तालाब की बातें

तालाब की बातें
जल है तो जीवन है

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

The smell of rotten system in onion

आफत बन गई प्याज की बंपर फसल

पंकज चतुर्वेदी

बुंदेलखंड के छतरपुर जिले का एक छोटा सा कस्बा है हरपालपुर, जिसकी हर गली-मुहल्ला इन दिनों प्याज के सड़ने की बदबू से तंग है। असल में हुआ यह कि कोई 2700 कुंटल प्याज ले कर एक मालगाड़ी यहां के रेलवे स्टेशन पर आई और माल को खुले में उतार दिया गया। अगली ही रात जमकर पानी बरसा और दो दिन बाद तगड़ी धूप निकल आई। जिला प्रशासन के पास इस माल को लाद कर गंतव्य तक पहुंचाने के लिए ना तो समय था और ना ही ट्रक व मजदूर। अफसरों ने कुछ ट्रकों को जबरदस्ती जब्त भी किया लेकिन तब तक प्रकृति ने अपना खेल दिखा दिया। जब हालात नियंत्रण के बाहर हो गए तो एक बुलडोजर मंगवा कर सड़े प्याज को हटवा दिया गया। यही नहीं प्याज का दरबार आम लेागों के लिए खोल दिया गया कि जो जितना चाहे उठा कर ले जाए। हालांकि यह कोई धर्मार्थ काम नहीं था, प्याज सड़ने का ठीकरा कर्मचारियों पर ना फूटे, उससे बेहतर है कि अज्ञात आदमियों पर चोरी का आरोप लगा दिया जाए । ना तो यह मध्यप्रदेश का एक मात्र ऐसा ‘हरपालपुर’ है और ना ही धरती के आशीश व कियसान के श्रम-फल की ऐसी दुर्गति का पहला उदाहरण।

मध्यपदेश में ऐसे हालात लगभग सभी उपज मंडियो, रेलवे स्टेशन और गोदामों के हैं, जहां सड़कों पर प्याज मारा-मारा घूम रहा है और असली किसान अपना माल बेचने के लिए मंडी के बाहर मारा-मारा।  सरकार आठ रूपए किलो प्याज खरीद रही है और सरकारी राशन की दुकानों पर तीन रूपए किलो बिकवा रही है। उधर बारिश में खराब हो गए प्याज को ग्राहक खरीद नहीं रहे हैं, राशन की दुकान वाले रो रहे हैं कि उन्हें आधे सउ़े प्याज दिए जा रहे हैं जिसका घाटा उनके सिर-माथे होगा। वैसे भी संसाधन इतने सीमित हैं कि ना तो इतना प्याज राशन की दुकानों तक पहुंच पा रहा है और ना ही ग्राहक भी इतना माल खरीद पा रहा है। उधर बरसात की झड़ी षुरू हो गई है और राज्य की बड़ी मंडियों में पांच सौ तक ट्रैक्टर-ट्राली की लाईनें लगी हैं किसान का नंबर दो-तीन दिन में आता है और तब तक यदि बरसात हो गई तो उसका माल सड़ जाता है।  आए रोज मंडियों के बाहर किसान प्रदर्शन कर रहे हैं लेकिन मंडी की भी तो सीमा है ।
अभी छह महीने पहले ही बस्तर में मिर्च की केश क्राप बंपर हुई। जब किसान उसे  बाजार में ले कर गया तो रू. 15 से 20 प्रति किलो वाली हरी मिर्च के दाम पांच-छह रूप्ए भी नहीं मिले हालात यह है कि अब तुड़ाई व परिवहन की कीमत भी नहीं मिल रही है। याद करे कुछ महीनों पहले बाजार में प्याज की कमी इन दिनों समाज से ज्यादा सियासत, लेखन का मसला बन गया था। जब-तब ऐसी दिक्कतें खड़ी होती हैं निर्यात पर रोक, आयात पर जोर, सरकार और विरोधी दलों द्वारा कम कीमत पर स्टॉल लागने जैसे तदर्थ प्रयोग होते रहते हैं ।

इस बात को बेहद षातिर तरीके से छुपाया जाता है कि खेतों मेे पैदा होने वाली उपज की बाजार में कमी की असली वजह उचित भंडारण, बिचौलियों की अफरात और प्रसंस्करण उद्योगों की आंचलिक क्षेत्रों में गैर मौजूदगी है। उ.प्र के इटावा इलाके में कुछ दिनों पहले तक बीस हजार रूपए कुंटल बिकने वाला लहसुन हजार रूपए से नीचे आ गया है। ठीक यही हाल आलू का है। जिन किसानों ने बैंक से कर्ज ले कर उम्मीदों की फसल बोई थी, वह अब हताशा में बदल चुकी है। इसी साल जनवरी-फरवरी में मध्यप्रदेश के मालवा अंचल की पेटलावद इलाके में इस बार कोई पच्चीस सौ हैक्टेयर में टमाटर बोये गए थे, फसल भी बंपर हुई लेकिन जब किसान माल ले कर मंडी पहंुचा तो पया कि वहां मिल रहे दाम से तो उसकी लागत भी नहीं निकलेगी।  हालत यह रहे कि कई सौ एकड़ में पके टमाटरों को किसान तुड़वाया भी नहीं ।

उत्तर प्रदेश में हर दूसरे साल आलू की इतनी अधिक पैदावार हो जाती है कि बामुश्किल तीन सौ रूपए कुंटल का रेट किसान को मिलता है। राज्य के सभी कोल्ड स्टोरेज ठसा-ठस भरे होते हैं और किसान अपी फसल को खेत में सड़ते देखने को मजबूर होता है। उस समय भी आलू का चिप्स 200 रूप्ए किलो से कम नहीं
मध्यप्रदेश में किसानों ने खेत में प्याज के रूप में सोना बोया था, अपने सपनों को पूरा करने का सोना। लेकिन जब बंपर फसल आई तो सपने कांच की किर्च की तरह बिखर गए और सोना सपने के टूटने के मांनिंद बिखर गया। एक महीने पहले मप्र में अपनी फसल के वाजिब दाम की मांग को ले कर हुआ किसान आंदोलन हिंसक कहो गया था और सरकार ने प्याज को आठ रूपए किलो खरीदने की घोशणा कर दी थी। सरकार अब 15 जुलाई तक मंडीे में आने वाला पूरा प्याज खरीदने जा रही है। 30 जून तक प्रदेश की विभिन्न मंडियों में 60,47,764.96 कुंटल यानि लगभग सात लाख टन प्याज की खरीद हो चुकी है। सनद रहे कि राज्य में हर साल लगभ्र 32 लाख टन प्याज होता है और उसके भंडारण की क्षमता महज तीन लाख टन यानि दस फीसदी से भी कम है। एक बात और वैसे तो भारत चीन के बाद दुनिया का बसे बड़ा प्याज उत्पादक देश है और यहां से हर साल 13 हजार करोड़ टन  प्याज का निर्यात होता है, लेकिन मप्र में पैदा होने वाले प्याज की क्वालिटी निर्यात की गुणवत्ता के अनुरूप नहीं होती। सो यहां का उत्पाद केवल स्थानीय बाजार की मांग ही पूरी करता है। ना ही प्याज उत्पादन करने वाले जिलों में प्याज पर आधारित कोई खाद्य प्रसंस्करण कारखाने लगे हैं। अब प्याज को ज्यादा दिन खुले में रखा भी नहीं जा सकता, सो कई बार किसान को अपनी लागत तो दूर, प्याज खुदाई का पैसा भी नहीं मिलता। ऐसे में वह अपनी दिन-रात की मेहनत की फसल सड़क पर यूं ही फैंक देता है। पिछले साल भी राज्य सरकार ने किसान का प्याज छह रूपए किलो में खरीदा था और इसके चलते राजय षासन को कोई सौ करोड़ का घाटा हुआ था। इस बार एक तो आंदोलन का दवाब है, दूसरा प्रदेश की विधान सभा के चुनाव को एक ही साल बचा है, सो सरकार जमकर प्याज खरीद रही है, भले ही उसके पास उसके भंडारण या बिक्री की कोई व्यवस्था नहीं है और अंदाजा है कि इस साल प्याज खरीदी के कारण राज्य सरकार को दो सौ करोड़ की हानि हो सकती है।

सरकार घाटा उठाकर भी प्याज खरीद रही है, उसके बावजूद भी किसान संतुश्ट नहीं है। कहा गया था कि खरीदी गई प्याज के दाम का आधा तत्काल नगद भुगतान होगा और षेश धन बैंक के माध्यम से किसन के खाते में जाएगा। राजधानी भोपाल की करोंद मंडी सहित प्रदेशभर में किसान से माल खरीद कर पर्ची ही तीन-चार दिन बाद दी जा रही है और भुगातन का उसमें कोई उल्लेख नहीं होता। कई किसान पांच दिन तक पंक्तिं खड़े रहे लेकिन उनका नंबर नहीं आ रहा। एक तो ट्रक या ट्राली, जिस पर वह माल लाता है, उसका उतने दिन का किराया हो जाता है, फिर किसान अपने घर गांव से दूर मंडी के सामने खुले में पड़ा रहता है, उसका व्यय और फिर यदि बरसात हो गई तो माल खराब होने का खतरा, ऐसे हालात में किसान मजबूरी में मंडी की जगह स्थानीय व्यापाी को ही चार से पांच रूपए किलोे में माल बेच रहा है।
इसके बावजूद राज्य सरकार के आंकड़ कह रहे हैं कि ग्यारह जिलों- सीहोर, राजगढ़, इंदौर, झाबुआ,उज्जैन, देवास, रतलाम, षाजापुर, आगर-मालवा, शिवपुरी और रीवा में प्याज बुवाई के रकवे से कई गुणा ज्यादा प्याज मंडी में खरीद लिया गया। असल में हो है रहा है कि थोक व्यापारी खुले बाजार से या फिर पिछले साल वेयर हाउस में रखे प्याज को तीन रूपए किलो खरीद रहा है, एक रूपए किलो परिवहन की और एक रूपए किलो रिश्वत लगा कर आठ रूपए में माल बेच रही है और इस तरह उसे बगैर खेती किए तीन रूपए प्रति किलो का मुनाफा हो रहा है। अब इस मामले की जांच भी हो रही है, लेकिन किसान तो खुद को ठगा सा ही महसूस कर रहा है।
यह मामला ना तो केवल मप्र का है और ना ही केवल प्याज का। देश के अलग-अलग हिस्सों में हर साल टमाटर, आलू, मिर्ची या अंगूर और भी अन्य फसलों के साथ ऐसा होता रहता है। भरमार से बंटाधार की इस समस्या के निराकरण के लिए भंडारण की व्यवस्था को बढ़ाना तो जरूरी ही है, साथ ही जिला स्तार पर प्रसंस्करण कारखाने लगाने,  सरकारी खरीदी केंद्र ग्राम स्तर पर स्थापित करने, किसान की फसल को निर्यात के लायक उन्नत बनाने के प्रयास अनिवार्य है। किसान को केवल उसके उत्पाद का वाजिब दाम ही नहीं चाहिए, वह यह भी चाहता है कि उसके उत्पाद का सड़कर या फिंक कर अनादर ना हो और उससे लोगों का पेट भरे।

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