल नगद भुगतान होगा और षेश धन बैंक के माध्यम से किसन के खाते में जाएगा। राजधानी भोपाल की करोंद मंडी सहित प्रदेशभर में किसान से माल खरीद कर पर्ची ही तीन-चार दिन बाद दी जा रही है और भुगातन का उसमें कोई उल्लेख नहीं होता। कई किसान पांच दिन तक पंक्तिं खड़े रहे लेकिन उनका नंबर नहीं आ रहा। एक तो ट्रक या ट्राली, जिस पर वह माल लाता है, उसका उतने दिन का किराया हो जाता है, फिर किसान अपने घर गांव से दूर मंडी के सामने खुले में पड़ा रहता है, उसका व्यय और फिर यदि बरसात हो गई तो माल खराब होने का खतरा, ऐसे हालात में किसान मजबूरी में मंडी की जगह स्थानीय व्यापाी को ही चार से पांच रूपए किलोे में माल बेच रहा है।
इसके बावजूद राज्य सरकार के आंकड़ कह रहे हैं कि ग्यारह जिलों- सीहोर, राजगढ़, इंदौर, झाबुआ,उज्जैन, देवास, रतलाम, षाजापुर, आगर-मालवा, शिवपुरी और रीवा में प्याज बुवाई के रकवे से कई गुणा ज्यादा प्याज मंडी में खरीद लिया गया। असल में हो है रहा है कि थोक व्यापारी खुले बाजार से या फिर पिछले साल वेयर हाउस में रखे प्याज को तीन रूपए किलो खरीद रहा है, एक रूपए किलो परिवहन की और एक रूपए किलो रिश्वत लगा कर आठ रूपए में माल बेच रही है और इस तरह उसे बगैर खेती किए तीन रूपए प्रति किलो का मुनाफा हो रहा है। अब इस मामले की जांच भी हो रही है, लेकिन किसान तो खुद को ठगा सा ही महसूस कर रहा है।
यह मामला ना तो केवल मप्र का है और ना ही केवल प्याज का। देश के अलग-अलग हिस्सों में हर साल टमाटर, आलू, मिर्ची या अंगूर और भी अन्य फसलों के साथ ऐसा होता रहता है। भरमार से बंटाधार की इस समस्या के निराकरण के लिए भंडारण की व्यवस्था को बढ़ाना तो जरूरी ही है, साथ ही जिला स्तार पर प्रसंस्करण कारखाने लगाने,  सरकारी खरीदी केंद्र ग्राम स्तर पर स्थापित करने, किसान की फसल को निर्यात के लायक उन्नत बनाने के प्रयास अनिवार्य है। किसान को केवल उसके उत्पाद का वाजिब दाम ही नहीं चाहिए, वह यह भी चाहता है कि उसके उत्पाद का सड़कर या फिंक कर अनादर ना हो और उससे लोगों का पेट भरे।

बुधवार, 5 जुलाई 2017

Depression becoming killing machine for India

मानसिक रोगियों की कौन ले सुध

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के मुताबिक देश में पागलखानों की हालत बदतर है। इन्हेंसुधारने के लिए कुछ साल पहले बेंगलुरु के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ और चेतना विज्ञान संस्थान में एक परियोजना शुरू की गई थी, लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं निकला। 1987 में सुप्रीम कोर्ट भी मानसिक अस्पतालों में बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने के निर्देश दिए थे। आदेश के बाद दो-चार दिन तो सरकार सक्रिय दिखी, पर हालात तनिक भी नहीं सुधारे

 

विश्व स्वास्थ्य संगठन और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के एक ताजा शोध से पता चला है कि आज देश में चौथी सबसे बड़ी बीमारी अवसाद या डिप्रेशन है। कोई साढ़े पांच करोड़ लोग इसके शिकार हैं। इनमें से आधे से ज्यादा लोगों को यह पता नहीं होगा कि उन्हें किसी इलाज की जरूरत है। इसकी आशंका है कि 2020 तक देश की सबसे बड़ी दूसरी बीमारी हार्ट अटैक के बाद अवसाद हो सकता है। बढ़ती जरूरतें, जिंदगी में भागदौड़, रिश्तों के बंधन ढीले होना; इस दौर की कुछ ऐसी त्रसदियां हैं जो इंसान को भीतर ही भीतर खाए जा रही है। ये सब ऐसे विकारों को आमंत्रित कर रहा है, जिनके प्रारंभिक लक्षण नजर आते नहीं हैं, जब मर्ज बढ़ जाता है तो बहुत देर हो चुकी होती है। विडंबना है कि सरकार में बैठे नीति-निर्धारक मानसिक बीमारियों को अब भी गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। 1इसे हास्यास्पद कहें या शर्म कि ‘जय विझान’ के युग में मनोविकारों को एक रोग के बनिस्पत ऊपरी व्याधि या नियति समझने वालों की संख्या बहुत अधिक है। तभी ऐसे रोगों के इलाज के लिए डॉक्टरों के बजाय पीर-फकीरों, मजार-मंदिरों पर अधिक भीड़ होती है। सामान्य डॉक्टर मानसिक रोगों को पहचानने और रोगियों को मनोचिकित्सक के पास भेजने में असमर्थ रहते हैं। इसके चलते ओझा, पुरोहित, मौलवी, तथाकथित यौन विशेषज्ञ, अवैध रूप से मनोचिकित्सक का दुष्कार्य कर रहे हैं। ‘नंग-धड़ंग, सिर पर कचरे का बोझ, जहां कहीं जगह मिली सो गए, कुछ भी खा लिया, किसी ने छेड़ा तो पत्थर चला दिए ।’ भारत के हर शहर-कस्बे में ऐसे महिला या पुरुष चरित्रों की मौजूदगी लगभग जरूरी है। आम लोगों की निगाह में ये भूत-प्रेत के प्रकोपधारी, मजनू, बदमाश या फिर देशी-विदेशी जासूस होते हैं। यह विडंबना है कि वे जो हैं, उसे न तो उनके अपने स्वीकारते हैं और न ही पराए। केंद्र सरकार ने आजादी के बाद पहली बार राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति की घोषणा की है। मानसिक रूप से बीमार लोगों की देखभाल के लिए बनाए गए पूर्व कानून जैसे भारतीय पागलखाना अधिनियम, 1858 और भारतीय पागलपन अधिनियम, 1912 में मानवाधिकार के पहलू की उपेक्षा की गई थी और केवल पागलखाने में भर्ती मरीजों पर ही विचार किया गया था। पागलपन कानून 1912 के तहत अदालती प्रमाण पत्र के जरिए मरीजों को केवल पागलखानों में इलाज की सीमा तय की गई थी, लेकिन 1987 में इस कानून में बदलाव किया गया और मरीज को खुद की इच्छा पर भर्ती होने, सामान्य अस्पतालों में भी इलाज कराने जैसी सुविधाएं दी गई हैं। आजादी के बाद भारत में इस संबंध में पहला कानून बनाने में 31 वर्ष का समय लगा और उसके नौ वर्ष के बाद मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 अस्तित्व में आया। परंतु इस अधिनियम में कई खामियां होने के कारण इसे कभी किसी राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेश में लागू नहीं किया गया। बहरहाल, अवसाद केवल रोगी के परिवार के लिए ही चिंता का विषय नहीं है, यह देश के विकास की गति में भी बाधक है। अनुमान है कि अवसाद के कारण यदि किसी व्यक्ति की कार्य क्षमता प्रभवित होती है तो वह अर्थव्यवस्था को औसतन दस हाजर डॉलर प्रति वर्ष का नुकसान करता है। भारत में 15 साल से कम उम्र के बच्चे भी अवसाद के शिकार हो रहे हैं। वैसे 1982 में मानसिक स्वास्थ कार्यक्रम शुरू हुआ था। एक दस्तावेज के मुताबिक करीब तेरह करोड़ भारतीयों को किसी न किसी रूप में मानसिक चिकित्सा की जरूरत है। इनमें अवसादग्रस्त सबसे ज्यादा हैं। प्रत्येक हजार जनसंख्या में 10 से 20 लोग जटिल मानसिक रोगों से ग्रस्त हैं जबकि दुखदाई और आर्थिक अक्षमता पैदा करने वाले भावुक रोगों के शिकार लोगों की संख्या इसका तीन से पांच गुना है। आम डॉक्टर के पास आने वाले आधे मरीज उदासी,भूख, नींद और सेक्स इच्छा में कमी आना, हस्त मैथुन, स्वप्न दोष जैसी शिकायतें ले कर आते हैं। वास्तव में वे किसी न किसी मानसिक रोग के शिकार होते हैं।1इतने लोगों के इलाज के लिए कोई 32 हजार मनोचिकित्सकों की जरूरत है, जबकि देशभर में इनकी संख्या बामुश्किल साढ़े तीन हजार है और इनमें भी तीन हजार तो चार महानगरों तक ही सिमटे हैं। दिनों दिन बढ़ रही भौतिक लिप्सा और उससे उपजे तनावों व भागमभाग की जिंदगी के चलते भारत में मानसिक रोगियों की संख्या पश्चिमी देशों से भी ऊपर जा रही है। विशेष रूप से महानगरों में ऐसे रोग कुछ अधिक ही गहराई से पैठ कर चुके हैं। दहशत और भय के इस रूप को फोबिया कहा जाता है। इसकी शुरुआत होती है चिड़चिड़ेपन से। बात-बात पर बिगड़ना और फिर जल्द से लाल-पीला हो जाना ऐसे ‘रोगियों’ की आदत बन जाती हैं। काम से जी चुराना, बहस करना और खुद को सच्चा साबित करना इनके प्रारंभिक लक्षण हैं। भय की कल्पनाएं इन लोगों को इतना जकड़ लेती हैं कि उनका व्यवहार बदल जाता है। जहां एक ओर मर्ज बढ़ता जा रहा है, वहीं हमारे देश के मानसिक रोग अस्पताल सौ साल पुराने पागलखाने के खौफनाक रूप से ही जाने जाते हैं। ये जर्जर, डरावनी और संदिग्ध इमारतें मानसिक रोगियों की यंत्रणाओं, उनके प्रति समाज के उपेक्षित रवैये और सरकारी उदासीनता की मूक गवाह हैं। 1कार्यक्रम,1982 में रोगियों के पुनर्वास, इसके कारणों पर नियंत्रण, दूरस्थ अंचलों के डॉक्टरों को विशेष ट्रेनिंग सहित न जाने क्या-क्या लुभावने कार्यक्रम दर्ज हैं लेकिन जमीन पर मानसिक रोगी सरकार व समाज दोनों की हेय दृष्टि से आहत है। देश में केवल 43 सरकारी मानसिक रोग अस्पताल हैं, इनमें से मनोवैज्ञानिक इलाज की व्यवस्था महज तीन जगह ही है। इनमें 21,000 बिस्तर हैं जो जरूरत का एक फीसद भी नहीं है। देशभर में महज 2,219 मानसिक रोग चिकित्सक उपलब्ध हैं जबकि जरूरत है 9,696 की। यहां तक कि जरूरत की पचास फीसद नर्स भी उपलब्ध नहीं हैं। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ कार्यक्रम की एक रिपोर्ट बताती है कि ऐसे रोगियों की बड़ी संख्या इलाज का खर्च उठाने में असमर्थ है। सरकारी अस्पतालों के नारकीय माहौल में जाना उनकी मजबूरी होता है। अनुमान है कि भारत में कोई सात करोड़ लोग छोटे-बड़े मानसिक रोग के शिकार हैं जबकि देश के स्वास्थ्य बजट का महज 0.06 फीसद ही मानसिक रोग के मद में जाता है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग मानता रहा है कि देश भर के पागलखानों की हालत बदतर है। इसे सुधारने के लिए कुछ साल पहले बेंगलुरु के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ और चेतना विज्ञान संस्थान (निमहान्स) में एक परियोजना शुरू की गई थी, लेकिन उसके किसी सकारात्मक परिणाम की जानकारी नहीं है। आज भी अधिकांश मानसिक रोगी बगैर इलाज के अपने हाल में अमानवीय हालात में जीने को मजबूर हैं।

मंगलवार, 4 जुलाई 2017

Rivers do not have depth to bear a good Mansoon rain

कहर बरपातीं नदियां

देश में इस बात को ले कर हर्ष है कि इस बार मानसून अच्छा होगा-यहां तक कि सदी के सबसे बेहतरीन मानसूनों में शुमार किए जा सकने वाले मानसून की भविष्यवाणी है, मौसम विभाग की। बारिश पानी की बूंदें ही नहीं ले कर आती बल्कि समृद्धि, संपन्नता की दस्तक होती है। लेकिन बरसात औसत से छह फीसदी ज्यादा हो जाए तो हमारी नदियों में इतनी जगह नहीं है कि वे उफान को सहेज पाएं। नतीजतन बाढ़ और तबाही के मंजर उतने ही भयावह हो सकते हैं जितने पानी को तरसते बुंदेलखंड या मराठवाड़ा के मंजर। पिछले साल मद्रास की बाढ़ भी एक बानगी है यह जानने की कि शहर के बीच से बहने वाली नदियों को लोगों ने जब उथला बनाया तो उनका पानी घरों में घुस गया था। सनद रहे कि वृक्षहीन धरती पर बारिश का पानी सीधा गिरता है, और भूमि पर मिट्टी की ऊपरी परत को गहराई तक छेदता है। यह मिट्टी बह कर नदी-नालों को उथला बना देती है, और थोड़ी ही बारिश में ये उफन जाते हैं। 

हाल में दिल्ली में एनजीटी ने मेट्रो कॉरपोरेशन को चताया है कि यमुना किनारे जमा किए गए हजारों ट्रक मलवे को हटवाए। भारतीय नदियों के मार्ग से हर साल 1645 घन किलोलीटर पानी बहता है, जो दुनिया की कुल नदियों का 4.445 प्रतिशत है। आंकडों के आधार पर हम पानी के मामले में पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा समृद्ध हैं, लेकिन चिंता का विषय यह है कि पूरे पानी का कोई 85 फीसदी बारिश के तीन महीनों में समुद्र की ओर बह जाता है, और नदियां सूखी रह जाती हैं। नदियों के सामने खड़े इस संकट ने मानवता के लिए चेतावनी का बिगुल बजा दिया है, जाहिर है कि बगैर जल के जीवन की कल्पना संभव नहीं है। हमारी नदियों के सामने मूल रूप से तीन तरह के संकट हैं-पानी की कमी, मिट्टी का आधिक्य और प्रदूषण। मानसून के तीन महीनों में बामुश्किल चालीस दिन पानी बरसना या फिर एक सप्ताह में ही अंधाधुंध बारिश हो जाना या फिर बेहद कम बरसना, ये सभी परिस्थितियां नदियों के लिए अस्तित्व का संकट पैदा कर रही हैं। सिंचाई व अन्य कायरे के लिए नदियों के अधिक दोहन, बांध आदि के कारण नदियों के प्राकृतिक स्वरूप के साथ भी छेड़छाड़ हुई और इसके चलते नदियों में पानी कम हो रहा है। नदियां अपने साथ अपने रास्ते की मिट्टी, चट्टानों के टुकड़े और बहुत सा खनिज बहा कर लाती हैं। पहाड़ी व नदियों के मार्ग पर अंधाधुंध जंगल कटाई, खनन, पहाड़ों को काटने, विस्फोटकों के इस्तेमाल आदि के चलते थेड़ी सी बारिश में ही बहुत सा मलवा बह कर नदियों में गिर जाता है। परिणामस्वरूप नदियां उथली हो रही हैं, उनके रास्ते बदल रहे हैं और थोड़ा सा पानी आने पर ही वे बाढ़ का रूप ले लेती हैं। यह भी खतरनाक है कि सरकार व समाज इंतजार करता है कि नदी सूखे व हम उसकी छोड़ी हुई जमीन पर कब्जा कर लें। इससे नदियों के पाट संकरे हो रहे हैं, उनके करीब बसावट बढने से प्रदूषण की मात्रा बढ़ रही है। आधुनिक युग में नदियों को सबसे बड़ा खतरा प्रदूषण से है। कल-कारखानों की निकासी, घरों की गंदगी, खेतों में मिलाए जा रहे रासायनिक दवा और खादों का हिस्सा, भूमि कटाव के अलावा अन्य अनेक ऐसे कारक हैं जो नदियों के जल को जहर बना रहे हैं। आज देश की 70 फीसदी नदियां प्रदूषित हैं। इनमें गुजरात की अमलाखेडी, साबरमती और खारी, हरियाणा की मारकंडा, मप्र की खान, उप्र की काली और हिंडन, आंध्र की मुंसी, दिल्ली में यमुना और महाराष्ट्र की भीमा मिलाकर 10 नदियां सबसे ज्यादा प्रदूषित हैं। देश की 27 नदियां नदी के मानक में भी रखने लायक नहीं बची हैं। वैसे गंगा हो या यमुना, गोमती, नर्मदा, ताप्ती, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी, ब्रrापुत्र, झेलम, सतलुज, चिनाव, रावी, व्यास, पार्वती, हरदा, कोसी, गंडगोला, मसैहा, वरुणा हो या बेतवा, ढौंक, डेकन, डागरा, रमजान, दामोदर, सुवर्णेखा, सरयू हो या रामगंगा, गौला हो या सरसिया, पुनपुन, बूढ़ी गंडक हो या गंडक, कमला हो या फिर सोन हो या भगीरथी या फिर इनकी सहायक, कमोबेश सभी प्रदूषित हैं। इस कारण से हर साल 600 करोड़ रुपये के बराबर सात करोड़ तीस लाख मानव दिवसों की हानि होती है। जब नदियों के पारंपरिक मार्ग सिकुड़ रहे हैं, जब उनकी गहराई कम हो रही है, जब उनकी अविरल धारा पर बंधन लगाए जा रहे हैं, तो जाहिर है ऐसे में नदियां एक अच्छे मानसून को वहन कर नहीं पाती हैं, शहरों पर कहर बरपाने के साथ ही उफन कर गांव-बस्ती-खेत में तबाही मचा देती हैं।

Onion has become frozen



जहां पर आफत बन गई है प्याज की बंपर फसल

बुंदेलखंड के छतरपुर जिले का एक छोटा सा कस्बा है हरपालपुर, जिसका हर गली-मुहल्ला इन दिनों प्याज के सड़ने की बदबू से तंग है। लगभग 2,700 क्विंटल प्याज लेकर एक मालगाड़ी यहां के रेलवे स्टेशन पर आई और माल को खुले में उतार दिया गया। अगली ही रात जमकर पानी बरसा और दो दिन बाद तगड़ी धूप निकल आई। जिला प्रशासन के पास इस माल को गंतव्य तक पहुंचाने के लिए न तो समय था और न ही ट्रक व मजदूर। अफसरों ने कुछ ट्रकों को जबर्दस्ती जब्त भी किया, पर तब तक प्रकृति ने अपना खेल दिखा दिया। मध्य प्रदेश में ऐसे हालात लगभग सभी कृषि मंडियों, रेलवे स्टेशनों और गोदामों के हैं। सरकार आठ रुपये किलो प्याज खरीद रही है और सरकारी राशन की दुकानों पर तीन रुपये किलो बिकवा रही है। वहां भी खरीदार नहीं हैं। बरसात की झड़ी शुरू हो गई है और राज्य की बड़ी मंडियों में पांच सौ तक ट्रैक्टर-ट्रॉली की लाइनें लगी हैं। किसान का नंबर दो-तीन दिन में आता है और तब तक बरसात हो गइ, तो उसका माल सड़ जाता है। मंडी की भी तो सीमा है ।
मध्य प्रदेश में किसानों ने खेत में प्याज के रूप में सोना बोया था। लेकिन जब बंपर फसल आई, तो सपने कांच की किरचों की तरह बिखर गए। एक महीने पहले फसल के वाजिब दाम की मांग को लेकर हुआ किसान आंदोलन हिंसक हो गया था और सरकार ने प्याज को आठ रुपये किलो खरीदने की घोषणा कर दी थी। 30 जून तक प्रदेश की विभिन्न मंडियों में लगभग सात लाख टन प्याज की खरीद हो चुकी है। राज्य में हर साल तकरीबन 32 लाख टन प्याज होता है और उनके भंडारण की क्षमता दस फीसदी से भी कम है।
यहां पैदा होने वाले प्याज की क्वालिटी ऐसी नहीं कि निर्यात हो सके। इसलिए वह केवल स्थानीय बाजार की मांग ही पूरी करता है। प्याज पर आधारित कोई खाद्य प्रसंस्करण कारखाने भी यहां नहीं हैं। पिछले साल भी राज्य सरकार ने किसान का प्याज छह रुपये किलो में खरीदा था और इसके चलते प्रदेश सरकार को कोई सौ करोड़ रुपये का घाटा हुआ था। इस बार एक तो किसान आंदोलन का दवाब है, दूसरा प्रदेश की विधानसभा के चुनाव को एक ही साल बचा है, ऐसे मौके पर कोई भी सरकार अलोकप्रिय होने का कोई खतरा नहीं लेना चाहेगी, सो जमकर प्याज की खरीद की जा रही है।
इसीलिए सरकार घाटा उठाकर भी प्याज खरीद रही है, लेकिन इसके बावजूद किसान संतुष्ट नहीं हैं। कहा गया था कि खरीदे गए प्याज के दाम का आधा तत्काल नगद मिलेगा और शेष धन बैंक के माध्यम से किसान के खाते में जाएगा। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा और  किसान मजबूरी में मंडी की जगह स्थानीय व्यापारी को ही चार से पांच रुपये किलो अपने माल बेच रहा है।
इसके बावजूद राज्य सरकार के आंकड़े कह रहे हैं  कि 11 जिलों- सीहोर, राजगढ़, इंदौर, झाबुआ, उज्जैन, देवास, रतलाम, शाजापुर, आगर-मालवा, शिवपुरी और रीवा में प्याज बुवाई के रकबे से कई गुणा ज्यादा प्याज मंडी में खरीद लिया गया। असल में, हो यह रहा है कि थोक व्यापारी खुले बाजार से या फिर पिछले साल वेयर हाउस में रखे प्याज को तीन रुपये किलो खरीद रहा है, एक रुपये किलो परिवहन और एक रुपये किलो रिश्वत लगाकर आठ रुपये में माल बेच रहा है और इस तरह उसे बगैर खेती किए ही तीन रुपये प्रति किलो का मुनाफा हो रहा है। अब इस मामले की जांच भी हो रही है, लेकिन किसान तो खुद को ठगा-सा ही महसूस कर रहा है।
यह मामला सिर्फ मध्य प्रदेश का नहीं है और न ही केवल प्याज का है। देश के अलग-अलग हिस्सों में हर साल टमाटर, आलू, मिर्ची या अंगूर और भी अन्य फसलों के साथ ऐसा होता रहता है। भरमार से बंटाधार की इस समस्या के निराकरण के लिए भंडारण की व्यवस्था को बढ़ाना तो जरूरी ही है, साथ ही जिला स्तर पर प्रसंस्करण कारखाने लगाने, सरकारी खरीदी केंद्र ग्राम स्तर पर स्थापित करने, किसान की फसल को निर्यात के लायक उन्नत बनाने के प्रयास अनिवार्य हैं। किसान को केवल उसके उत्पाद का वाजिब दाम ही नहीं चाहिए, वह यह भी चाहता है कि उसके उत्पादों का सड़ाकर या फेंककर निरादर न हो और उससे लोगों का पेट भरे।

सोमवार, 3 जुलाई 2017

control on NGO business


एनजीओ के ‘धंघे’ पर अंकुश

पंकज चतुर्वेदी
जरा पिछले साल नवंबर का महीना याद रखं, जब सरकार ने वित्तीय ईमानदारी और पारदर्श्शिता के लिए एक  कड़ा और अप्रत्याशित कदम उठाते हुए पांच सौ और हजार के नोट पर पाबंदी लगा दी थी। नोटबंदी के साथ-साथ देश को कैशलेस बनाने की मुहिम शुरू की गई थीं , वहीं बेनामी संपत्ति को जब्त कर देश में बढ़ रहे अवैध रीयल स्टेट के कारोबार पर लगाम लगाई थी। उसी दौर में एक ऐसा कदम भी उठाया गया था जिसकी कम चर्चा हुई लेकिन उसकी मार गहरी हुई, वह था 20,000 एनजीओ यानि गैर सरकारी संगठनों का लाइसेंस रद्द कर देना। हालांकि देश के सामाजिक विकास में एनजीओ की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है, लेकिन यह भी सच है कि बहुत से एनजीओ के लिए उनकी संस्था और उसे मिलने वाला दान, समाज से ज्यादा स्वयं के फायदे का जरिया रहा है। कई एक एनजीओ गोपनीय तरीके से देश या सरकार विरोधी आंदोलनों को मदद देते रहे हैं। कई एनजीओ विदेश से मिले धन के दम पर धर्मांतरण जैसी गतिविधियों में भी लिप्त होते हैं। हाल ही में सरकार ने उसी दिशा में एक और कदम उठाते हुए अपने वित्तीय लेन-देन व व्यय का ब्यौरा ना देने वाले 1300 से अधिक एनजीओ को चेतावनी जारी की है।

भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने ऐसे 1927 गैरसरकारी स्वयंसेवी संगठनों (एनजीओ) को नोटिस जारी किए है जो अपने विदेशों से मिले दान के खर्च का विवरण दे पाने में विफल रहे हैं। विदेशी सहायता से संबंधित बैंक खातों का ब्यौरा नहीं दे रहे एनजीओ को मंत्रालय की ओर से नोटिस जारी कर कानूनी कारवाई करने की चेतावनी दी गई है । नियमानुसार किसी भी एनजीओ को एक ही बैंक खाते में विदेशी सहायता प्राप्त करनी होती है । इस खाते को प्रमाणित कराना भी अनिवार्य होता है । ऐसे सभी संगठनों का विदेशी सहायता नियमन कानून (एफसीआरए) के तहत भी पंजीकरण कराना जरूरी है । मंत्रालय ने 7 जून को 2025 एनजीओ को 15 दिन के भीतर अपने खाते प्रमाणित कराने को कहा था। इसका पालन करने में नाकाम रहे 1927 एनजीओ को फिर से चेतावनी जारी की गई है। मंत्रालय ने विदेशी सहायता प्राप्त कर रहे संगठनों से अपनी ऑडिट रिपोर्ट भी जमा कराने को कहा है । ऐसे सभी संगठनों को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में एक अप्रैल से नौ महीने के भीतर आय व्यय के ब्यौरे के साथ ऑडिट रिपोर्ट देना अनिवार्य होता है.
याद ही होगा कि इस्लामिक प्रवचनकर्ता जाकिर नायक की स्वयं सेवी संस्था इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन(आईआरएफ) की जांच जब राश्ट्रीय जांच एजेंसी ने षुरू की थी तो उसके 78 बैंक खातों में संदिग्ध गतिविधियों पाई गई थीं। पता चला था कि समाज सेवा के लिए एकत्र किए गए पैसे का कोई सौ करोड़ रूप्ए जमीन-जायदाद के धंधे में लगा दिया गया था।  र्प्यावरण केमुद्दों पर काम करने वाले अंतरराश्ट्रीय संगठन ग्रीन पीस इंडिया के विदेशी मदद लेने पर रोक का मसला भी चर्चा में रहा है। सरकार का आरोप है कि यह संगठन विेदश से पैसे ले कर ऐसे आंदोलनों में षामिल है जोकि देश की प्रगति में बाधक हैं।गुजरात दंगा पीड़ितों के लिए संघर्श कर रहीं तीस्ता सितलवाड और जावेद आंनद के एनजीओ पर पाबंदी में सियासती गंध भी चर्चा मं रहा है।
सनद रहे इस समय देश में लगभग 33,000 एनजीओ चल रहे थे जिसमें से सरकार ने 20,000 एनजीओ के लाइसेंस रद्द कर दिए है। इससे एनजीओ को एक कारोबार के रूप में चलाने वाले लोगों को बड़ा झटका लगा है। गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक मोदी सरकार फेरा नियमों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करते हुए पिछले 3 साल में 10 हजार एनजीओ का पंजीकरण रद्द कर चुकी है। ये सभी संगठन फेरा के तहत अपने सालाना आय-व्यय के ब्योरे को सरकार को मुहैया कराने में नाकाम रहे जबकि फेरा के उल्लंघन के दोषी पाए गए 1,300 से अधिक एनजीओ के पंजीकरण का नवीनीकरण आवेदन खारिज कर दिया गया है। इसके अलावा करीब 6,000 एनजीओ को मंत्रालय ने कोर बैंकिंग सुविधा वाले बैंक खाते खुलवाने का निर्देश देते हुए इन्हें बैंक खातों का विवरण देने का निर्देश दिया है। मंत्रालय ने यह कार्रवाई उस रिपोर्ट के आधार पर की है, जिसमें कहा गया है कि अधिकांश संगठनों ने सहकारी या ऐसे सरकारी बैंकों में खाते खुलवाए हैं जिनमें इंटरनेट आधारित कोर बैंकिंग सुविधा नहीं है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि वर्ष 2014 से लेकर 2016 तक एनजीओ ने विदेशों से 50944 करोड़ रुपये लिए। लगातार तीन वर्ष तक वित्तीय जानकारी ना देने के कारण वर्ष 2011 में 21 हजार और 2014 में 10343 एनजीओ को नोटिस जारी किए गए। सालभर की वित्तीय जानकारी और नोटिस का जवाब ना देने पर वर्ष 2012 में 4138 एनजीओ और 2015 में 10020 एनजीओ के लाइसेंस रद्द कर दिए गए।
ऐसा नहीं है कि सरकार केवल एनजीओ पर शिकंजा ही कस रही है, हाल ही में उनके लिए एक राहतभरी खबर भी है। विदेशी धन लेने वाली एनजीओ के लिए राहतभरी खबर है. विदेशी अभिदाय विनियमन अधिनियमन (एफसीआरए) के अतंर्गत आने वाले एनजीओ अब अपना पंजीकरण करा सकेंगे।  इनमें वे संस्थाएं भी षािमल हैं जिनके लाईसेंस रद्द किए गए थे। उन्हें 14 जून तक का समय दिया गया था। वे ही एनजीओ संचालक इस योजना में हिस्सा बन पाए थे जिन्होंने वित्तीय वर्ष 2010-11 से लेकर 2014-15 तक का इनकम टैक्स रिटर्न बेवसाइट पर अपलोड किया था।
यह जान लें कि देश में हजारों एनजीओ बेहद सकारात्मक और परिणामकारी कार्य कर रहे हैं। ये सामाजिक उत्थान के साथ-साथ लोगों को रोजगार देने में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। कुछ संस्थाओं के काले कारनामों के चलते सभी संस्थआों को संदिग्ध नहीं माना जा सकता।

शनिवार, 1 जुलाई 2017

GST. open Market and weekly haat-bazar


मुक्त मंडी और हाट-बाजार

पहले कहा जाता था कि भारत गांवों में बसता है और उसकी अर्थव्यवस्था का आधार खेती-किसानी है, लेकिन मुक्त अर्थव्यवस्था के दौर में यह ‘पहचान’ बदलती-सी लग रही है। लगता है कि सारा देश बाजार बन रहा है और हमारी अर्थव्यवसथा का आधार खेत से निकल कर दुकानों पर जा रहा है।




Advertisement

असल में सारे देश के हाट-बाजार के पीछे केवल वे नहीं होते, जो सामने फुटपाथ पर अपना सामान बेचते हैं, और भी कई लोगों की रोजी-रोटी इनसे चलती है।


यह उदार अर्थव्यवस्था का दौर है। पूरी दुनिया एक मुक्त मंडी के रूप में बदल गई है। तेजी से मॉल संस्कृति विकसित हो रही है। इंटरनेट पर अलग बाजार फैल रहा है। घर बैठे खरीदारी की सुविधाएं उपलब्ध हैं। इन सबके बावजूद पुराने हाट-बाजार की परंपरा अब भी बनी हुई है, बल्कि लगातार समृद्ध हो रही है। गांवों-कस्बों में ही नहीं, महानगरों में भी मॉल संस्कृति के बरक्स साप्ताहिक बाजार का आकर्षण बना हुआ है। इन बाजारों और इनमें कारोबार करने वालों की स्थिति और हाट-बाजार की अर्थव्यवस्था के बारे में बता रहे हैं पंकज चतुर्वेदी।

दिल्ली की पूर्वी सीमा पर बनी रिहाइशी कॉलोनी दिलशाद गार्डन सन अस्सी के आसपास बसनी शुरू हुई थी। दिल्ली-शाहदरा को मिला कर इसका नाम दिलशाद पड़ा। यहां डीडीए फ्लैट बने और मध्यवर्गीय लोग आ बसे। उसी समय वहां कुछ रेहड़ी-पटरी वाले सब्जी और कुछ सामान शाहदरा से लाकर बेचने लगे। नब्बे के दशक में यहां बड़ा बाजार बन गया, लेकिन उससे दोगुना बड़ा बाजार उन रेहड़ी-पटरी वालों का हो गया। उसने साप्ताहिक बाजार का स्वरूप ले लिया था। चूंकि इस इलाके में मंगलवार को बाजार-बंदी होती है, सो साप्ताहिक बाजार उसी दिन भरने लगा। आज यहां का बाजार हर गली में फैल गया है और इसकी कुल लंबाई सात किलोमीटर हो गई है।  दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की हर कॉलोनी में ऐसे साप्ताहिक बाजार आज भी लोगों की जीवन रेखा बने हैं। दिल्ली में ऊंची इमारतों में पूरी तरह वातानुकूलित बाजार यानी मॉल के ठीक सामने लगने वाले इन बाजारों में कंधे छीलती भीड़ देख कर कई लोगों को हैरानी हो सकती है।
दिल्ली के डीडीए फ्लैट कालकाजी का साप्ताहिक बाजार हो या वसंत विहार जैसे संभ्रांत इलाके का बुध बाजार, करोलबाग और विकासपुरी का मंगल बाजार या फिर सुदूर भोपाल, बीकानेर या सहरसा के साप्ताहिक हाट-बाजार; जरा गंभीरता से देखें तो ये सामाजिक समरसता का अनूठा उदाहरण हैं। दैनिक मजदूरी करने वाला हो या अफसर की बीवी या फिर खुद दुकानदार, सभी आपको यहां मिल जाएंगे। दिल्ली में जिस दिन बाजार की छुट्टी होती है, उस दिन सस्ता बाजार अपनी रौनक पर होता है। वैसे दिल्ली का सबसे पुराना साप्ताहिक बाजार ‘चोर बाजार’ के नाम से मशहूर है। पहले यह लाल किले के सामने मैदान में लगता था, फिर सुरक्षा कारणों से जामा मस्जिद से दरियागंज तक लगने लगा। यहां जूते, किताबें, ब्रांडेड कपड़े, आटो पार्टस, हार्डवेयर, रसोई के बर्तन, सभी कुछ इतनी कम कीमत पर मिल जाते हैं कि हैरानी होती है।
ऐसे साप्ताहिक बाजार पूरे देश के कस्बों, शहरों और गांवों में लगते हैं। ये एक तरह से मेले की तरह होते हैं। कम क्रय क्षमता वाले लोग, घर से कम निकलने वाली महिलाओं, नई गृहस्थी जमाने वाले युवाओं के लिए यह वरदान होते हैं। यहां छोले-भटूरे, चाट-पकौड़ी, पूड़ी-तरकारी, फल-सब्जियां, नमकीन, कपड़े, नकली जेवर, जूते-चप्पल, पर्स, मेकअप का सामान, रसोई के बर्तन, गद्दे-रजाई-चादर, चाकू-छुरी सब कुछ उपलब्ध होता है। हकीकत यह है कि ये बाजार रोजगार की तलाश में अपने घर-गांव से पलायन कर आए निम्न आय वर्ग के लोगों की जीवनरेखा होते हैं। आम बाजार से सस्ता, चर्चित ब्रांड से मिलता-जुलता सामान, छोटे, कम दाम वाले पैकेट, घर के पास और देर रात तक सजा बाजार। पहले कहा जाता था कि भारत गांवों में बसता है और उसकी अर्थव्यवस्था का आधार खेती-किसानी है, लेकिन मुक्त अर्थव्यवस्था के दौर में यह ‘पहचान’ बदलती-सी लग रही है। लगता है कि सारा देश बाजार बन रहा है और हमारी अर्थव्यवसथा का आधार खेत से निकल कर दुकानों पर जा रहा है। भारत की एक प्रमुख व्यावसायिक संस्था के फौरी सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि दुनिया में सबसे ज्यादा दुकानें भारत में हैं। जहां अमेरिका जैसे विकसित या सिंगापुर जैसे व्यापारिक देश में प्रति हजार आबादी पर औसतन सात दुकानें हैं, वहीं भारत में यह आंकड़ा ग्यारह है। उपभोक्ताओं की संख्या की तुलना में भारत सबसे अधिक दुकानों वाला देश बन गया है।
सवाल है कि इस आंकड़े को उपलब्धि मान कर खुश हों या अपने देश के पारंपरिक ढांचे के दरकने की चेतावनी मान कर सतर्क हो जाएं। इसी सर्वे के अगले हिस्से में बताया गया है कि भारत का मात्र दो प्रतिशत बाजार नियोजित है, शेष अट्ठानबे प्रतिशत असंगठित है और उसकी कोई पहचान नहीं है। यह असंगठित बाजार बहुत हद तक कानून सम्मत भी नहीं है। दिल्ली में सवा करोड़ की आबादी में बारह लाख दुकानें हैं! खोखे, गुमटी, रेहड़ी पर बाजार अलग है! कुल मिला कर देखें तो प्रत्येक दस आदमी पर एक दुकान है! ०
कहां से आते हैं दुकानदार
वह बनारस में रिक्शा चलाता था, फिर किसी के कहने पर दिल्ली आ गया। यहां चांदनी चौक में एक थोक के मसाले की दुकान पर रेहड़ी चलाने लगा। धीर-धीरे लाभ-हानि का कुछ गणित समझ आया, तो उसी दुकान से थोड़ा-थोड़ा मसाला लेकर बाहरी दिल्ली की कच्ची कॉलोनियों में बेचने लगा। फिर वहां हाट-बाजार भरने लगा तो उसका ठिया बन गया। अब वह सप्ताह के प्रत्येक दिन किसी न किसी बाजार में जाता है। पहले रिक्शे से माल ढोता था। अब एक पुराना स्कूटर लेकर उसे रिक्शे से जोड़ दिया है। उसकी बेटी भी अब बाजार में उसका साथ देती है।  ऐसे ही कुछ लोग करीबी गांवों से सब्जी लाते हैं, तो कुछ पिलखुवा या हरियाणा से चादर और तौलिया जैसे सामान थोक के भाव उठा लेते हैं। कइयों का संपर्क एक्सपोर्ट करने वाली इकाइयों से है। वहां का किसी नुक्स के कारण लौटाया गया माल उनके लिए हाट-बाजार का हॉट-सेल बनता है। इन बाजार वालों में कई घाटे या किसी अन्य कारणों से अपनी दुकान या बड़ा व्यापार गंवा चुके लोग भी होते हैं तो कई एक सुदूर कस्बे से अपनी किस्मत चमकाने आए लोग भी। कुल मिला कर ऐसे बाजारों में अगर ग्राहकों की बड़ी संख्या प्रवासी या पलायन से उपजी आबादी की होती है, तो विक्रेता भी इसी श्रेणी के होते हैं। ०
कई आश्रित हैं इस बाजार के
असल में सारे देश के हाट-बाजार के पीछे केवल वे नहीं होते, जो सामने फुटपाथ पर अपना सामान बेचते हैं, और भी कई लोगों की रोजी-रोटी इनसे चलती है। एक तो हर जगह बाजार लगाने की जिम्मेदारी स्थानीय निकाय यानी नगर निगम से लेकर ग्राम पंचायत तक की होती है। हर विक्रेता से उसकी पैठ या बैठकी का निश्चित शुल्क वसूला जाता है। बहुत-सी जगहों पर निकाय इसे ठेके पर उठा देते हैं और ठेकेदार के आदमी प्रत्येक दुकानदार से एक शाम की वसूली करते हैं। यह राशि पंद्रह रुपए से सौ रुपए तक होती है। बाजार के लिए लकड़ी के फट्टे या टेबल, ऊपर तिरपाल, और बैटरी से चलने वाली एलईडी लाइट की आपूर्ति करने वालों का बड़ा वर्ग पूरी तरह इन हाट बाजार पर ही निर्भर होता है। कई लोग ऐसे बाजारों के सामान के परिवहन के लिए वाहन उपलब्ध कराते हैं।  इसके अलावा बहुत-सा धन ऐसा भी इन बाजारों के जरिए जेबों तक घूमता है, जिसका कोई हिसाब-किताब नहीं होता, जैसे कि पुलिस का हफ्ता, सफाई वाले को अतिरिक्त पैसा देना और कई जगह स्थानीय रंगदारी भी। हाट-बाजार में दुकान लगाने वालों का अभी तक कभी कोई सर्वेक्षण हुआ नहीं, लेकिन अनुमान है कि दिल्ली, गाजियाबाद, नोएडा, फरीदाबाद, गुरुग्राम में लगने वाले कोई तीन सौ से अधिक बाजारों में पैंतीस से चालीस हजार दुकानदार हैं। पूरे देश में यह संख्या लाखों में होगी। इसके बावजूद न तो इनको कोई स्वास्थ्य सुविधा मिली है और न ही बैंक से कर्ज या ऐसी कोई बीमा की सुविधा।
यह पूरा काम बेहद जोखिम का है, बरसात हो गई तो बाजार नहीं लगेगा, कभी-कभी त्योहारों के पहले जब पुलिस के पास कोई संवेदनशील सूचना होती है तो भी बाजार नहीं लगता। ऐसे दुकानदारों का वैसे तो पूरा सप्ताह ही एक बाजार से दूसरे बाजार में अपना ठीया जमाने, ग्राहक को बुलाने में बीतता है, थोड़ा भी समय मिला तो उन्हें खुद बाजार जाकर अपनी दुकान के लिए थोक व्यापारी से माल लेना होता है। पिछले दिनों पांच सौ और हजार के नोट बंद होने के दौरान उत्पन्न नगदी के संकट के चलते ऐसे बाजारों का हाल बुरा हो गया था। यह अरबों रुपए महीने की नगद अर्थव्यवस्था है। यहां न तो पेटीएम या कार्ड स्वाईप मशीन का चलन है, न यहां जीएसटी की चर्चा होती है। पटरी बाजारों ने नए बसते शहर देखे, चमकते मॉल का आगमन देखा, घरों में खुलती दुकानें देखीं, कई तरह के विरोध सहे, लेकिन सप्ताह के किसी तयशुदा दिन सड़क के किनारे, भयंकर ट्राफिक के बीच भारी चिल्लपों वाले बाजार की रौनक कभी कम नहीं हुई। ०
कराची का क्लिफ्टन बाजार
पाकिस्तान में कराची के लोगों का असल चेहरा देखना हो, तो क्लिफ्टन समुद्र तट पर हर रविवार और मंगलवार को भरने वाला हाट-बाजार जरूर देखना होगा। क्लिफ्टन के समुद्री तट की रेत पर कई किलोमीटर के इलाके में भारतीय साप्ताहिक हाट-बाजार से कई गुना बड़ा बाजार। कोई दस हजार कारों की पार्किंग, लगभग पांच हजार दुकानदार और साठ से अस्सी हजार लोग, एक साथ बाजार करते हुए। यहां जूते से लेकर ऊनी कपड़ों तक, रसोई के बर्तन, इलेक्ट्रॉनिक सामान, सजावट के हस्तशिल्प, किताबें, सीडी, खानपान सब कुछ एक ही जगह मिल जाता है। बाजार के एक सिरे पर बकायदा ‘प्राथमिक उपचार’ का स्टाल है। कहीं कोई पुलिस या सुरक्षाकर्मी नहीं दिखता। बाजार में कई हिंदू महिलाएं सिर पर मांग और ंिबंदी के साथ दिख जाती हैं।
कई किलोमीटर तक फैले बाजार में किसी भी तरह के वाहन का प्रेवश नहीं होता। बाजार में कम उम्र के पठान लड़के बड़ी-सी टोकरी लिए जगह-जगह खड़े मिल जाते हैं, जो खरीदारों का सामान कार तक पहुंचाते हैं। एक अनुशासित और मिश्र संस्कृति के कराची की अनूठी मिसाल है यह बाजार! यहां भी हिंदी फिल्मों के संगीत की सीडी की दर्जन-भर दुकानें दिखती हैं। यहां के हिंदी फिल्मों के बाजार का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि हाट में नई से नई बालीवुड फिल्म की सीडी आराम से साठ पाकिस्तानी रुपए, यानी भारतीय रुपए में चालीस से भी कम में खरीदी जा सकती है! वहां सब्जी बेचने वाले अधिकांश हिंदू होते हैं, जोकि मलेर या लालुखेत जैसी बस्तियों में रहते हैं।
वे नहीं चाहते साप्ताहिक बाजार
दिल्ली से सटे गाजियाबाद का नवयुग मार्केट वहां के कनाट प्लेस की तरह है। यह बाजार पहले मंगलवार को बंद रहता था, सो पिछले चालीस सालों से यहां उसी दिन बाजार भरने लगा। फिर स्थानीय व्यापारियों के कहने पर बाजार रविवार को लगने लगा। इसमें कोई पांच हजार रेहड़ी-पटरी वाले आते हैं। पिछले कुछ महीनों से साप्ताहिक बाजार के मसले पर व्यापारियों और पटरी दुकानदारों में खींचतान चल रही है। नाराज व्यापारियों का कहना है कि नवयुग मार्केट के साप्ताहिक बाजार में नब्बे प्रतिशत दुकानदार देवबंद, सहारनपुर, बिजनौर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, हापुड़, दिल्ली, सीलमपुर आदि क्षेत्रों से आते हैं, जिनकी कोई पहचान नहीं है। नवयुग मार्केट में ढाई सौ शोरूम और चार सौ दुकानें हैं। करीब डेढ़ हजार परिवार इस अवैध पैठ के चलते रविवार को दिन भर घरों में बंधक बन कर रह जाते हैं।
यह मामला अकेले गाजियाबाद का नहीं है। देश के अलग-अलग हिस्सों से समय-समय पर इन बाजारों को बंद करने की मांग उठती रहती है। इसके पीछे गिनाए जाने वाले कारण लगभग एक जैसे होते हैं:
० बाजार के कारण यातायात ठप्प हो जाता है और इलाके के रहवासी अपने घर में बंधक हो जाते हैं।
० ऐसे बाजारों में गिरहकटी होती है, अपराधी आते हैं।
० ये बाजार गंदगी फैलाते हैं और इसके चलते आवार पशु यहां आ जाते हैं।
मगर असलियत दूसरी है। ऐसे बाजारों को बंद कराने के पीछे स्थानीय व्यापारियों के कारण दीगर होते हैं:
० बाजार से कम कीमत पर सामान मिलने से हर सप्ताह घर का सामान खरीदने वाले लोग उनकी दुकानों पर न जाकर हाट-बाजार का इंतजार करते हैं।
० हाट-बाजार में मिलने वाली सस्ती चीजों और मोलभाव की आदत के कारण ग्राहक अक्सर उनकी दुकान पर भी मोलभाव करते हैं।
० कई बार साप्ताहिक बाजारों से उगाही करने वाले गिरोहों के आपसी टकराव होते हैं और इसी के चलते वे बाजार को बंद कराने की साजिश रचते हैं। ०
बस्तर का हाट
बस्तर अक्सर तभी चर्चा में आता है, जब वहां कुछ खून बहता है, लेकिन वहां बारूद की गंध के अलावा बहुत कुछ है। उसमें सबसे महत्त्वपूर्ण है अपनी परंपराओं, जीवनशैली और सभ्यता को सहेज कर रखने का जीवट और कला। बस्तर का क्षेत्रफल केरल राज्य से अधिक है और यहां के घने जंगलों में आदिवासियों के छोटे-छोटे करीब साढ़े तीन हजार गांव हैं। हर पांच-छह गांव के मध्य एक हाट होता है, जहां लोग अपनी जरूरत की वस्तुएं खरीद-बेच सकते हैं। बस्तर में लगने वाले इन हाटों में यहां की संस्कृति, खानपान और रहन-सहन के तौर-तरीकों को बेहद करीब से जानने-समझने का मौका मिलता है। यहां के बाजारों में रोजमर्रा की चीजें, कपड़े, स्थानीय आभूषण, चींटी की चटनी, सल्फी और पारंपरिक मुर्गा लड़ाई देख सकते हैं, जो बस्तर को खास बनाते हैं। बस्तर के आदिवासियों का जीवन कुछ दशक पहले तक पूरी तरह जंगलों पर निर्भर था, महुआ, इमली, बोंडा, चिरौंजी की गुठली जैसे उत्पाद लेकर वे साप्ताहिक बाजार में जाते, वहां से नमक जैसी जरूरी चीजें उसके बदले में ले लेते। नक्सलियों के बढ़ते असर पर रोकथाम के लिए आंचलिक क्षेत्रों तक सुरक्षा बल तैनात किए गए। ये सुरक्षाकर्मी भी इन्हीं हाट-बाजार में अपनी जरूरत का सामान लेने जाने लगे। नक्सलियों ने वहां घात लगा कर कई बार सुरक्षाकर्मियों पर हमले किए। उसके बाद वहां के बाजार सिमटने लगे।
बस्तर के घनघोर जंगलों के बीच बीजापुर जिला मुख्यालय से लगभग पचास किलोमीटर दूर बासागुड़ा के आदिवासी जानते नहीं थे कि वे जिस चिरौंजी को औने-पौने दाम में बचेते रहे हैं, वह उन्हें मालामाल कर सकती है। चिरौंजी की पैदावार के लिए मशहूर बासागुड़ा के लोग अब तक बिचौलियों के शोषण का शिकार थे, जिन्हें जिला प्रशासन ने नई राह दिखाते हुए उनके भविष्य को संवारने का अवसर प्रदान किया है। यहां की औरतों के स्वसहायता समूह ने साप्ताहिक बाजार के जरिए अपने इलाके की तकदीर बदल दी। बासागुड़ा साप्ताहिक बाजार में आदिवासी नमक के बदले बहुत कम दर पर चिरौंजी बेचा करते थे। इस प्रथा के चलते यहां के आदिवासियों को अपनी वनोपज का वाजिब दाम कभी नहीं मिल पाया। अब राज्य सरकार के प्रयास से चिरौंजी की गुठली साप्ताहिक बाजार में पचास से सौ रुपए की दर से कोचियों और लघु वनोपज समिति द्वारा खरीदी जा रही है। यहां सालाना दो सौ क्विंटल से ज्यादा चिरौंजी गुठली की आवक होती है। इस आवक को देखते हुए ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाने के मकसद से जिला प्रशासन ने बासागुड़ा में डेढ़ लाख रुपए स्वीकृत कर चार चिरौंजी मिलिंग मशीनें स्थापित कराई। हीरापुर में चिरौंजी प्रसंस्करण केंद्र स्थापित किया गया, जहां साप्ताहिक बाजार से चिरौंजी की गुठली क्रय कर मिलिंग शुरू की गई। ०

मेरे बारे में